Harsh Reality of CORPORATE Jobs in INDIA!
Author Name:Rashmi Sawarn
Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@rashmisawarn
Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=jzv0AxZtYi0
Transcript:
(00:00) आखिर क्यों कुछ लोग कॉर्पोरेट कल्चर से तंग होकर अपना जॉब छोड़ना चाह रहे हैं और वर्क कल्चर को टॉक्सिक बताने लगे। गाइस सीरियसली जो कोई भी समझ रहा है ना कॉर्पोरेट लाइफ बहुत अच्छी होती है तो लिटरली आपकी जिंदगी बर्बाद कर देंगे वो लोग। भाई जिंदगी ठंड हो चुकी है। कोई खुश नहीं है। सब बस काम कर रहे हैं। सब सोच रहे हैं कि कुछ करेंगे पर कोई कुछ कर नहीं रहा है। एक तरफ लोग कंपनीज़ में इंटरव्यू दे देकर थक रहे हैं। उनकी नौकरी नहीं लग रही है। लोगों को लग रहा होगा ना इसको जॉब मिल गई है। तभी आजकल इसने रोना छोड़ दिया है। सच बताऊं तो मुझे जॉब नहीं मिली है। भाई
(00:33) मैंने ना होप ही छोड़ दी है। और दूसरी तरफ कुछ लोग इस टॉक्सिक [संगीत] वर्क कल्चर की वजह से अपनी लाइफ से हार मान रहे हैं। 25 साल के निखिल सोमवंशी जो Ola के एआई आर्म कृत्रिम में जॉब करते थे। उन्होंने अपनी जे ले ली और इसका रीजन क्या था? एक्सट्रीम वर्क प्रेशर। उनके एक दोस्त [संगीत] ने रेडिट पर पोस्ट किया कि निखिल के ऊपर इतना इंटेंस वर्क लोड था और उसका मैनेजर उसे वर्बली अब्यूज भी करता था। और यह सिर्फ निखिल की कहानी नहीं है। एना सेवेशन परेल, तरुण सक्सेना, [संगीत] सौरभ कुमार, सदाफ फातिमा इन सब लोगों ने भी यही स्टेप लिया।
(01:06) और अगर ध्यान से देखो तो जो चीज सबके बीच कॉमन थी वो था बर्न आउट आइसोलेशन जॉब इनसिक्योरिटी और एक्सट्रीम वर्क प्रेशर दिया इतना लड्डू दिया उधर प्राइम को पूरा जा रहा कुछ नहीं किया वन ईयर से कुछ नहीं पूछेगा वो भी ऐसे ही रहेगा और अब जॉब इनसिक्योरिटी इतनी बढ़ चुकी है कि मत पूछो रिसेंटली ओरेकल कंपनी ने सुबह 6:00 बजे एंप्लाइजस के फोन [संगीत] पर एक ईमेल भेजा जिसमें लिखा था कि टुडे इज योर लास्ट डे एट ओरेकल योर रोल हैज़ बीन एलिमनेट ेड [संगीत] इफेक्टिवली इमीडिएटली। सोचो सुबह उठते ही आपको पता चले कि आपकी जॉब खत्म हो चुकी है। और गौर करने वाली
(01:42) बात यह है कि इस मास [संगीत] ले ऑफ में जूनियर से लेकर सीनियर एंप्लाइजस तक सब शामिल थे। Redit पर एक यूजर ने लिखा [संगीत] कि उसके फादर ने 20 साल ओरेकल में काम किया सेम बॉस के अंडर। लेकिन यह कंपनीज़ किसी की भी नहीं होती। आज वह कैंसर से लड़ रहे हैं, लेकिन उनके पास हेल्थ इंश्योरेंस भी नहीं है। और यह सिर्फ ओरेकल की कहानी नहीं है। पिछले कुछ सालों में कॉर्पोरेट फील्ड में मास लेऑफ्स एक नॉर्मल चीज बन चुकी है। जनवरी 2026 में Amazon ने भी ग्लोबली 16,000 कॉर्पोरेट रोल्स कट करने का प्लान किया जिसमें लगभग 500 इंडियंस शामिल थे।
