Tuesday, August 4, 2026

Indians Dying Because Of Vegetarian Diet? | Non-Veg Vs Veg | Protein Diet | StudyIQ

Indians Dying Because Of Vegetarian Diet? | Non-Veg Vs Veg | Protein Diet | StudyIQ

Author Name:StudyIQ IAS

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@StudyIQEducationLtd

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=kU8ZBxTiJE8



Transcript:
(00:01) दोस्तों इस वर्ल्ड मैप को ध्यान से देखिए। इसमें हर देश में वेजिटेरियन लोगों का परसेंटेज दिखाया गया है। अमेरिका में करीब 5%, ब्रिटेन में करीब 8 से 10%, जर्मनी में करीब 10%, चाइना, जापान, ब्राजील और रशिया इन सब में ये नंबर 5% से भी कम है। दुनिया के ज्यादातर देशों में वेजिटेरियन लोग एक छोटी सी माइनॉरिटी है। अब देखिए इंडिया का नंबर देखते हैं। अलग-अलग सर्वेज़ के मुताबिक इंडिया में करीब 30 से 39% लोग वेजिटेरियन हैं। यानी दुनिया के हर दूसरे देश से कई गुना ज्यादा। और क्योंकि हमारी आबादी 140 करोड़ है। इसका मतलब यह है कि
(00:33) दुनिया के लगभग सारे वेजिटेरियन लोग इंडिया में ही रहते हैं। हम दुनिया के सबसे बड़े वेजिटेरियन देशों में से एक हैं। और हमें बचपन से यही सिखाया जाता है कि सबसे शुद्ध, सबसे हेल्दी और सबसे सात्विक खाना एक्चुअली वेजिटेरियन खाना है। अब तीन और नंबर सुनिए इसके साथ में कि 2025 में 20 स्टडीज हुई और 18,750 लोगों का डाटा इकट्ठा किया गया और उसके ऊपर मेटा एनालिसिस हुआ। उसका नतीजा यह था कि इंडिया में करीब 51% लोगों में विटामिन B12 की कमी है और वेजिटेरियन लोगों में यह करीब 65% तक होती है। जो प्रेग्नेंट महिलाएं हैं उनमें यह परसेंटेज 67% तक
(01:08) पहुंच जाता है। दूसरा सुनिए कि इंडिया दुनिया के सबसे ज्यादा धूप वाला यानी कि सबसे ज्यादा सनलाइट वाले देशों में से एक है। राजस्थान के जोधपुर को तो सन सिटी तक कहते हैं जहां साल भर तेज धूप रहती है और फिर भी अलग-अलग स्टडीज के मुताबिक इंडिया में विटामिन डी की कमी 70 से 90% लोगों के अंदर है। तीसरा सुनिए कि आईसीआरआईआर की एक 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक जीरो से 10 साल के बच्चों में लगभग आधे में रिकेट्स के लक्षण मिले और 80 से 90% बूढ़े लोग ऑस्टियोपरोसिस के खतरे में हैं। और यह सवाल बहुत लोगों को चुभेगा भी। अगर हमारा खाना दुनिया के सबसे शुद्ध खाने में से एक
(01:46) है और हमारे पास दुनिया की सबसे अच्छी धूप भी है तो हमारी नर्व्स कमजोर क्यों हो रही है और हमारी हड्डियां इतनी जल्दी क्यों टूट रही है? क्या वो चीज जिस पर हमें सबसे ज्यादा गर्व है असल में हमें अंदर से खोखला कर रही है? तो चलिए पूरी सच्चाई समझते हैं आज इस वीडियो के माध्यम से। पहले B12 से शुरू करते हैं। विटामिन B12 एक ऐसा विटामिन है जिसका एक ही काम नहीं है। उसका सबसे जरूरी काम है कि आपकी नर्व्स को सुरक्षित रखना। ऐसे समझ लीजिए कि आपके शरीर में जितनी भी नर्व्स हैं या नसे हैं उनके ऊपर एक इंसुलेशन की परत होती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे बिजली के तार के
