चीन, जापान और कोरिया में संस्कृत? Sanskrit Beyond India | Hyper Quest Ft. Dr. Shashi Bala
Author Name:Hyper Quest
Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@HyperQuest
Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=uXdkAvaYmDA
Title: चीन, जापान और कोरिया में संस्कृत? Sanskrit Beyond India | Hyper Quest Ft. Dr. Shashi Bala
Author Name: Hyper Quest
Description: Sanskrit at the Great Wall of China? Saraswati worshipped in Japan? A Buddhist king who takes the Hindu title Rama?
Then the harder questions: was crossing the sea really a sin for Hindus, and is that why Buddhism reached everywhere? But then why would other nations adopt Hindu gods?
How did India’s knowledge travel this far, and why does the written proof survive in other countries, not here? Dr. Shashi Bala, Dean of the Centre for Indology at Bharatiya Vidya Bhavan, has spent decades tracing these links across Asia.
Watch the conversation to discover what India forgot, and who remembered.
------------------------------------------------------------
About The Guests:
Awarded Mongolia’s Order of the Polar Star, one of its highest civilian honours, Dr. Shashi Bala is an Indologist, Dean of the Centre for Indology at Bharatiya Vidya Bhavan. For over three decades she has traced India’s cultural links across Asia through Sanskrit, Buddhism and art, authoring more than 20 books and co-editing a nine-volume English–Sanskrit Dictionary.
-------------------------------------------------------
🕉️ Not sure where to start with Sanātan Dharma?
📜 Learn step by step, from basics!
👉🏼 Start Today: start.shikshanam.in
🎉 Special 20% Discount for Hyper Quest Subscribers, Use Code "HYPER20"
📱 For any Query, WhatsApp: +91-9910032165
Download Shikshanam App (Android): https://bit.ly/3LehPc5
-------------------------------------------------------
Chapters
00:00:00 How far did Sanskrit travel?
00:02:59 East still treats India as Guru?
00:05:35 Why India never wrote history
00:08:48 A Korean queen from Ayodhya?
00:11:06 Who took Sanskrit to China?
00:12:55 Did only Buddhism leave India?
00:15:11 Was sea travel a sin for Hindus?
00:22:41 Did Hindus go abroad too?
00:25:51 Gayatri mantra in China
00:30:35 Ramayana Played by Muslims!
00:32:59 Why is Hanuman white in Indonesia?
00:35:25 Prana pratishtha of a constitution
00:38:27 Sanskrit on the Great Wall of China
00:39:32 Why China and Japan Adopted Indian gods?
00:46:01 Did India really never attack anyone?
00:47:32 Why does Saraswati look different in Japan?
00:51:51 Why Mongolia honoured Dr. Shashi Bala Ji
00:56:10 Do Chinese still love India?
00:59:18 Why would they steal Gangajal?
01:02:19 Is their Buddhism just fashion?
01:06:15 Was Sanskrit the Global Language then?
01:09:59 Sanskrit not Mother of all languages?
01:12:42 Is English hiding Sanskrit?
01:14:40 Why should kids learn Sanskrit?
01:22:12 Does India need Sanskrit today?
01:27:30 What has India really forgotten?
—--------------
𝗪𝗮𝘁𝗰𝗵 𝗼𝘂𝗿 𝗠𝗼𝘀𝘁 𝗣𝗼𝗽𝘂𝗹𝗮𝗿 Podcasts:
🎥On Ancient Indian Mathematics with Prof C K Raju: • Did Calculus Reach Europe From India? | Hy...
🎥On Latest Ayurveda Research with Prof Bhushan Patwardhan: • Is Healing Possible Without Medicines? | L...
🎥On Ancient Indian Panchanga with Ashish Naredi Ji: • Hindu New Year Reveals Why India Fell Behi...
🎥On Indian Varna and Caste with Dr. Kundan SIngh: • The Real Reason why Brahmins are Targeted!...
🎥 On Sikhism and Its origin with Prof Jagbir Singh: • The Reality of Sikhism Most People Don’t K...
_________________________________
🚀 Want even more?
😁 Click on the Join button to get:
⏰ Priority Reply!
🎥 Member Only Exclusive Content!
_________________________________
About the host
Vishal is an IIT graduate who spends his time on the questions this channel is about: consciousness, the cosmos, and how a person should actually live. He hosts Hyper Quest, which investigates those questions. He also founded Shikshanam, which teaches the wisdom traditions in real depth to children and families, and The Prapancha, a studio building fictional worlds from Indian mythology.
👉 Invite him to speak: contact@hyperquest.in
----------------------------------------
CONNECT WITH US:
🔹 Instagram: / hyperquest
🔹 Facebook: / hyperquest
🔹 Twitter: / vishalonquest
----------------------------------------
धन्यवाद, आपके बहुमूल्य समय के लिए। 🙏🏼
Hashtags
#sanskrit #hinduism #buddhism #sanatandharma #podcast #hyperquest #indianhistory
Transcript:
(00:00) चीन की ग्रेट वॉल पर संस्कृत का मंत्र लिखा गया आज तक विद्यमान है। नाम जो है चीन का वो भारत ने दिया है। बौद्ध धन भारत से बाहर गया। लेकिन वैदिक परंपरा में लंबी यात्राओं को निषेध बताया गया है कि हम को ऐसी यात्रा बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। थाईलैंड बौद्ध देश है या हिंदू देश है? बौद्ध देश है? परंतु वहां पे जो भी राजा बनता है राम की उपाधि धारण करता है। ब्रह्मा जी की पूजा भारत में नहीं है जितनी वहां पर है। कोरिया के राजकुमार ने अयोध्या की राजकुमारी से विवाह किया। कुछ उनके यहां पत्थर मिले जो कि कोरिया के नहीं थे। मंगोलिया, साइबेरिया आदि जाएंगे,
(00:34) तो आप देखेंगे लोगों का जो जूता होता है, आगे से उठा हुआ होता था ताकि जूते की नोक जो है वो धरती मां को स्पर्श ना करे। इंडोनेशिया के दो द्वीप जावा और बाली। जावा की जो आकार है वो यव के समान है। बाली का बाली के समान है। कटाह द्वीप है क्योंकि उसका जो आकार है वो कढ़ाई के समान है। हमारे ऋषियों ने उनको देखा कैसे? आपने इंडोनेशिया का नाम लिया और हम लोग सुनते हैं कि वो 99% मुस्लिम्स रहते हैं वहां पे। इंडोनेशिया में व्यक्ति मुसलमान भी बन जाता है तो इतने सुंदर सुंदर संस्कृत के नाम रखते हैं सुपार्ड। वहां पे जब वो रामलीला करते हैं इतना बड़ा मंच होता है
(01:06) कि 200 300 कलाकार एक साथ आ सकते हैं। परंतु करने वाले तो सब मुसलमान होते हैं। हनुमान जी वहां पे भूरे नहीं होते। वहां सफेद हनुमान जी होते हैं। क्योंकि जब करने वाले सब मुसलमान देवी देवता तो पहले भी रहे होंगे चाइना जापान में। तो दूसरे के देवी देवता को अपनाना ये किस तरह की फिनोमिना है? बिलगेरिया में आप जाइए। कितने बड़ी संख्या में बिलगेरियंस हैं जो आश्रमों से जुड़े हुए हैं। पूजाएं करते हैं, हवन करते हैं, सब कुछ करते हैं। अद्भुत संसार है। वो देश जो गंगाजल की चोरी करता है। क्या बात है। आचार्य जी प्रणाम।
(01:55) नमस्कार। बहुत आनंद हो रहा है आपको हाइपरस्ट पर देखकर। बहुत ही अच्छा लग रहा है। बहुत दिनों से हम लोग चाहते थे कि आपके साथ बैठकर एक गहरी चर्चा की जाए। क्योंकि पिछले कुछ महीनों से मैं आपकी रील्स देख रहा था Instagram पे और बहुत अद्भुत लगता था जब आप बताती थी कि कैसे चीन में, मंगोलिया में, कोरिया में, जापान में और ना केवल ईस्ट एशिया में बल्कि आप ईरान में भी आप वहां पर तुर्की में भी जो सनातन धर्म के प्रमाण मिलते हैं, बौद्ध धर्म के प्रमाण मिलते हैं भारतीय परंपरा के और विशेषकर जो संस्कृत के मंत्रों के प्रमाण मिलते हैं। उनको मैं देखकर दंग रह जाता था।
(02:35) और जब सुनता था कि चीन में भी गायत्री मंत्र मिलता है। जापान में भी पिंडदान होता है। अभी पितृ पक्ष गया। जी तो मैंने आपके कार्यों को देखने का मतलब मन बनाया कि आप हैं कौन? जी। तो फिर देखा कि दर्जनों पुस्तकें आपने लिखी हैं। रिसर्च पेपर है। मतलब आपकी तपस्या ही 50 वर्षों की है कम से कम। जी। तो हमने टीम से अनुरोध किया कि आपके साथ एक चर्चा हो। जी। तो हम समझने का प्रयास करें कि भारत की जो विरासत है जी ये कैसे हम दर्शकों तक और गहराई से पहुंचा पाए। आपके कार्यों को देखा तो मुझे जो लगा मैं आपको बता रहा हूं। आप बताइएगा सही है कि नहीं है।
(03:13) कि जो हमारा प्राचीन भारत था वो एक गुरु की तरह था जो समय के साथ अपनी विद्या को भूलता गया। लेकिन उन उस गुरु के छात्रों ने उस विद्या को बचाए रखे और आज भारत उन छात्रों से वापस उस विद्या को ले रहा है। क्या मैं सही हूं इसको कहने में? वास्तव में था ही गुरु और आज भी यह देश भारत को गुरु मानते हैं। केवल अंतर इतना है कि भारत को नहीं पता कि वो किन कारणों से गुरु मानते हैं और गुरु बने तो कैसे बने। भारत ने देखिए कोई भी गुरु बनता है तो वह कुछ ना कुछ देता है। यह ऋषि मुनियों की धरती है। गुरुओं और आचार्यों की धरती है। इसके पास जो कुछ था इसने बिना किसी
(03:53) कॉपीराइट के बिना किसी पेटेंट के विश्व कल्याण के लिए दे दिया। हमारे जो धर्माचार्य थे वो किस प्रकार से कितने प्रकार के संकटों का सामना करते हुए कहीं मरुभूमियों को पार करते हैं तो कहीं विराट समुद्रों को पार करते हैं। कितने लोगों की इसमें जीवन लीला समाप्त हो गई? हमारे पास कुछ लिखा हुआ नहीं है। और हमारे किस गुरु ने पूरे विश्व में किस देश को क्या दिया हमारे पास कोई लिखित प्रमाण नहीं है। जो हमें लिखित प्रमाण मिलते हैं वो सारे दूसरे देशों से मिलते हैं। और वो देश आज भी भारत को गुरु मानते हैं। भारत गुरु है। परंतु भारत की अनभिज्ञता के कारण अज्ञान
(04:40) के कारण वो सब चीजें वो ज्ञान वो पीछे छूटता चला जा रहा है। तो बहुत ढेर सारी धाराएं जिसमें हम जा सकते हैं और मेरे मन में तो अभी बहुत ढेर सारे प्रश्न है। जैसे कि आपने बोला कि हम तो पेटेंट नहीं लेते थे। जो ज्ञान था हम देते थे। आज ऐसी स्थिति नहीं है विश्व में। आप सबसे अच्छी बात है कि संस्कृत और बौद्ध धर्म दोनों पर एक्सपर्ट हैं। तो मतलब अगर जैसे आज अलग-अलग लेंस से बौद्ध धर्म और सनातन धर्म को लोग देखते हैं तो वो भी हम यात्रा समझने का प्रयास करेंगे कि बौद्ध धर्म बहुत आवश्यकता है देश की सनातन धर्म औरकि आप सेंटर ऑफ इंडोलॉजी
(05:17) भारत विद्या भवन की डीन भी हैं। तो आप बहुत ढेर सारे देशों की यात्राएं भी की हैं। यहां पर जाकर प्रमाणों को इकट्ठा करना और उसको दर्शकों के बीच लेकर आना आपने अनवरत ये कार्य किया है पिछले कई वर्षों से। तो सबसे पहले कुछ मेरे मन में बहुत ढेर सारे प्रश्न आते हैं। एक तो जब हम ये बात करते हैं कि भारत विश्व गुरु है और भारत से लोग गए बाहर और ज्ञान का प्रवाह हुआ। तो चूंकि आप शोध कर रही हैं तो हम यहीं से प्रारंभ करते हैं कि आपको आपके शोध में क्या लगता है? वो पहले क्या इतिहास में बिंदु रहे होंगे या दिन रहे होंगे या कौन से साल रहे होंगे जब यह
(05:53) ज्ञान जाना प्रारंभ हुआ मतलब जो एविडेंस हमें जिसका मिलता है कब से जा रहा है अगर आपको पता है तो दर्शकों को बताइए या आपके एविडेंस में क्या मिलता है कि पहली बार जी इतिहास में क्या दर्ज है कि कौन लोग भारत से गए कहां गए जी देखिए जब हम ये विचार करने लगते हैं कि भारत का ज्ञान भारत से बाहर गया तो अनेक दिशा दिशाएं हैं और अनेक दिशाओं में अनेक देश हैं। अनेक देशों में अलग-अलग प्रकार के प्रमाण मिलते हैं। उन प्रमाणों को एकत्रित करके हम जो निष्कर्ष पर पहुंचते हैं वो यह है कि लिखित प्रमाण हमें पहली शताब्दी से मिलने आरंभ हो जाते हैं। फर्स्ट सेंचुरी से।
(06:36) परंतु निश्चित रूप से उससे पहले हमारे व्यापारी अपने धर्म को, अपनी संस्कृति को लेकर भारत से बाहर जा चुके थे। उसके पीछे भी कारण है मुझे यह बात कहने के लिए कि उससे पहले जो हमें लिखित प्रमाण मिलते हैं उससे पहले अवश्य कुछ ना कुछ संबंध रहा होगा। यह सुनिश्चित हो जाता है। कई कारण है उसके। अब वियतनाम की हम बात करते हैं। यदि आप दक्षिण पूर्व एशिया की बात करते हैं तो सबसे दूर हमसे वियतनाम है। वियतनाम में आप सोच सकते हैं कि वहां के किसी शहर का नाम कौठारेश्वरी होगा। जब वहां पर दूसरी शताब्दी में हमें संस्कृत का शिलालेख मिल रहा है। इसका अर्थ
(07:16) है कि संस्कृत वहां पहले पहुंच चुकी थी। जब राजा या प्रजा कोई भी जनसामान्य में यदि कोई संस्कृत को शिलाओं पर उत्कीर्ण कर रहा है इसका अर्थ है कि उसे संस्कृत का ज्ञान भी है। तो काफी समय हो चुका होगा। इसका अर्थ है कि पहले हो चुका जिसका हमारे पास कोई लिखित इतिहास नहीं है। क्योंकि भारतीयों ने इतिहास को उस ढंग से नहीं लिखा जिस ढंग से चीनियों ने लिखा या तिब्बत के लोगों ने लिखा या अन्य देशों ने लिखा। क्यों? उसके पीछे भी मैं कई कारण सोच रही हूं। मन में आते हैं कि ऐसा क्यों है? हम लोग इतिहास के प्रति इतने विमुख से क्यों हो गए? हमने
(07:56) कुछ लिखा नहीं। हम जो है जीवन को एक चक्र के रूप में देखते हैं। संसार एक चक्र है। जीवन एक चक्र है। जन्म मरण का चक्र है आपके पास। समय एक चक्र है। तो हम समय को लीनियर नहीं देखते कि जो आप आगे समय चला गया वो कभी लौटेगा नहीं। ऐसा नहीं है। तो और दूसरा था हमारे अंदर हो सकता है लोगों में उस तरह की ईगो भी नहीं थी। अहंकार भी नहीं था कि मैंने यह किया तो मैं इसे कहीं लिखित रूप में दे दूं। राजाओं ने अपने शिलालेख अवश्य स्थापित किए हैं। परंतु जो कलाकार है जो एक पत्थर को प्राण डाल देता है। उसको मूर्ति बना देता
(08:44) है। उसको भगवान बना देता है। उसका नाम नहीं है। बट जो आप फर्स्ट सेंचुरी का बता रही हैं प्रमाण वो क्या प्रमाण है? फर्स्ट सेंचुरी के मैं आपको कुछ प्रमाण देती हूं कि वो प्रमाण है जो हमारे पास कोरिया के राजकुमार ने अयोध्या की राजकुमारी से विवाह किया। अच्छा अयोध्या की राजकुमारी कोरिया गई। अब देखिए उस समय भारत इतना सक्षम देश था कि अनेक देश भारत के साथ अच्छे संबंध बनाने के लिए वैवाहिक संबंध स्थापित करता था। और ये बात वर्षों तक पता नहीं थी। वर्षों नहीं शताब्दियों तक नहीं पता थी। कोरिया के जो आर्कियोलॉजिस्ट हैं उनको बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनकी जो समाधि है वो
(09:29) तो कोरियन प्रिंसेस लिख रहे थे। उनको तो पता नहीं था वो भारतीय थी क्योंकि इतने वर्ष हो गए कभी किसी के पास इतिहास था नहीं उसका लिखा हुआ। उसकी समाधि पर मछली बनी हुई थी। मछली का बनाया जाना कोरिया में कहीं नहीं मिलता था। बड़ी विलक्षण बात थी। हम कुछ उनके यहां पत्थर मिले जो कि कोरिया के नहीं थे। है नहीं कोरिया के अभी भी हैं उनके यहां। तो आर्कियोलॉजिस्ट ने अनुसंधान आरंभ किया और बहुत लंबे समय तक अनुसंधान करने के पश्चात वो इस निष्कर्ष पर पहुंचे। अयोध्या में घरों में बाहर लोग चित्रकारी करके घरों पर मछलियां बनाते थे।
(10:17) उन्हें लगा यह हमारा समान कुछ दिखाई दे रहा है और रिसर्च और अनुसंधान किया तो उन्होंने समझा कि पौराणिक युग पुराण में लिखा हुआ है कि अयोध्या का जो आकार था वो मछली का आकार था। यहां से उन्हें आरंभ पता चला कि यह जो है इस राजकुमारी का संबंध अयोध्या से है। धीरे-धीरे अनुसंधान हुए। धीरे-धीरे प्रश्न की गुथियां सुलझनी आरंभ हुई और अब यह स्थापित हो चुका है कि 45 ईसवी 45 एडी में अयोध्या की राजकुमारी का कोरिया के राजकुमार से विवाह हुआ था और आज भी कोरिया के किम वंश क्योंकि वो राजकुमार
(11:05) किम था। किम जितने लोगों के साथ सरनेम किम लगता है, वह मानते हैं कि वह अयोध्या की राजकुमारी के वंशज हैं। दूसरा आपको पुष्ट प्रमाण देती हूं। चीन में क्योंकि मैंने कहा चीनियों ने बड़े अच्छे ढंग से सारा इतिहास लिखा है। चीन में 67 एडी 67 ईस्वी सन का शिलालेख मिला है। उसमें डेट डेट राजा उसका कौन सा राज्य का कौन सा वर्ष है इत्यादि इत्यादि सब लिखा हुआ है। और उसमें लिखा हुआ है कि दो संस्कृत के आचार्य काश्यप मातंग और धर्मरक्ष चीन पहुंचे। वो संस्कृत के ग्रंथ सफेद घोड़ों पर लेकर
(11:55) गए थे। सम्राट स्वयं अपने राजमहल से आया। उनका स्वागत किया और उनके निवास और उनके द्वारा संस्कृत के ग्रंथों के चीनी अनुवादों में सहयोग के लिए एक नए विहार की स्थापना की। जिसको कहते हैं श्वेताश्व विहार। चीन में है। चीन में है श्वेताश्व विहार। आज तक उन आचार्यों की वहां पर मूर्तियां हैं। वो जो धर्म ग्रंथ अपने साथ ले गए और केवल धर्म नहीं है। उसमें सभी प्रकार का ज्ञान है। सभी प्रकार की विद्याएं हैं। उसमें व्याकरण भी है। अब व्याकरण का धर्म से क्या लेना देना? परंतु ज्ञान
(12:42) हम ज्ञान को भी धर्म मानते हैं। तो इस प्रकार के प्रमाण आपको सुनिश्चित मिलते हैं और सबसे अच्छे जो मैंने आपको दो प्रमाण दिए जिनको कोई काट नहीं सकता वो ये हैं। जैसे कि आचार्य जी आपने बताया कि एक श्वेताश्व विहार की आपने बात की जहां पर संस्कृत आचार्य गए और उसके पहले हमने कोरिया का एक एग्जांपल देखा। जी तो जैसे कि अभी हम जितना पढ़ते हैं या समझ में हमें आता है तो मोस्टली मैं जो पढ़ा हूं मतलब आप मुझे करेक्ट कीजिएगा कि बौद्ध धर्म भारत से बाहर गया और विशेषकर सम्राट अशोक के समय में काफी प्रचार प्रसार हुआ। अभी जैसे आपने बताया कि संस्कृत के आचार्य
(13:24) हैं। हो सकता है कि वो भी बौद्ध धर्म के हो। मुझे आप करेक्ट कीजिएगा। बट जब हम बात करते हैं तो हमें ज्यादा दिखता है कि बौद्ध धर्म बाहर गया है। वैदिक परंपरा इतनी आप बताइएगा मुझे नहीं दिखती कि बाहर गई है। हम और वहीं पर हम मतलब मैंने पढ़ा था कि वैदिक परंपरा में बहुत ढेर सारे ऐसे हमारे जैसे बौद्धायन सूत्र है या फिर धर्म सूत्र हैं जहां पर लंबी यात्राओं को या विशेषकर समुद्री यात्राओं को निषेध बताया गया है कि अगर आप ऐसी यात्रा करेंगे तो आप वर्ण विहीन हो जाएंगे। ब्राह्मणों को ऐसी यात्रा बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। लेकिन अभी आप बता रही हैं कि संस्कृत लेकर
(14:02) लोग गए। जी। तो क्या ऐसा हिंदुओं में था कि हिंदू इसको पाप समझते थे इसलिए वो नहीं गए और बौद्ध धर्म के लोग ज्यादा देशों में जा पाए। देखिए एक तो ये बहुत बड़ी भ्रांति हमारे देश में है कि हिंदू अलग थे बौद्ध अलग थे। बुद्ध भगवान भी हिंदू ही थे। उनके माता-पिता हिंदू थे। उन्होंने जितने शास्त्रों का अध्ययन किया जो भी उनका ज्ञान था वो हिंदू धर्म ग्रंथों के आधार पर था। उन्होंने एक नया मार्ग प्रशस्त किया। ज्ञान का मार्ग था। तप का मार्ग था। बोधि प्राप्त की। हमारे देश के पूरे इतिहास में समय-समय पर ऐसा होता रहा है। समाज की आवश्यकताओं को
(14:44) देखते हुए नई-नई वस्तुएं नए-नए ढंग से ज्ञान जो है आता रहा। आज जो स्थिति बना दी गई है जो पहले नहीं थी। वो नहीं थी और आज भी नहीं है। उस पर भी मैं आपको कुछ बात करना चाहूंगी। हमारे यहां एक ऐसा तोड़ दिया गया है समाज को जबकि बौद्ध और हिंदू दोनों ही या जैन धर्म तीनों ही हमारे देश के धर्म है और तीनों का ही आधार ऋषियों मुनियों का तप त्याग और ज्ञान है। आपने कहा कि हिंदू लोग यात्रा नहीं उसमें वर्जित था कि भई आप
(15:29) लंबी यात्राएं करें। देखिए हमें दो तीन बातों को समझ लेना होगा। एक तो यदि एक विषय हर विषय हर ग्रंथ किसी ना किसी कारण से किसी समय पर लिखा गया है और किसी के लिए लिखा गया है। बौद्धायन शूत्र की आपने बात की कि उसमें वर्जित है। हो क्या रहा था कि लोग जब बहुत लंबी यात्राएं करते हैं तो वह दैनिक जो अपने जीवन का पूजा पाठ परिवार यदि पुरुष चले गए परिवार पीछे से पिछड़ जाते थे ऐसा बहुत लंबे समय तक होता रहा कि पुरुष चले गए जैसे गुजरात का राजा 5000 लोगों को लेके इंडोनेशिया जावा द्वीप चला गया परंतु वो पुरुष जाते थे महिलाएं
(16:16) तो नहीं जाती थी साथ में बच्चे तो साथ में नहीं जाते थे तो जब हम लंबी याद करते हैं तो उसको निषिद्ध कुछ लोगों के लिए किया गया। जैसे आपने कहा ब्राह्मणों के लिए निषेध किया गया। उसका मैं यह कहती हूं कि हर ग्रंथ में हमें देखना चाहिए। तब फिर उसका निर्वचन करना चाहिए। और भारत की आपको बात बता दूं। हमारा तो इतना लंबा इतिहास है। आप जानते हैं लोथल जो है विश्व का सबसे पुराना सीपोर्ट 3000 बीसी। सोच सकते हैं? हम इतने पुराने नेविगेशन वाले थे। इतना बड़ा हमारा और भी आप ईस्ट कोस्ट पर भी जाएंगे। इतने सारे हमारे पोर्ट सिटीज थे। व्यापार करते थे हम
(17:02) व्यापारी और इसीलिए आपको पोर्ट्स जो है पोर्ट सिटीज में मंदिर बहुत मिलते हैं। जब व्यक्ति विदेश यात्रा पर जाता था कठिन होती थी यात्रा। जाते समय ईश्वर की आराधना करके जाता था। हे भगवान मेरी यात्रा सफल हो। और जब आता था तो जैसे स्वर्ण दिव सोना लेने जाते थे। बहुत सोना लाए हम। आके वो बहुत बड़ी मात्रा में सोना भगवान को चढ़ाता था। जाते समय अपनी मालाएं मालाएं जो उसने पहनी हुई थी वो सब मंदिर में छोड़ जाता था। इसीलिए आप देखेंगे कई बार मंदिर में आपको डेकोरेशन में दीवारों पे ऐसे ऐसे मालाएं लटकी हुई। अब वो एक अलंकरण बन गया। वो परंपरा रही होगी। उसका लिखित इतिहास
