The ENLIGHTENMENT Of Nisargadatta Maharaj | The Eastern Lens
Author Name:The Eastern Lens
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Transcript:
(00:04) न्यूयॉर्क, लंदन, यूरोप से बड़े-बड़े फिलॉसोफर्स, प्रोफेसर्स फ्लाइट पकड़ कर मुंबई आ रहे थे। पूरी दुनिया के कोने-कोने से स्पिरिचुअल सीकर्स अपने-अपने आध्यात्मिक सवाल लेकर एक ही एड्रेस की तलाश में थे। एक छोटा सा कमरा जो एक बीड़ी की दुकान के ऊपर था। मुंबई की सबसे तंग और भीड़ भाड़ वाली गलियों [संगीत] में से एक में। यह सारे लोग वहां उस कमरे में एक ऐसे इंसान के पैरों में बैठे थे, जिनके पास कोई डिग्री नहीं थी। ना तो उनके पास कोई आश्रम था और ना ही वह कोई भगवा वस्त्र पहने थे। एक ऐसे इंसान जो गुजारे के लिए बीड़ी बेचते थे। शौक के लिए बीड़ी पीते
(00:50) थे। लेकिन उन्होंने वह हासिल कर लिया था जिसे पाने के लिए लोग सालों दर-बदर भटकते रहते हैं। मोक्ष, मुक्ति, एनलाइटनमेंट। कौन थे यह इंसान? और ऐसा क्या मिल गया था इन्हें जो दुनिया भर से लोग इनकी तलाश में आ रहे थे? यह है कहानी दुनिया के सबसे रोमांचक बीड़ी बेचने वाले की, [संगीत] निस्गदत्ता महाराज। मेरा नाम है ऋषभ एंड आप देख रहे हैं द ईस्टर्न लेंस। साल था 1897। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव कंद गांव में हनुमान जयंती के दिन एक बच्चा पैदा
(01:37) होता है जिसका नाम हनुमान जी के ही ऊपर मारुति रखा जाता है। मारुति की स्कूल में पढ़ाई [संगीत] सिर्फ चौथी कक्षा तक ही हुई थी क्योंकि उनकी असली शिक्षा स्कूल में नहीं बल्कि स्कूल के बाहर उनके अपने घर में हो रही थी। Maruti के पिता के एक दोस्त थे गोरे [संगीत] शास्त्री। वो घंटों लाइफ के गहरे सवालों पर डिबेट्स करा करते थे। इस दुनिया में असल क्या है? सेल्फ क्या है? मैं कौन हूं? छोटा सा Maruti यह सब सुनता रहता। उसे यह सब समझ तो नहीं आता पर इसके चलते उसके अंदर एक ऐसी आग लग गई थी जो समय के साथ और बढ़ने वाली थी। 18 साल की उम्र में Maruti
(02:21) के पिता की मृत्यु हो जाती है। इसी के चलते पैसा कमाने के लिए वह मुंबई शिफ्ट हो जाते हैं। शुरुआत में वो एक क्लर्क की नौकरी करते हैं। पर वहां मन ना लगने के कारण वो धीरे-धीरे पैसा [संगीत] जोड़कर एक बीड़ी की दुकान खोलते हैं। 40 की उम्र तक आते-आते उनकी कई बीड़ी की दुकानें हो गई थी। उनकी शादी और बच्चे भी हो गए थे। माने दुनिया की नजरों में वह एक सफल जिंदगी बिता रहे थे। मगर दुनिया को क्या पता था कि अंदर ही अंदर उन्हें एक बेचैनी थी जो खाए जा रही थी। एक ऐसी फीलिंग की कुछ मिसिंग है। पर क्या वो खुद नहीं जानते थे। और फिर 1933 में उनका एक दोस्त उन्हें
(03:04) किसी से मिलाने ले गया। जिसके चलते उनकी दुनिया पूरी तरह से बदल जाने वाली थी। उन इंसान का नाम था श्री सिद्धरामेश्वर महाराज। वो नवनाथ संप्रदाय के अध्यक्ष थे। एक ऐसी परंपरा जहां कोई फालतू के रिचुअल्स नहीं थे। सिर्फ एक ही फोकस था यह जानना कि तुम असल में कौन हो। मारुति उनसे 1933 में मिलते हैं और मिलते ही सिद्धरामेश्वर महाराज उनसे एक [संगीत] बहुत ही सिंपल पर खतरनाक बात कहते हैं। तुम वो नहीं हो जो तुम खुद को समझते हो। कोई कॉम्प्लेक्स टेक्निक नहीं, कोई सालों की पढ़ाई नहीं। उनके लिए इंस्ट्रक्शन सिंपल सी [संगीत] थी। अपने ध्यान को अंदर मोड़ो। आई एम माने