(02:14) आई गॉट फायर। टुडे माय एचआर कॉल्ड मी एंड सेड लाइक शशिधर टुडे इज योर लास्ट डे। आई स्पोक विथ हर बट नथिंग वर्क। एक टाइम था जब लोगों में बस इंजीनियरिंग करने का क्रेज हुआ करता था। अच्छा पैकेज, रिस्पेक्ट, फॉरेन ट्रिप्स और घर वाले प्राउडली बोलते थे मेरा बेटा आईटी में है। लेकिन आज वही आईटी जॉब वाले लोग Lindin पर ओपन टू वर्क लिख रहे हैं। रात के 3:00 बजे तक काम कर रहे हैं और कुछ लोग तो साइलेंटली बर्न आउट हो रहे हैं। यह वायरल वीडियो में एक रेपुटेड बैंक के मैनेजर के बिहेवियर को देखिए। किस तरीके से वह अपने एंप्लई को हैंडल कर रहे हैं। प्लस ही इज़
(02:48) सेइंग कि ही डजंट केयर अबाउट हिज फैमिली। अरे भाड़ में जाए तेरा फैमिली मेरा क्या होता है भाई? अगर बैंक ने नौकरी दिया काम करने के लिए फैमिली लेके घूमने के लिए दिया क्या? इसी तरह एक और HDFC बैंक की मीटिंग की वीडियो वायरल हुई थी जिसमें क्लियरली एक सीनियर एम्प्लॉय अपने को वर्कर्स को फटकार लगाते हुए दिखे थे। की सीमा 78 डिस्पैच 2020 से 21 के दौरान जब पेंडेमिक का टाइम था तब कंपनीज़ ने बहुत ही अग्रेसिवली हायरिंग स्टार्ट कर दी थी क्योंकि सब कुछ डिजिटल शिफ्ट हो रहा था। एप्स, [संगीत] वेबसाइट्स, क्लाउड, एआई सब डिमांड में आ गया था। कंपनीज़ ने सोचा जितने लोग हायर कर
(03:29) सकते हैं कर लो। [संगीत] लेकिन प्रॉब्लम तब शुरू हुई जब पेंडेमिक खत्म हुआ और धीरे-धीरे लाइफ नॉर्मल होने लगी। ग्रोथ स्लो होने लगी, प्रोजेक्ट्स कम होने लगे, क्लाइंट्स [संगीत] कम होने लगे। तब कंपनीज़ को रियलाइज हुआ कि उन्होंने जरूरत से ज्यादा लोग हायर कर लिए हैं और वहीं से लेऑ्स का सिलसिला शुरू हुआ जो आज तक चल रहा है। और सच थोड़ा हार्श लगेगा लेकिन इन कंपनीज़ के लिए एंप्लाइजज़ इमोशंस [संगीत] नहीं होते हैं। वो सिर्फ कॉस्ट होते हैं। जैसे ही प्रॉफिट कम होता है, सबसे इजी डिसीजन होता है लेआउट। सर, 1 मिनट। प्लीज। थैंक यू सर। नो
(04:00) आपको बात करनी है आपके नहीं सर हम सबके सामने बात करेंगे जब सबके सामने निकाल रहे हैं तो बात क्यों ना करें यस सर आई एम स्क्रीमिंग बिकॉज़ आई एम गोइंग मैड इसीलिए आज भी बड़ी-बड़ी कंपनीज बिना किसी वार्निंग के लोगों को निकाल देती है और अगर एक सबसे बड़ा फैक्टर निकल कर जो सामने आया है तो वो है [संगीत] आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पहले जो काम पांच लोग करते थे आज वही काम एक बंदा और एक एआई टूल [संगीत] कर लेता है तो कंपनीज़ क्या सोचती है जब सेम काम कम लोगों से हो रहा है तो ज्यादा लोग क्यों रखें और वहीं से स्टार्ट होता है जॉब कट्स ले ऑफ और रीस्ट्रक्चरिंग का