(17:46) नहीं है। परंतु हम जैसे लोग निकाल ढूंढ-ढूंढ के निकालते हैं चीजें। तो इसीलिए जितने हमारे कोस्टल एरिया के मंदिर थे उनमें बहुत सोना था। और सब नष्ट हो गया। लूट लिया गया। भारत को सोने की चिड़िया कहा। सोने का शेर नहीं कहा। चिड़िया का शिकार बहुत आराम से हो जाता है। सोना ही सोना था। आसानी से शिकार करिए। शेर नहीं था वो। मैं बार-बार कहती हूं भारत सोने की चिड़िया था। इस पर हमें गर्व नहीं करना चाहिए। हमें भारत को सिंह के रूप में देखना चाहिए। सिंह जहां बन गए खिलौने। बड़ा सुंदर एक गीत आता है। तो भरत की कहानी हम लोग बच्चों को सुनाते
(18:30) हैं। हमने भी सुनी बचपन में कि सिंह से खेलते थे। तो भारत एक बड़ा महान देश था। परंतु बस जैसे भी है अब इतिहास आपके समक्ष है। जो कुछ भी हुआ सोने की चिड़िया का अब चिड़िया ही बन गया। सोना सब लुट गया। तो मेरा कहने का अभिप्राय है कि हमारा बहुत लंबा इतिहास है। हमारे यहां सबसे अधिक उन्नत नेविगेशनल शास्त्र था। हमारे जो नेविगेशन के इंजीनियर्स जिसको आज आप कहेंगे वो इतने ज्ञानी थे और उनको एक सिर्फ ये नहीं कि आपको बस जलयान चलाना आता है। नहीं उनको तारों का ज्ञान था। हम कहां जा रहे हैं? कौन से तारे आप पूरा आकाश भर सकते थे। समुद्र का जल का रंग बदलता है। उनको जल के
(19:15) रंग से पता चलता था। कौन सी मछलियां कहां मिलती है उसका ज्ञान होता था। हमारा जो गुजरात महाराष्ट्र का यह जो क्षेत्र है यहां पर बहुत लोग विदेश जाते थे। बहुत सारी कथाएं मिलती हैं। बहुत कथाएं कथा साहित्य जो है उसमें बहुत कुछ मिलता है कि हम विदेश गए। आप जानते हैं इंडोनेशिया के दो द्वीप जावा और बाली। क्यों है? जावा की जो आकार है वह यव के समान है। जौ के समान है। बाली का बाली के समान है। आम्र द्वीप का आम्र के समान है। और एक द्वीप है के जिसको कहते हैं मलेशिया में। केड़ा कहते हैं आजकल कटाह द्वीप है। क्यों? क्योंकि उसका जो आकार है वो कढ़ाई
(20:03) के समान है। हमारे ऋषियों ने उनको देखा कैसे? पहचाना कैसे? कि यह जावा है, यह बाली है, यह कड़ा है। तो ऐसी कहानियां मिलती हैं। सोपारा एक जगह होती थी। है अभी भी वहां से कितने हमारे लोग जाते थे। श्रीलंका जाते थे। वहां से के जाते थे। और पूरे साउथ ईस्ट एशिया में क्या और एक और जातक बौद्ध जातकों में भी ऐसा बहुत कुछ मिलता है। जैसे एक सुपारक जातक है। एक एक है बेबिलोनिया का वर्णन आता है उसमें। जातक बेबिलोनिया से क्या शब्द है उसका। तो वो कहता है कि उसमें वर्णन है कि भारत से लोग बैबलोनिया जा रहे हैं। हम सब दिशाओं
(20:48) में जाते थे। समुद्री यात्राएं भी करते थे। रेगिस्तानी यात्राएं भी करते थे। सब प्रकार की यात्राएं करते थे। और यहां तक था गुजरात का एक राजा 603 ईस्वी में हमारे पास यह लिखित नहीं है। हमें जावा से मिला है। 603 ईस्वी में पांच सहस्त्र भारतीय लोगों को छह बड़े जलयान और शेष छोटी नावों के साथ उन सबको लेके इंडोनेशिया जावा द्वीप पहुंचा। अगर आपके पास 200 यात्रियों का एक जलयान है और आपको दो मास एक यात्रा में कहीं रुकने का स्थान नहीं है तो इसका अर्थ है कि आप 200 लोगों का दो मास का आप भोजन और पानी दोनों साथ लेकर चल रहे हैं।
(21:36) लोगों के साथ-साथ आपको वो व्यवस्थाएं भी तो रखनी थी ना। तो विदेश यात्राएं वर्जित नहीं थी। केवल जैन धर्म में थोड़ा सा रोका जाता था इसलिए कि पशुओं के सहारे हम यान चाहे वो बैलगाड़ी हो चाहे वो घोड़ा गाड़ी हो दो ही मुख्य थी हम तो उससे पशु को कष्ट होता है तो हम पशु को कष्ट ना दें इसके कारण जैन मुनियों ने पैदल यात्राएं अधिक की अब पैदल यात्रा में और घोड़े में और उसमें तो अंतर आ जाता है तो वो उतनी अधिक यात्राएं इन जैन मुनियों की नहीं जितनी औरों की है और कहीं शायद ऐसा हो कि ब्रेन ड्रेन होने लगा हो तो बोल दिए हो कि अब नहीं जाना है
(22:20) बाहर जिस प्रकार से लोग हमारे पास ज्ञान को क्या हम आज भी कहते हैं कि धन और ज्ञान जितना बांटोगे उतना बढ़ेगा हमने कभी भी ज्ञान को रोका नहीं कि अरे हमारे देश से बाहर जा रहा है तो हम इसे रोक लें। यह आधुनिक समस्याएं हैं। ब्रेन प्राचीन काल की नहीं है। हम इस समय प्राचीन भारत की चर्चा कर रहे हैं। तो यह मतलब मिथ ही है कि इस तरह का कोई बहुत बड़ा निषेध हिंदुओं का नहीं था। जैसे लोग बोल देते हैं कि हिंदू नहीं गए। वो यहीं पर रहे और बहुत नहीं ऐसा कुछ नहीं है। हिंदू बहुत गए। तो आपको ऐसे कुछ प्रमाण मिलते हैं हिंदुओं के। इंडोनेश थाईलैंड में सबसे पुरानी
(22:57) मूर्तियां विष्णु भगवान की मिल रही हैं। वर्मा चले जाइए। चीन जापान की तरफ इधर तो साउथ ईस्ट एशिया चीन जापान में चलिए जापान की बात कर लेते हैं क्योंकि वही सबसे दूर आपको दिखाई दे रहा है। ऑफिशियली जो डेट मिलती है 552 एडी उनके रिटन रिकॉर्ड्स में बुद्धिज्म के आने की डेट है। अच्छा परंतु देवी सरस्वती और महाकाल और कुबेर तीन ऐसे देवता हैं जो उनका एक देव समूह है शच फुकुजन उसे मैं संस्कृत में कहती हूं सुमंगल सप्तक सात देवता हैं और मंगल की कामना के लिए उनकी पूजा की जाती है आज भी करते हैं जापानी लोग उसमें सरस्वती जी है
(23:44) उसमें महाकाल है उसमें कुबेर है। इसका अर्थ है कि वो लोग पहले से थे वहां बौद्ध धर्म के पहुंचने से पहले। तो मतलब ये परंपरा थी जाने की। परंपरा थी और ऐसा हुआ कि बौद्ध धर्म को सम्राट अशोक के कारण प्रश्रय मिला। सम्राट थे ना? हम और धर्म प्रचार के लिए भेज दिया। चारों दिशाओं में भेजा। कोई एक दिशा में तो भेजा नहीं। हम चारों दिशाओं में धर्म प्रचार के लिए भेजा तो वो बौद्ध धर्म चला गया। वो अधिक चला गया। आश्रय मिला उनको। आश्रय मिला और बहुत से राजा फिर बौद्ध बन गए। सम्राट बौद्ध बन गए। तो जब वो बने तो निश्चित रूप से फिर वो
(24:31) राजा राज्य से धर्म का का वर्धन होता है और धर्म से राज्य का। परंतु बौद्ध और धर्म हिंदू धर्म को अलग नहीं रखा गया। यह भी हमें समझ लेना चाहिए। आज आप कहेंगे कि थाईलैंड बौद्ध देश है या हिंदू देश है? बौद्ध देश है। परंतु वहां पे जो भी राजा बनता है राम की उपाधि धारण करता है। इस समय रामा 10 कहलाते हैं जो राजा है। पिछले वाले राम न थे। उनका नाम जानते हैं। उच्चारण में थोड़ा भेद तो आ गया। भूमि बल अतुल तेज। वो नम राजा का नाम था। उच्चारण भिन्न है। उच्चारण भिन्न संस्कृत क्या? जहां कहीं भी
(25:16) आप जाएंगे वहां आपको उच्चारण भेद दिखाई देगा। इंग्लिश में भी दिखता है और उनका राजा बौद्ध है। परंतु सारे राजसिक जो अधिष्ठान होते हैं जो उनकी सेरेमनीज़ होती है रॉयल सेरेमनी, स्टेट सेरेमनी जो भी कह दीजिए राज्या अभिषेक होता है। वो तो सब वैदिक होता है। आज भी थाईलैंड के राजा के राजगुरु तमिल ब्राह्मण है। कहां भेद था? चीन के एक सम्राट हुए छन। उन्होंने अपनी माता के जैसे आपने आरंभ करते समय गायत्री मंत्र की बात की।
(26:00) उन्होंने अपनी माता के 80वें जन्मदिन पर चीन में जितने भी संस्कृत के मंत्र चाहे वो हिंदू हो चाहे वो बौद्ध हो उनके लिए कोई भेद नहीं था। सारे इकट्ठे किए और 10 सहस्त्र से अधिक का एक संग्रह बनाया। उनको चार लिपियों में लिखवाया मानचू, चीनी, मंगोल और तिब्बती और अपनी माता के 80वें जन्मदिन पर भेंट किया। क्यों? क्योंकि जब व्यक्ति 80 वर्ष पूर्ण करता है तो वह अपने जीवन के एक सहस्त्र पूर्णिमाएं देख चुका होता है। सहस्त्र चंद्रदर्शी हो जाता है। और वह संग्रह डॉ. रघुवीर
(26:44) चव लाइन ने भेंट किया। वह भारत लेकर आए और उसके पश्चात उनके पुत्र डॉ. लोकेश चंद्र जी ने उसका प्रकाशन किया। 22 भागों में 22 भागों में उन मंत्रों का संग्रह प्रकाशित है और उसी में गायत्री मंत्र भी है। कोई भेद नहीं था। यह भेद बना दिए गए। हमारे उत्सव हैं। क्या आप जानते हैं कि कोरिया तो एक बौद्ध देश है परंतु वहां पर शरद पूर्णिमा भी मनाते हैं। तो वो हिंदुओं का उत्सव है या बौद्धों का उत्सव है? एक बार मैं थाईलैंड में थी और उनका नव
(27:30) वर्ष आया। नव वर्ष कैसे मनाते हैं? उसमें होली भी खेलते हैं। रंग बनाने का ढंग अलग है। पर पिचकारियां भी होती है बच्चों के हाथों में और बड़े सुंदर ढंग से भी होली खेलते हैं। जो मेरी मित्र है उसके घर पर मैं ठहरी हुई थी। उनका एक सहायक जो है वो मेरे साथ होली खेलने आया। तो उसने बड़े सुंदर पात्र में पानी डाला। उसमें कुछ फूल डाले और बड़े आदर पूर्वक मेरे हाथों पर ऐसे करके उसने वह पानी डाला। वो उसकी होली हो गई। हमारे यहां तो पुष्पों से होली के रंग बनाते थे, खेलते थे। अभी भी आप देखिए वृंदावन में पुष्पों की होली खेली जाती है। तो ढंग बदले हैं।
(28:17) परंतु यह धर्म अलग ना थे ना है। क्यों? क्योंकि दोनों ही त्यागियों, तपस्वीयों और ज्ञानियों का है। धर्म। उन्होंने हमें दिया है सारा ज्ञान। वो ज्ञान पवित्र है। उसमें जो बेसिक जो फंडामेंटल प्रिंसिपल्स हैं वह समान है। यदि हिंदू धर्म मानता है विश्व कल्याण होना चाहिए तो बौद्ध धर्म भी मानता है। यदि वो ज्ञान के प्रसार को अच्छा मानता है कहते हैं ज्ञान देने से बढ़ता है तो बौद्ध भी मानते हैं। यदि उन्होंने तप किया नदियों के किनारे बैठ के किया तो हिंदू ऋषियों ने भी वही किया। यदि उनको प्रकृति बड़ी सुंदर लगती थी तो उन्हें भी लगती थी।
(29:05) यदि प्रकृति उन्हें रितंबरा सब कुछ देने वाली ये धरती उसकी पूजा करते थे तो बौद्ध भी करते हैं। यहां तक कि बहुत सारी सुंदर सुंदर बातें हैं। जैसे आप मंगोलिया, साइबेरिया आदि जाएंगे तो आप देखेंगे लोगों का जो जूता होता है वो आगे से उठा हुआ होता था। ताकि जूते की नोक जो है वह धरती मां को स्पर्श ना करे। इतना आदर इंडोनेशिया में जाइए। अद्भुत संसार है। एक बार मैं आपको थाईलैंड की एक बात बताती हूं। मैं एक कॉन्फ्रेंस में गई तो जिस होटल में ठहरना था पहले से पता ही होता है
(29:49) सब कुछ। तो मुझे पता था इस होटल में ब्रह्मा जी की कोई बहुत बड़ी मूर्ति है। बड़ी सुंदर वो घरघर में ब्रह्मा जी की पूजा सड़कों पर ब्रह्मा जी की पूजा। ब्रह्मा जी वो कहते हैं क्योंकि ब्रह्मा इज अ क्रिएटर। सो ही कैन गिव एनीथिंग दैट यू वांट। बौद्ध है ना परंतु ब्रह्मा जी की पूजा भारत में नहीं है जितनी वहां पर है। तो मैंने बहुत होटल में कई लोगों से पूछा कि प्रयत्न किया उनको समझाने का। फिर एक व्यक्ति मेरी बात को समझ गया कि मैं क्या देखना चाहती हूं। ओ यू मीन फोर फेस बुद्धा उनके लिए ब्रह्मा भी बुद्ध ही है। वो भगवान के पुजारी हैं। उनको ये नहीं है
(30:31) ब्रह्मा है तो हम नहीं पूजेंगे वो बौद्ध देश। ऐसा कुछ नहीं है। इसमें आपने इंडोनेशिया का नाम लिया और हम लोग सुनते हैं कि वो 99% मुस्लिम्स रहते हैं वहां पे। तो ये कल्चरल वहां पर क्लैश ऐसे आपको महसूस हुआ वहां जब आप थी कि किस तरह से उन्होंने इस मतलब जो उनके कल्चर में अभी भी एंशिएंट हिंदूज़्म और बुद्धिज्म है वो कैसे मेंटेन किए हुए हैं। देखिए ये भारत है जहां पे धर्म और संस्कृति को इस ढंग से मिलाजुला दिया गया जो कि इंडोनेशिया में नहीं है। इंडोनेशिया में व्यक्ति मुसलमान भी बन जाता है। तो इतने सुंदर-सुंदर संस्कृत के नाम रखते
(31:08) हैं। कॉर्नो आपने तो आपको मतलब आप उनकी कुछ भी उठा के देख लीजिए तो आपको सब संस्कृत के नाम दिखेंगे। उनकी जो पहचान है वो मुस्लिम नाम बहुत कम रखते हैं। उनका कहना यह है कि वो हमारा धर्म है। यह हमारी संस्कृति है। यदि वो रामायण बैले करते हैं, हम प्राय मुसलमान होते हैं। रामायण का बैले जितना भी इंडोनेशिया में होता है, इतने अद्भुत ढंग से होता है। ब्रह्मानंद में यदि आपका कभी जाना हो तो अवश्य देखिएगा। पूर्णिमा से एक दिन पहले और एक दिन बाद तीन बड़ा भारी उत्सव होता है। रामायण ब्रह्मानंद के प्रांगण में ब्र परमानंद संसार का सबसे बड़ा शिव मंदिर है।
(31:54) वहां पे जब आप रामलीला करते हैं। इतना बड़ा मंच होता है कि 200 300 कलाकार एक साथ आ सकते हैं। अद्भुत होता है। दर्शनीय है। मैं जितनी बार जाती हूं जावा अवश्य देख के आती हूं। परंतु करने वाले तो सब मुसलमान होते हैं। भारत में भी उनकी मंडलियां आती हैं। एक बार जैसे दूरदर्शन वाले इंटरव्यू ले रहे थे तो उस साक्षात्कार में मेरा भी था और उन लोगों का भी था। तो जो राम बना था वो भी खड़ा था वहां और मैं भी खड़ी थी। तो जो राम बना था उसका जब साक्षात्कार चल रहा था तो कहता है आई एक्ट एस रामा बट आई डोंट लाइक हिम। तो स्वाभाविक रूप से पूछा गया
(32:38) अगला प्रश्न था कि ऐसा क्यों? तो उसने कहा बिकॉज ही स ह वाइफ टू एक्साइल ही डिड नॉट गिव टू ह वाइफ व्हाट ही शुड हैव गिवन। तो उनकी जितनी समझ है भगवान राम ने देवी सीता का परित्याग क्यों किया? फिर वहां पे कितनी रामायण कितने ढंग से खेली जाती है? क्या कारण है? वहां पे अंतर क्यों आ गए? वहां पे हनुमान जी सफेद रंग के क्यों बनाए जाते हैं? हनुमान जी वहां पे भूरे नहीं होते। वहां सफेद हनुमान जी होते हैं। क्योंकि जब उनकी उनकी कथा है। बहुत सारे अंतर आए हैं कथाओं में। भारत में भी 300 प्रकार की रामायण आपको मिल जाएगी। विदेश में भी अलग-अलग प्रकार की
(33:20) रामायण मिलती है। मुख्य धारा वही है। मुख्य कथा वही है, कथानक वही है। तो उनकी उनका विश्वास है कि जब हनुमान जी माता अंजनी से विदा लेकर जा रहे थे तो उन्होंने कहा कि मुझे मेरे जो क्या कह आराध्य हैं राम वो मुझे पहचानेंगे कैसे कि मैं उनका भक्त हूं। तो माता अंजनी कहती है कि जो तुमसे यह प्रश्न करेगा ना और बोले मैं कैसे पहचानूंगा वो तो सन्यासी बन चुके हैं। मुझे कैसे पता चलेगा? तो माता अंजनी कहती है कि जो तुमसे यह प्रश्न करेगा कि बंदर तो भूरे होते हैं तुम सफेद क्यों हो? तो समझ लेना वही श्री राम है। तो वहां पे अभी
(34:07) भी हनुमान जी को सफेद रंग का बनाया जाता है। तो बहुत सारी आनंद के विषय हैं। जितना अंदर अंदर आप जाते जाइए आपको नए-नए विषय निकल के आते रहेंगे। मैंने ये भी सुना है कि जितना हम धीर गंभीर हनुमान जी को लेते हैं भारत में थाईलैंड और इंडोनेशिया में हनुमान जी को थोड़ा चंचल और वो टूरिज्म वो टूरिज्म। अच्छा क्योंकि आपके सामने 500 लोग हैं। अब आप कुछ एक्टिंग कर रहे हैं तो वो कुछ ना कुछ पुट ऐसा डाल देते हैं कि चंचलता अधिक बढ़ा देते हैं उनकी और वानर बुद्धि जो वानर के रूप में जो उनकी क्रियाएं हैं उनको थोड़ा बढ़ा दिया उन्होंने तो वो उसमें एक
(34:46) टूरिस्ट अट्रैक्शन का भी एक कारण रहा है। क्योंकि देखिए ये सब वस्तुएं चलती तभी है जब लोग उसको देखते हैं, समझते हैं, सुनते हैं और लोग तभी आते हैं जब उनको कुछ ज्ञान तो उनको थोड़ा कठिन लगता है। मनोरंजन में अधिक आकर्षण तो उसको अधिक मनोरंजन का साधन बनाने का भी एक प्रयत्न होता है। आचार्य जी जैसे अभी आप थाईलैंड में बता रही थी कैसे वहां पर धर्म और राजनीति एक ही साथ है। जैसे भारत में ठीक है। धर्म के तत्व तो हमारी राजनीति में भी है लेकिन उतना प्रखर मुखर नहीं है। इसमें कहा जाता है कि राजनीति से धर्म को अलग रखो। अलग रखो। यह एक प्रश्न खड़ा होता है। इसलिए कहा
(35:25) मैंने मैं आपकी ही वीडियो देख रहा था बहुत इंटरेस्टिंग सी जिसमें आप जापान के बारे में बता रही थी कि जब वहां कॉन्स्टिट्यूशन की प्राण प्रतिष्ठा हुई है। तो उसके विषय में भी बताइए कि ये क्या कांसेप्ट है? ये बहुत पहले की बात है या अभी की बात है? नहीं ऐसा है। छठी शताब्दी में एक राजकुमार हुए शतकशी। अच्छा जो बड़े विद्वान थे और तब चीन जापान में चीनी लिपि चीनी लिखी लिखने की जो शैली थी वो चीनी लिपि थी। चीन से उनका कोरिया के माध्यम से संपर्क पहला स्थापित हुआ था। हमारा सीधा संबंध जापान के साथ कब कैसे हुआ इस पर अनुसंधान बहुत ही ना के बराबर है। हुआ है परंतु हमें
(36:07) इतना नहीं पता। चीन से जो ग्रंथ गए तीन ग्रंथ थे सधर्म पुंडरिक सूत्र विमल कीर्ति निर्देश और प्रजना पारमिता या तीन तीन ग्रंथ थे जिन पर शतगुप्त ऐष ने टीकाएं भी लिखी और वो पूरे बौद्ध दर्शन के ज्ञाता भी थे और पूरे भक्त भी थे। उन्होंने पहला जापानी संविधान बनाया। उसका जो आधार था वो पंचशील और 17 आर्टिकल कॉन्स्टिट्यूशन आप गूगल कर सकते हैं। और उसका आधार था बहुजन हिताय बहुजन सुखाय। हित और सुख दोनों की आवश्यकता होती है। आपने हित किया पर सुख नहीं है। सुख दिया परंतु हित नहीं है। उसकी भी सम्राट अशोक
(36:54) के समय से यह धारणा आरंभ हो गई थी। यह प्रश्न खड़ा हो गया था। उन्होंने धर्म के नाम पर क्या किया? सराय बनवाई, हॉस्पिटल बनवाए, पशुओं के लिए, चिकित्सालय जो कुछ भी किया वो बहुजन हित और सुख के लिए किया। तो यह विचार जापान के पहले संविधान का आधार था। 17 आर्टिकल कॉन्स्टिट्यूशन कहते हैं उसको। और जब ये लागू किया गया प्रोमल्गेशन ऑफ द फर्स्ट कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ़ जापान उसके लिए संस्कृत का एक मंत्र मंगाया गया। उसकी पांडुलिपि उनीश विजय धारणी नाम से आज तक वहां के होरियो जी नामक मंदिर में सुरक्षित है। ये कब की बात है? शुद्ध कुदशी के समय छठी सातवीं शताब्दी
(37:41) अच्छा अच्छा तो उसमें जो है आपने कभी भी पूरे विश्व के इतिहास में भारत को भी उसमें मिला लीजिए कभी भी ऐसा नहीं देखा होगा कि किसी संविधान के लिए ऐसा एक अनुष्ठान किया गया कि उसमें धर्म के प्राण डाले गए। आधार भी वही और उसमें फिर उसके लिए एक रिचुअल आप जिसको कह सकते हैं संस्कृत के मंत्र का पाठ किया उष्णीश विजय आधारणी उष्णीश क्या है उष्णीश का अर्थ प्राय लोग पगड़ी बोलते हैं परंतु उसका अर्थ है सर्वो सर्वोच्च सर्वोच्च विजय की कामना से हमने यह संविधान बनाया है और यही उष्ण विजयधारणी
(38:29) चीन की महाभित्ति पर भी उत्कीर्ण है। पूरे विश्व में केवल एक वस्तु है जो मानव निर्मित है और चंद्रमा से दिखाई देती है और वह है चीन की महाभिद्धि चीन की दीवार चीन की ग्रेट वॉल ऑफ चाइना हम चीन की ग्रेट वॉल पर संस्कृत का मंत्र 13334 में लिखा गया आज तक विद्यमान है। ये वही उष्ण विजय धारणी है। इसकी धारणी वही है। उसको छह लिपियों में लिखा गया ताकि जो भी जिस लिपि का ज्ञाता हो वह उसे पढ़ सके। अभी तक है परंतु ज्ञात नहीं है किसी को भी। हजारों लोग जाते हैं प्रतिदिन परंतु किसी को यह बताया नहीं
(39:14) जाता कि यहां पर संस्कृत का मंत्र है। कौन बताएगा? भारत बताएगा। भारत किसकी नजर पड़ी सबसे पहले? डॉक्टर रुघवीर जी जब चीन गए तो वो उसकी स्टपेज लेकर आई थी और वो मेरे पास है। अच्छा उसकी प्रति मेरे पास है उसपेज की। आचार्य जी इतना अद्भुत लग रहा है आपको सुनकर। मेरे मन में एक प्रश्न यह आ रहा है जैसे कि हमने जब बात प्रारंभ की तो आपने बताया कि बिना पेटेंट के जो ज्ञान है वह और किसने लिखा है किसने रचना की है उसका भी कोई जिक्र नहीं करते हैं। आज के समय में भी अगर मैं इस इस सिचुएशन को सुपरइइोज करूं तो आज भी बहुत ढेर सारे देश के लोग
(39:54) दूसरे देश जाते हैं। टेक्नोलॉजी का व्यापार होता है। एक दूसरे को के साथ कोलैब करते हैं। लेकिन आज हम यह देखते हैं कि टेक्नोलॉजी लोग ले लेते हैं या हो सकता है एंटरटेनमेंट ले लें दूसरे देश की मूवीज देख लें लेकिन रिलीजन नहीं लेते उस पर टिके रहते हैं ज्यादातर फाइट यही दिखती है कि तुम भाई अपना रिलीजन अपने पास रखो हां हो गए आप क्रिश्चियन मैं हिंदू हूं आपकी मूवीज देख लूंगा आपके गाने सुन लूंगा तो उस समय जब ऐसे लोग जाते रहे होंगे तो आयुर्वेद ले गए चलिए समझ में आता है कि किसी की जान बच गई या संगीत शास्त्र लेकर गए तो संगीत में कुछ नया ज्ञान मिल गया
(40:31) लेकिन देवी देवता तो पहले भी रहे होंगे चाइना जापान में या अन्य जगहों पर अपने-अपने ऐसे समय में दूसरे के धर्म को अपनाना उनकी देवी देवताओं को अपनाने जैसे आप सरस्वती माता की बात करते हैं कि चीन या जापान में सरस्वती माता दिखती हैं वहां ब्रह्मा जी दिखते हैं तो अपने देवी देवताओं को होते हुए दूसरे के देवी देवता को अपनाना ये किस तरह की फिनोमिना है उस समय आपके प्रश्न में पहला प्रश्न तो यह है कि कोई दूसरे के धर्म धर्म को अपनाना नहीं चाहता। वो कहता है भाई ठीक है तुम हिंदू हो तुम्हारा ये सब तो ले लेंगे परंतु धर्म नहीं लेंगे। एक तो यह भी मिथ्या धारणा है।
(41:07) अच्छा मैं ऐसे बहुत से लोगों से मिलती हूं जो पूरे हिंदू क्रिश्चियन है परंतु पूरी तरह से हिंदू धर्म का पालन करते हैं। उसके पीछे क्या-क्या कारण है वो एक अलग चर्चा का विषय हो जाता है। अभी भी मैं अब अगले सप्ताह ही मैं रशिया जा रही हूं। रूस में मैं कुछ ऐसे लोगों के बीच में हूं जो जूना अखाड़े से जुड़े हुए हैं। महामंडलेश्वर बने हुए हैं और वो क्रिश्चियन है। अच्छा बिल्गेरिया में आप जाइए। कितने बड़ी संख्या में बल्गेरियंस हैं जो आश्रमों से जुड़े हुए हैं। पूजाएं करते हैं, हवन करते हैं। सब कुछ करते हैं। तो ऐसा कुछ नहीं है। एक दिन विमान में मैं
