Saturday, August 1, 2026

Why Quantum Physicists Read the Vedas | The Mind, Consciousness & Science Debate ft. Mohit Gaur

Why Quantum Physicists Read the Vedas | The Mind, Consciousness & Science Debate ft. Mohit Gaur

Author Name:ऋषि Drishti

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@RishiDrishtiPodcast

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=VHVkQY-Irtw



Transcript:
(00:00) आप एक बहुत ही युवा एक्टिविस्ट हैं। अभी मात्र 22 वर्ष के हैं और आपने इस छोटी सी आयु [संगीत] में इतने बड़े मुकाम को कैसे हासिल किया? सर फोडिंग, वर्नर, हजनबर्ग, मैक्स प्लांक, रॉबर्ट ओपन ह्यूमर, फादर ऑफ एटॉमिक बॉम्ब गीता पढ़ने के लिए संस्कृत लैंग्वेज ओरिजिनल सीख ली थी। लोगों को लगता है कि साइंस का मतलब टेक्नोलॉजी है। जबकि साइंस नहीं है। जो लोग आज मुझ पर हंस रहे हैं, वह यदि वेद पढ़ लें, तो वो नहीं हसेंगे। भाषा सबसे बड़ा आविष्कार नहीं भाषा चमत्कार है यदि वो मनुष्य ने बनाया उससे पूछा हाथ किसने उठाया होगा मैंने नहीं
(00:35) उठाया वही तो मैं है जो कह रहा है कि इस बार मेरी इच्छा नहीं थी मेरा प्रयत्न नहीं था वेट करना चाहते हैं तो एनी टाइम एनीवेयर आई एम ऑलवेज देयर कोई भी यहां पर आ सकता है मैं श्वेता ऋषि दृष्टि के सभी श्रोताओं का हार्दिक स्वागत और अभिनंदन करती हूं। आज ऋषि दृष्टि के इस एक और पडकास्ट में हमारे साथ एक ऐसी अनूठी युवा प्रतिभा विद्यमान है जो आधुनिक विज्ञान और सनातन ज्ञान परंपरा के सेतु पर खड़े होकर एक नए वैचारिक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। जी हां, हमारे साथ हैं विीडीआरओ यानी विज्ञान दर्शन रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन के डायरेक्टर
(01:13) और युवा उद्यमी मोहित गड जी। मोहित जी आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। मोहित जी अपने आप में एक वैदिक एक्टिविस्ट हैं और उन्होंने अभी तक अनेकों पडकास्ट इस वैदिक फिलॉसफी और साइंस से संबंधित विषयों पर किए हैं। जहां उनके पडकास्ट डीडी न्यूज़ और एबीपी न्यूज़ के साथ अनेकों प्लेटफॉर्म्स पर लोकप्रिय हो चुके हैं। उनका जो ज्ञान दर्शन है वह केवल आधुनिक विज्ञान तक सीमित कदापि नहीं है। वे इतिहास, हिंदी, साहित्य और संस्कृत के भी एक गहन अध्ययता हैं। आइए मोहित जी का मान मोहित जी का मानना है कि मनुष्य की योग्यता को केवल कागजी डिग्रियों में नहीं
(01:52) बांधा जा सकता बल्कि उनका वास्तविक लक्ष्य भारत में वैदिक एक्टिविज्म की एक सुदृढ़ नीव रखना है। स्वागत करते हैं मोहित जी का एक बार पुनः और उनसे होने वाली इस चर्चा में अनेकों ऐसे पॉइंट्स को खोजने की कोशिश करते हैं जो आज शायद हर युवा के दिमाग में पनप रहा एक प्रश्न है। मोहित जी सबसे पहले आप यही बताएं आप एक बहुत ही युवा एक्टिविस्ट हैं। अभी मात्र 22 वर्ष के हैं और आपने इस इस छोटी सी आयु में इतने बड़े मुकाम को कैसे हासिल किया और ये शुरुआत कैसे हुई? तो इसमें मुकाम जैसा तो कुछ नहीं है। कुछ लोग ऐसा समझ सकते हैं कि बड़प्पन में कोई कह रहा है
(02:29) लेकिन ऐसा कुछ नहीं है जो मुझे करीब से जानते हैं। उन्हें पता है कि कुछ बहुत बड़ा हासिल मैंने अभी तक नहीं किया है और मुझे कुछ बहुत बड़ा हासिल करना ये मेरा उद्देश्य भी नहीं है। मेरा उद्देश्य है इंडिया में वैदिक एक्टिविज्म की स्ट्रांग फाउंडेशन रखना। हालांकि इसकी फाउंडेशन स्वामी दयानंद ने रख दी थी 1875 में ही एक बहुत ही बड़ी डीप फोर्स के साथ में। लेकिन उसे मॉडर्न इंडिया में एकदम शार्प मॉडर्न इंडिया में वो भी एकेडमिक्स में साइंटिफिक फील्ड में फिलोसोफिकल वर्ल्ड में उसे रखने की आवश्यकता है। इसमें युवा पीढ़ी को सामने आना होगा और इसी जिम्मेदार
(03:02) किस युवा पीढ़ी का नेतृत्व कर रहे हैं? नेतृत्व तो नहीं भाग हूं मैं और नेतृत्व बनाना चाहता हूं। अब उसे जो भी संज्ञा दे दी जाए। लेकिन इसी कार्य हेतु हमने इस जिम्मेदारी को उठाया और वह कम उम्र में हो या अधिक उम्र में हो यह कोई मायने नहीं रखता है। जितना जल्दी हो उतना अच्छा है। ठीक। आपने कहा आपको बहुत बड़ा कुछ हासिल करना है। मतलब हासिल नहीं करना है। आपका उद्देश्य बहुत बड़ा है। लेकिन मैं बस ये पूछना चाहूंगी कि इस ये उद्देश्य आपके दिमाग में कब पनपा? जैसा कि मतलब आपने वो कब शुरुआत की? आप शायद 12th में खुद पीसीएम के छात्र रहे। विज्ञान के छात्र
(03:37) रहे। विज्ञान के छात्र होने के बावजूद भी हूं। हां छात्र हैं। हां। पर वहां से फिर ये सनातन का वैदिक धर्म का रुख कैसे अपनाया? क्या चीज? समझ गया मैं आपका प्रश्न ये है कि साइंस और इनका क्या मेल है? क्या मेल है? बेसिकली। तो मैं कैसे जुड़ा यह बताने से पहले या इसकी बजाय मैं यह बताना चाहूंगा कि ये आपस में जुड़ी हुई ही चीजें हैं। जो फिजिक्स है, केमिस्ट्री है, मैथमेटिक्स है। ये शब्द सुनते ही हमें लगता है कि कुछ तो ऐसा हो रहा है जहां पर कोई लैब है और वहां पर कुछ कोई बैठा है और चश्मा लगाया हुआ है। अच्छा एक तो हमारे मन में छवि है। अगर
(04:12) कोई विद्वान है तो उसके आंखों पर चश्मा होगा ही। तो उन्होंने आंखें फोड़ करके विद्वता हासिल की है। जबकि ऐसा नहीं है। चश्मा लगा हो सकता है। इसका कोई विरोध नहीं है। लेकिन फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमेटिक्स ये जितनी बातें हैं ये सारी बीज रूप में कहीं ना कहीं आपको वेदों में मिलेंगी। ऐसा नहीं कि वेद आपको बता देगा कि रेडियो एस्ट्रोनॉमी क्या है या फिर इस मोबाइल को बनाने की पूरी विधा बता देगा। ऐसा नहीं है। लेकिन इस मोबाइल फोन को बनाने के लिए जिनजिन सिद्धांतों का हम यूज़ करते हैं हम जैसे मान लीजिए कि कोई भी ग्रेविटी से लेकर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक थ्योरी तक सारी
(04:46) नॉलेज हमारे पास में है। इसीलिए हम कुछ भी इनिशिएट कर पाते हैं। तो इस मोबाइल को बनाने की भी कोई ना कोई टेक्नोलॉजी होगी। बाइनरी सिस्टम है, कोडिंग है। हमने अब एककस से शुरुआत की। आज हम मोबाइल तक आ गए हैं। तो इसके लिए हमें क्या चाहिए? मैथमेटिक्स गणना चाहिए। यह आपको यजुर्वेद के मंत्रों में आसानी से मिलंगी। ऐसे ही भौतिक विद्या हो, चाहे रसायन शास्त्र हो, इन सबका मूल बीज रूप में बहुत ही बेसिक लेवल पर बेसियल कंडीशन में आपको वेद मंत्रों में मिलेगा। उसी को आगे डेवलप करते हुए उस पर चिंतन मनन करते हुए अन्य ऋषियों ने दूसरे ग्रंथ लिखे हैं।
(05:18) कहा भी जाता है अनंतो वेदा मतलब वेद मंत्र के अनंत यानी अनेक अर्थ होते हैं। अनेक उसके भाव निकलते हैं। उन्हीं से कैप्चर करके फिर दूसरे ग्रंथों की रचना हुई है और उसी से आगे धीरे बढ़ते-बढ़ते आज हम मॉडर्न साइंस तक पहुंचे हैं। तो कहीं ना कहीं मॉडर्न साइंस और वेद जुड़ा हुआ है। राष्ट्रवाद और वेद जुड़ा हुआ है। साहित्य और वेद जुड़ा हुआ है। इतिहास और वेद कहीं ना कहीं जुड़ा हुआ है। तो वेद ऐसा विषय है जो समस्त विद्याओं का मूल है जो कि आर्य समाज का पहला नियम भी है। ठीक है। आर्य समाज का वो नियम है। लेकिन ये पहले से आर्य समाज के नियम से भी पहले
(05:52) से ये बात नहीं सही बात है। आप कह रहे हैं जुड़ा हुआ है और सब कहते हैं या फिर आप कह रहे हैं शाश्वत है ये चीज। लेकिन आज का साइंस का विद्यार्थी जो स्कूल्स में पढ़ने वाले विद्यार्थी हैं। विशेष रूप से मैं उनकी बात करूं। क्या वह इस बात को मानने को या उनको कैसे यह स्वीकारा मतलब स्वीकृत कराया जाए कि हां वेद भी पढ़ना आवश्यक है। आप पीसीएम के विद्यार्थी को कहें कि वेद का अध्ययन शुरू कीजिए। उन्हें लगेगा कि पागल बना रहे हैं हमारा। आप उनको क्या कह कहना चाहेंगे? क्योंकि मैंने इसीलिए आपसे पूछा था क्योंकि आप प्लस वन प्लस टू में खुद एक
(06:21) विज्ञान के छात्र थे और आज भी हैं। आप इन दोनों चीजों को कैसे साथ में कंटिन्यू कर पा रहे हैं? देखिए वेद को भी नहीं वेद को ही पढ़ना है। पढ़ने लायक अगर कुछ है तो वेद ही है। बाकी चीजें तो हम मजबूरी में पढ़ रहे हैं। जैसे फॉर एग्जांपल इंग्लिश है या कोई और भाषा है वो सीखनी चाहिए। उसका कोई विरोध नहीं है। लेकिन आज जो कुछ हम पढ़ रहे हैं जैसे फॉर एग्जांपल इंग्लिश अगर हम पढ़ रहे हैं तो इसलिए पढ़ रहे हैं क्योंकि वो इंटरनेशनल लैंग्वेज जैसा स्टैंडर्ड उसका बन गया है। है नहीं इंटरनेशनल लैंग्वेज लेकिन समझी जाने लगी है। मजबूरी में आपको
(06:50) पढ़नी पड़ेगी। लेकिन एक मानव जीवन का क्या उद्देश्य है? वो क्यों इस संसार में है? उसे सुख कैसे मिलेगा? दुख क्यों मिलता है? सुख क्यों मिलता है? आनंद क्या है? यह सारी चीजें उसे वेद में मिलेंगी। और हमें लगता है कि यह सब बातें सन्यासियों की और वो गेरवा कपड़ा डाले लोगों की टिपिकल बाबाओं की है। ऐसा नहीं है। मोस्ट ऑफ द फिजिक फिजिसिस्ट अपने जीवन के अंत में फिलॉसफर बन जाते हैं। मैं आपको कुछ नाम गिनाता हूं। अह सर इरविन सोडिंग, वर्नर हजनबर्ग, मैक्स प्लांक इसके अलावा रॉबर्ट जे ओपन हाइमर ये सारे वो वैज्ञानिक हैं जो अपने जीवन के
(07:30) शुरुआती स्तर में फिजिसिस्ट थे। लेकिन मरतेमरते ये दार्शनिक या फिलॉसोफर बनकर मरे हैं। इतनी तह तक तत्व जान तक चले। रोबर्ट ओपन ह्यूमर का नाम सबने सुना है जो फादर ऑफ एटॉमिक बॉम्ब है। जिन्होंने परमाणु बम और एटम बम जैसी चीजों की नींव रखी थी। उन्होंने 1922 में या किस सन में मुझे एग्जैक्ट डेट याद नहीं है। उसमें गीता पढ़ने के लिए संस्कृत लैंग्वेज ओरिजिनल सीख ली थी और गीता पढ़ते-पढ़ते जी और वो उपनिषद तक पहुंच गए। वेदों तक पहुंच गए। इरविन शोडिंग ने कहा कि मोस्ट ऑफ माय थ्यरीज आर हेवीली इन्फ्लुएंस्ड बाय वेदांत। वेद और वेदांत से उनकी थ्यरीज हेवीली
