Sunday, August 9, 2026

Body को Healing Mode में कैसे लाएं? | ft. Anurag Rishi | The Chitresh Soni Podcast

Body को Healing Mode में कैसे लाएं? | ft. Anurag Rishi | The Chitresh Soni Podcast

Author Name:Chitresh Soni

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@ChitreshSoni165

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=_i1sjuXMfIg



Transcript:
(00:00) थाइमस हीलिंग, हीलिंग। ये हीलिंग्स क्या-क्या होती है और इनसे जीवन में कैसे लोग बेनिफिट ले रहे हैं। अगर आपको सेक्सुअल थॉट भी आता है तो आपका पूरा सेक्सुअल तंत्र जो है वो स्टिमुलेट हो जाता है। आप किसी ऐसी प्रक्रिया में नहीं हो लेकिन सोचने मात्र से ही आपके शरीर ने वो कार्यक्रम प्रारंभ कर दिया है। आभार व्यक्त करने व से जीवन में समृद्धि आने लगती है। एक शॉप है उस पे नॉनवेज मिलता है। तो वो किन लोगों को अट्रैक्ट करेगी? नॉनवेज खरीदने वालों को। एक शॉप है उसको जूस मिलता है तो उस शॉप पे कौन लोग आएंगे जो जूस पीते होंगे जैसा आपका भाव होता है
(00:33) वैसा ही जीवन में सब कुछ होने लगता है तो ऐसी कितनी हीलिंग मोटलिटी को आप अनुभव कर चुके हैं मेडिसिन के अलावा केवल एक पद्धति है सिर्फ और सिर्फ पूरी दुनिया में एक ही पद्धति है जिससे आप अपने शरीर को वापस से रिस्टोर कर सकते हो जो कि है हमारे प्राणों को बैलेंस करना जो अचानक हमने अपनी लाइफ में तेजी ले आए हैं। तो तेजी के कारण पूरे समय बॉडी आपकी फाइट एंड फ्लाइट मोड में रहती है। क्या ये बात बिल्कुल सही है? पहले फाइट एंड फ्लाइट मोड रणक्षेत्र में ही एक्टिवेट होता था। अब आप चेयर पर बैठे हो तो भी फाइट एंड फ्लाइट मोड एक्टिवेटेड है। मतलब आप चेयर
(01:08) पर बैठे हो लेकिन आपका मन रणक्षेत्र में ही है। आपका मन अभी भी किसी परेशानी से जूझ रहा है। यदि हमने अपने शरीर को वैसा ट्रेंड कर दिया तो फ्यूचर में कोई भी स्ट्रेस से हम फाइट कर पाएंगे। अब आप देखो कि किसी भी सिचुएशन में आप धोनी को यॉर्कर डालोगे तो उसको हेलीकॉप्टर शॉट लगाने की मेमोरी इतनी स्ट्रांग है। यॉर्कर को खेलने का जो कैपेसिटी है वो सबसे ज्यादा उस व्यक्ति के पास है। एक्जेक्टली नो द सेल्फ वर्कशॉप क्या है और किन लोगों के लिए बनाया है? नो द सेल्फ नमस्कार दोस्तों, एक और शानदार एपिसोड आपके लिए लेके आया हूं मैं। आज के हमारे
(01:41) गेस्ट हैं अनुराग ऋषि जी। ऑलरेडी हम इनके साथ दो पॉडकास्ट कर चुके हैं और दोनों पॉडकास्ट में पब्लिक ने बहुत सारा प्रेम दिया। बहुत सारे सवाल पूछे और उन्हीं में से कुछ चुनिंदा सवालों को लेके आज का हम यह पॉडकास्ट करने वाले हैं। आज का पॉडकास्ट पूरा सेल्फ हीलिंग के ऊपर होगा कि कैसे एक व्यक्ति अपने जीवन में अपनी हीलिंग के प्रति थोड़ा सा जागरूक होके थोड़ा सा सिंसियरिटी से अपने ऊपर काम कर ले तो उसके जीवन में अधिकांश बीमारियां खत्म हो जाएंगी। तो अनुराग जी आपका बहुत-बहुत स्वागत है। बहुत-बहुत धन्यवाद चित्रेश जी मुझे फिर से
(02:13) बुलाने के लिए और मेरे ख्याल हम चौथा पॉडकास्ट शूट कर रहे हैं। तो मुझे लगता है कि आज भी अगर हम आपकी ऑडियंस को कुछ इंसाइट दे पाए तो बहुत-बहुत सौभाग्य होगा। तो धन्यवाद मुझे फिर से बुलाने के लिए। तो अनुराग जी आपके बहुत सारे YouTube पर जो वीडियोस देखते हैं उन वीडियो में बहुत सारे वीडियो ऐसे होते हैं जहां आप सेल्फ हीलिंग की बात करते हैं जहां आप साइंस ऑफ हीलिंग की बात करते हैं। एक स्टेटमेंट जो आपके वीडियो में मैंने कई बार सुना कि आज साइंस भी यह बात मानता है कि 90% जो बीमारियां हैं वो साइकोसोमेटिक हैं मतलब सोचने के कारण होते हैं। यही चीज मैं आज
(02:43) समझना चाहता हूं और इसी से आज हम पूरे पॉडकास्ट को आगे बढ़ाना चाहते हैं। तो सर इसको थोड़ा विस्तार से समझाइए कि कैसे आज मैक्सिमम बीमारियां साइकोस्मेटिक है और साइंटिस्ट के बारे में क्या कहता है। बहुत अच्छा सवाल है चिद्रेश जी देखो पहले तो हम ये समझते हैं कि बीमारी है क्या? तो जब भी कोई मेडिकल की पढ़ाई करता है तो उसको यह समझाया जाता है कि बीमारी दो प्रकार की है। एक होती है एक्यूट इलनेस और एक होती है क्रॉनिक इलनेस। एक्यूट का मतलब है जो एकदम से अभी-अभी हुई है। जैसे मैं कहीं जा रहा था एक्सीडेंट हो गया। चोट लग गई, स्क्रैच लग गया, घाव लग गया। एकदम से
(03:12) वायरस ने अटैक कर दिया मुझ पे। बैक्टीरिया ने अटैक कर दिया मुझ पे। कोई फंगाई मेरे शरीर में आ गई तो यह है एक्यूट कि अभी कल मैंने कुछ गलत खा लिया। मेरे को फूड पोइजनिंग हो गई। मेरे को चोट लग गई तो मेरा घाव हो गया। एकदम से अभी हो रही है। एक बीमारी वो है जिसको मैं बीमारी की कैटेगरी में डालता हूं। जिसको मेडिकल साइंस बोलता है क्रॉनिक इलनेस। क्रॉनिक का मतलब कि यह 2 दिन में या एक चोट लगने से या एक दिन का कुछ गलत खा लेने से नहीं हो रही है। इसको बनने में 5 से 7 साल से लेकर 40 साल तक का समय लग रहा है। तो धीरे-धीरे धीरे-धीरे चीज वो हमारे शरीर के अंदर
(03:44) बिल्ड अप होनी शुरू हो जाती है। और अगर आप इसी कैटेगरी में देखोगे तो इसी कैटेगरी में अधिकांश मतलब यह कहना उचित नहीं है कि 90% या 99% हो सकता है 100% हो या हो सकता है 50% भी हो। क्योंकि इसके मापदंड अभी तक हम इसको एग्जैक्टली निकाल नहीं पाए हैं। लेकिन रफली अगर हम माने तो 90% डिजीजसेस जो क्रॉनिक सेगमेंट में हो रही हैं वो साइकोसोमेटिक हैं। जो क्रॉनिक डिजीज जो क्रॉनिक डिजीज हो रही हैं। क्रॉनिक का मतलब जो बहुत लंबे समय से पैदा हो रही हैं। बहुत लंबे समय से उसमें बहुत सी बीमारियों को हम लाइफस्टाइल डिजीज भी बोल देते हैं। जैसे हमारा लाइफस्टाइल जिसको हम
(04:16) बोलते हैं कि खानपान गलत है। हमारा आदतें गलत हैं। हमारी शरीर में टॉक्सिक चीजों को हम बार-बार डाल रहे हैं। तो वो भी बहुत लंबे समय से हमें बीमार कर देती हैं। और बहुत सी ऐसी चीजें जो हम सोच के स्तर पर मानसिक स्तर पर जिन चीजों को हम लगातार सोचते रहते हैं उसमें आती है साइकोस्मेटिक डिजीजेस जिसमें लगातार अगर किसी चीज का स्ट्रेस बना रहे डिप्रेशन बना रहे एंजायटी बनी रहे तो वो चीजें धीरे-धीरे शरीर में बीमारी का रूप ले लेती है। थैंक्स टू ऑल द डिवाइसेस जो आज हमारे पास हैं चाहे वो स्कैन्स किसी तरह के हो चाहे वो किसी तरह के हमारे माइंड को पढ़ने वाले डिवाइसेस हो
(04:46) वो ये बताते हैं कि हमारी बॉडी में हम जिस तरह का भी भाव उत्पन्न करते हैं। हम जैसा भी सोचते हैं, जैसी फीलिंग हमारे शरीर में आती है, उसके बेसिस पर हमारी बॉडी कुछ केमिकल रिलीज करती है। और जब वो केमिकल रिलीज होते हैं, तो वो केमिकल्स हमारे शरीर को चला रहे होते हैं, बना रहे होते हैं, बिगाड़ रहे होते हैं, स्वस्थ कर रहे होते हैं और बीमार कर रहे होते हैं। हर एक केमिकल बिना किसी प्रयोजन के हमारे शरीर में नहीं दिया गया। कोई भी केमिकल आज हम कैटेगराइज कर लेते हैं कि ये अच्छे केमिकल हैं। ये डोपामिन है। ये ऑक्सीटोसिन है। ये
(05:13) सेरेटोनिन है। ये एनडामाइट है और ये बुरे केमिकल हैं। ये ये कॉर्टिजोल है। ये एड्रोनलिन है। ये नोरेपनेफ्राइन है। लेकिन आप यकीन मानो कि बुरा केमिकल हमें किसी प्रकार का कोई दिया ही नहीं गया। किसी भी चीज की अति जैसे योग बोलता है अत्यंत सर्वत्र वर्जते। अति किसी भी चीज की नुकसानदायक है। इनफैक्ट अगर किसी इंसान को जरूरत से ज्यादा पानी भी उसके पेट में ठूस दो तो वह भी उसको बीमार कर सकता है। वह भी उसको मार सकता है। जरूरत से ज्यादा हर चीज नुकसानदायक होती है। ठीक वैसे ही कुछ वो केमिकल्स जो हमारे स्ट्रेस को कॉप अप करने के लिए हमारे शरीर में दिए गए। कॉर्टिजॉल,
(05:42) एड्रिनलिन, नरे पेनेफ्राइन। जब इनका जरूरत से ज्यादा बॉडी में सिक्रशन प्रोडक्शन शुरू हो जाता है तो हमारा शरीर क्योंकि आज के वातावरण में उसको कॉप अप नहीं कर पाता क्योंकि हमारी फिजिकल एक्टिविटीज बहुत कम है और क्योंकि स्ट्रेस लगातार माइंड में बना रहता है तो वो कहीं ना कहीं हमारे शरीर को ही हैंपर करना शुरू कर देता है। जिस कारण से हमारी बॉडी में साइकोसोमेटिक यानी सोच के कारण जो स्ट्रेस है वो ज्यादातर सोच में है। जो डिप्रेशन है वो सोच में है। जो ए्जायटी है वो सोच में है। जो ओवरथिंकिंग है वो सोच में है। तो हमारी सोच के कारण, हमारे डर के कारण, चिंताओं
(06:12) के कारण वो केमिकल्स एक्स्ट्रा सिकक्रट होने से वह हमारी बॉडी में एक नेगेटिव इंपैक्ट डालते हैं जो धीरे-धीरे फिर कल को बीमारी का रूप ले लेते हैं। जिनको हम साइकोसोमेटिक डिजीज बोलते हैं। मतलब यह क्रम ऐसा होता है कि पहले आपने किसी चीज को सोचा। फिर उस सोच के हिसाब से आपकी बॉडी ने कोई ना कोई केमिकल रिएक्शन किया। उस केमिकल रिएक्शन में कोई केमिकल या कोई हार्मोन सीक्रेट हुए बॉडी से और उसकी जब क्वांटिटी बढ़ जाती है तब वो कोई ना कोई डिजीज का रूप ले लेती है। यही क्रम हुआ। बिल्कुल सही हुआ जित्रेश जी। इसीलिए हमने इसको क्रॉनिक बोला है। हमने इसको एक्यूट
(06:41) में नहीं डाला है। एक्यूट मतलब मैं आज स्ट्रेस ले रहा हूं किसी चीज का तो यह मुझे कोई बीमारी नहीं दे सकता है। लेकिन अगर यही स्ट्रेस क्रॉनिक हो जाए अगर यही मुझे लगातार मैं 6 महीने 1 साल डेढ़ साल तक स्ट्रेस में बना रहूं या कई लोगों के साथ क्या होता है कि उनको 6 महीने तक कोई स्ट्रेस था। 6 महीने के बाद वो स्ट्रेसफुल सिचुएशन रिज़ॉल्व हो गई। लेकिन बॉडी के अंदर वो जो पैटर्न बना अब बॉडी उसकी हैबिटचुअल हो गई है। तो बॉडी स्ट्रेसफुल सिचुएशन नहीं है तो भी वो स्ट्रेसफुल सिचुएशन छोटी-छोटी चीजों में क्रिएट करती रहती है। मतलब Facebook के किसी पोस्ट पे
(07:11) लाइक नहीं आया तो भी वही रिस्पांस ट्रिगर हो सकता है जो शायद किसी बहुत बड़ी दुर्घटना के कारण जीवन में कभी ट्रिगर हो रहा था। किसी इंसान जो हमारी जिंदगी से चला गया इस दुनिया से चला गया उसके कारण जो मैं परेशान था। हो सकता है आज मैं छोटे-मोटे दो पैसे नहीं कमा पा रहा हूं तो भी मुझे उसी लेवल का स्ट्रेस उसी लेवल के कॉर्टिजोल और एड्रिनलिन रिलीज हो रहे हो क्योंकि मेरी बॉडी ने उसको धीरे-धीरे सीख लिया और एक पैटर्न बना लिया तो कई बार ये होता है कि स्ट्रेस डिप्रेशन एंग्जायटी लगातार हमारी जिंदगी में बने रहते हैं और कई बार वो कुछ समय के लिए आते हैं लेकिन
(07:39) वो पैटर्न ऐसा छोड़ जाते हैं हमारी प्रोग्रामिंग ऐसी कर जाते हैं कि हम उस स्ट्रेस में एक सेकेंडरी गेन ढूंढने लगते हैं। सेकेंडरी गेन मतलब कई बार स्ट्रेस एंग्जायटी और डिप्रेशन में भी बॉडी को हमें नहीं मतलब कई लोग सुनने वाले सोचेंगे कि यार मैं क्यों स्ट्रेस में गेन समझूंगा मुझे क्यों उसमें फायदा होगा? मुझे क्या फायदा है स्ट्रेस ले के? मैं क्यों स्ट्रेस ले रहा हूं? हम नहीं ले रहे हैं। हमारी बॉडी का वो एक पैटर्न बन गया है। लूप बन गया है जिसको कई बार हम मसल मेमोरी बोल देते हैं कि हमारी बॉडी ने कई चीजों को मेमोराइज कर लिया है कि जब ऐसी कोई
(08:06) घटना ट्रिगर होती है तो कॉर्टिजॉल रिलीज़ करना है। अब मैं ट्रेन के लिए लेट हो रहा हूं। कॉर्टिसोल ज्यादा रिलीज हो रहा है। जबकि वो होना थोड़ा चाहिए था। लेकिन मेरी बॉडी ने एक पैटर्न बना लिया है एक्सेस कॉर्टिजॉल रिलीज़ करने का, हार्ट रेट बढ़ाने का, पपिटेशन करने का, रेस्टिंग हार्ट रेट को ऊपर रखने का। तो वो पैटर्न कहीं ना कहीं हमारे शरीर में उस एक सोच के कारण स्टोर हो जाता है जो कल को आगे चल के ठीक इसी क्रम में बीमारी का रूप ले लेता है। जैसे आपने बताया कि बॉडी आपको स्टोर कर लेती है। तो वो चीजें जो स्टोर धीरे-धीरे बॉडी में होती है बाद में आपको
(08:33) उसका स्ट्रेस नई भी है और कोई भी नया सिम्टम हो, कोई भी नई दुर्घटना हो, कोई भी नया इंसिडेंट हो तो उस समय भी बॉडी वही चीजें रिलीज़ करने लगती है। मतलब फील करने लगती है और फिर वो वैसा रिएक्शन करना शुरू कर देती है। देखो कितना इजी मैकेनिज्म है। आप देखो अभी कोविड कुछ साल पहले बहुत हल्ला था। कोविड आया एक बहुत बड़ा पेंडेमिक बन के आया। तो कोविड के लिए हमने एक वैक्सीन बनाई। अब जो हमने वैक्सीन बनाई वो वैक्सीन का लॉजिक क्या था? वैक्सीन का लॉजिक ये था कि उसमें उसी कोविड के वेरिएंट का एक डेड वायरस डेड वायरस या फिर बहुत ही लो म्यूट हल्का प्रभाव वाला
(09:06) प्रभाव वाला वायरस हमने एक वैक्सीन में डाला, एक इंजेक्शन में डाला और वो हमारी बॉडी में डाल दिया। अब जब हमने वो बॉडी में डाला तो बॉडी मतलब हमें ज्यादातर लोगों को ऐसा लगता है वैक्सीन का मतलब है कोई दवाई। जबकि वैक्सीन वो जो हमको कोविड की दी गई या जो बच्चों को भी जो वैक्सीनेशंस लगते हैं वो बेसिकली डेड वायरस होते हैं। तो जब डेड वायरस बॉडी में गया तो बॉडी ने उस बॉडी को नहीं पता बॉडी के लिए तो वो वायरस है। बॉडी ने अपनी एंटीबॉडीज को प्रोड्यूस किया। हमारे बीटा सेल्स एक्टिवेट हुए। हमारे थीटा सेल्स एक्टिवेट हुए और बी और टी सेल्स ने मिलकर
(09:33) के उस वायरस को दोबारा से मारने का प्रयास किया। अब जब उस वायरस को मारने का प्रयास किया तो मारने के प्रयास के बाद हमारे टी सेल्स जो हमारे लिंफोसाइट्स होते हैं बेसिकली वाइट ब्लड सेल का एक प्रकार होते हैं। टी सेल्स तीन कैटेगरी के होते हैं। एक किलर टी सेल जो कि वायरस बैक्टीरिया को मारते हैं। एक होते हैं हेल्पर टी सेल जो मारने वाली सेना को ये इन्फॉर्म करते हैं कि तुमको किसको मारना है, किसको छोड़ना है। और एक होते हैं मेमोरी टी सेल। मेमोरी टी सेल उस पूरी घटना की पिक्चर बना लेते हैं और पिक्चर बना के स्टोर कर लेते हैं
(10:02) कि तुमने इस वायरस को मारा है। तो यह मेमोरी टी सेल ने हम बेसिकली हमारे शरीर की मेमोरी में स्टोर कर दिया कि तुमने इस वायरस को मारा है। अब जब हमने कोविड की वैक्सीन ली तो क्या इससे हमको दोबारा कोविड नहीं हुआ या हमको कभी बुखार नहीं हुआ या हमको वायरस ने अटैक नहीं किया। किया वो एक शील्ड नहीं है कि आप बीमार नहीं होगे। वो आपके मेमोरी टी सेल के पास एक प्रोग्रामिंग है कि भैया जब दोबारा ऐसा वायरस आएगा तो तुमको इसको इस तरह से मारना है और इसको खत्म कर देना है। तो यानी हमारे लिंफोसाइट्स ने हमारे वाइट ब्लड सेल ने एक मेमोरी सेल में वो चीजें स्टोर की
(10:33) कि तुमको किसने कैसा अटैक किया था और बॉडी जिंदगी भर सेम उसी प्रोग्रामिंग से चलती रहेगी। अगर हम अपने शरीर को एक सही हालत में रखते हैं तो। किसी वायरस को मारने की प्रक्रिया को स्टोर किया जा सकता है। तो ठीक वैसे ही जब हमारे पास स्ट्रेस आता है वो स्ट्रेसफुल सिचुएशन में जब हमारे सेल्स, हमारी बॉडी, हमारी इम्यूनिटी या हमारे शरीर का पूरा तंत्र जब उस हिसाब से प्रोग्राम हो जाता है कुछ लंबे समय तक तो वो भी हमारे शरीर की मेमोरी में स्टोर हो जाता है। और आज इसके ऊपर एक नहीं बल्कि सैकड़ों रिसर्चेस अवेलेबल हैं। और कैंडेस्पर्ट अगर कोई Google करना सर्च
(11:05) करना चाहे तो कैंडेस्पर्ट ने सबसे पहले यह बताया और एक बुक भी बड़ी शानदार उनकी इस पूरी रिसर्च पे लिखी गई जिस बुक का नाम है द बॉडी कीप्स द स्कोर द बॉडी कीप्स द स्कोर उसका आपने समरी भी बनाया हुआ है हां द बॉडी कीप्स द स्कोर तो उसमें बताया गया कि हमारा शरीर जितनी भी गतिविधियां क्रॉनिक रूप से रिपीटेड फॉर्म में हो रही हैं हमारा शरीर उनको स्टोर करता जाता है मेमोरी बनाता जाता है जैसे मैं आपसे पूछूं 2 + 2 कितना होता है तो आप इजीली बता देंगे चार आपने इसका कैलकुलेशन नहीं किया आपकी मेमोरी में ये स्टर्ड ठीक उसी तरह किसी भी सिचुएशन में कैसा रिएक्ट करना है
(11:36) यह हमारे सेल्स की डीपर लेवल तक हमारे जेनेटिक लेवल तक कई बार चीजें जो हैं स्टोर हो जाती हैं हमारे शरीर में। तो बॉडी कीप्स द स्कोर बताती है कि शरीर का एक-एक ऑर्गन एक-एक पार्ट, एक-एक हिस्सा कुछ पर्टिकुलर मेमोरीज को स्टोर करता है। तो वो जब शरीर में स्टोर होता है तो ऑब्वियस सी बात है कि कल को जब हम एक बहुत बड़े जिंदगी के स्ट्रेस में लेकिन अब स्ट्रेस हमारी जिंदगी से जा चुका है या वो इंसिडेंस जा चुका है लेकिन उसकी मेमोरी अभी भी हमारे पास रखी है। तो इसीलिए एनर्जी हीलिंग में कई बार हम लोग बात करते हैं कि सबसे पहले किसी चीज की मेमोरी को
(12:05) क्लीन करना बहुत जरूरी है। उसके इंपैक्ट जो हमारे शरीर पर हो रहे हैं उसको रिड्यूस करना बहुत जरूरी है। तभी असल हीलिंग की शुरुआत होती है। अगर इसको आसान करके समझें तो किसी वायरस बैक्टीरिया को मारने की जो मेमोरी है वो भी हमारे पास है। और जिस चीज से हम नहीं लड़ पाए उसकी भी मेमोरी हमारे शरीर के पास है। चाहे वो स्ट्रेस था, चाहे वो डिप्रेशन था, चाहे वो ए्जायटी थी, ओवरथिंकिंग थी, डर था, गुस्सा था वो सब हमारे शरीर ने किसी ना किसी फॉर्म में स्टोर करके रखा हुआ है। और जब वो लंबे समय तक हमारे शरीर में उसी प्रोग्रामिंग से चलता रहता है, तो वो हमारी बॉडी को वियर
(12:34) एंड टियर करने लगता है, हैंपर करने लगता है। मतलब मैं इससे ये समझ रहा हूं कि यदि हमने एक बार स्ट्रेस से किसी भी स्ट्रेस से लड़ना सीख लिया और बॉडी की ट्रेनिंग वैसी कर ली, अपने मसल्स की वैसी ट्रेनिंग कर ली, अपने सारे टी सेल्स की, मेमोरी सेल्स की वैसी ट्रेनिंग कर ली। और वो ट्रेनिंग कर करके यदि हमने अपने शरीर को वैसा ट्रेन कर दिया तो फ्यूचर में कोई भी स्ट्रेस से हम फाइट कर पाएंगे क्योंकि हमारी मेमोरी सेल्स में वो सारी चीजें प्रोग्रामिंग हो गई है। बराबर ये सही सही है। बिल्कुल बराबर प्रोग्रामिंग हो गई है। चित्रेश जी। अब आप देखो कि किसी भी
(13:02) सिचुएशन में आप धोनी को आप यॉर्कर डालोगे तो उसको हेलीकॉप्टर शॉट लगाने की मेमोरी इतनी स्ट्रांग है। इतनी स्ट्रांग है कि यॉर्कर को खेलने का जो जो कैपेसिटी है वो सबसे ज्यादा उस व्यक्ति के पास है। तो क्या हुआ? उसकी वो मेमोरी इतनी स्ट्रांग है कि जब भी यॉर्कर आता है तो हेलीकॉप्टर शॉट निकलता है। लेकिन बहुत से लोग ऐसे हैं बहुत से बैट्समैन ऐसे होते हैं अच्छे से अच्छे बैट्समैन भी जो बुमराह के यॉर्कर को नहीं खेल पाते हैं। उनको या तो उसको ब्लॉक करना पड़ता है क्योंकि उनके पास इतना ज्यादा रिएक्शन टाइम नहीं होता कि हम उस पे शॉट लगा सकें या फिर वो उस पे
(13:29) एलबीडब्ल्यू या फिर आउट हो जाते हैं। तो यह ठीक ऐसे ही हमारी बॉडी के पास भी जब हम रेपिटेडली किसी चीज को करते हैं तो आंखें बंद करके भी जैसे आपके जूते का तस्मा है चितेश जी आज आप आंखें बंद करके बांध सकते हो आसानी से आपके घर की सीढ़ियां आंखें बंद करके चढ़ सकते हो लेकिन किसी दूसरे के घर की सीढ़ियां जो आपके घर की सीढ़ियों से 2 इंच छोटी या 2 इंच बड़ी हो आप वहां आंखें खोल करके भी चढ़ने में फंबल करोगे क्योंकि मसल के पास वो उस उस हाइट की मेमोरी नहीं है। आपके पास जूते का जो चश्मा है, आप राइट हैंड ऊपर रख के लेफ्ट हैंड नीचे रख के नॉट लगाते हो। और जो