(03:50) मैं हूं की फीलिंग। मैं हूं के एहसास को पकड़ो। इससे पहले कि वो मैं एक दुकानदार हूं या मैं एक पति हूं बने। सिर्फ उस मैं हूं के एहसास में रहो। Maruti इस बात को एक जुनून की तरह पकड़ लेते हैं। बीड़ी [संगीत] की दुकान के पीछे बैठे हुए, कस्टमर्स का वेट करते हुए, अपनी जिंदगी के रोजमर्रा के काम करते हुए वो सिर्फ अपने आई एम माने मैं हूं के एहसास में डूबे रहते। उन्होंने इसके अलावा कोई स्क्रिप्चर्स नहीं पढ़े। कोई ब्रीथिंग [संगीत] एक्सरसाइजेस नहीं करी। सिर्फ एक ही काम किया पूरी जान लगाकर और फिर ठीक 3 साल बाद कुछ अद्भुत होता है। मगर उन्हें
(04:33) उनकी इस प्रैक्टिस से कुछ मिलता [संगीत] उससे पहले उन्हें सब कुछ खोना पड़ता है। हाय अगर आप यह वीडियो यहां तक देख रहे हो तो मैं आपको बता दूं कि आप उन 20% ऑडियंस में से हो जो यह वीडियो यहां तक देख रहे हो। इस साल मैंने खुद के लिए एक क्रेजी गोल सेट किया है। दैट इज ऑफ रीचिंग 50,000 सब्सक्राइबर्स। तो अगर यह गोल रीच करने में आप मेरी हेल्प करना चाहते हो तो चैनल को सब्सक्राइब जरूर करना। एंड नाउ बैक टू द वीडियो। [नाक से की जाने वाली आवाज़] 1936 में उनके [संगीत] गुरु सिद्धारामेश्वर महाराज की मृत्यु हो जाती है और [नाक से की जाने वाली आवाज़] मारुति
(05:10) [संगीत] इसकी वजह से अंदर से बिल्कुल टूट जाते हैं। इसी दुख के बीच उनका मन करता है कि मैं सब छोड़ के बस भाग जाऊं। दुकान परिवार मुंबई का शोर सब कुछ वो नंगे पैर हिमालय की तरफ निकल पड़ते हैं। पूरा भारत पैदल घूमने के लिए। सोचो चलते-चलते वह दिल्ली पहुंचते हैं। वहां सिद्धारामेश्वर महाराज के एक पुराने शिष्य उनसे मिलते हैं। मारुति उन्हें अपनी [संगीत] पूरी कहानी सुनाते हैं। पर उनकी सारी बातें सुनने के बाद वो शिष्य मारुति को एक ऐसी बात बताते हैं जो उनकी पूरी दुनिया बदल देने वाली थी। वापस जाओ। हिमालय में भागना सन्यास नहीं है। यह तुम्हारी ईगो है जो
(05:54) छुपने के लिए बेहतर जगह ढूंढ रही है। असल आजादी का कोई एड्रेस कोई पता नहीं होता। यह बात मारुति के दिल पर पत्थर की लकीर की [संगीत] तरह लगती है। वो रियलाइज करते हैं वो नेचुरल स्टेट, वो सहज समाधि जिसे वह पहाड़ों में ढूंढ रहे थे। वो किसी स्थान या वस्तु में नहीं है। वो सिर्फ यहां और अभी मिल सकती है। हियर [संगीत] एंड नाउ। यह समझ आते ही वह मुड़ते हैं और वापस मुंबई चले आते हैं। मगर जब वह वापस मुंबई आते हैं और अपनी साधना दोबारा शुरू करते हैं तो सब कुछ बदल चुका था। अब उनके अंदर किसी स्पेशल प्लेस, किसी खास जगह की चाह नहीं थी। किसी स्पेशल एक्सपीरियंस की भूख
(06:39) [संगीत] नहीं थी। उनके अंदर से कहीं पहुंचने का वहम खत्म हो चुका था और उस खालीपन [संगीत] उस एम्प्टीनेस में उनके गुरु की इंस्ट्रक्शन आई एम मैं हूं पूरी तरह से फिट बैठ गई थी। Maruti बाद में इसे डिस्क्राइब करते हुए बताते हैं मेरा मैं आए गायब हो गया। मेरे गुरु गायब हो गए। पूरी दुनिया गायब हो गई। जो बचा वो सिर्फ शांति थी। प्यार था। यह कोई रोशनी या कोई एक्सपीरियंस नहीं था जो आया और चला गया। यह एक रिकग्निशन था। उस चीज का पहचाना जाना था जो हमेशा से वहीं थी। हर इमोशन हर थॉट के पीछे। Maruti इसे नाम देते हैं निस्ग माने द नेचुरल [संगीत] स्टेट। एक