(41:51) अमेरिका से आ रही थी तो जो मेरे साथ सह यात्री थी, एक महिला अफ्रीकन दिख रही थी दिखने में। अमेरिका से आ रही थी। वो निरंतर बैठ के माला फेरती रही। तो मैंने जब उसको माला करते करते फिर जब उसकी समाप्त हुई तो मैंने उससे पूछने का प्रयत्न किया कि भाई पर वो क्रिश्चियन थे तो ऐसा कुछ नहीं है। देखिए आज का व्यक्ति खुले मन का व्यक्ति है। वो यह देखता है मुझे एक मधुमक्खी के समान अलग-अलग फूलों से रस लेना है। उसको बिना डैमेज किए हुए। उसको कोई क्षति नहीं पहुंचाती मधुमक्खी। उसका रस चूस लेती है। फूल को पता भी नहीं चलता। फूल को कोई कष्ट
(42:33) नहीं होता। तो वो लोग अपनी इच्छा से जिस धर्म में जो उनको अच्छा लगा उसको अपने जीवन में उतार लेते हैं। यदि पूजा करके मन की शांति होती है। भगवान जैसे आपने पूछा उन्होंने हमारे देवी देवता क्यों ले लिए? कैसे ले लिए? ऐसा होता है कि टम कल्चर था। हम टोम कल्चर जो है वह मृत्यु से जुड़ा हुआ है। वो जीवन से नहीं जुड़ा हुआ। व्यक्ति जीवन इस संसार में आता है। जीवन जीने के लिए आता है। मृत्यु की तैयारी करता है। उसको जीवन में बहुत कुछ चाहिए। वो कहां से प्राप्त होगा? यदि आपको ज्ञान चाहिए तो देवी सरस्वती की पूजा करेंगे। जो
(43:19) लोग नास्तिक हैं उनका यह होता है कि अरे यह पत्थर है इसकी पूजा करके क्या मिलेगा? परंतु जिनको अनुभूति हुई है जो चेतना के कुछ उच्च स्तरों पर चले जाते हैं उनको वो अनुभूति भी होती है कि कैसे भगवान का आशीर्वाद मिलता है। शक्तिपात कहते हैं उसको। ऐसे बहुत उदाहरण हमें मिलते हैं कि किस सम्राट ने किस कारण से किस देवता की पूजा की और वो सफल हुआ। जब कुब्लई खान साउथ ईस्ट एशिया पर आक्रमण करने के लिए निकल रहा था उससे पहले एक बहुत बड़ी सेरेमनी की उसने और जिस भगवान की पूजा की वो पूर्ण इतना भयंकर रौद्र रूप में था आज भी पूजा होती है उनके
(44:07) जब इंडोनेशिया के उस समय के जो सम्राट थे उनको पता चला जावा में कि कुबले खान का आक्रमण होने वाला है और उसने इतनी बड़ी पूजा की है उसने और बड़ी पूजा की। बटुक भैरव की भगवान शिव की बटुक भैरव में पूजा की। देखिए भगवानों के बहुत सारे स्वरूप है। देवी सरस्वती का रूप आपको एक तो वीणा वादिनी मिलता है। परंतु अभी मैं जापान की बात करूं तो और तिब्बत की बात करूं। आपको मंगोलिया की दिखाऊं। तो वहां पर शस्त्रास्त्रधारी भी हैं। जापान में एक सरस्वती देवी है जो पूरी तरह से एग्रीकल्चर के कृषि की वस्तुएं हाथ में ली हुई है। हम भगवान का स्वरूप निर्मित करते हैं।
(44:53) मूर्त रूप देते हैं। पहले हम ध्यान लगाते हैं। फिर हम सोचते हैं यह भगवान कैसा होगा? फिर उसे मूर्त रूप देते हैं। उसे मूर्ति कहते हैं। वैदिक काल में भगवान की मूर्तियां नहीं बनती थी क्योंकि हमारा चेतना का स्तर बहुत ऊंचा था। आज हमारा चेतना का स्तर इतना ऊंचा नहीं है तो हम भगवान की मूर्ति रूप में भी पूजा करते हैं। चाहे रूप चित्र हो चाहे मूर्ति बनाए जो भी बनाए। तो उसने जो मूर्तियां बनवाई भगवान शिव की बटुक भैरव रूप में और साथ में गणपति गणेश जी जो होते हैं वो तो गणपति है ना सेनापति हैं तो सेनापति कैसा होना चाहिए? रौद्र रूप में होना चाहिए। तो गणेश जी की
(45:38) सबसे रौद्र रूप में जो मैंने स्वरूप देखा है वह इंडोनेशिया के राज परिवार का देखा है। मुझे राज परिवार ने एक मूर्ति भेंट की थी जिसमें गणेश जी पूरे रौद्र रूप में है। और जो मैं उस समय के जावा के राजा की कृत नगर की बात कर रही हूं। उसने जो गणेश जी की मूर्ति बनाई वो तो कपालासन पर बैठी हुई है। कपालों के आसन और कपालों से बने आभूषण पहने हुए हैं। जब आप शत्रु जब आप युद्ध के लिए जाते हैं तो आप शत्रु पर विजय के लिए जाते हैं। और यह भी बड़ी भ्रांति है हमारे देश में कि हमने तो कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। ऐसा नहीं है। भगवान राम भी
(46:22) दिग्विजय के लिए निकले थे। अश्वमेध का घोड़ा छोड़ा। किस लिए? बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित किया था। हम लोग भी साम्राज्य स्थापित करते थे। आप क्या सोचते हैं? बौद्ध लोगों का साम्राज्य नहीं था। क्या जैन राजाओं ने साम्राज्य नहीं बनाया? या हिंदू राजाओं ने साम्राज्य नहीं बनाया? परंतु हमें वह विषय पढ़ाया नहीं जाता। कश्मीर के एक राजा थे ललितादित्य। जिनका साम्राज्य इतना बड़ा था कि एलेक्जेंडर से डेढ़ गुना था। परंतु हम पढ़ाते अलेक्जेंडर द ग्रेट हैं। ललितादित्य द ग्रेट नहीं पढ़ाते। तो भगवान की पूजा करने का सदा से परंपरा रही और भारत से बाहर जब भारतीय संस्कृति
(47:06) गई तो अनेक देवी देवता भी गए। उनके अनेक स्वरूप गए। ट्रांसफॉर्मेशन भी हुआ। देवियां और देवता दोनों का जो बौद्ध स्वरूप है उसमें भिन्नता भी आई है। आपको यदि मैं जापान की लक्ष्मी जी की आपको चित्र दिखाऊं किचुततिन कहते हैं वो लोग। अब हमारे यहां जो लक्ष्मी जी होती है उनका आप देखेंगे स्वर्ण मुद्राएं सोने के सिक्कों से हमें आशीर्वाद दे रही हैं। वो हम धन का स्वरूप मानते हैं। परंतु जब वो बौद्ध बन गई। बौद्ध स्वरूप में बौद्ध लोगों के लिए थी तो उनके एक हाथ में चिंतामणि है। आप उनको देख के पहचान नहीं पाएंगे कि यह
(47:52) देवी लक्ष्मी है। परंतु आठवीं शताब्दी से इतिहास मिलता है कि सरस्वती और लक्ष्मी की इकट्ठे पूजा करने का उत्सव वार्षिक उत्सव बनता था किचकी का। सरस्वती जी और लक्ष्मी जी की पूजा हमारे घरों में भी इकट्ठे होती है। गणेश जी को भी रखते हैं। क्यों? क्योंकि शुभ लाभ लाभ तो होना चाहिए परंतु वो शुभ प्रयत्नों से होना चाहिए। कई बार लोग मुझसे पूछते हैं लक्ष्मी जी को पहले रखना चाहिए या गणेश जी को पहले रखना चाहिए? तो पहले शुभ है फिर लाभ है। आपका लाभ गलत ढंग से भी आप प्राप्त कर सकते हैं। आप चोरी करके भी धन प्राप्ति कर सकते हैं। पर हम उसके उपासक
(48:36) नहीं है। ऐसे ही ज्ञान ज्ञान की देवी सरस्वती को हमने श्वेत पद्म पर श्वेत वस्त्र पहनाकर बिठाते हैं। परंतु ज्ञान के साथ-साथ शक्ति भी आवश्यक होती है। शस्त्र शास्त्र च कौशलम उसका मैं आपको एक उदाहरण देना चाहूंगी कि रामायण में ऋषि मुनियों का बहुत ज्ञान था परंतु वो राक्षसों से लड़ नहीं पा रहे थे वो राम जी को लेने आए दशरथ घबरा गए कि ये बालक इतने भयंकर राक्षसों से लड़ेंगे तो वशिष्ठ मुनि ने एक ग्रंथ लिखा जो हमारे देश में बहुत
(49:21) कम लोग जानते हैं उसका जिसका नाम है योग वाशिष्ठ। उस समय श्री राम महलों की जो सुख सुविधाएं थी उससे विमुख हो चुके थे। और दशरथ इस असमंजस में पड़ गए थे कि यह बालक उन राक्षसों से लड़ेंगे कैसे? तो बड़ा सुंदर ग्रंथ है। उन सहस्र श्लोक भगवत गीता तो प्रसिद्ध हो गई परंतु योग वशिष्ठ प्रसिद्ध नहीं हो पाया। बहुत बड़ा ग्रंथ है। अभी रूसियों ने उसका रूसी भाषा में अनुवाद किया है और कई भागों में प्रकाशित हो रहा है। चौथे भाग तक प्रकाशित कर चुके हैं। अद्भुत ग्रंथ है। तो मेरा कहने का अर्थ यह है कि भगवान की उपासना
(50:10) अनेक रूपों में अनेक कारणों से की जाती है। तिब्बत में एक सरस्वती देवी जी का स्वरूप मिलता है। जिसमें चार में से तीन भुजाओं में शस्त्रार हैं। एक में पुस्तक है। अब जापान में जो सरस्वती है वह आपको जो दिखेंगी वो हमारे यहां तो पाम लीफ और ये पुस्तक पोथी टाइप होता था। ऐसे लंबी होती थी। तो हम सरस्वती देवी जी के जो हाथ में देंगे वो एक पोथी देंगे। ज्ञान का स्वरूप उसका जो सिंबल है। परंतु जापान और चीन में देंगे तो क्या देंगे? स्क्रोलर ब्रश। क्योंकि उनकी लिखने की शैली वो है। वस्त्र पहनाएंगे तो अपने पहनाएंगे ना। वो उनकी देवी बन गई। तो ऐसे ही शिव जी की
(50:55) पूजा भी होती रही। पार्वती जी के साथ होती रही। गणेश जी की पूजा अनेक रूपों में मिलती है और मैं ऐसे अद्भुत रूप गणेश जी के देख रही हूं कि भारत में तो हमने कभी देखे ही नहीं। परंतु उन्होंने अपने कारणों से सकार कारण भगवान का स्वरूप बनाया है। तो भगवान की आराधना सब देशों में होती रही है और वो कारण से थे। अनेक समय पर अनेक प्रकार के उन्होंने स्वरूप बनाए बदले। भारत जो है वह एक ना तो एक पुस्तक का देश है ना एक देवता का देश है। हमारे लिए हमारे लिए कोई कमांडमेंट्स ऊपर से नहीं आती। हम तो कहते हैं कि जो आपके हृदय में अनुभूति जन्य
(51:43) ज्ञान है वो पवित्र है। अब ये आप पर है कि आपकी चेतना का स्तर क्या है और आप उस ज्ञान को किस रूप में प्राप्त कर रहे हैं। आचार्य जी मैं दर्शकों को बताना भूल गया कि आपको मंगोलिया में हाईएस्ट सिविलियन ऑनर भी मिला हुआ है। जी वहां का स्टेट हाईएस्ट स्टेट सिविलियन अवार्ड वो पोलर स्टार कहलाता है। तो मैंने कुछ ऐसे कार्य किए जिन पर मैं आश्चर्यचकित हो गई जब मुझे ये राजदूत ने बताया कि हम आपको अपने देश का सर्वोच्च सम्मान दे रहे हैं तो मैंने उनसे यही पूछा बड़ी सुंदर हिंदी बोलते थे पिछले राजदूत तो मैंने कहा एक्सीलेंसी लगता है आपको कि मुझे सम्मान
(52:24) सच में मिलना चाहिए परंतु उन्होंने यह कहा कि शशि बाला जी आपको नहीं पता आपने कितना बड़ा हमारे लिए कार्य किया और उसकी थोड़ी सी यदि आपको मैं चर्चा करूं तो वो कार्य क्या था? इसीलिए मैंने छेड़ा। मैं जब पिछली बार मंगोलिया गई तो मैंने देखा कि इनके जो बौद्ध विहार जो नष्ट कर दिए गए थे पूर्णतया वो अब दोबारा से निर्मित हो गए हैं। बहुत सारे बन गए हैं। तो मैंने राजदूत से कहा कि भई जिसज विहार में मैं गई वहां वहां उनके सेक्रेड टेक्स्ट जो उनके धर्म ग्रंथ है वो नहीं मुझे दिखे। तो मुझे एक कमी लगी क्योंकि बौद्ध विहारों का मंदिरों का एक बड़ा
(53:03) अच्छी परंपरा है जो हमें सीखनी चाहिए कि धर्म जो मंदिर होते हैं वह धर्मोदय और ज्ञानोदय दोनों के केंद्र होते हैं। तो वहां पे वो अपने ग्रंथों का एक संग्रह बना के रखते हैं। अब वो ग्रंथ क्या है? तिब्बत और मंगोलिया में तो पांच सहस्त्र के लगभग संस्कृत के ग्रंथ और बाद की लिखी हुई टीकाएं उसमें सम्मिलित हैं। उसको उन्होंने दो भागों में विभक्त किया है। एक का नाम कंजूर है। दूसरे का नाम तंजूर है। कंजूर में 108 भाग हैं और तंजूर में लगभग 225 भाग हैं। मैं लगभग शब्द इसलिए प्रयोग कर रही हूं क्योंकि समय-समय पर अनेक सम्राटों में नए-नए वर्जनंस नए-नए संग्रह करके
(53:46) बनाए। तो उसमें कहीं-कहीं अंतर आ गए। किसी सम्राट ने कोई हटा दिया और कोई डाल दिया। तो ऐसा भी रहा है। तो जब मैं वहां से लौटी तो मैंने यहां आकर सरकार से प्रयत्न किया कि जो कम से कम हम कांजूर जो है 108 इतने बड़े-बड़े हैं 108 भाग इतने मोटे-मोटे वो हम मंगोलिया को दे सकके। सरकार भी चाहती थी मंगोलिया के साथ अच्छे संबंध बने। तो सरकार ने वो स्वीकार किया और सरकारी स्तर पर वह कार्य हो पाया कि वहां के मैंने राजदूत से पूछा कि यहां पर कितने विहार हैं जिनको हमें ये सेट्स भेंट करने चाहिए तो उन्होंने कहा शशि बला जी ये यदि 70 तो
(54:27) चाहिए और कुछ रूस में भी हो तो अच्छा रहेगा। तो हमने पहली बार में 70 सेट्स 108 भागों के मंगोलिया के सभी विहारों को भेंट करवाए। उसके पीछे मेरा श्रम था, परिश्रम था, मेरी निष्ठा थी। दो वर्ष लगे क्योंकि सरकार से पैसा निरंतर निकलवाना, पब्लिशर तक पहुंचाना, ठीक से प्रिंटिंग हो, बाइंडिंग हो, सब कुछ ठीक हो। उसके लिए आपको बहुत कुछ ध्यान रखना पड़ता है। वो सब मैंने किया। उसके पश्चात उनके राष्ट्रपति के द्वारा यह सम्मान दिया गया। जिसके लिए मैं अपने आप को बहुत बौना समझ रही थी। पर उन्होंने दिया परंतु अच्छा कार्य हुआ जिसका भारत में मोदी जी कई अपने भाषणों
(55:11) में ये बात कह चुके हैं कि हमने मंगोलिया को कंजूर भेंट किया परंतु इसके पीछे क्या प्रयत्न था कैसे हुआ कंजूर क्या है उसमें क्या है इत्यादि इत्यादि भारत को नहीं पता तो ये लाभ होता है जब गड़े मुर्देव निकालते हैं क्योंकि लोग तो ये बोलते हैं कि इतिहास से क्या लाभ है आप इतिहास में रहोगे भारत की बस बातें करोगे 2000 साल की अभी कुछ हम इतने पीछे हो गए हैं और आप बैठ के बस लेकिन यह दिखता है कि अगर हम आज जब बात करते हैं तो इंडिया के मंगोलिया से रिलेशंस अच्छे ही हुए होंगे आपके काम की वजह से। तो आज के जो मॉडर्न जिओपॉलिटिक्स
(55:48) है वो इतिहास के कारण जब हम इतिहास खंगालते हैं उनका सम्मान करते हैं तो मॉडर्न रिलेशंस भी बहुत अच्छे हो जाते हैं। उसी को सॉफ्ट पावर कहते हैं। सॉफ्ट पावर कहते हैं। आचार्य जी एक बहुत इंटरेस्टिंग क्वेश्चन मेरे मन में आ रहा है क्योंकि हम एक एक काइंड ऑफ इंडोस्फीयर बोल सकते हैं क्योंकि बहुत से स्कॉलर्स बोलते हैं कि इंडोस्फीयर अच्छा शब्द मैंने देखा। अगर हम काइंड ऑफ इसको एक कम्युनिटी या एक सिविलाइजेशनल वैल्यू होल्डिंग एक एक कम्युनिटी को देखें तो हम जैसे देखते हैं कि क्रिश्चियंस होते हैं तो उनका वेटिकन सिटी की तरफ एक लगाव होता है या मुस्लिम्स
(56:21) हैं तो वो मक्का जाते हैं। चाहे किसी भी कंट्री के हो। तो क्या इन कंट्रीज के लोग जो भारत से इस तरह से जुड़े हुए हैं इनका भी सपना रहता है कि हम भारत जाएं, गंगा नदी देखें, काशी आए। अद्भुत बहुत रहता है और मैं लोगों से मिल भी पाती हूं। सबका तो पता तो नहीं चल सकता परंतु बहुत लोग हैं जैसे जापान के कुछ लोग हैं। एक बहुत हमारे साथ आते थे। हम मिलते थे। हम जाते थे जापान वो आते थे। सदा हमारा काफी अच्छा संबंध रहा उचिता जी के साथ। उचिता जी ने अपनी विल की थी कि मेरे दिवंगत होने के पश्चात मेरी अस्थियां गंगा में प्रवाहित की जाए। ऐसे भी उदाहरण
(56:56) मिलते हैं। कई उदाहरण एक नहीं। तो भारत से जो जुड़ाव है उसके पीछे हमारा 2000 साल का इतिहास है। यदि आप इतिहास को समझेंगे नहीं तो आप आज की राजनीति में जिओपॉलिटिक्स में इधर-उधर की उलझनों में उलझ के रह जाएंगे। आज भारतीय लोग मुझे कई बार बोलते हैं मेरा चीन पर जो इतना काम है उस पर देख के बोलते हैं ओ चाइना इज मिसयजिंग यू। नहीं नहीं चाइना मुझे मिसयूज नहीं कर रहा। मैं जानती हूं वो बात। आप नहीं जानते। हमारा और जो चीन का झगड़ा है वो कितने वर्ष पुराना है और हमारा जो चीन के साथ प्रेम का संबंध है
(57:44) वो कितना पुराना है उसको समझिए। और आज भी आप चीन जाइए तो आपको मित्र धर्म भक्त बहुत मिलेंगे। वो अलग बात है कि उनकी राज्य की व्यवस्था ऐसी है कि धर्म लिख नहीं सकते कि मैं क्या हूं धर्म से हम अपनी वो पहचान उनको बताना उसका परमिशन नहीं है। तो परंतु झंजन में आप जाइए आप मंदिरों में जाइए। कितने भक्त आपको दिखाई देंगे? कितनी पूजाएं हो रही हैं? चीन में। चीन में जापान में जाइए। भागदौड़ का जीवन है परंतु पूजा करते हैं। ऐसा नहीं है कि पूजा नहीं करते। जबकि चीन में तो शासन के द्वारा ऐसे आदेश है कि आप अपने घर से बाहर कुछ नहीं कर सकते।
(58:30) दिखा नहीं सकते कि मैं हूं। परंतु इतनी अद्भुत वस्तुएं हैं। एक बार मैं चिंगडू में किसी मंदिर में पहुंची। वो हनसांग का मंदिर है। वहां पर उनका स्कलब रेनिक रखा हुआ है और मंदिर का पुनर्निर्माण हो रहा था। तो मैं पहुंची तो देखा कि लोग ईंटें दान कर रहे थे। तो मैंने सोचा ये तो बड़ा अच्छा मेरे लिए पुण्य अवसर है कि मुझे भी करनी चाहिए। तो मैंने उनसे निवेदन किया जाके कि मैं भी ईंट दान करना चाहती हूं। तो वो बड़े प्रसन्न हुए और मैंने ईंट दी उन्होंने मेरे हाथ में और मैंने उस पर उनको नाम लिख के दिया कि आप लिख दो इस पे पर वो देवनागरी में मैं चाहती थी तो
(59:09) देवनागरी उनको लिखना नहीं आया तो उन्होंने मुझे ब्रश दे दिया कि आप लिखिए तो मैंने अपना नाम लिख के वो ईदा नाम पर किए इंडोनेशिया चले जाइए आप प्रतिवर्ष वहां पे एक कोटा होता है कि देश में इतने प्रतिशत ये लोग हैं तो इतने प्रतिशत लोगों को सरकार से सुविधा मिलेगी अपने के तीर्थ स्थान पर जाने के लिए तो हिंदुओं को भी वो सुविधा उसी अनुपात में मिलती है जितने इंडोनेशिया में हिंदू हैं। तो वो बाली का प्रतिवर्ष ग्रुप आता है और अनेक तीर्थों पर जाते हैं। विशेष रूप से गंगा स्नान करना तो उनके यहां बहुत ही पवित्र माना जाता है। हरिद्वार जाते हैं।
(59:49) मैं जब पहली बार बाली गई तो मैं वहां के गवर्नर की अतिथि थी और अपने साथ में गंगाजल जैसे मुझे पता था जब भी बाली जाओ इंडोनेशिया जाओ तो गंगाजल ले जाना चाहिए लोगों को अच्छा अच्छा लगता है उनको तो मैं पहले इसमें थी दिनपसार में थी तो बहुत से मित्र मिलने के लिए आए थोड़ा थोड़ा थोड़ा थोड़ा गंगाजल सबको दिया और अंतिम मेरा पड़ाव था जकार्ता में उस समय मेरे साथ वहां के मेंबर ऑफ पार्लियामेंट थे पुण्यत्मा ओका जी वो मेरे साथ थे तो मैंने कहा ओका जी नाउ द अमाउंट इज टू स्माल दैट वी कैन नॉट डिस्ट्रीब्यूट टू पीपल तो ऐसा करते हैं वी
(1:00:33) कैन गिव इट टू अ टेंपल सो टेंपल कैन यूज़ इट नॉट द फ्रेंड्स नहीं नहीं तो मुझे लगा इन्हें क्या हो गया गंगाजल को मंदिर में देने के लिए मना कर रहे हैं कहती नो नो इट विल बी स्टोलन मैंने उनके हाथ सामने नतमस्तक हुई कि वो देश जो गंगाजल की चोरी करता है। वो लोग जो गंगाजल की चोरी करते हैं। क्या बात है। तो ऐसे ऐसे बहुत सारे अनुभव अपने जीवन में आए जो कि हृदय को बस मंत्र मुक्त कर देते हैं। गंगा के तट पर तीर्थ यात्रा के लिए आना बहुत पुरानी परंपरा है। वियतनाम बौद्ध देश है।
(1:01:16) हम परंतु वहां के इतिहास में लिखा हुआ है कि वहां का एक राजा तीर्थ यात्रा के लिए भारत आया गंगा के तट पर गंगा स्नान के लिए और उसके पश्चात जब वो अपने देश लौटा तो उसके पीछे से चीनियों का आक्रमण हो गया था और उनके मंदिर ध्वस्त हो गए थे और उसमें सोने चांदी की जो मूर्तियां थी वो सब ले जाई जा चुकी थी। मंदिर टूट गए। कारण कई है मंदिरों के टूटने के। पर मुख्य बात यह थी कि मंदिरों में से मुख्य मूर्तियां क्योंकि सोने या चांदी की होती थी और शेष मूर्तियां धातु अन्य धातु की ब्रोंज की या अन्य की होती थी। उसको इतना कष्ट हुआ कि उसका वियतनाम पहुंच के हार्ट फेल हो गया।
(1:01:57) मंदिरों से इतना संबंध था एक राजा का। राजाओं के मंदिरों के साथ क्या संबंध थे? वो भी एक बहुत बड़ा विषय है। कैसे राजाओं ने मंदिर जितने बड़े मंदिर हैं वो राजाओं ने निर्माण करवाए हैं। सम्राटों के द्वारा बनाए गए। क्यों? क्योंकि मंदिर बनाना पुण्य कार्य था और पुण्य करना हर राजा अपना धर्म मानता था। यहां पर आचार्य जी एक मतलब इसको अदरवाइज मत लीजिएगा। एक क्वेश्चन है मेरा कि मान लीजिए कि धर्म पर चलते थे राजा। राजा धर्म को मानते थे या फिर वो चाहते थे कि धर्म का राज हो। राजनीति में धर्म हो। बट जो हमारी फाइनर फिलॉसोफीस हैं या फिर जो हम जिसको धर्म का
(1:02:39) तत्व कहेंगे जैसे सत्य बोलना अहिंसा पंचशील आदि है आर्य सत्य है अगर हम बुद्धिज्म की बात करेंगे तो वो इन सोसाइटीज में उतना क्यों नहीं दिखता जैसे हम चीन जापान को देखें बुद्धिस्ट चीन में आज मोस्टली एथिस्ट हैं लेकिन अगर आप जैसे बता रहे हैं कि मन ही मन कुछ अगर वो कर भी रहे हैं तो बुद्धिज्म सनातन इस तरह की प्रैक्टिससेस कर रहे हैं। जापान में बुद्धिज्म दिखता है। थाईलैंड तो बुद्धिस्ट कंट्री या इधर के जो कंट्रीज हैं। बट हम देखते हैं कि मांसाहार करते ही हैं या फिर इन मिलिटराइज्ड है ही। चीन जापान ने बहुत विध्वंस किया है। तो ये क्या फैशन है
(1:03:12) बुद्धिज्म ऊपर ऊपर कि हां हम एंजॉय कर रहे हैं और हमें दिखता है कि वो विध्वंस कर रहे हैं या फिर मांसाहारी या कुछ भी खा रहे हैं। देखिए मांसाह मांसाहारी होने का अर्थ यह नहीं है कि आप धर्म के कार्य नहीं कर सकते। जहां जो भोजन था लोग करते थे। हम आज भी करते हैं। ऐसा नहीं है कि यदि मैं मांस खाऊं तो मैं हिंदू नहीं रहूंगी। मैं पूजा नहीं कर सकती। हां कुछ नियम है कि हम इस दिन मंगलवार को हम ये मांसाहार नहीं बहुत सारे लोग होंगे तो ऐसा कुछ नहीं है। एक तो मांसाहार को हम धर्म के बिल्कुल विरुद्ध कर दें ऐसा नहीं है। दूसरी बात ये
(1:03:51) है कि आपने कहा कि वो लोग धर्म के तत्वों को मानते हुए दिखते नहीं। ऐसा भी नहीं है। देखिए विध्वंस करना का क्या अर्थ है? जब राज्य की स्थापना होती है तो राज्य का विस्तार होता है तो विध्वंस तो होता है। यह स्वाभाविक है। परंतु उसके कारण से राज्य का विस्तार ना करें वो भी कोई अच्छा कभी भी नहीं माना गया इतिहास में। और जिन राज्यों ने अपने राज्यों का विस्तार नहीं किया वो फिर धीरे-धीरे क्षीण होते चले गए। समाप्त भी हो गए। जैसे मंचूरिया है वो आज कोई देश नहीं है। तो विस्तारवादी होना या विस्तार है तो आप अहिंसा नहीं करेंगे। ऐसा
(1:04:28) भी नहीं है। चीन एक इतना बड़ा देश है। इतनी बड़ी जनसंख्या है तो वहां के लोग धर्मनिष्ठ नहीं है। ऐसा नहीं है। वहां के लोग दान नहीं देते, सत्कर्म नहीं करते। ऐसा नहीं है। सब कुछ करते हैं। अहिंसा की एक बड़ी सुंदर पुस्तक है जिसमें चीनी कलाकार के द्वारा ड्राइंग्स बनाई गई हैं। और एक कवि के द्वारा अहिंसा पर कविताएं लिखी गई हैं। जिनका संस्कृत अनुवाद और अंग्रेजी अनुवाद डॉ.