(08:06) इन्फ्लुएंस्ड है। तो शुरुआत जिन्होंने क्लासिकल से की क्वांटम तक वो गए। अंत में जाते-जाते वो क्यों फिलॉसोफी तक जा रहे हैं? आज भी मुझे बहुत ही दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि लोग साइंस इक्वल टू टेक्नोलॉजी मानते हैं। हम लोगों को लगता है कि साइंस का मतलब टेक्नोलॉजी है। लोगों को लगता है ये साइंस है। जबकि साइंस नहीं है। ये साइंस के एप्लीकेशन को करने के बाद मिला गया प्रोडक्ट है। हम साइंस मतलब आप अपनी जिज्ञासा को शांत करने हेतु जिन यूनिवर्स के पहलुओं को खोजते हैं, जिन कॉन्सिक्वेंसेस को सॉल्व करते हैं, वो साइंस है। जैसे ग्रेविटी है या
(08:41) ईएमएफ है या आपने ब्लैक होल के बारे में कुछ स्टडी की। उसका यूज़ करके या उसके सिद्धांतों के आधार पे आप कोई टेक्नोलॉजी बना रहे हैं। ये एक्चुअल में इकोनॉमिक्स है। दिस इज़ नॉट साइंस एट ऑल। आपने पैसा डाला और पैसा डाल करके आप उस चीज को इस्तेमाल करते गए, करते गए। आपने साइकिल से धीरे-धीरे मेट्रो तक आप पहुंच गए। ये साइंस नहीं है। इसमें बहुत बड़ा रोल पैसों का है। इकोनॉमिक्स का है। और कई बार तो इसमें एक्सटॉरशन और शोषण जैसी चीजें भी शामिल है। ये मानव चेतना को कई बार खत्म करता है। कई बार सहायता भी देता है लेकिन कई बार खत्म करता है। जबकि साइंस और
(09:12) फिलॉसफी आपको लॉन्ग लास्टिक पीस देता है। अगर आप टेक्नोलॉजी हो सकता है आपके लिए अच्छी हो या बुरी हो लेकिन साइंस कभी अच्छी या बुरी नहीं होती है। अगर वो साइंस वाकई में सही साइंस है और वो आध्यात्म तक जा रही है। जैसे विज्ञान की परिभाषा महर्षि दयानंद ने बताई है। पृथ्वी तत्व से लेकर ईश्वर पर्यंत तक का विशिष्ट ज्ञान विज्ञान कहलाता है। है ना? तो जो साइंस है या जो विज्ञान है साइंस भी क्योंकि एक इंग्लिश का शब्द है तो उसकी उतनी वास्तव में विज्ञान वास्तव में वो विज्ञान या क्योंकि लोग विज्ञान बोलते हैं तो मैं विज्ञान भी कभी-कभी प्रयोग में लेता हूं। विज्ञान
(09:42) बोलोगे लोग गलत कहेंगे। है ना? तो उसको करेक्ट करना बहुत मुश्किल है। पर आप तो बीड़ा ही उठा के ये बैठे हैं ना कि मुझे तो दोनों [हंसी] बोलने पड़ते हैं। दोनों तरफ मैं हूं इसीलिए। कि लोग जो कह रहे हैं उसको सही ना करके जो सही है उसको सही प्रूफ हालांकि इसमें एक और तथ्य है कि हम जब संस्कृत भाषा का ही प्रयोग कर रहे हैं तब हम विज्ञान ही बोले जैसे यदि अग्नि पुरोहितम यजस देवजम तो वहां मैं यज ही बोलता हूं यह कभी नहीं बोलता हूं लेकिन यदि आप हिंदी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं तो वहां ये अपभ्रंश होकर बिगड़ गया है मानक हो गया वहां फिर वो विज्ञान भी बोला जाता है तो
(10:12) वो स्टैंडर्ड चलेगा हां मतलब जो समझ आए तो मूल विषय ये है कि जो विज्ञान है उसकी गहराइयां पृथ्वी तत्व यानी मटेरियल मटेरियलिस्टिक वर्ल्ड से शुरू होती है। मटेरियलिस्टिक परव्यू से शुरू होती है। और पृथ्वी तत्व से लेकर ईश्वर पर्यंत तक यानी जो सूक्ष्म से सूक्ष्म अवस्था है जो ब्रह्म है जिसे हम कहते हैं मूल है जो हम सारी चीजों का कारण है प्रकृति के अलावा तो उस ब्रह्म तक की जितनी विद्याएं हैं वो सारी विज्ञान है। तो ये बात मुझे शायद समझानी पड़े या एक्सप्लेन करनी पड़े लेकिन रॉबर्ट ओपन हाइमर को या इरविंश रडिंग को किसी को समझाने की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने खुद
(10:48) इस चीज को जिया है। उन्होंने अपने जीवन के इतने कीमती पलों में से कुछ पल वेद पढ़ने में दिए हैं। नोबेल प्राइज विनर्स ने वेदों की तारीफ की है। तो वेद कोई हल की वस्तु तो नहीं है। मैं दो प्रश्न पूछने वाली थी। पहले उसमें से आप जो कह रहे हैं कि इरविंस के नाम और जिन भी आपने साइंटिस्ट के नाम लिए कि इन्होंने वेदों को पढ़ा है और कहीं तारीफ भी की है। उनका वह सब दर्शन या उनका वो शास्त्र कहां है जहां पर यह तारीफ है क्योंकि वो तो प्रकाश में आती नहीं है। सिर्फ अब उसका जो दूसरा पहलू है आपने कहा कि साइंस का या विज्ञान का तो मतलब ही है
(11:18) कि विशेष रूप से पृथ्वी तत्व से सूक्ष्मतम वस्तु के ध्यान मतलब ज्ञान को प्राप्त कर लेना। लेकिन आजकल साइंस की जो परिभाषा है वो बिल्कुल मतलब गलत डिफाइन हो रखी है। परिभाषाएं ही गलत है। वहां कह रहे हैं विज्ञान और आस्तिकता या ईश्वर दो अलग चीजें हैं। दो एक सिक्के के दो अलग-अलग पहलू हैं जो कभी मिल नहीं सकते कि विज्ञान कभी साइंस को मानता ही नहीं है। आप इस बात को या ईश्वर अध्यात्म को नहीं मानता। हां [हंसी] हां हां विज्ञान ईश्वर को नहीं मानता। आस्तिकता मतलब वैज्ञानिक आस्तिक नहीं होते। इस बात को ना ये तो बहुत ही मूर्खता वाली बातें हैं।
(11:50) करते हैं कुछ एथिस्ट इंडिया के न्यू एथिस्ट। हम क्योंकि न्यूटन हम खुद एक थिस्ट थे। खुद आस्तिक थे। हालांकि क्रिश्चियन थे लेकिन बात यहां आस्तिक वर्सेस नास्तिक की चल रही है ना। तो न्यूटन जो थे वो नास्तिक नहीं थे। आइंस्टीन आस्तिक नहीं थे लेकिन नास्तिक भी नहीं थे। एग्नोस्टिक टाइप थे और स्पिनोजा के गॉड में वो बिलीव करते थे। तो एक तरह के थीस्ट भी थे साथ में। लेकिन नास्तिक नहीं थे। आइंस्टीन नास्तिक नहीं थे। गैलीलियो नास्तिक नहीं थे। न्यूटन नास्तिक नहीं थे। और भी बड़े-बड़े जो साइंटिस्ट हैं जैसे आप इरविन शोडिंग को देखेंगे तो वो बिब्लिक कांसेप्ट के
(12:23) रिलेटिव तो एथिस्ट थे लेकिन वो वेदांत को उन्होंने पढ़ा ब्रह्म को माना तो उस हिसाब से आस्तिक ही हुए वो एक तरह से हमारी दृष्टि में तो और आपने कहा कि इसका एविडेंस क्या है या इसका प्रमाण क्या है? तो इरविन श्रोडिंग और वर्नर हजनबर्ग दोनों ही बड़े साइंटिस्ट हैं। इन दोनों के ही बारे में हमें एक विवरण मिलता है। द होलग्राफिक पैराडाइम करके एक पुस्तक है। उसके पेज नंबर मुझे अभी याद नहीं आ रहा है। उसमें उनका एक इंटरव्यू है। जहां पर प्रिट्स ऑफ केपरा करके एक साइंटिस्ट हैं। वो इन दोनों के बारे में बता रहे हैं कि दोनों इंग्लैंड के मुनच करके कोई जगह हैं।
(12:56) वहां पर ये वेदों की पांडुलिपियां पढ़ते थे। तो मैंने एग्जैक्ट रेफरेंस बता दिया। आप लोग जाकर के इसको चेक कर सकते हैं। इसको मैं और भी बहुत जगह पर कोट कर चुका हूं। तो आप यह भी मतलब इस बहस को भी यहीं पे विराम देते हैं कि ईश्वर और विज्ञान दो अलग चीजें नहीं है। अलग नहीं है। बस इतना है कि हां काफी सारे साइंटिस्ट ऐसे हैं जो एथिस्ट होते हैं। काफी सारे साइंटिस्ट थीस्ट होते हैं। कई ऐसे साइंटिस्ट होते हैं जिन्हें साइंस पढ़ के लगता है कि देयर इज नो गॉड। और कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें साइंस पढ़ के लगता है कि देयर इज गॉड। देयर इज क्रिएटर।
(13:26) तो हम आस्था से तो हैं ही आस्तिक लेकिन साथ में हमने जितनी साइंस पढ़ी है उसमें भी हमें लगता है कि देयर इज गॉड एक लुईस पाश्चर करके भी साइंटिस्ट थे उनका भी क्लेम है कि जब कोई थोड़ी साइंस पढ़ता है तो ईश्वर से दूर चला जाता है लेकिन ज्यादा साइंस पढ़ता है तो पास आ जाता है क्योंकि जो जितनी ज्यादा साइंस पढ़ेगा जितना ज्यादा दर्शन पढ़ेगा फिलॉसफी पढ़ेगा अलग-अलग विषयों पे वो प्रकाश डालेगा अपनी नजर का तो वो देखेगा कि यूनिवर्स बिना किसी चेतना के बन ही नहीं सकता हम्म और इस पर हमने भी एक पेपर लिखा है जो कि ग्राउंड ब्रेकिंग हो सकता है भविष्य
(14:00) में। वो पेपर अभी तक पब्लिश्ड नहीं है। शायद यह पडकास्ट रिलीज हो जब तक हो जाए या यदि नहीं होता है तो भविष्य में यह होगा। तो यदि दर्शक उसे देखना चाहते हैं तो वो कनेक्टेड रहें इस चैनल से या विज्ञान दर्शन चैनल पर आप आकर देख सकते हैं। तो जैसे ही पेपर पब्लिश होगा हम इस बारे में बताएंगे। लेकिन मैं इतना आश्वासन देना चाहता हूं कि चेतना और ईश्वर के बिना ब्रह्मांड की रचना नहीं हो सकती है। उसे आपको अपने फ्रेमवर्क में रखना ही पड़ेगा। तो ही वो फ्रेमवर्क कंप्लीट होगा। नहीं इस आश्वासन के पीछे का कोई एग्जांपल भी आप दे सकते हैं क्योंकि आप साइंस के
(14:29) स्टूडेंट हैं। आपकी बात ज्यादा बेहतर मैं बताऊं किसी को कि ईश्वर क्या है? उससे ज्यादा बेहतर आप मैं एक एग्जांपल देता हूं। हालांकि हम लोग वेस्टर्न एकेडमिक्स में चलने वाले आर्गुमेंट से बहुत सहमत नहीं हैं। इसलिए हम अपना खुद का आर्गुमेंट बना रहे हैं जिसको हम पब्लिश करेंगे जो कि वैदिक [गला साफ़ करने की आवाज़] आर्गुमेंट होगा। लेकिन क्योंकि अभी तक ये पब्लिश नहीं हुआ है। इसलिए मैं वेस्टर्न आर्गुमेंट का उदाहरण दूंगा। उसे हम कहते हैं फाइन ट्यूनिंग आर्गुमेंट एफटीके। इसके भी अलग-अलग प्रकार हैं। फाइन ट्यूनिंग आर्गुमेंट के अलावा भी एक पूरी अलग ब्रांच
(15:01) है। एक नमोलॉजिकल आर्गुमेंट है। इस तरह के कुछ आर्गुमेंट हैं जो ये बताते हैं कि हमारा यूनिवर्स इतना फाइनली ट्यून है। इसके कांस्टेंट्स उनकी आपस में कपलिंग ये इतनी फाइन ट्यूंड है कि प्रोबेबिलिटी से कभी भी हम यह नहीं बता सकते कि यूनिवर्स रेंडमली आ जाएगा। और इसके साथ-साथ यह बात ऑलमोस्ट कंफर्म है कि बिना किसी अरेंजर के ये यूनिवर्स अरेंज नहीं हो सकता। ऐसे तो हजारों एग्जांपल्स हम ही देख पा रहे हैं। मतलब छोटी-छोटी चीजों को चलाने के लिए कोई चाहिए तो फिर इतने बड़े ब्रह्मांड को यूनिवर्स को चलाने इसका हां बेसिक मतलब यही है लेकिन फाइन
(15:32) ट्यूनिंग आर्गुमेंट अपने आप में बहुत डीप आर्गुमेंट है। ये क्रिश्चियंस ने इंट्रोड्यूस किया है तो इसमें थोड़ा गॉड का कांसेप्ट वैदिक नहीं है। तो इसलिए इसको हम अपने तरीके से इस आर्गुमेंट को बनाने वाले हैं और इस पे काम चल रहा है। ठीक है। दूसरा प्रश्न है आप फिजिक्स भी पढ़े हैं आप। पहले तो थोड़ा सा हमारे दर्शकों को बताएं कि क्वांटम फिजिक्स बहुत फेमस है आजकल। सब बात करते हैं इसकी। तो क्वांटम फिजिक्स क्या है? फिर मेरा अगला प्रश्न उसी से संबंधित हो। देखिए क्वांटम फिजिक्स का ऐसा क्वांटम फिजिक्स के नाम पर बहुत ज्यादा भ्रम भी
