Sunday, June 28, 2026

How Adi Shankaracharya Changed India Forever? | The Changemakers

How Adi Shankaracharya Changed India Forever? | The Changemakers

Author Name:Prachyam

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@Prachyam

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Transcript:
(00:03) एक शंकराचार्य हैं जो अक्सर विवादों में घिरे रहते हैं। धन होना गलत नहीं है [संगीत] लेकिन अहम मैं यह हूं मेरा यह है। कम से कम संतों के मुंह से ऐसी वाणी नहीं निकलनी चाहिए। और जो उन्होंने दिग्विजय यात्राएं [संगीत] की। क्या उद्देश्य था इन यात्राओं को करने का? आचार्य शंकर ने भाष के माध्यम से प्रॉपर लॉजिकल वे में यह समझाया कि मूल [संगीत] तत्व अद्वैत है और इसका ज्ञान होना चाहिए और जीवन का जो भी दुख है वह वेद के ज्ञान से ही निराकृत हो सकता है। आप देखें कि बच्चों के लिए आठ साल में कोई सब विषय का ज्ञाता हो जाए। आठ साल में वो
(00:43) विजनरी हो जाए। बच्चों के लिए इससे बड़ा कौन रोल मॉडल हो सकता है? यूथ के लिए देखें 32 साल में देश के लिए क्या-क्या कर दिया। जिस काल में आचार्य शंकर का जन्म हुआ उस समय क्या परिस्थिति थी कि भारत की तो जो प्रोमिनेंट एरियाज थे जहां करोड़ों-करोड़ों लोग एक-एक देवता की उपासना करते थे और दूसरे से घृणा करते थे और इसमें कई बार स्त्रियों का शोषण होता। कई बार कई और विभत्स चीजें आती थी। कहीं कहा कि बच्चे की बलि दे दी। कहीं कहा कि इसको यह कर दिया। आज के युवाओं को अगर कोई एक चीज अगर सीखनी है आदि गुरु शंकराचार्य के जीवन [संगीत] से तो क्या होगा?
(01:30) [संगीत] [संगीत] कैसे अंग्रेजों ने पूरा नैरेटिव बदल दिया। बदल दिया। हमारे अंदर जो है जो आत्मगौरव था अपने ज्ञान अपनी परंपराओं के प्रति उसको विनष्ट कर दिया और तीसरा यह कि कैसे उन्होंने ये लेबल्स लगा दिए हमारे इतिहास को मिथ बना दिया माइथोलॉजी बना दिया और जिसके विषय में मैं अभी आपसे पूछना चाहता हूं कि बहुत ही विकसित जो सैद्धांतिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले शास्त्र थे जैसे तंत्र शास्त्र उसके बारे में कितनी भ्रांतियां फैलाती भ्रांतियां फैला दी [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसको बोला कि
(02:12) ब्लैक मैजिक है। है ये कोई चीज बड़ी कुत्सित है। है ना? ये ये तो करना नहीं चाहिए। थोड़ा तंत्र शास्त्र के विषय में थोड़ा प्रकाश डालें। देखिए तंत्र जो है ना अपने यहां मंत्र तंत्र और यंत्र ये तीन चीजें हैं। तो मंत्र का मतलब सिद्धांत। इसीलिए अपने वेद को मंत्र कहते हैं। क्योंकि मंत्र मतलब ज्ञान। हमारे लोगों ने जो तप के माध्यम से कैसे कैसे के जो अर्जित किया तो एक जो सिद्धांत उनके मन में आया यह मंत्र कहलाता है। उसी को भाषा में प्रकट करना और जब ज्ञान है तो ज्ञान को धरातल पर लाना है। धरातल पर लाना है तो आपको उसके लिए सिस्टम डेवलप करना पड़ेगा।
(02:55) जैसे हम अभी पडकास्ट कर रहे थे तो आपने एक सिस्टम बनाया हो। एक टेक्निक है। यह टेक्निक है कि इस इतना कैमरा लगेगा, इस एंगल पे लगेगा, ऐसे बैठेंगे तो तब यह काम ज्ञान जो है अपने मूल रूप में प्रस्तुत होगा। तो ऐसे ही इस सिस्टम का नाम दिया हमारे लोगों ने तंत्र। और उस सिस्टम के लिए पहले जो आप मैपिंग करते हैं, उसका नाम दिया यंत्र। तो यंत्र वह मैप है जो आपके लिए गाइडलाइन देता है। उस मैप के बेस पर आप सिस्टम डेवलप करते हैं और सिस्टम के थ्रू उस सिद्धांत को एग्जीक्यूट करते हैं। तो यह मंत्र तंत्र और यंत्र है तो जो भी जैसे वैदिक दर्शन है
(03:37) तो वैदिक दर्शन का एक तंत्र है और तंत्र है तो उसके लिए यंत्र है। तो जो वैदिक ज्ञान परंपरा में जो जो तंत्र का स्वरूप है वह वह ऋषि के द्वारा डेवलप किया गया उसको कहते हैं सुभागम पंचकम सुभागम पंचक जो है वो जैसे वशिष्ठ अपने ऋषि हुए जैसे सनत कुमार हुए जैसे सुखदेव जी हुए ऐसे जो बड़े-बड़े ऋषि हुए हमारे उन्होंने इस तंत्र को बनाया डेवलप किया है और फिर इसी परंपरा में गॉड पादाचार्य उन्होंने शुभ गोद स्तुति लिखा तो शुभोदय स्तुति का मतलब है कि जो उसी तंत्र परंपरा का जो विकसित रूप है और सबसे ज्यादा इस पर काम करने वाले व्यक्ति रहे आदि शंकराचार्य आदि
(04:23) शंकराचार्य ने इसी तंत्र को ध्यान में रख के सौंदर्य लहरी की रचना की और तंत्र का मतलब यहां यह है कि हमारा जो वैदिक दर्शन है कि सत्य जो है वह ब्रह्म है। सत्य जो है वह शुद्ध चेतन तत्व है। लेकिन उसी का जो फंक्शनल आस्पेक्ट है उसी को हम शक्ति कहते है तो एक तो हुआ एब्सोल्यूट ट्रुथ दूसरा हुआ कि सृष्टि का निर्माण तो सृष्टि का निर्माण जहां से शुरू होता है वो उसी को हम आदि शक्ति कहते है तो शक्ति से सृष्टि परिणमित होती है तो शक्ति से सृष्टि का कैसे डेवलपमेंट होता है यह जो पूरा सिस्टम है ना इसी को तंत्र कहते हैं और इसीलिए उन्होंने सौंदर्य लहरी में
(05:08) शक्ति शक्ति का पूरा स्वरूप जो है उसका उल्लेख किया है और यह बताया है कि शक्ति कैसे कैसे करके आकाश रूप में आकाश से वायु वायु से अग्नि अग्नि से जल जल से पृथ्वी और फिर पृथ्वी और पंच महाभूत से सारी सृष्टि कैसे विकसित हुई है। यह जो सारा सिस्टम है इसको तंत्र कहते हैं। और थोड़ा सा जो उनको जो उस समय जो लगा समाज में कुरीतियां विकसित हो गई है। वह था कि जो तंत्र का जो दो एक दो रूप है एक तो है बामाचार और एक जो है वह है जिसको हम कहते हैं समयाचार तो समयाचार जो तंत्र की परंपरा है वह वेद की परंपरा है और जो बामाचार है उसमें कई बार नेगेटिव चीजें जो
(05:54) है वो भी वो दिखाते हैं। जैसे आप देखेंगे कि आचार्य शंकर के भ्रमण में जो देश का उन्होंने भ्रमण किया दो-तीन बार उसमें अधिकतर उनका एनकाउंटर जो है वो कापालिकों से हुआ है। तो वो कापालिक जो थे वो वाम मार्गी तंत्र को बढ़ाते थे और बाम मार्गी तंत्र में क्या है कि जो वो सारी नेगेटिव चीजें जो पंचमकार है एक्चुअली में स्थूल रूप में तो पंचमकार का प्रयोग करते थे और इसमें कई बार स्त्रियों का शोषण होता था। कई बार कई और विभत्स चीजें आती थी। छिटपुट अभी भी घटना आप देखते होंगे जो कहीं कहा कि बच्चे की बलि दे दी। कहीं कहा कि इसको यह कर दिया। थोड़ा आज भी बचा हुआ है। इतना
(06:38) हमारा लीगल सिस्टम अभी स्ट्रांग है। लेकिन फिर भी कहते हैं कि इन्होंने इस बच्चे की बलि दे दी। क्योंकि यह इसका इसका पूरा हो जाएगा। यह प्राप्त हो जाएगा। आचार्य शंकर ने उस समय यह फेस किया। वो मल्लिकार्जुन में हो। कापाली के साथ एनकाउंटर है। वो कामाख्या में हो, असम में उनका उनका बहुत ज्यादा उनके साथ हुआ है। कश्मीर में हो या फिर कर्नाटक में हो सब जगह और आप समझे कि लगभग जितने तीर्थ अपने थे सब जगह यह बामाचार तंत्र की परंपरा फैली हुई थी और समाज में एक तरह से इसके लिए बहुत भय का वातावरण था। उन्होंने इसको एक तरह से समझ लीजिए शास्त्रार्थ की दृष्टि से उनका जो
(07:21) प्रभाव था उसकी दृष्टि से उन्होंने इसको बहुत हद तक ठीक कर दिया और इसीलिए उन्होंने सोचा कि वैदिक तंत्र परंपरा को हमें विकसित करना है और वैदिक तंत्र परंपरा में उसी को हम श्री विद्या कहते हैं। तो सौंदर्य लहरी में श्री विद्या की उपासना है और उसमें उन्होंने उस स्थूल पंच मकार को उपासना से ही बाहर कर दिया। तो जो मत्स्य है, मांग्स है, मैथुन है, मदिरा है, यह जो पांच चीजें जो जो सब जगह कश्मीर में बहुत होता था, सब जगह होता था। उसको उन्होंने ज्ञान परंपरा से ही बाहर कर दिया। और इसीलिए हम देखते हैं कि सौंदर्य लहरी आप पढ़ेंगे तो जो जो टचक्र है जैसे