(13:59) सुनने वाले हैं वो भी ट्राई करके देखें कि अगर आप इसको उल्टा कर दो। अपने राइट हैंड को नीचे रखो और लेफ्ट को ऊपर रखो। नॉट लगाओ। आपको 5- 7 मिनट लग जाएंगे ठीक से उस जूते के तस्मे को बांधने में। जिसको हम आंखें बंद करके भी बांध सकते हैं। क्यों? क्योंकि हमारी बॉडी ने उससे जो भी उसका प्रोसेस था उसको स्टोर कर लिया है। ठीक वैसे ही स्ट्रेस, डिप्रेशन, ए्जायटी में जो हमारे शरीर का फाइट एंड फ्लाइट मोड एक्टिवेट हो जाता है उस फ्लाइट एंड फाइट एंड फ्लाइट मोड की बॉडी को आदत पड़ जाती है। बॉडी उसी को अडॉप्ट कर लेती है। इसको बोलते हैं द लॉ ऑफ अडॉप्टेबिलिटी। ठीक
(14:30) वैसे ही आप देखोगे एक इंसान को कोई डिजीज हुई। वो डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर ने उनको एक 2.5 एमg की मेडिसिन दी। तो आप देखोगे 6 महीने 8 महीने के बाद अब 2.5 एमg की मेडिसिन उसको काम नहीं दे रही है। तो डॉक्टर क्या करते हैं। फिर उस मेडिसिन को 5 एमg कर देते हैं। क्यों कर देते हैं? क्योंकि 2.5 एमg को तो बॉडी झेलना सीख चुकी है। वो उससे कॉप अप करना सीख चुने उसको अडॉप्ट कर लिया है। अब उससे फर्क नहीं पड़ता। मतलब उसकी पार्ट ऑफ लाइफ हो गया वो। आप ऐसा हर एक नेगेटिव चीज में देखोगे जब इंसान सिगरेट पीना शुरू करता है तो एक सिगरेट से शुरू करता है। लेकिन वो
(14:58) बॉडी इतनी जल्दी उसको अडॉप्ट कर लेती है कि अब एक उसको रश नहीं दे रही है। फिर दो फिर चार फिर धीरे-धीरे पैकेट। ठीक ऐसे ही ड्रिंक करने वाले को एक पैग से शुरुआत होती है। लेकिन दो-तीन पैग कहां चले जाते हैं? उससे उसको कुछ फर्क ही नहीं। क्योंकि बॉडी अब उसकी हैबचुअल हो गई है। उससे अडॉप्ट कर चुकी है। ठीक ऐसा नेगेटिव हॉर्मोंस के केस में भी होता है कि बॉडी उनको अडॉप्ट कर चुकी है। अब वो उसी पैटर्न पे अपने आप को चला रही है और ठीक ऐसा अच्छे केमिकल के केसेस में भी होता है कि वो उनको अडॉप्ट कर लेती है और चाहे कुछ सिचुएशन आए बॉडी उसी के बेसिस पर काम करती
(15:25) रहती है। तो जो आपने बोला बॉडी कीप्स स्कोर की जो आपने बात की मतलब चाहे अच्छे पैटर्न हो या बुरे पैटर्न हो। पैटर्न कोई भी आपकी बॉडी ने एक बार अपने महसूस कर लिए, फील कर लिए तो उसका स्कोर या उसका एक परिकल्पना उसकी बॉडी में हमेशा के लिए हो जाती है और फिर वो फ्यूचर में होने वाले उससे मिलते जुलते हर इंसिडेंट में वैसा ही रिएक्ट करती है जैसा आपको ट्रेंड किया गया है। वैसा रिएक्ट करती है। सेम वैसा ही और आप देखोगे कि घटना उतनी बड़ी ना हो। लेकिन घटना का नाम हो जाए तो भी बॉडी वैसा रिएक्ट करने लग जाती है क्योंकि उसके पास किसी भी स्ट्रेस के केस में बॉडी ने पास्ट
(15:59) में कैसा रिएक्ट किया था वो सेम मेमोरी रखी हुई है। तो इसीलिए आजकल क्या हो रहा है? इसीलिए आप देखोगे कि आज बहुत लोग इस चीज को कंडेम भी कर रहे हैं कि ये बच्चे जो मोबाइल पे वीडियो गेम खेलते हैं। वो वीडियो गेम के अंदर उनका कैरेक्टर जो गोलियां चला रहा है जब वो मर रहा होता है तो सेम कॉर्टिजोल और सेम एड्रनलिन बॉडी रिलीज कर रही होती है। जैसा रियल में आप फाइट कर रहे हो। कैलटेशन मोड में बॉडी आ जाती है। फाइट एंड फाइट में आ जाती है कि मेरा कैरेक्टर मरना नहीं चाहिए। मेरा कैरेक्टर को गोली नहीं लगनी चाहिए या मैं हारना नहीं चाहिए हूं। कॉर्टिसोल रिलीज हो
(16:23) रहा है। एड्रिनलिन रिलीज़ हो रहा है। और ये गेम खेलतेखेलते ही बॉडी में वो कॉर्टिजोल और एड्रिनलिन के पैटर्न्स बैठ जाते हैं। तो कल को कोई छोटी-मोटी सिचुएशन में भी बॉडी वही कॉर्टिजोल और एड्रिनलिन रिलीज करती है जिससे कि आगे चलके वो धीरे-धीरे बड़ी-बड़ी बीमारियों का रूप ले लेती है। तो अनुराग जी जैसा ये सारी चीजें सोचने से जब बनाई जा सकती हैं। तो क्या इन सभी चीजों को सोचने से या वेल अवेयरनेस के साथ प्रोग्रामिंग करने से क्या इन सभी चीजों को खत्म भी किया जा सकता है? बिल्कुल किया जा सकता है जित्रेश जी और ऐसा एक नहीं आपको हजारों लाखों एग्जांपल मिल जाएंगे।
(16:52) सबसे पहला एग्जांपल तो मुझे मिला एक बुक के नाम से जिसका नाम था एनाटमी ऑफ़ एन इलनेस। नॉमन कजन बहुत शानदार बुक है और मैं इसकी कई बुक्स का रेफरेंस भी देता हूं। अपने बहुत से इवेंट्स में, रिट्रीट्स में पार्टिसिपेंट जब मेरे पास आते हैं तो मैं बोलता हूं कि पहले यह बुक पढ़ के आओ ताकि आपको समझ में आए कि हमारे शरीर के पास कितनी ज्यादा एबिलिटी है। जिस शरीर को हम नेगेटिव प्रोग्राम कर सकते हैं, उसी शरीर को कॉन्शियस डिसीजन लेके हमारा प्रीफ्रंटल कॉेक्स पॉजिटिव प्रोग्रामिंग भी दे सकता है और पुरानी प्रोग्रामिंग को ओवरकम भी कर सकता है। एनाटॉमी ऑफ़ एन इलनेस
(17:20) में नॉर्मन कजन के साथ यही हुआ। कोई बहुत बड़ी डिजीज हुई और उसको जो पेन किलर्स लेनी पड़ती थी वो बहुत ज्यादा पेन किलर्स लेनी पड़ती थी एक दिन में। तो डॉक्टर से उसने पूछा कि यह बीमारी मुझे कोई मैं सिगरेट नहीं पीता, शराब नहीं पीता तो मुझे ये बीमारी हुई क्यों? तो डॉक्टर ने उनसे पूछा क्या तुम्हारे पास कोई नेगेटिव पैटर्न्स रखे हुए हैं? उसने कहा हां रखे हुए हैं। बचपन में ऐसा-सा पैटर्न मेरे पास रखा हुआ है। तो डॉक्टर ने बोला शायद उसके कारण यह बीमारी तुमको हुई है क्योंकि तुम्हारी बॉडी ने लगातार फाइट एंड फ्लाइट मोड को एक्टिवेटेड रखा है। लगातार
(17:44) कॉर्टिजॉल रिलीज किया है। लगातार तुम्हारा हार्ट रेट जो था वो ऊपर की तरफ बढ़ा हुआ है। तुम्हारा सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम 24 घंटे ऑन रहता है। जिसकी वजह से शरीर जो फाइट एंड फ्लाइट में थोड़ी देर के लिए वो तंत्र को एक्टिवेट करना चाहिए। वो तुम्हारा पूरे दिन रहता है। तो जब पूरे दिन वो तंत्र एक्टिवेट रहेगा तो तुम्हारे शरीर की मशीनरी का कुछ ना कुछ वियर एंड टियर तो होगा। जैसे कोई एक मशीनरी है। मान लो वो कुछ देर के लिए चलने के लिए बनी है। ऐसे ही हमारे शरीर में कुछ कॉर्टिजॉल और एड्रनलन किसी एक पर्टिकुलर सिचुएशन से फाइट एंड फ्लाइट मोड में रिलीज होने के
(18:12) लिए बने हैं। लेकिन अगर आप उनको 24 घंटे रिलीज करते रहो। पेट्रोल बड़े लिमिटेड है आपकी गाड़ी में। लेकिन अगर आप पूरी स्पीड से चला के गाड़ी को और पेट्रोल को खत्म कर दो तो पेट्रोल तो खत्म हो जाएगा ना गाड़ी में ही। ठीक वैसे ही हमारे शरीर में वो जो मोड था फाइट एंड फ्लाइट का उसके लिए यह बना था। लेकिन वह अब पूरे दिन भर एक्टिवेटेड रहने लगा है। तो वो जब पूरे दिन भर हमारा फाइट एंड फ्लाइट मोड एक्टिवेट रहता है तो वह हमारे शरीर के पूरे तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। जिसके कारण से हम बीमारी में जाते हैं और अगर इसको रिवर्स कर दिया जाए जो आपका सवाल
(18:39) है अगर इसको उल्टा कर दिया जाए कि हमारा जो पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम है जिसको हम रेस्ट एंड डाइजेस्ट मोड बोलते हैं। हमारे शरीर का शांत स्वभाव। अगर वो शांत स्वभाव की बॉडी की कुछ समय के लिए प्रैक्टिस कर दी जाए। उसकी प्रोग्रामिंग कर दी जाए और कैसे दिन भर में आपको रेस्ट एंड डाइजेस्ट मोड में रहना है। उसके प्राण के कुछ तरीके अगर व्यक्ति इंसान अपने जीवन में सीख ले तो वो उन्हीं पैटर्न्स को रिवर्स कर सकता है। लेकिन हां इसमें सबसे जरूरी चीज ये भी है कि जो पुराने पैटर्न्स हमारे शरीर ने स्टोर कर रखे हैं सबसे पहले उनको निकालना जरूरी है। तब हम नए पैटर्न्स
(19:09) को इंस्टॉल करें ताकि हमारी बॉडी के वो जो पुराने दबे हुए पैटर्न्स हैं वो कभी जिंदगी में आगे निकल कर के ना आए। इसको मैं डिटेल में और सवाल में पूछूंगा। उसके पहले मैं यह समझना चाहता हूं कि कितने प्रकार की ऐसी हीलिंग होती है जिसकी अवेयरनेस यदि हमें हो जाए तो हम अपने पुराने पैटर्न्स को भी धीरे-धीरे खत्म कर सकें और अपनी बॉडी को या अपनी मेमोरी सेल्स को नई ट्रेनिंग दे सकें और उससे हम फ्यूचर में होने वाले जो प्रभाव हैं उनको कम कर सकें। तो ऐसी कितने प्रकार की हीलिंग मॉडेलिटी अब तक खोजी गई हैं या आपने जो प्रैक्टिससेस खुद की हो जिसका
(19:41) आपने प्रभाव खुद देखा हो अपने जीवन में तो ऐसी कितनी हीलिंग मॉडेलिटी को आप अनुभव कर चुके हैं? बहुत ब्यूटीफुल सवाल है। मेडिसिन के अलावा केवल एक पद्धति है सिर्फ और सिर्फ पूरी दुनिया में एक ही पद्धति है जिससे आप अपने शरीर को वापस से रिस्टोर कर सकते हो जो कि है हमारे प्राणों को बैलेंस करना। अब प्राणों को बैलेंस करने के तरीके बहुत अलग-अलग हो सकते हैं। हम अपने प्राण को अपने मन से भी बैलेंस कर सकते हैं। हम अपने प्राण को अपनी सांसों से भी बैलेंस कर सकते हैं और हम अपने प्राण को अपने शरीर की कुछ गतिविधियों से भी बैलेंस कर
(20:10) सकते हैं। जिसके परम्यूटेशन कॉम्बिनेशंस बनाएंगे तो कितने भी बना सकते हो आप। लेकिन मूल सिद्धांत उसके पीछे ये है कि हमारा भारतीय पुराना जितनी भी परंपराएं थी या हमारी एंशिएंट हीलिंग साइंसेस थी या हमारा अद्वैत था। यह सब चीजें मानती हैं कि हम हमारे शरीर को जीवित रखने में और सुचारू रूप से चलाने में प्राण का अहम योगदान है। प्राण मॉडर्न साइंस के टर्म्स में सिर्फ ऑक्सीजन है कि ऑक्सीजन हमें इन्हेल कर रहा है और कार्बन डाइऑक्साइड एक्सेल कर रहा है। लेकिन एंशिएंट इंडियन हीलिंग साइंसेस में प्राण वो शक्ति है जिसका एक छोटा सा पार्ट ऑक्सीजन भी है। उस
(20:42) प्राण वायु जो हमारे शरीर में प्रवाहित हो रही है और हमारे शरीर में बनी रहती है। जब हम सांस को लेते हैं तो यह सांस इसको हमने प्राण बोला है। प्राण वायु बोला है। जीवन दायनी शक्ति बोला है। तो ये जब हमारे शरीर में जाती है तो ये पांच अलग-अलग वायु में बट जाती है। प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान। प्राण वायु का कार्य है हमारे शरीर में जाकर के हमारी ऊर्जा को ऊपर उठाना। अपान वायु का काम है जब हम सांस छोड़ते हैं तो उसी ऊर्जा को वापस हमारे मूलाधार चक्र में वापस स्थापित करना। समान वायु का काम है कि वह हमारे नाभिक क्षेत्र में घूम
(21:13) करके हमारे पूरे डाइजेस्टिव सिस्टम को बैलेंस करना। व्यान वायु का काम है कि पूरे शरीर के अंदर फैल करके पूरे शरीर के हर एक तंत्र को सुचारू रूप से चलाना और उदान वायु का काम है कि ऊपर उठकर हमारे प्राणों को ऊपर उठा के और जब हम हमारी मृत्यु होती है तो भी उदान वायु ऊपर उठकर हमारे प्राण को हमारे शरीर से बाहर निकालती है। तो ये प्राण जो है पंचप्राण बनके हमारे शरीर में अलग-अलग जगह प्रवाहित होता है और पूरे शरीर को बैलेंस करता है। अब योग की एक बहुत प्रसिद्ध लाइन है। हर एक ने जरूर सुनी होगी। चले वाते चले चित्तम निश्चले निश्चलम भवेत। यानी जिस
(21:44) प्रकार व बात चलेगी उसी प्रकार चित्त चलेगा। अभी हमने थोड़ी देर पहले बात की कि सभी बीमारियां साइकोसोमैटिक होती जा रही हैं। साइकोसोमेटिक का अर्थ है कि हमारा मन जिस प्रकार चल रहा है स्ट्रेस में है बॉडी स्ट्रेसफुल बिहेव कर रही है। हैप्पी है बॉडी हैप्पी बिहेव कर रही है। तो जो चित्त है चले वाते चले चित्तम। जिस प्रकार व बात चलेगी उसी प्रकार चित्त चलने लगता है। तो अगर मेरा चित्त, मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा अहंकार मेरे कंट्रोल में नहीं है और मैं स्ट्रेस, एंजायटी, डिप्रेशन या मुझे कोई बीमारी हो गई है मैं उसके डर से परेशान हूं। तो अगर मैं अपनी वात को यानी
(22:15) वायु को बदल लूं, प्राण वायु को सांसे जो हैं सांसों की प्रक्रिया को बदल लूं जिसको हमारे योगियों ने प्राणायाम के रूप में हमारे सामने दिया और बहुत सी ऐसे प्रक्रियाएं दी जैसे कुंभक, ब्रेथ का रिटेंशन, ब्रेथ का होल्ड और सांसों के ऐसे बहुत से प्रयोग जिससे हम प्राण वायु को अपान वायु के साथ मिला करके अपनी समान वायु को बैलेंस कर सकें। तो हमारा शरीर धीरे-धीरे बैलेंस होने लगता है। अब ये सांसों की कुछ प्रक्रियाओं से भी होने लगता है। मन जो है यह एक इंडिविजुअल आइडेंटिटी नहीं है। हमें लगता है मन एक आइडेंटिटी है। मन आइडेंटिटी नहीं है। मन
(22:45) चलता है वायु से। मन चलता है आपके प्राणों से। तो अगर हमारे प्राण बहुत ज्यादा सटल हैं, बहुत ज्यादा क्षीण हैं। बहुत ज्यादा छोटे हैं तो मन अलग चलेगा। और आपने देखा होगा बहुत बार कि जब हम हमारा मन गुस्से में होता है तो हमारी प्राणवायु कैसी हो जाती है? हमारी सांसे कैसी हो जाती हैं? एकदम तेज हो जाती हैं। जब हमारा हम बहुत खुश होते हैं तो हमारी सांसे एकदम से रिलैक्स हो जाती हैं। जब हम ध्यान में होते हैं तो हमारी सांसे बहुत सल हो जाती है। केवली कुंभक लग जाता है। तो यानी हमारी सांसे और हमारा मन इंटरकनेक्टेड है। मन इंडिविजुअल आइडेंटिटी नहीं है। वो
(23:17) प्राणों के साथ जुड़ी हुई एक चीज है। तो अगर मन में कुछ विकार आ रहे हैं साइकोसोैटिक डिजीज में या डर है या चिंता है, तनाव है, अवसाद है। उस केसेस में हम मन को डायरेक्टली कंट्रोल नहीं कर सकते। क्योंकि मोटिवेशन तो हम दे सकते हैं, अरे यार, बुरा मत सोचो। अरे यार, ठीक हो जाओगे, तुम चिंता मत करो। अरे यार, यह तो थोड़ी सी पैसे की घटना है। क्या हो गया? दोबारा पैसे कमा लोगे। यह मोटिवेशन थोड़ी देर डोपामिन देती है। उसके बाद वापस जैसा मन है वो अपनी स्थिति में वापस आ जाता है। तो, हम मन को कंट्रोल नहीं कर सकते। हम वायु को कंट्रोल कर सकते हैं। तो अगर मैं
(23:47) शांत हूं और वायु बड़ी गहरी चलती है। सांसे बड़ी गहरी चलती हैं। तो अगर मैं अशांत हूं तो मैं नोट करूंगा कि मेरी सांसे बहुत छोटी चल रही हैं। तो मन को कंट्रोल ना करके मैं अपनी सांसों को कंट्रोल कर लूं कि मैं डीप ब्रीदीिंग या डीप डायफ्रेग्मैटिक ब्रीदीिंग जो हम बोलते हैं कि वायु सांसे जो है हमारी नाभि के नीचे के केंद्र तक जाएं। तो अगर मैं सांसे गहरी लेना शुरू कर दूं तो मेरा मन आप देखोगे धीरे-धीरे तीन-चार मिनट में वो डिॉल्व होने लगा है। वो चिंता वो तनाव डिॉल्व होने लगा है। और अगर इसी प्रैक्टिस को मैं महीने दर महीने महीने दर महीने तीन
(24:15) चार छ महीने तक रेगुलरली करूं क्योंकि कोई भी चीज ऐसा इंस्टेंट फिक्स नहीं होता। जब वो होने में हमको 10 साल लगे हैं, 5 साल लगे हैं। कई लोग मेरे पास आते हैं वो बोलते हैं सर मेरी एंग्जायटी ठीक हो जाएगी क्या? मैं कहता हूं सर कितने साल हो गए? बोले 20 साल। मैंने कहा अगर बीमारी को 20 साल दिए हैं, तो क्या ठीक करने को 6 महीने देने को तैयार हो? अगर वह व्यक्ति 6 महीने देने को तैयार होता है तो 100% वो मैं ठीक नहीं करता हूं। उसके अंदर अपने पास उसके परमात्मा ने उसके शरीर में हीलिंग पावर दे रखी है। तो वह अपने प्राणों को बैलेंस
(24:42) करके उसको ठीक करने लगता है। तो अगर हम मॉडालिटीज की बात करें तो बेसिकली हर मॉडालिटी प्राण वायु के ऊपर ही काम कर रही होती है। और प्राण वायु फिर जाकर के चित्त पर और धीरे-धीरे हमारे शरीर पर और चित्त की जो प्रोग्रामिंग बदलती है वो फिर शरीर के केमिकल्स को और पूरे शरीर के प्रोसेससेस को बदलने लगता है। लेकिन इसके लिए बहुत अलग-अलग मॉडेलिटीज चाहे हम ध्यान करके कर सकते हैं। बहुत सी विजुलाइजेशंस के थ्रू हम डायरेक्टली मन के ऊपर और प्राणों के ऊपर काम कर सकते हैं। बहुत सी फिजिकल एक्टिविटीज, एक्सरसाइजेज और शरीर से निकालने की कुछ प्रक्रियाएं जो हम करते
(25:11) हैं उनके थ्रू हम कर सकते हैं। और डायरेक्टली हम प्राण वायु को इसके तरीके को बदल के लेने के तरीके को छोड़ने के तरीके को रिटेंशन के तरीके को बदल के हम अपने प्राणों को प्रभावित कर सकते हैं। प्राण चित्त को प्रभावित करेंगे। चित्त, मन, बुद्धि और अहंकार को प्रभावित करेगा और ये मन, बुद्धि और अहंकार धीरे-धीरे आपके शरीर को प्रभावित करेंगे। बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया अनुराग जी। मतलब मैं इसमें यह समझ पाया हूं कि मन, बुद्धि, चेतना, अहंकार को साधना थोड़ा कठिन है। पर यदि अपने सांसों को साध लिया तो उसके माध्यम से आप इन तक बहुत आसानी से पहुंच
(25:41) सकते हो। मतलब ये एक एक्सेस की है। जैसे कमरे में हम एंटर करने के लिए एक एक्सेस की मिलती है। हम उसको दबाते हैं तो अंदर घुस पाते हैं। वैसे ही यदि आपने अपनी सांसों को साध लिया। उसको एक पर्टिकुलर वे में करना या लेना शुरू कर दिया तो वहां से आप इन सबको भी बहुत आसानी से एक्सेस कर पाएंगे। बराबर सही। बहुत अच्छी एनालॉजी दी आपने। चित्रेश जी। जैसे मान लो एक फोन है। फोन में वायरस आ गया, फोन खराब हो रखा है। अब हम अगर उसके स्क्रीन गार्ड को बदलते रहें। अगर हम फोन के बैक कवर को नया बैक कवर लगा दें उसके ऊपर। अगर हम फोन के कैमरा मॉड्यूल को चेंज
(26:12) कर दें। अगर हम इसकी क्लीनिंग कर दें तो भी वो वायरस इस फोन से जाने वाला नहीं है। हां, दिखने में अच्छा लगने लगेगा। हम आज जो फोन के साथ प्रक्रिया बताई यही प्रक्रिया तो शरीर के साथ कर रहे हैं कि हम सीधा शरीर के ऊपर काम कर रहे हैं। दिखने में ठीक हो सकता है। एक पल के लिए ठीक हो सकता है। लेकिन कुछ समय के बाद वो चीजें वापस आने लगती हैं। इसीलिए आप देखो लोग कैंसर की सर्जरीज भी करवा लेते हैं। सब करवा लेते हैं लेकिन दो साल बाद पता चलता है कि शरीर में वापस से वो गांठे बनने लगी। वापस से शरीर में ट्यूमर्स बनने लगे या ये एक पर्टिकुलर एग्जांपल नहीं दे
(26:41) रहा हूं। ये हर केस में लागू होता है। आप चाहे दिल को ले लो। आप देखो दिल में ब्लॉकेज हुआ। हमने स्टंट डाल दिया। स्टंट डाल के क्या आप देखोगे जिसका एक डला है उसका दूसरा डलने की भी नौबत आ जाती है। तो हम उस रूट वायरस के ऊपर क्यों नहीं काम करते हैं कि मान लो एक डालना भी पड़ा उससे मुझे कोई ऐतराज नहीं है। मुझे तो अच्छी चीज है कि अगर आपका जीवन इससे बचता है तो जरूर मुझे भी कभी जरूरत पड़े मैं भी करवाऊंगा। लेकिन मैं उसके साथ इस प्रक्रिया पे भी काम करूंगा कि दोबारा मेरी ब्लॉकेज ना हो। मेरी वेंस जो है वो डाइलेट हो सके। मैं कैसे वैसो डायलेटर
(27:08) नेचुरली ले सकता हूं। कैसे मैं अपनी हार्ट रेट को नीचे लेकर के जा सकता हूं रेस्टिंग हार्ट रेट को। कैसे मैं अपने VO2 मैक्स और अपने एचआरवी हार्ट रेट वेरिएबिलिटी को बैलेंस कर सकता हूं और उसको बैलेंस करने का कोई दवाई कोई कहीं काम नहीं करती। वो आपको टेंपरेरी रिलीफ जरूर देगी। लेकिन परमानेंटली अगर उस वायरस को फोन से निकालना है तो उसके सॉफ्टवेयर को रीइंस्टॉल करना पड़ेगा या डायरेक्टली उस वायरस को जाकर के किल करना पड़ेगा। फोन के स्क्रीन गार्ड को बदलने से कुछ नहीं होगा। बहुत बढ़िया। ठीक वैसे ही जो आपने एनालॉजी दी बिल्कुल
(27:36) ठीक काम करती है कि शरीर में अगर कोई व्याधि हुई है जरूर उसके ऊपर काम करो। मेडिसिन लो, दवाई लो। लेकिन उसके साथ-साथ मैं किसी को भी मेडिसिन दवाई लेने से मना नहीं करता हूं। मैं कहता हूं अभी आपके लिए हो सकता है यह बहुत जरूरी हो। नहीं तो आपकी कंडीशन बस्ट हो जाए। जरूर लो दवाई। लेकिन ऐसा ना करो कि आज 2ाई एमg की गोली कल को 5 एमg की हो जाए और फिर 15 की फिर 20 की फिर 25 की फिर बॉडी उसको भी ना झेल पाए। इस 2.