(16:00) फैला हुआ है। हम लोगों को अगर किसी भी अंधविश्वास को या गलत चीज को अगर सही साबित करना है तो उसके पीछे क्वांटम जोड़ देते हैं। है ना? जैसे मैं यह कहूं कि मैं अभी इस सामने पड़े ग्लास को गायब कर सकता हूं। लेकिन अभी कर नहीं रहा हूं पर कर सकता हूं। कोई पूछे कैसे करोगे? हम तो मैं थोप दूं कि क्वांटम में ऐसा कुछ है ऑब्जर्वर इफेक्ट है यह है वो है इंटेंगलमेंट है पार्टिकल्स ऐसे हो जाएंगे तो इसका प्रयोग किया जाता है क्योंकि क्वांटम फिजिक्स बहुत ही ज्यादा मिस्टिकल है और उन उसके मिस्टिकल होने का रीजन भी यही है कि क्वांटम फिजिक्स की ज्यादातर
(16:32) प्रॉस्टिट्यूट्स अपने आप में कंफ्यूज्ड हैं और उसे जब हम पढ़ते हैं तो हमें लगता है कि यूनिवर्स इतना वियर्ड कैसे हो सकता है? तो क्वांटम की शुरुआत कहां से होती है? वो मैं आपको बताता हूं। जैसे मैंने अ ग्रेविटी है तो ग्रेविटी को हम अ कैलकुलेट कर लेंगे। न्यूटोनियन मैकेनिक्स का यूज़ करते हैं। यहां हमें फोर्स का फार्मूला है f = ma फोर्स इक्वल टू मास * एक्सलरेशन। तो यह रॉकेट की जो ट्रेजरी है इन सबको कैलकुलेट करने में यूज़ आता है। मतलब बाहरी संसार जो बड़ी चीज़ रॉकेट अंतरिक्ष में जा रहा है। मेरा फोन नीचे गिर रहा है। तो इनमें [गला साफ़ करने की आवाज़] हम जिन
(17:06) फार्मूलाज़ का यूज़ करते हैं ये लगभग न्यूटोनियन फिजिक्स में आता है। इसमें कोई कंफ्यूजन नहीं है। सब कुछ क्रिस्टल क्लियर दिखता है। लेकिन हम देखते हैं कि स्पीड ऑफ लाइट है या बहुत सारी ऐसी चीजें हैं। ब्लैक होल है। वहां पे जाकर के न्यूटोनियन मैकेनिक्स पूरी तरीके से फेल हो जाती है। न्यूटोनियन तो छोड़िए आइंस्टीनियन जो फ्रेमवर्क है वो भी फेल हो जाते हैं क्योंकि रिलेट रिलेटिविटी भी कहीं ना कहीं पर क्लासिकल है तो थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी आती है। फिर इसके बाद एक पूरी नई ब्रांच आती है फिजिक्स की जो कि अपने आप में एक क्रांति थी। एक
(17:35) रेवोल्यूशन था। उसके बाद हम बहुत सारी चीजों पर सोचने को मजबूर हुए। उसे हम कहते हैं क्वांटम फिजिक्स। इसकी नींव रखने वालों में मैक्स प्लांक, वर्नर हज़नबर्ग, इरविन शोडिंगर जिनके मैं नाम ले रहा था। इन पर उस समय के लोगों ने हंसी ठिठोलियां की है। हंसा है उन लोगों पर कि तुम कैसी फिजिक्स ले आए। तो हज़नबर्ग ने तो यह बोला भी था कि जो लोग आज मुझ पर हंस रहे हैं वो यदि वेद पढ़ लें हम तो वो नहीं हंसेंगे क्योंकि वेद पढ़ने वाले लोगों को क्वांटम थ्योरी कभी भी रेडिकुलस नहीं लगेगी। उनका इस तरह का कुछ कोटेशन है कि क्वांटम थ्यरी विल नॉट लुक
(18:06) रेडिकुलस टू पीपल हु हैव रीड वेदांत और वेद। इस तरह का उनका कोटेशन भी है। तो ऐसा क्या है? इसका मतलब कि वेद क्वांटम फिजिक्स उस वेद में लिखी है ऐसा नहीं है। वेद तो क्वांटम से भी आगे की बात करता है। लेकिन जिन्होंने वेद पढ़ा है उनके लिए क्वांटम फिजिक्स को डाइजेस्ट करना मुश्किल नहीं है। यदि वो क्वांटम फिजिक्स पढ़ ले तो ये उन्होंने उन पर वापस से तंज कसने वालों पर तंज कस करके कहा। तो क्वांटम की शुरुआत इन्होंने की। अब क्वांटम है क्या? हम जब भी ज़ूम करते हैं माइक्रोस्कोपिक लेवल पर तो हम इलेक्ट्रॉन के बाद माइक्रोस्कोप का यूज नहीं कर सकते। नॉर्मल
(18:38) माइक्रोस्कोप का। इलेक्ट्रॉन को ऑब्जर्व करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक माइक्रोस्कोप जो है वो भी ठीक तरीके से काम नहीं करता। आप इलेक्ट्रॉन को कभी भी देख नहीं सकते हैं। इलेक्ट्रॉन के जो भी डेटा है उस डेटा को आप प्रोसेस करके बताते हैं कि हां इलेक्ट्रॉन है। तो इलेक्ट्रॉन को ही जब आप नहीं देख पा रहे हैं तो इलेक्ट्रॉन से छोटे जगत को तो आप बिल्कुल नहीं देख सकते नग्न आंखों से और माइक्रोस्कोप के साथ भी। तो एटम है। एटम में इलेक्ट्रॉन है, प्रोटॉन है, न्यूट्रॉन है। अब इनमें क्या होता है अंदर? ये है सब एटॉमिक पार्टिकल्स। एटम एटम के अंदर जो है
(19:07) सब एटम सब एटॉमिक पार्टिकल्स अब इसके भी अंदर जो होते हैं वो और अंदर के पार्ट्स जैसे ग्लू्स लेप्टोंस और क्वार्क्स [नाक से की जाने वाली आवाज़] ये सब इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन न्यूट्रॉन से भी सूक्ष्म होते हैं। मतलब उनका भी 100वां हिस्सा आप ये मान लीजिए कि एटम के अंदर की दुनिया क्वांटम का दरवाजा है और एग्जैक्टली अगर आप न्यूट्रॉन इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन से भी अंदर चले जाए तो वो प्योर क्वांटम मैकेनिक्स है। उसके अंदर की बातें हैं लेप्टन ग्लूव्स इन सब की और इसमें भी अभी थ्योरी आई है एक स्ट्रिंग थ्यरी स्ट्रिंग थ्योरी कहती है कि अगर आप
(19:40) बहुत ज्यादा ज़ूम करेंगे तो सब कुछ स्ट्रिंग्स धागे नुमा तरंग जैसा सब कुछ दिखेगा ऐसा ऐसा ही एक सिमिलर सिद्धांत है रश्मि थ्यरी जो आचार्य अग्निव्रत जी ने इसका प्रतिपादन किया है एत ब्राह्मण ग्रंथ के भाष्य का एक आधार लेकर के तो वो भी स्ट्रिंग थ्योरी जैसा ही है। उल्टा स्ट्रिंग थ्यरी मल्टीवरिवर्स और कई ऐसी चीजें मानता है जो मतलब वैदिक लोग नहीं मानते हैं। आचार्य अग्निवर्जी नहीं मानते। तो इसमें अलग-अलग मतभेद हैं। लेकिन इतना तय है कि सूक्ष्म लेवल पर जाकर के ब्रह्मांड तरंगों के रूप में कार्य कर रहा हो। ये हो सकता है। और हम तो इतना मानते
(20:12) हैं कि उन तरंगों को भी अगर आप और ज़ूम करके देखेंगे तो प्रकृति तत्व अंतिम वो तत्व है जिससे मह तत्व आप कह सकते हैं। महत तत्व से भी सूक्ष्म जो प्रकृति है वो अव्यक्त हो गई ना? वो अव्यक्त है। सांख्य में आता है सत्व रजतमस साम्यवस्था प्रकृति महते साम्यवस्था प्रकृति हां तो ऐसे पूरा सूत्र उसमें आता है कि साम्य अवस्था जो है सत्व रजतम की उसे भंग करके फिर महत्व बनता है। फिर अहंकार मनस फिर पंच महाभूत पांच तन मात्राएं आकाश इत्यादि ये सब पूरा पृथ्वी तत्व तक आता है। तो क्रोनोलॉजी मैं बहुत ज्यादा नहीं बताऊंगा। लेकिन प्रकृति तत्व सबसे सूक्ष्म
(20:46) तत्व है। ये हम मानते हैं। तो हम वहां तक जा रहे हैं जहां महादेव शिव ने महाभारत में भीष्म पितामह के माध्यम से ये बात आती है कि अग्रहम इंद्रिय सर्वे रेत व्यक्त लक्षणम कि ये अग्रह इंद्रिय है। ये इंद्रियों से ग्राह्य ही नहीं है। इसे आप ग्रहण करेंगे तो आत्मा से करेंगे और आत्मा से ग्रहण करने के बाद भी आप उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकते। इसे सिर्फ एक पहचा पहुंचा हुआ योगी जान सकता है और पहचा हुआ पहुंचा हुआ योगी भी इसे शब्दों में बयां नहीं कर सकता। सिर्फ अनुभव का विषय है। अनुभव का विषय है। तो हम इतना सूक्ष्म स्तर तक जाते हैं
(21:19) और यहां पर भी जाकर के हम रुकते नहीं है। हम ईश्वर तक जाते हैं, ब्रह्म तक जाते हैं और जीवन को जीने की फिलॉसोफी भी इस डीप साइंस में जुड़ी हुई है। इसलिए मैंने शुरुआती स्तर पे कहा कि आप कितनी फिजिक्स पढ़ लो टेक्नोलॉजी और एक्सटॉरशन इन दोनों में आप फंसकर रह जाओगे। यदि आपको वास्तव में पीस चाहिए तो आपको फिलॉसोफी वाले मार्ग में आना होगा। मुझे आज भी यह बात सोचते हुए दुख होता है कि भारत में साइंस का मतलब टेक्नोलॉजी, साइंस का मतलब इक्विपमेंट डिवाइस। ठीक है? बनना चाहिए। उसका विरोध नहीं है। हम लोग भी उस क्षेत्र में भविष्य में काम करेंगे। इसकी संभावना
(21:49) है। लेकिन मूल उद्देश्य हमारा दर्शन देना है। अपनी फिलॉसोफी का प्रचार करना है और अपनी फिलॉसोफी के माध्यम से लोक कल्याण करना है। फिलॉसोफी जो है वो हाईएस्ट चीज है। फिलॉसोफी आप ये मान लीजिए कि सारी ब्रांचेस की मदद है। अच्छा फिलॉसफी का अर्थ है दर्शन। दर्शन माने देखना। अब देखना किसको है? सबसे सूक्ष्मतम पॉइंट तक। मतलब जो भी इस दुनिया का मूल तत्व है उसको देखना ही फिलॉसफी है। हालांकि फिलॉसफी और दर्शन में भी फर्क है। उसको हम डिस्कस नहीं करेंगे। ओके। जी ठीक है। अब आप मैं ऐसा समझूं कि क्वांटम वेद तक ले जाने का एक रास्ता है या ये सतह
(22:20) ही तो वेद तक ले जाने का रास्ता ऐसा नहीं है। वेद तक जाने का रास्ता तो सीधा वेद ही है। इस बहाने साइंस के बच्चे भी जा सकते हैं। पर हां ये है कि यदि आपने क्वांटम पढ़ा, आपने फिजिक्स पढ़ी है। आप उसके डीप कॉन्सक्वेंसेस को देख पा रहे हैं और आप में एक जिज्ञासा है, अनूठी जिज्ञासा है। तो उसका मार्ग फिर वेद में ही जाकर के आपको खुलेगा। अच्छा एक बहुत बड़ा विमर्श आता है कि वेदों में आधुनिक विज्ञान के सूत्र हूबहू मौजूद हैं जो कि आप कह रहे हैं कि हूबहू नहीं होते। ना कोई चांस लेकिन क्या कुछ ऐसा है जैसे विमान बनाने का ही बहुत हमने मूवीज भी देखी हैं कि
(22:54) इसके जो मूल सूत्र हैं वो वेदों में है। मूल तो हैं। देखिए मंत्र हैं आपको वेदों में अनश्व कोई एग्जांपल दे पाएंगे। अनश्व करके एक मंत्र कोई तो है ऋग्वेद के शायद दशम मंडल में मुझे अभी याद नहीं आ रहा जिसमें लिखा हुआ है कि बिना अश्व का बिना रथी का रथ बिना ड्राइवर का और बिना अश्व का यानी बिना घोड़े का तो बिना घोड़े के रथ माने वो ना रथ होगा तब तो वो विमान हुआ ही नहीं विमान को व्यक्त करने के लिए ऐसा कहा है कि ऐसी चीज जिसमें कोई ड्राइवर नहीं है तो ड्राइवरलेस तो हो ही गया लेकिन साथ में रथ नहीं है वो सॉरी अश्व नहीं है बिना अश्व का रथ
(23:27) तो वो विमान का वहां पर संकेत है और भी विमान आता है विमान शब्द भी आता ऐसे तो रजस्व विमान करके संध्या के मंत्रों में भी आता है। हां और विमान शब्द का अनेक जगह प्रयोग है। रुक्मी विमान है और तरह-तरह के विमान आपको वैमानिक शास्त्र में मिलेंगे। हालांकि वैमानिक शास्त्र को बहुत ज्यादा ऑथेंटिक ग्रंथ नहीं माना जाता है। कहते हैं वो अभी-अभी लिखा गया है लेकिन उसमें जो बातें हैं वो पुराने टेक से ही कंपाइल की गई है। और वेद मंत्रों में आपको सीधा-सीधा विमान के बारे में मिलेगा। वेद के आपको टेक्निक सीधी-सीधी नहीं बताता है। वेद के मंत्र जो