(08:05) मूलाधार है, स्वाधिष्ठान है, मणिपुर है, अनाहत है, विशुद्धि है और आज्ञा चक्र है। इस टच चक्र में सृष्टि भी है और शरीर भी है। यानी शक्ति किस-किस रूप में इस अपने को डेवलप करती है और कैसे-कैसे शक्ति का सेंटर बनता जाता है और उस सेंटर को यदि हम समझते हैं तो फिर धीरे-धीरे हम अपने को डेवलप कर सकते हैं। और यह हर एक सेंटर से अपनी वर्णमाला जुड़ी हुई है। जैसे जितने संस्कृत के वर्णमाला है ना वो मूलाधार चक्र से ले आज्ञा चक्र तक का केंद्र को रिप्रेजेंट करता है। शक्ति केंद्र को रिप्रेजेंट करता है। तो इस रूप में उन्होंने पूरा का पूरा यह नॉलेज सिस्टम के
(08:46) रूप में उसको सेट कर दिया और जितनी नकारात्मक चीज थी इसलिए उसको बाहर कर दिया। तो आज भी सभी जो आचार्य शंकर के द्वारा स्थापित मठ है उन मठों में श्री विद्या की उपासना होती है। लेकिन केवल वो सहस्त्रार से शुरू होती है। यह पंच स्थूल मकार की पूजा ही नहीं होती। तो आप कैसे जो है वो बॉडी में कैसे आप उस शक्ति केंद्र को समझें और उससे धीरे-धीरे आप अपने उस शक्ति के सर्वोच्च रूप को समझें और वहां पहुंचे और अपने मूल स्वरूप को इस रूप में जाने। तो यह जो पूरा सिस्टम है यह जो है उसको आचार्य शंकर ने डेवलप किया और वह
(09:31) श्री विद्या के नाम से प्रसिद्ध है। सौंदर्य लहरी को सबको पढ़ना चाहिए कि जो पता चले कि वैदिक तंत्र का क्या स्वरूप है ये पता थोड़ा सा उनके जीवन का के विषय में थोड़ा सा आप हमको बताएंगे और सबसे इंपॉर्टेंट बात है कि जो उनके भाष्य हैं उनके जो कमेंट्रीज हैं और जो उन्होंने ये शास्त्रार्थ जहांजहां जिससे किए वहां पे क्या था बौद्ध दर्शन उस समय क्या था बौद्ध धर्म कैसे उस समय हमारे हिंदू धर्म के ऊपर संकट मंडरा रहा था कैसे सब कुछ अव्यवस्थित था चारों तरफ एक एक संकट का काल था कैसे उन्होंने उभार के पुन प्रतिष्ठित किया हमारे ज्ञान को दर्शन को परंपराओं को
(10:16) थोड़ा उस विषय में नहीं ये तो है कि आचार्य शंकर जो है वो आप कह सकते हैं कि वो है तो भारत है और इतना विराट व्यक्तित्व आपने कहा ही कि जो एक विलक्षण प्रतिभा के व्यक्तित्व थे वह और इतने विलक्षण प्रतिभा के थे कि परंपरा में उनको शिव जी का अवतार माना जाता है। हमारे यहां ज्ञान की जब पराकाष्ठा होती है तो उसको अवतार मान लिया जाता है। क्योंकि सामान्य लोग उतना कर नहीं पाता। तो ऐसे ही उन्होंने आठ वर्ष की आयु में ही एक तरह से समझे कि संपूर्ण शास्त्र के ज्ञाता हो गए और फिर वह ओंकारेश्वर आए तो वहां उन्होंने जो योग की जितनी सिद्धियां
(10:58) होती है और एक तरह से आत्म साक्षात्कार यह सब जो है उनके गुरु भगवत पाद गोविंद पाद ने उनको कराया और उन्हीं के आदेश से उनको यह लगा कि जो जो वेद का जो मूल तत्व है जो सार है वह लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। इसीलिए उन्होंने आदेश दिया कि आप उपनिषद पर भाष्य लिखें, ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखें और गीता पर भाष्य लिखें जिसको हम प्रस्थानत्रय कहते हैं। तो उपनिषद जो है वह वेद का सार माना जाता है क्योंकि वह चेतना विज्ञान है और ऋषियों ने यह निष्कर्ष निकाला कि दैहिक स्तर पर तो हम में भेद होता है। लेकिन हमारे ही अंदर का जो चैतन्य स्वरूप है, जो शुद्ध चेतना है,
(11:45) वह एक ही है। इसीलिए, आप जैसे-जैसे अपने व्यक्तित्व के डीपर लेवल में जाते हैं, वैसे-वैसे आपकी व्यापकता होती जाती है। और चैतन्य का या चेतना का वह स्वरूप है जहां सब एक हो जाता है। वैसे ही जैसे इस कमरे का आकाश बाहरी आकाश एक ही है। हम दीवार के कारण भले ही उसको समझे कि अलग-अलग है। तो वैसे ही शरीर के कारण हम भले ही एक दूसरे से अलग-अलग लगे लेकिन चेतना की दृष्टि से हम सब एक हैं। इसी विज्ञान को जो व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने वाला ग्रंथ है वह वेद का सार उपनिषद है जिसका दूसरा नाम वेदांत है और इसी को लेकर के उनके गुरु का आदेश था कि उस ज्ञान को समाज
(12:31) तक ले जाना है जो सबको जोड़ता है क्योंकि भेद में दुख है। एकत्व की भावना में सुख है। यह ऋषि का निष्कर्ष है। तो इसीलिए उन्होंने फिर गुरु के आदेश से लगभग 10 11 उपनिषदों पर भाष्य लिखा और उसके बाद उसी का जो तार्किक रूप से प्रस्तुत करने वाला ग्रंथ है वह ब्रह्म सूत्र है। तो ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा और उसी को स्मृति के रूप में जो पॉपुलर वे में प्रस्तुत करने वाला ग्रंथ है वह भगवत गीता है। कि उन्होंने उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवत गीता पर भाष्य लिखकर के उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि सबके मूल में वही एक तत्व विद्यमान है और जब तक व्यक्ति इसको
(13:16) नहीं समझता तब तक वह अज्ञान से दूर नहीं हो सकता और अज्ञान जब तक है तब तक भेद है। भेद जब तक है तब तक व्यक्ति दूसरे को दूसरा समझता है और जब तक व्यक्ति दूसरे को दूसरा समझता है तब तक राग द्वेष से वंचित नहीं हो सकता तो इसीलिए यदि व्यक्ति को परमानंद में आना है अनुभव करना है तो उस चैतन्य के एकत्व भाव का अनुभव जरूरी है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] इस दृष्टि से उन्होंने भाष्य के माध्यम से जो उपनिषद के ऋषि ने जो अद्वैत शब्द का की बात रखी थी कि चैतन्य की दृष्टि से अद्वैत है यानी दूसरा नहीं है न वस्तंतरम विद्यते इति
(14:02) अद्वैतम तो दूसरा नहीं है तो इस एकत्व रूप में जो हमारा जो मूल तत्व है उसको समाज में लाया जाए और आप जैसे कहेंगे ना आप कह रहे थे जो अद्वैत को सरलता से कैसे समझाया जाए? हम क्या समझाएंगे? आचार्य शंकर ही कहते हैं बात पे कि जो छांदोग्य के छठे अध्याय में कि एक व्यक्ति घर से निकला तो देखा कि जो गांव में एक मिट्टी का ढेर है और वो थोड़े समय के लिए दूसरे गांव चला गया। जब देखा तो आया कि मिट्टी के ढेर के बदले 10 घड़े हो गए। तो वह व्यक्ति आकर पूछता है कि पहले तो यहां मिट्टी ही थी। तो वैसे ही कहते हैं कि जो ऋषि कहते हैं एक मेवा द्वितीय सदैव सौम्यग्र आसीत तो
(14:48) कहते हैं वो एक जो है वही संसार के विविध रूप में प्रस्तुत हो गया। इसीलिए ऋषि कहते हैं पहले तो एक ही था। जैसे मिट्टी एक ही थी और 10 घड़े के रूप में परिणत हो गई। वैसे एक ही शुद्ध चैतन्य था। जो शुद्ध चैतन्य अभी अनेकारात्मक संसार के रूप में प्रकट हो गया। तो प्रकट हो गया तो जैसे 10 घड़े बन गए तब भी मिट्टी ही है। जैसे गोल्ड के 10 आभूषण हो गए तब भी गोल्ड ही है। वैसे ही एक ही चैतन्य अनेक रूपों में प्रस्तुत हो गया तब भी शुद्ध चैतन्य ही है। इस रूप में जब आपको ज्ञान होगा तो आपका भेद समाप्त होगा। भेद समाप्त होगा तो आपका अपना दुख समाप्त होगा। और जो एकत्व
(15:36) रूप है उसी को ऋषियों ने विज्ञानंदम ब्रह्म कहा है। वही आनंद स्वरूप है। तो इसीलिए समाज में जितनी विषमता है उसके मूल में भेद है। उसके मूल में द्वैत भाव है। तो ऋषियों और आचार्य शंकर का जो निष्कर्ष है वह यह है कि व्यक्ति को उस अद्वैत का अनुभव होना चाहिए। और उस अद्वैत का अनुभव करके ही वह समाज के लिए एसेट बन सकता है। उनका एक बहुत सुंदर श्लोक है कि जब अद्वैत भाव होता है तो होता क्या है? तो संपूर्णम जगदेव नंदन वनम सर्वे कल्पद ध्रुमा संपूर्ण जगत नंदन वन की तरह लगने लगता है। सभी पेड़ पौधे कल्प ध्रुम लगने लगते हैं। गांगम वारी समस्त व निवा पुण्य समस्ता