(27:58) 5 एमg को 2ाई एमजी तक रहने दो और इसको धीरे-धीरे खत्म करने का प्रयास को करो। उस रूट कॉज को टारगेट करके उस रूट कॉज के ऊपर काम करके जिस पर हम अपने मन पर अपने बुद्धि, अहंकार और चित्त पर काम करके और उसके साथ-साथ अपने प्राणों पर काम करके इस सॉफ्टवेयर को अपग्रेड कर सकते हैं जो धीरे-धीरे फोन को सुचारू रूप से चलाने। मतलब मैं ये समझा अनुराग जी इस कन्वर्सेशन में सॉफ्टवेयर एक ही है आपके पास। उस सॉफ्टवेयर को एक्सेस करने के लिए हार्डवेयर आप अलग-अलग यूज़ कर सकते हो। विजुअलाइजेशन भी कर सकते हो आप, ध्यान भी कर सकते हो आप, सांसों को साधना भी कर सकते हो। पर इन सबका एक्सेस मन बुद्धि,
(28:30) चेतना, अहंकार पे ही होता है। मतलब सॉफ्टवेयर वही है मन। और यदि आप उस सॉफ्टवेयर को एक्सेस करना सीख गए इनमें से किसी भी माध्यम से प्रैक्टिस करके आप उसको एक्सेस करना सीख गए तो आप उसको कंट्रोल करके बाकी पूरी बॉडी को ठीक कर सकते हैं। बहुत अच्छी बात है चित्रेश जी। आप देखो भगवत गीता में भी श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए यह नहीं कहते हैं कि परमात्मा तक पहुंचने का एक ही मार्ग है। वो कहते हैं ध्यान भी एक मार्ग है। योग भी एक मार्ग है, कर्म भी एक मार्ग है। तो ऐसे वो बहुत से अलग-अलग मार्ग बताते हैं कि सब मार्गों से पहुंच भक्ति भी एक मार्ग है।
(28:59) सब मार्गों से पहुंचोगे जरूर आप। लेकिन मार्ग अलग-अलग है लेकिन चीज एक ही है। ठीक वैसे ही हमारे पास अलग-अलग मॉडेलिटीज हैं। बहुत अलग-अलग चीजों पर काम किया जा सकता है। लेकिन सब चीजें अल्टीमेटली प्राणों को ही बैलेंस कर रही हैं और प्राण चित्त को बैलेंस कर रहे हैं और चित्त मन बुद्धि अहंकार को बैलेंस कर रहा है और मन बुद्धि अहंकार बैलेंस होते ही शरीर बैलेंस होने लग जाता है। जिसको आज अगर मैं बहुत लेमन लैंग्वेज में समझाने की कोशिश करूं तो आज आप देखोगे कि हमारे शरीर के दो मोड्स हैं। एक है सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम, एक है पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम। सिंपैथेटिक
(29:29) नर्वस सिस्टम फाइट एंड फ्लाइट के लिए बना है। लड़ना भिड़ना, कोई तेज काम करना, शारीरिक क्षम करना, कोई भी एक्सरसाइज इमीडिएट बचाव के लिए। एकदम से जहां पर शरीर की आवश्यकता है। अब पुराने जमाने में तो लड़ने भिड़ने के लिए शरीर की आवश्यकता होती थी। माइंड गेम तो इतनी होती नहीं थी। लेकिन आज अगर हम देखें, तो आज हमारे पास मानसिक चैलेंज में भी हमारा शरीर सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम में है। सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम हमें इसलिए दिया गया था कि सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम एक्टिवेट होते ही हमारा हार्ट रेट तेज हो जाए। मेरे सामने कोई शेर आ गया मुझसे
(29:56) लड़ने के लिए या कोई चार लोगों ने मुझ पे अटैक कर दिया तो अब मैं क्या करूंगा? अब मुझे उनसे लड़ना है। जिंदगी की कोई भी परिस्थिति पुराने समय में फिजिकल ही होती थी। मानसिक होती ही नहीं थी। फिजिकल ही होती थी। मानसिक इसलिए नहीं होती थी क्योंकि वो परिस्थिति सॉल्व होते ही वो दिमाग से निकल जाती थी। मतलब कोई भी विकट से विकट घटना हुई हमारे साथ तो मेरा हार्ट रेट बढ़ना जरूरी है। तभी चित्रेश जी मैं अपनी बॉडी में पंप ब्लड को ज्यादा पंप कर पाऊंगा। मेरी सांसों का तेज होना जरूरी है। इसीलिए अगर कोई मुझ पर अटैक करेगा तो मैं दौड़ पाऊंगा या फाइट करूंगा या फ्लाइट
(30:23) करूंगा। दौड़ पाऊंगा। अगर मेरी सांसे तेज नहीं हुई, अगर मेरे बॉडी का हार्ट रेट नहीं बढ़ा, तो मेरे बॉडी में वो जो रश पैदा होता है एड्रिनलिन का कॉर्टिजोल रिलीज होने से, वो नहीं पैदा होगा और मैं इतनी एफिशिएंटली नहीं लड़ पाऊंगा। कैशियस क्ले मोहम्मद अली दुनिया का सबसे बड़ा बॉक्सर हुआ। मोहम्मद अली रिंग में पहुंचने से पहले 1/2 कि.मी.
(30:41) दूर से ना बॉक्सिंग करता हुआ आता था और बोलता था आई एम द चैंपियन। आई एम द बेस्ट। विजुअलाइज करता था। एमेशन देता हुआ आता था आई एम द चैंपियन। आई एम द बेस्ट। क्यों? क्यों? क्योंकि वो रिंग में पहुंचने से पहले ही अपनी हार्ट रेट, अपने पलपोटेशन, अपने सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम को ऑन करता था और आप Google करेंगे तो आपको पता चलेगा कितनी ऐसी फाइट्स थी जिसमें उसने एक पंच में फाइट खत्म की है। एक पंच मतलब दो लोगों को तो मतलब जो बाकी लोग रिंग के अंदर आके वार्म अप करते थे। वो वहीं से वार्म अप करके आता था और सीधे प्रोग्रामिंग देता हुआ आता था अपने शरीर को। आई एम द
(31:09) चैंपियन। आई एम द बेस्ट। विजुलाइज करता आता था। आप उसके पुराने वीडियोस सुनो। मैंने अभी रिसेंटली माइकल फिलिप्स की बात की थी अपने सबकॉन्शियस माइंड वाले सीरीज में कि वो कैसे बोलते हैं कि मैं विजुअलाइज करता हुआ आता हूं और बोलते रात को सोते हुए भी मैं यही विजुलाइज़ करता हूं कि मैं बेड पे नहीं हूं मैं पानी में हूं और मैं तैर रहा हूं और मैं रिकॉर्ड तोड़ रहा हूं। माइकल फिलिप्स वो व्यक्ति जिसके पास 80 प्लस इंटरनेशनल मेडल्स हैं। 30 प्लस ओलंपिक मेडल्स हैं जिसके आसपास भी दूर-दूर तक कोई नहीं है। मैं जितने कंट्रीियों के पास नहीं है उतने एक आदमी
(31:34) के पास। कंट्रीियों के पास नहीं है उतने एक आदमी के पास है। और वो व्यक्ति क्या बोल रहा है कि मैं अपने उस सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम को ट्रेन करता हूं और विजुअलाइज करके अपनी बॉडी को उस इंसिडेंस के लिए प्रिपेयर करता हूं। तो सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम हमें फाइट एंड फ्लाइट के लिए मिला था। और पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम मिला था कि शांत हो जाओ, रिलैक्स हो जाओ, खाना खाओ, खाना पचाओ और बॉडी को हील करने दो। अब हमारा दिन भर में पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम 20% एक्टिवेटेड होता है और सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम 80% एक्टिवेट होता है। चित्रेश जी। मेरे पास नो दसेल्फ
(32:04) में पार्टिसिपेंट आते हैं जब मेरी उनसे बात होती है ना या ऑनलाइन किसी भी इवेंट में प्रोग्राम में बात होती है तो कई लोग तो यहां तक भी बताते हैं। वो कहते हैं सर हमारा तो सोने से पहले भी माइंड शांत नहीं होता। सोने से पहले भी सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम एक्टिवेटेड रहता है। अब रात को नींद इसलिए मिली थी कि रात को नींद में जाने के बाद पैरासिंैथेटिक एक्टिवेट हो और हमारी बॉडी फाइट एंड फ्लाइट को छोड़ के रिपेयर का काम करे। जो पूरे दिन भर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बना है। इनफ्लेमेशन हुई है बॉडी अब उसको रिपेयर का काम करे। और आप यकीन मानो आज बहुत से लोगों का रात
(32:33) को भी पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम एक्टिवेट नहीं हो रहा है। सोने से पहले भी विचार तंग कर रहे हैं। सोने से पहले भी दिमाग में बकबक बकबक चल रही है। स्ट्रेस चल रहा है। कल क्या करूंगा? कल ये होगा, परसों ये होगा। दो साल पहले किसी ने मुझे ऐसा कह दिया था। तो अब रात को सोते टाइम भी सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम जो है पीछा नहीं छोड़ता। जबकि 100% टाइम्स पैरासिंथेटिक नर्वस सिस्टम एक्टिवेट होना चाहिए था। लेकिन वहां पर भी सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम एक्टिवेटेड है तो रिपेयर कैसे होगा? बॉडी की हीलिंग कैसे होगी? तो ये दो मोड्स हमें दिए गए थे। तो हम
(33:02) बेसिकली जितनी भी मॉडेलिटीज पे काम करते हैं वहां कई लोग मेरे पास आके पूछते हैं कि आप क्या किसी को ठीक करते हो? आप हीलिंग करते हो? तो मैंने कहा नहीं जितना मैं जानता हूं उतना ही आप जानते हो। मैं कोई हील नहीं करता। लेकिन मैं एक चीज अलग जानता हूं कि हमारे शरीर के पास एक सेल्फ हीलिंग मैकेनिज्म है जो पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम में अपने नर्वस सिस्टम को शांत करके अपने तंत्रिका तंत्र को शांत करके और अपनी पुरानी मेमोरीज को उनके मीनिंग को बदल के अपने शरीर के प्राण वायु को पंचप्राण में सही से एस्टैब्लिश करके प्राणपान व्यान उदान समान जो मैंने भारतीय
(33:34) पुराने स्क्रिप्चर से पढ़ा सीखा। अपनी जिंदगी में उतारा जिससे मैंने अपनी जिंदगी के बहुत से विकारों को दूर किया। मैं वह सिर्फ आपको बताने का अवगत कराने का प्रयास करता हूं। उसके बाद हील तो आप अपने आप करोगे। आपकी बॉडी अपने आप हील करेगी। आपका शरीर अपने आप वो करेगा। लेकिन अगर आप पूर्ण रूप से सरेंडर होगे। अगर आप किसी भी एक्सपेक्टेशन, किसी भी तनाव से दूर रहोगे। अगर किसी भी चिंता और अवसाद से दूर रह के इन प्रैक्टिससेस को करोगे तो 100% आपके जीवन में यह बेनिफिट देगी। और वो बेनिफिट का क्रेडिट मुझे नहीं जाता। वो आपके शरीर की उस दिव्य ऊर्जा को जाता है। उस
(34:06) प्राणवायु को जाता है जिसके पास ये एबिलिटी थी। सिर्फ मैं यह बताता हूं कि उस एबिलिटी को एक्टिवेट कैसे करना है जो मैंने अपनी जिंदगी में किया। मतलब आप वो ह्यूमन पोटेंशियल जो भगवान ने ऑलरेडी दिया हुआ है। हर व्यक्ति के अंदर दिया है जो दिव्य ऊर्जा जो आप बोल रहे हैं। आप उस दिव्य ऊर्जा से मिलवाने बस का काम करते हो कि भाई ये मेरे पास भी है और ये तुम्हारे पास भी है। मैंने इसका यूटिलाइजेशन कर लिया है और अपने जीवन को सुखी समृद्ध कर लिया है और अब तुम भी इसका उपयोग करके कर सकते हो। जो स्टेप मैंने फॉलो किए वो स्टेप आप भी फॉलो कर लो।
(34:36) बराबर बिल्कुल सही जितनेश जी आप देखो ना कि हमारे जब हम ठीक हैं हम स्वस्थ हैं जिसको हम स्वास्थ्य बोलते हैं जब हम स्वस्थ हैं तो हमको कौन सी दवाई खानी पड़ती है स्वस्थ रहने के लिए? जब हम ठीक हैं तो हमको कौन सा इलाज, कौन सी सर्जरी, कौन सी मेडिसिन, कौन सा डॉक्टर, हमको क्या करना पड़ता है? हमारा शरीर ही तो हमारे को स्वस्थ रखे हुए है। हमने बीमारी कोई चीज नहीं है। बीमारी है जो स्वस्थ रखने वाली प्रणाली थी जो तंत्र था हमने उसको बाधित कर रखा है। बस डिस्टर्ब हो गया वो डिस्टर्ब हो गया है। तो अगर हम उस प्रणाली को वापस से चला दें और मैं कहता हूं कि
(35:10) अक्सर लोग जागते पता है क्यों नहीं है? लोग बाहर के खाने पर, कपड़ों पर, हर चीज पर लाखों रुपए खर्च करने को तैयार हैं। लेकिन अपने शरीर के ऊपर खर्च करने को तैयार नहीं है। अच्छा खाने पर, अच्छी प्रोग्रामिंग पर, अच्छे कोर्स पर, अच्छे मतलब लोगों को लगता है कि यार यह पैसे का वेस्टेज है। लेकिन वहीं अगर वो कभी हॉस्पिटल में एडमिट हो और डॉक्टर 20 लाख का बिल बना दे तो वो जायज लगता है। तो इसलिए मैं लोगों को बोलता हूं कि हमारे शरीर के पास वो तंत्र है। आपको इसको सीखने की जानने की जरूरत है। कि जब आप स्वस्थ थे तो कौन स्वस्थ रखे हुआ था? आपका अपना शरीर
(35:39) और जब आप बीमार हुए तो बीमारी कहीं से एंटर नहीं हुई है। पैदा नहीं हुई है। सिर्फ वो जो तंत्र आपके पूरे शरीर को सुचारू रूप से चला रहा था आपने उसको बाधित कर दिया। आपने उसको रोक दिया। अपने मन से, अपनी बुद्धि, अपने विचारों, अपने नेगेटिव थॉट्स, अपने फियर, अपने स्ट्रेस से अगर आप उसको वापस से सुचारू रूप से चलाना सीख लो। तो मैं कहता हूं कि जिंदगी में चमत्कार हो सकते हैं और यह चमत्कार स्वयं भगवान रूप में आपके मेरे हर एक व्यक्ति के अंदर विराजमान है। सिर्फ उसको जानने की, टैप करने की और सही से उसकी प्रैक्टिस करने की जरूरत है। बहुत बढ़िया अनुराग जी। अनुराग
(36:10) जी मैं इसमें एक बात और आपसे उसमें जस्टिफिकेशन चाहूंगा या आपका उसमें मोहर चाहूंगा कि आज से कुछ 250 साल पहले हमारे जो पूर्वज रहे वो पूर्वज लोगों के जीवन में बड़ा कंपटीशन नहीं होता था। वो बहुत फास्ट लाइफ नहीं जीते थे और उनका पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम शायद बहुत अच्छा काम करता था क्योंकि वो हमेशा गांव में बैठ के ताश खेल रहे हैं। चौपाल में बैठे हैं। इकट्ठे गप्पे कर रहे हैं। हमेशा खुशमजाज बैठे हुए हैं और ज्यादा से ज्यादा रेस्ट मोड में रहते थे। तो उनकी बॉडी में वो सारे विकार ही नहीं आते थे। आप देखिए जितनी भी यह लाइफस्टाइल डिसऑर्डर या डिजीज
(36:45) हम बोलते हैं यह शायद लास्ट 50- 100 साल में ही हमने सुने हैं। चाहे हम डायबिटीज की बात करें, बीपी की बात करें इन सबके नाम तो हमने कभी पहले हमारे फोर फादर्स बोलते हैं। हमने कभी नाम भी नहीं सुने थे। तो क्या ये इसी का परिणाम है कि हम जो बहुत हाई लाइफ जी रहे हैं जो अचानक हमने अपनी लाइफ में तेजी ले आए हैं तो तेजी के कारण पूरे समय बॉडी आपकी फाइट एंड फाइट मोड में रहती है और उसको रेस्ट करने का मौका ही नहीं मिलता है या विचारों को शांत होने का मौका ही नहीं मिलता कि वो अपनी बॉडी को हीलिंग और रिपेयरिंग के मोड में ले जाए। क्या यह बात बिल्कुल सही है? 100%
(37:15) सही है जित्रेश जी। लेकिन आप यह देखो कि हमारे पुराने लोग भी काम करते थे। वो भी खेतों में या बहुत मेहनत का बड़े-बड़े यू नो आप इतने बड़े-बड़े मंदिर इतने बड़ी-बड़ी इमारतें बनी देखते हो तो तब भी काम सारे के सारे होते काम होते थे पर वो जो काम करते थे उसमें फाइट एंड फ्लाइट मोड नहीं होता था बिल्कुल सही बात है वो रेस्टिंग मोड में ही काम करते थे बोल रहे हो अभी रिसेंटली मैंने एक इस पूरे टॉपिक के ऊपर एक वीडियो किया था और उस वीडियो में मैंने एक स्पेसिफिक एक ये बात बोली कि पहले फाइट एंड फ्लाइट मोड रणक्षेत्र में ही एक्टिवेट होता था। अब आप
(37:44) चेयर पर बैठे हो तो भी फाइट एंड फ्लाइट मोड एक्टिवेटेड है। मतलब आप चेयर पर बैठे हो लेकिन आपका मन रणक्षेत्र में ही है। आपका मन अभी भी किसी परेशानी से जूझ रहा है। आपका मन अभी भी किसी पास्ट की सिचुएशन को सॉल्व करने में लगा हुआ है। मन अभी भी फ्यूचर की किसी ए्जायटी में अटका हुआ है। कल को क्या होगा? मैं मर गया तो घर का क्या होगा? पैसे ना आए तो क्या होगा? मतलब पहले वो जो मन डिसरप्ट होता था वो युद्ध के मैदान में ही होता था। वो किसी मेहनत की प्रक्रिया में ही होता था। और वो तो उसके लिए तो हम बने ही हैं कि जब वो मुश्किल सिचुएशन हो और हमारा शरीर भी
(38:14) एक्टिवेटेड हो, जब हमारी हार्ट रेट बढ़ रही है, जब हमको पप्पेटेशन हो रही है, हमको पसीना आ रहा है, हमारे पूरे सांसों का प्रवाह तेज हो रखा है, तो हमारा शरीर भी तो एक्टिवेटेड है उसको उस तरीके से झेलने के लिए। यानी कि आप एक इतनी सी पाइप लो। एक छोटी सी पाइप। उस छोटी सी पाइप में से आपने इतना बड़ा पानी गुजार दिया तो अब क्या होगा? वो पाइप फटेगी या फिर पानी ठीक से नहीं निकल पाएगा। लेकिन अगर पाइप ही इतनी बड़ी है तो वो पानी बड़े आराम से सुचारू रूप से निकल जाएगा। अब वही वो पाइप इतनी बड़ी हो जाती थी पुराने टाइम में जब वो लड़ रहे हैं तो इतनी बड़ी है जब वो
(38:45) नहीं लड़ रहे हैं छोटी हो जाती थी समझाने के लिए एक वो यूज़ कर रहा हूं। लेकिन आज पानी का प्रवाह तो उतना है लेकिन पाइप इतनी छोटी है जो उसको झेल नहीं पा रही है। तो पुराने समय में युद्ध क्षेत्र में फाइट एंड फ्लाइट मोड एक्टिवेट होता था। भयंकर काम करते हुए होता था तो बॉडी एक्टिवेटेड थी। यूज़ कर जाती थी। आज हम चेयर पर बैठे हैं। मन में अभी भी फाइट एंड फाइट मोड एक्टिवेटेड है। तो इस सिचुएशन को जो आज पैदा हुई है, इसको कॉप अप करने का हमारे ग्रंथों में, हमारे शास्त्रों में हजारों साल पहले तरीके हजारों साल पहले विधियां हमको दे दी गई
(39:14) थी। फर्क सिर्फ इतना है कि जब तक उसको मॉडर्न साइंस वैलिडेट नहीं करती। जब तक वो अमेरिका, यूरोप और और किसी कॉन्टिनेंट से घूम कर नहीं आता तब तक हमको लगता नहीं है कि ये बहुत बढ़िया चीज है। लेकिन आज भी आप देखो ना अभी कुछ ही दिन पहले हमने इंटरनेशनल योगा डे मनाया। योगा डे आया कहां से? भारत मतलब हम ये योग योग दिवस तो हम हजारों साल पहले महर्षि पतंजलि और शिवसूत्र से हमको हजारों साल पहले हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। लेकिन ये तब चर्चित हुआ जब ये विदेशी लोग करने लगे। तो हमें लगा कि यार ये विदेशी लोग हमारी चीज कर रहे हैं। तो हमने उसके उसके ऊपर काम
(39:49) करना शुरू कर दिया। लेकिन आज भी योग का मतलब ज्यादातर लोग सिर्फ बॉडी के कुछ पोश्चर और एक्सरसाइज समझते हैं। जबकि ये योग का 2% भी नहीं है। योग का असली अर्थ था यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। कि आपका ध्यान भी बदले, आपकी धारणा भी बदले। आपके प्रत्याहार, आपकी इंद्रियों का कंट्रोल भी बदले। आपके आठ शरीर के आठ तत्व बदले जिसमें से एक आसन है। हमने आसन को पूरा योग समझ लिया। लेकिन हम उसके पीछे बहुत बड़ी-बड़ी साइंसेस थी। प्राण की साइंसेस हमारे एंशिएंट इंडिया में बहुत भयंकर साइंसेस थी। अगर हम उनको समझें और उनको
(40:24) करने का प्रयास करें तो किसी भी इंसान का जीवन बदल सकता है। और आप देखो पुराने समय में लोग ये प्रक्रियाएं नेचुरल रूप से करते थे। उनके जीवन का हिस्सा थी। तभी हम संपन्न थे। मतलब हमारी संपन्नता किसी से छुपी नहीं हुई है। ऐसे ही नहीं कि पूरी दुनिया को छोड़ के ईस्ट इंडिया कंपनी सिर्फ भारत को लूटने के लिए आती है। सिर्फ यहां पे चाहे वो मंगोलिया से कोई मंगोल से कोई आए, चाहे वो रशिया से कोई आए वो व्यापार करने के लिए भारत को ही क्यों चुनते थे? भारत हम समृद्ध थे। हर प्रकार से समृद्ध थे जितेश जी। यह खाली चीजों के उत्पादन तक
(40:55) सीमित नहीं था कि हमारे यहां पर सब प्रकार की चीजें हो रही थी। इनफैक्ट आप देखो कि शिक्षा का भी सबसे बड़ा क्षेत्र भारत था। नालंदा और तक्षशिला ऐसे विश्वविद्यालय थे जहां पर पूरी दुनिया विश्वविद्यालय जब पूरी दुनिया को यूनिवर्सिटी का मतलब नहीं पता था। तब यहां पर विश्वविद्यालय थे जहां पर चाइना से, जापान से और बहुत कंट्रीज से लोग यहां पर सीखने पढ़ने के लिए आते थे। और आप देखोगे ये वो देश हैं जहां पर तीन चार 5000 साल पहले अगर आप पीछे जाओगे तो आप देखोगे कि पूरा का पूरा पूरी दुनिया त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही है। कोई प्लेग से लड़ रहा है। कोई किसी
(41:25) हैजा से लड़ रहा कोई किसी बीमारी से लड़ रहा है। कहीं पर खाने की व्यवस्था नहीं है। उनको सिर्फ जानवरों को मारकर खाना पड़ रहा है। और यहां पर वेद लिखे जा रहे हैं। यहां पर उपनिषद लिखे जा रहे हैं। यहां पर संपन्नता निवास कर रही है। क्यों? क्योंकि यहां पर वो सब चीजें सुचारू रूप से प्रारंभिक रूप से इंसान को दी गई जिनका प्रयास वो करता था अपनी प्राण को, अपनी चेतना को बैलेंस करने के लिए और उन्हीं चीजों को आज हमने खो दिया जिसका बहुत बड़ा कारण है कि चेयर पर बैठे-बैठे अभी पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम जो एक्टिवेट होना चाहिए था उसकी जगह सिंपैथेटिक नर्वस
(41:51) सिस्टम फाइट एंड फ्लाइट एक्टिवेट है और वो हमारे शरीर के अंदर केमिकल्स हॉर्मोंस में इतनी तब्दीली ला रहा है जो आज धीरे-धीरे हमारे शरीर को विकारों की तरफ लेकर के जा रहे हैं। जब आप ये सारी बातें बोल रहे थे तो मानस पटल पर पुरानी पिक्चरें चल रही थी कि कैसे मैं भी अपने जीवन में आपसे मिलने के पहले वाला जो जीवन था उस समय मैं हमेशा फाइट एंड फ्लाइट मोड में ही रहता था हमेशा एक्टिव मोड में रहता था और आपका मेरे जीवन में आने का जो भगवान ने प्रारब्ध बनाया उसके बाद मेरे जीवन में भी जब वो थोड़ा अंदर से शांति आई सुकून आई जो हम बोलते
(42:24) हैं जुगाड़ तगाड़ खत्म हुआ उकड़ जो आपका शब्द होता है वो खत्म हुआ और अंदर से जब वो शांति आई तो मुझे सब कुछ जो 40 साल की उम्र में नहीं मिला वह दो सालों में मिल गया। और बॉडी वाइज भी मैं बड़ा फिट हो गया। जो आज से 10 साल पहले मेरी फोटो जो दिखती थी उससे भी यंग आज मैं दिख रहा हूं। मैं अपने आप को आईने में देखता हूं तो मैं खुद ही रियलाइज कर पाता हूं। तो मैं बहुत अच्छे से कोरिलेट कर पा रहा था जब आप वो सारी बातें बोल रहे थे। तो अनुराग जी मैं वापस फिर से हीलिंग पे ही आना चाहूंगा। आपके बहुत सारे सेशंस मैंने खुद भी अटेंड किए और मैंने खुद के जीवन में ही बड़ा
(43:00) परिवर्तन लाया। तो जो ये हीलिंग की सारी मॉडेलिटीज हैं। अब जैसे लोग बोलते हैं कि स्ट्रेस, एंजाइटटी, डिप्रेशन, सिंजोफेनिया, ओसीडी ये सब नाम हो गए। पर इनके पीछे कारण तो सोच ही है। सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी है। सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी है। ये सब तो अलग-अलग टूल्स हो गए। वो टूल्स के कारण सॉफ्टवेयर तक पहुंच रहे हैं। तो आपके एक प्रोग्राम जो अभी हीलिंग इंटेलिजेंस प्रोग्राम मैंने खुद भी बहुत बार अटेंड किया। लाइव भी अटेंड किया, रिकॉर्डेड भी कई बार सुना। उसमें जो प्रैक्टिससेस आप करवाते हैं, तो क्या यह प्रैक्टिससेस रेगुलर करने पे ये सारी जो
(43:35) बीमारियां जिनको नाम दे दिए हैं बीमारी के रूप में क्या ये सारी चीजें ठीक हो सकती हैं? जी अगर मैं यहां पे एक एनालॉजी दूंगा ना तो लोग इसको गलत तरीके से समझते हैं। मैं कभी किसी की बीमारी को ठीक नहीं करता हूं। ना ही कोई प्रक्रिया किसी की बीमारी को ठीक करती है। लेकिन फिर भी वहां पर हजारों लाखों लोगों के शरीर ठीक होते हैं। लाखों लोगों के स्ट्रेस, डिप्रेशन, ए्जायटी ठीक होते हैं। उसका कारण क्या है कि जो पद्धतियां मैं बताता हूं उनको वो अपने जीवन में उतारते हैं। कई लोग मेरे पास ऐसे भी आते हैं कि सर मेरी यह बीमारी ठीक मैं आपका सेशन