(23:56) हैं वो एक तरह से अपने आप में इतने कंसाइज है वो एक पेनड्राइव की तरह हैं। आपको उसे कंप्यूटर में इंसर्ट करके उससे डाटा गैदर करना पड़ेगा। पर एग्जैक्टली अगर आपको विमानों के बारे में या फिर धातुओं के बारे में जानना है जैसे रसायन यदि आप जानना चाहते हैं तो आप रस रत्न समुच्चय, रसाणव, रस रत्नाकर ये सब ग्रंथ पढ़िए। ज्योतिष पढ़ना है तो आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, सूर्य सिद्धांत ये सब ग्रंथ पढ़िए। आपको मान लीजिए कि व्याकरण पढ़ना है तो व्याकरण के अपने अलग शास्त्र हैं। तो वेद के आधार पर ऋषियों ने अलग-अलग ग्रंथ लिख रखे हैं। जैसे वैशेषिक दर्शन है महर्षि कणत का।
(24:27) इसका एक सूत्र है संयोग विभाग वेगानं कर्म समान न द्रव्या नाम च कर्म है। वेग निमित्त विशेषत कर्मणा जाते। उसके आचार्य प्रशस्त ने लिखा है। तो यह गति की बात कर रहा है। इससे गति के नियमों को भी जोड़ा जाता है। मैंने भी इस पर एक वीडियो बना रखा है। लेकिन वो इसका बहुत ही ऊपरी मतलब है। यदि आप डीप में जाएंगे तो वैशेषिक दर्शन में आपको गति के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलेगा। तो वेदों में है सीधे सूत्र हैं। लेकिन वो इतने डीप है कि उसे कंक्लूजन तक ले जाना इतना आसान नहीं है। उसके लिए वैसी बुद्धि चाहिए। ये लंबी बात है और [गला साफ़ करने की आवाज़] मैं तो युवाओं
(24:58) को ये संदेश दूंगा कि आप इसको झटपट एक चॉकलेट मत मानिए कि खाई और टेस्ट आ और ऐसा नहीं है। यह लंबी बात है। लंबी साधना है। जैसे आप फिजिक्स में भी अगर आपने कोई टॉपिक लिया जैसे फिजिक्स में एक ब्रांच है फ्लेवर फिजिक्स जो आपने ली हम तो उसमें आप मर जाएंगे लेकिन आपको पूरी नहीं समझ में आएगी। है ना? एक व्यक्ति को अपने एक जीवन में क्योंकि एक व्यक्ति अपने जीवन में कई चीजें करता है। खेलता कूदता भी है। उसका परिवार होगा। बहुत सारी चीजें होंगी। तो वेद भी ऐसा ही विषय है इसे आप एक जीवन में नहीं जान सकते हैं। उल्टा यह तो कहा गया है कि यह जन्म जन्मांतर की यात्रा है।
(25:30) जितना आप जान लें उतना आपके लिए अच्छा है। उतना आपका मन शुद्ध होगा, पवित्र होगा, निर्बल होगा, अभय होगा। आप में उतना साहस आएगा उतना आप अच्छा कार्य कर पाएंगे। हां वो केनोपनिषद में एक आख्यायिका आती है। वहां पे वो कहता है ऋषि जो भी हैं वो कहते हैं कि जो भी इस दुनिया का ज्ञान है ना उसका सिर्फ 1/4 ही हम पूरी जिंदगी भी अध्ययन करेंगे तब जाके उतना ले पाएंगे। अगर मन मन एक इंद्रिय है, उभयेंद्रिय है और उसके अगर 100 विषय हैं ना तो आप उसमें से 20 भी नहीं ले पाएंगे जीवन भर। ये वहां पे ऐसा दिखाया गया है। ठीक है? अगर क्योंकि आप एक साइंस के स्टूडेंट हैं। मैं
(26:00) पूछूंगी वेदों को ना ईश्वर कृत माना जाता है या अपौरुषीय माना जाता है? विज्ञान पढ़ने की दृष्टि के बाद आप इस बात को क्या सिद्ध कर पाएंगे कि वेद कैसे अपारुषेय हैं? ईश्वरीय है। हम देखिए सिद्ध करना और एक्सप्लेन करना दो अलग-अलग चीज़ होती हैं। एक्सप्लेन मैं कर सकता हूं। डेमोंस्ट्रेट मैं कर सकता हूं। डेमोंस्ट्रेट मतलब ऐसा नहीं कि उसका एक्सपेरिमेंट करके दिखाऊंगा। उसका थ्यरिटिकल डेमोंस्ट्रेशन मैं कर सकता हूं कि ऐसा मुझे क्यों लगता है या फिर इसका तार्किक रीज़ क्या हो सकता है। सिद्ध करना ऐसा है कि हर चीज का एंपेरिकल एविडेंस
(26:34) हम ये आवश्यक नहीं है। उल्टा हर चीज का एविडेंस होना चाहिए। इस बात का कोई एविडेंस नहीं है। हम इस बात का क्या प्रमाण है कि हर चीज का प्रमाण होना चाहिए। बात सच है। तो हर चीज का प्रमाण नहीं होता है। और एंपेरिकल प्रमाण की बात कर रहा हूं मैं यहां। प्रमाण तो कई तरीके के होते हैं। प्रत्यक्ष भी है, शब्द भी है। वो सब तो मानते नहीं है। लोग अनुमान भी है। मैं प्रत्यक्ष प्रमाण की बात कर रहा हूं। प्रत्यक्ष प्रमाण हर चीज का नहीं संभव है। आकाश कहीं नहीं हो सकता है। किसी भी चीज का प्रत्यक्ष प्रमाण पूरी तरीके से संभव नहीं है। मैं कहूं ये
(27:01) मोबाइल है मेरे सामने। इसमें भी कोई पांच सवाल ला के खड़े कर देगा। मैं नहीं दे पाऊंगा उत्तर। प्रमाणित नहीं कर पाऊंगा। हम ठीक है। हमने कुछ नियमावली बना रखी है कि हां इस हिसाब से इतना तो मैं मान लूंगा। है ना? कोर्ट में भी कुछ चीज़ माननी पड़ती है। कुछ क्लॉज़ हैं तो उस हिसाब से माना जाता है। तो ठीक है कि इसके ऊपर और काम हो सकता है और रिसर्च हो सकती है। लेकिन मैं कुछ तर्क दे सकता हूं आपको। तर्क ये है कि इस पे भी हालांकि हम लोग फ्यूचर में रिसर्च करने वाले हैं। बट थोड़ा रिवील करूंगा। आप बिना भाषा के सोच सकते हैं। नहीं सोच सकते। यदि आपके ब्रेन में से
(27:32) सारी भाषाएं यदि हटा दी जाए तो आप नहीं सोच पाएंगे। नहीं हो नहीं सकता। ब्लैंक आप रहेंगे या फिर ज़्यादा से ज़्यादा आप मतलब बहुत बेसिक काम खाना पीना यह सब कर सकते हैं। है ना? कोई कहता है नहीं नहीं सबसे पहले भाषा बनी तो सूर्य इधर से उधर जा रहा है। ये सब वो सोचा होगा। लेकिन सूर्य इधर से उधर या इधर और उधर भी शब्द है तो दिमाग में आता है। शब्द ना हो तो हम नहीं सोच पाऊंग पाएंगे। तो बेसिकली आपको इसीलिए शब्दों को ब्रह्म कहा है। भाषा बनाने के लिए भी आपको भाषा चाहिए। हम भाषा बनाने के लिए भी भाषा चाहिए। इससे ये पता चलता है कि भाषा ऐसी चीज है जो मनुष्य
(28:02) बना ही नहीं सकता। हां पहले से है। यू कैन नॉट क्रिएट ए लैंग्वेज फ्रॉम स्क्रैच। अगर आपके पास कोई लैंग्वेज नहीं है तो आप बनाएंगे कैसे? क्योंकि लैंग्वेज लैंग्वेज नहीं है। आप कुछ भी नहीं कर पाएंगे। लोग कहते हैं कि पहिया सबसे बड़ा आविष्कार है। लोग कोई कहता है कि आग सबसे बड़ा आविष्कार है। है ना? अब आप समझ रहे होंगे कि मैं कहना चाहता हूं कि भाषा सबसे बड़ा आविष्कार है। ना मैं कहना चाहता हूं भाषा सबसे बड़ा आविष्कार नहीं। भाषा चमत्कार है यदि वो मनुष्य ने बनाया तो क्योंकि यह संभव ही नहीं है कि कोई मनुष्य बिना किसी भाषा के
(28:34) वो भाषा बना ले है ना तो [गला साफ़ करने की आवाज़] ये इसको प्रूव किया जा सकता है। मैं यहां डिस्क्लेमर दूंगा कि मैं इसका एविडेंस नहीं दे रहा हूं। मैं सिर्फ आपके सामने एक हाइपोथेसिस रख रहा हूं कि ये मेरा हाइपोथेसिस है जिसको मैं भविष्य में इस पे कुछ आपको कार्य करके हमारी टीम दिखा सकती है। लेकिन फिलहाल ये मेरा हाइपोथेसिस है जिसको आप लॉजिकली सोच सकते हैं कि बिना किसी भाषा के आप कोई भाषा नहीं बना सकते। और जब आपके पास कोई भाषा ही नहीं है तो आप भाषा बनाएंगे नहीं। तो यानी हमारे पास आज बहुत सारी भाषाएं हैं। यानी कोई ना कोई भाषा हमारे पास बाय
(29:02) डिफॉल्ट रही हो। तो अब वो संस्कृत ही है। ये भी मैं अभी एविडेंस नहीं दे रहा हूं। लेकिन मैं अपना कारण, अपनी श्रद्धा, अपनी आस्था के साथ-साथ आपको कुछ लॉजिक दे रहा हूं कि संस्कृत या कोई ना कोई ऐसी प्राइमरी भाषा होनी चाहिए जो मनुष्य के पास पहले से हो। क्योंकि हम ईश्वर को मानते हैं। तो हमारी ऐसी मान्यता है कि वो कोई और भाषा नहीं बल्कि वो संस्कृत ही है जो कि वेद के कारण धरती पर उतरी। क्योंकि ईश्वर ने वेदों का सबसे पहले उद्बोधन किया या यह मान लीजिए ईश्वर ने जो भी उद्बोधन किया उसको हम वेद मानते हैं। हम हम उसको हम वेद कहते हैं। है ना? आप कहे नहीं
(29:33) वो वेद ही क्यों है? कुछ और क्यों नहीं? जो मानना है मान लो उसको हम वेद कहते हैं। हम वेद को ही वो वाणी मानते हैं। उसका एक अलग चर्चा हो सकती है कि वही मंत्र वेद क्यों है? इसके ऊपर भी अलग शोध है। इस पर भी मैं अभी आऊंगा। इसी पॉडकास्ट में हम बात करेंगे। तो बेसिकली हमारे पास कोई ना कोई एक भाषा पहले से ईश्वर के माध्यम से होनी चाहिए। ईश्वर ने वेद दिए। वेद में वैदिक संस्कृत है। छांदस है। उससे हमें एक बेसियल कंडीशन मिल गई। उसी का प्रयोग करके फिर इंद्र, बृहस्पति कई आदिकाल के जिन्हें हम कहते हैं महेश्वर, शिव इन सब ने इन चीजों का
(30:06) विकास किया और वेदों से व्याकरण इत्यादि ये सब छह अंग शिक्षा, कल्प, छंद, व्याकरण, ज्योतिष, निरुक्त ये धीरे-धीरे इनके विभाग हुए। विभाग हो के आज हमारे पास फिर अलौकिक संस्कृत आई। उसे करते-करते रशियन बनी, इंग्लिश बनी, अमेरिकन इंग्लिश, ये वो इरिश बहुत सारी चीजें आज हम हिंदी, भोजपुरी, बघेली, बुंदेलखंडी, राजस्थानी, हरियाणवी बहुत सारी भाषाएं हम उसी से अपभ्रंश करके बना चुके हैं। तो बेसिकली एक तो बात यह है कि हम लॉजिकली अगर जाते हैं डिडक्ट करके तो हमें एक ऐसी अवस्था माननी पड़ेगी जहां हमें ईश्वर से या ब्रह्म से या फिर मनुष्य
(30:35) के बाहर से कुछ तो प्रेरणा आई और कुछ तो मिला। तो इस चीज को हम कहते हैं कि यह वेद हो सकता है और फिर वो अपुरुष है। क्योंकि वो पुरुष की रचना नहीं हो सकती। अब वो वेद ही है। इसके लिए और फ्यूचर में तगड़ा काम किया जा सकता है। इस पर चर्चा की जा सकती है। लेकिन संकेत दूंगा कि जो वेद के मंत्र हैं उनके ऊपर बहुत सारी ऐसी स्टडीज हो चुकी है कि वेद मंत्र बोलने पर आपको मन में अच्छा इफेक्ट मिलता है। ब्रेन में अच्छा इफेक्ट मिलता है। ओम का उच्चारण करने पर। इस पर काफी सारी रिसर्च है। एम्स की रिसर्च है। बहुत सारे इंस्टट्यूट्स की रिसर्च है। लेकिन जब आप नॉर्मल श्लोक
(31:06) बोलते हैं या कुछ नॉर्मल बोलते हैं। जैसे मैंने बोला माय नेम इज मोहित। आई एम रनिंग एमजे टेक्निकल्स। इट इज माय आईटी कंपनी। मैं ये शब्द बोल रहा हूं इससे इफेक्ट नहीं पड़ रहा। इसका मतलब उस ध्वनि में ओम में या उन वेद मंत्रों में ऐसा कुछ है जो कहीं ना कहीं मन से नेचर से कनेक्टेड है। कुछ तो ऐसा है जो कि तत्व रूप में कहीं ना कहीं है। यदि वो नहीं है तो मान लीजिए ओम भूर भुव स्वः यह बोलने पर ही क्यों हो रहा है। मैं ओम ह्रीम श्रीमंग चामुंडाय नमः ये सब मैं बोल रहा हूं। उससे तो कुछ नहीं हो रहा है। या मैं कुछ भी बकवास कर रहा हूं। कोई जोक