(16:24) क्रिया सभी जल गंगाजल की तरह लगने लगते हैं और सभी क्रियाएं पुण्य लगने लगती है। वाच प्राकृत संस्कृत श्रुति शिरो वाराणसी मेदनी काशी में बैठे हैं इसीलिए श्लोक की महत्ता ज्यादा है और काशी में ही यह श्लोक बोले थे आदि शंकराचार्य कि जब उस एक तत्व का ज्ञान होता है तो प्राकृत हो संस्कृत हो बौद्ध पाली हो सब के सब वेद लगने लगते हैं। ठीक है? श्रुति सिर वेद लगने लगते हैं और वाराणसी मेदनी संपूर्ण पृथ्वी काशी लगने लगती [हंसी] है। क्या बात है? लेकिन कब होता है यह सर्वास्थित रस वस्तु विषय दृष्ट परबह्मणी जब वह अद्वैत का अनुभव होता है तो अद्वैत
(17:11) का अनुभव हर एक व्यक्ति के लिए आवश्यक है और परिवार से लेकर समाज तक और आज यूएनओ जैसी संस्था में जब तक अद्वैत बुद्धि नहीं होगी तब तक पॉलिसी डिसीजन में यह रिफ्लेक्ट नहीं होगा। जब तक रिफ्लेक्ट नहीं होगा तो फिर देशों के प्रति हमारा बसनेस जो दिखता है वह इसलिए दिखता है क्योंकि हम भेद मानकर बैठे रहते हैं। आचार्य शंकर ने भाष के माध्यम से प्रॉपर लॉजिकल वे में यह समझाया कि मूल तत्व अद्वैत है और इसका ज्ञान होना चाहिए। यही इरविन सोडिंजर कहते हैं कि कॉन्शियसनेस इज़ सिंगुलर। इट डजंट नो प्लुरलिटी। वही मैक्स प्लैंक कहने लगे कि कॉन्शियसनेस इज द
(17:54) फंडामेंटल। इसी को समझने के लिए नील्स बोर उपनिषद पढ़ने लगे और इसी को समझते हुए क्वीन फ्रेडरिका जो ग्रीस की महारानी है वो कहती हैं कि जो मेरे फिजिक्स का निष्कर्ष है वह वैसे ही नॉन डुअल स्टेट को बताता है जैसे आचार्य शंकर अद्वैत की व्याख्या करते नाम लेके और वह यह भी कहती हैं कि भारतीय लोगों से मुझे बहुत द्वेष है। क्यों द्वेष है कि जो ज्ञान भारत को सहजता से मिल गया वह हम लोगों को समझने में बहुत परिश्रम करना पड़ता है। तो यह उनका कंट्रीब्यूशन है और इस इसको हमें सबको जानना चाहिए और उनका जो भाष्य है आज भी ग्लोबल लेवल पर बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी
(18:38) में उनके भाष्य को समझा जाता है। उसका दार्शनिक विश्लेषण होता है और दुनिया में बहुत देश हैं जैसे अभी रिसेंटली उनकी पुस्तक है उपदेश शाहस्त्री तो उनका एक लेटेस्ट एडिशन निकला है प्रोफेसर मैदा किया है जापान में जो यूनिवर्सिटी ऑफ टोक्यो के प्रोफेसर आप कहीं देखेंगे कि हार्डवर्ड में कोई कर रहा है कहीं कर रहा है तो कहने का मतलब देश के अतिरिक्त और जगह पे जो भी उनको पढ़ा है तो फिर वो उसी हाइट पे वो आपको वो अनुभव होता क्या बात है तो यह आचार्य शंकर का कंट्रीब्यूशन है और उन्होंने यह बता दिया कि जीवन का सर्वोच्च रूप जीवन का आनंद वेद के ज्ञान से ही संभव
(19:24) है और जीवन का जो भी दुख है वह वेद के ज्ञान से ही निराकृत हो सकता है। तो इसीलिए तीन बार यात्रा की भारत का भ्रमण किया। एक-एक स्थान में जाकर अनुभव किया और अनुभव करते हुए लोगों की भावना को समझा और भावना के अनुरूप सभी तीर्थ स्थल को सुरक्षित किया। भावना के अनुरूप पंच देवतोसना की स्थापना की। भावना के अनुरूप सब जगह जाकर के वहां वहां की संस्कृति वहां वहां की सभ्यता को उसी रूप में विकसित किया। जहां भी जो त्रुटियां थी उसको समाप्त किया और
(20:10) भारतवासी के मन में यह अटूट विश्वास स्थापित किया कि वेद से ही आपका सब कुछ प्राप्त हो सकता है। नो अदर अल्टरनेटिव इज एकिस्टिंग। तो यह उनका क्या बात है। तो प्रोफेसर जहां हम यह पूछ रहे थे कि जिस काल में आचार्य शंकर का जन्म हुआ उस समय क्या परिस्थिति थी कि भारत की उस समय में परिस्थिति यह थी कि वैदिक ज्ञान को एक तरह से साइडलाइन कर दिया गया था और अनेक प्रकार के जो विचार थे जो भेद परक विचार थे तो उसका आधिपत्य हो गया और जब भेद का प्राबल्य होता है ना तो फिर व्यक्ति के की इच्छाएं प्रबल होने लगती है और उसमें राग द्वेष का वातावरण बन
(20:58) जाता है। सभी एक दूसरे से लाभ लेना चाहते हैं और इस प्रकार से एक कटुता का वातावरण विकसित हो गया था। तो बहुत विकट परिस्थिति थी। जैसे मैंने पहले कहा कि जो तंत्र में पंचमकार का बाल्य हो गया था। समाज में सबका सब शोषण करने लगा था। तो एक तरह से अपने पर अनास्था उत्पन्न हो गई थी। तो इन सब विषयों का जो एक वर्चस्व हो गया था उस परिस्थिति में आदि शंकराचार्य का उद्भव होता है और उन्होंने एक-एक विषय को एड्रेस किया है और वह एड्रेस किया है वेद के आधार पर तो इसीलिए उन्होंने वेद को बहुत प्रामाणिक ढंग से विद्वानों के बीच वो ले गए लगभग 80 84 संप्रदाय के आचार्यों से
(21:44) संवाद किया और संवाद इस रूप में किया कि कोई हमारे अंदर प्रतिद्वंदता नहीं है। हम इस विचार पर चर्चा करें और आपको यदि तार्किक दृष्टि से यह लगता है कि नहीं यह विचार जो है वह व्यक्तिगत रूप से भी हमें सुखी बना सकता है और समाज को राष्ट्र को मानवता को प्रकृति को आगे बढ़ाने में सहायक हो सकता है। तो फिर वेद के आधार पर आगे बढ़े और इसको सभी आचार्यों ने लगभग एक तरह से स्वीकार किया और एक देश में ऐसा वातावरण बन गया जो फिर से जो वो कलुषता का वातावरण था जो स्वार्थ परखता का वातावरण था वह एक कल्याण परखता में कन्वर्ट हो गया और भारत फिर से एक अखंड भारत के रूप में
(22:29) स्थापित हो गया। तो वस्तुतः यह जो सारा अखंड शब्द है यह अद्वैत का ही है। इसीलिए हम अखंड भारत कहते हैं। तो भारत अपने सर्वांगीण रूप में भारत अपने मौलिक चिंतन के रूप में भारत लोक कल्याण परक दृष्टि के रूप में। तो ये सारी चीजें जो हैं, यही अखंडता का द्योतक है। और भारत अखंड तब तक रह सकता है जब तक अद्वैत दृष्टि हो। और भारत अखंड तब तक रह सकता है जब शास्त्र का महत्व समाज में रहे और संस्कृत भाषा का भी महत्व रहे क्योंकि सभी शास्त्र मौलिक रूप से संस्कृत भाषा में है। इसीलिए आदि शंकराचार्य मूलत तो मलयालम समाज से थे। लेकिन जीवन में उन्होंने एक शब्द भी
(23:16) मलयालम में नहीं लिखा। इसलिए नहीं लिखा क्योंकि हमारी सारी भाषाएं हैं। लेकिन हर एक भाषा क्षेत्र विशेष की भाषा है। उस भाषा से पूरे देश में इंटरेक्शन नहीं हो सकता। लेकिन संस्कृति एक भाषा ऐसी थी जो सभी भाषाओं के केंद्र में थी। सभी भाषाओं की मातृस्वरूपा भाषा थी। और सभी भाषाओं में शब्दावली की दृष्टि से विचार की दृष्टि से जोड़ने वाली भाषा थी। वह भारत को जोड़ना चाहते थे। भारत की अखंडता को स्थापित करना चाहते थे। इसीलिए संस्कृत भाषा को ही चुना और संस्कृत भाषा में अपनी सारी रचनाएं प्रस्तुत की और वही रचना जो है वह ज्ञान की दृष्टि से दर्शन की दृष्टि
(24:00) से इवन भक्ति की दृष्टि से कर्म की दृष्टि से भारत को जोड़ने की दृष्टि से सभी में एकरूपता लाने की दृष्टि से जो है वह उस समय प्रस्तुत की गई और उसी के आधार पे इतना ज्यादा हमारे ऊपर प्रहार हुए इतनी समस्याएं आई क्या-क्या क्या नहीं हुआ? लेकिन फिर भी भारत अपने किसी न किसी रूप में बचा रहा और वही जो उन लोगों का जो एक एक जो व्यवस्था उन लोगों के द्वारा की गई वो व्यवस्था कहीं ना कहीं मानस में आज भी है। इसका स्वरूप कुंभ में दिखा कि किस प्रकार 66 करोड़ लोग एक साथ एकात्मकता में स्थित रहते हुए आते हैं और किस प्रकार अनुशासन में रहते हुए अपने आनंद का भी