(44:08) अटेंड कर लूं। मेरी बीमारी ठीक हो जाएगी। मैंने कहा बिल्कुल मत आना। गलती से भी मत आना। वहां पर जो प्रैक्टिससेस मैं आपको करवाता हूं अगर आप उनको आत्मसात कर पाओ। अगर आप उनको अपने जीवन में उतार पाओ, अगर आपके पास यह समय हो कि आप अपने जीवन के लिए, अपनी जिंदगी के लिए, अपने शरीर के लिए आप तीन छ महीने अपने आपको दे पाओ। अलग से दिन में एक डेढ़ दो घंटे निकाल पाओ तो वो प्रक्रियाएं आपको बेनिफिट देंगी। लेकिन वो भी जानते हैं कब जब मैं बिना किसी आउटकम से अटैच हुए उनको अपनी जीवन शैली बना लूंगा। मतलब आपको मैनुअली नहीं करनी है वो। आपको उसको समझ
(44:41) के गहराई पे जाके 100% सरेंडर हो के ट्रस्ट करके बिलीव करके हां ये चीजें करके यदि लाखों लोगों ने बेनिफिट लिया है तो मैं भी ले पाऊंगा ये 100% आपको ट्रस्ट होना चाहिए। बहुत अच्छी बात है। और कल हम इसी पर एक बात कर रहे थे श्रेयश जी कि बहुत से लोग ऐसे भी मेरे पास आते हैं जो हमारा जो रिट्रीट होता है नो दसेल्फ उसमें आते हैं जो कंप्लीट सरेंडर से आते हैं। कंप्लीट एक बिलीफ से आते हैं। जिनके पास आउटकम से वो अटैच नहीं होते कि यहां से मेरा यह ठीक होगा या नहीं होगा। उनके शरीर में कई ऐसे अनवांटेड चीजें जो उनको पता भी नहीं है वो भी वहां निकल के आती हैं और वह
(45:16) भी ठीक हो जाती हैं। क्यों? क्योंकि वो उस प्रक्रिया को अनुभव के लिए कर रहे हैं। आनंद में कर रहे हैं। वो उसके आउटकम से अटैच नहीं है। लेकिन जब हम किसी प्रक्रिया के आउटकम से अटैच होते हैं तो आउटकम से अटैच होना हमारी एक्सपेक्टेशंस को उससे बांध देता है। और जब किसी आउटकम से हमारी एक्सपेक्टेशंस बंधती हैं, तो हम उसके प्रोसेस में इनवॉल्व नहीं हो पाते। हम सिर्फ उसी चिंता में, उसी तनाव में, उसी डर में, उसी डाउट में बने रहते हैं। डाउट कैसा ठीक होगा? नहीं होगा। डर कैसा नहीं हुआ तो क्या होगा? डेस्पिरेशन बंद जाती है कि यार जल्दी से जल्दी ये सर ये छ दिन आप
(45:52) करवाओगे तीन दिन में ठीक चार दिन में या पांच या घर जाके पांचव दिन ठीक। जब तक आपका फाइट एंड फ्लाइट मोड एक्टिवेटेड है तब तक भगवान स्वयं भी आ जाए आपको ठीक नहीं कर सकते। आपका नर्वस सिस्टम खुद का शांत नहीं हुआ। इसीलिए तो सर्जरी करवा लो, कुछ करवा लो बॉडी में वो विकार दोबारा से आ जाता है। क्योंकि फाइट एंड फ्लाइट मोड को टेम नहीं किया। फाइट एंड फ्लाइट मोड हमेशा एक्टिवेटेड रहा। और जब हम किसी भी एक्सपेक्टेशन किसी आउटकम के बंधने के साथ डेस्पिरेशन, डाउट, फियर और लस्ट में किसी चीज के साथ जुड़ते हैं तो वो हमको कभी बेनिफिट नहीं दे सकती। तो इसलिए मैं लोगों
(46:24) को बोलता हूं कि अगर भैया सरेंडर कर सकते हो मेरे पे नहीं अपने शरीर में अंदर बैठा जो परमात्मा है उस पर विश्वास रख सकते हो और यह जो मैं बताऊंगा इसको आउटकम के साथ जुड़कर नहीं बल्कि आपको यह करने में आनंद आए ऐसा क्या इन प्रक्रियाओं को कर सकते हो तो ही मेरे पास आना अदरवाइज मैं आपके काम का व्यक्ति नहीं हूं कोई दूसरा इंसान ढूंढो जो मेरे से अच्छा करवाता हो या जो कोई और बेनिफिट दे सकता हो मैं यह नहीं दे सकता हूं मैं तो केवल आपका वो तंत्र तंत्र जो है उसको जागृत कर सकता हूं। लेकिन तब जब आप वो अवसाद से जुड़े जो आप हो उससे
(46:59) हटकर के आप मेरे पास और आप देखो सर मतलब हम कोई नो दसेल्फ का हम कोई ऐड नहीं लगाते। हम किसी के घर बुलाने नहीं जाते। फिर भी हमारे पास जगह नहीं है। हां अभी तो नवंबर तक जगह नहीं है। नवंबर तक हमारे पास जगह नहीं है। पता नहीं ये वीडियो कब रिलीज होगा मतलब आज जब हम बात कर रहे हैं तो भी अगले चार महीने हमारे पास जगह छ महीने जगह नहीं है। क्यों नहीं है जगह? क्योंकि वो जो लोग वहां पर आ रहे हैं वो इतने सरेंडर भाव से आते हैं इतने आनंद के साथ आते हैं और इतने आनंद के साथ वापस जाते हैं कि वो जो शरीर में वो जो जानते भी नहीं थे मतलब कितने ऐसे लोग
(47:30) होते हैं जिनको ये पता भी नहीं था कि यार मेरे यहां पर कुछ दिक्कत है वहां इवेंट में बैठे-बैठे पता चला क्योंकि हम कुछ प्रक्रियाएं करते हैं जिससे शरीर बताने लगता है कि मेरे पास ये चैलेंजेस मेमोरीज ये रखी हुई हैं। वो भी लोग आनंदित जाते हैं और वो बोलते हैं और सिर्फ ये शरीर के मामले में नहीं है। आप देखो कोई बोल रहा है कि मैंने अपनी जिंदगी में इतना पैसा नहीं कमाया जितना मैं अब कमा रहा हूं। मैंने अपना शरीर बिल्कुल ठीक कर लिया। मैं 10 साल यंग दिखने लगा। मेरे मेरे परिवार में मेरे रिलेशंस बड़े अच्छे हो गए। मेरी सक्सेस बड़ी जल्दी मुझे मिलने लग गई। तो
(48:01) ये सब चीजें आपके प्राणों का ही बाय प्रोडक्ट है। ये जो जिसको हमने बोला सर्व खलवेदम ब्रह्म कि ये सब कुछ ब्रह्म ही है और अहम ब्रह्मस्मि कि मैं भी वह ब्रह्म ही हूं। जब मैं उस ब्रह्म को जानता हूं तो इस ब्रह्म में आने वाली प्रकृति की हर एक चीज मुझसे प्रभावित होती है क्योंकि पूरी प्रकृति उस एक ब्रह्म तत्व से बनी है और जब मैं खुद ब्रह्म हो करके उस ब्रह्म चेतना के साथ विलीन होता हूं मिलता हूं ध्यान की उस अवस्था पर पहुंचता हूं जहां शरीर मन बुद्धि अहंकार और चित्त ये पांचों चीजें नहीं बचती तो जिंदगी में आनंद ही आनंद है विकार सब दूर होते हैं और जिंदगी
(48:35) के हर क्षेत्र को मैं बैलेंस कर पाता हूं। लेकिन उसका कारण मैं नहीं होता। उसका कारण उन लोगों के अंदर बैठा हुआ भगवान है, परमात्मा है, वाहेगुरु है, गॉड है, खुदा है जो भी उसको नाम दो और उनकी अपनी समर्पण की भावना है। अगर समर्पण होगा तो जीवन में कुछ भी पॉसिबल होगा और ये जो विद्याएं थी ये केवल उसी व्यक्ति के साथ काम करती थी जो वाकई इस पूरे प्रोसेस को एंजॉय करना जानता हो, चाहता हो ना कि सिर्फ आउटकम के साथ जुड़ा रहे। तो इसलिए बहुत से लोग आते हैं जितेश जी अवेकन में हमारा क्वांटम मैनिफेस्टेशन क्वांटम हीलिंग का एक प्रोग्राम होता है। इंटेंशनल अलाइनमेंट
(49:08) होता है। मेंटल डिटॉक्स होता है। नो दसेल्फ हमारा रिट्रीट होता है जिसमें अब हमारे पास जगह ही नहीं बचती है। हर एक में लोगों की सेम प्रतिक्रिया मुझे मिलती है। चाहे हमारा एक फ्री प्रोग्राम होता है। ग्रेटट्यूड वाली हमारी एक मास्टर क्लास होती है जिसमें लोग आभार और आनंद के साथ कुछ प्रोग्रामिंग और उसमें मैं एक विजुअलाइजेशन भी करवाता हूं। बिल्कुल फ्री निशुल्क। आप चाहे तो आप अपने सभी जितने भी श्रोताग उसको सुन रहे हो उनको ये बिल्कुल निशुल्क दे सकते हैं। मैं उसका लिंक आपको दे दूंगा। तो लोग उसमें भी चित्रेश जी वो पा जाते हैं जो लोग 2020 लाख खर्च करके
(49:38) नहीं पाते। तो मैं कहता हूं पाने के लिए पात्रता चाहिए है। अगर पात्रता आपकी है तो आप जिंदगी में किसी भी चीज को, किसी भी रोग को, किसी भी परेशानी को, किसी भी चैलेंज को धीरे-धीरे निरंतर प्रयास के साथ उसको समाप्त कर सकते हो। अगर आप सरेंडर के साथ, ग्रेटट्यूड के साथ और उस पात्रता के साथ आओ तो। बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया अनुराग जी बीच में आपने एक बात बोली अवसाद की जो बात की तो लोग उनके मन में जो 2020 30-30 साल पुरानी घटनाएं हैं उन घटनाओं को छोड़ नहीं पाते और कहीं ना कहीं उन्हीं घटनाओं के दुष्परिणाम या उन्हीं घटनाओं के
(50:12) साइड इफेक्ट हैं जो उनके मन में वो बीमारियां घर कर जाती हैं। तो इसको खत्म करने के क्या सटीक तरीके हैं या क्या ऐसे स्टेप्स हैं जिससे वो यह पुराने मेंटल ट्रॉमा से अपने आप को ओवरकम कर सके। यह तो इतना अच्छा सवाल है चित्रेश जी और ये ये मैं इतना कन्विक्शन से इस सवाल का जवाब दे सकता हूं क्योंकि यह सवाल कभी मेरा भी था। यह सिचुएशन कभी मेरी भी थी। मैं भी जिंदगी के एक ऐसे फेज में था जहां पर वो पास्ट के पेनफुल मेमोरीज, ट्रॉमाज़, वो इंसिडेंसेस जो मुझे कई साल पहले हुए थे वो मेरे यहां पर रखे रखे इतना विध्वंस मचा रहे थे कि शरीर में बीमारियों का रूप उन्होंने लेने
(50:48) लिया था। मेरे शरीर में विकार होने लगे थे। ब्लड प्रेशर इतना ज्यादा बढ़ने लगा था। लम्स बम्स होने लगे थे बॉडी के अंदर। और कई ऐसी डिजीजसेस जिनका नाम भी आज मैं नहीं लेना चाहूंगा शरीर में पैदा होने लगी थी। तो मैं तो इससे इतना ज्यादा रिलेट करता हूं क्योंकि उन सब चीजों के ऊपर मैंने धीरे-धीरे जानना शुरू किया, समझना पढ़ना शुरू किया और जब यह पता चला कि इन सब विकारों को दूर करने का बाहर से कुछ भी प्रयोजन नहीं है। इन सबको जो हमारे अंदर मेमोरीज बैठी हैं केवल उन मेमोरी के मीनिंग को बदलना है। उनके इंपैक्ट को बदलना है। कई लोग मेरे पास आते हैं वो
(51:21) बोलते हैं कि सर मेरी ना 20 साल पुरानी एक मेमोरी है। 20 साल पहले मुझे किसी ने धोखा दिया था। तो अब ऐसा कैसे हो कि मैं ये 20 साल पुरानी मेमोरी भूल जाऊं? मैंने कहा जी ये तो कोई तरीका ही नहीं है हमारे पास। ये तो कोई आप हॉलीवुड के किसी डायरेक्टर के पास जाओ मैट्रिक्स मैट्रिक्स जो आपका ऐसा वो मेमोरी डिलीट कर दे तो ये तो हमारे पास ये तो कोई तरीका ही नहीं है। और मैंने कहा ये तरीका भी सही नहीं है। मतलब आप कहते हो कि मैं शराब छोड़ना चाहता हूं तो पूरे शहर के सभी शराब की दुकानें बंद करवा दो तो शराब छूट जाएगा। अरे नहीं आप ढूंढोगे आप शराबबंदी जहां हो जाती है
(51:50) सबसे ज्यादा शराब बिकती है वहां। तो आप ढूंढोगे कोई दूसरा क्षेत्र जहां पर जाकर के आप तो चीजों को सप्रेस करने से कभी भी चीजें ठीक नहीं होती हैं। बल्कि उस स्थिति में रहते हुए वो चीज आपको परेशान ना करे ऐसा आपको चीज प्रिपेयर करनी पड़ती है। तो कथारेसिस हम इसको बोलते हैं। तो कथारेसिस बेसिकली ऐसी टर्म है चित्रेश जी जो जिनको साइकोलॉजी का गॉड फादर हम मानते हैं। फादर ऑफ साइकोलॉजी बोलते हैं। सिगमंड फ्रॉयड उनके एक कोलीग थे जिनका नाम था जोसफ ब्रूअर। तो जोसफ ब्रूअर ने सबसे पहले इस कथारसिस का प्रयोग किया और हमको ये कथारसिस एक प्रॉपर फॉर्म में वैसे तो ये
(52:24) हमारी भारतीय परंपराओं में हमेशा से मौजूद थी लेकिन हमने इसको कोई नाम या कोई फॉर्म नहीं दिया था। उस उस व्यक्ति ने इसको एक फॉर्म दिया और उन्होंने कहा कि हमारे पुराने समय में हमारे पास जो भी नेगेटिव इमोशंस जो भी नेगेटिव पैटर्न्स पड़े हैं उन पैटर्न्स को हमारी बॉडी कीप्स द स्कोरर। हमने अभी थोड़ी देर पहले बात की। तो हमारे शरीर ने उनको स्टोर करके रखा हुआ है। उन पैटर्न्स को निकालने की जरूरत है। तो उन पैटर्न्स को जो आपके अंदर पड़े हैं हम उनको निकालते नहीं। हम उनके मीनिंग को बदलते हैं। जैसे किसी व्यक्ति के साथ 20 साल पुरानी कोई घटना हुई। वो घटना आज भी
(52:57) वो सोचता है तो परेशान हो जाता है। वो घटना आज भी उसको तंग करती है। या 20 साल के बाद मेरा क्या होगा? मैं पैसे कमा पाऊंगा। कामयाब हऊंगा नहीं। मेरे बच्चे, मेरी फैमिली 20 साल आगे की घटना जो है उसको भी लेकर के हम चिंतित होते रहते हैं। तो ये सब कुछ शरीर में पैदा कहां से हुआ? मन से। कि मन ने बार-बार उसको सोचना शुरू किया और शरीर ने बार-बार उस हिसाब से केमिकल्स रिलीज करना शुरू किए। तो हम पार्टिसिपेंट्स को ऐसा विजुलाइज करवाते हैं कि वो विजुलाइज करके उस समय में जाएं जब वो स्थिति पैदा हुई थी। उस समय को बहुत अच्छे से देखें। उस स्थिति को बहुत अच्छे
(53:29) से देखें। उस सारी सिचुएशन को माइंड ने कहीं ना कहीं स्टोर किया हुआ है। तो अब हम उस सिचुएशन में एक नया आउटपुट अपने माइंड को देते हैं। एक नया आउटकम देख देते हैं। हम देखते हैं कि वो जो पूरी की पूरी घटना थी वो पूरी घटना में से मुझे लर्निंग क्या मिल सकती थी। वो पूरी घटना में से मेरे साथ अच्छा क्या हुआ? या वो पूरी घटना के जो भी नेगेटिव इंपैक्ट थे उन्होंने जो हमारे माइंड में जगह बना करके रखी हुई थी उनके इंपैक्ट को धीरे-धीरे हम कुछ प्रोसेससेस से खत्म करते रहते हैं कि अब जो है और फिर आप देखोगे कि लोग जब इस प्रक्रिया को करते हैं तो कुछ समय के बाद
(54:00) वो जो पुरानी घटना थी वो उनको दुख नहीं देती बल्कि उनको ये रियलाइज होता है कि वो घटना अगर ना हुई होती तो आज मैं यहां पर ना होता। वो घटना मेरे एक जीवन का पार्ट था। इसीलिए मैं बोलता हूं कोई भी दुर्घटना नहीं होती। घटना होती है घटने आती है। घटने का मतलब माइनस होने कम होने आती है। लेकिन हमारा मन उसको पकड़ लेता है। क्योंकि उससे जो दर्द मिला जो पेन मिली वो माइंड के लिए सेकेंडरी गेन बन जाता है। एक तरह का गेन माइंड को अच्छा लगता है उस दर्द में। जैसे छोटे-छोटे से दर्द में शरीर को मजा आता है। कभी आपने शायद नोट किया हो या ना किया
(54:31) हो जब बुखार चढ़ रहा होता है ना उस समय की जो शरीर की टूटन है, जो अंगड़ाई है वो बड़ा आनंद देती है शरीर को। कभी जिम करके आओ। जिम करने के बाद वो जो शरीर टूट रहा होता है वो बड़ा आनंददायक चीज है। ऐसे ही मॉडरेट लेवल का वो जो पेन है ना वो शरीर को कहीं ना कहीं गेन दे रहा होता है बॉडी को। और उससे शरीर को सिग्निफिकेंस लग रही होती है। क्योंकि आप शरीर पर ध्यान देते हो। आप पूछना शुरू करते हो। आप यू नो पास्ट में जो मेमोरीज आपके साथ गलत हुई लोग उसके बारे में आपसे पूछना शुरू करते हैं। तो कहीं ना कहींेंस मिल रही होती है। तो हम उनके मीनिंग को चेंज करते हैं। उस
(55:01) घटना को डिलीट नहीं करते हैं कि उससे जब तक हम उसकी इमोशंस के साथ जुड़े हुए थे क्योंकि कोई भी घटना के साथ अगर आप इमोशंस को जोड़ दोगे तो वो पेनफुल मेमोरी बन जाती है या वो प्लेजर देने वाली मेमोरी बन जाती है। लेकिन अगर आप उससे इमोशंस को विड्रॉ कर लो। अगर आप उसको साक्षी हो के देख लो। जिस भी चीज को आप देख लेते हो ना वो आपको तंग करना बंद कर देती है। जैसे स्वामी विवेकानंद का एक बहुत पुराना वाक्य है। बहुत फेमस है और टीवी पर एक बार ये स्टोरी आ रही थी तो मैंने भी देखी थी बचपन में बहुत छोटा था कि स्वामी विवेकानंद कहीं भाग रहे होते हैं तो कुत्ते उनके पीछे लग
(55:34) जाते हैं। तो भागते रहते हैं कुत्ते और तेजी से पीछे भागते रहते हैं। तो उनके गुरु बोलते हैं कि एक मिनट वहीं रुक जाओ। रामकृष्ण परमहंस हो जाओ। तटस्थ हो जाओ। वहीं रुक जाओ। तो बोलते हैं रुकूंगा तो मुझे ये काट लेंगे। वो बोले नहीं एकदम वहीं रुक जाओ और रुक करके पलट के इनको देखो। स्वामी विवेकानंद रुकते हैं, पलट करके देखते हैं। कुत्ते भी वहीं रुक जाते हैं और जैसे वो उनको देखते रहते हैं, वह वहीं से वापस मुड़ जाते हैं। तो यानी कि जब हम अपने जीवन में वो जो कुत्ते वो जो परिस्थितियां जो हमारे पीछे पड़ी हुई है और हमको आगे आगे भगा रही है जिससे हम डर
(56:02) करके भाग रहे हैं। जिस दिन हम उसको जागरूक होकर उस डर को देखना शुरू कर सिर्फ इतना गेम है जितेश जी। डर को जागरूक होकर देखने का गेम है कि यह डर किसको खत्म करेगा? किसको तबाह करेगा? किसको बर्बाद करेगा? ये तो सिर्फ एक मन में पड़ी हुई एक दशा है। एक मनोदशा है। तो जब हम जाग करके चित्रेश जी उनको देखना शुरू करते हैं, उसका मीनिंग बदलने लगता है। हमारे अंदर की चेतना ऊपर उठने लगती है। उसके साथ हम प्राणों की कुछ प्रक्रियाएं करें। हम कुछ ब्रेथ वर्क्स करते हैं। कुछ ब्रीथिंग प्रैक्टिससेस करते हैं। अपने सप्त चक्रों को जागृत करते हैं।
(56:32) तो वो शक्ति वो कुंडलिनी शक्ति जो मूलाधार में सा बल लगाकर पड़ी हुई थी और मूलाधार में क्या था? डर था। इनसिक्योरिटी थी। सेफ्टी कल को जिंदगी में नहीं होगी। उसका बहुत-बहुत बड़ा भय हमारे मूलाधार में बैठा रहता है। तो वो शक्ति जब तक मूलाधार में बैठी है हम जीवन की हर चीज से डरते रहेंगे। लेकिन जैसे ही वो प्राण वायु ऊपर की तरफ चेतना को बढ़ाने लगी तो वो शक्ति धीरे-धीरे ऊपर बढ़ती है। वो मणिपुर मणिपुर से होते हुए विशुद्धि विशुद्धि से फिर इन सब छह के छह चक्रों को पार करके जब वो सहस्त्रार तक पहुंचती है तो पता चलता है जीवन में ना कोई डर है ना कोई अवसाद है ना
(57:04) कोई चिंता है ना कोई तनाव है और साथ में कथारसिस करते हैं हम जिससे कि वो जो पुरानी मेमोरीज थी उनके मीनिंग को हम बदलते हैं और हम देखते हैं कि इन पुरानी मेमोरीज को हमने अपने जीवन से निकाल दिया। इनके इमोशंस को हमने निकाल दिया। घटना आज भी वही है लेकिन वो घटना आज मुझे दुख नहीं देती। तो अगर हम ये कैथारसिस का प्रॉपर प्रोसेस करें हम उसके बाद कुछ हम एक मेडिटेशन करते हैं जिसको हम रिदममिक रिलीज मेडिटेशन बोलते हैं। बहुत से पॉडकास्ट और वीडियोस में भी मैंने इसके बारे में बात की है। जो लोग घर बैठकर के करना चाहे कर भी सकते हैं बहुत आराम से। और फिर उसके
(57:31) बाद हम वो सप्तचक्र ध्यान करके और ब्रेथ वर्क करके अपने प्राणों को ऊपर की तरफ ऊर्ध्व गमन हम जब उसका करते हैं और पंच प्राण को बैलेंस करते हैं प्राण अपान ज्ञान उदान समान तो शरीर का पूरा सॉफ्टवेयर सुचारू रूप से काम करने लगता है और अगर शरीर के सॉफ्टवेयर ने सही काम करना शुरू कर दिया तो हार्डवेयर उस सॉफ्टवेयर का ही बाय प्रोडक्ट है। लोगों की गलत आदतें छूटने लगती हैं। लोगों के रिलेशनशिप्स में जो वो एकदम से एंग्री एंगर हो जाता है उनको या एकदम से कोई प्रतिक्रिया दे देते हैं वो प्रतिक्रियाएं बंद होने लगती हैं। लोग न सिर्फ अपने आप
(58:01) को समझने लगते हैं, लोग दूसरों को समझने लगते हैं। दूसरों के विचारों को समझने लगते हैं और शायद हमारे योगी हमारे पुराने लोग जानते थे इस सभी चीज को। इसीलिए वो ये एक अवधारणा दे पाए क्योंकि वो अंदर से शांत थे। वो अंदर से ठहराव में थे, रुके हुए थे। इसीलिए वो यह दे पाए कि सर्वे भवंतु सुखिन सर्वे संत निरामया सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्य दुख सभी सुखी हो। सभी ये कौन बोल सकता है? यह फाइट एंड फ्लाइट में नहीं बोला जा सकता। यह पीस में रेस्ट एंड डाइजेस्ट में निकल सकती है चीज। जब आंतरिक शांति भी आपके अंदर आ जाए। यह तभी आ सकती है जब आपके प्राण उसकी सही
(58:31) अवस्था में सुचारू रूप से चल रहे हो, बैलेंस हो और जब आपके मन के विकारों को आपने जीत लिया हो। श्री कृष्ण भी अर्जुन को यह बोल रहे हैं मनव मनुष्य नाम कारण बंधन मोक्ष कि मन ही मनुष्य के बंधन का और मोक्ष का भी कारण है। फर्क सिर्फ इतना है कि अगर आप मन से गवर्न हो रहे हो तो ये आपको बंधन देगा। और अगर आप मन को गवर्न कर रहे हो तो ये आपको मोक्ष लिबरेशन और फ्रीडम देगा। तो सारा गेम उस मन से अटैचमेंट का है। लेकिन जैसे ही आप मन को देखना शुरू करते हो पलट के तो वो वहीं तटस्थ खड़ा हो जाता है और आप अब दूसरी दिशा में अपना कार्य कर सकते हो और अपने
(59:03) जीवन को बदल सकते हो। बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया। क्या ब्यूटीफुली आपने समझा अनुराग जी आनंद आ गया। अनुराग जी जो बहुत सारे आपके सेशंस में दो-तीन टर्म बार-बार सुनने मिलते हैं। थाइमस हीलिंग, थीटा हीलिंग यह क्या है और इनसे क्या लाभ जीवन में होता है? लोग जो भी आपके वर्कशॉप में जब लोग आते हैं और मैंने खुद ही सैकड़ों लोगों के मुंह से सुना है कि यह एक थीटा हीलिंग करने के बाद मेरे जीवन में ऐसा चमत्कार हो गया। कोई बोलता है थाइमस हीलिंग करने में मेरे हृदय में आनंद ही आनंद आ गया। मैं परिपूर्ण हो गया। तो ऐसी ये ये हीलिंग्स क्या-क्या होती हैं और इनसे जीवन में कैसे
(59:39) लोग बेनिफिट ले रहे हैं? देखो जरेश जी ये बहुत खूबसूरत सवाल है आपका और अगर कोई इसको खाली सुने नहीं और प्रक्रिया को उतारे भी अपनी जिंदगी में तो उसको ना सिर्फ सुनने में बल्कि जीवन में भी बहुत आनंद आने लगेगा। जैसे आप देखो हमारे शरीर का पूरा तंत्र हॉर्मोंस पे चल रहा है। हमको अगर कुछ हम खट्टा चीज के बारे में सोचते हैं। नींबू, चटकारेदार चटनी, मसाला, पापड़ कुछ भी ऐसा नमक डालो उसके ऊपर आपके मुंह में पानी आ गया है। मैंने देख लिया है और आपने घूंट भर भी लिया है। तो जब हम किसी ऐसी चीज के बारे में सोचते हैं तो हमारे स्लाइवरी ग्लैंड्स एक जीभ के नीचे
(1:00:11) और यहां पर वो स्लाइवरी ग्लैंड्स जो हैं एक्टिवेट हो जाते हैं और मुंह में सलाइवा रिलीज़ करने लगते हैं। तो क्या यह सलाइवा किसी खाने की प्लेट को देखकर के सामने आया या उसको सोचने से ही सामने आ गया। मुंह में आ गया। सोचने से ही ग्लैंड सोचने मात्र से ग्लैंड एक्टिवेट हो गया। ठीक वैसे ही अगर आप मतलब हम एडल्ट्स हैं थोड़ी सी इस बारे में बात कर सकते हैं। अगर आपको कोई सेक्सुअल थॉट भी आता है तो आपका पूरा सेक्सुअल तंत्र जो है वो स्टिमुलेट हो जाता है। हालांकि आप ऐसी कोई एक्टिविटी नहीं कर रहे हो। आप किसी ऐसी प्रक्रिया में नहीं हो लेकिन सोचने मात्र
(1:00:43) से ही आपके शरीर ने वह कार्यक्रम प्रारंभ कर दिया है। ठीक वैसे ही अगर आप डॉक्टर के पास जाओ और आप उससे पूछो भैया स्ट्रेस क्या है? तो बोलेगा भैया आपके माइंड में नेगेटिव थॉट्स आ रहे हैं। आप ज्यादा डर रहे हो सो बोलेगा हां लेकिन बॉडी में क्या हो रहा है? बोलेगा बॉडी में आपकी कॉर्टिजोल और एड्रिनलिन एक्सेसिव रिलीज हो रहे हैं। आपका हार्ट रेट बढ़ा हुआ है। आपको पपिटेशन हो रही है। आपका रेस्टिंग हार्ट रेट तेज ऊपर जा रहा है। और आपकी सांसे जो हैं जो आपका जिसको हम ब्रीथिंग रेट बोलते हैं ब्रीथिंग रेट बहुत ज्यादा है। और आपके माइंड की जो वेव्स हैं जो
(1:01:12) आपकी नॉर्मल बीटा में या अल्फा में होनी चाहिए थी वो हाई बीटा में है। ये टेक्निकल टर्म्स में वो इंसान ये बात बोलेगा। तो यानी कि हम एक केवल सोचने मात्र से हम मुंह में पानी रिलीज कर सकते हैं। हम कॉर्टिजॉल रिलीज कर सकते हैं। एड्रिनलिन रिलीज कर सकते हैं। डोपमिनोक्सटोसिन सेरोटोनिन, नोरेपनेफ्राइन, एनेंडामाइड, कॉर्टिजोल हम सब रिलीज कर सकते हैं। कैसे? सोचें। हम केवल सोचने मात्र से अपनी हार्ट रेट बढ़ बढ़ा सकते हैं। जी। आप अभी किसी के प्रति गुस्सा लेके आओ माइंड में। आप अभी कोई स्ट्रेसफुल सिचुएशन में आ जाओ और आप देखो आपकी हार्ट रेट 70 से 90 ना हो