(1:04:56) रघुवीर ने किया। आपको दिखाएंगे। तो अहिंसा ऐसा नहीं है कि चीन जापान में अहिंसा नहीं थी। देखिए हिंसा और शक्ति दो में अंतर करना पड़ेगा। हिंसा जो होती है वो अकारण की जाती है और शक्ति जो होती है उसका आप उसका प्रयोग करके आप बल प्रयोग भी करेंगे और राज्य विस्तार भी करते हैं। आप इतनी पहले हमारे यहां कुछ युद्ध के नियम होते थे। सेनाओं सेना सेना सेना से लड़ती थी। लोगों की हत्या नहीं होती थी। उसमें नियम होते थे कि साय काल हो जाएगी तो आप नहीं कर सकते। आप युद्ध में हैं तो आप शरीर के इस अंग पर प्रहार नहीं करेंगे। आप महिलाओं पर प्रहार नहीं करेंगे। आप बच्चों को नहीं मारेंगे। आप
(1:05:34) शहरों में नहीं घुसेंगे। बड़े-बड़े युद्धों के मैदान होते थे जिसमें किया जाता है। कुरुक्षेत्र का मैदान आपके समक्ष बड़ा उदाहरण है। तो हम लोग शहरों में घुस के लोगों को नहीं मारते थे। तो नियम होते थे युद्ध के। आजकल कोई नियम पालन उस ढंग से नहीं हो रहे। तो विध्वंसकारी शक्तियां अधिक हो गई हैं। तो चीन जापान में दान नहीं करते या पूजा नहीं करते या धर्म के आचरण नहीं करते ऐसा नहीं है। चीन में इतना डिसिप्लिन है। इतना सत्यवादी भी है। ऐसा कुछ नहीं है। जहां उनकी आवश्यकता है ठीक है। राजनीति में सब कुछ बोलते हैं करते हैं। परंतु धर्म समाप्त हो गया। ऐसा नहीं
(1:06:13) है। ये मिथ्या धारणा है। और आचार्य जी जैसे आप संस्कृत भाषा को लेकर बहुत ढेर सारे मंत्रों को प्रमाणों को बीज मंत्रों को दिखाती हैं विदेशों से अलग-अलग जगह चीन, जापान आदि से तो मेरा एक ये प्रश्न आएगा जब संस्कृत का प्रभाव और इसके हमें प्रमाण मिलते हैं कि भारत से लोग गए। एक समय संस्कृत काइंड ऑफ यूनिवर्सल या हमारे संसार की लैंग्वेज थी। जैसे आज इंग्लिश है। क्योंकि मैंने भी जब कुछ रिसर्च की और पढ़ा तो मुझे ये पता चला कि चीन और इधर वियतनाम आदि के लोग संस्कृत सीखते ही थे कि उनको नालंदा में एडमिशन हो जाए या किसी भारतीय यूनिवर्सिटी में
(1:06:50) एडमिशन हो जाए। तो संस्कृत को लेकर वो बहुत काइंड ऑफ कह सकते हैं कि भारत में प्रवेश करने के लिए संस्कृत की एक आवश्यकता वो समझते थे। तो संस्कृत सीखते थे। मेरा प्रश्न ये है कि हमें यहां प्रमाण मिल रहा है संस्कृत भाषा का। ज्यादातर इंटरनेट पर जो वीडियोस हमें दिखती हैं इंडो यूरोपियन लैंग्वेज संस्कृत का संबंध दिखता है कि संस्कृत में जो भ्राता है वो ब्रदर बन गया आगे जाके या जो यहां पर मात्री है तो वो मदर बन गया। बट आप चीन जापान की लैंग्वेज में ऐसे संस्कृत के डायरेक्ट वर्ड्स उनकी मेंडेडरिन में या जापानीज में या वियतनामीज़ में या हमें थाई लैंग्वेज में
(1:07:26) मिलता है क्या? मतलब मैं आपसे कंफर्म करना चाहता हूं क्योंकि देखिए वेस्टर्न लैंग्वेज में मिल जाता है। ऐसा है कि संस्कृत की कई बातें हैं जो हमें समझनी चाहिए। एक तो आपने कहा कि जब भारत से बाहर जाते थे तो भारत में आते थे तो संस्कृत पढ़ते थे। इसके हमें प्रमाण भी मिले हैं। शिनचैंग रीजन जो है आज चीन का वहां से एक पांडुलिपि मिली है जो कि डायलॉग है दो भिक्षुओं का। जैसे आज आप कहीं विदेश जाएंगे तो आप एक छोटी सी पुस्तिकाएं प्राय हम लोग पहले जापान के लिए जाया करते थे कि 100 शब्द वाक्य हैं कि हम एयरपोर्ट पर उतरे तो हमें टैक्सी
(1:08:00) चाहिए होटल ये वो दिशा पूछनी है तो उस प्रकार करते थे तो उसमें दो भिक्षुओं का संवाद है और वो भिक्षु क्या संवाद कर रहे हैं? वो पूछता है कि आप कश्मीर से आए हैं क्या? चीनी भिक्षु पूछता है क्योंकि कश्मीर बहुत बड़ा केंद्र था ज्ञान का। तो पूछता है कश्मीर से आए हो क्या? फिर अगला प्रश्न करता है कि आप अपने साथ कौन से ग्रंथ लाए हो? क्योंकि जो भी भिक्षु जाते थे, विद्वान जाते थे, अपने साथ ग्रंथ ले जाते थे। फिर अगला प्रश्न पूछता है कि वथशान जा रहे हो क्या? क्योंकि जैसे हमारे यहां चार धाम है उनके यहां भी है जिसमें से एक है वथशान जो बहुत बड़ा धाम है। बहुत
(1:08:33) सारे मंदिर हैं आज भी वहां पर। तो फिर पूछता है कि क्या सम्राट से आपने समय निश्चित कर लिया? क्योंकि जो भारतीय भिक्षु विद्वान जाते थे तो वो लोग सम्राटों से अवश्य मिलते थे। तो जो भी बाहर से लोग आते थे, वह संस्कृत पढ़ते थे। जो बाहर जाते थे, वह भी संस्कृत तो जानते ही थे। सामान्य बात थी। जावा में संस्कृत सिखाने का एक बहुत बड़ा केंद्र था। इत्सिं जब चीन से भारत आ रहा था, तो मार्ग में छह मास उसने जावा में रुक के संस्कृत व्याकरण का अध्ययन किया। तो संस्कृत जो है वो पढ़ाने के केंद्र भी बहुत स्थानों पर थे। खोदान में भी था संस्कृत का केंद्र। और भी
(1:09:11) बहुत सारे हमें उदाहरण मिलते हैं कि संस्कृत विदेशों में भी पढ़ाई जाती थी। कंबोड कंबोडिया में आश्रमों के मंदिरों के साथ आश्रम जुड़े हुए थे। जिनमें कि भारत से पांडुलिपियां मंगाई जाती थी। जैसे वहां के शिलालेखों से मिलता है ये सब इतिहास कि कैसे भारत से रामायण मंगाई, पुराण मंगाए, मनुस्मृति मंगाई। लोगों ने मनुस्मृति को लेकर इतनी भ्रांतियां फैला दी है। इतना विरोध कर दिया है कि मनुस्मृति के ज्ञान को पता नहीं क्या कहां-कहां तक उसके निंदा का विषय बना दिया। परंतु मनुस्मृति एक अद्भुत ग्रंथ है और वह अनेक देशों में गया और इसके प्रमाण मिलते हैं। तो कंबोडिया
(1:09:50) में पाठ करने के लिए आश्रम जुड़े हुए थे, विद्यालय जुड़े होते थे, पुस्तकालय जुड़े हुए होते थे तो संस्कृत तो अध्ययन लोग करते थे। दूसरा आपने प्रश्न किया शब्दों का जितनी भी साउथ ईस्ट एशिया की दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों की जितनी भाषाएं हैं सब में संस्कृत है। लगभग 50 से लेकर 70% तक संस्कृत के शब्द है। ये कहना गलत है कि संस्कृत विश्व की सभी भाषाओं की जननी है। नहीं। संस्कृत जननी है केवल भारतीय भाषाओं की और संस्कृत ने पोषण किया है अन्य भाषाओं का। चाहे वो यूरोप की भाषाएं हो, चाहे वो साउथ ईस्ट एशिया की भाषाएं हो। उच्चारण भेद हो गए हैं। जैसे
(1:10:33) एक बार मैं वहां के एक बैंकॉक में एक संस्कृत अध्ययन केंद्र है। वहां पर थी तो उस सड़क का नाम था बोरोमो राजचा चौानी। तो मुझे बोरमोर राजचा चौानी एक बार में नहीं समझ में आया। परंतु कुछ बहुत कुछ सोचने के पश्चात और लोगों से चर्चा करने के पश्चात समझ में आया कि इसका अर्थ है ब्रह्मराज जननी। ब्रह्मराज जननी एक सड़क का नाम है थाईलैंड में। जब मैं पहली बार बाली गई तो मेरे साथ क्योंकि मैं गवर्नर की अतिथि थी तो इंटरप्रेटर गाड़ी सब होता था। तो मैं ड्राइवर को कहती थी भाई धीरे चलाओ गाड़ी को क्योंकि सड़क पे जितने बोर्ड होते थे
(1:11:18) मेरा मन करता था मैं हर बोर्ड को पढूं क्योंकि मैं अभी भूत जो जाती थी वहां के इतने सुंदर संस्कृत के नाम देखकर ऐसे आप जहां भी जाएंगे जहां भी जाएंगे आपको संस्कृत के नाम नगरों के नाम मीकोंग जैसे एक नदी है मीकोंग उसका अर्थ है मां गंगा अयोध्या है तो उसका है अयोध्या वरनगर ऐसे बहुत सारे नाम हैं जो कि संस्कृत के नाम है। चीन शब्द जो है चीन शब्द नाम जो है चीन का वो पता है आपको भारत ने दिया है संस्कृत का शब्द क्योंकि वहां पे उस समय छिन वंश का राज्य था। चीन में कहीं भी साहित्य में चीन शब्द देश के लिए नहीं मिलता। वहां तो हान चाइना छिन चाइना ऐसे
(1:12:00) करके मिलते हैं। क्योंकि जो वंश उस समय राज्य कर रहा है वो उस रूप में उसको लिख देता था। तो जब छिन वंश का राज्य था और भारत के साथ संबंध आया तो हमने छिन को चीन कर दिया क्योंकि हम संस्कृत वाले हैं और हम अकारांत शब्द होने से उसके रूप अच्छे सुविधाजनक हो जाते हैं। तो चीन शब्द जो है जो वो हमारे ग्रंथों में आता है। महाभारत तक में चीन शब्द आता है। चीन के साहित्य में चीन शब्द नहीं है। जो मेंडरिन है या चीनी भाषा है उसमें उसमें हां मेंडरीन चीनी भाषा में और जापानी भाषा में या तिब्बती भाषा में बहुत सारी भाषाएं संसार की ऐसी है जिनमें आपको
(1:12:34) संस्कृत के कुछ विशेष शब्द नहीं दिखेंगे। क्यों? क्योंकि उन्होंने अपने देश में नए शब्दों का निर्माण किया। अच्छा। अपनी और साउथ ईस्ट एशिया में संस्कृत को आधार बनाकर सारे यूरोप की भाषाओं में संस्कृत को आधार बनाकर नए शब्दों का निर्माण हुआ। जैसे एडवोकेट शब्द है अंग्रेजी में। एड वोक और इट तीन भाग है इसके एक उपसर्ग एक प्रत्यय और बीच में संस्कृत के धातु अब जो वोक है वह वच धातु से है मैं पूछती हूं कई बार लोगों से कि एन आई टी भी नाइट हो सकता है एन आई टी ई भी नाइट हो सकता है फिर इसमें जी एच क्यों आ गया हम तो वो संस्कृत के नक्त से बना है जिसको हम
(1:13:14) भूल गए दोहित्री शब्द है उससे डॉटर बना है डॉटर जब हम बोलते हैं तो डी ओ टी ई आर भी हो सकते हैं डी ओ टी ए आर भी हो सकते हैं डी ए पर जीएच क्यों आ गया? क्योंकि वो संस्कृत के दुहित से आया है। आजकल हमारा अनेक कोषों पर कार्य चल रहा है। एक बहुत बड़ा जो विराट संस्कृत कोष बन रहा है वो है संस्कृत अंग्रेजी कोष जिसमें कुछ सहस्त्र संस्कृत के शब्द पहली बार किसी कोष में आने की संभावना दिख रही है। दूसरा हमारा कार्य चल रहा है लिथवानियन भाषा में संस्कृत और तीसरा चल रहा है आर्मेनियन भाषा में संस्कृत। मैं आपको उसके शब्दों की समानताएं दिखाऊंगी। तो एक भारतीय होने
(1:13:51) के कारण आपको आप अद्भुत आपको अद्भुत लगेगा गदगद होंगे। लिथवानियन शायद संस्कृति सबसे क्लोजेस्ट वेस्टर्न लैंग्वेज है। जी लिथवानियन को बहुत अधिक क्लोज माना जाता है। उसके अनेक कारण है। जैसे संस्कृत में विभक्तियां हैं। लिथवानियन भाषा के कुछ शब्द ऐसे हैं जो सातों विभक्तियों में चलते हैं। हमारे यहां एकवचन, द्विवचन और बहुवचन तीन होते हैं। हिंदी में आते-आते हमारे पास केवल एकवचन और बहुवचन रह गया। द्विवचन छूट गया। परंतु लिथवानियन भाषा में कुछ शब्दों में द्विवचन भी है। फिर लकार हम जिसको टेंस कहते हैं। हमने हिंदी में केवल भूत, वर्तमान और भविष्य तीन ही
(1:14:29) रखे हैं। परंतु संस्कृत में 10 लकार हैं और टेंसेस हैं जिसमें कि लिथवानियन भाषा के कुछ शब्दों में हमें वो भी मिले हैं। लगभग हम कंक्लूजन की तरफ हैं। आचार्य जी जाने से पहले एक दो मैं बचे हुए प्रश्न पूछूंगा। एक तो जैसे आप भारतीय संस्कृति पर लगातार कार्य कर रही हैं। बहुत ढेर सारे प्रमाण आपको संस्कृत भाषा के, ग्रंथों के, त्यहारों के, कस्टम्स के, रिचुअल्स के आपको मिलते हैं। संस्कृत पर अभी जैसे आपका शोध चल रहा है। ट्रांसलेशंस और कोष डेवलप हो रहे हैं। तो इसमें आप आज के बच्चों को क्यों प्रोत्साहित करेंगे कि वो संस्कृत सीखें?
(1:15:11) जी। उसके कई कारण हैं। केवल इसलिए नहीं कि संस्कृत भारत की एक प्राचीन भाषा है। उसके अतिरिक्त बहुत सारे कारण है। मैंने इसका प्रयोग का एक उदाहरण आपको देना चाहूंगी। मेरा पौत्र पांचवी श्रेणी में आया तो उसके सामने प्रश्न आया फ्रेंच पढ़े, जर्मन पढ़े, रशियन पढ़े क्या पढ़े या संस्कृत पढ़े? तो मैंने कहा बेटा आप संस्कृत पढ़ोगे। बोला दादी मां कोई भी नहीं ले रहा। मैं अकेला हूं। मैंने कहा कोई बात नहीं मैं पढ़ाऊंगी। तुम संस्कृत लोगे। पर बच्चा है पांचवी श्रेणी का बहुत छोटा होता है तो मैं प्रतिदिन उसको कुछ एक कारण बताती थी और वह जाकर बच्चों से चर्चा करता
(1:15:48) था और अंत में 43 बच्चों का 43 बच्चों का संस्कृत का एक बैच बन गया बैच बन गया अब वो कारण क्या थे मैंने कहा बेटे देखो आप वो भाषा पढ़ना चाहते हो जो सबसे संसार की सबसे साइंटिफिक लैंग्वेज है या अनसाइंटिफिक पढ़ना चाहते हो तो उसने कहा नहीं नहीं साइंटिफिक पढ़ेंगे तो मैंने कहा अच्छा फिर आप यह बताओ कि आपने हिंदी के देवनागरी लिपि के स्वर व्यंजन वर्णमाला आप पढ़ते हो और दूसरी तरफ आप अल्फाबेट्स इंग्लिश के पढ़ते हो तो दोनों को जरा तुलना करो और मुझे बताओ कौन सा साइंटिफिक है? बच्चा था उसका मन इधर-उधर उसने सोचा तो बोला अच्छा मैंने बोला देखो हमारे पहले
(1:16:33) दो विभाजन है स्वर व्यंजन और फिर उनका एक क्रम निर्धारित है और व्यजों में भी हम कवर्ग अंदर से लेके आपकी मैंने उसे बोलने के लिए कहा क ख ग घ च छ ज झ यण ट ठ ड ढ ण त थ द ध उसके पश्चात प फ तो आप पूरा एक एक बहुत सिस्टमैटिक है सारा उसमें भी आप क ख ग ख पूरा एक सिस्टम से चल रहे हैं हम और अंग्रेजी में क्या है आपका अ ए बी सी डी आपर में कोई कनेक्शन नहीं। आपके स्वर और व्यंजन का कुछ पता नहीं। आपका सी एच केमिस्ट्री भी हो सकता है और च चेयर में च की ध्वनि भी दे सकता है। तो ऐसे बहुत सारे
(1:17:19) उदाहरण क्योंकि हम इलॉजिकल थिंकिंग की ओर बच्चों को डे वन से डाल देते हैं कि बेटा जो कुछ है ए बी सी डी है बस रट लो। हिंदी आपको देवनागरी का क्रम आए ना आए इंग्लिश का आना चाहिए। तो मैंने बच्चों को एक टंग ट्विस्टर के रूप में खेलना सिखाया। कुचुतपु कुचुट तू तू तू तू तू तू तू तू तू तूपु हम संस्कृत में सभी लोग जानते हैं ये तो एक व्यंजनों का हमारा स्वर निर्धारित हो गया साइंटिफिक अल्फाबेट बच्चे को समझ में आया उसने जाके कहा मैंने उसे एक कहा एक बेटा एक टेबल बनाइए उसमें लिखो वन टू थ्री फोर उसके बाद संस्कृत की लिखो गिनती उसके पश्चात अंग्रेजी की लिखो जर्मन की
(1:17:57) लिखो फ्रेंच की लिखो रशियन की लिखो क्योंकि बच्चे हैं आजकल सब इंटरनेट से निकाल के उसने सब लिख दिया। मैंने कहा अब यह बताइए कि टी ओ भी टू होता है। टी डबल ओ भी टू होता है। टी यू भी टू होता है। तो ये टी डब्ल्यू क्यों हो गया? इसमें व क्यों आ गया बीच में? और डब्ल्यू का कोई आपके पास पक्का उच्चारण भी नहीं है। डब्ल्यू का क्या उच्चारण है? बोलते डबल यू है। उच्चारण क्या करते हैं आप? तो मैंने ऐसे प्रश्न भी खड़े किए और उत्तर भी दिए। तो मैंने कहा देखो बेटा ये दो से निकला है इसलिए यहां है। फिर उसको रशियन का, जर्मन का, फ्रेंच का। मैंने कहा देखो यदि कोई
(1:18:39) भाषा अपने लिए गिनती भी नहीं बना सकती थी तो आपको वो भाषा पढ़नी चाहिए या वो भाषा पढ़नी चाहिए जिसके आपने सबको गिनती सिखाई। गिनती के बिना तो साइंस कहीं है नहीं। फिर मैंने उसे न्यूमरल सिस्टम ने कि भाई एक दो तीन चार फिर उसे रोमन दिखाया कि देखो एक के लिए एक डंडा, दो के लिए दो डंडे, तीन के लिए तीन डंडे। ऐसे चलती थी। बहुत कठिन थी लिखना। हमने नंबर सिस्टम बनाया। हमने ये किया ये किया ये किया सब उसको समझाया। उसके पश्चात मैंने जब वो थोड़ा और आगे बढ़ने लगा तो लॉजिकल थिंकिंग कैसे आती है? हम जो है हर हर शब्द का हम निर्वचन कर
(1:19:16) सकते हैं। मात्री पित्री क्यों बना? उसका अर्थ क्या है? सार्थकता क्या है? परंतु जब वो मदर और फादर बन गया तो फॉसिलाइज्ड हो गए। उसका आप निर्वचन किसी अंग्रेज से पूछिए नहीं दे पाएगा। आप किसी संस्कृत वाले से पूछिए आपको निर्वचन तुरंत दे देगा। तो ऐसे जितने भी संस्कृत के शब्द है हम उनके निर्वचन दे सकते हैं क्योंकि वह साइंटिफिकली डेवलप्ड है। फिर बच्चा जब थोड़ा आगे बढ़ गया लॉजिकल थिंकिंग पर आ गया। मैंने उसे कहा बेटे देखो जितनी भी आप भाषाएं पढ़ना चाहोगे यदि आपने संस्कृत का आधार बना लिया तो एक आपकी लॉजिकल थिंकिंग हो जाएगी। लिंग्विस्टिकली आप किसी भी भाषा
(1:19:52) को पढ़ने में आपको सरलता रहेगी और वो मेरा अपना अनुभव था। क्योंकि जब मैं बहुत बड़ी हो गई थी। मेरे दो बच्चे भी हो गए उसके पश्चात मैं जापानी भाषा पढ़ रही थी। तो मैं जब भी वो टीचर पूछती थी अंडरस्टुड तो मैं कहती थी हां तो एक दिन मुझे उसने क्लास के बाहर पकड़ लिया। बोली डू यू रियली अंडरस्टैंड और जस्ट से यस। तो मुझे भी थोड़ा आश्चर्य हुआ कि मैं समझ कर ही बोलती हूं। यस वैसे तो नहीं बोलती। उसकी मेरे साथ लगभग एक घंटा चर्चा हुई कि और अंतिम निष्कर्ष ये निकला क्योंकि मेरा संस्कृत का आधार है तो मैं कोई भी भाषा विश्व की शीघ्र पकड़ लेती हूं। समझ जाती
(1:20:26) हूं उसको। मेरे मन में एक रजिस्टर होना, एक उसका एक बैठना मन में जो होता है वो बड़े शीघ्र होता है। फिर मैंने उसे जेम्स मुरे की डिक्शनरी दी। स्कैन डिक्शनरी है। इंटरनेट पे पड़ी हुई है। कोई भी देख सकता है। बहुत अच्छा स्कैन नहीं है परंतु फिर भी कुछ तो है। तो मैंने उसे उसका पहला भाग दिया। मल्टीपल वॉल्यूम्स हैं 15 17 भाग मोटे-मोटे। तो मैंने उसको वो दिया पहला भाग और कहा कि इसमें एसकेआरटी क्योंकि उसने वो एब्रविएशन उसमें जेम्स मुरे ने प्रयोग किया। जेम्स मुरे जो है वो 1880 में पब्लिश हुआ और वो फर्स्ट डिक्शनरी है ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ऑन हिस्टोरिकल
(1:21:03) प्रिंसिपल्स तो उस समय एक बड़ी चेतना यूरोप में आई थी कि हमारी भाषा जिसकी भी भाषा संस्कृत के अधिक निकट जाती है तो वो अपने आप को गर्व की अनुभूति करता था क्योंकि डीपर द ब्रांचेस हायर द रूट्स तो वो एक उनको था कि हमारी भाषाएं इतनी पुरानी है संस्कृत तक जा रही है तो जेम्स मु ने अपने कोश में संस्कृत तक शब्दों को लेकर गया है मतलब रूट्स दिखाने रूट दिखाने के लिए तो उस बच्चे ने 800 से अधिक पहले भाग में से शब्द निकाले जिनमें एसकेआरटी प्रयोग हुआ था। बहुत कठिन कोष है बच्चे के अगर हम लोग भी पढ़ेंगे तो हमारे लिए भी कठिन है क्योंकि उसमें पूरी शब्दों की
(1:21:38) यात्रा दी गई है कि अंग्रेजी का ये अमुक शब्द पहले क्या था? उससे पहले क्या था? उससे पहले क्या था? क्योंकि एक पूरी यात्रा है संस्कृत से लेकर अंग्रेजी तक। तो उसको समझ में आ गया कि यह भाषा आप आज प्रतिदिन नए-नए आविष्कार कर रहे हैं। आपको नए-नए शब्द चाहिए। कहां से आएंगे? संस्कृत एक ऐसी भाषा है आप जितने चाहे शब्दों का निर्माण कर सकते हैं। लाखों शब्दों का निर्माण यदि आपको करना है वैज्ञानिक प्रगति के लिए, प्रौद्योगिक प्रगति के लिए तो हमें संस्कृत से आता है। अभी मैंने प्रौद्योगिकी शब्द प्रयोग किया। भारत में क्या है? तकनीकी
(1:22:18) टेक्निक का तकनीक बना दिया। उसकी कोई सार्थकता नहीं है। वो कुछ समय एक स्वतंत्रता के पश्चात ऐसा आया कि अरे चले चले शब्दों को ले लो। तो बहुत सारे शब्द चले चले ले संस्कृत में हिंदी में लिखना और बोलना आरंभ कर दिया जिसका कोई अपना परिवार नहीं है। हर शब्द का एक परिवार होता है। विधान है, विधायिका है, विधानसभा है। तो विधि है तो एक पूरा परिवार होता है हर शब्द का। वो तब होता है जब हम संस्कृत के आधार पर चलते हैं। नहीं तो आप नहीं बना पाएंगे। संसद शब्द है डॉक्टर रघुवीर ने दिया। उन्होंने कहा संसदीय संसद से ले आप जितने चाहे संसद
(1:22:57) से संबंधित जितने शब्दों की आवश्यकता है वो आपको एक शब्द से बहुत सारे शब्दों का निर्माण कर सकते हैं। विधि है, वैधानिक है। अनेक शब्दों का आप संस्कृत के कारण से निर्माण कर सकते हैं। अन्यथा नहीं कर पाएंगे। आज जो है यह समस्या आ गई है कि हम लोग नए शब्दों के लिए संस्कृत के नए शब्दों का निर्माण ना करके चलेच शब्दों का प्रयोग करना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि हिंदी के शब्दों की बहुत उपहास उड़ा दिया गया। लोह पत कामिनी आवत जावत ऐसेसे बहुत घटिया शब्द लोगों ने मजाक उड़ाने के लिए बना दिए। जबकि बहुत सुंदर शब्द है। रेल के लिए जैसे संज्ञान शब्द आचार्य जी ने
(1:23:34) बनाया। तो ऐसे उनके बनाए हुए 80 सहस्त्र शब्द 80 हजार 8 हजार शब्दों का पूरा कोष है। मैंने उसको इंटरनेट पर डाल दिया है। आप रघुवीर कोश में जाएंगे तो आपको मिल जाएगा। और ऐसे जितने भी उनके बहुत सारे कोष है कुछ पर काम हुआ कुछ पर नहीं हुआ। कुछ आधे अधूरे रह गए। कुछ का अभी हमने प्रकाशन किया पिछले छह सात वर्ष लगा के मैंने और उनके पुत्र डॉ.
(1:23:57) लोकेश चंद्र जी ने। वह अंग्रेजी संस्कृत कोष जो 1947 से पहले बन गया था। क्योंकि आचार्य जी को ये था। जब वो पहली बार यूरोप गए तो लोगों ने उनकी मजाक उड़ाई। अरे भारत स्वतंत्र होने वाला है। विकास करेगा। ये आप क्या बोल रहे हैं? भारत के पास तो शब्द नहीं है। वो विकास कैसे करेगा? शब्दों के शब्द भारत के विकास को आधार देते हैं। उन्होंने इसको चैलेंज लिया और ऐसे कोष बनाए जो कि भारत की आने वाली समय जो है उनको दिख रहा था। जब वो पहली बार यूरोप यात्रा पर गए 19 2930 में तो वहां उनको बड़ा चोट लगी कि हमारी भाषा में शब्द नहीं है तो उन्होंने शब्द निर्माण का कार्य किया और भगवान से
(1:24:36) प्रार्थना की कि हे भगवान जब तक मैं 20 लाख शब्द इस भाषा के लिए ना बना लूं तब तक मुझे इस दुनिया से इस संसार से उठाना मत परंतु जो भी ईश्वर का आदेश था 80 हजार तो बहुत शब्द कम आपको बता रही हूं वो एक कोश में उसके पश्चात उसका परिशिष्ट भी छपा था और उनकी बहुत बड़ी योजना थी भारत के लिए हर 600 जो भारतीय विद्याओं के ज्ञान के 600 क्षेत्र हैं सबके लिए वे शब्द दे सके नहीं दे पाए उससे पहले दिवंगत हो गए तो मेरा कहने का अभिप्राय है कि हमने अपने महापुरुषों के कार्यों को भुला दिया उनको आगे नहीं बढ़ाया कुछ लोग हैं जो उनके शब्दों के आधार पर नए शब्दों को बना रहे
(1:25:16) हैं। चीन जापान आदि में भारतीय शब्द या विदेशी शब्द क्यों नहीं है? क्योंकि वे अपनी भाषा के नए शब्दों का सतत निर्माण करते हैं। उसमें भी आचार्य रघुवीर का योगदान रहा दिशा देने में कि चीनी भाषा में नए शब्द कैसे कह सकते हैं और चीनी भाषा में नए शब्दों का निर्माण तिब्बती जहांजहां भारतीय संस्कृति गए भारत के ग्रंथ गए उनके अनुवाद हुए और उन अनुवादों के लिए नए शब्दों का निर्माण करना पड़ा तो भाषाई विकास हुआ। छोटी-छोटी जो बोलियां थी उनको व्याकरण ने आधार दिया। पाणिनी क्या आप जानते हैं मंगोलिया से कंबोडिया तक सब जगह था जाना जाता था अनुवाद होते थे लोग उसका
(1:26:00) अध्ययन करते थे अष्टाध्याय का अष्टाध्याय का पाणिनि को लोग आज भी जानते हैं तो व्याकरण पाणिनि जैसा व्याकरण पूरे संसार में नहीं है हमने भुला दिया आज आप हजार बच्चों को खड़ा कर लीजिए पूछ लिए पाणिनि तो कहेंगे क्या पानी क्या हमने भुला दिया तो व्याकरण से आधार मिलता है और केवल संस्कृत का व्याकरण है जो संसार का सर्वोत्कृष्ट व्याकरण है। आज हम टेक्नोलॉजी की बात करते हैं, सॉफ्टवेयर की बात करते हैं। 1985 में एक अमेरिकी विद्वान ने लिखा था कि संस्कृत इस द मोस्ट एप्रोप्रियट लैंग्वेज फॉर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट। आज तक तो हमने किया
(1:26:44) नहीं। भारत नहीं कर रहा। अब थोड़ा-थोड़ा लोगों ने इसमें अनुसंधान कुछ प्रयोग नए-नए प्रयोग कर रहे हैं। कहीं-कहीं सफलता भी मिली है। परंतु संस्कृत ही सबसे एप्रोप्रियट मोस्ट सूटेबल ऐसी भाषा है जो सॉफ्टवेयर में प्रयोग होनी चाहिए। हो सकती है। बहुत अच्छे सॉफ्टवेयर बन सकते हैं। भाषा के कारण, वैज्ञानिकता के कारण जो संसार की सबसे वैज्ञानिक भाषा है, सबसे समृद्ध भाषा है, क्या हमें भारतीयों को उसको नहीं पढ़ना चाहिए? पढ़ना चाहिए। हमारे विकास में हम देश के लिए योगदान अधिक कर पाएंगे। ऐसा मेरा सोचना है। बहुत सारे विद्वान इस बात को स्वीकार करेंगे।
(1:27:28) ऐसी आशा करते हैं। आचार्य जी बहुत ही अद्भुत चर्चा हुई और इससे पहले कि हम इसको समाप्त करें। मैं एक क्वेश्चन रखकर आप उत्तर मत दीजिएगा सो दैट कि आपके पास एक बहाना और हो दोबारा आने का और दर्शकों के पास भी एक बहाना हो आपको फिर से सुनने का। क्वेश्चन यही है क्योंकि भाषा की बात हो रही थी और मेरे लिए एक नाइट मेयर क्वेश्चन है। मतलब मैं जब भी समय मिलता है तो बात करता हूं। टीम में बात करता हूं। घर पे बात करता हूं। कभी भी फिलॉसफी या इस पर बात होती है। जब हम सोचते हैं कि हमारे लोग बाहर गए होंगे या यूरोप के लोग इधर आए होंगे या जब भी दो
(1:28:04) ऐसी सभ्यताएं जो अनट रही हो पहली बार मिलती होंगी तो वो भाषा का व्यवहार कैसे होता क्योंकि सामने अगर हम चीन गए पहली बार मान लीजिए तो वो क्या बोल रहे हैं हम क्या बोल रहे हैं हमें पता नहीं है कैसे एक दूसरे की भाषा समझ जाते हैं फिर उसके बाद एक दूसरे का ट्रांसलेशन बाद में ठीक है कि इंटरप्रेटर्स हैं और ट्रांसलेटर्स हैं वो लेकिन जब प्रारंभ होता है जब पहली बार सभ्यता ताएं मिलती हैं तो कैसे एक दूसरे की भाषा को समझती हैं? तो ये मैं चाहूंगा कि आप जब कभी और समय निकालेंगी तो हम भाषा संस्कृत भाषा और जो आपके और रिसर्च है जो आपका काम चल रहा है अभी आप
(1:28:41) रशिया भी जाने वाली हैं जापान में भी काम चल रहा है जापान की भी अभी एक सिटी का प्लान यूपी में चल रहा है तो जो हमारे इंटरनेशनल रिलेशंस बढ़ रहे हैं संस्कृति के आधार पर सॉफ्टवेयर पावर के आधार पर तो वो और तेजी से बढ़े और हमें फिर आपका सानिध्य मिले एक बार और तो अगली चर्चा में भाषा की गहराई में और जाना चाहता हूं क्योंकि लैंग्वेज कैसे डेवलप हुई है? कैसे हम यहां तक आए हैं? यह भी एक मिस्ट्री है अपने आप में। तो मैं चाहूंगा कि उस पर और हम चर्चा करेंगे। तो यदि आप दर्शकों के लिए अंतिम कुछ बोलना चाहती हैं, कुछ पुस्तकें सुझाना
(1:29:16) चाहती हैं या संस्कृति को कैसे वो अपनाएं तो आप अभी स्वतंत्र हैं। आप दर्शकों से कुछ अपनी जो राय है वो दीजिए और उसके बाद ही मैं इस एपिसोड को यहां पर समाप्त करूंगा। बहुत सारी भ्रांतियों में उलझा है हमारा युवा समाज। उनको पता ही नहीं भारतीय संस्कृति की विलक्षणता क्या है। तो मैं बस यही कहूंगी अपनी युवा पीढ़ी से कि भारतीय संस्कृति को समझें। उसे जाने क्योंकि अज्ञान के कारण माता-पिता भी कुछ नहीं बता पा रहे। बच्चे तो क्या समझेंगे। बहुत छोटी-छोटी बातें भी नहीं पता। तो अपनी संस्कृति की विलक्षणता, उसकी वैज्ञानिकता,
(1:30:00) उसकी ग्राहयता, उसकी जो विश्व भर में आवश्यकता है और आज के विश्व की जो समस्याएं हैं उनको हमारी संस्कृति कैसे कुछ मार्ग प्रशस्त कर सकती है उनको समाधान में इत्यादि कुछ विषयों पर चर्चाएं अधिक हो तो आज का जो बच्चा है वो लॉजिकल थिंकिंग है। हम वो हमारी वाली पीढ़ी थी जो वो थी कि पिताजी ने जो कहा हमने मान लिया आज का बच्चा नहीं मानेगा और क्यों माने ठीक है समय है उनको समझना चाहिए परंतु हमें स्वयं ही नहीं पता तो हम बताएंगे कैसे नहीं लॉजिकल थिंकिंग के कारण हो सकता है वो ज्ञान वापस आने लगे नहीं वो आएगा तभी क्योंकि वो लॉजिकली सोच
(1:30:44) रहे हैं और जब उन्हें समझ में आ जाता है तो उसको अपनाते हैं ऐसा नहीं है कि नहीं अपनाते तो संस्कृति हमारी पहचान है बनी रहे उसी से हम में गर्व की अनुभूति होती है और यदि हमने उसको छोड़ दिया तो पहचान भूल जाएंगे। संसार में आप कुछ भी बन जाइए परंतु यदि संस्कृति छोड़ दी तो आपका सम्मान नहीं है। जो व्यक्ति अपनी भाषा अपनी संस्कृति को नहीं बचा के रख सकता वो संसार में स्वाभिमान से जी नहीं पाता। सर ऊंचा उठा के जीने का तो सबकी इच्छा है। क्यों ना हो हमारी भी है, आपकी भी है, सबकी है। होनी चाहिए। हमें करना होगा। जो अपना सम्मान नहीं करता उसका कोई और
(1:31:28) सम्मान नहीं करता। नहीं करेगा। आचार्य जी बहुत आनंद हुआ आपसे चर्चा करके। बहुत हर्ष की बात है कि हम आपको फाइनली हाइपर क्वेस्ट पर आमंत्रित कर पाए और दर्शक भी आपको सुन पाए। इसी के साथ और भविष्य में एक और चर्चा की कामना के साथ मैं इस पॉडकास्ट को यहीं पर समाप्त करता हूं। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
Author Name:Hyper Quest
Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@HyperQuest
Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=uXdkAvaYmDA
Title: चीन, जापान और कोरिया में संस्कृत? Sanskrit Beyond India | Hyper Quest Ft. Dr. Shashi Bala
Author Name: Hyper Quest
Description: Sanskrit at the Great Wall of China? Saraswati worshipped in Japan? A Buddhist king who takes the Hindu title Rama?