(24:49) अनुभव करते हैं और भारत के की एकता या दूसरे शब्दों के में कहें कि अद्वैतता का प्रदर्शन करते हैं। और जो उन्होंने दिग्विजय यात्राएं की प्रथम उन क्या उद्देश्य था इन यात्राओं को करने का और दूसरा क्या-क्या उन्होंने किया इन यात्राओं में? उद्देश्य तो यही था कि सबसे पहले भारत को समझे, भारत के विद्वानों को समझें। भारत के एक-एक क्षेत्र में जाकर के वहां की भावना को समझे और भारत की सीमा को समझे। यह सारी चीज उनके ध्यान में थी क्योंकि भारत यात्राओं का देश रहा है। अब देखेंगे कि वेद के समय से लेकर और अभी भी भारत में ज्ञानी जो भी हुआ है उसने यात्रा की है।
(25:34) यात्रा इसलिए की है क्योंकि भारत की जो सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता है उस एकता को बिना यात्रा के नहीं समझा जा सकता। तो उसको उन्होंने बहुत बारीकी से समझा और यहां तक कि आज भी हम जो भारत की सीमा की बात करते हैं तो आदि शंकराचार्य भारत उस भारत में भ्रमण किए जिस भारत में बलूचिस्तान है। जिस भारत में सिंधु है, जिस भारत में पूरे पाकिस्तान का पंजाब है। जिस भारत में अफगानिस्तान है, जिस भारत में नेपाल है और जिस भारत में जो पूरा नॉर्थ ईस्ट पूरा जो सब कुछ क्षेत्र है तो उन्होंने उस भारत की अनेक बार यात्रा की और उस भारत में अखंडता को स्थापित किया और
(26:20) जब तक वो भारत को नहीं जानते। जब तक विद्वानों से इंटरेक्शन नहीं करते तब तक वो अद्वैतवाद को स्थापित करने में कभी सफल नहीं होते। उन्होंने जैसे पंच देवता उपासना की स्थापना की। उनकी दृष्टि में वेद का दर्शन तो स्पष्ट है कि एक ही तत्व की अभिव्यक्ति सब रूपों में है। लेकिन सब रूपों में है तो लोग इस चीज को नहीं समझते थे। कोई गणेश की पूजा कर रहे हैं। कोई शिव की पूजा कर रहे हैं और शिव की पूजा कर रहे हैं तो विष्णु की पूजा करने वालों से घृणा कर रहे हैं। कोई विष्णु की पूजा कर रहे हैं तो शक्ति की पूजा करने वालों से घृणा कर रहे हैं। तो जब तक वो यात्रा नहीं करते
(26:59) जब तक उनकी भावना को नहीं समझते तब तक वो यह कन्विंस करने में सक्षम नहीं होते कि एक ही मूल तत्व की अभिव्यक्ति भगवती के रूप में भी होती है। उसी की अभिव्यक्ति शिव रूप में होती है। विष्णु रूप में होती है, गणेश के रूप में होती है। तो जो प्रोमिनेंट एरियाज थे जहां करोड़ों करोड़ों लोग एक-एक देवता की उपासना करते थे और दूसरे से घृणा करते थे। तो उसको उन्होंने आचार्यों के पास गए। वहां के लोगों की भावना को समझते हुए उन्होंने किसी की कभी अवहेलना नहीं की। लेकिन गणेश के जो सब जो उपासक थे विष्णु के उपासक थे उनके बड़े आचार्यों से शास्त्रार्थ करके
(27:42) यह कन्विंस करने में सक्षम हुए कि विष्णु जो हैं वह तो सर्वोच्च हैं लेकिन शिव जी भी उसी के दूसरे रूप [हंसी] शक्ति भी उसी के ही रूप हैं। इसीलिए पंचदेव उपासना में उन्होंने एक विधान बना दिया कन्विंस करते हुए कि जो भी जिस देवता की उपासना करते हैं उसको केंद्र में रखा जाए और बाकी चार जो है उनको चार कोने पर रखा जाए। [हंसी] तो इस रूप में आप जिस देवता की पूजा करना चाहते हैं वो केंद्र में है। आपके मन में बैठा हुआ है। लेकिन चारों तरफ दूसरे देवता भी है जो उसी की अभिव्यक्ति है। अब ये तब तक नहीं संभव था जब तक वो सब जगह घूमते
(28:24) नहीं। विद्वानों से नहीं चर्चा करते। और भी उन्होंने किया कुछ-कुछ। जैसे कि कहीं पर भगवती का उग्र रूप है। कहीं पर किसी देवता का उग्र रूप है। तो उन्होंने यह भी चिंतन किया कि नहीं उग्र देवता का स्वरूप हमें नहीं चाहिए। हमें सॉफ्ट देवता का स्वरूप चाहिए और सॉफ्ट देवता का स्वरूप जब आएगा तो दूसरे जो देवता को मानने वाले लोग हैं उनका भी आकर्षण उधर होगा। तो आप देखें कि कितनी बारीकियों से उन्होंने इन चीजों को परखा। सारे उग्र देवता के जो जो कि मूर्ति को उन्होंने सॉफ्ट में बदल दिया। अब सॉफ्ट में बदल दिया तो आम लोग चाहते हैं कि हम देवी देवता के सामने जाएं तो
(29:06) बड़ा एक आशीर्वाद देने की मुद्रा में रहे। वो लोक कल्याण परक दृष्टि हो उनकी। तो यह सब भी उन्होंने किया। नदी पर्वत पे देखें जितने स्तोत्र आज देश में चल रहे हैं वो शिव संबंधी स्तोत्र हो विष्णु संबंधी हो भगवती का स्तोत्र हो गणेश जी का स्तोत्र हो जो जो शक्ति है या सूर्य है उनका स्त्रोत्र हो ये नदियों के स्तत्र नदियों के स्त्रोत्र हो सबके स्त्रोत्र उन्होंने लिखे और आपको एक एक बताएं कि जो बहुत सारे स्त्रोत्र ऐसे पाठ किए जाते हैं और बोले जाते हैं जो बोलने वालों को भी नहीं पता कि आधी आदि शंकराचार्य की रचना जैसे बरखरी संप्रदाय है तो वहां जो भगवान
(29:50) का जो स्वरूप है जो वहां कृष्ण भगवान का स्वरूप है तो उनका जो मूल श्लोक है वो श्लोक आदि शंकराचार्य की रचना है। श्री रंगम में श्रींगाष्टकम है आदि शंकराचार्य की रचना है। शिव के जितने स्तोत्र है आदि शंकराचार्य की रचना है। भगवती का जो स्तोत्र है आदि शंकराचार्य की रचना है। तो जो आप जैसे हम वहां पूरी जाते हैं जगन्नाथ मंदिर है तो जगन्नाथ स्वामी नयन पथगामी भवतु में ये वहां का एक एक तरह से समझ ले कि स्लोगन है। उसकी रचना आदि शंकराचार्य की है। तो कहने का मतलब जहां गए वैष्णव को शुरू में लग रहा था कि कहीं ये यहां आकर के क्योंकि प्रभाव बहुत था उनका तो कहीं
(30:35) आकर कोई यहां दूसरी चीज ना उपस्थित हो जाए। जहां गए तो वहां वैष्णव के ही भक्त की रचना कर दी। स्तोत्र की रचना कर दी। अब वो वही आज तक गा रहे हैं। कहीं शिव जी के मंदिर में गए तो वहां शिव जी के स्तोत्र रच दिए। भगवती के स्तोत्र रच दिए। तो सबके मन माफिक जो हो उनकी साइकोलॉजी को ध्यान में रखते हुए उनकी आस्था को ध्यान में रखते हुए वो सब कुछ कर दिए। आज पूरे देश में जहां जाएंगे मंदिर का विषय हो, तीर्थ का विषय हो, स्तोत्र का विषय हो, एक एकत्व की भावना का विषय हो। आपको सब जगह शंकराचार्य के योगदान आप और जो एक अद्भुत बात ये लगती है कि कैसे
(31:19) कुंभ को उन्होंने माध्यम बनाया कि एक गृहस्थ भी अगर साधु संतों का ऋषियों का सिद्धों का सन्यासियों का अगर आशीर्वाद लेना चाहे मार्गदर्शन लेना चाहे जीवन में प्रेरणा लेना चाहे तो कैसे वो एक स्थान है जहां पे वो मिल सकता है अपने जीवन में एक नया दृष्टिकोण उत्पन्न कर सकता है, उपदेश ले सकता है, प्रेरणा ले सकता है, आशीर्वाद ले सकता है। तो यह और दूसरी बात यह कि कैसे उसको एक खगोल शास्त्र की दृष्टि से आप देखिए बृहस्पति की जो परिक्रमा है ना? कैसे उस टाइमिंग को है कैसे टाइमिंग कैसे उसको जो है उन्होंने उसको अलाइन किया टाइमिंग को ले लिया और एक अमृत काल
(32:05) अमृत काल है काल उपस्थित हो और ये तो मैं स्वयं एक लाख बार भी बोलना हो तो बोलूंगा कि कुंभ में जो स्नान करने का अनुभव है वो दिव्य है। दिव्य है। और मैं यह भी एक एक उनका कोटेशन बता रहा हूं। शंकर दिग्विजय में इसकी चर्चा है कि जब वह स्वयं संगम पे स्नान करने के लिए गए क्योंकि कुमारिल भट्ट से जो शास्त्रार्थ की बात थी तो स्वयं संगम में स्नान किए और वहां वो लिखते हैं वहां वो बोलते हैं कि जो कुंभ का ये कुंभ का स्नान संगम का स्नान केवल आज की बात नहीं है। वेद में ऋषियों ने इनकी चर्चा की है। और एक श्लोक वहां लिखते हैं सीता सितते
(32:49) सरिते यत्र संगमे तत्रा प्लुतासो दिवत कि सित कहते हैं गंगा जी को और असित कहते हैं यमुना जी को कहते हैं इन दोनों के संगम में जब कोई स्नान करता है तो वेद के ऋषि कहते हैं कि वो दिव्यता की अनुभूति होती है जो आपने कही थी अद्भुत है तो वो उनका उनका श्लोक है वहां पे उन्होंने बोला है शंकर दिग्विजय में इसकी चर्चा आती है तो यह जो दृष्टि है इस दृष्ट दृष्टि को देने वाले और और सबसे बड़ी बात है कि भारत के लोगों ने सिरोधार्य किया। आज भी आदि शंकराचार्य के प्रति जो जो भी जानता है उनको उनमें वही पवित्रता का भाव है। वही आस्था है, वही निष्ठा है। तो हमें अधिक से