(02:21) ऊपर प्लास्टिक की आपने लेयर देखी होगी। उस परत का नाम है माइलीन शीत। इसका काम है कि दिमाग का सिग्नल बिना लीक हुए पूरी स्पीड से सही जगह पर पहुंच जाए। और इस मन शीत के बनाने और ठीक रखने के लिए शरीर को B12 की बहुत ज्यादा जरूरत होती है। अब जब B12 कम हो जाता है तो यह इंसुलेशन धीरे-धीरे घिसने लगती है और जब तार का कवर घिस जाए तो सिग्नल गड़बड़ होने लगता है और इसका नतीजा क्या दिखता है? वो सब जो आज लाखों इंडियंस को हो रहा है और वो इसे हम थकान समझकर छोड़ देते हैं। हाथ और पैरों में आपके झुनझुनाहट होती है। वो पिंस और नीडल्स की तरह जो आपको एहसास होता है कि
(02:55) पिन चुभ रही है, सुइयां चुभ रही है। उंगलियों आपकी जो है वह सुन हो जाती है। पैर में आपके जलन होने लगती है। चलते वक्त आपका बैलेंस थोड़ा डगमगाने लगता है। याददाश्त कमजोर होने लगती है। बात करते-करते आप शब्द भूल जाते हैं। दिमाग पर एक फ़ग सी छा जाती है या धुंधलापन छा जाता है। चिड़चिड़ापन होने लगता है और मूड भी बिगड़ने लगता है। और अब वह आंकड़ा सुनिए जो सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है। नॉर्थ इंडिया की एक टर्शरी केयर हॉस्पिटल की स्टडी में बी12 की कमी के 220 मरीज देखे गए। उनमें से 86% से ज्यादा लोग प्योर वेजिटेरियन थे। और उनमें सबसे आम लक्षण
(03:29) क्या था कि 98% से ज्यादा लोगों को झुनझुनापन या फिर या उनकी जो है कमकपापन या फिर सूनापन उनके हाथ पैरों में होता था। करीब 95% को सर में भारीपन या दर्द होता था और उनमें से आधे से ज्यादा में नर्व की जांच में पक्का नुकसान मिल चुका था। अब सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? और यहां वो बात आती है जो शायद सबसे ज्यादा अनकंफर्टेबल भी है कि B12 किसी भी प्लांट बेस्ड फूड के अंदर नहीं होता है। बिल्कुल 0% होता है। ना यह दाल में होता है, ना सब्जी में होता है, ना चावल में होता है और ना ही रोटी में और ना ही फलों में और ना ही ड्राई फ्रूट्स में। B12 असल
(04:05) में कुछ खास बैक्टीरिया बनाते हैं और वो जानवर के शरीर में ही जमा होता है। इसलिए यह सिर्फ मांस, मछली, अंडा, दूध और दूध से बनी चीजों में आपको थोड़ा बहुत मिल सकता है। यानी कि एक प्योर वेजिटेरियन इंडियन के पास में बी12 का सिर्फ एक ही जरिया बचता है मिल्क और मिल्क प्रोडक्ट्स। और यहीं एक्चुअली गड़बड़ शुरू हो जाती है क्योंकि बीट की जरूरत पूरी करने के लिए रोज अच्छी मात्रा में दूध, दही या पनीर चाहिए और बहुत से घरों में वह मात्रा पूरी नहीं हो पाती है। कभी पैसे की वजह से, कभी आदत की वजह से और कभी इसलिए कि चाय में पड़ने वाला थोड़ा सा दूध हमें दूध पी लिया
(04:38) लग जाता है। और अब वो मैं आपको बात बताऊंगा जो इस पूरे वीडियो की सबसे खतरनाक बात भी है और जिससे ज्यादातर लोग और कई बार डॉक्टर भी मिस कर जाते हैं। बी12 की कमी से दो चीजें होती है। एक खून की कमी यानी कि एनीमिया और दूसरा आपकी नर्व्स को नुकसान। अब जरा ध्यान से सुनिए। एक दूसरा विटामिन होता है जिसे हम कहते हैं फोलिक एसिड यानी कि B9। यह दाल, हरी सब्जी और अनाज में खूब मिलता है और इंडिया में आटा जो है और नमक जैसी चीजों में भी फर्टिफाई किया जाता है ताकि गर्भवती महिलाओं के बच्चों को जन्म दोष ना हो या वो बच्चे जो है वो प्रॉब्लमेटिक तरीके से पैदा ना हो।