(1:01:44) जाए तो मेरा नाम बदल देना। और वहीं आपकी 90 हार्ट रेट है और आप एकदम पीसफुल हो जाओ। कोई पास्ट की पेनफुल मेमोरी की जगह कोई अच्छी मेमोरी के बारे में सोचने लगो। अपने माता-पिता के बारे में, अपने बच्चों के बारे में, अपने परिवार के बारे में, कोई अच्छी सिचुएशन कभी आपने कुछ ऐसा अच्छा अचीव किया था उसके बारे में सोचने लगो तो हार्ट रेट ना सिर्फ हार्ट रेट डाउन होती है बल्कि कॉर्टिसोल रिलीज होना बंद हुआ। एड्रनलिन वो कन्वर्ट हो रहा था वो कन्वर्ट होना बंद हुआ। आपका एचआरवी हार्ट रेट वैबिलिटी डाउन हुई। आपका VO2 मैक्स जो हार्ट का सबसे मेन पैरामीटर है वो कम हुआ।
(1:02:13) और आपकी ब्रेन वेव जो हाई बीटा में थी अब वो लो बीटा में और अल्फा में किससे? सोचने मात्र। यह सब कुछ इसलिए बताया ताकि मैं थाइमस को एक्सप्लेन कर सकूं। अब अगर मेरे मुंह में सलाइवा रिलीज होता है सोचने मात्र से। मेरे सोचने मात्र से कॉर्टिजॉल रिलीज होता है और मेरे सोचने मात्र से लव केमिकल ऑक्सीटोसिन रिलीज होता है। ठीक वैसे ही मेरे प्यार की फीलिंग से लव की भावना से, हैप्पीनेस की भावना से मेरा मेरे पास एक ग्लैंड है। इसको बोला जाता है थाइमस ग्लैंड। यहां पर लोकेटेड होता है। यहां पर एक बोन होती है। उसको हम बोलते हैं स्टर्नम बोन जो हमारे रिब केज को
(1:02:45) बांधे रखती है। सेंटर में बोन होती है स्टर्नम बोन। इस स्टर्नम बोन के पीछे एक ऑर्गन है हमारा पार्ट है बॉडी का। उसको हम बोलते हैं थाइमस। थाइमस क्या कर रहा है? हमारे पूरे शरीर में जितना भी एंटीबॉडीज हैं, जो भी वाइट ब्लड सेल्स हैं, जो भी लिंफोसाइट्स हैं, वो इस थाइमस में मैच्योर होते हैं। मैच वो बनते हमारे बोन मैरो में हैं। लेकिन बोन मैरो में बनने के बाद हमारे बीटा सेल्स जो हैं और हमारे जो टी सेल्स हैं, जिनको हम टी लिंफोसाइट से अभी थोड़ी देर पहले बात कर रहे थे ना कोविड को जो मारा जो कैंसर को भी ईट अप करते हैं। जो हमारी बॉडी के हर वायरस हर बीमारी को
(1:03:17) ईट अप कर सकते हैं। वो यहां बनते हैं। जी। यहां मैच्योर होते हैं। फिर उसके बाद हमारा शरीर जब हम मोहब्बत फील कर रहे होते हैं तो हमारा थाइमस उसको हमारी पूरी बॉडी में डिस्ट्रीब्यूट करता है। हमारा थाइमस उसको डिस्ट्रीब्यूट करता है। कब? जब हम मोहब्बत फील कर रहे हैं। मतलब ये पानी की टंकी है। सब जगह पाइप लाइन से पाइप हमारी बॉडी में फ्लूइड होता है जिसको हम इंटरस्टीशियल फ्लूइड बोलते हैं। जो बाद में लिंफ नोड्स में जाके लिंफेटिक फ्लूइड बन जाता है। हमारा ब्लड होता है। उसमें भी हमारे पास बहुत से वाइट ब्लड सेल्स होते हैं। तो ये सारे वहां पर जाते कहां से
(1:03:47) हैं? इस थाइमस से। अब सबसे बड़ी विडंबना क्या है? हम यह तो मान लेते हैं कि सोचने से मुंह में सलाइवा रिलीज हो रहा है। सोचने से कॉर्टिजॉल, सोचने से एड्रिनलिन, सोचने से सेक्सुअल एक्टिविटी, सोचने से सारे पूरी बॉडी का सारा काम सोच ये हम मान लेते हैं कि सोचने से हो रहा है। लेकिन थाइमस ग्लैंड जो सोचने से केवल लव की फीलिंग से टी सेल्स को आपकी बॉडी में रिलीज कर सकता है। एंटीबॉडीज को ट्रेन कर सकता है। बीटा सेल्स को एंटीबॉडीज बनाने के लिए ट्रेन कर सकता है। वो आपके थाइमस से रिलीज हो रहा है। और वो कहां पे है? यहां ठीक? हृदय के पास। इसीलिए हमारे
(1:04:19) योगियों ने पूरे शरीर को बैलेंस करने के लिए शरीर में सात चक्र बताए। हर एक चक्र एक-एक ग्लैंड के पास है। एक-एक ग्लैंड के पास ये कोई मजाक नहीं है। ये कोई संयोग नहीं है। संयोग नहीं है। कि कैसे पीनियल और पिट्यूटरी ग्लैंड के पास मतलब हमारे यहां दो चक्र होते हैं जिसको हम क्राउन चक्र और थर्ड आई बोलते हैं। पीनियल और पिट्यूटरी। यहां थायरॉइड ग्लैंड हमारे विशुद्धि चक्र के पास। यहां थाइमस ग्लैंड हमारे हार्ट चक्र के पास ग्रीन कलर का। तो अगर हमारे हार्ट को बैलेंस किया जाए। इसको हम बोलते हैं हार्ट ब्रेन सिंक्रोनाइजेशन। पहले हार्ट और
(1:04:50) ब्रेन को सिंक्रोनाइज किया ब्रेथ वर्क से। कैसे करना है? घर बैठे-बैठे लोगों को बता देता हूं। ऐसा नहीं कि मेरे पास ही आना पड़ेगा। आपने अपनी सांसों को बैलेंस किया। सांसों को बैलेंस कैसे करना है? चार सेकंड्स का इन्हेल, चार सेकंड्स का एक्सेल या पांच सेकंड का इन्हेल, 5 सेकंड का एक्सेल। उसमें हम कुंभक लगाते हैं। अच्छा। ये सिर्फ इन्हेल, एक्सेल है। इसको हम बोलते हैं सिस्टेटिक ब्रीथिंग। ओके? सिस्टेटिक। पांच मतलब इन्हेल चार सेकंड का ना हो और एक्सेल 6 सेकंड का ना हो। सिस्टमैटिक हो। समान हो दोनों दोनों समान हो। इसके बहुत से वीडियोस आपको YouTube पे मिल जाते हैं।
(1:05:19) लगाओ और ब्रीथिंग शुरू कर दो। या फोन में आपने एक स्टॉप वॉच लगाया 5 सेकंड तक इन्हेल 5 सेकंड तक। आपने 15 20 बार किया उसके बाद आपको खुद ही आईडिया लग जाएगा और शरीर अपने आप ही जैसे बॉडी सेंड हो जाएगा। मेमोरी स्टोर कर लेगा और उसी हिसाब से वो करने लगेगा। वो देखे ना आपने ये 26 जनवरी 15 अगस्त पे हमारे जवान परेड करते हैं। आप देखो टांग का 1 इंच भी इधर से उधर नहीं होता। इनफैक्ट जवानों को तो छोड़ो जो राष्ट्रपति के घोड़े होते हैं उनकी टापें भी एक से उधर नहीं होती हैं। क्यों? क्योंकि उन्होंने पैरों के ऊपर इतने आपने देखा होगा कभी जब उनकी ट्रेनिंग होती है
(1:05:51) ना तो उनके पैरों पर इतनी बड़ी एक रस्सी बांध दी जाती है जिससे कि जब वो पैर खोलें तो उतना ही खुले टक टक वो उतना ही खुल रहा है तो वो बॉडी इतनी ट्रेन हो जाती है कि वो इतना सा भी इधर का उधर नहीं कर रही है ठीक वैसे ही जब आप सिस्टमैटिक ब्रीदीिंग थोड़ी देर करोगे उसके बाद आपका बॉडी ट्रेन हो जाएगा और आपको स्टॉप वॉच किसी वीडियो किसी क्लॉक की कोई भी जरूरत नहीं आपने सिस्टमैटिक ब्रीथिंग किया इसको हम बोलते हैं हार्ट ब्रेन कोरेंस आपका हार्ट और ब्रेन कोरेंट हुआ। हार्ट और ब्रेन कोरेंट करने के बाद अब आपको चाहिए लव की फीलिंग्स। किसकी? लव
(1:06:22) की। एक बुक है चित्रेश जी लव मेडिसिन मिरेकल। ओ हो हो क्या बात है। आप तो कमाल हो गए हो चित्रेश जी। उसका नाम है लव मेडिसिन मिरेकल। बर्नी सीगल की बुक है और बर्नी सीगल कोई फिलॉसफर नहीं है। ऐ कोई कहीं से उठ के बुक लिख दी। दुनिया के सबसे बड़े सर्जन्स में डॉक्टर्स में उनका नाम आता है डॉ.
(1:06:42) बर्नी सीगल का। डॉक्टर होने के बाद बर्नी सीगल ये बुक लिख रहे हैं कि लव इस दुनिया की सबसे बड़ी मेडिसिन है जो सबसे बड़ा मिरेकल कर सकती है। लव मेडिसिन मिरेकल उस पूरी बुक का सार यह है और आप अगर एक और बुक है अगर किसी को पढ़नी हो उसका नाम है यू कैन हील योर लाइफ बाय लुईस हे लुईस हे जिनको खुद को कैंसर हुआ वो हर एक बीमारी का ना कारण बता रही हैं इमोशनल लेवल पर अभी पीछे ना Instagram पर ऐसा ही कोई हमारा कोई पॉडकास्ट था उस पॉडकास्ट की एक रील अपलोड की गई थी और उस रील में मैं यह बात बोल रहा हूं कि योर बॉडी कीप्स द स्कोर और जैसे-जैसे आप इमोशन लेते हो वैसे-वैसे आपके पर्टिकुलर एक ऑर्गन पे
(1:07:17) इंपैक्ट पड़ जाता है। तो एक डॉक्टर उन डॉक्टर का कमेंट आया हुआ। डॉक्टर क्या कमेंट कर रहे हैं? वो कह रहे हैं देखो यह पागल क्या बात बता रहा है और इसकी ऑडियंस सुनने वाली भी इसकी बात मान रही है। अरे भैया तुम भी पढ़ लो थोड़ा सा थोड़ा सा ज्ञान कई बार हमारे लिए भी बहुत जरूरी हो जाता है। आज तो मेडिकल साइंस भी साइकोन्यूरोइमनोलॉजी के माध्यम से यह प्रूव कर रही है कि हमारी जितनी भी बॉडी की जो तंत्र है वो साइकी हमारे नर्वस सिस्टम से गवर्न कर रही है। साइकोन्यूरोमिनोलॉजी और एपिजेनेटिक्स इसको प्रूव करती है। खैर बहुत पढ़ाने रहे होंगे
(1:07:49) लेकिन आपको जरूरत है भैया पढ़ने की बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं मैं जानता हूं आज बच्चा-बच्चा इन चीजों को जानता है। तो हम अगर अपने यहां पर वो लव की फीलिंग लेकर के आए जो बर्नी ईगल बोल रहे हैं कि लव मिरेकल हो सकता है। जो लुईस है लुईस है पता है क्या बोल रही है बुक में कि जिस इंसान की आत्मा रोई है ना जिसके पास मोहब्बत नहीं है उस इंसान ने लाइफस्टाइल डिजीज डेवलप की है। आप नोट करना और सुनने वाला व्यक्ति भी नोट करेगा। श्रोता भी नोट करेगा कि हां मेरी जिंदगी में लव खत्म हो गया। मेरी जिंदगी में मोहब्बत नहीं बची और जब मोहब्बत नहीं बची तो ये टी सेल्स अरे भैया
(1:08:19) जब मुंह के ग्लैंड सोचने से केमिकल रिलीज कर रहे हैं तो ये क्यों नहीं कर सकता आपकी बॉडी का हर ग्लैंड सोचने से ऑपरेट कर रहा है मतलब ऑटोमेटिकली भी कर रहा है लेकिन सोचने से आप उसका गवर्निंग आप उसका कमांड ले सकते हो तो ये ग्लैंड क्यों नहीं करेगा ये कहां की हिपोक्रेसी है ये भी तो कर सकता है और ये क्या कर रहा है टी सेल्स बी सेल्स सारी एंटीबॉडीज सारे लिंफोसाइट्स सारे मेमोरी टी सेल्स सारे किलर सेल्स एन के सेल्स नेचुरल किलर सेल्स जिनको बोलते हैं जो बॉडी में किसी भी चीज को ईट अप कर सकते हैं। आपका इम्यून को हीट अप हां आपका आईजीए आपके इम्यूनिटी के दो
(1:08:51) इम्यूनिटी होती है। एक हमारी प्राइमरी इम्यूनिटी होती है। एक सेकेंडरी होती है। प्राइमरी इम्यूनिटी का सबसे बड़ा मार्कर आईजीए इम्यूनोग्लोबुलिन ए आईएल सिक्स ये सब मार्कर्स कहां से बन रहे हैं? आपके थाइमस ग्लैंड में मैच्योर हो रहे हैं। टी सेल्स बीटा सेल्स जो एंटीबॉडीज को बनाने का आदेश देते हैं कि जाओ इसको ईट अप करो। आपके बॉडी में जो गांठे हैं, ट्यूमर कुछ भी बन रहा है। मैं ये नहीं मैं दावा नहीं कर रहा हूं कि मैं उसको ठीक करता हूं। मैं कह रहा हूं आपका थाइमस करता है क्योंकि आज अगर मुझे आपको कोई ट्यूमर या कैंसर नहीं है तो शरीर के अंदर ही कोई
(1:09:20) तंत्र तो है जो काम कर रहा है रोज उसको ठीक करने पे तो उस तंत्र को हमने गड़बड़ कर दिया और तंत्र को गड़बड़ कैसे किया इसको मोहब्बत ना फील करके लव ना फील काम में भी स्ट्रेस मतलब काम में भी मोहब्बत नहीं है घर जाते हुए स्ट्रेस है ट्रैफिक में स्ट्रेस है हर जगह स्ट्रेस है तो मैं कहता हूं अगर यह मोहब्बत के कुछ विचार कुछ फीलिंग्स कुछ इमोशंस आप कहोगे मेरी जिंदगी जिंदगी में मोहब्बत लायक कुछ है ही नहीं। मेरे पास आ जाओ। मैं मोहब्बत डालता हूं आपके अंदर क्योंकि मुझे पता है कि कैसे वो फीलिंग्स वो इमोशंस आपके पास हैं। पास्ट के हैं लेकिन आप उनको याद नहीं कर रहे हो।
(1:09:53) आप पास्ट की सिर्फ पेनफुल मेमोरीज को याद कर रहे हो। हम जो चीजें चित्रेश जी रिजॉल्व हो गई ना जो अच्छी थी उनको हम पकड़ के नहीं बैठते। नहीं बैठते। जो चीज अनरिजॉल्वड है ना उसको हम पकड़ के बैठते हैं। राइट? आपने ₹50 लाख की एक गाड़ी ली। 10 दिन के बाद गाड़ी खुशी नहीं देगी। मतलब अब वो नॉर्मल लगने लॉ ऑफ़ अडॉप्टेबिलिटी अडॉप्ट कर लेगी। लेकिन स्क्रैच लगा था 10 दिन पहले। 10 दिन के बाद भी आप उस पर चिंता करोगे एक स्क्रैच पे। ₹100 का स्क्रैच नहीं है। वो एक कौड़ी का स्क्रैच नहीं है। 50 लाख की गाड़ी की कोई खुशी नहीं है। लेकिन ₹100 के स्क्रैच
(1:10:23) की चिंता है। ठीक वैसे ही हमारे पास्ट में हमारे पास बहुत सारी ऐसी ब्यूटीफुल मेमोरीज रखी हैं जिनको हम याद नहीं कर रहे। मैं सिर्फ वो याद दिलाने का काम करता हूं। और मुझे कैसे पता? मुझे तो पता ही नहीं। आपको पता है। मैं तो सिर्फ उस थीटा के मोड में आपको लेकर के जाता हूं। उस अल्फा की स्टेट में लेकर के जाता हूं जहां ब्रेन जब शांत होता है और शांति के बाद वो सब चीजें हमको जिंदगी में मिलने लगती हैं। हम उनको एक्सेस करने लगते हैं। तो इसको हम बोलते हैं थाइमस हीलिंग। और कई ऐसे लोग आते हैं जो उन लव की फीलिंग्स को जनरेट करते हैं। हार्ट ब्रेन को कोहरेंट करते
(1:10:52) हैं। सांसों को सामान्य करते हैं। फिर प्राणवायु के थ्रू अच्छी फीलिंग्स अपने मन में एस्टैब्लिश करते हैं और उन पास्ट की ब्यूटीफुल मेमोरीज को देखते हैं। लोग ऐसा आनंद में झूमते हैं। वो कहते हैं कि जिंदगी में ऐसे लग रहा है कि मैंने जो नो दसेल्फ में लोग आते हैं वो बोलते हैं कि सर ये छह दिन मेरी पूरी जिंदगी एक तरफ और ये छह दिन एक तरफ। मैंने ऐसा जीवन जिया है और ना सिर्फ वो छह दिन बल्कि वो बोलते हैं सर यहां से जाने के बाद ऐसा लग रहा है कि अब मैं जिंदगी को काट रहा था। अब मैं जिंदगी को जीऊंगा। मुझे जीने का तरीका मिल गया। मुझे अपने आप को जानने के बाद पैटर्न
(1:11:21) मिल गया कि जिंदगी जीनी कैसे है। अरे थोड़ा सा समय है। हम भी कीड़े मकोड़ों की तरह कुछ समय के लिए यहां पर आए हैं। जिंदगी को धक्का देने के लिए नहीं आए। इंसान बनाया जिंदगी जीने के लिए और हमारे मन ने पास्ट की कुछ पेनफुल मेमोरीज ने जो मेरे पास भी जीवन में आई और मैं भी उनसे परेशान था। मैं भी सुसाइडल हो रहा था। मेरे को भी बीमारियां हो रही थी। लेकिन फिर पता चला कि हमारे शरीर के पास ऐसा तंत्र मौजूद है। जित्रेश जी जो हमारे ऋषि मुनि हमारे योगी हजारों साल पहले हमको बता करके गए। उस तंत्र को अगर सही तरीके से सुचारू रूप से चलाया जाए। तंत्र की कुछ
(1:11:50) प्रक्रियाएं, हठ योग की कुछ प्रक्रियाएं, सांसों की कुछ प्रक्रियाएं, प्राणों की कुछ प्रक्रियाएं और मन को चेंज करने की, चित्त को बदलने की कुछ विजुअलाइजेशंस अगर इन सबका एक कॉम्बिनेशन इंसान को मिले जो लगातार पिछले 2 साल से, ढाई साल से, 3 साल से इवन मैं कहूंगा कि मैं अपने YouTube चैनल पर लोगों को घर बैठे-बैठे देने का प्रयास कर रहा हूं। लोग इसको कई तो हमारी विजुअलाइजेशंस हैं। जितनेश जी YouTube चैनल पर बिल्कुल फ्री अपलोड की हुई है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] कभी उनकी जाकर के टेस्टिमनी पढ़ो। उनके जाकर के कमेंट्स पढ़ो। लोग बोल रहे हैं जी मैंने
(1:12:17) ये ठीक किया। अरे मेरी विजुअलाइजेशन मैं कभी भी दावा नहीं करता हूं कि मैं कुछ ठीक कर रहा हूं। क्योंकि आपके अंदर है ठीक करने वाला। मैं कौन होता हूं? मेरी औकात क्या है किसी को ठीक करने की? उनके अंदर वो प्रक्रियाएं बैठी हुई है। लेकिन वो सही तरीके से करो तो सब चीज बैलेंस हो जाती है। ये ठीक उस रूबिक्स क्यूब क्या बोलते हैं उसको? उसको रूबिक्स क्यू भी बोलते हैं। उसकी तरह है जो बिल्कुल गड़बड़ाया हुआ है। लेकिन हमें उसको ठीक करना नहीं आता तो हम जिंदगी में परेशान है और कितना ही जिंदगी को तोड़ मरोड़ के घुमाए जा रहे हैं। लेकिन फिर भी हर कलर बैलेंस नहीं हो
(1:12:45) रहा। लेकिन वहीं अगर उसको ठीक करने का तरीका, उसकी प्रैक्टिस, उसका विज्ञान समझ लें और उसकी लगातार प्रैक्टिस करें कुछ समय तक तो हम भी अपनी जिंदगी को उस रूबिक्स क्यूब की तरह यूं कुछ महीनों में सुलझा सकते हैं और जिंदगी को बड़ा खूबसूरत और खुशनुमा बना सकते हैं और थाइमस हीलिंग उसका एक छोटा सा प्रकार है जो लोग करते हैं और आनंदित होते हैं। सर आप जब ये सारी बातें बोल रहे थे तो मुझे एक इंसिडेंट याद आया हमारे नो एसएल वर्कशॉप का ही। डॉक्टर मुकेश बोरा जी जो खुद एक मेडिकल प्रैक्टिशनर हैं और पिछले 25 साल से प्रैक्टिस कर रहे हैं। उन्होंने पार्किंस
(1:13:14) और पैरालिसिस पे एक बात बोली कि मेडिकल साइंस बोलता है कि एक बार जिसको ये हो गया वो ठीक नहीं हो सकता। पर उन छ दिनों में किसी ने आके ऐसा एक्सपीरियंस किया और उसने अपने उन्हीं छ दिनों में वो चीज ठीक कर ली। तो वो इंसिडेंट थोड़ा विस्तार से बताएंगे तो बहुत सारे वो लोग जिनको पार्किंस है या जो पैरालिसिस से तकलीफ में है उनके जीवन में कुछ उससे फायदा हो सके। बहुत अच्छी बात है चित्रेश जी और आप देखो कि ऐसा एक नहीं हमारे पास तो ऐसे सैकड़ों हजारों लोग हैं जो अपने इन चीजों को ठीक करते हैं लेकिन वो लोग कर पाते हैं जो पूर्ण रूप से सरेंडर के भाव से आते हैं
(1:13:45) पूर्ण बिलीफ के साथ आते हैं उनका प्लेसीबो भी एक्टिवेटेड होता है और साथ में वो जो प्रक्रियाएं तंत्र की हम उनको बताते हैं वो सारी प्रक्रियाएं करते हैं। वो खुद एक डॉक्टर हैं डॉक्टर मुकेश बोरा। तो उन्होंने कहा कि मैं जिंदगी में कभी ऐसा कोई केस नहीं देखा और खासतौर पर पार्किंस अल्जाइमर, डिमेंशिया या फिर पैरालिसिस या कोई भी न्यूरो डिजनरेटिव डिजीज है जिसमें न्यूरॉन्स डीजेनरेट होने लग गए हैं। मेडिकल साइंस बोलता है कि उनको रिकवर नहीं किया जा सकता। लेकिन मेडिकल साइंस से भी बड़ा हमारा विश्वास तो महादेव पे है। और जब विज्ञान भैरव तंत्र में भैरव भैरवी
(1:14:13) संवाद होता है और भैरवी भैरव से पूछती है कि महादेव किम बलम सत्वबलम दुनिया का सबसे बड़ा बल क्या है? तो महादेव बोलते हैं कुंभक बलम सर्वबलम। अगर अपनी सांसों को रोकने का एक विज्ञान समझ आ जाए। हमारी जब हम सांसे लेते हैं तो हमारी प्राण ऊर्जा ऊपर की तरफ बढ़ती है। प्राण वायु हम लेते हैं। जब हम सांसे छोड़ते हैं तो अपान वायु नीचे की तरफ जाती। अपान नीचे की वायु है। हमारी नाभि से नीचे हमारे गुदा द्वार तक अपान वायु जाती है और ऊपर प्राण वायु का प्रवाह होता है। ये प्राण और अपान के बीच में समान वायु जो हमारी नाभि में गोल-गोल
(1:14:45) करके सर्कुलेट करती है। इसके बीच में एक केंद्र होता है। जिस केंद्र को कुंभ बोला जाता है। कुंभ मतलब घड़े जैसा एक केंद्र छोटा सा घड़ा। कुंभ का मतलब होता है घड़ा। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो जब हमारी प्राण वायु को हम इन्हेल करें, हमारी सांसों को इन्हेल करें और जो अपान वायु जो नीचे के एरिया में प्रवाहित होने वाली है, इन दोनों वायु के बीच में जो गैप है कुंभ जब इसको सही से लेने के बाद वायु को उस कुंभ में रोक दिया जाए। इसको बोलते हैं कुंभक। अंतः कुंभक साध लिया जाए। साध लिया जाए। अगर यह अंतः कुंभक लगाया जाए। अंतः कुंभक में जो प्राण जो ब्रह्म
(1:15:19) जो ऊर्जा पूरी सृष्टि को चला रही है जो वायु आपको जीवन दे रही है अगर उसी प्राणदायनी वायु को ऊर्जा को आपके शरीर में रोका जाए जिसको और ये दो प्रकार के कुंभक हैं अंतः कुंभक और बाह्य कुंभक और आज मेडिकल साइंस पर भी इसकी सैकड़ों हजारों रिसर्चेस अवेलेबल हैं चित्रेश जी और इसको बोला जाता है इंटरमिटेंट हाइपोक्सिया हाइपोक्सिया का मतलब है जहां पर ऑक्सीजन हमारे शरीर में कम होने लगती है इंटरमिटेंट यानी कुछ एक समय के लिए तो इंटरमिटेंट हाइपोक्सिया ही कुंभक है कुंभक जब लगाया जाए तो हमारे शरीर में इसलिए महादेव बोल रहे हैं कुंभक बलम सर्वबलम
(1:15:51) कुंभक से बड़ा बल कोई नहीं है और अगर एक सही मार्गदर्शक एक सही गुरु एक सही व्यक्ति जिसको यह पता हो मतलब जो सिर्फ योग को एक्सरसाइज ना समझ करके जो तंत्र के और हठ योग के प्रयोगों को जानता हो और खुद पढ़ा हो ना सिर्फ पढ़ा हो अपने जीवन में उतारा हो ऐसा व्यक्ति अगर किसी को ये प्रक्रियाएं सिखाए करवा इसीलिए हम पार्टिसिपेंट्स को ये सिखाते हैं। यहां पे बताना इसलिए पॉसिबल नहीं है क्योंकि लेस नॉलेज इज़ डेंजरस। लोग उसको जब तक सही से मैं उनको करते हुए नहीं देखता हूं तब तक वह प्रक्रिया नहीं। तो वह कुंभक अगर मैं नहीं मतलब ये कोई भी
(1:16:21) अच्छा व्यक्ति जिससे भी आप सीख सको आपको कुंभक का अभ्यास सीखना चाहिए। पहले वो जो जिन लेडी की वो बात कर रहे थे डॉक्टर मुकेश बोरा उनको पैरालिसिस भी था। उनको पार्किंस भी था और अल्जाइमर भी था। और न्यूरो डीजनरेटिव डिजीज एक बार न्यूरॉन्स एक बार माइंड से वो डीजनरेट होना शुरू हो गया। सिस्टम तो ठीक नहीं होता। लेकिन उन्होंने वहां पर ये थाइमस हीलिंग जिसकी अभी हमने बात की थाइमस हीलिंग किया उसके साथ-साथ उन्होंने ब्रेथ वर्क किया और ब्रेथ वर्क में एक ध्यान आता है जिसको हम बोलते हैं बहुत ही ब्यूटीफुल ध्यान नाद ब्रह्म ध्यान ये हमारे शास्त्रों का बहुत
(1:16:50) पुराना ध्यान है बहुत पुराना हमारे पास एक उपनिषद है जिसका नाम है नाद बिंदु उपनिषद मतलब लोग नाद ब्रह्म ध्यान को ओशो के माध्यम से जानते हैं आचार्य रजनीश के माध्यम से और मैंने पहली बार नाद ब्रह्म ध्यान को आचार्य रजनीश के मुंह से ही सुना लेकिन क्योंकि ग्रंथों को पढ़ने की बड़ी पुरानी आदत थी तो नाद बिंदु उपनिषद से नाद ध्वनि नाद योग का पता चला। उससे पता चला कि ये नाद का जो ध्यान है यह हमारे हजारों साल पहले प्राचीन ऋषि मुनि इसको यू नो हमको देकर के गए। तो वो नाद [गला साफ़ करने की आवाज़] ब्रह्म ध्यान में हम एक प्रकार का भ्रामरी जैसा उच्चारण
(1:17:24) करते हैं जिससे हमारे पूरे शरीर के अंदर एक वाइब्रेशन पैदा होती है और उस वाइब्रेशन में हम मुद्राएं लगाते हैं जिसमें नभो मुद्रा और खेचड़ी मुद्रा बहुत इंपॉर्टेंट होती है। तो वो उस लेडी ने वो नाद ब्रह्म ध्यान कथासिस करके अपने इमोशंस को निकाला। थाइमस से अपने थाइमस ग्लैंड को बैलेंस किया और उसके साथ कुंभक का प्रयास शुरू किया। तो मेरे ख्याल वो जब हमारे पास आई थी वो ठीक से चल नहीं पा रही थी। व्हीलचेयर पे व्हीलचेयर पे थी और चल और लोग उनको सहारा देकर के वह कर रहे हैं और एक दिन वह चौथा या पांचवा दिन था हमारे रिट्रीट का और वो खड़ी होकर के तांडव कर
(1:17:52) रही हैं। वो नाच रही एक पैर पे नाच रही हैं। नाच रही थी और उनके हस्बैंड को हमने कॉल किया और ऐसा एक नहीं हमारे पास ऐसे बहुत लोग हैं। लेकिन कौन लोग हैं जो वो प्रक्रियाएं बताई जा रही हैं उन प्रक्रियाओं में आत्मसात अपने आप को कर लेते हैं। वो उस प्रक्रिया को जीवन बना लेते हैं। वो आउटकम्स है कि इससे मैं ठीक होऊंगा सर नहीं होऊंगा। ऐसा नहीं। वो लेडी जब पहले दिन उन्होंने चल नहीं पा रही थी। वो अंदर एंटर हुई वो बोली सर यहां पे आके मैं ठीक हो जाऊंगी। मतलब उसमें मेरा वह किसी और के पास भी जाती तो भी हो जाती। इतना भयंकर बिलीफ, इतनी विल