(04:30) साइकिल। कुछ टाइम पहले TCS ने भी अपने वर्क फोर्स से अराउंड 20,000 एंप्लाइजज़ कम करने का डिसीजन लिया जो कंपनी के हिस्ट्री का सबसे बड़े जॉब कट्स में से एक था। रीज़न क्या दिया गया कि क्लाइंट डिमांड शिफ्ट हो रही है और एआई लेड सर्विस डिलीवरी मॉडल्स आ रहे हैं। द बिग चैलेंजेस विथ ऑल ऑफ़ दीज़ न्यू टेक्नोलॉजीस इज व्हेन वर्क वर्क आर्टिफेक्ट एंड वर्क फ्लो [संगीत] चेंजेस। द मीन्स वी एस फर्म्स हैव टू चेंज हाउ वी वर्क। Microsoft ने भी 15,000 से ज्यादा जॉब्स एलिमिनेट की मल्टीपल फेसेस में और उसका रीजन भी यही बताया गया कि कंपनी एi
(05:05) इंफ्रास्ट्रक्चर और क्लाउड सर्विज में इन्वेस्ट कर रही है। और अगर एआई से रिलेटेड डाटा देखें [संगीत] तो एक रिसर्च के मुताबिक 96% इंडियन प्रोफेशनल्स एi टूल्स यूज करते हैं। लेकिन 68% को डर है कि उनके रोल्स अगले 5 साल में ऑटोमेट हो सकते हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक [संगीत] फोरम प्रेडिक्ट करता है कि अगले 5 साल में वर्कर्स की कोर स्किल्स का 44% चेंज हो जाएगा। TCS, Infosys [संगीत] और WPRO जैसे कंपनीज़ स्किल डेंसिटी पे फोकस कर रही हैं। जनरलिस्ट रोल्स श्रिंक हो रहे हैं और मिडिल मैनेजर्स के रोल रिडंडेंट बनते जा रहे हैं। और अगर काम की
(05:36) बात करें तो एक ब्लाइंड सर्वे [संगीत] 2025 के हिसाब से 72% इंडियन आईटी प्रोफेशनल्स हर हफ्ते लीगल लिमिट 48 घंटे से ज्यादा [संगीत] काम करते हैं और 25% रूटीनली 70 से ज्यादा घंटे काम करते हैं। [संगीत] 83% ने बर्न आउट फील किया। 68% को ऑफिस के बाद भी मैसेजेस [संगीत] का रिप्लाई करना पड़ता है। लिटरली आर स्लेव्स फॉर देम रिप्लेबल स्लेव्स। एक सर्वे ने ये एस्टिमेट किया कि लगभग 22 लाख आईटी प्रोफेशनल्स अपनी जॉब्स छोड़ सकते हैं और 57% वापस आईटी सेक्टर जॉइ ही नहीं करना चाहते। और अगर आपको लगता है कि यह बर्न आउट सिर्फ मेंटली फील हो रहा है
(06:12) तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। यह फिजिकली भी लोगों को उतना ही इंपैक्ट कर रहा है। कर्नाटका हेल्थ डिपार्टमेंट के डाटा के मुताबिक स्टेट में ऑर्गन ट्रांसप्लांट के लिए वेट कर रहे लोगों में से 20% आईटी प्रोफेशनल्स हैं। ऑफिशियल्स कहते हैं कि क्रॉनिक स्ट्रेस, हाइपरटेंशन, इर्रेगुलर स्लीप और एक्सटेंडेड [संगीत] सिंग उनके ऑर्गन्स को फेल कर रहे हैं। हैदराबाद के आईटी हब के एक स्टडी में 84% टेक वर्कर्स को लिवर डिजीज पाया गया। सेडेंटरी लाइफ स्टाइल और हाई स्ट्रेस की वजह से अगर कोई एम्प्लई अपनी कंपनी के लिए 70 80 घंटे काम कर रहा है तो यह उसके डेडिकेशन
(06:45) का प्रूफ नहीं है। इस बात का प्रूफ है कि उस पर्टिकुलर कंपनी के सिस्टम में कुछ तो प्रॉब्लमैटिक है। एक गवर्नमेंट डाटा ने टेक वर्कर्स के मेंटल स्टेट के लिए कुछ साइकोलॉजिकल थीम्स आइडेंटिफाइड की जैसे कि इमोशनल शॉक, प्रोफेशनल आइडेंटिटी का इरोजन, क्रॉनिक एंग्जायटी, सोशल विड्रॉल और पर्सव्ड ऑर्गेनाइजेशनल बिट्रेयल। यानी लोग सिर्फ थक नहीं रहे हैं बल्कि खुद पर अपने करियर और ऑर्गेनाइजेशन पर भरोसा भी खोते जा रहे हैं। ट्रू एंड टेल मी नो आई विल रिमूव एनी ऑफ़ द एरिया हु इज नॉट फिट फॉर मी। द रेिग्नेशन लो रिमार्क्स लो क्लियर का मेंशन छ नॉन