(05:11) यह अपने आप में एक अच्छी पॉलिसी है गवर्नमेंट की। लेकिन इसका एक छुपा हुआ साइड इफेक्ट भी है। जब शरीर में फोलिक एसिड काफी बढ़ जाता है तो बी12 की कमी से होने वाले खून के लक्षण को वो ढक देता है। यानी आपकी ब्लड रिपोर्ट बिल्कुल नॉर्मल आ जाती है। आपको लगता है कि सब कुछ ठीक चल रहा है। डॉक्टर को भी लगता है कि सब ठीक है। लेकिन फोलिक एसिड आपकी नर्व्स को बचा नहीं सकता है। यानी ऊपर से सब कुछ नॉर्मल दिखता रहता है और अंदर ही अंदर आपकी नर्व्स की इंसुलेशन घिस रही है। चेतावनी या इमरजेंसी का अलार्म बजना चाहिए था। लेकिन वह बज नहीं पाता है क्योंकि फोलिक
(05:41) एसिड फर्टिफिकेशन से आपको वह छुप जा रही है कहानी। और जब तक आपको सिम्टम्स इतने बढ़ जाते हैं कि आदमी डॉक्टर के पास जाता है तो उसके हाथ पैरों में झुनझुनाहट, सूनापन, चलने में दिक्कत तब तक बहुत नुकसान और परमानेंट नुकसान हो चुका होता है। क्योंकि नर्व्स को नुकसान एक लिमिट के बाद में वापस रिवर्स नहीं किया जा सकता है। यही वजह है कि इसे साइलेंट डेफिशिएंसी कहते भी हैं। यह चुपचाप काम करती है। धीरे-धीरे आपके शरीर को अंदर से वो खाने लगती है। अब यहां एक ईमानदारी से बात करना जरूरी है। वरना ये वीडियो सिर्फ एक तरफ की एक डायरेक्शन में चला जाएगा। मैं यह नहीं
(06:12) कह रहा हूं कि वेजिटेरियन होना गलत है। यह बिल्कुल गलत बात होगी। दुनिया भर की रिसर्च कहती है कि वेजिटेरियन डाइट के बड़े फायदे भी हैं। दिल की बीमारी उससे कम होती है। ब्लड प्रेशर उससे बेहतर रहता है और कुछ कैंसर्स का खतरा भी कम हो जाता है वेजिटेरियन डाइट से। और एक ठीक से प्लांट वेजिटेरियन डाइट पूरी तरह से हेल्दी भी हो सकती है। और इसका सबूत खुद इंडिया से आता है। एक इंडियन स्टडी ने दिखाया कि जिन यंग वेजिटेरियंस ने रोज ठीक मात्रा में दूध पिया उनका बी12 लेवल साफ तरीके से इंप्रूव होता नजर आया। तो असली विलन वेजिटेरियनिज्म नहीं है। असली विलेन है
(06:43) बिना जानकारी वाला वेजिटेरियनिज्म। वो सोच कि मैं वेजिटेरियन हूं। मतलब मैं ऑटोमेटिकली हेल्दी हूं। और इसलिए मुझे कुछ और सोचने की जरूरत नहीं है। यह सोच एक्चुअली गलत है। और यही सोच आज कई करोड़ों लोगों की नर्व्स को धीरे-धीरे खा रही है। अब इस कहानी का दूसरा हिस्सा देखिए जो सनलाइट वाला पैराडॉक्स है क्योंकि बी12 सिर्फ आधी कहानी है। दूसरा आधी हमारी हड्डियों से जुड़ा कहानी है वो है विटामिन डी। विटामिन डी के बिना हमारा शरीर कैल्शियम को अब्सॉर्ब नहीं कर सकता है। आप कितना भी दूध पी लीजिए अगर विटामिन डी नहीं है तो वो कैल्शियम हड्डियों तक
(07:15) पहुंचेगा ही नहीं और नतीजा बच्चों में रिकेट्स, बड़ों में कमजोरी और जल्दी टूटने वाली हड्डियां और ऑस्टियोपरोसिस से और विटामिन डी हमें सबसे ज्यादा मिलता है एक्चुअली धूप से। तो सवाल यह है कि इंडिया में तो साल भर धूप रहती है। फिर भी 70 से 90% लोगों में इसकी कमी कैसे आ जाती है? इसके चार जवाब हैं और चारों एक्चुअली काफी दिलचस्प भी हैं। पहला हम धूप से एक्चुअली दूर भागते हैं। इंडिया की धूप इतनी तेज और गर्म है कि हम उसे एंजॉय नहीं करते हैं। एक्चुअली हम उससे बचकर भागते हैं। हम छाया ढूंढते हैं। एसी में बैठे रहते हैं। दोपहर