(1:18:19) पावर, इतना ज्यादा और वह बोली सर मैं यहां ठीक होने वैसे आई भी नहीं हूं। मैं तो जो प्रोसेस आप करवाने वाले हो उसका आनंद लेने वाली हूं और उस प्रोसेस में मुझे पता आनंद लेते लेते मेरे शरीर की सारी दिक्कतें चली जाए। चौथे पांचवे दिन और वो लेडी ने पैरालंपिक में ब्रोंज़ मेडल लिया जी। और वो मुझे बोल के गई कि सर अगली बार मैं गोल्ड लेके आउंगी जब मैं पैरालंपिक में जाऊंगी तो। तो आप देखो कि इतनी ऐज में जिसको हम बोल देते हैं कि अब ये ऐसे आपकी 55 60 के आसपास 60 से ऊपर थी वो 60 ऊपर होंगी 60 के 60 से ऊपर होगी मतलब 60 के आसपास होंगी इस ऐज में भी जब लोग ये सोच रहे हैं
(1:18:49) कि यार अब तो मेरे शरीर में कोई जान नहीं बची तो तंत्र के पास ऐसी ऐसी साधनाएं हैं ऐसी ऐसी चीजें हैं अगर उनका सही तरीके से प्रयोग किया जाए तो डॉक्टर्स भी हैरान होते हैं और इस बार तो आप देखोगे लोनावाला में जो रिट्रीट था हमारे पास सात डॉक्टर्स थे अपनेपने क्षेत्र के दिग्गज सात डॉक्टर्स थे हमारे पास और वो वो जब लास्ट डे जब यहां से जाते हैं जो मोहाली से एक डॉक्टर आए बलविंदर जी हां वो बलविंदर कौर बलविंदर कौर हमारे तो ऐसे कितने डॉक्टर्स हमारे पास आते हैं और जब वो पहले दिन आते हैं तो वो सोचते हैं कि हां एक प्रोसेस होगा बड़ा अच्छा हम भी इसको एंजॉय करेंगे
(1:19:20) लेकिन छठे दिन जाते हुए वो ये खुद स्वीकार करके जाते हैं कि सर ये जो ये जो हो रहा है ना यहां पे ये जो रच दिया यहां पे इन सब लोगों के साथ मिलकर के ये प्रक्रिया जीवन में वाकई बदल सकती है। खुद डॉक्टर्स के शब्द होते हैं। तो ठीक वैसे ही डॉक्टर मुकेश बोरा भी हैरान थे कि ये हो कैसे सकता है और आज मेडिकल साइंस भी हैरान होगी। लेकिन अगर हम ये करना चाहें तो हम ये नहीं कर पाएंगे। गुरुणी में एक बड़ी खूबसूरत बात बोली गई है। थाप्या ना जाए की ना होए आपो आप निरंजन सोए। थापने से नहीं होगा। करने से नहीं होगा। अपने आप स्वत ही यह घटना अपने अंदर घटित होती है। वह तब
(1:19:52) होती है जब आपका पूरा शरीर सरेंडर है। स्वतंत्र भाव में है। आनंद के भाव में है। रिलैक्स है। और आप किसी जल्दबाजी में, किसी डर में, किसी चिंता में, किसी तनाव में नहीं बल्कि आनंदित होके उन प्रक्रियाओं को पैरासिंैथेटिक और सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम के वही बात हो गई यहां पे भी। कितनी दवाई खाते रहो चित्रश जी? अगर बॉडी सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम में बनी हुई है तो दवाई भी उतना फायदा नहीं देती है जितना उसको देना चाहिए। हम् और दवाई बंद होने के बाद कहीं ना कहीं दोबारा से वह विकार हमारे शरीर में आ जाते हैं। लेकिन आप दवाई कम खा रहे हो लेकिन
(1:20:20) आपने अपने शरीर को अंदर से वह हीलिंग दे रहे हो। अपने शरीर को अंदर से वह मोड दे रहे हो शांति का, रिलैक्सेशन का, पीस का तो शरीर नेचुरली वो प्रक्रियाएं जानता है कि उसको शरीर को बैलेंस कैसे करना है। बचपन से बैलेंस करता आया है जब तक वो आज तक यहां। तो ऐसा एक नहीं, दो नहीं, न्यूरो डिजनरेटिव डिजीज नहीं, हार्ट नहीं, लिवर नहीं, ब्रेन नहीं, ट्यूमर्स नहीं। कई चीजों पर लोगों ने आज मेरे पास नहीं पिछले हजारों सालों का आप इतिहास उठा करके देखो। आप एक बुक है कैली टर्नर की कैली न्यून की एक बुक है जिसमें उन्होंने 1500 कैंसर पेशेंट्स पे रिसर्च किए। उस 1500 लोगों पे
(1:20:54) उन्होंने रिसर्च करके नौ पॉइंट्स निकाले और नौ पॉइंट्स में सबसेेंट पॉइंट जानते हैं क्या है? उन्होंने सबसे पहला पॉइंट देखा कि लोग जो है खुश रह रहे थे। हैप्पी रह रहे थे। दूसरा पॉइंट उन्होंने देखा कि वो सब लोग अपने बेटर फ्यूचर को विजुअलाइज कर रहे थे। नेगेटिव को नहीं बेटर फ्यूचर को विजुअलाइज कर रहे थे। तीसरा पॉइंट उन्होंने देखा कि वह सब लोगों का पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम एक्टिवेटेड था। उन्होंने अपने सांसों को ऐसा गहरा लेना शुरू कर दिया था कि उनका नाभि केंद्र से नीचे का सिस्टम एक्टिवेट होने लगा। कितना स्ट्रेस हो, कितना डिप्रेशन हो। और
(1:21:24) एक चीज मैं यहां पे बोलूं। चित्रेश जी किसी इंसान को दिन में कुछ करने का समय नहीं मिलता। योग नहीं करता, प्राणायाम नहीं करता, एक्सरसाइज नहीं करता, विजुअलाइजेशन नहीं करता, कुछ करने का समय कुछ नहीं है। मैं कहता हूं अगर दिन में उसके पास कोई 5 मिनट का भी समय नहीं है तो भी वो अगर 2 मिनट के लिए भ्रामरी कर ले। भ्रामरी मुझे नहीं पता इससे पावरफुल कोई चीज मैंने देखी हो और अगर इसको तंत्र और प्राण के साथ मिलाकर के जो हम नो दसेल्फ में करते हैं किया जाए जिसका पूरा एक प्रक्रिया वो तो अद्भुत लेकिन कुछ नहीं कर सकते हो भैया। कुछ नहीं तो 2 मिनट भ्रामरी का
(1:22:00) प्राणायाम जरूर कीजिए। यह आपके शरीर में आपके नेजल पैसेजेस में 1400% नाइट्रिक ऑक्साइड बढ़ा देता है। 1400 टाइम्स आपने वीडियो भी बनाया एक नाइट्रिक पूरा नाइट्रिक 1400 टाइम्स नाइट्रिक ऑक्साइड बढ़ा देता है। और नाइट्रिक ऑक्साइड एक वेसो डायलेटर है। आपके हार्ट को आपकी वेंस को डलेट करता है। आपके ब्लड फ्लो को मेंटेन करता है। आपके शरीर में आपके ब्लड में आपके इंटस्टीशियल फ्लूइड में जो कचरा जमा हो रखा है जो फिर आपके लिंफ नोड्स क्लियर करते हैं। लिंफेटिक फ्लूइड के माध्यम से उस लिंफेटिक ड्रेनेज को प्रॉपर्ली करने लगता है। जिससे बॉडी का
(1:22:33) सारा नेगेटिव फ्लूइड जो है वो लिंफेटिक फ्लूइड से इंटरस्टीशियल फ्लूइड लिंफेटिक फ्लूइड बन के निकलने लगता है। इतनी पावरफुल चीज और हम इसको सिंपल एक प्राणायाम समझ के आज लोग भ्रामरी कर रहे हैं लेकिन भ्रामरी उनके लिए मैकेनिकल मैकेनिकल हो गया। मैकेनिकल हो गया है। भ्रामरी करने का सही तरीका क्या है कि आप भ्रामरी कर रहे हो। जो आप हमिंग कर रहे हो जब आप गुंजार कर रहे हो और आपने अपने पूरे यह पता है यह बंद करने का यह उंगलियों का भी एक विज्ञान है। यहां से जब आप यह उंगलियां यहां पर रखते हो तो इससे यहां से आपकी इड़ा नाड़ी प्रवाहित हो रही है। यहां
(1:23:02) से पिंगला प्रवाहित हो रही है। ये दोनों का केंद्र है आपकी आंखों के मध्य में यहां पर। आप यहां पर अपनी उंगलियां रखते हो तो आप इड़ा और पिंगला को बाधित करते हो और फिर आप जो वाइब्रेशन करते हो वो वाइब्रेशन आपकी सुषुमना के थ्रू आपके पूरे शरीर में प्रवाहित होती है। मतलब [नाक से की जाने वाली आवाज़] ये एक-एक उंगली रखने का एक-एक जगह का ये भी विज्ञान है और वो अगर 2 मिनट के लिए भी अगर आप भ्राहमरी करते हो मैं कहता हूं कुछ नहीं कर मैं ये नहीं बोल रहा हूं ये सबसे बढ़िया है। लेकिन मैं बोल रहा हूं अगर आप कुछ नहीं करते हो दिन में दो मिनट भी आप
(1:23:29) भ्रामरी करोगे आप अपने शरीर में जो वाइब्रेशन होता है और उसको करने का सही तरीका ये है कि आप भ्रामरी को करते हुए आप यह भाव पैदा करो कि जब आप गहरी सांस लेते हो तो आपने प्राण ऊर्जा को अपने नाभि के नीचे के केंद्र में इकट्ठा किया और जब आप हमिंग करते हुए गुंजार करते हुए जब वो आप सांस छोड़ते हो हम करके ऐसा सांस छोड़ते हो तो वो प्राण ऊर्जा आपके पूरे शरीर में सर्कुलेट हुई भाव ही भगवान है। यद भावम तदभवती तद्भवती जैसा भाव करोगे वैसा लोगों के लिए आज प्राणायाम मैकेनिकल एक्सरसाइज बन चुका है। नॉट फॉर्मेलिटी में कर रहे हैं कि बस
(1:24:09) पांच मिनट ये करना है तो करना है। लेकिन अगर उसके पीछे भाव नहीं है। अगर भाव हो तो मैं कहता हूं यह 100 गुना चमत्कारी है। भ्रामरी प्राणायाम केवल एक गुंजार कीजिए। भाव कीजिए कि जो आपने सांस भरी है इसने आपके पूरे शरीर में प्राण वायु को भर दिया। आनंदित कर दिया। चेहरे पर मुस्कान ले आए और फिर जब आपने गुंजार किया तो देखिए कि कैसे बॉडी के एक-एक ऑर्गन में ये प्राणवायु प्रवाहित हो रही है। चमत्कार अमेजिंग और जो लोग करेंगे मुझे बताएंगे भी कि ये करने के बाद मुझे जीवन में क्या परिवर्तन आया। बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया सर। सर वैसे तो ये जो कन्वर्सेशन है ये
(1:24:40) खत्म होने का नाम ही नहीं लेगा क्योंकि हर बार कुछ नए कुछ नए कुछ नए क्वेश्चंस आ जाते हैं। पर कुछ ऐसे क्वेश्चंस हैं जो लोगों ने हमारे कमेंट बॉक्स में बहुत सारे पूछे हैं। वो चार-चार क्वेश्चंस मैं आपसे बस और पूछना चाहूंगा। सर आप कई पॉडकास्ट में स्टेट बदलने की बात करते हैं। तो स्टेट बदलना वास्तव में क्या होता है और जब वास्तविक परिस्थिति वैसी ना हो तो उस भाव को कैसे लाएं और बहुत प्रयास करने के बाद भी यदि वो फीलिंग नहीं आती है और बार-बार हम उसी स्थिति में फंसे होते हैं तो इससे बाहर कैसे निकलें? इसका क्या समाधान है? वाह भाई वाह चिद्री जी एक क्वेश्चन में
(1:25:12) पांच क्वेश्चन ये तो [हंसी] बहुत ही बढ़िया सवाल है। तो मैं इसको एक-एक करके सॉल्व करने की कोशिश करता हूं। सबसे पहले स्टेट क्या है? मैं उसकी बात करता हूं। तो हमारा जो शरीर है यह दो अलग-अलग स्टेट्स में दो अलग-अलग मोड में रहता है। जिसकी हमने थोड़ी देर पहले अभी बात की कि एक है सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम और एक है पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम। ये साइंटिफिक टर्म हो गई। लेकिन अगर हम इसको आम बोलचाल की भाषा में समझें तो एक है फाइट एंड फ्लाइट और एक है रेस्ट एंड डाइजेस्ट। अगर हम इसको हीलिंग की मोटलिटी की भाषा में समझें तो एक है डिजीज मोड और
(1:25:39) एक है हीलिंग मोड। यानी जो पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम है जहां पर हमारी सांसे गहरी चल रही होती हैं। हमारी हार्ट रेट रिलैक्स्ड होती है। हमें पप्पेशन नहीं हो रही होती। हमारी ब्रेन वेव्स जो हैं वो हाई बीटा से लो बीटा या अल्फा में होती हैं। यह मोड है जहां हमारा शरीर हील करने का काम करता है। हमारा शरीर रिपेयर करने का काम करता है। तो हमारे नर्वस सिस्टम के जो दो केंद्र हैं हमारा पूरा शरीर दिन भर में इनमें से किसी एक केंद्र में रहता है। तो अगर हमारा पूरा शरीर कुछ भी फिजिकल एक्टिविटी करते हुए सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम में है तो यह 100% ठीक चीज है।
(1:26:10) लेकिन अगर कोई फिजिकल एक्टिविटी नहीं हो रही और हमारा शरीर सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम में है। यानी मेरी सांसे तेज चल रही हैं। मेरी हार्ट रेट बढ़ी हुई है। मेरे को स्ट्रेसफुल थॉट्स आ रहे हैं। यह सिग्नल कुछ लोग पूछेंगे मुझे कैसे पता चले सांसे तेज चल रही है या? इसका सिम्प्टम है कि आपको आपके पास स्ट्रेसफुल थॉट्स आ रहे हैं। आप चिंता में हो। आप खुश नहीं हो रहे हो। लोगों के फेस के जो स्माइली हैं वो ऐसे होने की बजाय ऐसे हो रखे हैं। मतलब खुश होने का आप भूल ही गए हो वो जिंदगी में कभी। तो ये जो स्टेट है इसका मतलब है कि हमारी बॉडी इस समय फाइट एंड फ्लाइट मोड
(1:26:39) में है। सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम में। तो हमें अपने शरीर को जितना हो सके सिंपैथेटिक से पैरासिंैथेटिक में लेकर के जाना है। जितना हो सके का मतलब है जब हम बैठे हैं। जब हम कोई काम नहीं कर रहे हैं। जब हम काम कर रहे हैं तो ऑटोमेटिकली आपको पैरासिंैथेटिक में ले जाने सिंपैथेटिक में ले जाने की जरूरत नहीं है। आपका शरीर अपने आप अपनी हार्ट रेट बना लेगा। अपने आप सांसों को तेज कर लेगा। अपने आप ब्रेन को बीटा ब्रेन वेव्स में ले जाएगा। उसका काम है। लेकिन वो अपने आप इतना ट्रेन हो चुका है कि वो बैठे-बैठे भी अब चेयर पे फाइट एंड फ्लाइट मोड में है। तो हमको अपने शरीर
(1:27:07) को यह ट्रेन करना है कि हम जब रिलैक्स्ड हो, जब हम कोई फिजिकल एक्टिविटी नहीं कर रहे तो हमारा ब्रेन जो है वो पैरासिंैथेटिक मोड को, रेस्ट एंड डाइजेस्ट को, हीलिंग मोड को एक्टिवेट करे। अब हम अपने ब्रेन को डायरेक्टली कंट्रोल नहीं कर सकते क्योंकि इसको हमारा ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम कंट्रोल करता है। लेकिन हम एक चीज को कंट्रोल कर सकते हैं जो ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम जिसके थ्रू हमारे मोड्स को कंट्रोल करता है। स्टेट्स को कंट्रोल करता है और वो एक चीज है हमारी सांसे। चले वाते चले चित्तम निश्चले निश्चलम भवेत। तो हम अपनी वात को अपनी सांस को जो गहरा जब करते हैं
(1:27:40) जितनी ये छोटी है जितनी ये छोटी है ऊपर ऊपर है तो हमारा सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम है लेकिन अगर हम ये गहरी कर लें ये हमारी नाभि के नीचे जाने लगे मतलब जाएगी लंग्स में और डायफ्रेम्स में लेकिन अगर ये गहरी सांस हो जाए जिससे हमारा डायफ्रेम एक्सपेंड हो तो आज मुझे कई लोग मिलते हैं चित्रेश जी वो बोलते हैं सर कि सर मैंने आपका जितनी चीजें आपने बताई कभी कुछ फॉलो नहीं किया लेकिन ये चीज मुझे सबसे आसान लगी सांसों को गहरा करना करना। जब याद आ जाए दिन में गहरी सांसे लेने लग जाओ। जब याद कमर सीधी करो कमर सीधी मतलब ऐसा झुक के गहरी सांस नहीं लेनी। कमर सीधी करो।
(1:28:14) आपकी रीड की हड्डी सीधी हो और आप गहरी सांस नाभि में लेके गए आपने नाभि से छोड़ा। आप नाभि में लेके गए आपने नाभि से छोड़ा। अगर आप सिर्फ ये प्रक्रिया भी करो और दिन में जब आपको याद आ जाए, फिर धीरे-धीरे क्या होगा? मेमोरी बनने लगेगी। मसल मेमोरी ट्रेन होने लगेगी। सांसे ट्रेन होने लगेंगी। आपकी सांसे गहरी होने लगेंगे। जबजब आप सांस को गहरा करोगे थोड़ी देर के अंदर अगर आपने 4 से 5 मिनट भी यह किया ना आपका पैरासिंैथेटिक मोड आपका जब आपने सांस को गहरा किया ना तो आपका सिंपैथेटिक मोड पैरासिंैथेटिक मोड में शिफ्ट हो जाएगा। यानी आपकी बॉडी की जो
(1:28:45) स्टेट थी जो फाइट एंड फ्लाइट में थी नर्वस सिस्टम जो एक्टिवेटेड था वो नर्वस सिस्टम अब शांत हो गया। यह शांत नर्वस सिस्टम घर है आपकी हीलिंग का। यह दरवाजा खोलता है आपकी हीलिंग के लिए और ना सिर्फ हीलिंग के लिए बल्कि जिंदगी के हर क्षेत्र की हीलिंग के लिए रिलेशनशिप्स हील होते हैं। पैसे के प्रॉब्लम्स हील होते हैं। जिंदगी का हर एरिया सॉल्व होने लगता है जब आपकी बॉडी क्योंकि ये आपका बॉडी नहीं है। हम एक इवेंट करते हैं इंटेंशनल अलाइनमेंट उसका नाम होता है। उसमें हम ये सिखाते हैं कि दिस इज नॉट जस्ट अ बॉडी। दिस इज अ ट्रांसमिशन टावर।
(1:29:18) ये बॉडी के थ्रू आप इस यूनिवर्स को ट्रांसमिट कर रहे हो। अपनी ऊर्जा आप अपनी पूरी वाइबेशंस को इस यूनिवर्स को दे रहे हो और जब आपकी बॉडी पैरासिंैथेटिक मोड में हो, गहरी सांसे हो तो आपका ट्रांसमिशन टावर सुचारू रूप से काम करने लगता है। बिना बाधित हुए एनर्जी यूनिवर्स के साथ ब्यूटीफुल एक्सचेंज करने लगता है। तो आपकी बॉडी के दो मोड्स हैं सिंपैथेटिक और पैरासिंैथेटिक। हीलिंग का मोड है पैरासिंैथेटिक। यह एक्टिवेट डायरेक्टली करना पॉसिबल नहीं। इसको करने के लिए आप अपनी सांसों को गहरा कीजिए। लंबा कीजिए और सांसे जब आप गहरी करते हो तो
(1:29:50) पैरासिंैथेटिक मूड एक्टिवेट होने लग जाता है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] अब आते हैं आपके प्रश्न के दूसरे हिस्से पर कि जब हम ये सब कुछ करते भी हैं उसके बाद भी नेगेटिव विचार नहीं छोड़ते उसके बाद भी हमें कई चीजें नहीं वो करती हैं तो इसका सबसे अच्छा तरीका जान अगर आप ये जान गए लोग सुनने वाले जान गए तो ये अपनी जिंदगी में बदलाव ले आएंगे। हमें अपने शरीर को प्रभावित करने के लिए कॉन्शियस प्रैक्टिस से ज्यादा सबकॉन्शियस माइंड को इंपैक्ट करना जरूरी है। मतलब मैं कॉन्शियसली ये जान गया कि सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। लेकिन यह बात दो कौड़ी की है
(1:30:24) अगर यह मेरे सिर्फ कॉन्शियस माइंड ने जानी है तो। आपने बहुत से लोग देखे होंगे वीडियो पे वीडियो देखते हैं। वीडियो पे वीडियो देखते हैं। वीडियो पे वीडियो देखते हैं। जीवन में बदलाव नहीं आता। कई लोग मेरे पास आते हैं बोलते हैं सर एक वीडियो देखा था जीवन बदल गया। मैंने कहा कैसे? बोले सर आपने बोला था ना वो करना शुरू कर दिया। जैसे जी एस पाजी बोलते हैं कि मैंने अबंडेंस के ऊपर आपका वीडियो देखा और मेरे जीवन में जितना पैसा मैंने 40 साल में नहीं कमाया उतना मैंने 6 महीने में 6 महीने में कमा लिया। कैसे कमा लिया? क्योंकि वो जो चीज हमने सीखी जो हमने जाना
(1:30:50) उसको हमने इंप्लीमेंट किया। तो मैं यह बात बोलता हूं कि अगर कोई व्यक्ति अपने सबकॉन्शियस को प्रभावित करे। कॉन्शियस को नहीं। मतलब मैं किसी को बोलता रहूं कि यार चिंता मत करो तुम ठीक हो जाओगे। क्या तुम चिंता बंद कर दोगे? मैं कहूं यार तुम्हारे जीवन में जो बीमारी है चिंता मत करो ठीक हो। क्या इससे बीमारी की चिंता खत्म हो जाएगी? नहीं। चिंता कर कौन रहा है? चिंता तो आ रही है आपके मन से और मन क्या है? मन ही आपके सबकॉन्शियस माइंड का गेटवे है। मन ही उससे सारे कार्य कर रहा है। ये पंच इंद्रियां दी गई। पंच इंद्रियां जो भी कुछ
(1:31:20) प्रिसीव करती हैं, यह पंचेंद्रियां अपने आप में कोई वैल्यू ही नहीं रखती जब तक मन इसको इंटरप्रेट ना करे। अगर मन इंटरप्रेट नहीं कर रहा है तो योगी ऐसा बैठा रहता है सब देखता रहता है लेकिन सबसे विमुख रहता है सबसे दूर रहता है जब तक पंच इंद्रियों को मन वैलिडेट नहीं करेगा तब तक पंच इंद्रियां भी कोई काम की नहीं है तो मन जो है यह कह रहा है कि तुम यार तुम फिर से नेगेटिव थॉट तुम्हारे पास आ गया तुम्हारी जिंदगी में सब कुछ फिर से आ गया तो मन को काम मन को बदलना है कॉन्शियस माइंड को नहीं बदलना है ताकि जब आप यह प्रक्रिया कर रहे हो उसके बाद जब आप
(1:31:53) बोलते हो नेगेटिव थॉट आ गया वो मन से आया तो मन से अब वो नेगेटिव थॉट ना आए। तो इसलिए हम कुछ विजुअलाइजेशंस करते हैं क्योंकि विजुअलाइजेशंस आपके सबकॉन्शियस माइंड के ऊपर काम करती हैं। और सबकॉन्शियस की लैंग्वेज क्या है? दो लैंग्वेज हैं सबकॉन्शियस की। जैसे आप कौन सी दो लैंग्वेज बोल लेते हैं? आप इंग्लिश बोल लेते हैं। आप हिंदी बोल लेते हैं। मैं मान लो दो चार पांच लैंग्वेज बोल लेता हूं। ये लोकेश जी मान लो 16 लैंग्वेज बोल लेते हैं। तो ऐसा सबकॉन्शियस दो लैंग्वेज बोलता है जित्रेश जी। एक है विजुअल्स की लैंग्वेज और एक है इमोशंस की लैंग्वेज।
(1:32:22) मैं बिना विजुअल और बिना इमोशन के सिर्फ बोल रहा हूं कि यार मेरा तो मन जो है वो मैं तो यार फिर से मेरे को नेगेटिव विचार घेर तो इसका मतलब आपने अपने सबकॉन्शियस को सही लैंग्वेज नहीं दी या बहुत से लोग अफमेशंस कर रहे हैं चित्रे जी अफमेशंस बुरी नहीं है लेकिन अफमेशंस में अगर इमोशंस और विजुअल्स नहीं है तो अफमेशंस काम नहीं करेगा उतना अच्छा जितना होना चाहिए होना चाहिए फिर आपको अमेशन 70-80 साल करनी पड़ेगी बार-बार रिपीट करना पड़ेगा लेकिन कैशियस के लिए मोहम्मद अली जब आता है वो ना सिर्फ बोलता है बल्कि वो इमेजिन कर रहा होता है। जब माइकल फिलिप्स रात को भी बेड
(1:32:56) पे लेटे होते हैं तो वो इमेजिन कर रहे होते हैं और इमोशंस फील कर रहे होते हैं अपनी बॉडी में कि मैं वाकई रेस को जीत रहा हूं और सब लोगों को पीछे छोड़ रहा हूं। सो विजुअल एंड इमोशन इज द लैंग्वेज ऑफ योर सबकॉन्शियस माइंड। चिंता मत करो। दिन में पांच बार, 10 बार आपके पास विकार आए क्योंकि ये डिस्प्रिन की गोली नहीं है कि आपने यूं खाई और यूं काम हुआ। यह आपके क्रॉनिक बैठे हुए विचारों को शांत करने साल के हैं। 20 साल 50 साल 30-30 साल पुराने लोगों के विचार हैं। तो आप सोच रहे हो कि इसको यूं खत्म करेंगे। अरे नहीं आपको इसमें समय देना पड़ेगा। तो आप वो
(1:33:27) विजुलाइजेशन प्रैक्टिससेस कीजिए जो आपके सबकॉन्शियस से बात कर रही हो जो आपके विजुअल फॉर्म में और इमोशन फॉर्म में आपके सबस में जो मन है उस मन से आने वाली फीलिंग्स को बदल रही हो। तो अगर वो फीलिंग बदलेंगी तो धीरे-धीरे आप देखोगे आपने पहले दिन विजुअलाइजेशन किया। आज आप विजुअलाइजेशन करने के बाद आपको 99% नेगेटिव विचार आए कि यार ये तो मेरे शरीर में वाकई दर्द है या ठीक कैसे होगा या किसी ने मुझे परेशान कर दिया करंट में कोई सिचुएशन मेरे पास दूसरे दिन जब आप विजुअलाइजेशन करोगे आप देखोगे अब 98% विचार आए नेगेटिव तीसरे दिन 97 फिर 96
(1:34:00) समझाने के लिए नंबर दे रहा हूं ऐसा एग्जैक्टली नहीं है लेकिन धीरे-धीरे जब कोई व्यक्ति तीन महीने करता जाएगा करता जाएगा तो वो मन परिवर्तित होगा जहां से वो विचार आ रहे थे और कई पार्टिसिपेंट्स तो हमारे पास एक अभी रिसेंट कल ही आप बात कर रहे थे तो मुझे ध्यान है पार्टिसिपेंट है हमारी पूजा जोशी अरे भैया क्या तब्दीली है उस लड़की के अंदर क्या उसने जीवन बदला और आप जानते हो उसने जीवन कैसे बदला मेरी कोई प्रक्रिया या कोई उसने उसके लिए काम नहीं किया उसकी खुद की निरंतरता उसका खुद का अभ्यास जो रेगुलरली हमने उनको विजुअलाइजेशन दी वो
(1:34:31) उन्होंने रेगुलरली की और ऐसी कितनी विजुअलाइजेशंस मैंने अपने YouTube चैनल अब तो मैंने उसकी एक प्लेलिस्ट भी बनवा दी है। एक पूरी प्लेलिस्ट बनी हुई है जिसमें लोग प्लेलिस्ट में जाकर के जो चैलेंज उनको जिंदगी में है उससे रिलेटेड विजुलाइजेशन चूज़ कर सकते हैं। तो सबकॉन्शियस की लैंग्वेज है विजुअल और इमोशंस। अगर विजुअल्स और इमोशंस सही मिले तो सबकॉन्शियस रिप्रोग्राम करता है। आपके पास एक बैग रखा है। बैग में एक-एक रुपए के बहुत सारे सिक्के रखे हैं। कॉइंस रखे हैं। जब आप बैग में हाथ डालोगे और ऐसे मुट्ठी बंद करके निकालोगे तो क्या निकलेगा?