(07:26) ऐसी अवेयरनेस, एक ऐसी चेतना जिसे मेंटेन करने के लिए, बनाए रखने के लिए कोई एफर्ट नहीं चाहिए। क्योंकि हम सब वही हैं। इस रिकग्निशन के बाद Maruti अब एक नया नाम ले लेते हैं। निस्गदत्ता। निस्गदत्ता महाराज को सत्य ट्रुथ मिल गया था। और वो सत्य ऐसा था कि अगले 40 साल वो मुंबई की एक गंदी सी गली में बीड़ी की दुकान के ऊपर एक छोटे से मकान में बैठकर सिर्फ इसी के बारे में बात करते रहे। उस छोटे से 10/20 के कमरे में निस्गदत्त महाराज रोज बैठते भजन गाते अपने गुरु की तस्वीरों पर तिलक लगाते पीढ़ी फूंक से और इसके साथ-साथ वो बातें करते बातें उस परम
(08:15) सत्य की उनकी इन्हीं बातों को सुनने के लिए बड़े-बड़े फिलॉसफर्स पूरी दुनिया से आते जो लोग उन्हें वेदांत के ज्ञान से इंप्रेस करने की कोशिश करते वो फट से बोलते उस ज्ञान का क्या फायदा जो तुम जी ही नहीं रहे। बस याद करके बैठे हो। जब लोग उनके [संगीत] सामने रोते-धोते वो उन्हें डांट देते। मैं तुम्हारी ईगो को पका के खत्म कर रहा हूं। उसे खाना खिला के और बढ़ा नहीं रहा। अक्सर लोग कहते कि वो थोड़े [संगीत] से रूढ़ माने असभ्य रूखे हैं। मगर जो उन्हें ध्यान से सुनते वो बताते कि इसी रूखेपन के नीचे उन्हें एक अताह शांति महसूस होती और इसी सबके बीच
(08:58) एंट्री होती है मॉरिस फ्रीडम की। एक पोलिश जइश रेफ्यूजी जो महात्मा गांधी के साथ काम कर चुके थे और सालों से पूरे भारत में सत्य की तलाश में थे। 1965 में वह निस्गदत्त महाराज से मिलते हैं और उन्हें तुरंत समझ आ जाता है दिस इज इट। इसी की तलाश में वह दर-दर भटक रहे थे। वो डीप रिकॉर्डर पर महाराज की बातें रिकॉर्ड करना शुरू करते हैं। उन्हें मराठी से इंग्लिश में ट्रांसलेट कराते हैं। आखिरकार महाराज की इन्हीं टॉक्स पर आधारित एक किताब निकल के आती है। आई एम दैट। एक ऐसी किताब जिसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया। [संगीत]
(09:42) बड़े-बड़े स्पिरिचुअल टीचर्स जैसे कि एकात टोले इस किताब को दुनिया के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण किताबों में से एक बताते हैं। पूरी दुनिया से लोग निस्गदत्ता महाराज से मिलने आते और वह सभी से बस एक ही बात कहते। आई एम माने मैं हूं सबसे पहले सबसे ऊपर। 1980 में निस्गदत्ता महाराज थ्रूट कैंसर से डायग्नोस होते हैं। उनका शरीर कमजोर हो गया था। उनकी आवाज एकदम धीमे हो गई थी। दर्द इतना था कि बर्दाश्त ही ना हो। लेकिन फिर भी वो उसी कमरे में बैठे रहे। लोगों से मिलते रहे। बीड़ी फूंकते रहे। उनके शिष्य उनसे [संगीत] अक्सर कहा करते महाराज किसी बड़े
(10:28) हॉस्पिटल चलिए। किसी बड़े कमरे में शिफ्ट हो जाइए। लेकिन महाराज इसके जवाब में कहते मैं यहीं मरूंगा जहां मैं जिया हूं। वह अपने दर्द के बारे में कहा करते मैं इस दर्द का साक्षी हूं। मैं यह दर्द नहीं हूं। 8 सितंबर 1981 की शाम को महाराज अपना शरीर त्याग देते हैं। उन बीड़ी फूंकने वाले संत की टीचिंग आज भी उनकी हर टॉक उनकी हर किताब से झलकती है। तुम वो नहीं हो जो तुम खुद को सोचते हो। [संगीत] तुम्हारे नाम, तुम्हारी जॉब, तुम्हारी लाइफ स्टोरी के नीचे। एक ऐसी चीज है जो कभी पैदा नहीं हुई जो कभी मर नहीं सकती। [संगीत] जिसे ढूंढने की जरूरत नहीं है
(11:13) क्योंकि वह कभी खोई ही नहीं थी। निस्गदत्ता महाराज की तरह मैंने भारत के कई और महान संतों और ऋषियों के जीवन के ऊपर वीडियोस बनाई है। उस प्लेलिस्ट को देखने के लिए यहां क्लिक करें। अगली वीडियो मैं किस टॉपिक पे बनाऊं यह मुझे नीचे कमेंट सेक्शन में लिखकर बताओ क्योंकि यह सिर्फ मेरा ही नहीं आप लोगों का भी चैनल है। तब तक के लिए थैंक यू। [संगीत]
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