Then the harder questions: was crossing the sea really a sin for Hindus, and is that why Buddhism reached everywhere? But then why would other nations adopt Hindu gods?
How did India’s knowledge travel this far, and why does the written proof survive in other countries, not here? Dr. Shashi Bala, Dean of the Centre for Indology at Bharatiya Vidya Bhavan, has spent decades tracing these links across Asia.
Watch the conversation to discover what India forgot, and who remembered.
------------------------------------------------------------
About The Guests:
Awarded Mongolia’s Order of the Polar Star, one of its highest civilian honours, Dr. Shashi Bala is an Indologist, Dean of the Centre for Indology at Bharatiya Vidya Bhavan. For over three decades she has traced India’s cultural links across Asia through Sanskrit, Buddhism and art, authoring more than 20 books and co-editing a nine-volume English–Sanskrit Dictionary.
-------------------------------------------------------
🕉️ Not sure where to start with Sanātan Dharma?
📜 Learn step by step, from basics!
👉🏼 Start Today: start.shikshanam.in
🎉 Special 20% Discount for Hyper Quest Subscribers, Use Code "HYPER20"
📱 For any Query, WhatsApp: +91-9910032165
Download Shikshanam App (Android): https://bit.ly/3LehPc5
-------------------------------------------------------
Chapters
00:00:00 How far did Sanskrit travel?
00:02:59 East still treats India as Guru?
00:05:35 Why India never wrote history
00:08:48 A Korean queen from Ayodhya?
00:11:06 Who took Sanskrit to China?
00:12:55 Did only Buddhism leave India?
00:15:11 Was sea travel a sin for Hindus?
00:22:41 Did Hindus go abroad too?
00:25:51 Gayatri mantra in China
00:30:35 Ramayana Played by Muslims!
00:32:59 Why is Hanuman white in Indonesia?
00:35:25 Prana pratishtha of a constitution
00:38:27 Sanskrit on the Great Wall of China
00:39:32 Why China and Japan Adopted Indian gods?
00:46:01 Did India really never attack anyone?
00:47:32 Why does Saraswati look different in Japan?
00:51:51 Why Mongolia honoured Dr. Shashi Bala Ji
00:56:10 Do Chinese still love India?
00:59:18 Why would they steal Gangajal?
01:02:19 Is their Buddhism just fashion?
01:06:15 Was Sanskrit the Global Language then?
01:09:59 Sanskrit not Mother of all languages?
01:12:42 Is English hiding Sanskrit?
01:14:40 Why should kids learn Sanskrit?
01:22:12 Does India need Sanskrit today?
01:27:30 What has India really forgotten?
—--------------
𝗪𝗮𝘁𝗰𝗵 𝗼𝘂𝗿 𝗠𝗼𝘀𝘁 𝗣𝗼𝗽𝘂𝗹𝗮𝗿 Podcasts:
🎥On Ancient Indian Mathematics with Prof C K Raju: • Did Calculus Reach Europe From India? | Hy...
🎥On Latest Ayurveda Research with Prof Bhushan Patwardhan: • Is Healing Possible Without Medicines? | L...
🎥On Ancient Indian Panchanga with Ashish Naredi Ji: • Hindu New Year Reveals Why India Fell Behi...
🎥On Indian Varna and Caste with Dr. Kundan SIngh: • The Real Reason why Brahmins are Targeted!...
🎥 On Sikhism and Its origin with Prof Jagbir Singh: • The Reality of Sikhism Most People Don’t K...
_________________________________
🚀 Want even more?
😁 Click on the Join button to get:
⏰ Priority Reply!
🎥 Member Only Exclusive Content!
_________________________________
About the host
Vishal is an IIT graduate who spends his time on the questions this channel is about: consciousness, the cosmos, and how a person should actually live. He hosts Hyper Quest, which investigates those questions. He also founded Shikshanam, which teaches the wisdom traditions in real depth to children and families, and The Prapancha, a studio building fictional worlds from Indian mythology.
👉 Invite him to speak: contact@hyperquest.in
----------------------------------------
CONNECT WITH US:
🔹 Instagram: / hyperquest
🔹 Facebook: / hyperquest
🔹 Twitter: / vishalonquest
----------------------------------------
धन्यवाद, आपके बहुमूल्य समय के लिए। 🙏🏼
Hashtags
#sanskrit #hinduism #buddhism #sanatandharma #podcast #hyperquest #indianhistory
Transcript:
(00:00) चीन की ग्रेट वॉल पर संस्कृत का मंत्र लिखा गया आज तक विद्यमान है। नाम जो है चीन का वो भारत ने दिया है। बौद्ध धन भारत से बाहर गया। लेकिन वैदिक परंपरा में लंबी यात्राओं को निषेध बताया गया है कि हम को ऐसी यात्रा बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। थाईलैंड बौद्ध देश है या हिंदू देश है? बौद्ध देश है? परंतु वहां पे जो भी राजा बनता है राम की उपाधि धारण करता है। ब्रह्मा जी की पूजा भारत में नहीं है जितनी वहां पर है। कोरिया के राजकुमार ने अयोध्या की राजकुमारी से विवाह किया। कुछ उनके यहां पत्थर मिले जो कि कोरिया के नहीं थे। मंगोलिया, साइबेरिया आदि जाएंगे,
(00:34) तो आप देखेंगे लोगों का जो जूता होता है, आगे से उठा हुआ होता था ताकि जूते की नोक जो है वो धरती मां को स्पर्श ना करे। इंडोनेशिया के दो द्वीप जावा और बाली। जावा की जो आकार है वो यव के समान है। बाली का बाली के समान है। कटाह द्वीप है क्योंकि उसका जो आकार है वो कढ़ाई के समान है। हमारे ऋषियों ने उनको देखा कैसे? आपने इंडोनेशिया का नाम लिया और हम लोग सुनते हैं कि वो 99% मुस्लिम्स रहते हैं वहां पे। इंडोनेशिया में व्यक्ति मुसलमान भी बन जाता है तो इतने सुंदर सुंदर संस्कृत के नाम रखते हैं सुपार्ड। वहां पे जब वो रामलीला करते हैं इतना बड़ा मंच होता है
(01:06) कि 200 300 कलाकार एक साथ आ सकते हैं। परंतु करने वाले तो सब मुसलमान होते हैं। हनुमान जी वहां पे भूरे नहीं होते। वहां सफेद हनुमान जी होते हैं। क्योंकि जब करने वाले सब मुसलमान देवी देवता तो पहले भी रहे होंगे चाइना जापान में। तो दूसरे के देवी देवता को अपनाना ये किस तरह की फिनोमिना है? बिलगेरिया में आप जाइए। कितने बड़ी संख्या में बिलगेरियंस हैं जो आश्रमों से जुड़े हुए हैं। पूजाएं करते हैं, हवन करते हैं, सब कुछ करते हैं। अद्भुत संसार है। वो देश जो गंगाजल की चोरी करता है। क्या बात है। आचार्य जी प्रणाम।
(01:55) नमस्कार। बहुत आनंद हो रहा है आपको हाइपरस्ट पर देखकर। बहुत ही अच्छा लग रहा है। बहुत दिनों से हम लोग चाहते थे कि आपके साथ बैठकर एक गहरी चर्चा की जाए। क्योंकि पिछले कुछ महीनों से मैं आपकी रील्स देख रहा था Instagram पे और बहुत अद्भुत लगता था जब आप बताती थी कि कैसे चीन में, मंगोलिया में, कोरिया में, जापान में और ना केवल ईस्ट एशिया में बल्कि आप ईरान में भी आप वहां पर तुर्की में भी जो सनातन धर्म के प्रमाण मिलते हैं, बौद्ध धर्म के प्रमाण मिलते हैं भारतीय परंपरा के और विशेषकर जो संस्कृत के मंत्रों के प्रमाण मिलते हैं। उनको मैं देखकर दंग रह जाता था।
(02:35) और जब सुनता था कि चीन में भी गायत्री मंत्र मिलता है। जापान में भी पिंडदान होता है। अभी पितृ पक्ष गया। जी तो मैंने आपके कार्यों को देखने का मतलब मन बनाया कि आप हैं कौन? जी। तो फिर देखा कि दर्जनों पुस्तकें आपने लिखी हैं। रिसर्च पेपर है। मतलब आपकी तपस्या ही 50 वर्षों की है कम से कम। जी। तो हमने टीम से अनुरोध किया कि आपके साथ एक चर्चा हो। जी। तो हम समझने का प्रयास करें कि भारत की जो विरासत है जी ये कैसे हम दर्शकों तक और गहराई से पहुंचा पाए। आपके कार्यों को देखा तो मुझे जो लगा मैं आपको बता रहा हूं। आप बताइएगा सही है कि नहीं है।
(03:13) कि जो हमारा प्राचीन भारत था वो एक गुरु की तरह था जो समय के साथ अपनी विद्या को भूलता गया। लेकिन उन उस गुरु के छात्रों ने उस विद्या को बचाए रखे और आज भारत उन छात्रों से वापस उस विद्या को ले रहा है। क्या मैं सही हूं इसको कहने में? वास्तव में था ही गुरु और आज भी यह देश भारत को गुरु मानते हैं। केवल अंतर इतना है कि भारत को नहीं पता कि वो किन कारणों से गुरु मानते हैं और गुरु बने तो कैसे बने। भारत ने देखिए कोई भी गुरु बनता है तो वह कुछ ना कुछ देता है। यह ऋषि मुनियों की धरती है। गुरुओं और आचार्यों की धरती है। इसके पास जो कुछ था इसने बिना किसी
(03:53) कॉपीराइट के बिना किसी पेटेंट के विश्व कल्याण के लिए दे दिया। हमारे जो धर्माचार्य थे वो किस प्रकार से कितने प्रकार के संकटों का सामना करते हुए कहीं मरुभूमियों को पार करते हैं तो कहीं विराट समुद्रों को पार करते हैं। कितने लोगों की इसमें जीवन लीला समाप्त हो गई? हमारे पास कुछ लिखा हुआ नहीं है। और हमारे किस गुरु ने पूरे विश्व में किस देश को क्या दिया हमारे पास कोई लिखित प्रमाण नहीं है। जो हमें लिखित प्रमाण मिलते हैं वो सारे दूसरे देशों से मिलते हैं। और वो देश आज भी भारत को गुरु मानते हैं। भारत गुरु है। परंतु भारत की अनभिज्ञता के कारण अज्ञान
(04:40) के कारण वो सब चीजें वो ज्ञान वो पीछे छूटता चला जा रहा है। तो बहुत ढेर सारी धाराएं जिसमें हम जा सकते हैं और मेरे मन में तो अभी बहुत ढेर सारे प्रश्न है। जैसे कि आपने बोला कि हम तो पेटेंट नहीं लेते थे। जो ज्ञान था हम देते थे। आज ऐसी स्थिति नहीं है विश्व में। आप सबसे अच्छी बात है कि संस्कृत और बौद्ध धर्म दोनों पर एक्सपर्ट हैं। तो मतलब अगर जैसे आज अलग-अलग लेंस से बौद्ध धर्म और सनातन धर्म को लोग देखते हैं तो वो भी हम यात्रा समझने का प्रयास करेंगे कि बौद्ध धर्म बहुत आवश्यकता है देश की सनातन धर्म औरकि आप सेंटर ऑफ इंडोलॉजी
(05:17) भारत विद्या भवन की डीन भी हैं। तो आप बहुत ढेर सारे देशों की यात्राएं भी की हैं। यहां पर जाकर प्रमाणों को इकट्ठा करना और उसको दर्शकों के बीच लेकर आना आपने अनवरत ये कार्य किया है पिछले कई वर्षों से। तो सबसे पहले कुछ मेरे मन में बहुत ढेर सारे प्रश्न आते हैं। एक तो जब हम ये बात करते हैं कि भारत विश्व गुरु है और भारत से लोग गए बाहर और ज्ञान का प्रवाह हुआ। तो चूंकि आप शोध कर रही हैं तो हम यहीं से प्रारंभ करते हैं कि आपको आपके शोध में क्या लगता है? वो पहले क्या इतिहास में बिंदु रहे होंगे या दिन रहे होंगे या कौन से साल रहे होंगे जब यह
(05:53) ज्ञान जाना प्रारंभ हुआ मतलब जो एविडेंस हमें जिसका मिलता है कब से जा रहा है अगर आपको पता है तो दर्शकों को बताइए या आपके एविडेंस में क्या मिलता है कि पहली बार जी इतिहास में क्या दर्ज है कि कौन लोग भारत से गए कहां गए जी देखिए जब हम ये विचार करने लगते हैं कि भारत का ज्ञान भारत से बाहर गया तो अनेक दिशा दिशाएं हैं और अनेक दिशाओं में अनेक देश हैं। अनेक देशों में अलग-अलग प्रकार के प्रमाण मिलते हैं। उन प्रमाणों को एकत्रित करके हम जो निष्कर्ष पर पहुंचते हैं वो यह है कि लिखित प्रमाण हमें पहली शताब्दी से मिलने आरंभ हो जाते हैं। फर्स्ट सेंचुरी से।
(06:36) परंतु निश्चित रूप से उससे पहले हमारे व्यापारी अपने धर्म को, अपनी संस्कृति को लेकर भारत से बाहर जा चुके थे। उसके पीछे भी कारण है मुझे यह बात कहने के लिए कि उससे पहले जो हमें लिखित प्रमाण मिलते हैं उससे पहले अवश्य कुछ ना कुछ संबंध रहा होगा। यह सुनिश्चित हो जाता है। कई कारण है उसके। अब वियतनाम की हम बात करते हैं। यदि आप दक्षिण पूर्व एशिया की बात करते हैं तो सबसे दूर हमसे वियतनाम है। वियतनाम में आप सोच सकते हैं कि वहां के किसी शहर का नाम कौठारेश्वरी होगा। जब वहां पर दूसरी शताब्दी में हमें संस्कृत का शिलालेख मिल रहा है। इसका अर्थ
(07:16) है कि संस्कृत वहां पहले पहुंच चुकी थी। जब राजा या प्रजा कोई भी जनसामान्य में यदि कोई संस्कृत को शिलाओं पर उत्कीर्ण कर रहा है इसका अर्थ है कि उसे संस्कृत का ज्ञान भी है। तो काफी समय हो चुका होगा। इसका अर्थ है कि पहले हो चुका जिसका हमारे पास कोई लिखित इतिहास नहीं है। क्योंकि भारतीयों ने इतिहास को उस ढंग से नहीं लिखा जिस ढंग से चीनियों ने लिखा या तिब्बत के लोगों ने लिखा या अन्य देशों ने लिखा। क्यों? उसके पीछे भी मैं कई कारण सोच रही हूं। मन में आते हैं कि ऐसा क्यों है? हम लोग इतिहास के प्रति इतने विमुख से क्यों हो गए? हमने
(07:56) कुछ लिखा नहीं। हम जो है जीवन को एक चक्र के रूप में देखते हैं। संसार एक चक्र है। जीवन एक चक्र है। जन्म मरण का चक्र है आपके पास। समय एक चक्र है। तो हम समय को लीनियर नहीं देखते कि जो आप आगे समय चला गया वो कभी लौटेगा नहीं। ऐसा नहीं है। तो और दूसरा था हमारे अंदर हो सकता है लोगों में उस तरह की ईगो भी नहीं थी। अहंकार भी नहीं था कि मैंने यह किया तो मैं इसे कहीं लिखित रूप में दे दूं। राजाओं ने अपने शिलालेख अवश्य स्थापित किए हैं। परंतु जो कलाकार है जो एक पत्थर को प्राण डाल देता है। उसको मूर्ति बना देता
(08:44) है। उसको भगवान बना देता है। उसका नाम नहीं है। बट जो आप फर्स्ट सेंचुरी का बता रही हैं प्रमाण वो क्या प्रमाण है? फर्स्ट सेंचुरी के मैं आपको कुछ प्रमाण देती हूं कि वो प्रमाण है जो हमारे पास कोरिया के राजकुमार ने अयोध्या की राजकुमारी से विवाह किया। अच्छा अयोध्या की राजकुमारी कोरिया गई। अब देखिए उस समय भारत इतना सक्षम देश था कि अनेक देश भारत के साथ अच्छे संबंध बनाने के लिए वैवाहिक संबंध स्थापित करता था। और ये बात वर्षों तक पता नहीं थी। वर्षों नहीं शताब्दियों तक नहीं पता थी। कोरिया के जो आर्कियोलॉजिस्ट हैं उनको बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनकी जो समाधि है वो
(09:29) तो कोरियन प्रिंसेस लिख रहे थे। उनको तो पता नहीं था वो भारतीय थी क्योंकि इतने वर्ष हो गए कभी किसी के पास इतिहास था नहीं उसका लिखा हुआ। उसकी समाधि पर मछली बनी हुई थी। मछली का बनाया जाना कोरिया में कहीं नहीं मिलता था। बड़ी विलक्षण बात थी। हम कुछ उनके यहां पत्थर मिले जो कि कोरिया के नहीं थे। है नहीं कोरिया के अभी भी हैं उनके यहां। तो आर्कियोलॉजिस्ट ने अनुसंधान आरंभ किया और बहुत लंबे समय तक अनुसंधान करने के पश्चात वो इस निष्कर्ष पर पहुंचे। अयोध्या में घरों में बाहर लोग चित्रकारी करके घरों पर मछलियां बनाते थे।
(10:17) उन्हें लगा यह हमारा समान कुछ दिखाई दे रहा है और रिसर्च और अनुसंधान किया तो उन्होंने समझा कि पौराणिक युग पुराण में लिखा हुआ है कि अयोध्या का जो आकार था वो मछली का आकार था। यहां से उन्हें आरंभ पता चला कि यह जो है इस राजकुमारी का संबंध अयोध्या से है। धीरे-धीरे अनुसंधान हुए। धीरे-धीरे प्रश्न की गुथियां सुलझनी आरंभ हुई और अब यह स्थापित हो चुका है कि 45 ईसवी 45 एडी में अयोध्या की राजकुमारी का कोरिया के राजकुमार से विवाह हुआ था और आज भी कोरिया के किम वंश क्योंकि वो राजकुमार
(11:05) किम था। किम जितने लोगों के साथ सरनेम किम लगता है, वह मानते हैं कि वह अयोध्या की राजकुमारी के वंशज हैं। दूसरा आपको पुष्ट प्रमाण देती हूं। चीन में क्योंकि मैंने कहा चीनियों ने बड़े अच्छे ढंग से सारा इतिहास लिखा है। चीन में 67 एडी 67 ईस्वी सन का शिलालेख मिला है। उसमें डेट डेट राजा उसका कौन सा राज्य का कौन सा वर्ष है इत्यादि इत्यादि सब लिखा हुआ है। और उसमें लिखा हुआ है कि दो संस्कृत के आचार्य काश्यप मातंग और धर्मरक्ष चीन पहुंचे। वो संस्कृत के ग्रंथ सफेद घोड़ों पर लेकर
(11:55) गए थे। सम्राट स्वयं अपने राजमहल से आया। उनका स्वागत किया और उनके निवास और उनके द्वारा संस्कृत के ग्रंथों के चीनी अनुवादों में सहयोग के लिए एक नए विहार की स्थापना की। जिसको कहते हैं श्वेताश्व विहार। चीन में है। चीन में है श्वेताश्व विहार। आज तक उन आचार्यों की वहां पर मूर्तियां हैं। वो जो धर्म ग्रंथ अपने साथ ले गए और केवल धर्म नहीं है। उसमें सभी प्रकार का ज्ञान है। सभी प्रकार की विद्याएं हैं। उसमें व्याकरण भी है। अब व्याकरण का धर्म से क्या लेना देना? परंतु ज्ञान
(12:42) हम ज्ञान को भी धर्म मानते हैं। तो इस प्रकार के प्रमाण आपको सुनिश्चित मिलते हैं और सबसे अच्छे जो मैंने आपको दो प्रमाण दिए जिनको कोई काट नहीं सकता वो ये हैं। जैसे कि आचार्य जी आपने बताया कि एक श्वेताश्व विहार की आपने बात की जहां पर संस्कृत आचार्य गए और उसके पहले हमने कोरिया का एक एग्जांपल देखा। जी तो जैसे कि अभी हम जितना पढ़ते हैं या समझ में हमें आता है तो मोस्टली मैं जो पढ़ा हूं मतलब आप मुझे करेक्ट कीजिएगा कि बौद्ध धर्म भारत से बाहर गया और विशेषकर सम्राट अशोक के समय में काफी प्रचार प्रसार हुआ। अभी जैसे आपने बताया कि संस्कृत के आचार्य
(13:24) हैं। हो सकता है कि वो भी बौद्ध धर्म के हो। मुझे आप करेक्ट कीजिएगा। बट जब हम बात करते हैं तो हमें ज्यादा दिखता है कि बौद्ध धर्म बाहर गया है। वैदिक परंपरा इतनी आप बताइएगा मुझे नहीं दिखती कि बाहर गई है। हम और वहीं पर हम मतलब मैंने पढ़ा था कि वैदिक परंपरा में बहुत ढेर सारे ऐसे हमारे जैसे बौद्धायन सूत्र है या फिर धर्म सूत्र हैं जहां पर लंबी यात्राओं को या विशेषकर समुद्री यात्राओं को निषेध बताया गया है कि अगर आप ऐसी यात्रा करेंगे तो आप वर्ण विहीन हो जाएंगे। ब्राह्मणों को ऐसी यात्रा बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। लेकिन अभी आप बता रही हैं कि संस्कृत लेकर
(14:02) लोग गए। जी। तो क्या ऐसा हिंदुओं में था कि हिंदू इसको पाप समझते थे इसलिए वो नहीं गए और बौद्ध धर्म के लोग ज्यादा देशों में जा पाए। देखिए एक तो ये बहुत बड़ी भ्रांति हमारे देश में है कि हिंदू अलग थे बौद्ध अलग थे। बुद्ध भगवान भी हिंदू ही थे। उनके माता-पिता हिंदू थे। उन्होंने जितने शास्त्रों का अध्ययन किया जो भी उनका ज्ञान था वो हिंदू धर्म ग्रंथों के आधार पर था। उन्होंने एक नया मार्ग प्रशस्त किया। ज्ञान का मार्ग था। तप का मार्ग था। बोधि प्राप्त की। हमारे देश के पूरे इतिहास में समय-समय पर ऐसा होता रहा है। समाज की आवश्यकताओं को
(14:44) देखते हुए नई-नई वस्तुएं नए-नए ढंग से ज्ञान जो है आता रहा। आज जो स्थिति बना दी गई है जो पहले नहीं थी। वो नहीं थी और आज भी नहीं है। उस पर भी मैं आपको कुछ बात करना चाहूंगी। हमारे यहां एक ऐसा तोड़ दिया गया है समाज को जबकि बौद्ध और हिंदू दोनों ही या जैन धर्म तीनों ही हमारे देश के धर्म है और तीनों का ही आधार ऋषियों मुनियों का तप त्याग और ज्ञान है। आपने कहा कि हिंदू लोग यात्रा नहीं उसमें वर्जित था कि भई आप
(15:29) लंबी यात्राएं करें। देखिए हमें दो तीन बातों को समझ लेना होगा। एक तो यदि एक विषय हर विषय हर ग्रंथ किसी ना किसी कारण से किसी समय पर लिखा गया है और किसी के लिए लिखा गया है। बौद्धायन शूत्र की आपने बात की कि उसमें वर्जित है। हो क्या रहा था कि लोग जब बहुत लंबी यात्राएं करते हैं तो वह दैनिक जो अपने जीवन का पूजा पाठ परिवार यदि पुरुष चले गए परिवार पीछे से पिछड़ जाते थे ऐसा बहुत लंबे समय तक होता रहा कि पुरुष चले गए जैसे गुजरात का राजा 5000 लोगों को लेके इंडोनेशिया जावा द्वीप चला गया परंतु वो पुरुष जाते थे महिलाएं
(16:16) तो नहीं जाती थी साथ में बच्चे तो साथ में नहीं जाते थे तो जब हम लंबी याद करते हैं तो उसको निषिद्ध कुछ लोगों के लिए किया गया। जैसे आपने कहा ब्राह्मणों के लिए निषेध किया गया। उसका मैं यह कहती हूं कि हर ग्रंथ में हमें देखना चाहिए। तब फिर उसका निर्वचन करना चाहिए। और भारत की आपको बात बता दूं। हमारा तो इतना लंबा इतिहास है। आप जानते हैं लोथल जो है विश्व का सबसे पुराना सीपोर्ट 3000 बीसी। सोच सकते हैं? हम इतने पुराने नेविगेशन वाले थे। इतना बड़ा हमारा और भी आप ईस्ट कोस्ट पर भी जाएंगे। इतने सारे हमारे पोर्ट सिटीज थे। व्यापार करते थे हम
(17:02) व्यापारी और इसीलिए आपको पोर्ट्स जो है पोर्ट सिटीज में मंदिर बहुत मिलते हैं। जब व्यक्ति विदेश यात्रा पर जाता था कठिन होती थी यात्रा। जाते समय ईश्वर की आराधना करके जाता था। हे भगवान मेरी यात्रा सफल हो। और जब आता था तो जैसे स्वर्ण दिव सोना लेने जाते थे। बहुत सोना लाए हम। आके वो बहुत बड़ी मात्रा में सोना भगवान को चढ़ाता था। जाते समय अपनी मालाएं मालाएं जो उसने पहनी हुई थी वो सब मंदिर में छोड़ जाता था। इसीलिए आप देखेंगे कई बार मंदिर में आपको डेकोरेशन में दीवारों पे ऐसे ऐसे मालाएं लटकी हुई। अब वो एक अलंकरण बन गया। वो परंपरा रही होगी। उसका लिखित इतिहास