(1:35:01) कॉइंस निकलेंगे। अगर उसमें 50-50 हजार की बहुत सारी गड्डियां रखी हैं। आप उसमें ऐसा हाथ डालोगे और निकालोगे तो क्या निकलेगा? 50,000 की गड्डी निकलेगी। ठीक वैसे ही मन में हमारे पास वो विचार रखे हैं वो बाहर से नहीं आ रहे हैं। अरे किसी की औकात ही नहीं है कि आपको वो दुखी कर सके। किसी की औकात ही नहीं है कि आपको परेशान कर सके। जब तक हमारे मन की स्वीकृति नहीं मिलती है। मन की स्वीकृति मिलती है। हमारे पास वही वो बैग में सिक्के रखे होते हैं तो ही मन उसके साथ जुड़ता है। एक इंसान अंबानी को बोले कि चल बे गरीब। अंबानी उसको कितनी
(1:35:36) अटेंशन देगा। वो रखा ही नहीं है वो सबकॉन्शियस में। है ही नहीं वो। तो ठीक वैसे ही जब हम इमेजिन करते हैं इमेजिनेशन और विजुअलाइजेशन से हम उस सबकॉन्शियस को बदल देते हैं क्योंकि हमारा माइंड इमेजिनेशन और रियलिटी में फर्क नहीं करता क्योंकि ये मेरी बात सुनने के बाद कोई बोल सकता है कि भाई मैं तो वाकई गरीब हूं। मुझे कोई बोलेगा तो मैं तो वाकई ट्रिगर हो जाऊंगा। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो अगर आप अपने माइंड को ऐसा विजुअलाइज करवाओ अच्छी चीज जो उससे ऑोजिट कि आप जिंदगी में बहुत बढ़िया कर रहे हो। आपके पास जो है वो भी लाखों लोगों के पास नहीं है। आप जब ऐसा
(1:36:07) विजुलाइज करवाओगे तो अब जब आप उस थैले में हाथ डालोगे, बैग में हाथ डालोगे तो अबंडेंस ही निकलेगी, ब्यूटीफिकेशन ही निकलेगा। तो ठीक उसी तरह अगर हम वो विजुलाइजेशन प्रैक्टिस करें और ऐसा विजुलाइज करें और इमोशंस और फीलिंग्स हमारे साथ उसके साथ विद्यमान हो तो आप देखोगे आपका मन धीरे-धीरे बदलने लगेगा। और एक दिन ऐसा आएगा जब आप प्रैक्टिस करते-करते ऐसे मुकाम पर होगे कि कोई कुछ भी बोल रहा है। कोई सिचुएशन भी नेगेटिव आ रही है। लेकिन आपके ऊपर वो इंपैक्ट नहीं डाल पा रही क्योंकि आपके अंदर वो रखा ही नहीं है जो बाहर से देने वाला आपको देना
(1:36:35) चाह रहा है। सर वैसे तो आप इसका जवाब दे चुके हैं। फिर भी मैं इसको थोड़ा सा डिटेल में समझना चाहूंगा कि यदि विजुलाइजेशन करते समय कुछ भी दिखाई नहीं देता। बार-बार कोशिश करते हैं फिर भी नहीं दिखाई देता। सर दर्द होता है। तनाव और बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए? इसके दो क्वेश्चन बनते हैं जितेश जी। एक तो कई लोगों का सिर दर्द, तनाव, बॉडी एक, पीठ में दर्द, कमर में दर्द इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि विजुलाइज करते हुए कई बार हमारे शरीर के अंदर जो स्टर्ड इमोशंस हैं वो निकलने लगते हैं। जो आप बोलते हैं बॉडी कीप्स द स्कोर। बॉडी
(1:37:03) कीप्स द स्कोर। वो जो बॉडी ने स्कोर रखा हुआ है। अब विजुलाइजेशन उस कोर को धीरे-धीरे बाहर निकाल रही है। हमारे पास कोई पुरानी पेनफुल आकृतियां निकल रही हैं। कई शरीर में अलग-अलग जगह पर स्टर्ड है वो। वो स्टर्ड है। वो विजुलाइजेशन से वो चीजें निकलती हैं। तो जब निकलेंगी तो हमारे को दिखेंगी। हमारे एक मित्र हैं बड़ी अच्छी बात बोलते हैं। वो कहते हैं कि नाई के कांटे सामने ही आएंगे। मतलब खुद को ही दिखेंगे जब आएंगे तो तो ऐसे ही अपने कांटे भी सामने ही आएंगे। जो अपने अंदर दबा के हमने रखा हुआ था वो जब निकालेंगे तो सबसे पहले हमें दिखेगा।
(1:37:32) सबसे पहले हम उससे दुखी होंगे। तो कई लोग बोलते हैं ना सर मैं विजुअलाइजेशन कर रहा हूं। अब मैं थोड़ा ज्यादा दुखी हूं। मैं कहता हूं ये एक बड़ी अच्छी प्रक्रिया है क्योंकि जो आपके अंदर था अब वो आपको बाहर से दिखने लग इस प्रक्रिया को दुखी होने को रुकना मत। इसको और दुखी हो। जितना हो सकते हो लो। तो आचार्य रजनीश बोलते थे कि लिबरेशन का रास्ता सप्रेशन से नहीं भोग लेने से जाता है। मतलब एक आदमी शराब छोड़ना चाहता है। वो उसका दमन करता रहे। मैं नहीं पिऊंगा, मैं नहीं पिऊंगा, मैं नहीं पिऊंगा। वो बाहर नहीं निकल सकता। वो इंसान जिसने जागृक जागरूक हो के उसको देख
(1:37:58) लिया वो उससे बाहर निकल सकता है। तो ठीक वैसे ही वो दर्द जो है वो कई बार अंदर दबे हुए इमोशंस होते हैं जो निकल रहा होता है। यह पहला आस्पेक्ट था। दूसरा आस्पेक्ट यह है कि कई बार हमें जब विजुअल्स नहीं दिख रहे। और उसके कारण हम तंग हो रहे हैं। इसमें भी दो अलग-अलग चीजें मैं बताना चाहूंगा। पहला तो ये कि कई बार हम उस प्रोसेस को प्रोसेस के लिए करते ही नहीं। हम उसको आउटकम के लिए कर रहे होते हैं। जिस कारण वो प्रोसेस मैकेनिकल हो जाता है। मतलब मैं विजुलाइजेशन कर रहा हूं ऐसा नहीं मैं सोच रहा हूं। मैं विजुलाइजेशन कर रहा हूं और बैक ऑफ द माइंड ये चल रहा है कि
(1:38:28) मैं इस काम के लिए कर रहा हूं। इस काम के लिए कर रहा हूं क्योंकि तो जब मैं किसी काम के लिए कर रहा हूं तो मैं विजुलाइजेशन कर ही नहीं पा रहा हूं। चित्रेश जी फिर तो सिर दर्द होना लाजमी है क्योंकि मैं सोच रहा हूं कि यार मेरा ना जो यह ओसीडी है मेरी ठीक हो जाएगी या मेरा पेट दर्द जो रहता है मेरा आईबीएस है ये मेरा ठीक होना चाहिए मैं मैंने उसका प्रयोजन ही बदल दिया भाव ही भगवान है यद भावम तदभाव अब कर तो आप विजुअलाइजेशन रहे हो वो कहते हैं ना बगल में छुरी मुंह में राम राम कर तो आप विजुअलाइजेशन रहे हो लेकिन भाव क्या है भाव है आपका बीमारी के
(1:38:59) ऊपर भाव है आपका डर का भाव है आपका चिंता का डेस्पिरेशन का तनाव का एक बीज में पूरा पोटेंशियल है पेड़ बनने का। लेकिन उस बीज को अगर सही एनवायरमेंट ना मिले, अगर उसको सही मिट्टी ना मिले, अगर उसको सही धूप खाद पानी ना मिले तो वो बीज की क्या औकात कि बीज से पेड़ निकल जाए। लेकिन बीज के अंदर पेड़ है ना पूरा पेड़ है। लेकिन वहीं अगर उसको सही मिट्टी में आप दबा दो। लेकिन वहीं अगर उस बीज को आप भून दो और भूनने के बाद दबाओ कछू नहीं निकलेगा। ठीक वैसे ही हम विजुअलाइजेशन तो कर रहे हैं लेकिन हम उसको जो एनवायरमेंट दे रहे हैं वो डर,
(1:39:35) चिंता, तनाव, डेस्पिरेशन, डाउट और फियर का दे रहे हैं अगर क्योंकि हम आउटकम से अटैच्ड हैं तो वो विजुलाइजेशन हमारे दिमाग में, हमारे सिर में दर्द करेगी, हमारी बॉडी में दर्द करेगी। यह दूसरा आस्पेक्ट है। अब आते हैं तीसरे आस्पेक्ट पे। तीसरे [नाक से की जाने वाली आवाज़] आस्पेक्ट में आपने कहा कि कुछ लोगों को विजुअल्स ही नहीं दिखते हैं। तो अगर किसी को विजुअल विजुअल नहीं दिखते तो कोई चिंता की बात नहीं है। जो विजुलाइजेशन है उसकी साउंड पे आप फोकस कीजिए। उसकी आवाज पर फोकस कीजिए। आप उससे मिलने वाली सेंसेशंस पर फोकस कीजिए। हम अवेकन में भी हम यह सिखाते हैं
(1:40:05) लोगों को कि हमारी बॉडी के तीन डोमिनेंट जो हैं इंद्रियां होती हैं जिसमें एक विजुअल है, एक ऑडियो है, ऑडिटरी है और एक काइनेथेटिक है। यानी बॉडी की फीलिंग्स हैं। तो इन तीनों में से अगर एक भी काम करने लगी कई लोगों ज्यादातर लोगों के विजुअल्स एक्टिवेट होते हैं। मेरा भी विजुअल एक्टिवेट नहीं है जितेश जी। मुझे भी विजुअल ऐसा दिखता नहीं है क्लियरली। लेकिन मैं साउंड के ऊपर और बॉडी की सेंसेशंस और फीलिंग्स के ऊपर ध्यान लगा लेता हूं। तो जिसको विजुअल्स नहीं दिखते वो साउंड और कानस्थेटिक यानी बॉडी की फीलिंग्स कहां-कहां हो रही हैं ये साउंड सुनी जैसे
(1:40:39) मैं विजुअलाइजेशन में बोल रहा हूं। आप देखो पास में झरना बह रहा है। झरने की कल-कल आवाज उस चीज के ऊपर ध्यान लगाओ। सुनने पे ध्यान लगाओ। मैं बोलता हूं कि आप ऐसा देखो कि आप एक ऐसी जगह पर हो जहां पर चारों तरफ बादल ही बादल है। सब कुछ सफेद है। अब आप सफेद नहीं देख पा रहे हो। बादल नहीं देख पा रहे हो। लेकिन आप ऐसा महसूस करो कि बॉडी में ठंडक लग रही है। चारों तरफ ठंडी हवाएं चल रही। बॉडी को ठंडक छू रही है। कानों में आवाज आ रही है ठंडी-ठंडी उसकी। तो आप जो विजुअल प्रैक्टिस नहीं कर पा रहे हो वो ऑडिटरी और काइनेथेटिक से प्रैक्टिस करो। अरे आज तो
(1:41:07) बच्चे अगर अपने थर्ड आई को एक्टिवेट कर लेते हैं अपनी आंखें बंद करके वो चीजों को छू करके उसका कलर बता देते हैं। वो चीजों को छू करके उस पर क्या लिखा है वो बता देते हैं। तो आंखों का काम जब आंखें नहीं कर पाती तो आपका पीनियल ग्लैंड आपकी थर्ड आई और सेंसेस से और ऑर्गन से वो काम करवा देती है। तो अगर आप सुनना शुरू कर दें और आप फील करना शुरू कर दें तो वो जो विजुअल का काम था क्या ऐसा जो जो लोग ब्लाइंड हैं क्या वो लोग जिंदगी का पूरा आनंद नहीं ले पाते? अरे वो ले पाते हैं क्योंकि कुदरत ने उनको जो नहीं देख पा रहे उसकी सेंस उनकी स्किन
(1:41:37) में दे दी है। वो छू करके बता देते हैं इंसान को। वो इंसान के आभामंडल में आते ही बता देते हैं अच्छा इंसान है बुरा इंसान है। वो देख नहीं पाते लेकिन वो बता देते हैं कि सामने खतरा है। क्यों? क्योंकि उनकी वो सिक्स सेंस एक्टिवेटेड हो जाती है। तो जिन लोगों के पास विजुअल की एबिलिटी कम होती है वो लोग ऑडियो और काइनेस्टेटिक फीलिंग से यानी उसकी सेंसेस से उसकी बॉडी में इमोशंस और फीलिंग्स को अगर देखना शुरू करें तो वो विजुअलाइजेशन का उतना ही बेनिफिट ले पाएंगे जितना कोई विजुअल वाला इंसान ले पाता है। क्योंकि मैं भी विजुअल नहीं देख पाता और मैं भी
(1:42:04) उसका 100% 1000% आनंद ले पाता हूं तो अगर मैं ले पाता हूं तो कोई भी ले पाएगा। मेरा ये तो सवाल ही खत्म हो जाएगा अब लोगों का। यदि अनुराग जी नहीं देख पाते और वह अपने जीवन में परिवर्तन कर लिए तो बाकी लोग भी कर ही सकते हैं। मैं विजुअल से उतना कनेक्ट नहीं करता हूं लेकिन मैं ऑडियो से बहुत ज्यादा काइनेस्टेटिक से बॉडी में फीलिंग आ रही है उस चीज की उससे बहुत कनेक्ट करता हूं। बहुत सारे लोग ग्रेटट्यूड की बात करते हैं और आप भी अपने बहुत सारे सेशंस में ग्रेटट्यूड की बहुत बात करते हैं। तो क्या ग्रेटट्यूड आभार व्यक्त करने व से जीवन
(1:42:30) में समृद्धि आने लगती है। जीवन में अच्छी चीजें आना शुरू हो जाती हैं। हम अच्छी चीजें अट्रैक्ट करना शुरू कर देते हैं। बहुत अच्छी बात है चित्रेश जी। यहीं पर मैं फिर से वो बात कोट करना चाहूंगा। यद भावम तद्भवती जैसा आपका भाव होता है वैसा ही जीवन में सब कुछ होने लगता है। तो अगर मेरे पास भाव कमी का है तो कमी वाली चीजें मेरे पास आने लगती है। अट्रैक्ट करती हैं। आप देखो ना एक एक शॉप है उस पे नॉनवेज मिलता है। तो वो किन लोगों को अट्रैक्ट करेगी? नॉनवेज खरीदने वालों को। एक शॉप है उस पे जूस मिलता है। तो उस शॉप पे कौन लोग आएंगे?