(33:34) अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहिए। और सबके लिए एक रोल मॉडल है। आप देखें कि बच्चों के लिए आठ साल में कोई सब विषय का ज्ञाता हो जाए। आठ साल में वह विजनरी हो जाए। बच्चों के लिए इससे बड़ा कौन रोल मॉडल हो सकता है? यूथ के लिए देखें 32 साल में देश के लिए क्या-क्या कर दिया। सन्यासी के लिए देखिए कि पूरे सन्यासी का सिस्टम डेवलप कर दिया। आज आज कोई भी संप्रदाय हो। आप देखें कि जो अद्वैत ट्रेडिशन में नहीं है वो भी सन्यास उसी मेथड से लेता है। तो एक सिस्टम बनाया और सन्यास परंपरा को व्यवस्थित रूप दे दिया। तो यह कितना बड़ा एक विजनरी
(34:16) स्टेप है। अखाड़ों की स्थापना अखाड़ों की स्थापना कर दी। अब वो अखाड़ा जो है देखिए जो अपने जितने अखाड़ जो जैसे अभी जूना अखाड़ा है उसके बाद निर्वाणी अखाड़ा है और यह जो एक और निरंजनी अखाड़ा इसमें लाखों लाख नागा साधु आज भ मतलब स्वामी अवदेशानंद जी जो महा आचार्य महामंडलेश्वर है जूना अखाड़ा के वो कहते हैं जो लाखों नागा को तो मैंने दीक्षा दी हुई है तो आप देखें और वो शांत भाव से अपनी साधना में है लेकिन देश के लिए तत्पर है। तो यह जो दृष्टि है वह उन्होंने लाई नेपाल जैसे पशुपतिनाथ जैसे मंदिर जितने बड़े-बड़े मंदिर आज भारत में है उन सबको
(35:00) नया रूप देना उनकी प्राचीन परंपरा को स्थापित करना और नॉर्थ के लोगों को साउथ भेज देना। साउथ के लोगों को नॉर्थ भेज देना। पशुपतिनाथ मंदिर हो या बद्रीनाथ मंदिर हो केदार वहां से आज भी दक्षिण के लोग आते हैं। हमारा जो डिमरी जो टाइप के जो सर नेम वाले दिखेंगे आपको तो मुख्य पुजारी के रूप में एक सिस्टम बना दिया और उसके पेरीफेरी में चारों तरफ जो लोग हैं जो उसमें जुड़े हुए हैं वो दूसरा सिस्टम बना दिया। आज वैसे का वैसे चल अभी मैं थोड़े दिन पहले चंद्रबदनी शक्तिपीठ है जो उत्तराखंड में है। देवप्रयाग के समीप में है। मैं गया तो वहां उनसे मैंने चर्चा की
(35:43) जो वहां के पुजारी थे तो वो बोले कि हम तो कर्नाटक से आए हुए हैं। [हंसी] आदि शंकराचार्य ने तब से वह चल रही है। तो यह बड़ी स्टडी है सोशियोलॉजी के पॉइंट ऑफ व्यू से कि किस किस तरह से भारत का समाज एक दिशा से दूसरी दिशा में गया। आचार्य एक दिशा से दूसरी दिशा में गया। मंडन मिश्र उत्तर भारत के थे तो वो श्रृंगेरी के शंकराचार्य बन गए। और जो दक्षिण के लोग थे जैसे पद्मपादाचार्य थे तो वो तो तमिलनाडु के थे। वो पूरी के शंकराचार्य बन गए। सबको सब जगह ला दिया और भारत की अखंडता को स्थापित कर दिया। तो केवल वैचारिक दृष्टि से नहीं बड़ा जमीन पर जमीन पर उन्होंने
(36:28) अखंडता को स्थापित किया और ऐसा प्रभाव था कि जो जो लोगों ने उसको सिरोद्धार्य किया और आज तक हमारी जो चीजें हैं वो बहुत चीजें वैसी की वैसी और एक चीज और ये जो परिव्राजन की जो परंपरा उन्होंने स्थापित की परिव्राजक है। लेकिन क्या अभी भी उस परंपरा को सन्यासी या शंकराचार्य उसको जीवंत रखें अपनी? नहीं देखिए उनका जो मठामनाय है उन्होंने ये इसके लिए जो नियम का भी विधान किया हुआ है। तो मठामनाय के अनुसार जो है वो तो उनका एक तरह से निर्देश है कि सब जो है वह समाज में रहे और मठ में ज्यादा समय तक ना रहे। क्योंकि समाज के प्रत्येक व्यक्ति से
(37:13) उन्होंने भारत को चार भागों में बांट दिया। तो जो चार राज्य दक्षिण के हैं वह श्रृंगेरी पीठ के अधीन है जो रामेश्वरम क्षेत्र कहलाता है जो अपना इधर बंगाल असम बिहार इस तरह का जो क्षेत्र है यह गोवर्धन पीठ के अंदर है जो पुरुषोत्तम क्षेत्र कहलाता है जो इधर जो हिमालय में है ज्योतिष पीठ उसमें उत्तराखंड उत्तर प्रदेश कश्मीर ये सब जो एरिया है वह सारा उनके अंदर आ गया तो वो कहलाता है बद्रिका आश्रम क्षेत्र और जो गुजरात में है वह द्वारका क्षेत्र में है जिसमें शारदा पीठ है तो सभी पीठों में उन्होंने चारों वेद की व्यवस्था कर दी और सभी पीठों में ये सारी
(37:56) चीजें कर दी कि जो जो वहां विधिवत लोग ज्ञान प्राप्त करें और जो भी शंकराचार्य हो वो समाज में रहे और समाज के एक-एक व्यक्ति से उनका संपर्क रहे और उसके अभुदय और निश्रेयस का वो उनकी व्यवस्था करें उसको को उन्नत बनाएं। तो ऐसा विधान है। बाकी जो हैं वो सब जानते हैं और जिस रूप में जिसको है वो कर रहे हैं। अभी के जो शंकराचार्य हैं क्या इसका पालन करते हैं? ए क्विक पॉज एव्री स्टोरी वी क्रिएटेड प्राच्यम इज बोर्न फ्रॉम [संगीत] डीप पैशन फॉर भारतीय कल्चर एंड हेरिटेशन। टू हेल्प अस कंटिन्यू दिस अनुष्ठान। प्लीज बी ए पार्ट ऑफ दिस।
(38:42) सब्सक्राइब टू दिस ट्रूली भारतीय oटीt www.prach.com और स्कैन दिस क्यूआर [संगीत] कोड ऑफ प्राचम.org टू डोनेट फॉर दिस कॉज। योर सपोर्ट हेल्प्स अस कीप दिस कल्चरल जर्नी अलाइव। बी अ पार्ट ऑफ दिस [संगीत] धार्मिक विसर्जन्स। एवरी ड्रॉप काउंट्स। नाउ बैक टू योर एक्सपीरियंस। जय श्री राम। बहुत यात्रा होती रहती है। अभी भी एक यात्रा प्रस्तावित है जो अभी 2026 में अगस्त के आसपास जो कालडी से केदारनाथ की यात्रा का एक प्रस्ताव है। तो उसमें 22 राज्यों से होते हुए जो त्रिंगेरी के
(39:29) आचार्य जी लीड करेंगे और जन-जन से संपर्क हो सबको समझा जाए। हां जितना होना चाहिए उतना नहीं हो रहा है क्योंकि वो आवश्यक है। बिल्कुल हमें लगता है कि मूल तो आदि गुरु शंकराचार्य की परिक कल्पना यही थी कि लोग निकले भ्रमण करें परिवराजन करें उपदेश दें हिंदू धर्म को हमारी संस्कृति को स्थापित करें और जो खतरे हैं जो संकट हैं इसका निवारण करें। जैसे देखिए अब मैं देखता हूं कि हर राज्य में इतना मैसिव कन्वर्ज़ हो रहा है। हम लेकिन मैं देखता हूं कि हमारे साधु समाज उदासीन है उसके प्रति हैं और बड़े-बड़े मठों के आसपास के क्षेत्रों में
(40:12) ये हो रहा है। आपको नहीं लगता कि इस इस दिशा में भी और प्रयास की आवश्यकता है? अवश्य अवश्य प्रयास होना चाहिए क्योंकि किसी का लोभ इत्यादि के माध्यम से कन्वर्जन जो है वे उसके मौलिक सत्ता की चुनौती है। इसीलिए इस विषय में जो हिंदू जीवन दर्शन है या वैदिक जीवन दर्शन है या सनातन चिंतन है वह कभी भी ऐसा नहीं कहता कि लोभ, क्रोध, मोह या और तरह से किसी दूसरे मत को मानने वालों को हम अपने में जबरन ले आए तो फिर हिंदू समाज के भी लोग हैं उनको भी कोई लोभ देकर कोई किसी और ढंग से यदि दूसरे में ले जाने का प्रयास करते हैं तो यह एक मौलिक जो जो व्यक्ति का
(41:00) स्वभाव है उसका हनन है। इस विषय में जो दूसरे जो लोग हैं जो कन्वर्जन में विश्वास करते हैं वह तो विवेकहीन है ही क्योंकि उनकी अपनी जो इतिहास परंपरा है वह तो वो क्या-क्या उसमें धूमिल है वो उसको जब लोग जानेंगे तो पता चलेगा कि हम कहां जा रहे हैं। लेकिन हमारे जो ज्ञानी लोग हैं साधु संत हैं क्योंकि जो जिन्होंने जीवन ही समाज के लिए समर्पित किया है तो उनको इस विषय में तो भूमिका निभानी ही चाहिए और बहुत लोग लगे भी हुए हैं लेकिन और भी अपेक्षित है। एक शंकराचार्य है जो अक्सर विवादों में घिरे रहते हैं। मुझे बड़ा आश्चर्य होता है