(17:46) नहीं है। परंतु हम जैसे लोग निकाल ढूंढ-ढूंढ के निकालते हैं चीजें। तो इसीलिए जितने हमारे कोस्टल एरिया के मंदिर थे उनमें बहुत सोना था। और सब नष्ट हो गया। लूट लिया गया। भारत को सोने की चिड़िया कहा। सोने का शेर नहीं कहा। चिड़िया का शिकार बहुत आराम से हो जाता है। सोना ही सोना था। आसानी से शिकार करिए। शेर नहीं था वो। मैं बार-बार कहती हूं भारत सोने की चिड़िया था। इस पर हमें गर्व नहीं करना चाहिए। हमें भारत को सिंह के रूप में देखना चाहिए। सिंह जहां बन गए खिलौने। बड़ा सुंदर एक गीत आता है। तो भरत की कहानी हम लोग बच्चों को सुनाते
(18:30) हैं। हमने भी सुनी बचपन में कि सिंह से खेलते थे। तो भारत एक बड़ा महान देश था। परंतु बस जैसे भी है अब इतिहास आपके समक्ष है। जो कुछ भी हुआ सोने की चिड़िया का अब चिड़िया ही बन गया। सोना सब लुट गया। तो मेरा कहने का अभिप्राय है कि हमारा बहुत लंबा इतिहास है। हमारे यहां सबसे अधिक उन्नत नेविगेशनल शास्त्र था। हमारे जो नेविगेशन के इंजीनियर्स जिसको आज आप कहेंगे वो इतने ज्ञानी थे और उनको एक सिर्फ ये नहीं कि आपको बस जलयान चलाना आता है। नहीं उनको तारों का ज्ञान था। हम कहां जा रहे हैं? कौन से तारे आप पूरा आकाश भर सकते थे। समुद्र का जल का रंग बदलता है। उनको जल के
(19:15) रंग से पता चलता था। कौन सी मछलियां कहां मिलती है उसका ज्ञान होता था। हमारा जो गुजरात महाराष्ट्र का यह जो क्षेत्र है यहां पर बहुत लोग विदेश जाते थे। बहुत सारी कथाएं मिलती हैं। बहुत कथाएं कथा साहित्य जो है उसमें बहुत कुछ मिलता है कि हम विदेश गए। आप जानते हैं इंडोनेशिया के दो द्वीप जावा और बाली। क्यों है? जावा की जो आकार है वह यव के समान है। जौ के समान है। बाली का बाली के समान है। आम्र द्वीप का आम्र के समान है। और एक द्वीप है के जिसको कहते हैं मलेशिया में। केड़ा कहते हैं आजकल कटाह द्वीप है। क्यों? क्योंकि उसका जो आकार है वो कढ़ाई
(20:03) के समान है। हमारे ऋषियों ने उनको देखा कैसे? पहचाना कैसे? कि यह जावा है, यह बाली है, यह कड़ा है। तो ऐसी कहानियां मिलती हैं। सोपारा एक जगह होती थी। है अभी भी वहां से कितने हमारे लोग जाते थे। श्रीलंका जाते थे। वहां से के जाते थे। और पूरे साउथ ईस्ट एशिया में क्या और एक और जातक बौद्ध जातकों में भी ऐसा बहुत कुछ मिलता है। जैसे एक सुपारक जातक है। एक एक है बेबिलोनिया का वर्णन आता है उसमें। जातक बेबिलोनिया से क्या शब्द है उसका। तो वो कहता है कि उसमें वर्णन है कि भारत से लोग बैबलोनिया जा रहे हैं। हम सब दिशाओं
(20:48) में जाते थे। समुद्री यात्राएं भी करते थे। रेगिस्तानी यात्राएं भी करते थे। सब प्रकार की यात्राएं करते थे। और यहां तक था गुजरात का एक राजा 603 ईस्वी में हमारे पास यह लिखित नहीं है। हमें जावा से मिला है। 603 ईस्वी में पांच सहस्त्र भारतीय लोगों को छह बड़े जलयान और शेष छोटी नावों के साथ उन सबको लेके इंडोनेशिया जावा द्वीप पहुंचा। अगर आपके पास 200 यात्रियों का एक जलयान है और आपको दो मास एक यात्रा में कहीं रुकने का स्थान नहीं है तो इसका अर्थ है कि आप 200 लोगों का दो मास का आप भोजन और पानी दोनों साथ लेकर चल रहे हैं।
(21:36) लोगों के साथ-साथ आपको वो व्यवस्थाएं भी तो रखनी थी ना। तो विदेश यात्राएं वर्जित नहीं थी। केवल जैन धर्म में थोड़ा सा रोका जाता था इसलिए कि पशुओं के सहारे हम यान चाहे वो बैलगाड़ी हो चाहे वो घोड़ा गाड़ी हो दो ही मुख्य थी हम तो उससे पशु को कष्ट होता है तो हम पशु को कष्ट ना दें इसके कारण जैन मुनियों ने पैदल यात्राएं अधिक की अब पैदल यात्रा में और घोड़े में और उसमें तो अंतर आ जाता है तो वो उतनी अधिक यात्राएं इन जैन मुनियों की नहीं जितनी औरों की है और कहीं शायद ऐसा हो कि ब्रेन ड्रेन होने लगा हो तो बोल दिए हो कि अब नहीं जाना है
(22:20) बाहर जिस प्रकार से लोग हमारे पास ज्ञान को क्या हम आज भी कहते हैं कि धन और ज्ञान जितना बांटोगे उतना बढ़ेगा हमने कभी भी ज्ञान को रोका नहीं कि अरे हमारे देश से बाहर जा रहा है तो हम इसे रोक लें। यह आधुनिक समस्याएं हैं। ब्रेन प्राचीन काल की नहीं है। हम इस समय प्राचीन भारत की चर्चा कर रहे हैं। तो यह मतलब मिथ ही है कि इस तरह का कोई बहुत बड़ा निषेध हिंदुओं का नहीं था। जैसे लोग बोल देते हैं कि हिंदू नहीं गए। वो यहीं पर रहे और बहुत नहीं ऐसा कुछ नहीं है। हिंदू बहुत गए। तो आपको ऐसे कुछ प्रमाण मिलते हैं हिंदुओं के। इंडोनेश थाईलैंड में सबसे पुरानी
(22:57) मूर्तियां विष्णु भगवान की मिल रही हैं। वर्मा चले जाइए। चीन जापान की तरफ इधर तो साउथ ईस्ट एशिया चीन जापान में चलिए जापान की बात कर लेते हैं क्योंकि वही सबसे दूर आपको दिखाई दे रहा है। ऑफिशियली जो डेट मिलती है 552 एडी उनके रिटन रिकॉर्ड्स में बुद्धिज्म के आने की डेट है। अच्छा परंतु देवी सरस्वती और महाकाल और कुबेर तीन ऐसे देवता हैं जो उनका एक देव समूह है शच फुकुजन उसे मैं संस्कृत में कहती हूं सुमंगल सप्तक सात देवता हैं और मंगल की कामना के लिए उनकी पूजा की जाती है आज भी करते हैं जापानी लोग उसमें सरस्वती जी है
(23:44) उसमें महाकाल है उसमें कुबेर है। इसका अर्थ है कि वो लोग पहले से थे वहां बौद्ध धर्म के पहुंचने से पहले। तो मतलब ये परंपरा थी जाने की। परंपरा थी और ऐसा हुआ कि बौद्ध धर्म को सम्राट अशोक के कारण प्रश्रय मिला। सम्राट थे ना? हम और धर्म प्रचार के लिए भेज दिया। चारों दिशाओं में भेजा। कोई एक दिशा में तो भेजा नहीं। हम चारों दिशाओं में धर्म प्रचार के लिए भेजा तो वो बौद्ध धर्म चला गया। वो अधिक चला गया। आश्रय मिला उनको। आश्रय मिला और बहुत से राजा फिर बौद्ध बन गए। सम्राट बौद्ध बन गए। तो जब वो बने तो निश्चित रूप से फिर वो
(24:31) राजा राज्य से धर्म का का वर्धन होता है और धर्म से राज्य का। परंतु बौद्ध और धर्म हिंदू धर्म को अलग नहीं रखा गया। यह भी हमें समझ लेना चाहिए। आज आप कहेंगे कि थाईलैंड बौद्ध देश है या हिंदू देश है? बौद्ध देश है। परंतु वहां पे जो भी राजा बनता है राम की उपाधि धारण करता है। इस समय रामा 10 कहलाते हैं जो राजा है। पिछले वाले राम न थे। उनका नाम जानते हैं। उच्चारण में थोड़ा भेद तो आ गया। भूमि बल अतुल तेज। वो नम राजा का नाम था। उच्चारण भिन्न है। उच्चारण भिन्न संस्कृत क्या? जहां कहीं भी
(25:16) आप जाएंगे वहां आपको उच्चारण भेद दिखाई देगा। इंग्लिश में भी दिखता है और उनका राजा बौद्ध है। परंतु सारे राजसिक जो अधिष्ठान होते हैं जो उनकी सेरेमनीज़ होती है रॉयल सेरेमनी, स्टेट सेरेमनी जो भी कह दीजिए राज्या अभिषेक होता है। वो तो सब वैदिक होता है। आज भी थाईलैंड के राजा के राजगुरु तमिल ब्राह्मण है। कहां भेद था? चीन के एक सम्राट हुए छन। उन्होंने अपनी माता के जैसे आपने आरंभ करते समय गायत्री मंत्र की बात की।
(26:00) उन्होंने अपनी माता के 80वें जन्मदिन पर चीन में जितने भी संस्कृत के मंत्र चाहे वो हिंदू हो चाहे वो बौद्ध हो उनके लिए कोई भेद नहीं था। सारे इकट्ठे किए और 10 सहस्त्र से अधिक का एक संग्रह बनाया। उनको चार लिपियों में लिखवाया मानचू, चीनी, मंगोल और तिब्बती और अपनी माता के 80वें जन्मदिन पर भेंट किया। क्यों? क्योंकि जब व्यक्ति 80 वर्ष पूर्ण करता है तो वह अपने जीवन के एक सहस्त्र पूर्णिमाएं देख चुका होता है। सहस्त्र चंद्रदर्शी हो जाता है। और वह संग्रह डॉ. रघुवीर
(26:44) चव लाइन ने भेंट किया। वह भारत लेकर आए और उसके पश्चात उनके पुत्र डॉ. लोकेश चंद्र जी ने उसका प्रकाशन किया। 22 भागों में 22 भागों में उन मंत्रों का संग्रह प्रकाशित है और उसी में गायत्री मंत्र भी है। कोई भेद नहीं था। यह भेद बना दिए गए। हमारे उत्सव हैं। क्या आप जानते हैं कि कोरिया तो एक बौद्ध देश है परंतु वहां पर शरद पूर्णिमा भी मनाते हैं। तो वो हिंदुओं का उत्सव है या बौद्धों का उत्सव है? एक बार मैं थाईलैंड में थी और उनका नव
(27:30) वर्ष आया। नव वर्ष कैसे मनाते हैं? उसमें होली भी खेलते हैं। रंग बनाने का ढंग अलग है। पर पिचकारियां भी होती है बच्चों के हाथों में और बड़े सुंदर ढंग से भी होली खेलते हैं। जो मेरी मित्र है उसके घर पर मैं ठहरी हुई थी। उनका एक सहायक जो है वो मेरे साथ होली खेलने आया। तो उसने बड़े सुंदर पात्र में पानी डाला। उसमें कुछ फूल डाले और बड़े आदर पूर्वक मेरे हाथों पर ऐसे करके उसने वह पानी डाला। वो उसकी होली हो गई। हमारे यहां तो पुष्पों से होली के रंग बनाते थे, खेलते थे। अभी भी आप देखिए वृंदावन में पुष्पों की होली खेली जाती है। तो ढंग बदले हैं।
(28:17) परंतु यह धर्म अलग ना थे ना है। क्यों? क्योंकि दोनों ही त्यागियों, तपस्वीयों और ज्ञानियों का है। धर्म। उन्होंने हमें दिया है सारा ज्ञान। वो ज्ञान पवित्र है। उसमें जो बेसिक जो फंडामेंटल प्रिंसिपल्स हैं वह समान है। यदि हिंदू धर्म मानता है विश्व कल्याण होना चाहिए तो बौद्ध धर्म भी मानता है। यदि वो ज्ञान के प्रसार को अच्छा मानता है कहते हैं ज्ञान देने से बढ़ता है तो बौद्ध भी मानते हैं। यदि उन्होंने तप किया नदियों के किनारे बैठ के किया तो हिंदू ऋषियों ने भी वही किया। यदि उनको प्रकृति बड़ी सुंदर लगती थी तो उन्हें भी लगती थी।
(29:05) यदि प्रकृति उन्हें रितंबरा सब कुछ देने वाली ये धरती उसकी पूजा करते थे तो बौद्ध भी करते हैं। यहां तक कि बहुत सारी सुंदर सुंदर बातें हैं। जैसे आप मंगोलिया, साइबेरिया आदि जाएंगे तो आप देखेंगे लोगों का जो जूता होता है वो आगे से उठा हुआ होता था। ताकि जूते की नोक जो है वह धरती मां को स्पर्श ना करे। इतना आदर इंडोनेशिया में जाइए। अद्भुत संसार है। एक बार मैं आपको थाईलैंड की एक बात बताती हूं। मैं एक कॉन्फ्रेंस में गई तो जिस होटल में ठहरना था पहले से पता ही होता है
(29:49) सब कुछ। तो मुझे पता था इस होटल में ब्रह्मा जी की कोई बहुत बड़ी मूर्ति है। बड़ी सुंदर वो घरघर में ब्रह्मा जी की पूजा सड़कों पर ब्रह्मा जी की पूजा। ब्रह्मा जी वो कहते हैं क्योंकि ब्रह्मा इज अ क्रिएटर। सो ही कैन गिव एनीथिंग दैट यू वांट। बौद्ध है ना परंतु ब्रह्मा जी की पूजा भारत में नहीं है जितनी वहां पर है। तो मैंने बहुत होटल में कई लोगों से पूछा कि प्रयत्न किया उनको समझाने का। फिर एक व्यक्ति मेरी बात को समझ गया कि मैं क्या देखना चाहती हूं। ओ यू मीन फोर फेस बुद्धा उनके लिए ब्रह्मा भी बुद्ध ही है। वो भगवान के पुजारी हैं। उनको ये नहीं है
(30:31) ब्रह्मा है तो हम नहीं पूजेंगे वो बौद्ध देश। ऐसा कुछ नहीं है। इसमें आपने इंडोनेशिया का नाम लिया और हम लोग सुनते हैं कि वो 99% मुस्लिम्स रहते हैं वहां पे। तो ये कल्चरल वहां पर क्लैश ऐसे आपको महसूस हुआ वहां जब आप थी कि किस तरह से उन्होंने इस मतलब जो उनके कल्चर में अभी भी एंशिएंट हिंदूज़्म और बुद्धिज्म है वो कैसे मेंटेन किए हुए हैं। देखिए ये भारत है जहां पे धर्म और संस्कृति को इस ढंग से मिलाजुला दिया गया जो कि इंडोनेशिया में नहीं है। इंडोनेशिया में व्यक्ति मुसलमान भी बन जाता है। तो इतने सुंदर-सुंदर संस्कृत के नाम रखते
(31:08) हैं। कॉर्नो आपने तो आपको मतलब आप उनकी कुछ भी उठा के देख लीजिए तो आपको सब संस्कृत के नाम दिखेंगे। उनकी जो पहचान है वो मुस्लिम नाम बहुत कम रखते हैं। उनका कहना यह है कि वो हमारा धर्म है। यह हमारी संस्कृति है। यदि वो रामायण बैले करते हैं, हम प्राय मुसलमान होते हैं। रामायण का बैले जितना भी इंडोनेशिया में होता है, इतने अद्भुत ढंग से होता है। ब्रह्मानंद में यदि आपका कभी जाना हो तो अवश्य देखिएगा। पूर्णिमा से एक दिन पहले और एक दिन बाद तीन बड़ा भारी उत्सव होता है। रामायण ब्रह्मानंद के प्रांगण में ब्र परमानंद संसार का सबसे बड़ा शिव मंदिर है।
(31:54) वहां पे जब आप रामलीला करते हैं। इतना बड़ा मंच होता है कि 200 300 कलाकार एक साथ आ सकते हैं। अद्भुत होता है। दर्शनीय है। मैं जितनी बार जाती हूं जावा अवश्य देख के आती हूं। परंतु करने वाले तो सब मुसलमान होते हैं। भारत में भी उनकी मंडलियां आती हैं। एक बार जैसे दूरदर्शन वाले इंटरव्यू ले रहे थे तो उस साक्षात्कार में मेरा भी था और उन लोगों का भी था। तो जो राम बना था वो भी खड़ा था वहां और मैं भी खड़ी थी। तो जो राम बना था उसका जब साक्षात्कार चल रहा था तो कहता है आई एक्ट एस रामा बट आई डोंट लाइक हिम। तो स्वाभाविक रूप से पूछा गया
(32:38) अगला प्रश्न था कि ऐसा क्यों? तो उसने कहा बिकॉज ही स ह वाइफ टू एक्साइल ही डिड नॉट गिव टू ह वाइफ व्हाट ही शुड हैव गिवन। तो उनकी जितनी समझ है भगवान राम ने देवी सीता का परित्याग क्यों किया? फिर वहां पे कितनी रामायण कितने ढंग से खेली जाती है? क्या कारण है? वहां पे अंतर क्यों आ गए? वहां पे हनुमान जी सफेद रंग के क्यों बनाए जाते हैं? हनुमान जी वहां पे भूरे नहीं होते। वहां सफेद हनुमान जी होते हैं। क्योंकि जब उनकी उनकी कथा है। बहुत सारे अंतर आए हैं कथाओं में। भारत में भी 300 प्रकार की रामायण आपको मिल जाएगी। विदेश में भी अलग-अलग प्रकार की
(33:20) रामायण मिलती है। मुख्य धारा वही है। मुख्य कथा वही है, कथानक वही है। तो उनकी उनका विश्वास है कि जब हनुमान जी माता अंजनी से विदा लेकर जा रहे थे तो उन्होंने कहा कि मुझे मेरे जो क्या कह आराध्य हैं राम वो मुझे पहचानेंगे कैसे कि मैं उनका भक्त हूं। तो माता अंजनी कहती है कि जो तुमसे यह प्रश्न करेगा ना और बोले मैं कैसे पहचानूंगा वो तो सन्यासी बन चुके हैं। मुझे कैसे पता चलेगा? तो माता अंजनी कहती है कि जो तुमसे यह प्रश्न करेगा कि बंदर तो भूरे होते हैं तुम सफेद क्यों हो? तो समझ लेना वही श्री राम है। तो वहां पे अभी
(34:07) भी हनुमान जी को सफेद रंग का बनाया जाता है। तो बहुत सारी आनंद के विषय हैं। जितना अंदर अंदर आप जाते जाइए आपको नए-नए विषय निकल के आते रहेंगे। मैंने ये भी सुना है कि जितना हम धीर गंभीर हनुमान जी को लेते हैं भारत में थाईलैंड और इंडोनेशिया में हनुमान जी को थोड़ा चंचल और वो टूरिज्म वो टूरिज्म। अच्छा क्योंकि आपके सामने 500 लोग हैं। अब आप कुछ एक्टिंग कर रहे हैं तो वो कुछ ना कुछ पुट ऐसा डाल देते हैं कि चंचलता अधिक बढ़ा देते हैं उनकी और वानर बुद्धि जो वानर के रूप में जो उनकी क्रियाएं हैं उनको थोड़ा बढ़ा दिया उन्होंने तो वो उसमें एक
(34:46) टूरिस्ट अट्रैक्शन का भी एक कारण रहा है। क्योंकि देखिए ये सब वस्तुएं चलती तभी है जब लोग उसको देखते हैं, समझते हैं, सुनते हैं और लोग तभी आते हैं जब उनको कुछ ज्ञान तो उनको थोड़ा कठिन लगता है। मनोरंजन में अधिक आकर्षण तो उसको अधिक मनोरंजन का साधन बनाने का भी एक प्रयत्न होता है। आचार्य जी जैसे अभी आप थाईलैंड में बता रही थी कैसे वहां पर धर्म और राजनीति एक ही साथ है। जैसे भारत में ठीक है। धर्म के तत्व तो हमारी राजनीति में भी है लेकिन उतना प्रखर मुखर नहीं है। इसमें कहा जाता है कि राजनीति से धर्म को अलग रखो। अलग रखो। यह एक प्रश्न खड़ा होता है। इसलिए कहा
(35:25) मैंने मैं आपकी ही वीडियो देख रहा था बहुत इंटरेस्टिंग सी जिसमें आप जापान के बारे में बता रही थी कि जब वहां कॉन्स्टिट्यूशन की प्राण प्रतिष्ठा हुई है। तो उसके विषय में भी बताइए कि ये क्या कांसेप्ट है? ये बहुत पहले की बात है या अभी की बात है? नहीं ऐसा है। छठी शताब्दी में एक राजकुमार हुए शतकशी। अच्छा जो बड़े विद्वान थे और तब चीन जापान में चीनी लिपि चीनी लिखी लिखने की जो शैली थी वो चीनी लिपि थी। चीन से उनका कोरिया के माध्यम से संपर्क पहला स्थापित हुआ था। हमारा सीधा संबंध जापान के साथ कब कैसे हुआ इस पर अनुसंधान बहुत ही ना के बराबर है। हुआ है परंतु हमें
(36:07) इतना नहीं पता। चीन से जो ग्रंथ गए तीन ग्रंथ थे सधर्म पुंडरिक सूत्र विमल कीर्ति निर्देश और प्रजना पारमिता या तीन तीन ग्रंथ थे जिन पर शतगुप्त ऐष ने टीकाएं भी लिखी और वो पूरे बौद्ध दर्शन के ज्ञाता भी थे और पूरे भक्त भी थे। उन्होंने पहला जापानी संविधान बनाया। उसका जो आधार था वो पंचशील और 17 आर्टिकल कॉन्स्टिट्यूशन आप गूगल कर सकते हैं। और उसका आधार था बहुजन हिताय बहुजन सुखाय। हित और सुख दोनों की आवश्यकता होती है। आपने हित किया पर सुख नहीं है। सुख दिया परंतु हित नहीं है। उसकी भी सम्राट अशोक
(36:54) के समय से यह धारणा आरंभ हो गई थी। यह प्रश्न खड़ा हो गया था। उन्होंने धर्म के नाम पर क्या किया? सराय बनवाई, हॉस्पिटल बनवाए, पशुओं के लिए, चिकित्सालय जो कुछ भी किया वो बहुजन हित और सुख के लिए किया। तो यह विचार जापान के पहले संविधान का आधार था। 17 आर्टिकल कॉन्स्टिट्यूशन कहते हैं उसको। और जब ये लागू किया गया प्रोमल्गेशन ऑफ द फर्स्ट कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ़ जापान उसके लिए संस्कृत का एक मंत्र मंगाया गया। उसकी पांडुलिपि उनीश विजय धारणी नाम से आज तक वहां के होरियो जी नामक मंदिर में सुरक्षित है। ये कब की बात है? शुद्ध कुदशी के समय छठी सातवीं शताब्दी
(37:41) अच्छा अच्छा तो उसमें जो है आपने कभी भी पूरे विश्व के इतिहास में भारत को भी उसमें मिला लीजिए कभी भी ऐसा नहीं देखा होगा कि किसी संविधान के लिए ऐसा एक अनुष्ठान किया गया कि उसमें धर्म के प्राण डाले गए। आधार भी वही और उसमें फिर उसके लिए एक रिचुअल आप जिसको कह सकते हैं संस्कृत के मंत्र का पाठ किया उष्णीश विजय आधारणी उष्णीश क्या है उष्णीश का अर्थ प्राय लोग पगड़ी बोलते हैं परंतु उसका अर्थ है सर्वो सर्वोच्च सर्वोच्च विजय की कामना से हमने यह संविधान बनाया है और यही उष्ण विजयधारणी
(38:29) चीन की महाभित्ति पर भी उत्कीर्ण है। पूरे विश्व में केवल एक वस्तु है जो मानव निर्मित है और चंद्रमा से दिखाई देती है और वह है चीन की महाभिद्धि चीन की दीवार चीन की ग्रेट वॉल ऑफ चाइना हम चीन की ग्रेट वॉल पर संस्कृत का मंत्र 13334 में लिखा गया आज तक विद्यमान है। ये वही उष्ण विजय धारणी है। इसकी धारणी वही है। उसको छह लिपियों में लिखा गया ताकि जो भी जिस लिपि का ज्ञाता हो वह उसे पढ़ सके। अभी तक है परंतु ज्ञात नहीं है किसी को भी। हजारों लोग जाते हैं प्रतिदिन परंतु किसी को यह बताया नहीं
(39:14) जाता कि यहां पर संस्कृत का मंत्र है। कौन बताएगा? भारत बताएगा। भारत किसकी नजर पड़ी सबसे पहले? डॉक्टर रुघवीर जी जब चीन गए तो वो उसकी स्टपेज लेकर आई थी और वो मेरे पास है। अच्छा उसकी प्रति मेरे पास है उसपेज की। आचार्य जी इतना अद्भुत लग रहा है आपको सुनकर। मेरे मन में एक प्रश्न यह आ रहा है जैसे कि हमने जब बात प्रारंभ की तो आपने बताया कि बिना पेटेंट के जो ज्ञान है वह और किसने लिखा है किसने रचना की है उसका भी कोई जिक्र नहीं करते हैं। आज के समय में भी अगर मैं इस इस सिचुएशन को सुपरइइोज करूं तो आज भी बहुत ढेर सारे देश के लोग
(39:54) दूसरे देश जाते हैं। टेक्नोलॉजी का व्यापार होता है। एक दूसरे को के साथ कोलैब करते हैं। लेकिन आज हम यह देखते हैं कि टेक्नोलॉजी लोग ले लेते हैं या हो सकता है एंटरटेनमेंट ले लें दूसरे देश की मूवीज देख लें लेकिन रिलीजन नहीं लेते उस पर टिके रहते हैं ज्यादातर फाइट यही दिखती है कि तुम भाई अपना रिलीजन अपने पास रखो हां हो गए आप क्रिश्चियन मैं हिंदू हूं आपकी मूवीज देख लूंगा आपके गाने सुन लूंगा तो उस समय जब ऐसे लोग जाते रहे होंगे तो आयुर्वेद ले गए चलिए समझ में आता है कि किसी की जान बच गई या संगीत शास्त्र लेकर गए तो संगीत में कुछ नया ज्ञान मिल गया
(40:31) लेकिन देवी देवता तो पहले भी रहे होंगे चाइना जापान में या अन्य जगहों पर अपने-अपने ऐसे समय में दूसरे के धर्म को अपनाना उनकी देवी देवताओं को अपनाने जैसे आप सरस्वती माता की बात करते हैं कि चीन या जापान में सरस्वती माता दिखती हैं वहां ब्रह्मा जी दिखते हैं तो अपने देवी देवताओं को होते हुए दूसरे के देवी देवता को अपनाना ये किस तरह की फिनोमिना है उस समय आपके प्रश्न में पहला प्रश्न तो यह है कि कोई दूसरे के धर्म धर्म को अपनाना नहीं चाहता। वो कहता है भाई ठीक है तुम हिंदू हो तुम्हारा ये सब तो ले लेंगे परंतु धर्म नहीं लेंगे। एक तो यह भी मिथ्या धारणा है।
(41:07) अच्छा मैं ऐसे बहुत से लोगों से मिलती हूं जो पूरे हिंदू क्रिश्चियन है परंतु पूरी तरह से हिंदू धर्म का पालन करते हैं। उसके पीछे क्या-क्या कारण है वो एक अलग चर्चा का विषय हो जाता है। अभी भी मैं अब अगले सप्ताह ही मैं रशिया जा रही हूं। रूस में मैं कुछ ऐसे लोगों के बीच में हूं जो जूना अखाड़े से जुड़े हुए हैं। महामंडलेश्वर बने हुए हैं और वो क्रिश्चियन है। अच्छा बिल्गेरिया में आप जाइए। कितने बड़ी संख्या में बल्गेरियंस हैं जो आश्रमों से जुड़े हुए हैं। पूजाएं करते हैं, हवन करते हैं। सब कुछ करते हैं। तो ऐसा कुछ नहीं है। एक दिन विमान में मैं