(07:17) प्रोडक्टिव फॉर लास्ट सिक्स मंथ्स। और सबसे गौर करने वाली बात यह है कि आईटी लीडर्स भी ओवरवर्क कल्चर को नॉर्मलाइज करने की कोशिश कर रहे हैं। Infosys को-फाउंडर नारायण मूर्ति ने दिसंबर 2024 में एक स्टेटमेंट दी कि एम्प्लाइज को 70 आवर वर्क हर हफ्ते करना [संगीत] चाहिए और इंडिया को इनोवेशन में नंबर वन बनाने के लिए मेहनत करनी चाहिए। इंडिया वर्क प्रोडक्टिविटी वन ऑफ़ द लोएस्ट इन द वर्ल्ड। माय रिक्वेस्ट इज [संगीत] दैट आवर यंगस्टर्स मस्ट से दिस इज माय कंट्री। आई वांट टू वर्क 70 आवर्स बी। इवन Ola के सीईओ भाेश अग्रवाल ने भी नारायण
(07:50) मूर्ति के 70 आवर वीक को सपोर्ट किया। इकोनॉमिक [संगीत] टाइम्स के इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि एक जनरेशन को तपस्या करनी पड़ेगी ताकि इंडिया दुनिया की सबसे [संगीत] बड़ी इकॉनमी बन सके। द यंगर जनरेशन टुडे आई फील वांट्स अ लिटिल बिट ऑफ व्हाट आई डोंट एग्री विथ दिस वर्क लाइफ बैलेंस कॉन्सेप्ट। यू नो बिकॉज़ इफ यू आर एन्जॉयंग योर वर्क। यू विल एक्चुअली फाइंड हैप्पीनेस इन लाइफ आल्सो एंड वर्क आल्सो एंड द बोथ विल बी इन हार्मोनी। मींस [संगीत] सीरियसली क्या अपनी पर्सनल लाइफ और मेंटल हेल्थ को खराब करके इंडिया को सबसे बड़ी इकॉनमी बनाया जा सकता है?
(08:18) [संगीत] हेल्थ एक्सपर्ट डॉक्टर सुधीर कुमार ने वार्निंग दी कि एक हफ्ते में 55 घंटे से ज्यादा काम करने से स्ट्रोक और हार्ट डिजीज का रिस्क बढ़ता है और हर साल 8 लाख से ज्यादा डेथ्स [संगीत] एक्सेसिव वर्किंग आवर्स से हो रही है। तो इन स्टडीज इट हैज़ बीन फाउंड दैट पीपल हु पुट इन मोर देन 55 आवर्स ऑफ़ वर्क पर वीक एज़ कंपेयर टू दोज़ हु पुट इन 35 टू 40 आवर्स। दे हैव ऑलमोस्ट 35% हायर रिस्क ऑफ स्ट्रोक। ये डिबेट्स दिखाते हैं कि लीडरशिप लेवल पर ही प्रोडक्टिविटी और मेंटल हेल्थ के बीच बैलेंस नहीं समझा जा रहा और इन स्टेटमेंट्स की वजह से कॉर्पोरेट मैनेजर्स
(08:50) अनरियलिस्टिक एक्सपेक्टेशन [संगीत] सेट कर देते हैं। जिस वजह से बर्न आउट और हेल्थ इश्यूज को फर्दर नॉर्मलाइज किया जा रहा है। इंसान दो वक्त की रोटी कमाने के लिए ऑफिस जाता है। अगर वो दो वक्त की रोटी सुकून से सुख चैन से [संगीत] अपने घर में बैठ के ना खा सके तो फिर वो पैसे कमाने का उस पैसे से सोफा और गद्दा खरीदने का क्या पॉइंट है? विजुअल कैपिटलिस्ट के डाटा के मुताबिक एशिया के कुछ कंट्रीज दुनिया के सबसे हार्ड वर्किंग हैं। जैसे भूटान 54.