(1:43:02) जो जूस पीते होंगे। जैसा ही अंदर का एनवायरमेंट है वैसे ही बाहर की चीजें हमारे पास आने लगती हैं चित्रेश जी। मंदिर में वही आएगा जिसकी मंदिर में आस्था है। मस्जिद में वही जाएगा जिसकी मस्जिद में आस्था है। और नो दसेल्फ में वही आएगा जिसकी नो दसेल्फ में आस्था है। ठीक वैसे ही आपके अंदर जो है वही बाहर की चीजों को आपके पास चीजें तो हजार प्रकार की हैं। इसीलिए लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन का सबसे बड़ा प्रिंसिपल कहता है लाइक अट्रैक्ट्स लाइक। जैसे आप हो वैसी ही चीज आपके पास आएगी। तो ब्रह्मांड का भी सबसे बड़ा नियम यही बोलता है कि आपके अंदर जो है उसी प्रकार की
(1:43:35) चीजें बाहर से भी आपको जीवन में मिलने लगती हैं। अगर आप अंदर से खाली हो तो और खाली चीजें मिलने लगेंगी। अगर आप अंदर से भरे हुए हो तो भरी हुई चीजें आपको जीवन में मिलने लगेंगी और भरी हुई चीजें अच्छी हैं तो अच्छी भरी हुई चीजें आपको मिलने लगेंगी। तो इसका मतलब जब आप आभार करते हैं, ग्रेटट्यूड करते हैं तो ये चेतना के जो मस्तिष्क में जो इमोशंस के लेवल हैं उसकी सर्वोच्च अवस्था है। इससे ऊपर कोई अवस्था ही नहीं है। क्योंकि ग्रेटट्यूड जानते हैं कौन कर सकता है? जैसे हमने इमोशंस के लेवल बनाए कि इमोशन का लेवल है गिल्ट, शेम, एंगर, एपिथी, न्यूट्रलिटी।
(1:44:12) उसके बाद हम धीरे-धीरे ऊपर जाते हैं। करज, लव, पीस, अबंडेंस, ग्रेटट्यूड। ग्रेट इज़ द हाईएस्ट फॉर्म। यानी ग्रेटट्यूड का मतलब है कि जैसे सब चीज से परिपूर्ण होगा वही ग्रेटट्यूड कर पाएगा। जैसे मैं आपसे पूछूं कि आप आपने पढ़ाई क्या की और आप बोले कि मैंने ग्रेजुएशन कर लिया तो मैं आपसे पूछूं कि क्या मैंने आपने फिफ्थ क्लास भी पास की थी? तो ये कितना बेकार सवाल है। आप बोलोगे ग्रेजुएशन की है तो पहले का सब कुछ तो किया ही होगा ना। तो ऐसे ही ग्रेटट्यूड जो इंसान करता है उसके पास लव, उसके पास पीस, उसके पास अबंडेंस, उसके पास न्यूट्रलिटी, उसके पास
(1:44:42) करज ये सब कुछ ऑटोमेटिकली होगा। क्योंकि ग्रेटट्यूड में सब कुछ सम्मिलित है। बाद ही वहां पहुंचा दिया। वहां पहुंच भी गया तो सब कुछ अपने आप आ जाएगा। क्योंकि आप अगर किसी चीज का आभार कर रहे हो तो बिना मोहब्बत के आभार नहीं किया जाता। चित्रेश जी। जेलसी वाला इंसान आभार नहीं कर सकता। मोहब्बत वाला इंसान आभार कर सकता है। अगर आप किसी चीज का आभार कर रहे हो तो गुस्से में आभार कभी नहीं किया जाएगा। शांत मन से आभार किया। क्या बात है? क्या? तो यानी आप देखो पीस, हैप्पीनेस, करज, ब्लिस ये सब कुछ ऑटोमेटिकली आपकी बॉडी में आ जाता है। जब
(1:45:12) आप ग्रेटट्यूड करते हो इसलिए बोलते हैं ग्रेटट्यूड इज़ द किंग इमोशन। सबसे ब्यूटीफुल, सबसे बड़ा और जब आपने ग्रेटट्यूड किया तो लव, पीस, हैप्पीनेस, करज ये सब कुछ आपके पास है। और अगर आपके पास लव है, पीस है, ग्रेटट्यूड है, ब्लिस है तो कैसा भाव है आपके शरीर में? आनंद का भाव है। यद भावम तद्भवती। और अगर भाव इन सब चीजों का है तो सब कुछ कैसा मिलने लगेगा? आप देखोगे आपके जब ग्रेटट्यूड करते हो ना तो आपके जीवन में लोग बदल जाते हैं। चित्रेश जी मैंने तो यह सैकड़ों नहीं लाखों लोगों के साथ देखा है। आप ग्रेटट्यूड करो आपके लोग बदल जाएंगे। जी
(1:45:45) जो लोग आपके जीवन में नहीं होना चाहिए वो लोग छटने लगेंगे और अच्छे लोग आपके जीवन में आने लगेंगे और अगर आपके जीवन में वो लोग नहीं बदलते आपके रिश्तेदार आपके घर में ही आपके एक ही कमरे में मौजूद हैं तो भी आप देखोगे आपको उनसे फर्क पड़ना बंद हो जाएगा। क्योंकि अब आपका रेडियो चैनल अलग लेवल पर ट्यून हो चुका है। आप 99 एफएम पर थे। 99 एफएम के गाने सुनाई दे रहे थे। आपने 100 पे ट्यून कर लिया। 99 अभी भी बज रहा है लेकिन सुनाई नहीं दे रहा है। क्यों? क्योंकि आपकी फ्रीक्वेंसी बदल गई। जब आप ग्रेटट्यूड पे होते हो ना तो आप देखते हो
(1:46:17) कोई कंप्लेंट भी कर रहा है तो आपको उससे हेट्रेड नहीं होती, द्वेष नहीं होता बल्कि आप उसके ऊपर तरस खाते हो। बेचारा जानता नहीं है। तो ग्रेटट्यूड इतनी पावरफुल चीज है, इतनी ब्यूटीफुल चीज है जो और अगर कोई मुझे सुनता है और पिछले चारप साल से सुन रहा है तो वो यह जरूर जानता होगा कि मैं अपने जीवन को बदलने का जो सबसे बड़ा क्रेडिट है वो ग्रेटट्यूड को देता हूं। इसके बाद में सब प्रक्रियाएं ब्रेथ वर्क इसके बाद में तंत्र इसके बाद में सब चीजें काम करी लेकिन वह तब करी जब मैं अंदर से भरा हुआ था। तब मैं यह सब प्रक्रियाएं और अच्छे से कर पाया। तो जो भरा हुआ है अंदर
(1:46:56) से वह भरी हुई चीजों को ही अट्रैक्ट करता है। वह अबंडेंस को ही अट्रैक्ट करता है। इसीलिए लोगों के जीवन बदल जाते हैं। लेकिन कई लोगों के लिए चित्रेश जी ये ग्रेटट्यूड मैकेनिकल हो गया है। उनको लगता है पेपर पे थैंक यू लिख देना ग्रेटट्यूड है। या दिन में जैसा दवाई लेनी होती है, रोटी खानी होती है वैसे हां थैंक यू। नहीं इमोशन एंड फीलिंग। जब आप ग्रेटट्यूड कर रहे हो तो आपके माइंड में उससे रिलेटेड इमोशन पैदा होना चाहिए और शरीर में उससे रिलेटेड फीलिंग पैदा होनी चाहिए। जैसे आप अपने शरीर का ग्रेटट्यूड कर रहे हो तो आपके पास एक इमोशन आए कि यार कितना स्वस्थ
(1:47:30) शरीर दिया है और आप ये इमोशन एक इंसिडेंस क्रिएट कर पाओ कि यार इतने स्वस्थ शरीर से मैं क्या एक्सरसाइज कर पा रहा हूं। मेरा शरीर सुचारू रूप से चल रहा है। मैं पहाड़ चढ़ सकता हूं। हूं मैं समंदर चल सकता हूं और आप फील कर रहे हो साथ में अपने शरीर के एक-एक अंग को देखते हुए कि यार मेरे स्टमक का धन्यवाद, मेरे हार्ट का धन्यवाद, मेरे मतलब आप एक-एक सेंसेशन बॉडी में फील कर रहे हो तो इमोशन और फीलिंग अगर इन चीजों में साथ में हैं तो ग्रेटट्यूड से बड़ी कोई चीज नहीं। मैं अक्सर लोगों को यहां तक बोल देता हूं चित्रेश जी कि अगर आप ग्रेटट्यूड कर रहे हो ना तो इससे बड़ा तो
(1:48:05) बस भगवान ही है। इससे बड़ा तो फिर कुछ कोई प्रगति कुछ बचता ही नहीं है। जी अगर आप आभार करना शुरू कर दो। एक ग्रेटट्यूड आपकी जिंदगी को इतना बदल सकता है। क्योंकि मैं ये इसलिए दावे से बोलता हूं कि ना सिर्फ इसने मेरी जिंदगी को बदला बल्कि हमारे सैकड़ों हजारों लाखों पार्टिसिपेंट्स की जिंदगी को इसने बदला है। और ना सिर्फ पार्टिसिपेंट्स ने जो लोग वीडियोस देखते हैं जो लोग मैंने ग्रेटट्यूड पे कई वीडियोस बनाए। हम इस पे एक प्रॉपर सेशन करते हैं जो बिल्कुल निशुल्क हमने रखा हुआ है सब दुनिया के लिए। इसकी विजुअलाइजेशन हम लोगों को करवाते हैं। लोगों के जीवन
(1:48:32) में जो बदलाव आते हैं वो इतने अद्भुत हैं। अभी जैसे हम पूजा की बात कर रहे थे और लोग ये सब लोग कहां से बदले? राइट? ग्रेटट्यूड से बदले। तो एक ग्रेटट्यूड कैन चेंज योर लाइफ ड्रामेटिकली। बहुत बढ़िया सर। वैसे तो आप इसका जवाब दे चुके हो। फिर भी क्योंकि आपके ऑडियंस का प्रश्न है इसलिए मैं फिर से पूछ रहा हूं। लगातार विजुलाइज़ेशन प्रैक्टिस करने के बाद भी उनको वो परिणाम नहीं मिलते जो वह जीवन में चाहते हैं और थोड़ी देर अच्छा लगता है बाद में फिर वैसे ही सामान लाइफ में लौट जाते हैं। वैसे तो मैं इसके ऊपर बात कर चुका हूं लेकिन फिर भी पर्टिकुलर इस सवाल के
(1:49:01) लिए मैं जवाब देना चाहूंगा कि जब भी हम विजुलाइजेशन को आउटकम से अटैच होकर के करेंगे एक्सपेक्टेशन से करेंगे। अब आप कहोगे कि यार मेरे को कोई चैलेंज है, दिक्कत है तो एक्सपेक्टेशन तो आएगी ही आएगी। बिल्कुल आएगी। लेकिन आप प्रयास यह कीजिए कि आप उस प्रक्रिया में इतना खो जाओ कि आप यह भूल जाओ कि आप यह कर किसके ले रहे हो। हम पॉडकास्ट करते हुए यह इस समय भूल चुके हैं कि यह पॉडकास्ट जाएगा कहां कैसा होगा क्या डले क्या हम यह प्रक्रिया में इन्वॉल्व्ड हैंड तो किसी भी काम को करते हुए जैसे एक जिम में आप जाते हो या आप एक्सरसाइज आजकल बहुत करते हो तो
(1:49:30) एक्सरसाइज करते हुए आप इस चीज से अटैच हो कि एक्सरसाइज से मेरे बॉडी बनेगी मेरे बाईसेप्स बनेंगे मेरे ट्राइसेप्स या आप इस प्रक्रिया में आनंद ले रहे हो आनंद ले रहे हो तो अगर आप प्रक्रिया में आनंद ले रहे हो तो आप देखोगे कि आप उससे ज्यादा बढ़िया रिजल्ट लेने लगे हो लेकिन जब आप आउटकम से अटैच होगे तो वो प्रक्रिया तो आप कर रहे हो लेकिन वो कहीं ना कहीं शरीर में तनाव पैदा पैदा करेगी। बॉडी तो बन जाएगी। बाईसेप्स तो बन जाएंगे। ट्राइसेप्स तो बन जाएंगे। लेकिन वो कहीं ना कहीं शरीर को तनाव देगी। क्योंकि प्रक्रिया का जो मूल था, जो एनवायरमेंट
(1:49:56) था, जो मिट्टी थी, जिस बीज में वो प्रक्रिया रूप ने जन्म लिया वो मिट्टी तनाव की थी। इसीलिए आप देखोगे कि रेत में कुछ नहीं होता कैक्टस के अलावा, कांटों के अलावा। क्यों? क्योंकि मिट्टी की प्रकृति वैसी है और वहीं आप देखोगे कि ठंड में आप जाकर के देखो तो क्या ब्यूटीफुल बेरीज हो रही हैं। क्या तो ड्राई फ्रूट्स हो रहे हैं। क्या तो लीची हो रही है। क्या तो सेब हो रहा है और क्या तो ये स्ट्रॉबेरी हो रही है। क्या केसर हो रहा है। क्यों हो रहा है? क्योंकि जैसी सोइल है उसी के हिसाब से बीज उत्पन्न होगा। स्ट्रॉबेरी के बीज को आप रेगिस्तान में लगा दोगे। नहीं
(1:50:26) पैदा होगा। और कैक्टस के बीज को आप बर्फ में जाकर लगा दोगे। वो भी पैदा नहीं होगा। तो ठीक वैसे ही हमें चमत्कार तब मिलेगा, बदलाव तब मिलेगा जब उस विजुअलाइजेशन को या जो भी प्रक्रिया आप कर रहे हो उसमें आपका भाव बदलेगा। अगर आपका भाव आउटकम से ही जुड़ा रहा तो हम कभी उसमें सक्सेसफुल नहीं हो पाएंगे। लेकिन अगर आप प्रक्रिया में आनंद लेने लगे क्योंकि भाव प्रक्रिया में है। आउटकम में नहीं आउटकम में नेगेटिव भाव है। क्योंकि आउटकम बीमारी से जुड़ा हुआ है। कमी से जुड़ा हुआ है। पैसा ना आने से जुड़ा हुआ है। मैनिफेस्टेशन ना होने से
(1:50:55) जुड़ा हुआ है। आउटकम अभी तो नहीं है ना मेरे पास वो सब कुछ जो मैं आउटकम में चाह रहा हूं। तो कमी है, लैक है लेकिन प्रक्रिया में संपूर्णता है, आनंद है, ग्रेटट्यूड है, आभार है, खुशी है, सेरिटोनिन है, डोपामिन है, एनेंडामाइट है। तो प्रक्रिया का आनंद लेने के लिए प्रक्रिया कीजिए। आप देखिए जो रिजल्ट आपको छ महीने में भी नहीं मिले वो छ हफ्ते में ना मिल जाए तो कह देना। बहुत बढ़िया सर। सर कुछ लोग प्रोकस्टिनेशन के चलते शुरू ही नहीं कर पाते। उनके लिए क्या उनको क्या करना चाहिए कि वो उस प्रोकस्टिनेशन को तोड़ के आगे बढ़ सके। बहुत अच्छा सवाल है चित्रेश जी। आप देखो
(1:51:26) प्रोक्रास्टिनेशन के लिए हम बहुत सी मोटिवेशन भी देखते हैं। लेकिन मुझे लगता है इसमें सबसे बड़ा काम करता है गुरु। पुराने समय में जब बच्चा कुछ नहीं कर पा रहा होता था तो उसका कान पकड़ के उसके पिता गुरु के पास ले जाते थे कि यार यह इसको सीधा करेंगे। तो इसमें एक व्यक्ति यहां पे गुरु से मेरा मतलब कोई ऐसा गुरु नहीं है। इससे मेरा मतलब है अकाउंटेबिलिटी पार्टनर। आप किसी को अपना अकाउंटेबिलिटी पार्टनर बना लो। मतलब जैसा एक इंसान है वो जिम ज्वाइन करता है लेकिन जिम जा नहीं पाता। तो वो अपने दोस्त को रिससिबिलिटी दे दे कि यार रोज सुबह 6:00 बजे तूने मुझे
(1:51:57) उठाना है या तूने मुझे इसका एक अकाउंटेबिलिटी पार्टनर से आपकी कई चीजों को करने की क्षमता मैं ये नहीं कह रहा हूं 100% हो जाएगा। जब दो लोग कोर्स कर रहे हैं तो दोनों एक दूसरे को अकाउंटेबिलिटी पार्टनर बना लें और दोनों एक दूसरे को रोज-रोज बताते जाएं। बताते जाएं। जिस तरह के व्यक्ति के साथ आप जुड़ोगे उसी तरह से आपके जीवन में वो भावनाएं और ज्यादा प्रचुर मात्रा में आने लगती हैं। जैसे मान लो आप किसी के साथ जुड़ रहे हो और आप उसको ये बता रहे हो कि यार मैं रोज जो है पुश अप्स लगाता हूं मैं रोज तो आपको देखने वाले सुनने वाले भी चार
(1:52:23) लोग प्रभावित होंगे। क्यों प्रभावित होंगे? क्योंकि आपके रिजल्ट्स देख रहे हैं। आपसे आपसे सुन आपसे बात कर रहे हैं। तो इसी प्रकार एक व्यक्ति चार लोगों को उठा के शराब खाने भी ले जा सकता है और एक व्यक्ति चार लोगों को उठा के रोज सुबह वॉक करने भी ले जा सकता है। क्यों? क्योंकि दूसरे से हमें मोटिवेशन मिलती है। तो एक अकाउंटेबिलिटी पार्टनर अगर आप अपना कोई बना लो कि मैं अपनी सारी चीजें तुम्हारे साथ शेयर करता हूं। तुम मेरे साथ शेयर करो। हम दोनों एक दूसरे के लिए अकाउंटेबल रहेंगे। तो मुझे लगता है कि यह कहीं ना कहीं उस प्रोक्रास्टिनेशन को पुश करने का
(1:52:49) काम करता है। जैसे मेरा एक दोस्त था वो क्या बोलता था? मैं मॉर्निंग वॉक पे जाता था। बोलता था यार अगर मैं सुबह ना उठ हूं ना तो एक मग पानी मेरे ऊपर डाल देना। तो पानी जब डाला तो वो लड़ नहीं सकता क्योंकि उसने खुद ने बोला था कि मेरे साथ यह कर देना। तो कहीं ना कहीं अकाउंटेबल मैं इतना एक्सट्रीम जाने के लिए नहीं बोल रहा हूं लेकिन एक व्यक्ति जिसके साथ आप अकाउंटेबल हैं और ऐसा कोई ना कोई आपको जरूर मिलेगा। ऐसा दोस्त जिसके आप पानी डालने से गुस्सा ना करो। ऐसा दोस्त जिसकी आप बात मान सको। ऐसा व्यक्ति जिसमें आप ट्रस्ट कर सको तो
(1:53:17) कहीं ना कहीं एक इंसान चार लोगों को पुश करके आगे ले जाता है। तो मैं कहूंगा प्रोक्रास्टिनेट कर रहे हो तो मोटिवेशन की जगह उस व्यक्ति को ढूंढो जो आपका अकाउंटेबिलिटी पार्टनर बन सके। कहीं ना कहीं वो आपको पुश कर दे। वैसे आपकी कम्युनिटी में तो ऐसा हो ही जाता है क्योंकि आप इतने सारे ग्रुप बनाए हुए हैं। हर ग्रुप में जो लोग रेगुलर प्रैक्टिस करते हैं जैसे जो नो दसेल्फ वाले हैं वो डेली जो प्रैक्टिस करते हैं ग्रुप में लिखते हैं उनको देख के फिर दूसरे लोग करने लगते हैं और एक दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं। तो कम्युनिटी भी एक यदि कम्युनिटी
(1:53:43) मिल जाती है तो भी ये चीजें बहुत आसानी से आसान हो जाती है। हो जाती है। सर वैसे तो बहुत सारे सवाल और भी हैं। पर वो सारे सवाल के लगभग आप जवाब दे चुके हैं। बस एक लास्ट सवाल पूछना चाहता हूं सर कि यदि जीवन में कुछ मानसिक संघर्ष लगातार बन रहे हैं। लगातार वही पैटर्न है और उन पैटर्न को हम चाह के भी ब्रेक नहीं कर पा रहे हैं। तो क्या उन पैटर्न को ब्रेक करने के लिए कोई साइंटिफिक या कोई एक ऐसा नियम या कोई एक ऐसा स्टेप बाय स्टेप प्रोसेस है कि हम उसको ब्रेक कर पाएं एक बार और आगे बढ़ पाएं। सर देखो क्या वो जो पैटर्न हमारी जिंदगी में बन रहे हैं वो हमने बनाए हैं।
(1:54:18) हम चाह रहे हैं कि वो पैटर्न हमारी जिंदगी में हो? नहीं हम नहीं चाह रहे हैं। वो स्वत ही हमारे कर्मों के कारण हमारे जीवन के कारण हमारे जीवन में बने जा रहे हैं। लेकिन पैटर्न कभी भी किसी को डिस्टर्ब नहीं कर सकता। चितेश जी कभी नहीं कर सकता। जब हमारे मन में उस पैटर्न से रिलेटेड चुंबकीय शक्ति चुंबकीय तत्व पड़ा होता है तो ही वो पैटर्न हमारी जिंदगी में हमको डिस्टर्ब करेगा। यानी क्या शराब की दुकान आपको अपनी तरफ बुला सकती है? लेकिन जिस इंसान के अंदर उसकी तलब है उसको वो बड़ी जल्दी बुला सकती है। राइट? क्या सिगरेट का एक पैकेट आपको दिखे तो
(1:54:48) क्या वो आपको आकर्षित कर सकता है कि उठाओ और मुझे पियो। आपको कभी आकर्षित नहीं कर सकता क्योंकि आपके अंदर उस चीज से रिलेटेड चुंबकीय तत्व पड़ा ही नहीं है। तो जीवन में जो लोग किसी परिस्थिति से परेशान हो रहे हैं, जीवन की परिस्थितियां बदल जाएं ये तो हमारे कर्मों और हमारे प्रारब्ध को बदलना पड़ेगा। जिसके लिए ध्यान की बड़ी गहरी अवस्थाओं में जाना पड़ेगा। केवल वही बदल सकता है। अदरवाइज हमको हमारे अंदर का वो पैटर्न बदलना है जो पैटर्न उसकी तरफ आकर्षित हो रहा है। एक उदास आदमी चार उदास आदमियों को इकट्ठा कर लेता है। एक चुगली करने वाली औरत जस्ट चुगली करने वाली औरतों
(1:55:18) को अपने साथ यूं इकट्ठा कर लेती है। एक मंदिर जाने वाला 10 मंदिर जाने वालों को अपने साथ यूं इकट्ठा कर लेता है। और एक शराब पीने वाले को चार दोस्त मिल जाए शराब पीने वाले या तो यूं कर सकता है वो यूं। एक फोन करने की देर है। तो यानी आपके अंदर जब वो चीज रखी हुई है वो उसी तरह की जीवन की सिचुएशन से एकदम से जुड़ जाती है। तो मैं जीवन की सिचुएशंस बदल जाएं ऐसा नहीं हो सकता और ना ही कोई प्रयास करे कि मेरे जीवन की सिचुएशन सिचुएशंस वैसी ही रहेंगी। लेकिन आपके अंदर वो शक्ति आ जाए कि अब वो सिचुएशंस आपको प्रभावित ना कर पाएं। और ये
(1:55:46) शक्ति जो है ये सिर्फ ध्यान और कुछ मेडिटेशन और विजुलाइजेशन से ही पॉसिबल है। और अगर आप ये सब नहीं कर पा रहे हो तो एक काम जरूर करो कि दिन में 5 मिनट बैठ जाओ और गहरी लंबी सांस लेने लगो। क्योंकि चले वाते चलम चित्तम निश्चलम निश्चले भवेत बहुत बढ़िया जिस प्रकार बात चलेगी उसी प्रकार चित्त चलने लगेगा और बाहर की चीज आपको कोई परेशान नहीं कर सकती जब तक आपका चित्त भी उसी स्तर पर नहीं है जैसे आपको सिगरेट नहीं परेशान कर सकती उनको शराब नहीं परेशान कर सकती वैसे किसी और उस व्यक्ति को जिसके अंदर से चित्त परिवर्तित हो गया बाहर की कोई सिचुएशन तंग नहीं कर
(1:56:18) पाएगी बहुत बढ़िया उसके लिए प्रक्रिया एक ही है कि अपनी सांसों को गहरा कीजिए जितना हो सके पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम को एक्टिवेट करो क्योंकि जब आप बार-बार अपने पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम को ट्रेन करोगे तो यह आपकी मेमोरी में इतना गहरा बैठ जाएगा कि कुछ भी हो मैं तो शांति रहता हूं। बहुत मुझे यह चीज इंपैक्ट नहीं डाल सकती। तो सिर्फ एक ये प्रयास अगर लोग करें तो उनके जीवन में बहुत अच्छे बदलाव आ सकते हैं। बहुत बढ़िया सर। बस एक लास्ट क्वेश्चन पूछना चाहूंगा। बहुत सारे लोग ये बोलते हैं कि मुझे नो दसेल्फ में क्यों आना चाहिए? ऐसा क्या करते हैं आप जो इतने सारे
(1:56:46) टेस्टिमोनी लोग बोलते हैं मेरे जीवन में यह बदल गया, मेरे जीवन में वो बदल गया। तो एग्जैक्टली नो दसेल्फ वर्कशॉप क्या है और किन लोगों के लिए बनाया है आपने? देखिए मैंने तो यह वर्कशॉप अपने लिए बनाया था। मैंने तो यह इसलिए बनाया था कि वह प्रक्रियाएं जितना मैं करने में आनंदित होता हूं, उतना मैं करवाने में भी आनंदित होता हूं। नो दसेल्फ में वो सभी प्रोसेससेस हो रहे हैं जिसमें तंत्र का कुछ पार्ट है। जिसमें हठ योग का कुछ पार्ट है। जिसमें हमारे मन को विकारों को दूर करने के लिए विजुलाइजेशंस का कुछ पार्ट है। जिसमें कैथारसिस का कुछ पार्ट है।
(1:57:17) जिसमें हमारे पुराने ग्रंथों से अद्वैत से षटचक्र निरूपम से हठयोग प्रदीपिका से हमने बहुत सी ऐसी चीजें ली जो हमारे चक्रों को, हमारी इंटरनल एनर्जीज को, हमारे प्राण को बैलेंस करती है। और यह सारी प्रक्रिया इतनी आनंददायक है, इतनी आनंददायक है कि मैं कहता हूं कि उस व्यक्ति को कभी नहीं आना चाहिए जो जीवन में किसी कारण को ढूंढ रहा है कि मुझे यहां क्यों जाना चाहिए। मुझे कोई कारण मिल जाए तो मैं यहां पर जाऊं। मैं कहता हूं जो व्यक्ति आनंद की खोज में है। जो व्यक्ति चाह रहा है कि मेरा जीवन ब्लिस हो जाए। जो व्यक्ति चाह रहा है कि मेरी पूरी इंटरनल स्टेट बैलेंस
(1:57:51) हो जाए। जो व्यक्ति चाह रहा है कि मैं डिजीज फ्री बॉडी पाऊं। जो व्यक्ति चाह रहा है कि मेरे रिलेशनशिप्स अच्छे हो जाए। जो चाह रहा है कि मेरे जीवन में गुस्सा तनाव बिना किसी बात के जो हो रहा है, कारण में हो रहा है तो बड़ी अच्छी बात है। बिना किसी बात के हो रहा है वो समाप्त हो जाए और उससे भी बड़ी बात जो व्यक्ति ये चाह रहा है कि मैं अपने आप को जानू कि मैं कौन हूं। जब हम प्राणों की कुछ प्रक्रियाएं करते हैं तो हमारे प्राण स्थूल से सूक्ष्म की तरफ बढ़ते हैं। स्थूल से शरीर से सूक्ष्म की तरफ बढ़ते हैं। और मैं अपने आप को तब
(1:58:26) जान पाता हूं जब मैं अपने उस सूक्ष्म तत्व को जान पाता हूं। ठीक वैसे ही जैसे क्वांटम फिजिसिस्ट बोलता है कि तुम फिजिक्स में कितना ही कुछ खोजते रहो। लेकिन असली सबसे बड़ा तत्व तब पता चलेगा जब क्वांटम फिजिक्स में उस क्वांटा के उस एनर्जी के पैकेट के अंदर जाके उसके बिहेवियर को हम समझ पाएंगे जो हम आज तक समझ नहीं पाए हैं जो फिजिक्स के लॉस के विपरीत है जो ग्रेविटी के विपरीत है जो किसी भी लॉ को नहीं मानता जब हम उसको समझेंगे जिसको हम लोग ब्रह्म तत्व और हम चेतना बोलते हैं जब वो कहते हैं उसको समझेंगे तो हम एक्चुअल में फिजिक्स को समझ
(1:58:54) पाएंगे। ठीक वैसे ही मैं कहता हूं जब आप इस स्थूल से हटके उस सूक्ष्म को समझोगे जो आप हो तो आप एक्चुअल में अपने जीवन को आनंद से अपने हर एक जीवन को आनंद से जी पाओगे तो वो व्यक्ति को जरूर आना चाहिए जो अपने आप को जानना चाहता है कि वो सूक्ष्म अवस्था क्या है जिसके साथ मैं जुड़ जाऊं संपन्नता से जुड़ जाऊं संपूर्णता से जुड़ जाऊं हेल्थ से जुड़ जाऊं और जीवन के हर ब्यूटीफुल चीज से जुड़ जाऊं उसको आना चाहिए लेकिन जो कुछ दूर करना चाहता है मिटाना चाहता है खत्म करना चाहता है कुछ बदलना चाहता है वो मत आए कृपया करके कभी मत आए वैसे भी हमारे पास जगह नहीं होती।
(1:59:25) केवल वो व्यक्ति आए जो अपने अंदर मन में जुड़कर अपनी जिंदगी को बदलकर अपने उस सूक्ष्म तत्व को जानना चाहता है। अपने आप से मिलना चाहता है और आनंदित होना चाहता है। वाह बहुत बढ़िया अनुराग जी लगभग 2 घंटा हो गया हमें। मैं ब्रॉडकास्ट तो बोलूंगा बस चर्चा करते हुए और इन 2 घंटे के चर्चा में 2 घंटे के डिस्कशन में इतना आनंद आया कि मुझे और अभी मन में बहुत सारी जिज्ञासाएं बहुत सारे क्वेश्चंस हैं। पर इनको हम एक नेक्स्ट फिर से एक पॉडकास्ट में हमारे पांचवें पॉडकास्ट में कवर कर लेंगे क्योंकि ये पेज में जो लिख के लाया था एक ही पेज पूछ पाया एक पेज अभी भी बाकी
(1:59:59) है। पर आज के जो चर्चा हुई मैं बड़े दावे से यह बात लोगों को बोल सकता हूं कि जिनके मन में भी साइंस और हीलिंग को लेके कितने भी प्रश्न थे वो आज का पॉडकास्ट जिसने पूरा देख लिया वो हीलिंग और साइंस के जो कोरिलेशन है उसको बहुत अच्छे से समझ पाएगा और आज का पॉडकास्ट जिसको समझ में आ गया और उसने उनको प्रैक्टिस कर लिया तो शायद वह आने वाले समय में बीमार ही ना हो यह सारी चीजें आज आपने बहुत क्लिटी िटी से बहुत डिटेल में समझाई। तो बहुत-बहुत धन्यवाद अनुराग जी। बहुत शानदार आपने आज जानकारी दी लोगों को और 100% लोगों को इस जानकारी
(2:00:37) से फायदा होगा। तो आपने समय निकाला और इतना समय दिया उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद अनुराग। बहुत-बहुत थैंक यू जित्रेश जी। शुक्रिया और मुझे भी बहुत आनंद आया। आज की चर्चा मेरे ख्याल मुझे भी ऐसा लग रहा है कि और हम 2 घंटे भी बात करते रहे तो और यह समाप्त नहीं होगी और क्योंकि जब भी आपके साथ पॉडकास्ट किया है जब भी आपके साथ चर्चा हुई है तो जो आपकी ऑडियंस है जो आपके लोगों का उस पे प्यार मिलता है जो अह लोगों की इतनी दुआएं मिलती हैं, इतने अच्छे कमेंट्स मिलते हैं। मुझे लगता है कि वो कहीं ना कहीं मुझे भी फ्यूल दे देते हैं कि इतना अच्छा आनंद का भाव जब मिलता
(2:01:06) है किसी जगह पर आकर आपकी पॉजिटिव वाइबेशंस मिलती हैं। तो वो उस चर्चा को और भी ब्यूटीफुल और गहन बना देती है और उससे किसी ना किसी को तो जीवन में जरूर बदलाव महसूस होगा। सो थैंक यू सो मच फॉर हैविंग मी हियर। बहुत-बहुत धन्यवाद। थैंक यू सर। थैंक यू।

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