(31:34) मार रहा हूं, कोई गाली दे रहा है। उससे कोई भी मिरेकल इफेक्ट हमें क्यों नहीं मिल रहा? मिरेकल इफेक्ट से मेरा मतलब है कुछ फेनोमिनल। कुछ ग्राउंड ब्रेकिंग ऐसा हमें कोई फिनोमिना क्यों नहीं दिख रहा? तो इससे पता चलता है कि कुछ खास ध्वनियां है। विशेष ध्वनियां है जो बाकी ध्वनियों से अलग है। तो कुछ तो इसका कनेक्शन है यूनिवर्स से। तो इससे हम सिद्ध कर सकते हैं सिद्ध करने का प्रयास कर सकते हैं भविष्य में कि जो वेद मंत्र हैं वो कहीं ना कहीं यूनिवर्स से कनेक्टेड हैं और साथ में हमें एक ऐसी वाक भी चाहिए। एक ऐसी देवीय वाक चाहिए जो कि मनुष्य ने ना बनाई
(32:03) हो। तो ये दोनों चीजें कहीं ना कहीं एक ही हो सकती है। क्योंकि हमें इसके अलावा आप बाइबल लो, कुरान लो, कोई भी ग्रंथ लो उसमें यह प्रॉपर्टी आपको नहीं मिलेगी। क्योंकि यह प्रॉपर्टी सिर्फ वेद में मिल रही है। हेंस प्रूव कि वेद जो है वो अपारुषय है। यह एक बहुत ही लॉजिकल डेमोंस्ट्रेशन है। यह एविडेंस नहीं है। एररिकल एविडेंस नहीं है। इस पे फ्यूचर में काम किया जा सकता है। इस डिस्क्लेमर के साथ मैं ये लॉजिक दे रहा हूं जिस पे आगे एक काम किया ओपन होगा डिस्कशन। नहीं मतलब मैं इस विषय से बाहर जाके मैं खुद एक संस्कृत की छात्रा हूं। मैंने भी
(32:28) बचपन से वेद पढ़े हैं। वेदों को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ है। पूरा नहीं थोड़ा बहुत। पर फिर भी मेरे मन में भी अभी तक एक प्रश्न है क्योंकि शुरू से ये सुना है गुरु परंपरा से कि जो वेद है जब ऋषि मुनियों ने सृष्टि के आदि में जब सृष्टि आरंभ हुई तो तपस्या की और तपस्या करते-करते कुछ वो चार ऋषि जो थे क्योंकि वो इतनी पवित्र आत्माएं थे उनके मन में वेद का ज्ञान ईश्वरीय प्रेरणा से मिला और फिर उन्होंने वेदों को सबके सामने लाया। मतलब इस बात को किस तरह से डेमोंस्ट्रेट किया जा सकता है या व्याख्यायित किया जा सकता है कि यह जो वो चार ऋषि थे उनके
(33:00) द्वारा जो जान आया था यह वही है जो आज वेद रूप में है। दिस इज माय मतलब मेरा पर्सनल क्वेश्चन है और अगर आपको लगता है कि अभी इसके ऊपर और काम करना बाकी है तो वी कैन लीव दिस। हम मैंने अभी तक जो बातें बोली लॉजिकल उस पर आपका कोई और काउंटर क्वेश्चन है? मतलब नहीं यह मुझे समझ आता है कि हां भाषा की जननी एक चाहिए और भाषा आविष्कार नहीं है। भाषा को भी कहीं से लाया गया है। मतलब उसे रिसर्च कह सकते हैं लाइक प्राप्त हुई है। हां प्राप्त हुई है। मतलब कोई बनाई नहीं गई चीज ना अपने आप से नहीं बनी है। वहां इसके अलावा वेद मंत्रों में ये हमें जो
(33:34) वैशिष्ट्य दिखता है ये हमें विशेषता जो दिखती है ये भी बताती है कि वेद मंत्र रचना नहीं है। क्योंकि हमारी रचना है तो हम ऐसा और कोई नया फ्रेज़ बना के क्यों नहीं दिखा लेते जिसका वैसा ही माइंड पे इफेक्ट हो। हम हां अगर यह बात प्रूव हो जाती है तो यह कंक्लूजन निकलेगा। तो हमने एक हाइपोथेसिस रखा है। हम हां ये तो क्लियर है। मतलब यही वाली बात कि जो मंत्र अभी चल रहे हैं अब इसमें कुछ प्रक्षिप्त हैं। कहीं-कहीं शाखाओं में कुछ वेद की कुछ शाखाएं जो हैं जहां पे कुछ प्रक्षेप हुए हैं उनको हम प्रकरण से बाहर हो जाने की वजह से एग्जिट करा सकते हैं।
(34:04) लेकिन जिनको हम मान रहे हैं कि वह वेद ही है। वो वेद कैसे है? हम इसी का मैंने उत्तर दिया कि यदि यह मंत्र आपको वैशिष्ट्य के साथ दिख रहे हैं। आम श्लोकों से यह अलग दिख रहे हैं। इट मींस कि ये मानव रचना नहीं है क्योंकि मानव रचना अगर होती तो उसका फिर माइंड पे या ब्रेन पे इफेक्ट क्यों मिल रहा है? ये एक प्रश्न है ना? तो हम इस तरह से भी इसको जांच सकते हैं। हमें प्रक्षिप्त का भी जांचना है तो ऐसे जांच लो कि जो मंत्र आपको कुछ इफेक्ट दे रहा है माने वास्तव में मंत्र है। है ना? उसका कोई प्रकृति पर या भौतिक पदार्थों पर भी इफेक्ट मिल रहा
(34:33) है। लेकिन जिसका कोई इफेक्ट ही नहीं है तो इसका मतलब मंत्र नहीं है। फिर वो श्लोक है। क्योंकि मंत्र का संबंध मन से है, मन तत्व से है, मनन से है, सृष्टि से है, ब्रह्मांड से हैं। तो इसको जांचने का यही तरीका है। या तो परंपरा से जांचिए या फिर इस वैज्ञानिक रीति से जांचिए। ठीक? तो अगर यह जांचा जाता है भविष्य में तो यह एक बहुत अच्छा प्रमाण हो सकता है इस दिशा में। बाकी बहुत ज्यादा प्रमाण की आवश्यकता नहीं है किसी चीज को मानने के लिए। जानना है तो प्रमाण लेते रहो और जानते जाओ लेकिन आपको कुछ ना कुछ मानना पड़ेगा क्योंकि यह भी लॉजिकल बात सिद्धांत पे टिकना
(35:05) एक सिद्धांत पे टिकना पड़ेगा तो इसके लिए ये इतना लॉजिक पर्याप्त है कि जिससे आप इस पे एटलीस्ट देखिए एक और चीज लोग कहते हैं मैं क्यों बिलीव करूं तो मेरा ये आंसर रहता है कि मैं कहां कह रहा हूं बिलीव करूं या बिलीव करने या ना करने से क्या हो जाएगा आपके माइंड में ये बात बस पहुंच गई ना बस यही आपके लिए मुक्ति मोक्ष या फिर शुद्ध आत्मा का कारण बनेगी मानना या ना मानना ऐसा कोई लेबल नहीं है कि मैंने खटखट खटखट कंप्यूटर खोला अपना डिवाइस का कंप्यूटर का उसमें मैंने यस एंट्री कर दी। अब जो नहीं मान रहा है वो नो जैसे एक विद्यार्थी है कोई उससे मेरी
(35:36) बात चल रही है काफी समय से पहले भी मेरी कई लोगों से इस तरह से डिस्कशन हुआ है तो वो कहता है मैं नास्तिक हूं फिर चर्चा करते-करते उसको आस्तिक बनने का मन कर रहा है तो कहता है भैया मैं आस्तिक बनना चाहता हूं कहां जाके बनूं मैंने कहा ये कोई आधार कार्ड वाला मसला तो है नहीं कि जैसे घर वापसी या वो सब होता है तो संवैधानिक कारण से करना पड़ता है। तुम्हें लग रहा है ईश्वर है तो तुम आस्तिक हो। अब तुम खुद को आस्तिक ना कहो या कहो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। तो वही बात है कि आपके भीतर यह तर्क प्रवेश कर गया कि हां यह देवीय वाक है। इस तरह का है तो बस
(36:03) वो उतना पर्याप्त है। अब आप इसको लिबलाइज करो कि मैं मानता हूं नहीं मानता हूं। तो ये एक यूथ के साथ अभी बड़ी प्रॉब्लम है। यूथ हर चीज को लिबलाइज करना चाहता है कि मैं क्या हूं मैं क्या नहीं हूं। जो बहुत ज्यादा किताबी कीड़े हैं वो तो बहुत ही ज्यादा ऐसा करते हैं या जो थोड़ा बहुत भी सोशल मीडिया पर एक्टिव है। जैसे कॉकरोच जनता पार्टी तो कहेगा मैं कॉकरोच मैं कॉकरोच हूं। ऐसा हूं। जबकि वो यह भी कह सकता था कि मैं सत्य के पक्ष में हूं या धर्म के पक्ष में हूं या समाज के पक्ष में हूं या जो भी भ्रष्टाचारी है रिश्वतखोरी है या वो सरकार का यदि विरोध कर रहे हैं
(36:31) तो यदि उनको सरकार में कुछ कमियां लग रही है तो उनका विरोध कर सकते थे। उन्हें खुद को कॉकरोच कहने की क्या आवश्यकता थी? लिबलाइज करना है। लेकिन कॉकरोच कह के वो उसमें शामिल होना चाहते हैं और खुद को लिबलाइज करना चाहते हैं। उसका हिस्सा बनना चाहते हैं। हां। तो मैं तो यही कहता हूं या तो लिबलाइज करना तो स्वयं को वैदिक आर्य के रूप में या वैदिक के रूप में लिबलाइज करिए। हम् वरना बेस्ट तो यह है वैदिक आर्य किसी भी रूप में आपको स्वयं को लिबलाइज करने की आवश्यकता नहीं है। आप जानिए आर्य संस्कृति क्या है? आप जानिए वेद क्या है। आप अपने
(36:59) पूर्वजों को जानिए। आप आर्यावर्त की इस ग्रेट लेगसी को जानिए। आपको स्वयं को लिबलाइज करने की जरूरत नहीं है। आप अपने आप वो कार्य करेंगे जो हमारे क्रांतिकारियों ने किया। वो रास्ता अपने आप उधर ले जाएगा। ठीक है। आप एआई भी पढ़ रहे हैं। है ना? जहां सब कुछ न्यूरल नेटवर्क के ऊपर है। जबकि वेद और वेदांत कहते हैं कि चेतना सर्वोपरि है। तो इस डिफरेंस को क्या आप कभी सिद्ध कर पाएंगे कि चेतना केवल मस्तिष्क के रसायनों की उपज है या भौतिकवाद बहुत अच्छा आपने ये प्रश्न उठाया क्योंकि अभी ये बहुत बड़ा हॉट टॉपिक है और इस पे हम चाहते हैं कि कुछ ना कुछ काम
(37:32) हो। अ कॉन्शियसनेस इज नॉट द बाय प्रोडक्ट ऑफ योर ब्रेन। यह हम लोग प्रचार करते आए हैं। हम और बहुत सारे न्यूरो साइंटिस्ट भी इस बात को मानते हैं कि कॉन्शसनेस आपके ब्रेन का बाय प्रोडक्ट नहीं है। लेकिन स्टिल ये एक डिबेट है। ऑनगोइंग डिबेट है और बहुत हॉट डिबेट है कि कॉन्शियसनेस आपके ब्रेन का बाय प्रोडक्ट है या नहीं है जो आपने अभी बात बोली कि मस्तिष्क में चलने वाली रासायनिक क्रियाओं की उपज है। दैट इज कॉल्ड बाय प्रोडक्ट इन साइंटिफिक टर्मिनोलॉजी और इंग्लिश जो आपने हिंदी में बोला कि रासायनिक क्रियाओं की उपज है या नहीं है। तो प्रश्न ये है कि चेतना यानी
(38:07) मैं हूं। यह मुझे आभास है। मैं अपने बारे में सोच पा रहा हूं। स्वयं के होने का आभास एक जो सब्जेक्टिव एक्सपीरियंस होता है ना जैसे मुझे अभी ये दिख रहा है कि आप पॉडकास्ट कर रहे हैं। मुझे देख रहे हैं। आपको ये दिख रहा है मैं पॉडकास्ट कर रहा हूं। आपको देखते हुए लेकिन आप फील नहीं कर सकते हैं कि मैं कैसा फील कर रहा हूं या आप कैसा फील कर रहे हैं। मैं डिस्क्राइब तो कर सकता हूं कि मुझे ऐसा फील हो रहा है कि बहुत अच्छी चर्चा चल रही है। आप बहुत अच्छे प्रश्न कर रहे हैं। है ना? या जो भी मेरे मन में भावना है, मैं आपको सही मान रहा हूं या गलत मान रहा हूं। यह सब बातें
(38:37) मैं आपको लिख करके दे सकता हूं। आप भी मुझे दे सकते हैं। लेकिन उन बातों को जैसे मान लीजिए कि मैं आपको बहुत विद्वान मान रहा हूं, विदुषी मान रहा हूं। लेकिन ये मानते वक्त मैं कैसा फील कर रहा हूं? इस सब्जेक्टिव एक्सपीरियंस को मैं कभी भी आपको शेयर नहीं कर सकता। इसे हम साइंटिफिक टर्मिनोलॉजी में क्वालिया कहते हैं। क्वालिया मतलब मैं क्या फील कर रहा हूं? एग्जैक्टली मैं इसे नहीं। ये कह रहे हैं कि प्रेजेंटेस्ट जो मोमेंट है उसमें क्या फील हो रहा है उसको? मैं जो भी फील कर रहा हूं उसे मैं नहीं बता सकता। क्वालिया कहते हैं। मैं इस पॉडकास्ट में भी नहीं बता सकता।
(39:08) इसीलिए वो क्वालिया है। है ना? ये सब ने इंडिविजुअली फील किया है कि ये क्वालिया है कि आप अपनी तरफ से क्या सोच रहे हैं या क्या फील हो रहा है आपको। आप उसका डिस्क्रिप्शन लिख सकते हैं। लेकिन वो फीलिंग आप एज इट इज़ किसी को फील करवा ही नहीं सकते। हर आदमी की थोड़ी-थोड़ी पॉइंट टू पॉइंट मीटर टू मीटर हल्की-हल्की चेंज हो रही है। वो एक्सपीरियंस चेंज होगा। तो ये क्वालिया क्यों होता है? यह कॉन्शसनेस के कारण होता है। अब साइंटिस्ट यह जानना चाहते हैं कि कॉन्शसनेस या तो ब्रेन का बाय प्रोडक्ट है। जैसे कि यह पेंटिंग है यहां पर ऋषि दृष्टि