(09:14) 5 आवर्स पर वीक, सूडान 50.8, यूएई 48.4 और इंडिया 45.8 आवर्स पर वीक। इसके कंपैरिजन में वेस्टर्न यूरोप और नॉर्दर्न यूरोप में वर्क वीक्स 30 घंटे से भी कम है। जैसे नीदरलैंड्स 26.8 आवर्स, नॉर्वे 27.1, डेनमार्क 28.8 आवर्स, यूनाइटेड स्टेट्स का एवरेज 36 घंटे है। यानी डेवलप्ड इकॉनमीज़ ऑटोमेशन, प्रोडक्टिविटी और स्ट्रांग लेबर प्रोटेक्शंस की वजह से कम घंटे काम करके भी हाई लिविंग स्टैंडर्ड्स [संगीत] मेंटेन करती है। और इंडिया में आप ज्यादा घंटे काम करवा लो। बट [संगीत] सैलरी कितनी मिलती है आपको पता ही है। गुस्सा तब आती है जब अभी ये लड़का देखो
(09:51) इरिटेट हो गया है। अभी ये ऑन कैमरा ही बेचारा कुछ मैगीवगी बना के खा रहा है। ठीक है। क्या फायदा है इसकी मैनेजर की जॉब? क्या करेगा 10 लाख के पैकेज का जब मैगी बना के ही खाना है इसको। ठीक है? अब सुबह 9:00 बजे से मीटिंग चला के रखी हुई है इन लेकिन मजाल है कोई बंदा हिल जाए। यह जो अजंपशंस है कि 70 या 90 घंटे काम करने से कंपनी ग्रो करेगी। असल में यह डाटा से बिल्कुल कंट्राडिक्ट होती है। स्टडीज दिखाती हैं कि 50 घंटे से ज्यादा काम करने के बाद प्रोडक्टिविटी पर आवर ड्रॉप हो जाती है। मिस्टेक्स के चांसेस बढ़ जाते हैं और क्रिएटिविटी गिर जाती है।
(10:26) यूरोप और यूएस जहां वर्किंग आवर्स कम है वहां पर कैपिटा प्रोडक्टिविटी हाई है और एंप्लाइज की वेल बीइंग भी बेटर है। मतलब लॉन्ग आवर्स से ज्यादा वैल्यू नहीं निकलती। क्वालिटी और इनोवेशन तभी पॉसिबल है जब एंप्लाइजज़ रेस्टेड हो और मोटिवेटेड हो। देखो यह वेकअप कॉल है हम सबके लिए। कंपनीज़ को अपने एंप्लाइजज़ को नंबर्स की तरह ट्रीट करना बंद करना होगा। लीडरशिप को समझना होगा कि सक्सेस का मतलब सिर्फ रेवेन्यू नहीं बल्कि हेल्दी, क्रिएटिव और मोटिवेटेड वर्क फोर्स है। और हम एज एंप्लाइजज़ अपनी बाउंड्रीज ड्रॉ कर सकते हैं। अब स्किल कर सकते हैं और अपनी मेंटल
(10:58) हेल्थ को प्रायोरिटी दे सकते हैं। आखिर में कॉर्पोरेट कल्चर को टॉक्सिक [संगीत] कहना या जॉब छोड़ देना एक इंडिविजुअल सॉल्यूशन हो सकता है। लेकिन असल में सिस्टम लेवल पर काफी बदलाव की जरूरत है। देखो कॉर्पोरेट [संगीत] में काम करना गलत नहीं है। लेकिन अपनी लाइफ उसके नाम कर देना वो गलत है। अगर आपकी भी कोई कॉर्पोरेट लाइफ की एक्सपीरियंस है चाहे अच्छी या बुरी तो आप कमेंट सेक्शन में शेयर कर सकते हैं। और भी कुछ इंपॉर्टेंट टॉपिक्स मुझे सजेस्ट कर सकते हैं जिस पर आप चाहते हैं कि मैं वीडियो बनाऊं। मिलती हूं बहुत जल्द नेक्स्ट इंपॉर्टेंट टॉपिक
(11:26) के साथ। थैंक यू सो मच।
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