(41:51) अमेरिका से आ रही थी तो जो मेरे साथ सह यात्री थी, एक महिला अफ्रीकन दिख रही थी दिखने में। अमेरिका से आ रही थी। वो निरंतर बैठ के माला फेरती रही। तो मैंने जब उसको माला करते करते फिर जब उसकी समाप्त हुई तो मैंने उससे पूछने का प्रयत्न किया कि भाई पर वो क्रिश्चियन थे तो ऐसा कुछ नहीं है। देखिए आज का व्यक्ति खुले मन का व्यक्ति है। वो यह देखता है मुझे एक मधुमक्खी के समान अलग-अलग फूलों से रस लेना है। उसको बिना डैमेज किए हुए। उसको कोई क्षति नहीं पहुंचाती मधुमक्खी। उसका रस चूस लेती है। फूल को पता भी नहीं चलता। फूल को कोई कष्ट
(42:33) नहीं होता। तो वो लोग अपनी इच्छा से जिस धर्म में जो उनको अच्छा लगा उसको अपने जीवन में उतार लेते हैं। यदि पूजा करके मन की शांति होती है। भगवान जैसे आपने पूछा उन्होंने हमारे देवी देवता क्यों ले लिए? कैसे ले लिए? ऐसा होता है कि टम कल्चर था। हम टोम कल्चर जो है वह मृत्यु से जुड़ा हुआ है। वो जीवन से नहीं जुड़ा हुआ। व्यक्ति जीवन इस संसार में आता है। जीवन जीने के लिए आता है। मृत्यु की तैयारी करता है। उसको जीवन में बहुत कुछ चाहिए। वो कहां से प्राप्त होगा? यदि आपको ज्ञान चाहिए तो देवी सरस्वती की पूजा करेंगे। जो
(43:19) लोग नास्तिक हैं उनका यह होता है कि अरे यह पत्थर है इसकी पूजा करके क्या मिलेगा? परंतु जिनको अनुभूति हुई है जो चेतना के कुछ उच्च स्तरों पर चले जाते हैं उनको वो अनुभूति भी होती है कि कैसे भगवान का आशीर्वाद मिलता है। शक्तिपात कहते हैं उसको। ऐसे बहुत उदाहरण हमें मिलते हैं कि किस सम्राट ने किस कारण से किस देवता की पूजा की और वो सफल हुआ। जब कुब्लई खान साउथ ईस्ट एशिया पर आक्रमण करने के लिए निकल रहा था उससे पहले एक बहुत बड़ी सेरेमनी की उसने और जिस भगवान की पूजा की वो पूर्ण इतना भयंकर रौद्र रूप में था आज भी पूजा होती है उनके
(44:07) जब इंडोनेशिया के उस समय के जो सम्राट थे उनको पता चला जावा में कि कुबले खान का आक्रमण होने वाला है और उसने इतनी बड़ी पूजा की है उसने और बड़ी पूजा की। बटुक भैरव की भगवान शिव की बटुक भैरव में पूजा की। देखिए भगवानों के बहुत सारे स्वरूप है। देवी सरस्वती का रूप आपको एक तो वीणा वादिनी मिलता है। परंतु अभी मैं जापान की बात करूं तो और तिब्बत की बात करूं। आपको मंगोलिया की दिखाऊं। तो वहां पर शस्त्रास्त्रधारी भी हैं। जापान में एक सरस्वती देवी है जो पूरी तरह से एग्रीकल्चर के कृषि की वस्तुएं हाथ में ली हुई है। हम भगवान का स्वरूप निर्मित करते हैं।
(44:53) मूर्त रूप देते हैं। पहले हम ध्यान लगाते हैं। फिर हम सोचते हैं यह भगवान कैसा होगा? फिर उसे मूर्त रूप देते हैं। उसे मूर्ति कहते हैं। वैदिक काल में भगवान की मूर्तियां नहीं बनती थी क्योंकि हमारा चेतना का स्तर बहुत ऊंचा था। आज हमारा चेतना का स्तर इतना ऊंचा नहीं है तो हम भगवान की मूर्ति रूप में भी पूजा करते हैं। चाहे रूप चित्र हो चाहे मूर्ति बनाए जो भी बनाए। तो उसने जो मूर्तियां बनवाई भगवान शिव की बटुक भैरव रूप में और साथ में गणपति गणेश जी जो होते हैं वो तो गणपति है ना सेनापति हैं तो सेनापति कैसा होना चाहिए? रौद्र रूप में होना चाहिए। तो गणेश जी की
(45:38) सबसे रौद्र रूप में जो मैंने स्वरूप देखा है वह इंडोनेशिया के राज परिवार का देखा है। मुझे राज परिवार ने एक मूर्ति भेंट की थी जिसमें गणेश जी पूरे रौद्र रूप में है। और जो मैं उस समय के जावा के राजा की कृत नगर की बात कर रही हूं। उसने जो गणेश जी की मूर्ति बनाई वो तो कपालासन पर बैठी हुई है। कपालों के आसन और कपालों से बने आभूषण पहने हुए हैं। जब आप शत्रु जब आप युद्ध के लिए जाते हैं तो आप शत्रु पर विजय के लिए जाते हैं। और यह भी बड़ी भ्रांति है हमारे देश में कि हमने तो कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। ऐसा नहीं है। भगवान राम भी
(46:22) दिग्विजय के लिए निकले थे। अश्वमेध का घोड़ा छोड़ा। किस लिए? बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित किया था। हम लोग भी साम्राज्य स्थापित करते थे। आप क्या सोचते हैं? बौद्ध लोगों का साम्राज्य नहीं था। क्या जैन राजाओं ने साम्राज्य नहीं बनाया? या हिंदू राजाओं ने साम्राज्य नहीं बनाया? परंतु हमें वह विषय पढ़ाया नहीं जाता। कश्मीर के एक राजा थे ललितादित्य। जिनका साम्राज्य इतना बड़ा था कि एलेक्जेंडर से डेढ़ गुना था। परंतु हम पढ़ाते अलेक्जेंडर द ग्रेट हैं। ललितादित्य द ग्रेट नहीं पढ़ाते। तो भगवान की पूजा करने का सदा से परंपरा रही और भारत से बाहर जब भारतीय संस्कृति
(47:06) गई तो अनेक देवी देवता भी गए। उनके अनेक स्वरूप गए। ट्रांसफॉर्मेशन भी हुआ। देवियां और देवता दोनों का जो बौद्ध स्वरूप है उसमें भिन्नता भी आई है। आपको यदि मैं जापान की लक्ष्मी जी की आपको चित्र दिखाऊं किचुततिन कहते हैं वो लोग। अब हमारे यहां जो लक्ष्मी जी होती है उनका आप देखेंगे स्वर्ण मुद्राएं सोने के सिक्कों से हमें आशीर्वाद दे रही हैं। वो हम धन का स्वरूप मानते हैं। परंतु जब वो बौद्ध बन गई। बौद्ध स्वरूप में बौद्ध लोगों के लिए थी तो उनके एक हाथ में चिंतामणि है। आप उनको देख के पहचान नहीं पाएंगे कि यह
(47:52) देवी लक्ष्मी है। परंतु आठवीं शताब्दी से इतिहास मिलता है कि सरस्वती और लक्ष्मी की इकट्ठे पूजा करने का उत्सव वार्षिक उत्सव बनता था किचकी का। सरस्वती जी और लक्ष्मी जी की पूजा हमारे घरों में भी इकट्ठे होती है। गणेश जी को भी रखते हैं। क्यों? क्योंकि शुभ लाभ लाभ तो होना चाहिए परंतु वो शुभ प्रयत्नों से होना चाहिए। कई बार लोग मुझसे पूछते हैं लक्ष्मी जी को पहले रखना चाहिए या गणेश जी को पहले रखना चाहिए? तो पहले शुभ है फिर लाभ है। आपका लाभ गलत ढंग से भी आप प्राप्त कर सकते हैं। आप चोरी करके भी धन प्राप्ति कर सकते हैं। पर हम उसके उपासक
(48:36) नहीं है। ऐसे ही ज्ञान ज्ञान की देवी सरस्वती को हमने श्वेत पद्म पर श्वेत वस्त्र पहनाकर बिठाते हैं। परंतु ज्ञान के साथ-साथ शक्ति भी आवश्यक होती है। शस्त्र शास्त्र च कौशलम उसका मैं आपको एक उदाहरण देना चाहूंगी कि रामायण में ऋषि मुनियों का बहुत ज्ञान था परंतु वो राक्षसों से लड़ नहीं पा रहे थे वो राम जी को लेने आए दशरथ घबरा गए कि ये बालक इतने भयंकर राक्षसों से लड़ेंगे तो वशिष्ठ मुनि ने एक ग्रंथ लिखा जो हमारे देश में बहुत
(49:21) कम लोग जानते हैं उसका जिसका नाम है योग वाशिष्ठ। उस समय श्री राम महलों की जो सुख सुविधाएं थी उससे विमुख हो चुके थे। और दशरथ इस असमंजस में पड़ गए थे कि यह बालक उन राक्षसों से लड़ेंगे कैसे? तो बड़ा सुंदर ग्रंथ है। उन सहस्र श्लोक भगवत गीता तो प्रसिद्ध हो गई परंतु योग वशिष्ठ प्रसिद्ध नहीं हो पाया। बहुत बड़ा ग्रंथ है। अभी रूसियों ने उसका रूसी भाषा में अनुवाद किया है और कई भागों में प्रकाशित हो रहा है। चौथे भाग तक प्रकाशित कर चुके हैं। अद्भुत ग्रंथ है। तो मेरा कहने का अर्थ यह है कि भगवान की उपासना
(50:10) अनेक रूपों में अनेक कारणों से की जाती है। तिब्बत में एक सरस्वती देवी जी का स्वरूप मिलता है। जिसमें चार में से तीन भुजाओं में शस्त्रार हैं। एक में पुस्तक है। अब जापान में जो सरस्वती है वह आपको जो दिखेंगी वो हमारे यहां तो पाम लीफ और ये पुस्तक पोथी टाइप होता था। ऐसे लंबी होती थी। तो हम सरस्वती देवी जी के जो हाथ में देंगे वो एक पोथी देंगे। ज्ञान का स्वरूप उसका जो सिंबल है। परंतु जापान और चीन में देंगे तो क्या देंगे? स्क्रोलर ब्रश। क्योंकि उनकी लिखने की शैली वो है। वस्त्र पहनाएंगे तो अपने पहनाएंगे ना। वो उनकी देवी बन गई। तो ऐसे ही शिव जी की
(50:55) पूजा भी होती रही। पार्वती जी के साथ होती रही। गणेश जी की पूजा अनेक रूपों में मिलती है और मैं ऐसे अद्भुत रूप गणेश जी के देख रही हूं कि भारत में तो हमने कभी देखे ही नहीं। परंतु उन्होंने अपने कारणों से सकार कारण भगवान का स्वरूप बनाया है। तो भगवान की आराधना सब देशों में होती रही है और वो कारण से थे। अनेक समय पर अनेक प्रकार के उन्होंने स्वरूप बनाए बदले। भारत जो है वह एक ना तो एक पुस्तक का देश है ना एक देवता का देश है। हमारे लिए हमारे लिए कोई कमांडमेंट्स ऊपर से नहीं आती। हम तो कहते हैं कि जो आपके हृदय में अनुभूति जन्य
(51:43) ज्ञान है वो पवित्र है। अब ये आप पर है कि आपकी चेतना का स्तर क्या है और आप उस ज्ञान को किस रूप में प्राप्त कर रहे हैं। आचार्य जी मैं दर्शकों को बताना भूल गया कि आपको मंगोलिया में हाईएस्ट सिविलियन ऑनर भी मिला हुआ है। जी वहां का स्टेट हाईएस्ट स्टेट सिविलियन अवार्ड वो पोलर स्टार कहलाता है। तो मैंने कुछ ऐसे कार्य किए जिन पर मैं आश्चर्यचकित हो गई जब मुझे ये राजदूत ने बताया कि हम आपको अपने देश का सर्वोच्च सम्मान दे रहे हैं तो मैंने उनसे यही पूछा बड़ी सुंदर हिंदी बोलते थे पिछले राजदूत तो मैंने कहा एक्सीलेंसी लगता है आपको कि मुझे सम्मान
(52:24) सच में मिलना चाहिए परंतु उन्होंने यह कहा कि शशि बाला जी आपको नहीं पता आपने कितना बड़ा हमारे लिए कार्य किया और उसकी थोड़ी सी यदि आपको मैं चर्चा करूं तो वो कार्य क्या था? इसीलिए मैंने छेड़ा। मैं जब पिछली बार मंगोलिया गई तो मैंने देखा कि इनके जो बौद्ध विहार जो नष्ट कर दिए गए थे पूर्णतया वो अब दोबारा से निर्मित हो गए हैं। बहुत सारे बन गए हैं। तो मैंने राजदूत से कहा कि भई जिसज विहार में मैं गई वहां वहां उनके सेक्रेड टेक्स्ट जो उनके धर्म ग्रंथ है वो नहीं मुझे दिखे। तो मुझे एक कमी लगी क्योंकि बौद्ध विहारों का मंदिरों का एक बड़ा
(53:03) अच्छी परंपरा है जो हमें सीखनी चाहिए कि धर्म जो मंदिर होते हैं वह धर्मोदय और ज्ञानोदय दोनों के केंद्र होते हैं। तो वहां पे वो अपने ग्रंथों का एक संग्रह बना के रखते हैं। अब वो ग्रंथ क्या है? तिब्बत और मंगोलिया में तो पांच सहस्त्र के लगभग संस्कृत के ग्रंथ और बाद की लिखी हुई टीकाएं उसमें सम्मिलित हैं। उसको उन्होंने दो भागों में विभक्त किया है। एक का नाम कंजूर है। दूसरे का नाम तंजूर है। कंजूर में 108 भाग हैं और तंजूर में लगभग 225 भाग हैं। मैं लगभग शब्द इसलिए प्रयोग कर रही हूं क्योंकि समय-समय पर अनेक सम्राटों में नए-नए वर्जनंस नए-नए संग्रह करके
(53:46) बनाए। तो उसमें कहीं-कहीं अंतर आ गए। किसी सम्राट ने कोई हटा दिया और कोई डाल दिया। तो ऐसा भी रहा है। तो जब मैं वहां से लौटी तो मैंने यहां आकर सरकार से प्रयत्न किया कि जो कम से कम हम कांजूर जो है 108 इतने बड़े-बड़े हैं 108 भाग इतने मोटे-मोटे वो हम मंगोलिया को दे सकके। सरकार भी चाहती थी मंगोलिया के साथ अच्छे संबंध बने। तो सरकार ने वो स्वीकार किया और सरकारी स्तर पर वह कार्य हो पाया कि वहां के मैंने राजदूत से पूछा कि यहां पर कितने विहार हैं जिनको हमें ये सेट्स भेंट करने चाहिए तो उन्होंने कहा शशि बला जी ये यदि 70 तो
(54:27) चाहिए और कुछ रूस में भी हो तो अच्छा रहेगा। तो हमने पहली बार में 70 सेट्स 108 भागों के मंगोलिया के सभी विहारों को भेंट करवाए। उसके पीछे मेरा श्रम था, परिश्रम था, मेरी निष्ठा थी। दो वर्ष लगे क्योंकि सरकार से पैसा निरंतर निकलवाना, पब्लिशर तक पहुंचाना, ठीक से प्रिंटिंग हो, बाइंडिंग हो, सब कुछ ठीक हो। उसके लिए आपको बहुत कुछ ध्यान रखना पड़ता है। वो सब मैंने किया। उसके पश्चात उनके राष्ट्रपति के द्वारा यह सम्मान दिया गया। जिसके लिए मैं अपने आप को बहुत बौना समझ रही थी। पर उन्होंने दिया परंतु अच्छा कार्य हुआ जिसका भारत में मोदी जी कई अपने भाषणों
(55:11) में ये बात कह चुके हैं कि हमने मंगोलिया को कंजूर भेंट किया परंतु इसके पीछे क्या प्रयत्न था कैसे हुआ कंजूर क्या है उसमें क्या है इत्यादि इत्यादि भारत को नहीं पता तो ये लाभ होता है जब गड़े मुर्देव निकालते हैं क्योंकि लोग तो ये बोलते हैं कि इतिहास से क्या लाभ है आप इतिहास में रहोगे भारत की बस बातें करोगे 2000 साल की अभी कुछ हम इतने पीछे हो गए हैं और आप बैठ के बस लेकिन यह दिखता है कि अगर हम आज जब बात करते हैं तो इंडिया के मंगोलिया से रिलेशंस अच्छे ही हुए होंगे आपके काम की वजह से। तो आज के जो मॉडर्न जिओपॉलिटिक्स
(55:48) है वो इतिहास के कारण जब हम इतिहास खंगालते हैं उनका सम्मान करते हैं तो मॉडर्न रिलेशंस भी बहुत अच्छे हो जाते हैं। उसी को सॉफ्ट पावर कहते हैं। सॉफ्ट पावर कहते हैं। आचार्य जी एक बहुत इंटरेस्टिंग क्वेश्चन मेरे मन में आ रहा है क्योंकि हम एक एक काइंड ऑफ इंडोस्फीयर बोल सकते हैं क्योंकि बहुत से स्कॉलर्स बोलते हैं कि इंडोस्फीयर अच्छा शब्द मैंने देखा। अगर हम काइंड ऑफ इसको एक कम्युनिटी या एक सिविलाइजेशनल वैल्यू होल्डिंग एक एक कम्युनिटी को देखें तो हम जैसे देखते हैं कि क्रिश्चियंस होते हैं तो उनका वेटिकन सिटी की तरफ एक लगाव होता है या मुस्लिम्स
(56:21) हैं तो वो मक्का जाते हैं। चाहे किसी भी कंट्री के हो। तो क्या इन कंट्रीज के लोग जो भारत से इस तरह से जुड़े हुए हैं इनका भी सपना रहता है कि हम भारत जाएं, गंगा नदी देखें, काशी आए। अद्भुत बहुत रहता है और मैं लोगों से मिल भी पाती हूं। सबका तो पता तो नहीं चल सकता परंतु बहुत लोग हैं जैसे जापान के कुछ लोग हैं। एक बहुत हमारे साथ आते थे। हम मिलते थे। हम जाते थे जापान वो आते थे। सदा हमारा काफी अच्छा संबंध रहा उचिता जी के साथ। उचिता जी ने अपनी विल की थी कि मेरे दिवंगत होने के पश्चात मेरी अस्थियां गंगा में प्रवाहित की जाए। ऐसे भी उदाहरण
(56:56) मिलते हैं। कई उदाहरण एक नहीं। तो भारत से जो जुड़ाव है उसके पीछे हमारा 2000 साल का इतिहास है। यदि आप इतिहास को समझेंगे नहीं तो आप आज की राजनीति में जिओपॉलिटिक्स में इधर-उधर की उलझनों में उलझ के रह जाएंगे। आज भारतीय लोग मुझे कई बार बोलते हैं मेरा चीन पर जो इतना काम है उस पर देख के बोलते हैं ओ चाइना इज मिसयजिंग यू। नहीं नहीं चाइना मुझे मिसयूज नहीं कर रहा। मैं जानती हूं वो बात। आप नहीं जानते। हमारा और जो चीन का झगड़ा है वो कितने वर्ष पुराना है और हमारा जो चीन के साथ प्रेम का संबंध है
(57:44) वो कितना पुराना है उसको समझिए। और आज भी आप चीन जाइए तो आपको मित्र धर्म भक्त बहुत मिलेंगे। वो अलग बात है कि उनकी राज्य की व्यवस्था ऐसी है कि धर्म लिख नहीं सकते कि मैं क्या हूं धर्म से हम अपनी वो पहचान उनको बताना उसका परमिशन नहीं है। तो परंतु झंजन में आप जाइए आप मंदिरों में जाइए। कितने भक्त आपको दिखाई देंगे? कितनी पूजाएं हो रही हैं? चीन में। चीन में जापान में जाइए। भागदौड़ का जीवन है परंतु पूजा करते हैं। ऐसा नहीं है कि पूजा नहीं करते। जबकि चीन में तो शासन के द्वारा ऐसे आदेश है कि आप अपने घर से बाहर कुछ नहीं कर सकते।
(58:30) दिखा नहीं सकते कि मैं हूं। परंतु इतनी अद्भुत वस्तुएं हैं। एक बार मैं चिंगडू में किसी मंदिर में पहुंची। वो हनसांग का मंदिर है। वहां पर उनका स्कलब रेनिक रखा हुआ है और मंदिर का पुनर्निर्माण हो रहा था। तो मैं पहुंची तो देखा कि लोग ईंटें दान कर रहे थे। तो मैंने सोचा ये तो बड़ा अच्छा मेरे लिए पुण्य अवसर है कि मुझे भी करनी चाहिए। तो मैंने उनसे निवेदन किया जाके कि मैं भी ईंट दान करना चाहती हूं। तो वो बड़े प्रसन्न हुए और मैंने ईंट दी उन्होंने मेरे हाथ में और मैंने उस पर उनको नाम लिख के दिया कि आप लिख दो इस पे पर वो देवनागरी में मैं चाहती थी तो
(59:09) देवनागरी उनको लिखना नहीं आया तो उन्होंने मुझे ब्रश दे दिया कि आप लिखिए तो मैंने अपना नाम लिख के वो ईदा नाम पर किए इंडोनेशिया चले जाइए आप प्रतिवर्ष वहां पे एक कोटा होता है कि देश में इतने प्रतिशत ये लोग हैं तो इतने प्रतिशत लोगों को सरकार से सुविधा मिलेगी अपने के तीर्थ स्थान पर जाने के लिए तो हिंदुओं को भी वो सुविधा उसी अनुपात में मिलती है जितने इंडोनेशिया में हिंदू हैं। तो वो बाली का प्रतिवर्ष ग्रुप आता है और अनेक तीर्थों पर जाते हैं। विशेष रूप से गंगा स्नान करना तो उनके यहां बहुत ही पवित्र माना जाता है। हरिद्वार जाते हैं।
(59:49) मैं जब पहली बार बाली गई तो मैं वहां के गवर्नर की अतिथि थी और अपने साथ में गंगाजल जैसे मुझे पता था जब भी बाली जाओ इंडोनेशिया जाओ तो गंगाजल ले जाना चाहिए लोगों को अच्छा अच्छा लगता है उनको तो मैं पहले इसमें थी दिनपसार में थी तो बहुत से मित्र मिलने के लिए आए थोड़ा थोड़ा थोड़ा थोड़ा गंगाजल सबको दिया और अंतिम मेरा पड़ाव था जकार्ता में उस समय मेरे साथ वहां के मेंबर ऑफ पार्लियामेंट थे पुण्यत्मा ओका जी वो मेरे साथ थे तो मैंने कहा ओका जी नाउ द अमाउंट इज टू स्माल दैट वी कैन नॉट डिस्ट्रीब्यूट टू पीपल तो ऐसा करते हैं वी
(1:00:33) कैन गिव इट टू अ टेंपल सो टेंपल कैन यूज़ इट नॉट द फ्रेंड्स नहीं नहीं तो मुझे लगा इन्हें क्या हो गया गंगाजल को मंदिर में देने के लिए मना कर रहे हैं कहती नो नो इट विल बी स्टोलन मैंने उनके हाथ सामने नतमस्तक हुई कि वो देश जो गंगाजल की चोरी करता है। वो लोग जो गंगाजल की चोरी करते हैं। क्या बात है। तो ऐसे ऐसे बहुत सारे अनुभव अपने जीवन में आए जो कि हृदय को बस मंत्र मुक्त कर देते हैं। गंगा के तट पर तीर्थ यात्रा के लिए आना बहुत पुरानी परंपरा है। वियतनाम बौद्ध देश है।
(1:01:16) हम परंतु वहां के इतिहास में लिखा हुआ है कि वहां का एक राजा तीर्थ यात्रा के लिए भारत आया गंगा के तट पर गंगा स्नान के लिए और उसके पश्चात जब वो अपने देश लौटा तो उसके पीछे से चीनियों का आक्रमण हो गया था और उनके मंदिर ध्वस्त हो गए थे और उसमें सोने चांदी की जो मूर्तियां थी वो सब ले जाई जा चुकी थी। मंदिर टूट गए। कारण कई है मंदिरों के टूटने के। पर मुख्य बात यह थी कि मंदिरों में से मुख्य मूर्तियां क्योंकि सोने या चांदी की होती थी और शेष मूर्तियां धातु अन्य धातु की ब्रोंज की या अन्य की होती थी। उसको इतना कष्ट हुआ कि उसका वियतनाम पहुंच के हार्ट फेल हो गया।
(1:01:57) मंदिरों से इतना संबंध था एक राजा का। राजाओं के मंदिरों के साथ क्या संबंध थे? वो भी एक बहुत बड़ा विषय है। कैसे राजाओं ने मंदिर जितने बड़े मंदिर हैं वो राजाओं ने निर्माण करवाए हैं। सम्राटों के द्वारा बनाए गए। क्यों? क्योंकि मंदिर बनाना पुण्य कार्य था और पुण्य करना हर राजा अपना धर्म मानता था। यहां पर आचार्य जी एक मतलब इसको अदरवाइज मत लीजिएगा। एक क्वेश्चन है मेरा कि मान लीजिए कि धर्म पर चलते थे राजा। राजा धर्म को मानते थे या फिर वो चाहते थे कि धर्म का राज हो। राजनीति में धर्म हो। बट जो हमारी फाइनर फिलॉसोफीस हैं या फिर जो हम जिसको धर्म का
(1:02:39) तत्व कहेंगे जैसे सत्य बोलना अहिंसा पंचशील आदि है आर्य सत्य है अगर हम बुद्धिज्म की बात करेंगे तो वो इन सोसाइटीज में उतना क्यों नहीं दिखता जैसे हम चीन जापान को देखें बुद्धिस्ट चीन में आज मोस्टली एथिस्ट हैं लेकिन अगर आप जैसे बता रहे हैं कि मन ही मन कुछ अगर वो कर भी रहे हैं तो बुद्धिज्म सनातन इस तरह की प्रैक्टिससेस कर रहे हैं। जापान में बुद्धिज्म दिखता है। थाईलैंड तो बुद्धिस्ट कंट्री या इधर के जो कंट्रीज हैं। बट हम देखते हैं कि मांसाहार करते ही हैं या फिर इन मिलिटराइज्ड है ही। चीन जापान ने बहुत विध्वंस किया है। तो ये क्या फैशन है
(1:03:12) बुद्धिज्म ऊपर ऊपर कि हां हम एंजॉय कर रहे हैं और हमें दिखता है कि वो विध्वंस कर रहे हैं या फिर मांसाहारी या कुछ भी खा रहे हैं। देखिए मांसाह मांसाहारी होने का अर्थ यह नहीं है कि आप धर्म के कार्य नहीं कर सकते। जहां जो भोजन था लोग करते थे। हम आज भी करते हैं। ऐसा नहीं है कि यदि मैं मांस खाऊं तो मैं हिंदू नहीं रहूंगी। मैं पूजा नहीं कर सकती। हां कुछ नियम है कि हम इस दिन मंगलवार को हम ये मांसाहार नहीं बहुत सारे लोग होंगे तो ऐसा कुछ नहीं है। एक तो मांसाहार को हम धर्म के बिल्कुल विरुद्ध कर दें ऐसा नहीं है। दूसरी बात ये
(1:03:51) है कि आपने कहा कि वो लोग धर्म के तत्वों को मानते हुए दिखते नहीं। ऐसा भी नहीं है। देखिए विध्वंस करना का क्या अर्थ है? जब राज्य की स्थापना होती है तो राज्य का विस्तार होता है तो विध्वंस तो होता है। यह स्वाभाविक है। परंतु उसके कारण से राज्य का विस्तार ना करें वो भी कोई अच्छा कभी भी नहीं माना गया इतिहास में। और जिन राज्यों ने अपने राज्यों का विस्तार नहीं किया वो फिर धीरे-धीरे क्षीण होते चले गए। समाप्त भी हो गए। जैसे मंचूरिया है वो आज कोई देश नहीं है। तो विस्तारवादी होना या विस्तार है तो आप अहिंसा नहीं करेंगे। ऐसा
(1:04:28) भी नहीं है। चीन एक इतना बड़ा देश है। इतनी बड़ी जनसंख्या है तो वहां के लोग धर्मनिष्ठ नहीं है। ऐसा नहीं है। वहां के लोग दान नहीं देते, सत्कर्म नहीं करते। ऐसा नहीं है। सब कुछ करते हैं। अहिंसा की एक बड़ी सुंदर पुस्तक है जिसमें चीनी कलाकार के द्वारा ड्राइंग्स बनाई गई हैं। और एक कवि के द्वारा अहिंसा पर कविताएं लिखी गई हैं। जिनका संस्कृत अनुवाद और अंग्रेजी अनुवाद डॉ.