(39:37) तो अगर कोई कहे कि ऋषि दृष्टि ये पेंटिंग ब्यूटीफुल है। तो मैं कहूं इसमें ब्यूटी कहां है? आप मुझे दिखाइए। तो इसमें ब्यूटी कहीं नहीं है। महसूस हो रही है। इसमें ब्यूटी कहीं नहीं है। इसमें री है। इसमें शी है। इसमें डी आर आई एस ये यू है। एच एच है। डिजाइनर डिजाइनर है। टी है। आई है डिजाइनर। एच का ब्यूटी है। हां [हंसी] ब्यूटी ब्यूटी नहीं है लेकिन अभी भी है। ये डंडी है। ऐसा है वैसा है। ये ब्लू कलर है। मतलब ब्यूटी नाम से यहां आप मुझे उंगली टच करके नहीं बता सकते कि दिस इज़ ब्यूटी। आप एक्सप्लेन कर सकते हैं ऐसा ऐसा ऐसा लेकिन यह सब मिला ब्यूटी है।
(40:09) तो ब्यूटी एक इमरजेंस है। वो इमर्ज होती है कि यह ब्यूटी है। तो ब्यूटी कोई एलिमेंट नहीं है। ऐसे ही जो कॉन्शियसनेस को बाय प्रोडक्ट नहीं मानते हैं। जो न्यूरल नेटवर्क वो सबसे समझाते हैं। वो कहते हैं कि कॉन्शियसनेस बाय प्रोडक्ट है। कॉन्शियसनेस कुछ नहीं है। ब्रेन में ये केमिकल है, ऐसा है, पीनियल ग्लैंड है, ये है, हाइपोथैलेमस है। ये सब अच्छे से काम कर रहा है। तो इसके प्रॉपर काम करने का ही दूसरा नाम कॉन्शसनेस है। ये एसिस लोग कहते हैं। हम ऐसा नहीं मानते। हम मानते हैं ना कॉन्शियसनेस एक अलग से एंटिटी है। जैसे ये फ्रेम है तो ये फ्रेम
(40:36) एक अलग एंटिटी है। फ्रेम इमरजेंस नहीं है। वैसे ही हम मानते हैं कॉन्शसनेस भी ब्यूटी की तरह नहीं है। कॉन्शियसनेस इस फ्रेम की तरह है। वो एक अलग एंटिटी है जो कि हमारे ब्रेन या हमारी बॉडी को गवर्न कर रही है या फिर फील कर रही है। एक्सपीरियंस कर रही है। कंट्रोल कर रही है। अलग-अलग दर्शन अद्वैत होने से जीवन है। जिसके होने से जीवन है वो एक अलग तत्व है। वो एक अलग अस्तित्व है। ये हम मानते हैं। तो इसमें एक बहुत हॉट डिबेट है। जैसे बहुत सारे एक्सपेरिमेंट्स भी हुए हैं। बहुत सारी चीजें भी हुई है। जैसे अ शयन की तीन अवस्थाएं होती है। एक हां
(41:06) सुशुप्त, जागृत और स्वप्न और फिर तुरी अलग होती है। ट्रांसेंडर उसको जो बोलते हैं वो एक अलग विषय है। लेकिन हम अगर मॉडर्न साइंस में देखें तो एक अवेकन, एक स्लीप और एक ड्रीम है ना। इसके अलावा एक डीप स्लीप भी होती है। डीप स्लीप और जो ये समाधि वाली या जो तुर्य वाली अवस्था है ये हम लोग इसमें डिस्कस नहीं करेंगे। तो जो अवेकन, स्लीप और डीप स्लीप है इसमें अवेकन के दौरान आपको एक्सपीरियंस होता है सब कुछ। स्लीप के दौरान भी होता है। हम ड्रीम के दौरान भी होता है। लेकिन डीप स्लीप में आपका एक्सपीरियंस थोड़ा अलग होता है। मैं समझाता हूं कैसे।
(41:44) अ जब भी आप सोते हैं तो आप आपको सपने आ रहे होते हैं, ड्रीम आ रहा होता है। तो जब आपको ड्रीम आ रहा होता है तो आप सब कुछ एक्सपीरियंस कर रहे होते हैं। हम उस समय आपके न्यूरॉन्स एक्टिव होते हैं। अभी आप बैठे हैं आपके न्यूरॉन्स एक्टिव हैं। आपके न्यूरॉन्स फायर होकर आपको बता रहे हैं कि यू आर अवेकन। लेकिन जैसे ही आप सो जाते हैं तब भी आपके न्यूरॉन्स एक्टिव रहते हैं। आपके न्यूरॉन्स बताते हैं कि यू आर ड्रीमिंग। ड्रीम्स जो है वो न्यूरॉन्स को विटनेस कर रहे हैं। लेकिन डीप स्लीप का मतलब ही होता है कि कुछ पर्टिकुलर न्यूरल एक्टिविटी
(42:13) डीएक्टिवेट हो चुकी है। न्यूरॉन्स एक्टिव हैं। लेकिन डीप स्लीप का मतलब है कि कुछ पर्टिकुलर न्यूरॉन्स डीएक्टिव हो चुके हैं। इसी का नाम डीप स्लीप है। है ना? इसमें आरईएम एक रैपिड आई मूवमेंट भी आता है। तो प्रश्न ये है कि जब आप डीप स्लीप में जाते हैं तो कायदे से होना ये चाहिए कि जैसे मैंने अपने फोन को बंद किया 3:42 पे और इंटरनेट नहीं है और मैंने इसको 1 घंटे बाद चालू किया। तो इसमें वापस 3:42 ही होने चाहिए। ऐसा नहीं एक घंटे बाद का समय हो जाए। है ना? जब हम सोकर उठते हैं तो हमें याद रहता है कि हमने 6 घंटे की डीप स्लीप ली। हमें डीप
(42:45) स्लीप एक्सपीरियंस हो रही होती है। चेतना गहरी नींद भी आपको अनुभव हो रही होती है। तो यदि चेतना ब्रेन का बायप्रक्ट होती। यदि चेतना न्यूरॉन्स का बाय प्रोडक्ट होती तो न्यूरल एक्टिविटी के सुशुप्त होने के साथ-साथ आपकी चेतना भी सुशुप्त हो जाती और आपको 6 घंटे का कोई अनुभव ही नहीं होता। जबकि आपको 6 घंटे का अनुभव होता यानी न्यूरॉन्स काम नहीं कर रहे हैं। यह भी कोई और बता रहा है। कोई विटनेस कर रहा है इसको। न्यूरॉन स्वयं ही स्वयं को विटनेस करते हैं। तो उनके बंद होने के बाद कौन बताएगा? लेकिन सोचिए कि आपको मरने के बाद का भी अगर रास्ता याद रह
(43:17) रहा है। मैं एक एग्जांपल दे रहा हूं। इसका मतलब कि बॉडी के अलावा भी कुछ है ना। वैसा ही यहां पर समझना चाहिए कि चेतना ही उसे बता रही है। तो जैसे अभी आप मेरे मोबाइल को अगर बंद करके वापस चालू करेंगे या किसी आप कंप्यूटर को बंद करके चालू करेंगे एक दिन बाद तो उसमें टाइम एक दिन बाद का अपडेट हो जाता है। इंटरनेट से नहीं। इसलिए क्योंकि स्टार्ट करने के लिए आप जैसे ही स्टार्ट करते हैं तो इलेक्ट्रिसिटी जाके कुछ होती है। ऐसा कुछ होता है मुझे एक्सैक्टली अभी उसका मैकेनिज्म याद नहीं। तो उसके लिए एक छोटा सा सेल होता है। आप 10 साल बाद
(43:45) खोलेंगे वो सेल खराब हो जाएगा। तो इसलिए वो आपको टाइम नहीं अपडेट करके देगा। वरना वो टाइम अपडेट करेगा। मतलब कंप्यूटर बंद कितनी देर से है तो उसके बंद होने का भी समय वो कैलकुलेट कर रहा होता है। है ना? अगर वो सेल उसमें नहीं होगा तो वो सेम उसी टाइम के साथ उसकी सुशुप्त अवस्था होती है। इससे हमें पता चलता है कि डीप स्लीप भी हम एक्सपीरियंस करते हैं कि ओ आज मुझे डीप स्लीप आई। अच्छा कोई कहता है नहीं मैं एक्सपीरियंस नहीं करता। मैं तो सुबह सीधा उठ जाता हूं। तो उसे पता कैसे चलता है कि उसने डीप स्लीप लिया। अच्छी नींद सोया। अच्छी नींद सोया।
(44:11) सुखम असप्सम ऐसा कुछ सोना तो ऐसा चाहिए था कि डीप स्लीप आई तो 2:00 बजे तक सपने देख रहा था। सीधा 4:00 बजे। उसको बीच का कुछ भी एक्सपीरियंस नहीं होना चाहिए था। उसको कुछ याद नहीं रहना चाहिए था। कंप्लीट ब्लैंक कि मैं 2:00 बजे सोया। सीधा 4:00 बजे गए। ऐसा होना चाहिए था अगर कॉन्शसनेस ही खत्म हो गई तो या फिर उसकी कॉन्शसनेस ही इमरजेंस थी तो इसका मतलब कॉन्शियसनेस इमरजेंस नहीं है। कॉन्शसनेस इंडिपेंडेंट है और वो ऑब्जर्व करती रहती है कि अभी मेरा शरीर चल रहा है। अभी शरीर नहीं चल रहा है या अभी ये अवेकन है। ये एक एक्सपेरिमेंट है। इस तरह के अनेकों
(44:39) एक्सपेरिमेंट हुए हैं। जैसे एक और एक्सपेरिमेंट हुआ है। उसका रिसर्च पेपर मैं आपको चाहे तो भेज दूंगा। आप एडिटिंग में लगा सकते हैं। जिसमें मतलब एक पेशेंट को ऐसा कहा गया कि आप बहुत सरल करके मैं बता रहा हूं। बहुत टेक्निकल टर्म नहीं बता रहा हूं क्योंकि मेरे साथ दोनों समस्या है। सामान्य दर्शक कहते हैं आप बहुत इजी बताइए और जो थोड़े एक्सपोज करने की जिनमें चिल्लप है वो कहते हैं नहीं आप बिल्कुल टेक्निकल बताइए। तो मैं यहां सामान्य बता रहा हूं। जिसको टेक्निकल जानना है वो फिर डिबेट विबेट में आ जाए। तो अभी हम लोग एक स्पार्कर्स करके
(45:07) एक सीरीज भी चला रहे हैं डिबेट की। ऑनलाइन भी हम लोग करते हैं। लाइव भी करते हैं और कहीं ऑफलाइन भी कर सकते हैं। तो उसमें भी कोई आ सकता है यदि डिबेट करना चाहता है तो। तो बैक टू दी टॉपिक ये जो एक्सपेरिमेंट है इसमें ऐसा होता है कि एक व्यक्ति को कहा जाता है अपने हाथ को आप ऊपर करिए। अपने हाथ को ऊपर करिए। उसके सारे ब्रेन में जो भी फ्रीक्वेंसी जो केमिकल्स हो रहे हैं उन सबको नोट कर लिया जाता है। उससे पूछा जाता है किसने हाथ ऊपर किया? वो कहता है मैंने किया। उसको कहा हाथ ऊपर करिए। उसने हाथ ऊपर किया। उससे पूछा किसने हाथ ऊपर किया? उसने कहा
(45:36) मैंने किया। अब उसके ब्रेन में जो जो केमिकल प्रॉपर्टीज चल रही थी उसका पूरा डाटा निकाल लिया और डाटा निकाल करके उसको वापस रेप्लिककेट किया। सब कुछ उसके ब्रेन को कंट्रोल करके मशीन लगा के जो भी माध्यम अपनाया होगा प्रोसेसिंग को चेक किया जैसे ही वो प्रोसेस होगा तो बायोलॉजिकली सब वो न्यूरॉन्स जाएंगे फायर होंगे और उसका हाथ उठेगा उससे पूछा अब हाथ किसने उठाया होगा मैंने नहीं उठाया उसने मना कर दिया हां क्योंकि उसने नहीं उठाया उसने नहीं उठाया ये हमने केमिकल्स फायर किए उसके ब्रेन में जबरदस्ती कुछ करके उससे उसका हाथ तो उठ गया लेकिन वो कह रहा
(46:07) है मैंने नहीं उठाया यानी मैंने कोई तो मैं है जो कह रहा है कि इस बार मेरी इच्छा नहीं थी मेरा प्रयत्न नहीं था मेरा मेरा संकल्प नहीं था। इस बार मेरी विल नहीं थी। मेरी रजामंदी नहीं थी। तो ये कोई कह रहा है। यानी कोई तो और है जिससे हम बात कर रहे हैं। कोई तो अनुभव कर रहा है। यदि ब्रेन ही सब कुछ होता तो हमने ब्रेन को पकड़ के उठाया तो उसको कहना था हां मैंने ही किया क्योंकि ब्रेन ने ही किया। लेकिन ब्रेन ये क्यों कहेगा? ब्रेन तो निर्जीव है। वो तो इमरजेंसी है। इससे पता चलता है कि कोई चेतना है। पिछली बार उस चेतना के संकल्प से वो हाथ उठा था और
(46:36) इस बार उस डॉक्टर के संकल्प से वो हाथ उठा था। इसलिए उसे नहीं पता। तो इस तरह के ढेरों एक्सपेरिमेंट्स हुए हैं जो कहते हैं कि न्यूरल नेटवर्क से इमर्ज नहीं हो सकती है कॉन्शियसनेस। लेकिन स्टिल मैं कहता हूं कि ये अभी गैप ऑफ रिसर्च है। इसको पूरी तरीके से हम फिर भी एविडेंट नहीं कह रहा हूं क्योंकि एज ए साइंस लवर या एज ए साइंस सीकर ये हमारा दायित्व है। हमारी जिम्मेदारी है कि हम बताएं कि हमें हर जगह पर रैशन रहना है। स्केप्टिक रहना है। हमें प्रगति करते जानी है। लेकिन यदि आपको उन्नति करनी है आध्यात्म में तो आपको इन सब चक्करों में ना पड़ के सीधा आध्यात्म