(41:39) देख के कि ये कौन सा शंकराचार्य होने का कर्तव्य का जो आदि शंकराचार्य के जो उनके जो भाष्य हैं उनकी जो कृतियां हैं उनको हमने शब्द पढ़ा है और मुझे जैसे लगता है कि जो भी उनका जो शास्त्र है और उनका जो तात्पर्यार्थ है उसको समझेंगे तो वो वैसे ही जीवन में आचरण करेंगे जैसे आदि शंकराचार्य का दृष्टिकोण था। लेकिन कोई भी व्यक्ति यदि उससे डिरे्ड होता है तो इसका मतलब है कि उनको ना तो उस शास्त्र में निष्ठा है ना वह जो जीवन का सदाचार है उसमें निष्ठा है। तो फिर बाकी चीजें व्यर्थ हो जाती है। तो इसीलिए शास्त्र की
(42:25) मर्यादा आचार्य शंकर तो पैदल ही चलते थे। वह तो वो तो पेड़ के नीचे रहते थे। वो तो गांव में भी कम ही जाते थे और जो भी मिल गया वह भोजन कर रहे हैं। नहीं मिला भूखों रह रहे हैं और कहीं भी दिव्यता की कमी नहीं है। तो इस प्रकार का जो तप इस प्रकार का जो जीवन यद्यपि आचार्य शंकर का जो घर था वो सुखी संपन्न घर था और एक ही पुत्र पिताजी का स्वर्गवास हो चुका था। मां के एक पुत्र और उस रूप में जो उन्होंने देश की अखंडता स्थापित की और जिस तरह का जीवन दर्शन हमें दिया तो मुझे लगता है कि सबको उसका ध्यान रखना चाहिए और यदि उससे कोई अलग हटता है तो इसका मतलब आदि शंकराचार्य
(43:12) के प्रति ना तो उनका सम्मान है और ना वेद के प्रति उनका सम्मान है और समाज में भी इसका बड़ा एक जो क्योंकि सभी तो विद्वान नहीं होते तो यद्यदा श्रेष् दे जन यत प्रमाणम कुरते लोकते समाज के जो श्रेष्ठ लोग होते हैं उनका जो आचरण होता है ना आम लोग उसको फॉलो करते हैं तो ऐसे व्यक्ति को सतत यह ध्यान में रखना चाहिए कि मेरा एक एक आचरण जो है वह लोगों के समक्ष है और एक तरफ आचार्य शंकर की परंपरा है। दूसरी तरफ लोगों की उन पर निष्ठा आचार्य के प्रति बहुत निष्ठा है लोगों की तो वो निष्ठा भी कहीं प्रभावित
(43:57) ना हो तो हमारा एक एक जो आचार हो वो ऐसा हो कि लोगों के लिए प्रेरणास्पद हो लोगों को कहीं भी यह ना लगे कि जो हम कहां हैं हम हम क्या देख रहे हैं तो इन सब चीजों को हमें जरूर ध्यान में रखना चाहिए। आचार्य शंकर तो तो कभी उनके मन में वह तो कहते हैं तक्त ममा बंध करे पदे द्व मानामान सदशा समदर्शनस कहते हैं जिसके मन में अहम और मम आ गया तो फिर वो घोर अज्ञानी है और अभी जो एक जो चीज देखने में आ रही है कि मैं सबका तो नहीं कहता एक से एक संत हैं। मेरा खुद भी बहुतों से संबंध है और मैं मैं व्यक्तिगत जानता हूं कि वो बहुत कार्य
(44:43) करते हैं और उसी तरह का जीवन भी व्यतीत कर रहे हैं। लेकिन एक जो चीज दिख रही है कि जो कई लोग जो उस ऑर्डर में है या कई लोग जो दूसरे संप्रदाय में भी है। उनमें अहम की वृत्ति बहुत बढ़ गई। मैं बड़ा विद्वान हूं। मैं यह काम कर रहा। मेरा यह पद होना चाहिए। मैं इतनी पूजा करता हूं। मैं जितनी पूजा मैं 20 बार यहां चला गया। मैं 25 बार वहां चला गया। यह घोर अज्ञान है और आचार्य शंकर यही कहते थे कि अहम जो है ना इसका मतलब शरीर का अध्यास हो गया है। इसका मतलब आप मानते हैं कि मैं शरीर भी हूं क्योंकि शरीर ही तो जाता है। शरीर में ही तो अहम
(45:27) भाव होता है। और जब अहम हो जाता है तो फिर मम शुरू होता है। तो फिर हमारे पास 50 गाड़ियां हैं। हमारे पास फिर यह सुख सुविधा है। तो यह सारी चीजें जो है ना यह अद्वैत दर्शन के विरुद्ध है। धन होना गलत नहीं है। लेकिन अहम मैं यह हूं मेरा यह है। कम से कम संतों के मुंह से ऐसी वाणी नहीं निकलनी चाहिए। तो जैसे दूसरे लोग बोलते हैं कि मैं यह हूं। मेरा यह है। तो संतों में यह प्रवृत्ति दिखती है कि हम बैठ के बोलते हैं कि मैं इतनी पूजा कर रहा हूं तो मैं यह कर रहा हूं। दूसरा जो कोई है तो जैसे जैसे कोई विष्णु के भक्त हैं तो टिप्पणी कर देंगे कि शिव के भक्त जो है
(46:13) वह ऐसे कर रहे हैं। ना ना ये जो है वेद विरुद्ध है और यह जो है आचार्य शंकर का जो कार्य है उसके विरुद्ध है। सभी एक ही तत्व की अभिव्यक्ति है। आप जिसको भी माने जिनमें भी आपकी आस्था हो उससे आप आगे बढ़े लेकिन सभी उसी एक तत्व की अभिव्यक्ति है इसलिए सबके प्रति वही श्रद्धा भाव सबके प्रति वही प्रेम भाव और सबके प्रति आदर का भाव होना चाहिए। यह भी कमी दिख रही है। मैं वेद इतना जानता हूं। मैं यह कर रहा हूं। मैं वो कर रहा हूं। दूसरे नहीं कर रहे हैं। नहीं नहीं ये संतों के मुंह से ऐसी भाषा नहीं निकलनी चाहिए। तो आपने जो संकेत किया तो [हंसी] इसका थोड़ा बाुल्य
(46:59) तो दिखता है। यद्यपि जो मेरा उतना समय नहीं बच पाता क्योंकि अपना शास्त्र अध्ययन या जो भी ज्ञान विज्ञान को समाज तक जितना ले जा सकते हैं तो इससे समय नहीं बचता लेकिन कभी-कभी सुनने में आता है। तो हम क्या है? हमें तो ऋषियों ने जो ज्ञान दिया हमारे जो आचार्यों ने हमारे ज्ञानियों ने सब ने जो हमें ज्ञान दिया हम उसको ठीक से समझ ले यही बड़ी बात है। बिल्कुल सही कहा। हमारा क्या है? आचार्य शंकर भी कभी नहीं बोले कि मैं इतना बड़ा ज्ञानी हूं। आचार्य शंकर तो कहते हैं गुरु से जो प्राप्त हुआ ऋषि परंपरा से जो प्राप्त हुआ। इसीलिए पूरे जीवन दर्शन में आचार्य
(47:45) शंकर का कहीं नहीं देखेंगे कि मैं यह कर रहा हूं। गुरु का जो आदेश ऋषि परंपरा का जो ज्ञान है सब जगह श्रुति यह कहती है सब जगह जो आचार्य यह कहते हैं कहीं व्यास जी का उल्लेख हो रहा है कहीं किसी का उल्लेख हो रहा है और सब का सब ईश्वर पे देवी देवता पे वो ले चले जाते हैं तो उस परंपरा के हम लोग हैं और हमें बिल्कुल क्लियर कट है कि हमारा एक भी अपना ज्ञान नहीं क्लियर कट है कि हमें उनके द्वारा एक उनके के तप के कारण हमें यह सब चीज मिला हुआ है। बहुत आचार्य अपने इसीलिए नाम भी नहीं लिखते टेक्स्ट में। हमारा क्या ज्ञान है कि हम
(48:26) नाम लिखें। तो यह जो भाव है यह भाव थोड़ा कम हो रहा है। लोग अहम को ज्यादा ला रहे हैं। जब तक अहम और मम रहेगा ना तब तक ज्ञान नहीं होता। ज्ञान तो वही होता है कि आप अद्वैत की तरफ जाएं। जो कोई भगवान भक्त को भी मानते हैं वह भी भगवान को समर्पित करें। भगवान में समर्पण हो। तो जब भगवान में समर्पण हो तो अहम का कहां स्कोप और यदि अद्वैत में समर्पित है तो भी अहम नहीं है। [हंसी] जहां भी अहम और मम होगा ना वहां राग द्वेष से कोई बच नहीं सकता। तो इससे क्या हो रहा है कि जो अद्भुत परंपराएं स्थापित हुई उनके संरक्षण की दिशा में वैसा प्रयास
(49:10) जिन्हें करना चाहिए था वो नहीं कर पा रहे। जी जी जी तो ये ये हम लोग ये एक चिंता करते क्योंकि ज्ञान का मतलब अपने यहां लोक कल्याण जी लोक कल्याण बिना अहम भाव तो वो लोक कल्याण क्या हो जाता है ना सेकेंडरी हो जाता है और अहम मम से अपना जो स्वरूप है वो प्रधान हो जाता है। तो फिर आठ वर्ष की आयु में आचार्य शंकर ने गृह त्याग कर दिया और कब भोजन मिला? कब नहीं मिला? किस अवस्था में कहां थे? आप बताएं कि 8 वर्ष की आयु में कालड़ी से ओंकारेश्वर आए। नदियों को 1700 कि.मी.
(49:50) नदियों को पार करते हुए वन में कहां-कहां वो आठ वर्ष का बच्चा जो है वो वो खोजते खोजते जा रहा है। कौन खाना दे रहा है? कौन कहां हो रहा है? लेकिन ज्ञान का संकल्प ऋषियों के ज्ञान में अटूट विश्वास ये उनको आठ वर्ष की आयु में ओंकारेश्वर ले आए और 12 वर्ष की आयु तक ओंकारेश्वर में सब विद्या में निष्नात तात्विक रूप से अनुभूत और 12 से 16 वर्ष की आयु में सारे भाष्य लिख देना 16 से 32 वर्ष की आयु में पूरे देश को नाप लेना और नाप लेना वो नहीं पाकिस्तान बांग्लादेश नेपाल काल अफगान सबको लेकर नाप देना। हमारे सामने वो स्वरूप नहीं है क्या? इसमें अहम का कहां गुंजाइश है?