(07:44) में बाहर निकलना अवॉइड करते हैं। जबकि यूरोप के लोग धूप निकलते ही पार्क में लेट जाते हैं जाकर। वहां धूप एक लग्जरी है। हमारे यहां पर एक प्रॉब्लम है। दूसरा हमारे कपड़े। हमारे यहां कल्चरल और धार्मिक कारणों से शरीर का बड़ा हिस्सा ढका रहता है और विटामिन डी बनने के लिए स्किन पर धूप सीधी बढ़ना बहुत जरूरी है। इसलिए यह कमी मर्दों से भी ज्यादा औरतों के अंदर मिलती है। तीसरा हमारी स्किन। हमारी स्किन के अंदर मेलेनिन होता है जो एक नेचुरल सनस्क्रीन होता है। यह हम तेज धूप से हम लोगों को बचाता है जो एक तरह का फायदा भी है। लेकिन उसका एक नुकसान भी
(08:15) होता है कि गहरी स्किन को उतना ही विटामिन डी बनने के लिए गोरी स्किन से ज्यादा देर धूप में रहना पड़ता है। और चौथा हमारे यहां का पोल्यूशन। विटामिन डी बनने के लिए एक खास किस्म की किरण चाहिए या रेज चाहिए जिसे हम कहते हैं यूवीबी और हमारे शहरों की जो गंदी हवा है उन किरणों को काफी हद तक वो रोक देती है यानी कि आप धूप में खड़े हो फिर भी वो धूप आपके लिए अधूरी है और अब इन दोनों को जोड़कर देखिए कम विटामिन डी मतलब कैल्शियम अब्सॉर्प्शन कम होगा और कम बी12 मतलब आपकी नर्व्स कमजोर है। एक तरफ हड्डियां आपकी कमजोर हो रही है। दूसरी तरफ आपकी नर्व्स भी कमजोर हो
(08:48) रही है। और इसका असर आपको कई सारे डाटा बता देंगे। एक मल्टीसेंट्रिक स्टडी के मुताबिक 5 से 18 साल के सिर्फ 42% इंडियन बच्चों में विटामिन डी ठीक पाया गया। यानी कि हर पांच में से तीन बच्चे अपनी हड्डियों की नींव को कमजोर बना रहे हैं। वो भी इतनी कम उम्र में जब हड्डियां पूरी जिंदगी के लिए मजबूत बनी रही हो सकती थी। लेकिन वो यहां से कमजोर होना शुरू हो गई है। तो असली सवाल यह है कि आखिर हमारे यहां ऐसा क्यों हो रहा है और हम यहां तक आखिर कैसे पहुंचे? अब मेरा मानना यह है कि इसकी जड़ एक गहरी सोच में भी छुपी है। हमने अपने खाने को हमेशा से शुद्धता के
(09:21) पैमाने पर नापा कि क्या शुद्ध है, क्या सात्विक है और क्या साफ है। हमने उसे कभी न्यूट्रिशन के पैमाने पर नहीं नापा। उसमें प्रोटीन कितना है, बी12 है या नहीं, आयरन की मात्रा है या नहीं। और एक दौर था जब काम भी चल जाता था क्योंकि तब लोग खेतों में काम करते थे। दिन भर धूप में रहते थे और घर में गाय भैंस होती थी जिसकी वजह से वो ताजा दूध, दही और घी खूब खा लेते थे। लेकिन फिर हम गांव से शहर आ गए। खेत से ऑफिस में बैठ गए। धूप से एसी में आ गए और ताजे दूध के पैकेट और चाय वाले दूध पर हम शिफ्ट हो गए। हमारी थाली वहीं रुक गई। हमारी प्लेट वहीं कंट्रोल हो गई। लेकिन
(09:54) हमारी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। और वही पुरानी जो प्लेट जिसमें हम खाना खाते थे, जो हम खाने का कंपोजशन था इस नई जिंदगी के लिए वो एक्चुअली कम पड़ने लगी। और दुनिया ने इस प्रॉब्लम को ठीक किया। सिर्फ हम ही लोगों ने इससे चूक हो गई। कई देशों में दूध, सीरियल और आटे में B12 और विटामिन डी को फर्टिफाई किया जाता है। यानी वहां आम आदमी को सोचना ही नहीं पड़ेगा क्योंकि वो उसके रोज के खाने में पहले से ही मिला हुआ है। हमारे यहां वो अभी शुरुआती स्तर पर भी है। अभी जस्ट शुरुआत हुई है पॉलिसी लेवल पर। तो ऐसी सिचुएशन में हमें क्या करना