(47:07) प्रैक्टिस करना चाहिए। उसी में आप उन्नति कर सकते हैं। अभी जैसे आपने बताया कि एआई न्यूरॉन्स के ऊपर काम करता है। हालांकि ना एआई अलग है। आपने जो सवाल किया वो क्योंकि न्यूरल नेटवर्क से आप न्यूरॉन शब्द के ऊपर आपका ज्यादा जोर था तो मैंने इतनी बातें बोली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक अलग चीज है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग करके हम हो सकता है ऐसी चिप्स बना लें। जैसे ईलॉन मस्क अभी बना रहे हैं जिसको हम ब्रेन में प्लांट करके अपने ब्रेन पे कंट्रोल करें। लेकिन अगेन वही बात है कि अगर हम अपनी इच्छा से कर रहे हैं जब तक हम कर रहे हैं लेकिन अगर कल को
(47:38) वो चिप तो वो चिप क्या करेगी फिर वो चिप जैसे आपकी मेमोरी बढ़ाती है या फिर आपको और कोई कमांड देने में आसानी करती मतलब मैं मेरा प्रश्न तो अभी ये था कि अब मुझे जो आपकी बात से समझ आया मैं विज्ञान की छात्रा नहीं हूं तो मैं बहुत नहीं पढ़ी हूं पर मुझे ये समझ आया कि बुद्धि जो डाटा कलेक्शन करती है उसको चेतना की जरूरत नहीं होती शायद इसी बेस पे एआई काम कर रहा है मतलब एआई जो काम कर रहा है डाटा कलेक्ट कर रहा है कहीं-कहीं से उठा के उसको चेतना सही बोला एआई जो है वो हमारी जो बुद्धि है मन बुद्धि चित्त अहंकार इसमें बुद्धि और जो मन है
(48:09) हम वो जिस तरह से काम करता है क्योंकि वो चेतना के तरीके से काम नहीं करता वो तो जड़ है चेतना कमांड देती है चेतना उसके साथ काम करती है वो सहायक है लेकिन चेतना उसको प्रोसेसिंग में लगा देती है हां तो वो कमांड देती है लेकिन वो एक टूल की तरह है तो जैसे एआई का यूज़ भी हम करते हैं एआई टूल की तरह काम करता है तो मन और बुद्धि भी एआई की तरह ही काम करती है हमारे टूल वो एक टूल है तो बुद्धि हमारी जैसे काम करती है देखिए हमने हमारी बुद्धि की ही कॉपी करने की कोशिश की है। उसकी सस्ती फोटोकॉपी हमने की है। हमें लगता है देखिए एi फास्ट प्रोसेस
(48:38) कर सकता है। लेकिन हमारे जैसे उसमें सेंटीमेंट्स इसीलिए नहीं है क्योंकि वो उसकी सस्ती कॉपी है। पर हां ये है कि सस्ती होने के साथ-साथ वो तेज है। क्योंकि हमारी जो बुद्धि है कनेक्शन कवरेज बहुत है। क्योंकि हमारी बुद्धि की एनर्जी क्या है? हमारी चेतना हमारी इच्छा हमारी विल वो सुस्ता भी जाती है आलस्य में भी चली जाती है उत्साह है गुस्सा क्रोध सब कुछ है लेकिन वो तो मशीन है वो तो इलेक्ट्रिसिटी से चल रही है हमेशा एक ही तो डाटा सेंटर से चल रही है तो उसको तो कोई मतलब नहीं है आप उसको जितना मर्जी उतना हार्ड टास्क दीजिए वो आपको रिजल्ट ला
(49:05) के देगा तो एआई इस तरीके से काम करता है ठीक है ठीक है अब विज्ञान जो बाहर की दुनिया को मापता है और अध्यात्म जो अंदर की खोज है अंतत ये क्या है एपिस्टेमोलॉजी जान मीमांसा के स्तर पर एक ही परम सत्य की खोज दोनों दोनों कर रहे हैं। क्या आप इसका समन्वय देखते हैं? वैसे हर फ्रेमवर्क की अलग-अलग एपिस्टोमोलॉजी होती है। आध्यात्म की अलग है। उसमें भी द्व है, दद्व नहीं पर इन दोनों में समन्वय की जरूरत ही नहीं है। समन्वय है। पहले से कुछ समन्वय है और कुछ समन्वय की आवश्यकता नहीं है। जैसे फिजिक्स और केमिस्ट्री है। तो समन्वय तो उनमें है।
(49:38) समन्वय ऐसे हैं कि फिजिक्स भी यूनिवर्स को बता रहा है। केमिस्ट्री भी यूनिवर्स को बता रही है। अब जैसे ये पेड़ का पत्ता है। मैं इसे तोड़ सकता हूं। हम ये पेड़ का पत्ता है। ये मैंने तोड़ा। तो इसमें केमिस्ट्री काम की कि फिजिक्स? आई गेस फिजिक्स दोनों काम की आप कैसे समझाना चाहते हैं आप पर डिपेंड करता है फिजिक्स भी काम की क्योंकि मैंने तोड़ा कुछ फोर्स लगा मास है इसका एक्सरेशन है ग्रेविटी काम कर रही है लेकिन इसमें क्लोरोफिल है इसमें कुछ क्रिया हुई होगी अगर पेन रिसेप्टर्स इसमें होते तो इसे दर्द होता या अभी भी कुछ यदि अनुभव हुआ है
(50:09) क्योंकि वृक्षों में भी आत्मा है या जो कुछ भी है तो हालांकि कहा जाता है कि इसमें पेन रिसेप्टर्स नहीं है और वृक्षों में जो आत्मा होती है सुशुप्त अवस्था में होती इसलिए पाप नहीं लगने वाला है हमें [हंसी] हां और इसीलिए हम इसकी पत्तियों को तोड़ के हम खा सकते हैं। वो भी अधर्म नहीं है। तो बेसिकली इसमें रसायन भी काम किया और फिजिक्स भी काम की। तो फिजिक्स भी एक्सप्लेन होती है। गेंद है लेकिन गेंद की रसायन भी होगी। कोई वो कैसे मटेरियल बना है। तो बेसिकली दोनों विषय अलग हैं। उनका समन्वय करने की जरूरत नहीं है। दोनों की एपिस्टोमोलॉजी भी कुछ-कुछ
(50:39) अलग होगी। मेथोडोलॉजी अलग-अलग होगी। सब्जेक्ट और उसकी अलग-अलग ब्रांचेस के अकॉर्डिंग। लेकिन उसमें समन्वय इस आधार पर है कि दोनों यूनिवर्स पे एक्सप्लेन। वो जो कहते हैं ना यथापिंडे तथा ब्रह्मांडे जो बाहर हो रहा है या जो अंदर हो रहा है वही बाहर हो रहा है। या फिर आप दुनिया में मैं उपनिषद पढ़ रही थी कल ही आपने अभी जो नींद की तीन अवस्थाएं बताई थी ना उन्होंने वहां पे कहा है कि हमारा शरीर तीन तरह से बटा हुआ है। कार्य शरीर कारण शरीर सूक्ष्म शरीर जो निद्रा अवस्था है उसमें कार्य और कारण शरीर दोनों कनेक्टेड है। जो सुशुप्त अवस्था है वहां कारण और सूक्ष्म कनेक्टेड
(51:07) रह गया। जहां पे वो माइंड काम कर रहा है। और जो तीसरी अवस्था है सुशुप्त अवस्था है उसमें कारण और सूक्ष्म दोनों का आभास नहीं रहता। सिर्फ चेतना मात्र रह जाती है। ऐसा सा कुछ तो मैं उसको वहां से कनेक्ट कर पा रही थी कि हां जो आप बता रहे हो कुछ-कुछ यही बात चल रही है। तो ऐसे ही उसी में उसी आगे प्रसंग में उसमें आता है कि दुनिया की किसी एक छोटे से भी तथ्य को आप समझने की कोशिश अगर पूरी तरह से कर लेते हैं तो वही प्रोसेस आपको हर जगह दिखाई देगा। क्योंकि सर्वम पांच भौतिकम इदम ऐसा कहते हैं ना कि सब कुछ ही पांच भौतिक है। सब पांच ही
(51:38) चीजों से बना है। फिर उसका कारण शरीर सबका मतलब सेम है। तो ऐसा कुछ नहीं है कि समन्वय मतलब अगर हमें कोई एक बाहर समझना है तो अंदर समझने लग जाए शायद ऐसा है। है ऐसा नहीं समन्वय नहीं। इसीलिए मैंने कहा जैसे फिजिक्स और केमिस्ट्री में समन्वय वैसे ही साइंस हो, फिलोसफी हो, आध्यात्म हो। समन्वय तो है ही। हम बाहर की चीजें समझेंगे तो हमें अंदर की भी बातें समझ में आएंगी। हम और सच बताऊं तो इसका भी समन्वय करने के लिए हमने जो पेपर अभी मैं पहले बता रहा था वो पूरा फ्रेमवर्क अब उसको मैं लीक नहीं करना चाहता लेकिन मैं इतना हम भी चाहेंगे उस गरिमा
(52:09) समन्वय वो हो रहा है उससे तो हम हम चाहेंगे ऋषि दृष्टि के मंच के माध्यम से कि वो सब पेपर आपके जल्दी पब्लिश हो और हम लोगों तक भी वो तथ्य आ पाए और हमें बहुत खुशी हो रही है इस बात को देख के आपसे जिस भी विषय में हमने बात की आपने कहा कि आप उस विषय में अभी कार्यरत हैं मतलब रिसर्च ऑनगोइंग है। अगर मैं एज अ स्टूडेंट क्योंकि मैं भी अभी रिसर्च स्कॉलर थी और अभी-अभी मेरी रिसर्च पूरी हुई है आयुर्वेद में। मुझे लगता है कि हम भारतीयों की एक थोड़ी सी प्रॉब्लम है। शायद वो इस वजह से है क्योंकि हमारे पुरखों ने हमें काफी दे दिया था। अमीर बाप
(52:39) की बिगड़ी औलाद है हम। हमें सब कुछ मिला था नॉलेज की फॉर्म में तो हमें ढूंढना बहुत कुछ नहीं पड़ा। गए और मिल गया। है ना? तो हमें वो आदत ही नहीं पड़ी कि किसी चीज के तह तक घुसे। हम आलसी हो गए। जितना मिल जाए आसानी से उतना आलसी हो गए। और यदि कोई प्रश्न किया जाता है तो ज्यादातर लोग उत्तर देने में वो रहते हैं कि हम उत्तर दे दे कुछ भी बता दें। हां मतलब हम अपना जान दिखाएं। हां ये नहीं कि ये इस पे हम कुछ काम करें। सोचे कि और क्या हो सकता है और ये पश्चिम ने इस बात को ज्यादा अच्छे से किया क्योंकि उनको मुझे लगता है वो मिला नहीं
(53:07) ना। जैसे जितने भी अभी साइंटिस्ट के आपने नाम लिए सब उनको मिला नहीं था तो उनको वहां तक पहुंचना था तो वो चलते चले गए। चलते चले गए। नेक्स्ट नेक्स्ट नेक्स्ट नेक्स्ट। अभी जो आप वो कह रहे थे ना कि एक साइंटिस्ट ने कहा है कि जब मुझे कुछ नहीं आता था। जब मुझे थोड़ी साइंस आती थी तो मुझे लगता था मुझे बहुत आता है और जब से मुझे साइंस आने लग गई तो मुझे समझ आ गया कि एक बड़ा खूबसूरत सा श्लोक है भरत्री हरी का आपने सुना भी होगा यदा किंचित विप मदो में व्यपगत मतलब उसका भाव यही है कि जब मुझे कुछ नहीं आता था तो मैं हाथी की तरह घूमता घूम रहा था मुझे लगता था मुझे
(53:35) सब आता है लेकिन जब मैं सुधिजनों के साथ बैठ के कुछ-कुछ सीखने लग गया तदा मूर्खो स्मृति तब मुझे समझ आया कि मैं मूर्ख हूं अभी तो मुझे कुछ भी नहीं आया है तो बेसिकली यही है तो शायद हम सबको ना खोज की आदत ही नहीं तो आपको देख के वो अच्छा लग रहा है कि आप रिसर्च की मतलब रास्ते पर हैं और रिसर्च को बेसिकली डिफाइन कर रहे हैं। हां खोज की हमें आदत नहीं है और हमें आदत हो चुकी है सिर्फ और सिर्फ मनी पैसा। अच्छा क्योंकि इसीलिए मैंने कहा कि हम साइंस को टेक्नोलॉजी समझते हैं कि खोज या रिसर्च लोग इसी चीज को मानते हैं कि आरएडी जैसे होती है। कंपनीज़ में आरएडी
(54:11) होती है ना। कोई भी कॉर्पोरेट है तो उसमें आरएडी होती है। तो आरएडी क्या करता है? उस प्रोडक्ट की आरएडी करेगा। उसको और एफिशिएंट कैसे बनाया जा सकता है? तो यह भी रिसर्च है। लेकिन यह वो खोज नहीं है जिसकी बात अभी हम यह बेसिकली इकोनॉमिक रिसर्च है। ये इकोनॉमिक्स की रिसर्च है। तो कुछ प्रोडक्ट बनाना या कुछ ऐसा जिसका एविडेंस हो जिसको कोई मशीन से जांचे केवल यही रिसर्च नहीं है। ये सिर्फ साधन तक जा रही है। साध्य तक नहीं जा रही है। साध्य तक नहीं जा रही है। साधन और साध्य में फर्क है। शोध के कई आयाम हैं। और मेजर जितनी थ्योरीज हैं, थ्यरेटिकल थ्यरीज हैं वो