(50:35) बहुत सही कहा। अहम होता तो वो कारड़ी से निकलते। अम होता तो अपनी संपत्ति को छोड़ते। अब तो वह हमारे सामने क्यों नहीं उदाहरण है और जब उदाहरण नहीं है तो जो गृहस्थ है उसमें तो हम मानते हैं कि चलो कुछ उसका एक वातावरण का भी प्रभाव होता है जो एक बार सन्यासी बन गए जो संत बन गए उनमें यदि वही अम और अहम और मम रहा तो फिर क्या मतलब रह गया अनाश्रित कर्म फलम कार्यम कर्म करोति यह सन्यासी योगी च न निरग निर्णक्रिया यम सन्यासित प्राहु योगम तम वि पांडव न य सन्यस्त संकल्पो योगी भवती क छठे अध्याय गीता का यह पहला दूसरा श्लोक सबको पढ़ना
(51:20) चाहिए कौन सन्यासी है कौन योगी है तो जो बिना अहम के बिना कर्तृत्व भाव के काम करता है कभी फल को ध्यान में नहीं रखता भगवान कृष्ण कहते हैं कि जिसने फल को ध्यान में रख लिया अहम और मम को ले आया तो ना तो वो सन्यासी है ना योगी तो इन सब चीजों को हमें कभी भूलना नहीं चाहिए चाहिए और इसीलिए ऋषि ने कहा है तैत्री उपनिषद में कि स्वाध्याय प्रवचनाभ्याम मा प्रमरितव्यम कि स्वाध्याय में कभी भी प्रमाद नहीं होना चाहिए। आप प्रत्येक दिन जब शास्त्र का अध्ययन करते हैं ना तो शास्त्र जो है आपको वो संकेत करता रहता है कि अहम नहीं मम नहीं। जब हम शास्त्र का
(52:02) अध्ययन छोड़ देते हैं तो फिर भगवान यह भी कहते हैं कि देवी गुणमई मम माया दुतया मेरी शक्ति जो है ना वो ऐसे उलझा देगी ना आपको कि पता नहीं चला कि कब सन्यासी से कब अहम मम पे आ गए तो यह कब नहीं होता जब आप प्रत्येक दिन शास्त्र का अध्ययन करते और धीरे-धीरे उसका मनन करते रहते हैं अब मनन जब करते रहेंगे तो ना अहम आएगा ना मम आएगा क्या बात है फिर सीधे परंपरा का ज्ञान आएगा और फिर उनका जो जीवन वृत्त है उनकी वह सामने रहेगी। अब बताइए जो 32 वर्ष की आयु में जो इतना कर सकते हैं यहां 32 वर्ष की आयु में तो हमें पता भी नहीं कि देश का क्या
(52:44) लक्ष्य है? देश का क्या स्वरूप है। यह थोड़ा भी जो स्मरण रखेगा उसमें अहम आएगा। तो इस पर तो यह तो गंभीर विषय है। इसको हमें सबको लेना चाहिए। और मैं तो यही कहूंगा कि आज भी स्वाध्याय शास्त्र का अध्ययन और उसका उस ज्ञान को लोगों तक ले जाना। इसमें ना तो प्रमाद होना चाहिए और ना आलस्य होना। इसी में अपने जीवन को लगाना चाहिए। तभी हम भारत की इस महान परंपरा को हम भारत में भी अक्षुण्य रख सकते हैं और दुनिया को भी इसकी दिशा की जरूरत है। वो फ्रेंच एक स्कॉल थे माल रक्स आप देखेंगे 1936 37 में नेहरू जी से मिले थे तो फ्रांस में उन्होंने उनको कहा था कि
(53:33) लेट शंकर लीड इंडिया। समझ रहे हैं? कहें कि पूरी दुनिया में अद्वैत का विचार ही नहीं है। भारत जब स्वतंत्र हो तो अद्वैत के विचार से भारत को आगे बढ़ाना क्योंकि भारत ही एक ऐसा देश है जो दुनिया को दिशा दे सकता है और हम कहां अहम और मम में घूम रहे हैं जो और उसके आधार पर समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर तो ये जो है इससे तो बचना चाहिए और हम लोग तो स्वयं ही उस ज्ञान की खोज में है लेकिन जितना समझा है उतना है कि जो इनसे दूर रहे हम जहां बैठे विश्व की प्राचीनतम नगरी काशी में और जहां की [नाक से की जाने वाली आवाज़] संस्कृति आज
(54:14) भी वैसे ही जीवंत है, जागृत है। वहां पे बहुत अद्भुत उनको आदि गुरु शंकराचार्य जब आए थे तो अद्भुत अनुभव हुए यहां पे यहां पे जब वो गए श्मशान घाट पे तो एक वो प्रकरण होता है ना एक चांडाल उनके सामने आता है हां जरा उस प्रकरण के विषय में बताइए और अद्भुत है कि और हमें लगता है कि वहीं उन्होंने मनीषा पंचकम की रचना की रचना की थी और ये सबको जानना चाहिए जानना चाहिए जी लेकिन जो काशी का प्रसंग है जिसमें वो तो जो शिष्यों के साथ जो है वह स्नान करके आ रहे थे गंगा जी से तो उसमें जो चांडाल का प्रकरण आता है कि चार कुत्तों को साथ लेकर के वो क्योंकि काशी की गली बहुत संकरी
(55:03) होती है तो वह चार कुत्तों को ले आ रहे थे तो उन्होंने कहा कि हमें रास्ता दें जिससे कि हम जा पाएं। तब जो उन्होंने प्रश्न पूछा कि आप किसको रास्ता देने के लिए कह रहे हैं? जिस पंचमहाभूत से जैसे आपका शरीर बना है तो उसी पंचमहाभूत से मेरा शरीर बना है तो एक पंच भौतिक शरीर दूसरे पंच भौतिक शरीर को कैसे कह सकता है कि तुम आप दूर हटो रास्ता दो दूसरा आप तो कहते हैं आत्मा एक ही है ये चांडाल ने पूछा चांडाल ने पूछा [हंसी] आप तो अद्वैतवादी है अद्वैतवादी तो आप आपकी तो स्थापना यह है कि जो एक ही आत्मा है तो जब एक ही आत्मा है तो एक आत्मा दूसरे आत्मा को हटने
(55:45) के लिए कैसे कह सकता तो आत्मा दो हो गए ना तो द्वैत हो गया तो आप अपने सिद्धांत का स्वयं ही व्यवहार की दृश्य खंडन कर रहे हैं इनका तो दिमाग घूम गया कि जो ये कौन है जो इस तरह का प्रश्न कर रहे हैं उनके पास गए और पास जाके जो उन्होंने उनसे निवेदन किया यह हम सबको सीखना चाहिए कि जागृत स्वप्न सुसुप्त सुफुटरा या समुभते या ब्रह्माद पपीिकांत तनुसु प्रोता जगत साक्षिनी सवाह न दृश्य वस्तुत दृढ़ प्रज्ञा यस चेत चांडा लो द्वजो सतगुरुष मनीष मम उनको जाके करते हैं कि जो आपने जिस तरह का प्रश्न पूछा यह भी हमारे
(56:32) विद्वानों को सीखना चाहिए कि एक चांडाल जो व्यक्ति दाह संस्कार सुबह से रात तक करते हैं और वो व्यक्ति जब प्रश्न पूछा तो उस प्रश्न को उन्होंने उतना ही सीरियसली लिया। उनके पास गए और प्रश्न के गांभीर्य से उनको पता चला कि इस व्यक्ति इस व्यक्ति का व्यक्तित्व क्या है? और कहा कि जो आपने जो प्रश्न किया है कि जो एक ही आत्मा जब है तो फिर आप कैसे कह सकते हैं कि आप अलग हटो। तो कहते हैं कि जागृत स्वप्न और सुशुप्ति यह पूरा दर्शन है अद्वैत का कि जागृत अवस्था में रहते हैं तो भी हम चेतन रहते हैं। जब हम स्वप्न अवस्था में रहते हैं तो भी चेतन रहते यद्यप इंद्रियां काम
(57:18) नहीं करती और जब सुसुप्ति अवस्था में चले जाते हैं तो ना इंद्रियां काम करती है ना मन काम करता है तो भी चेतन रहते हैं तो वो चैतन्य जो जागृत हो स्वप्न हो सुसुप्ति हो सब में जो विद्यमान है या समविभते और वही ज्ञान का स्वरूप है जो प्रकट रहता है और या ब्रह्माद पिपीलिकांत तनसु प्रोता जगत साक्षी और वही साक्षी रूप में ब्रह्मा से चींटी पर्यंत सब में एक ही रूप में विद्यमान है। सवाह वही चैतन्य मैं हूं जो चैतन्य ब्रह्मा में भी है और चींटी में भी है। सब में है। यह दृढ़ ज्ञान प्रज्ञा जिसकी हो चुकी है तो कहते हैं वह चांडाल हो या द्विज हो वही और
(58:04) वही केवल गुरु बन सकता है। आप देखें कि क्या उनकी दृष्टि है कि लोग कहते हैं कि वो यह जातिवादी थे, यह वादी थे, वो वादी थे। उनको यह श्लोक ही नहीं दिखता कि चांडाल को वो कह रहे हैं कि जो आप जो हैं वह ब्रह्म ज्ञानी हैं। क्योंकि आपको सब में एक ही आत्मा का अनुभव हो रहा है। तभी तो आप कह रहे हैं ना कि जो जब मेरे और आपके बीच का आत्मा दो नहीं है तो आप किस आत्मा को कह रहे हैं कि आप दूर हटो। यह मनीषा पंचकम है और सबको पढ़ना चाहिए यह और इसके आधार पर अपना आकलन करना चाहिए कि कोई जब कई बार हम देखते हैं कि अभी कई वायरल हो रहे हैं। विश्वविद्यालय के कई कुलपति
(58:49) हैं, कई प्रोफेसर होते हैं। कई संत महात्मा भी होते हैं। तो वह कोई प्रश्न पूछता है तो कई बार वो गुस्से में आ जाते हैं। यह हमें सीखना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति हो क्योंकि मौलिक रूप से वैदिक दर्शन में सबको आत्मूप माना जाता है। सब आत्म स्वरूप है। वो तो जब तक हम हम में थोड़ा अज्ञान रहता है तब तक हम शरीर को इंद्रिय को मन को बुद्धि को हम मानते रहते हैं। लेकिन मौलिक रूप से सब आत्मा है। तो जब सब आत्मा है तो किस व्यक्ति में कौन ज्ञान कब प्रकट हो? ये कौन जान सकता है? आत्मा ज्ञान स्वरूप है। तो उसी विनम्रता से उसी सम्मान से उन्होंने उनको यह निवेदन