(10:24) चाहिए? तीन चीजें हैं और वो सबसे आसान भी है जो आप कर सकते हैं। पहला एक टेस्ट करवाइए। अगर आप 25 साल से ऊपर हैं, खासकर अगर आप वेजिटेरियन हैं, तो साल में एक बार B12 और विटामिन डी की जांच करवाना समझदारी हो सकती है। और अगर आपके हाथ में कंपन होती है, सूनापन रहता है, याददाश्त की दिक्कत है तो तुरंत आपको यह करवा लेना चाहिए। क्योंकि जैसे हमने देखा कि जो नॉर्मल ब्लड रिपोर्ट है, वह कुछ खास बताती नहीं है। दूसरा आप अपने खाने को सुधारिए। वेजिटेरियन है तो रोज ठीक मात्रा में दूध, दही या पनीर लीजिए। चाय वाला दूध आपके लिए काफी नहीं है। अंडा खा सकते हैं तो वह B12
(10:58) का अच्छा जरिया भी है और अगर जरूरत हो तो डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लेने में भी कोई शर्म की बात नहीं है। यह एक तरह से आपकी कमी को पूरी कर देगा। यह कोई कमजोरी वाली बात नहीं है। तीसरा धूप लीजिए सही तरीके से। सुबह से शाम की हल्की धूप में हाथ पैर खुले रखकर कुछ मिनट रोजाना आपको बैठना चाहिए। खिड़की के कांच से पीछे बैठने से काम नहीं चलेगा क्योंकि कांच यूवीबी किरणों को रोक देता है। तो चलिए पूरी बात को एक जगह समेट कर रख देते हैं ताकि आपके लिए चीजें आसान हो जाए। हम दुनिया के सबसे बड़े वेजिटेरियन देश हैं और दुनिया के सबसे ज्यादा धूप वाले देश भी
(11:27) हैं और फिर भी हमारे देश में आधे से ज्यादा लोगों को बी12 की कमी रहती है और 70% से ज्यादा लोगों में विटामिन डी की भी कमी है और यह एक तरह का कंट्राडिक्शन है लेकिन यह इत्तेफाक नहीं है क्योंकि हमने एक परंपरा को तो संभाल कर रख रखा है लेकिन उस परंपरा के साथ जो जिंदगी चलती है उसे हमने छोड़ दिया है। हमने शुद्धता को तो पकड़े रखा लेकिन न्यूट्रिशन को हमने छोड़ दिया और नतीजा यह है कि एक पूरी पीढ़ी कपकपाने से और थकान से ग्रसित है। वो थकान में रहती है। उनकी हड्डियां कमजोर हो रही है। वो स्ट्रेस में रहती है। उन्हें भूल पड़ने लगी है। इसलिए इस वीडियो का मकसद
(11:58) आपकी खाने को बदलना नहीं है। मकसद सिर्फ यह है कि आप उसे समझदारी से चुने क्योंकि कोई भी खाना इसलिए हेल्दी नहीं हो जाता है कि वह शुद्ध है या पुराना है या हमारी संस्कृति का हिस्सा है। खाना तभी हेल्दी होता है जब उसमें वह सब कुछ हो जो आपके शरीर को जिसकी जरूरत है। और अगर उसमें कुछ छूट रह जाती है तो आपका शरीर आपसे झगड़ा नहीं करेगा। वह बस चुपचाप अपना काम कर देगा और वह आपको बिल्कुल अंदर से खोखला बना सकता है। देखिए यह वीडियो सिर्फ जानकारी के लिए है। किसी भी टेस्ट, दवाई या सप्लीमेंट लेने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें। माय नेम इज मंगल सिंह।
(12:32) आईटीच एंथ्रोपोलॉजिट स्टडी आईक्यू। आप मेरा कोर्स ज्वाइन कर सकते हैं और आप मुझसे जुड़ भी सकते हैं इन क्यूआर कोड्स को स्कैन करके tlegram चैनल पे और Instagram हैंडल पे। इनका नाम है एंथ्रोलॉजिकल। थैंक यू सो मच। ये वीडियो आपको कैसी लगी? प्लीज कमेंट करके बताएं। स्टडी आईक्यू आईएस आपका सिलेक्शन [संगीत] हमारा मिशन

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