(1:04:56) रघुवीर ने किया। आपको दिखाएंगे। तो अहिंसा ऐसा नहीं है कि चीन जापान में अहिंसा नहीं थी। देखिए हिंसा और शक्ति दो में अंतर करना पड़ेगा। हिंसा जो होती है वो अकारण की जाती है और शक्ति जो होती है उसका आप उसका प्रयोग करके आप बल प्रयोग भी करेंगे और राज्य विस्तार भी करते हैं। आप इतनी पहले हमारे यहां कुछ युद्ध के नियम होते थे। सेनाओं सेना सेना सेना से लड़ती थी। लोगों की हत्या नहीं होती थी। उसमें नियम होते थे कि साय काल हो जाएगी तो आप नहीं कर सकते। आप युद्ध में हैं तो आप शरीर के इस अंग पर प्रहार नहीं करेंगे। आप महिलाओं पर प्रहार नहीं करेंगे। आप बच्चों को नहीं मारेंगे। आप
(1:05:34) शहरों में नहीं घुसेंगे। बड़े-बड़े युद्धों के मैदान होते थे जिसमें किया जाता है। कुरुक्षेत्र का मैदान आपके समक्ष बड़ा उदाहरण है। तो हम लोग शहरों में घुस के लोगों को नहीं मारते थे। तो नियम होते थे युद्ध के। आजकल कोई नियम पालन उस ढंग से नहीं हो रहे। तो विध्वंसकारी शक्तियां अधिक हो गई हैं। तो चीन जापान में दान नहीं करते या पूजा नहीं करते या धर्म के आचरण नहीं करते ऐसा नहीं है। चीन में इतना डिसिप्लिन है। इतना सत्यवादी भी है। ऐसा कुछ नहीं है। जहां उनकी आवश्यकता है ठीक है। राजनीति में सब कुछ बोलते हैं करते हैं। परंतु धर्म समाप्त हो गया। ऐसा नहीं
(1:06:13) है। ये मिथ्या धारणा है। और आचार्य जी जैसे आप संस्कृत भाषा को लेकर बहुत ढेर सारे मंत्रों को प्रमाणों को बीज मंत्रों को दिखाती हैं विदेशों से अलग-अलग जगह चीन, जापान आदि से तो मेरा एक ये प्रश्न आएगा जब संस्कृत का प्रभाव और इसके हमें प्रमाण मिलते हैं कि भारत से लोग गए। एक समय संस्कृत काइंड ऑफ यूनिवर्सल या हमारे संसार की लैंग्वेज थी। जैसे आज इंग्लिश है। क्योंकि मैंने भी जब कुछ रिसर्च की और पढ़ा तो मुझे ये पता चला कि चीन और इधर वियतनाम आदि के लोग संस्कृत सीखते ही थे कि उनको नालंदा में एडमिशन हो जाए या किसी भारतीय यूनिवर्सिटी में
(1:06:50) एडमिशन हो जाए। तो संस्कृत को लेकर वो बहुत काइंड ऑफ कह सकते हैं कि भारत में प्रवेश करने के लिए संस्कृत की एक आवश्यकता वो समझते थे। तो संस्कृत सीखते थे। मेरा प्रश्न ये है कि हमें यहां प्रमाण मिल रहा है संस्कृत भाषा का। ज्यादातर इंटरनेट पर जो वीडियोस हमें दिखती हैं इंडो यूरोपियन लैंग्वेज संस्कृत का संबंध दिखता है कि संस्कृत में जो भ्राता है वो ब्रदर बन गया आगे जाके या जो यहां पर मात्री है तो वो मदर बन गया। बट आप चीन जापान की लैंग्वेज में ऐसे संस्कृत के डायरेक्ट वर्ड्स उनकी मेंडेडरिन में या जापानीज में या वियतनामीज़ में या हमें थाई लैंग्वेज में
(1:07:26) मिलता है क्या? मतलब मैं आपसे कंफर्म करना चाहता हूं क्योंकि देखिए वेस्टर्न लैंग्वेज में मिल जाता है। ऐसा है कि संस्कृत की कई बातें हैं जो हमें समझनी चाहिए। एक तो आपने कहा कि जब भारत से बाहर जाते थे तो भारत में आते थे तो संस्कृत पढ़ते थे। इसके हमें प्रमाण भी मिले हैं। शिनचैंग रीजन जो है आज चीन का वहां से एक पांडुलिपि मिली है जो कि डायलॉग है दो भिक्षुओं का। जैसे आज आप कहीं विदेश जाएंगे तो आप एक छोटी सी पुस्तिकाएं प्राय हम लोग पहले जापान के लिए जाया करते थे कि 100 शब्द वाक्य हैं कि हम एयरपोर्ट पर उतरे तो हमें टैक्सी
(1:08:00) चाहिए होटल ये वो दिशा पूछनी है तो उस प्रकार करते थे तो उसमें दो भिक्षुओं का संवाद है और वो भिक्षु क्या संवाद कर रहे हैं? वो पूछता है कि आप कश्मीर से आए हैं क्या? चीनी भिक्षु पूछता है क्योंकि कश्मीर बहुत बड़ा केंद्र था ज्ञान का। तो पूछता है कश्मीर से आए हो क्या? फिर अगला प्रश्न करता है कि आप अपने साथ कौन से ग्रंथ लाए हो? क्योंकि जो भी भिक्षु जाते थे, विद्वान जाते थे, अपने साथ ग्रंथ ले जाते थे। फिर अगला प्रश्न पूछता है कि वथशान जा रहे हो क्या? क्योंकि जैसे हमारे यहां चार धाम है उनके यहां भी है जिसमें से एक है वथशान जो बहुत बड़ा धाम है। बहुत
(1:08:33) सारे मंदिर हैं आज भी वहां पर। तो फिर पूछता है कि क्या सम्राट से आपने समय निश्चित कर लिया? क्योंकि जो भारतीय भिक्षु विद्वान जाते थे तो वो लोग सम्राटों से अवश्य मिलते थे। तो जो भी बाहर से लोग आते थे, वह संस्कृत पढ़ते थे। जो बाहर जाते थे, वह भी संस्कृत तो जानते ही थे। सामान्य बात थी। जावा में संस्कृत सिखाने का एक बहुत बड़ा केंद्र था। इत्सिं जब चीन से भारत आ रहा था, तो मार्ग में छह मास उसने जावा में रुक के संस्कृत व्याकरण का अध्ययन किया। तो संस्कृत जो है वो पढ़ाने के केंद्र भी बहुत स्थानों पर थे। खोदान में भी था संस्कृत का केंद्र। और भी
(1:09:11) बहुत सारे हमें उदाहरण मिलते हैं कि संस्कृत विदेशों में भी पढ़ाई जाती थी। कंबोड कंबोडिया में आश्रमों के मंदिरों के साथ आश्रम जुड़े हुए थे। जिनमें कि भारत से पांडुलिपियां मंगाई जाती थी। जैसे वहां के शिलालेखों से मिलता है ये सब इतिहास कि कैसे भारत से रामायण मंगाई, पुराण मंगाए, मनुस्मृति मंगाई। लोगों ने मनुस्मृति को लेकर इतनी भ्रांतियां फैला दी है। इतना विरोध कर दिया है कि मनुस्मृति के ज्ञान को पता नहीं क्या कहां-कहां तक उसके निंदा का विषय बना दिया। परंतु मनुस्मृति एक अद्भुत ग्रंथ है और वह अनेक देशों में गया और इसके प्रमाण मिलते हैं। तो कंबोडिया
(1:09:50) में पाठ करने के लिए आश्रम जुड़े हुए थे, विद्यालय जुड़े होते थे, पुस्तकालय जुड़े हुए होते थे तो संस्कृत तो अध्ययन लोग करते थे। दूसरा आपने प्रश्न किया शब्दों का जितनी भी साउथ ईस्ट एशिया की दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों की जितनी भाषाएं हैं सब में संस्कृत है। लगभग 50 से लेकर 70% तक संस्कृत के शब्द है। ये कहना गलत है कि संस्कृत विश्व की सभी भाषाओं की जननी है। नहीं। संस्कृत जननी है केवल भारतीय भाषाओं की और संस्कृत ने पोषण किया है अन्य भाषाओं का। चाहे वो यूरोप की भाषाएं हो, चाहे वो साउथ ईस्ट एशिया की भाषाएं हो। उच्चारण भेद हो गए हैं। जैसे
(1:10:33) एक बार मैं वहां के एक बैंकॉक में एक संस्कृत अध्ययन केंद्र है। वहां पर थी तो उस सड़क का नाम था बोरोमो राजचा चौानी। तो मुझे बोरमोर राजचा चौानी एक बार में नहीं समझ में आया। परंतु कुछ बहुत कुछ सोचने के पश्चात और लोगों से चर्चा करने के पश्चात समझ में आया कि इसका अर्थ है ब्रह्मराज जननी। ब्रह्मराज जननी एक सड़क का नाम है थाईलैंड में। जब मैं पहली बार बाली गई तो मेरे साथ क्योंकि मैं गवर्नर की अतिथि थी तो इंटरप्रेटर गाड़ी सब होता था। तो मैं ड्राइवर को कहती थी भाई धीरे चलाओ गाड़ी को क्योंकि सड़क पे जितने बोर्ड होते थे
(1:11:18) मेरा मन करता था मैं हर बोर्ड को पढूं क्योंकि मैं अभी भूत जो जाती थी वहां के इतने सुंदर संस्कृत के नाम देखकर ऐसे आप जहां भी जाएंगे जहां भी जाएंगे आपको संस्कृत के नाम नगरों के नाम मीकोंग जैसे एक नदी है मीकोंग उसका अर्थ है मां गंगा अयोध्या है तो उसका है अयोध्या वरनगर ऐसे बहुत सारे नाम हैं जो कि संस्कृत के नाम है। चीन शब्द जो है चीन शब्द नाम जो है चीन का वो पता है आपको भारत ने दिया है संस्कृत का शब्द क्योंकि वहां पे उस समय छिन वंश का राज्य था। चीन में कहीं भी साहित्य में चीन शब्द देश के लिए नहीं मिलता। वहां तो हान चाइना छिन चाइना ऐसे
(1:12:00) करके मिलते हैं। क्योंकि जो वंश उस समय राज्य कर रहा है वो उस रूप में उसको लिख देता था। तो जब छिन वंश का राज्य था और भारत के साथ संबंध आया तो हमने छिन को चीन कर दिया क्योंकि हम संस्कृत वाले हैं और हम अकारांत शब्द होने से उसके रूप अच्छे सुविधाजनक हो जाते हैं। तो चीन शब्द जो है जो वो हमारे ग्रंथों में आता है। महाभारत तक में चीन शब्द आता है। चीन के साहित्य में चीन शब्द नहीं है। जो मेंडरिन है या चीनी भाषा है उसमें उसमें हां मेंडरीन चीनी भाषा में और जापानी भाषा में या तिब्बती भाषा में बहुत सारी भाषाएं संसार की ऐसी है जिनमें आपको
(1:12:34) संस्कृत के कुछ विशेष शब्द नहीं दिखेंगे। क्यों? क्योंकि उन्होंने अपने देश में नए शब्दों का निर्माण किया। अच्छा। अपनी और साउथ ईस्ट एशिया में संस्कृत को आधार बनाकर सारे यूरोप की भाषाओं में संस्कृत को आधार बनाकर नए शब्दों का निर्माण हुआ। जैसे एडवोकेट शब्द है अंग्रेजी में। एड वोक और इट तीन भाग है इसके एक उपसर्ग एक प्रत्यय और बीच में संस्कृत के धातु अब जो वोक है वह वच धातु से है मैं पूछती हूं कई बार लोगों से कि एन आई टी भी नाइट हो सकता है एन आई टी ई भी नाइट हो सकता है फिर इसमें जी एच क्यों आ गया हम तो वो संस्कृत के नक्त से बना है जिसको हम
(1:13:14) भूल गए दोहित्री शब्द है उससे डॉटर बना है डॉटर जब हम बोलते हैं तो डी ओ टी ई आर भी हो सकते हैं डी ओ टी ए आर भी हो सकते हैं डी ए पर जीएच क्यों आ गया? क्योंकि वो संस्कृत के दुहित से आया है। आजकल हमारा अनेक कोषों पर कार्य चल रहा है। एक बहुत बड़ा जो विराट संस्कृत कोष बन रहा है वो है संस्कृत अंग्रेजी कोष जिसमें कुछ सहस्त्र संस्कृत के शब्द पहली बार किसी कोष में आने की संभावना दिख रही है। दूसरा हमारा कार्य चल रहा है लिथवानियन भाषा में संस्कृत और तीसरा चल रहा है आर्मेनियन भाषा में संस्कृत। मैं आपको उसके शब्दों की समानताएं दिखाऊंगी। तो एक भारतीय होने
(1:13:51) के कारण आपको आप अद्भुत आपको अद्भुत लगेगा गदगद होंगे। लिथवानियन शायद संस्कृति सबसे क्लोजेस्ट वेस्टर्न लैंग्वेज है। जी लिथवानियन को बहुत अधिक क्लोज माना जाता है। उसके अनेक कारण है। जैसे संस्कृत में विभक्तियां हैं। लिथवानियन भाषा के कुछ शब्द ऐसे हैं जो सातों विभक्तियों में चलते हैं। हमारे यहां एकवचन, द्विवचन और बहुवचन तीन होते हैं। हिंदी में आते-आते हमारे पास केवल एकवचन और बहुवचन रह गया। द्विवचन छूट गया। परंतु लिथवानियन भाषा में कुछ शब्दों में द्विवचन भी है। फिर लकार हम जिसको टेंस कहते हैं। हमने हिंदी में केवल भूत, वर्तमान और भविष्य तीन ही
(1:14:29) रखे हैं। परंतु संस्कृत में 10 लकार हैं और टेंसेस हैं जिसमें कि लिथवानियन भाषा के कुछ शब्दों में हमें वो भी मिले हैं। लगभग हम कंक्लूजन की तरफ हैं। आचार्य जी जाने से पहले एक दो मैं बचे हुए प्रश्न पूछूंगा। एक तो जैसे आप भारतीय संस्कृति पर लगातार कार्य कर रही हैं। बहुत ढेर सारे प्रमाण आपको संस्कृत भाषा के, ग्रंथों के, त्यहारों के, कस्टम्स के, रिचुअल्स के आपको मिलते हैं। संस्कृत पर अभी जैसे आपका शोध चल रहा है। ट्रांसलेशंस और कोष डेवलप हो रहे हैं। तो इसमें आप आज के बच्चों को क्यों प्रोत्साहित करेंगे कि वो संस्कृत सीखें?
(1:15:11) जी। उसके कई कारण हैं। केवल इसलिए नहीं कि संस्कृत भारत की एक प्राचीन भाषा है। उसके अतिरिक्त बहुत सारे कारण है। मैंने इसका प्रयोग का एक उदाहरण आपको देना चाहूंगी। मेरा पौत्र पांचवी श्रेणी में आया तो उसके सामने प्रश्न आया फ्रेंच पढ़े, जर्मन पढ़े, रशियन पढ़े क्या पढ़े या संस्कृत पढ़े? तो मैंने कहा बेटा आप संस्कृत पढ़ोगे। बोला दादी मां कोई भी नहीं ले रहा। मैं अकेला हूं। मैंने कहा कोई बात नहीं मैं पढ़ाऊंगी। तुम संस्कृत लोगे। पर बच्चा है पांचवी श्रेणी का बहुत छोटा होता है तो मैं प्रतिदिन उसको कुछ एक कारण बताती थी और वह जाकर बच्चों से चर्चा करता
(1:15:48) था और अंत में 43 बच्चों का 43 बच्चों का संस्कृत का एक बैच बन गया बैच बन गया अब वो कारण क्या थे मैंने कहा बेटे देखो आप वो भाषा पढ़ना चाहते हो जो सबसे संसार की सबसे साइंटिफिक लैंग्वेज है या अनसाइंटिफिक पढ़ना चाहते हो तो उसने कहा नहीं नहीं साइंटिफिक पढ़ेंगे तो मैंने कहा अच्छा फिर आप यह बताओ कि आपने हिंदी के देवनागरी लिपि के स्वर व्यंजन वर्णमाला आप पढ़ते हो और दूसरी तरफ आप अल्फाबेट्स इंग्लिश के पढ़ते हो तो दोनों को जरा तुलना करो और मुझे बताओ कौन सा साइंटिफिक है? बच्चा था उसका मन इधर-उधर उसने सोचा तो बोला अच्छा मैंने बोला देखो हमारे पहले
(1:16:33) दो विभाजन है स्वर व्यंजन और फिर उनका एक क्रम निर्धारित है और व्यजों में भी हम कवर्ग अंदर से लेके आपकी मैंने उसे बोलने के लिए कहा क ख ग घ च छ ज झ यण ट ठ ड ढ ण त थ द ध उसके पश्चात प फ तो आप पूरा एक एक बहुत सिस्टमैटिक है सारा उसमें भी आप क ख ग ख पूरा एक सिस्टम से चल रहे हैं हम और अंग्रेजी में क्या है आपका अ ए बी सी डी आपर में कोई कनेक्शन नहीं। आपके स्वर और व्यंजन का कुछ पता नहीं। आपका सी एच केमिस्ट्री भी हो सकता है और च चेयर में च की ध्वनि भी दे सकता है। तो ऐसे बहुत सारे
(1:17:19) उदाहरण क्योंकि हम इलॉजिकल थिंकिंग की ओर बच्चों को डे वन से डाल देते हैं कि बेटा जो कुछ है ए बी सी डी है बस रट लो। हिंदी आपको देवनागरी का क्रम आए ना आए इंग्लिश का आना चाहिए। तो मैंने बच्चों को एक टंग ट्विस्टर के रूप में खेलना सिखाया। कुचुतपु कुचुट तू तू तू तू तू तू तू तू तू तूपु हम संस्कृत में सभी लोग जानते हैं ये तो एक व्यंजनों का हमारा स्वर निर्धारित हो गया साइंटिफिक अल्फाबेट बच्चे को समझ में आया उसने जाके कहा मैंने उसे एक कहा एक बेटा एक टेबल बनाइए उसमें लिखो वन टू थ्री फोर उसके बाद संस्कृत की लिखो गिनती उसके पश्चात अंग्रेजी की लिखो जर्मन की
(1:17:57) लिखो फ्रेंच की लिखो रशियन की लिखो क्योंकि बच्चे हैं आजकल सब इंटरनेट से निकाल के उसने सब लिख दिया। मैंने कहा अब यह बताइए कि टी ओ भी टू होता है। टी डबल ओ भी टू होता है। टी यू भी टू होता है। तो ये टी डब्ल्यू क्यों हो गया? इसमें व क्यों आ गया बीच में? और डब्ल्यू का कोई आपके पास पक्का उच्चारण भी नहीं है। डब्ल्यू का क्या उच्चारण है? बोलते डबल यू है। उच्चारण क्या करते हैं आप? तो मैंने ऐसे प्रश्न भी खड़े किए और उत्तर भी दिए। तो मैंने कहा देखो बेटा ये दो से निकला है इसलिए यहां है। फिर उसको रशियन का, जर्मन का, फ्रेंच का। मैंने कहा देखो यदि कोई
(1:18:39) भाषा अपने लिए गिनती भी नहीं बना सकती थी तो आपको वो भाषा पढ़नी चाहिए या वो भाषा पढ़नी चाहिए जिसके आपने सबको गिनती सिखाई। गिनती के बिना तो साइंस कहीं है नहीं। फिर मैंने उसे न्यूमरल सिस्टम ने कि भाई एक दो तीन चार फिर उसे रोमन दिखाया कि देखो एक के लिए एक डंडा, दो के लिए दो डंडे, तीन के लिए तीन डंडे। ऐसे चलती थी। बहुत कठिन थी लिखना। हमने नंबर सिस्टम बनाया। हमने ये किया ये किया ये किया सब उसको समझाया। उसके पश्चात मैंने जब वो थोड़ा और आगे बढ़ने लगा तो लॉजिकल थिंकिंग कैसे आती है? हम जो है हर हर शब्द का हम निर्वचन कर
(1:19:16) सकते हैं। मात्री पित्री क्यों बना? उसका अर्थ क्या है? सार्थकता क्या है? परंतु जब वो मदर और फादर बन गया तो फॉसिलाइज्ड हो गए। उसका आप निर्वचन किसी अंग्रेज से पूछिए नहीं दे पाएगा। आप किसी संस्कृत वाले से पूछिए आपको निर्वचन तुरंत दे देगा। तो ऐसे जितने भी संस्कृत के शब्द है हम उनके निर्वचन दे सकते हैं क्योंकि वह साइंटिफिकली डेवलप्ड है। फिर बच्चा जब थोड़ा आगे बढ़ गया लॉजिकल थिंकिंग पर आ गया। मैंने उसे कहा बेटे देखो जितनी भी आप भाषाएं पढ़ना चाहोगे यदि आपने संस्कृत का आधार बना लिया तो एक आपकी लॉजिकल थिंकिंग हो जाएगी। लिंग्विस्टिकली आप किसी भी भाषा
(1:19:52) को पढ़ने में आपको सरलता रहेगी और वो मेरा अपना अनुभव था। क्योंकि जब मैं बहुत बड़ी हो गई थी। मेरे दो बच्चे भी हो गए उसके पश्चात मैं जापानी भाषा पढ़ रही थी। तो मैं जब भी वो टीचर पूछती थी अंडरस्टुड तो मैं कहती थी हां तो एक दिन मुझे उसने क्लास के बाहर पकड़ लिया। बोली डू यू रियली अंडरस्टैंड और जस्ट से यस। तो मुझे भी थोड़ा आश्चर्य हुआ कि मैं समझ कर ही बोलती हूं। यस वैसे तो नहीं बोलती। उसकी मेरे साथ लगभग एक घंटा चर्चा हुई कि और अंतिम निष्कर्ष ये निकला क्योंकि मेरा संस्कृत का आधार है तो मैं कोई भी भाषा विश्व की शीघ्र पकड़ लेती हूं। समझ जाती
(1:20:26) हूं उसको। मेरे मन में एक रजिस्टर होना, एक उसका एक बैठना मन में जो होता है वो बड़े शीघ्र होता है। फिर मैंने उसे जेम्स मुरे की डिक्शनरी दी। स्कैन डिक्शनरी है। इंटरनेट पे पड़ी हुई है। कोई भी देख सकता है। बहुत अच्छा स्कैन नहीं है परंतु फिर भी कुछ तो है। तो मैंने उसे उसका पहला भाग दिया। मल्टीपल वॉल्यूम्स हैं 15 17 भाग मोटे-मोटे। तो मैंने उसको वो दिया पहला भाग और कहा कि इसमें एसकेआरटी क्योंकि उसने वो एब्रविएशन उसमें जेम्स मुरे ने प्रयोग किया। जेम्स मुरे जो है वो 1880 में पब्लिश हुआ और वो फर्स्ट डिक्शनरी है ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ऑन हिस्टोरिकल
(1:21:03) प्रिंसिपल्स तो उस समय एक बड़ी चेतना यूरोप में आई थी कि हमारी भाषा जिसकी भी भाषा संस्कृत के अधिक निकट जाती है तो वो अपने आप को गर्व की अनुभूति करता था क्योंकि डीपर द ब्रांचेस हायर द रूट्स तो वो एक उनको था कि हमारी भाषाएं इतनी पुरानी है संस्कृत तक जा रही है तो जेम्स मु ने अपने कोश में संस्कृत तक शब्दों को लेकर गया है मतलब रूट्स दिखाने रूट दिखाने के लिए तो उस बच्चे ने 800 से अधिक पहले भाग में से शब्द निकाले जिनमें एसकेआरटी प्रयोग हुआ था। बहुत कठिन कोष है बच्चे के अगर हम लोग भी पढ़ेंगे तो हमारे लिए भी कठिन है क्योंकि उसमें पूरी शब्दों की
(1:21:38) यात्रा दी गई है कि अंग्रेजी का ये अमुक शब्द पहले क्या था? उससे पहले क्या था? उससे पहले क्या था? क्योंकि एक पूरी यात्रा है संस्कृत से लेकर अंग्रेजी तक। तो उसको समझ में आ गया कि यह भाषा आप आज प्रतिदिन नए-नए आविष्कार कर रहे हैं। आपको नए-नए शब्द चाहिए। कहां से आएंगे? संस्कृत एक ऐसी भाषा है आप जितने चाहे शब्दों का निर्माण कर सकते हैं। लाखों शब्दों का निर्माण यदि आपको करना है वैज्ञानिक प्रगति के लिए, प्रौद्योगिक प्रगति के लिए तो हमें संस्कृत से आता है। अभी मैंने प्रौद्योगिकी शब्द प्रयोग किया। भारत में क्या है? तकनीकी
(1:22:18) टेक्निक का तकनीक बना दिया। उसकी कोई सार्थकता नहीं है। वो कुछ समय एक स्वतंत्रता के पश्चात ऐसा आया कि अरे चले चले शब्दों को ले लो। तो बहुत सारे शब्द चले चले ले संस्कृत में हिंदी में लिखना और बोलना आरंभ कर दिया जिसका कोई अपना परिवार नहीं है। हर शब्द का एक परिवार होता है। विधान है, विधायिका है, विधानसभा है। तो विधि है तो एक पूरा परिवार होता है हर शब्द का। वो तब होता है जब हम संस्कृत के आधार पर चलते हैं। नहीं तो आप नहीं बना पाएंगे। संसद शब्द है डॉक्टर रघुवीर ने दिया। उन्होंने कहा संसदीय संसद से ले आप जितने चाहे संसद
(1:22:57) से संबंधित जितने शब्दों की आवश्यकता है वो आपको एक शब्द से बहुत सारे शब्दों का निर्माण कर सकते हैं। विधि है, वैधानिक है। अनेक शब्दों का आप संस्कृत के कारण से निर्माण कर सकते हैं। अन्यथा नहीं कर पाएंगे। आज जो है यह समस्या आ गई है कि हम लोग नए शब्दों के लिए संस्कृत के नए शब्दों का निर्माण ना करके चलेच शब्दों का प्रयोग करना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि हिंदी के शब्दों की बहुत उपहास उड़ा दिया गया। लोह पत कामिनी आवत जावत ऐसेसे बहुत घटिया शब्द लोगों ने मजाक उड़ाने के लिए बना दिए। जबकि बहुत सुंदर शब्द है। रेल के लिए जैसे संज्ञान शब्द आचार्य जी ने
(1:23:34) बनाया। तो ऐसे उनके बनाए हुए 80 सहस्त्र शब्द 80 हजार 8 हजार शब्दों का पूरा कोष है। मैंने उसको इंटरनेट पर डाल दिया है। आप रघुवीर कोश में जाएंगे तो आपको मिल जाएगा। और ऐसे जितने भी उनके बहुत सारे कोष है कुछ पर काम हुआ कुछ पर नहीं हुआ। कुछ आधे अधूरे रह गए। कुछ का अभी हमने प्रकाशन किया पिछले छह सात वर्ष लगा के मैंने और उनके पुत्र डॉ.
(1:23:57) लोकेश चंद्र जी ने। वह अंग्रेजी संस्कृत कोष जो 1947 से पहले बन गया था। क्योंकि आचार्य जी को ये था। जब वो पहली बार यूरोप गए तो लोगों ने उनकी मजाक उड़ाई। अरे भारत स्वतंत्र होने वाला है। विकास करेगा। ये आप क्या बोल रहे हैं? भारत के पास तो शब्द नहीं है। वो विकास कैसे करेगा? शब्दों के शब्द भारत के विकास को आधार देते हैं। उन्होंने इसको चैलेंज लिया और ऐसे कोष बनाए जो कि भारत की आने वाली समय जो है उनको दिख रहा था। जब वो पहली बार यूरोप यात्रा पर गए 19 2930 में तो वहां उनको बड़ा चोट लगी कि हमारी भाषा में शब्द नहीं है तो उन्होंने शब्द निर्माण का कार्य किया और भगवान से
(1:24:36) प्रार्थना की कि हे भगवान जब तक मैं 20 लाख शब्द इस भाषा के लिए ना बना लूं तब तक मुझे इस दुनिया से इस संसार से उठाना मत परंतु जो भी ईश्वर का आदेश था 80 हजार तो बहुत शब्द कम आपको बता रही हूं वो एक कोश में उसके पश्चात उसका परिशिष्ट भी छपा था और उनकी बहुत बड़ी योजना थी भारत के लिए हर 600 जो भारतीय विद्याओं के ज्ञान के 600 क्षेत्र हैं सबके लिए वे शब्द दे सके नहीं दे पाए उससे पहले दिवंगत हो गए तो मेरा कहने का अभिप्राय है कि हमने अपने महापुरुषों के कार्यों को भुला दिया उनको आगे नहीं बढ़ाया कुछ लोग हैं जो उनके शब्दों के आधार पर नए शब्दों को बना रहे
(1:25:16) हैं। चीन जापान आदि में भारतीय शब्द या विदेशी शब्द क्यों नहीं है? क्योंकि वे अपनी भाषा के नए शब्दों का सतत निर्माण करते हैं। उसमें भी आचार्य रघुवीर का योगदान रहा दिशा देने में कि चीनी भाषा में नए शब्द कैसे कह सकते हैं और चीनी भाषा में नए शब्दों का निर्माण तिब्बती जहांजहां भारतीय संस्कृति गए भारत के ग्रंथ गए उनके अनुवाद हुए और उन अनुवादों के लिए नए शब्दों का निर्माण करना पड़ा तो भाषाई विकास हुआ। छोटी-छोटी जो बोलियां थी उनको व्याकरण ने आधार दिया। पाणिनी क्या आप जानते हैं मंगोलिया से कंबोडिया तक सब जगह था जाना जाता था अनुवाद होते थे लोग उसका
(1:26:00) अध्ययन करते थे अष्टाध्याय का अष्टाध्याय का पाणिनि को लोग आज भी जानते हैं तो व्याकरण पाणिनि जैसा व्याकरण पूरे संसार में नहीं है हमने भुला दिया आज आप हजार बच्चों को खड़ा कर लीजिए पूछ लिए पाणिनि तो कहेंगे क्या पानी क्या हमने भुला दिया तो व्याकरण से आधार मिलता है और केवल संस्कृत का व्याकरण है जो संसार का सर्वोत्कृष्ट व्याकरण है। आज हम टेक्नोलॉजी की बात करते हैं, सॉफ्टवेयर की बात करते हैं। 1985 में एक अमेरिकी विद्वान ने लिखा था कि संस्कृत इस द मोस्ट एप्रोप्रियट लैंग्वेज फॉर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट। आज तक तो हमने किया
(1:26:44) नहीं। भारत नहीं कर रहा। अब थोड़ा-थोड़ा लोगों ने इसमें अनुसंधान कुछ प्रयोग नए-नए प्रयोग कर रहे हैं। कहीं-कहीं सफलता भी मिली है। परंतु संस्कृत ही सबसे एप्रोप्रियट मोस्ट सूटेबल ऐसी भाषा है जो सॉफ्टवेयर में प्रयोग होनी चाहिए। हो सकती है। बहुत अच्छे सॉफ्टवेयर बन सकते हैं। भाषा के कारण, वैज्ञानिकता के कारण जो संसार की सबसे वैज्ञानिक भाषा है, सबसे समृद्ध भाषा है, क्या हमें भारतीयों को उसको नहीं पढ़ना चाहिए? पढ़ना चाहिए। हमारे विकास में हम देश के लिए योगदान अधिक कर पाएंगे। ऐसा मेरा सोचना है। बहुत सारे विद्वान इस बात को स्वीकार करेंगे।
(1:27:28) ऐसी आशा करते हैं। आचार्य जी बहुत ही अद्भुत चर्चा हुई और इससे पहले कि हम इसको समाप्त करें। मैं एक क्वेश्चन रखकर आप उत्तर मत दीजिएगा सो दैट कि आपके पास एक बहाना और हो दोबारा आने का और दर्शकों के पास भी एक बहाना हो आपको फिर से सुनने का। क्वेश्चन यही है क्योंकि भाषा की बात हो रही थी और मेरे लिए एक नाइट मेयर क्वेश्चन है। मतलब मैं जब भी समय मिलता है तो बात करता हूं। टीम में बात करता हूं। घर पे बात करता हूं। कभी भी फिलॉसफी या इस पर बात होती है। जब हम सोचते हैं कि हमारे लोग बाहर गए होंगे या यूरोप के लोग इधर आए होंगे या जब भी दो
(1:28:04) ऐसी सभ्यताएं जो अनट रही हो पहली बार मिलती होंगी तो वो भाषा का व्यवहार कैसे होता क्योंकि सामने अगर हम चीन गए पहली बार मान लीजिए तो वो क्या बोल रहे हैं हम क्या बोल रहे हैं हमें पता नहीं है कैसे एक दूसरे की भाषा समझ जाते हैं फिर उसके बाद एक दूसरे का ट्रांसलेशन बाद में ठीक है कि इंटरप्रेटर्स हैं और ट्रांसलेटर्स हैं वो लेकिन जब प्रारंभ होता है जब पहली बार सभ्यता ताएं मिलती हैं तो कैसे एक दूसरे की भाषा को समझती हैं? तो ये मैं चाहूंगा कि आप जब कभी और समय निकालेंगी तो हम भाषा संस्कृत भाषा और जो आपके और रिसर्च है जो आपका काम चल रहा है अभी आप
(1:28:41) रशिया भी जाने वाली हैं जापान में भी काम चल रहा है जापान की भी अभी एक सिटी का प्लान यूपी में चल रहा है तो जो हमारे इंटरनेशनल रिलेशंस बढ़ रहे हैं संस्कृति के आधार पर सॉफ्टवेयर पावर के आधार पर तो वो और तेजी से बढ़े और हमें फिर आपका सानिध्य मिले एक बार और तो अगली चर्चा में भाषा की गहराई में और जाना चाहता हूं क्योंकि लैंग्वेज कैसे डेवलप हुई है? कैसे हम यहां तक आए हैं? यह भी एक मिस्ट्री है अपने आप में। तो मैं चाहूंगा कि उस पर और हम चर्चा करेंगे। तो यदि आप दर्शकों के लिए अंतिम कुछ बोलना चाहती हैं, कुछ पुस्तकें सुझाना
(1:29:16) चाहती हैं या संस्कृति को कैसे वो अपनाएं तो आप अभी स्वतंत्र हैं। आप दर्शकों से कुछ अपनी जो राय है वो दीजिए और उसके बाद ही मैं इस एपिसोड को यहां पर समाप्त करूंगा। बहुत सारी भ्रांतियों में उलझा है हमारा युवा समाज। उनको पता ही नहीं भारतीय संस्कृति की विलक्षणता क्या है। तो मैं बस यही कहूंगी अपनी युवा पीढ़ी से कि भारतीय संस्कृति को समझें। उसे जाने क्योंकि अज्ञान के कारण माता-पिता भी कुछ नहीं बता पा रहे। बच्चे तो क्या समझेंगे। बहुत छोटी-छोटी बातें भी नहीं पता। तो अपनी संस्कृति की विलक्षणता, उसकी वैज्ञानिकता,
(1:30:00) उसकी ग्राहयता, उसकी जो विश्व भर में आवश्यकता है और आज के विश्व की जो समस्याएं हैं उनको हमारी संस्कृति कैसे कुछ मार्ग प्रशस्त कर सकती है उनको समाधान में इत्यादि कुछ विषयों पर चर्चाएं अधिक हो तो आज का जो बच्चा है वो लॉजिकल थिंकिंग है। हम वो हमारी वाली पीढ़ी थी जो वो थी कि पिताजी ने जो कहा हमने मान लिया आज का बच्चा नहीं मानेगा और क्यों माने ठीक है समय है उनको समझना चाहिए परंतु हमें स्वयं ही नहीं पता तो हम बताएंगे कैसे नहीं लॉजिकल थिंकिंग के कारण हो सकता है वो ज्ञान वापस आने लगे नहीं वो आएगा तभी क्योंकि वो लॉजिकली सोच
(1:30:44) रहे हैं और जब उन्हें समझ में आ जाता है तो उसको अपनाते हैं ऐसा नहीं है कि नहीं अपनाते तो संस्कृति हमारी पहचान है बनी रहे उसी से हम में गर्व की अनुभूति होती है और यदि हमने उसको छोड़ दिया तो पहचान भूल जाएंगे। संसार में आप कुछ भी बन जाइए परंतु यदि संस्कृति छोड़ दी तो आपका सम्मान नहीं है। जो व्यक्ति अपनी भाषा अपनी संस्कृति को नहीं बचा के रख सकता वो संसार में स्वाभिमान से जी नहीं पाता। सर ऊंचा उठा के जीने का तो सबकी इच्छा है। क्यों ना हो हमारी भी है, आपकी भी है, सबकी है। होनी चाहिए। हमें करना होगा। जो अपना सम्मान नहीं करता उसका कोई और
(1:31:28) सम्मान नहीं करता। नहीं करेगा। आचार्य जी बहुत आनंद हुआ आपसे चर्चा करके। बहुत हर्ष की बात है कि हम आपको फाइनली हाइपर क्वेस्ट पर आमंत्रित कर पाए और दर्शक भी आपको सुन पाए। इसी के साथ और भविष्य में एक और चर्चा की कामना के साथ मैं इस पॉडकास्ट को यहीं पर समाप्त करता हूं। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
No comments:
Post a Comment