(54:42) एक्सपेरिमेंटल थ्यरीज नहीं है। बहुत सारी तो मैथमेटिकल थ्यरीज हैं। तो उनका प्रादुर्भाव क्यों होता है? क्योंकि हमें कहीं ना कहीं आजादी देती है। मुक्ति मोक्ष तक ले जाती है। तो ज्ञान जो है वह सिर्फ और सिर्फ एक्सटॉरशन करने प्रोडक्ट बना करके एमआरपी लिखने के लिए नहीं है। ज्ञान हमारी आत्मा की पिपासा को शांत करने का एक अनूठा प्रयास है। और इसीलिए हमें शोध करना चाहिए। जितना अधिक हमारा शोध ग्रहण होगा जितनी हमारे पास अच्छी थ्यरीज और फिलॉसफी होंगी। फिर हम मशीन भी अच्छी बनाएंगे। उसका उपयोग भी अच्छा करेंगे। ऑटोमेटिक वो हर चीज में फॉर एग्जांपल जैसे
(55:14) एक टर्म बहुत चलता है लव जिहाद। एक प्रॉब्लम है। है ना? बहुत सारी ऐसी चीज़ हैं। मैं हर एक चीज को फिलॉसफी से कनेक्ट कर सकता हूं। हम कोई आवश्यक नहीं है। यदि हमारी फिलॉसफी क्लियर है। हमें अलग से लव जिहाद पे बोलने की जरूरत नहीं है। हमें अलग से धर्मांतरण पे वोट जिहाद ये वो जितनी चीजें हैं उन पे बोलने की जरूरत ही नहीं है। एक लेवल तक ये ठीक है। लेकिन फिलॉसफी पर जाकर के ये सब बकवास हो जाती है। क्यों? क्योंकि यदि फिलॉसफी आपकी ठीक है तो ये सब कुछ प्रॉब्लम का सशन नहीं होगा। ये प्रॉब्लम ही पैदा नहीं होगी। प्रॉब्लम पैदा ही नहीं होगी। तो इसलिए
(55:43) हमारा गोल है कि वैदिक एक्टिविज्म के माध्यम से हम फिलॉसफी को ले जाएं और स्वामी दयानंद की भी जो फिलॉसफी थी युवलिस्टिक अप्रोच थी उसको त्रयतवाद कुछ लोग बोलते हैं ट्रिनिटी आप बोल सकते हैं जिन्होंने त्रयतवाद शब्द का यूज़ नहीं किया प्रकृति ईश्वर और जीव ये तीनों बातें वेद में यदि आप इन तीन सिद्धांतों पर चलते हैं ना दुनिया की हर समस्या का समाधान है। दुनिया की हर समस्या का समाधान है। पर आज हम सीधा त्रैतवाद पे प्रवचन या भजन करके उसको प्रचारित नहीं कर सकते हैं। हमें पिरामिड के उस पीक को छूना होगा। मैंने यह बात अह ऋषि मेला कार्यक्रम हुआ था ऋषि उद्यान में
(56:16) वहां पर भी बोली थी। जहां से वह पराग कणों की तरह बिखर जाए वह विद्या। हम पिरामिड के नीचे एक-एक लोगों को समझाएंगे। इससे अच्छा पीक पर जाकर के आप समझा दीजिए। आपकी विद्या फैल जाएगी, बिखर जाएगी। इसीलिए ऐसे चैनल्स कामयाब होंगे उस चीज के लिए। जी। हां। जी। हां। आप एक साइंस के विद्यार्थी हैं और संस्कृत के भी अध्यता हैं। तो बस ये बताइए कि भारतीय गुरुकुल पद्धति या मैकाले की शिक्षा पद्धति दोनों में से कौन बेहतर है? यह तो अनडाउटली भारतीय शिक्षा पद्धति है। लेकिन भारतीय शिक्षा पद्धति हमारे खुद मैकाले कैसे पढ़े हैं? ये सोच के बताइएगा।
(56:46) जी देखिए मैकाले का जो फ्रेमवर्क था वो एक्सटॉर्शन सिखा था। हम लेकिन हमने एक्सटॉर्शन ना सीख के भारतीय ज्ञान पद्धति की एपिस्टोमोलॉजी को सीखा। हम भले उस पद्धति से पढ़े लेकिन हमने उसे कैच ना करके इसे कैच किया। हम तो यह बात तो ठीक है कि भारतीय शिक्षा पद्धति बढ़िया है। लेकिन आज के समय में भारतीय शिक्षा पद्धति कहीं पर भी सही तरीके से नहीं पढ़ाई जा रही है। अ उसको कनेक्ट करना बहुत जरूरी है। जैसे मैं यहां पर आया जो गुरुकुल है तो यहां दोनों चीजें कनेक्ट आपको दिख रही है। ऐसा ज्यादातर जगह नहीं है। और मैं ये नहीं कह रहा हूं कि हर जगह
(57:20) कनेक्ट ही होनी चाहिए। कुछ ऐसे भी गुरुकुल होने चाहिए जो पूर्णतः समर्पण के साथ हो। लेकिन हमें ऐसे गुरुकुल की ज्यादा जरूरत है जिस गुरुकुल में बैठकर अभी हम यह कार्यक्रम कर रहे हैं। इस तरह के और भी ब्रिज हो सके भविष्य में और इससे बेहतर हो सके। हमें वैसे गुरुकुलों की ज्यादा आवश्यकता है। ऐसा भी नहीं कि वो बिल्कुल वैसा बन जाए कि एकदम ही वो मॉडर्न में उसमें चला गया। लेकिन हमें उसे ब्रिज करना होगा। और देखिए ब्रिज जो है वो विद्या से ही होगा। केवल इंफ्रास्ट्रक्चर से नहीं होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर तो हमें चाहिए ही चाहिए। लेकिन उसके साथ-साथ हमें ये रिसर्च तो
(57:51) करनी ही होगी। क्योंकि जब तक हमारे पास यह शोध नहीं होगा जब तक हम यह प्रमाणित नहीं कर पाएंगे कि हमारी फिलॉसफी मॉडर्न साइंस से बेस्ट है या फिर उससे कनेक्टेड है या कैसे वो उससे मैच करती है तब तक आजकल तो हां वो खुद को कॉकरोच बोलने वाले लोगों की ऐसी आदत हो गई है कि जब तक उनको कोई चीज कूल फील नहीं होती है वो नहीं करते हैं और इसको वो एक्सप्लेन भी नहीं कर सकते जैसे हम नहीं वो कूल पहले से है जिसको वो कूल कहते हैं प्रूफ मतलब दिखाना पड़ेगा उनको उसका साक्षात्कार करवाना होगा तो जैसे आप इसमें ब्यूटी नहीं दिखा सकते हैं वैसे कोई सिद्ध नहीं कर सकता कि कोई चीज
(58:21) कूल कूल कब हो जाती है? वही बात है मेरे लिए जो चीज कूल है वो किसी के लिए फूल है और किसी के लिए जो कूल है वो मेरे लिए फूल है। तो ये आप जब तक उसे अनुभव नहीं करेंगे जब तक आप वहां नहीं जा सकते और यकीन मानिए वेद केवल साइंस से जुड़ा हुआ नहीं है। वेद छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य से भी जुड़ा हुआ है। वेद चंद्रगुप्त मौर्य और आचार्य चाणक्य की नीति से भी जुड़ा हुआ है। वेद श्री कृष्ण की बहुत गहन और बहुत आकर्षक कूटनीति से भी जुड़ा हुआ है। और वेद आर्यभट्ट के ज्ञान से भी जुड़ा हुआ है। वेद हर जगह जाकर जुड़ता है। वेद एक भावना को भी लेकर पैदा करता है। आपके मन
(58:55) में कुछ ऐसी चीजें जिससे आप एक अलग ही स्तर पर जाकर के कार्य कर सकते हैं। तो ये बातें जो वो एक मीम भी है बताने की नहीं है। ये बातें अनुभव करने की है। तो उस दिशा में है। बट हां मैं क्लोजिंग रिमार्क में ये कहना चाहूंगा कि जब तक हम चर्चा और अपनी शास्त्रार्थ की परंपरा को वापस पुनर्जीवित नहीं करेंगे तब तक नहीं होगा। तो मैं आपके चैनल के माध्यम से ओपन इनविटेशन भी दूंगा जो सभ्य डिबेटर्स हैं उनके लिए भी और जो थोड़े असभ्य को तो हम नहीं लेंगे जो थोड़े अग्रेसिव डिबेटर हैं जिन्हें लगता है कि बस हम हम बाकी सब कम तो उन्हें भी हम चाहते हैं कि वो आए और
(59:31) हमारे साथ बैठे संवाद करें वेद वर्सेस साइंस वेद वर्सेस एथिज्म जो आपको करना है जिस भी आपको जो लगता है मैं पहले भी यह बात एबीपी पर भी बोला था उसके बाद कई लोगों ने मुझे चैलेंज चैलेंज वैलेंज किया कि आप काम डिबेट का इनविटेशन एक्सेप्ट करते हैं। मैं कुछ लोगों के यहां से नाम भी लूंगा क्योंकि एक अच्छा अवसर है। एक नित्यानंद मिश्र करके अभी काफी पॉपुलर हैं जो स्वामी दयानंद ने अपनी पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश में बताया कि जो पाताल है वो पद के नीचे है और ये अमेरिका है। तो इस पर उन्होंने प्रश्न किए और चलिए तो छोटा विषय इसके अलावा भूभ्रण
(1:00:02) पे उन्होंने प्रश्न किए हैं। तो इस पे हमारा भविष्य में काम आने वाला है और इस पे जल्द ही उनको बहुत तगड़ा उत्तर भी मिलेगा और मैं चाहूंगा कि यहीं पे लाके चर्चा कर ले यहां पर या और कहीं पर जहां उन्हें बुलाना हो तो वहां पर की जा सकती है और मैं आपको एक और व्यक्ति का नाम बताता हूं। एक वर्ल्ड ऑफ साइंस करके हालांकि वो अच्छे व्यक्ति हैं। उन्होंने अच्छी तरीके से बात की है। अभी तक तो अच्छे व्यक्ति ही लग रहे हैं। हम उन्होंने मुझे एबीपी न्यूज़ वाली वीडियो देखने के बाद में चैलेंज किया। वीडियो बना के चैलेंज किया क्योंकि मैंने ओपन इनविटेशन दिया जो मैं
(1:00:33) आज यहां से भी दे रहा हूं कि कोई भी यहां पर आ सकता है। उसको उन्होंने एक्सेप्ट किया और काफी बड़ा उनका चैनल है और जब मैंने वापस से एक्सेप्ट कर लिया कि हां मैं तो तैयार हूं डिबेट करने के लिए तो उसके बाद में उन्होंने मुझे उत्तर दे दिया उत्तर दिया Instagram पर मुझे कहा कि मैं इस डिबेट को पोस्टपोन करना चाहता हूं। मैंने कहा कब तक? तो कहा अनडिफाइंड टाइम तक। जैसे प्रकृति अजक्त है वैसे ही अनडिफाइंड टाइम तक या अन डिसाइडेड टाइम तक। तो आज तक उनका वापस रिप्लाई नहीं आया। मुझे नहीं पता मैं कुछ दावा नहीं करूंगा लेकिन मैं उनका यहां से इसलिए नाम
(1:01:02) ले रहा हूं क्योंकि ऐसी चर्चा होनी चाहिए। हम शुरू करना चाहते हैं कि भारत में शास्त्रार्थ की परंपरा बहुत तेजी से शुरू हो। तो आपको जो भी विषय लगता है कि इसमें तो मैं एक आस्तिक को फंसा दूंगा। फिर चाहे वो थ्यरी ऑफ़ एवोल्यूशन हो, रीइकार्नेशन हो, हवन हो, कोई फिलॉसफी हो, गॉड है या नहीं। तो आप हमसे या हमारी टीम से जो भी उस विषय से एक्सपर्ट होगा उससे आप डिबेट कर सकते हैं। जहां आपको लगता है कि यहां तो एक आस्तिक पक्का फंस जाएगा और वेद के आधार पे ऐसा नहीं आप किसी भी सेकेंडरी ग्रंथ को ले आए। वेद के आधार पे यदि आप डिबेट करना चाहते हैं तो एनी टाइम
(1:01:32) एनीवेयर आई एम ऑलवेज देयर। ठीक है। तो आप महर्षि दयानंद के अनुयाई हैं। परम अनुयाई। उन्होंने भी कहा था वेद के आधार पे कोई मुझसे शास्त्रार्थ करना चाहता है तो मैं हमेशा तैयार हूं। ठीक है। मोहित जी बहुत अच्छा लगा आपसे बात करके। मैं आपकी बातों को कोट करूंगी। आपने कहा ना कि जान से ही सब कुछ हो सकता है तो नहीं जाने सदृश्यम पवित्रम विद्यते श्री कृष्ण का श्लोक है कि उसके अलावा कोई और रास्ता ही नहीं है ना पंथा विद्यते अन्य कोई नहीं है कोई और रास्ता नहीं है तो आपसे बात करके मुझे ऐसा लगता है कि आज हमारे श्रोताओं को भी समझ आ गया होगा कि विज्ञान को दर्शन से
(1:02:03) अध्यात्म को ब्रह्मांड से जोड़े बिना किसी भी फाइनल डेफिनेशन तक आप नहीं पहुंच पहुंच पहुंच सकते और इसी के साथ ऋषि दृष्टि आपके इस प्रयास को इस वैदिक एक्टिविज्म की जो आपने मजबूती के साथ एक धार बनाई है वीडीआरओ के लिए बहुत ऋषि ऋषि नमन करता है और हम चाहेंगे कि आप बार-बार हमारे से जुड़े अपने विषयों के साथ अपनी इन्हीं क्रांतिकारी विचारधाराओं के साथ और आपसे इस वैचारिक मंथन के बाद बहुत सुखद अनुभूति हो रही है। आपका हमारे शो पर आने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। पुनः हार्दिक अभिनंदन के साथ ऋषि दृष्टि के सभी श्रोताओं को नमन। देखते रहिए ऋषि दृष्टि।
(1:02:42) हम्म

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