(59:30) किया और उनको गुरु माना और गुरु मान के उनके चरण को स्पर्श किया और फिर उनसे जो आदेश हुआ तो उसी आदेश को ले वो बद्रिका आश्रम चले गए जहां उन्होंने भाष्य लिखा। तो ये जो घटना है काशी की आपने तो स्मरण दिला दिया। ये तो घटना का स्मरण करते ही रोमांच हो जाता है। कहते हैं कि वो स्वयं शिव थे चांडाल के रूप में। हां हम तो शिव थे। वो तो सब शिव रूप है। लेकिन कहने का मतलब है कि जो जिस समय वो प्रश्न कर रहे थे उस समय में तो एक सीधे वो चांडाल थे। तो वो गए उनको प्रणाम किया। उनको उसी समय रच वो तो स्पॉनटेनियसली वो सारी चीज करते थे। उसी समय रचना है जो
(1:00:15) मनीषा पंचकम है और यह काशी की एक अद्भुत घटना है। तो सनंदन इत्यादि मिले। उन्होंने विश्वनाथाशष्टकम भी लिखा। अन्नपूर्णा भगवती पे लिखा। एक से एक लिखा। काशी पंचकम भी लिखा। कितने सारे स्त्रोत्र यहां के उनके हैं। मणिकर्णिका स्तोत्रम लिखा। आपको यह भी एक सबको ध्यान में रहना चाहिए कि जो 16वीं 17वीं शताब्दी तक मणिकर्णिका में दाह संस्कार नहीं होता था। आचार्य शंकर जितनी बार काशी आए वो वहीं रुकते थे। उतारते थे और मणिकर्णिका स्तोत्रम जो है ना वह बहुत प्रसिद्ध है कि बाद में जितना मुझे हिस्टोरिकल फैक्ट्स मिला है ये 17वीं शताब्दी के आसपास कुछ जो जमींदार थे कुछ
(1:00:59) जो लोग थे उन्होंने यहां दाह संस्कार शुरू किया और तब से एक परंपरा बन गई दाह संस्कार के लिए तो हरिश्चंद्र घाट ही है शुरू से राजा हरिश्चंद्र से लेकर अभी तक की कहानी है तो इसीलिए हमें काशी का जो यह स्वरूप है आदि शंकराचार्य का वो ध्यान में रखें और इसी से हम क्या हैं दूसरा क्या है यह इसकी जो बारीकी जो है इसको समझे और सबको सम्मान दें और उसी आत्मभाव से सबको सबको सम्मान देते हुए और गुरु क्या होता है इसको समझें और जब आप कहते हैं कि हम गुरु हैं तो आप में यह विलक्षणता है कि नहीं है इसका भी आकलन करें। आज के युवाओं को अगर कोई एक चीज अगर सीखनी है आदि गुरु
(1:01:48) शंकराचार्य के जीवन से और उनके जो इतना विस्तृत उन्होंने भाष्य लिखे और इतना कार्य किया जो दर्शन को प्रतिपादित किया वो क्या होगा? सबसे पहला जो मुझे अपील करता है वो है वैज्ञानिक दृष्टि। आचार्य शंकर का जो कुछ भी है, वह वैज्ञानिक दृष्टि पर टिका हुआ है। कभी भी किसी अंधविश्वास, कभी वह किसी ऐसी चीज को उन्होंने नहीं आगे बढ़ाया जो वैज्ञानिक दृष्टि से युक्त ना हो। यही कारण है कि वैज्ञानिक उनको रिस्पेक्ट देते हैं और दूसरा जीवन की संकल्प शक्ति। हम जो लक्ष्य निर्धारित करेंगे, हम उसको प्राप्त करेंगे और ना कोई संसाधन हो तब भी प्राप्त
(1:02:29) करेंगे। आज एक चल पड़ा है ना कि हम प्रोजेक्ट ले ही हम बड़ा काम करेंगे। हम यह हमें फंडिंग मिलेगी तभी हम बड़ा काम करेंगे। तो आचार्य शंकर को कोई फंडिंग नहीं थी। कोई प्रोजेक्ट नहीं था। जन्म लिया कार्डी में और बिना किसी प्रोजेक्ट के बद्रिका आश्रम में जाके ब्रह्मसूत्र गीता उपनिषद पर भाष्य लिख दिया। बिना किसी फंडिंग के भारत के सभी तीर्थ स्थल को पुनरुद्धार कर दिया। जहां मंदिर को तोड़ा गया था, वहां पुनर्निर्माण करवा दिया। और देश का कोई ऐसा कोना नहीं है जहां उन्होंने वो सब कुछ नहीं कर दिया जिसके लिए बहुत फंडिंग की जरूरत पड़ती है। लेकिन
(1:03:11) उन्होंने बिना फंडिंग के सब करवा दिया। देश की एकता अखंडता सर्वोपरि वैदिक ज्ञान सर्वोपरि और सब कुछ जीवन में तर्क पूर्ण हो। कोई भी उसको यदि कोई ब्रह्मसूत्र भाष्य पढ़ ले तो उसको पता चलेगा कि तर्क किसको कहते तो लॉजिक की पराकाष्ठा एक्सपीरियंस का हाईएस्ट स्टेट माता के प्रति अनंत श्रद्धा जो सन्यास धर्म लेते हुए भी मां की सेवा की और वो श्लोक भी बहुत जरूरी है कि जो मातृ पंचकम है सबको वो पढ़ना चाहिए कि माता किसको कहते हैं। जो लोग कहते हैं ना कि ये पितृसत्तात्मक है उनको जरा यह श्लोक एक बार पढ़ना चाहिए। जब माता जी मना करती हैं कि आप मेरी सेवा
(1:03:56) ना करें। तब वह कहते हैं आस्ता ताब दम प्रसूति समय दुरार सुलभ्यथा न रुचम तनु शोषण मलमय सया सासरी एकस्यापिन गर्भ भार भरण क्रेशस यस क्षम दातु निष्कृति मुनतो तनय तस जन्य नमः ये कहते हैं माता जननी आपको नमस्कार है क्यों क्यों सन्यास आपके सामने कुछ नहीं है तो कहते हैं जब मां के गर्भ में बच्चा आता है ना तो दुर्बार सुलभ्यथा वह कष्ट होता है जो मां के अतिरिक्त कोई सहन नहीं कर सकता। न रुच्यम रुचि खत्म हो जाती है। तनु शोषणम शरीर जो है वह विकृत हो जाता है। और जब
(1:04:43) बच्चा जन्म लेता है तो मलमई सयाच सा वर्षों तक बच्चे के मल मूत्र में मां सनी रहती है। उसी के साथ सोती है उठती है बैठती है। ये जो तप है ना मां का कहते एकस्यापिन गर्भ भार भरण क्लेशस्य एक एक संतान को जन्म दे दे माना तो उसकी जो पीड़ा है तपस्या है कहते हैं इसको ध्यान में रख के पुत्र कितना भी बड़ा हो जाए माता के इस ऋण को जन्म जन्मांतर तक नहीं चुका सकता और क्या आप कह रही हैं कि आप सन्यासी हैं आप मेरी सेवा नहीं कर सकते ये मां इसको कहते तो यह जो शंकराचार्य का मातृ पंचकम है और जितने जीवन के पक्ष हैं
(1:05:30) उनमें जो उनका जो दृष्टिकोण है यह सब बच्चों को पढ़ना चाहिए कि मां क्या चीज है एक-एक बच्चे के लिए यह प्रेरणा का स्रोत तो दुर्भाग्य तो यह है कि इन सब चीजों को स्कूल में बच्चों को पढ़ाना चाहिए। कॉलेज यूनिवर्सिटी में आना चाहिए। लेकिन पता तक नहीं कि भारत में माता किसको कहते हैं और वो यूरोप के लोग कहते हैं कि ये पेट्रियाकी है। [हंसी] आप बताइए कि पूरे यूरोप में आज तक मां का कांसेप्ट विकसित नहीं हुआ क्योंकि कभी वो भोग की वस्तु से ज्यादा स्त्री को समझे नहीं और भारत के इस स्वरूप को साइड कर कर कहते हैं यह पितृसत्तात्मक है। तो आचार्य शंकर का हर
(1:06:14) एक व्यक्ति जीवनी पर हैं। स्वामी अपूर्वानंद जी की जो सबसे बेसिक बुक है रामकृष्ण मिशन से छपा है तो सबके लिए लगता है वह प्राइमरी टेक्स्ट वह है उतना पढ़े तो उनको पता चलेगा कि क्या-क्या चीज है और बाद में जितना इंटरेस्ट जिसका डेवलप हो वो उस उस लेवल पर पढ़ता जाए और किसी को यदि कई बार मुझे पूछते भी हैं किसी को यदि अद्वैत दर्शन का यदि बेसिक टेक्स्ट पढ़ना हो तो तत्व बोध पढ़ें तत्व बोध जो है वह बहुत बेसिक चीज है और आपको कम शब्द शब्दों में वह सारी चीज समझ में आ जाएगी कि आचार्य शंकर कहना क्या चाहते। बहुत ही आभार आपका कोई आभार नहीं। ये तो हम जितनी चर्चा करते
(1:06:56) रहेंगे तो अपना जो ज्ञान है वो विकसित होता है। बहुत और फिर अहम और मम भाव नहीं आता। [हंसी] और हमारे जो बच्चे हैं यूथ हैं उनको यह चीज समझ में आए और मुझे बहुत बहुत आनंद है कि इतनी ज्यादा क्वेरी है यूथ में। हां। कहां-कहां से फोन आते हैं? क्या-क्या वो जानने के लिए तत्पर हैं। उनको एक छोटा सा यदि यह संकेत मिल जाता है। कहां-कहां से लोग फोन करते हैं। कहां-कहां से मैसेज करते हैं। आप समझे कि हम सब पे कितनी बड़ी रिस्पांसिबिलिटी है कि बहुत सारे बच्चे हमारे हैं, यूथ हैं। उनको पता ही नहीं इस विषय में। कॉलेज यूनिवर्सिटी में स्कूल
(1:07:38) में पढ़ाई नहीं होती। और कैसे बड़े-बड़े वैज्ञानिक बड़े-बड़े जो चिंतक हैं वह कैसे आचार्य शंकर के दर्शन से प्रेरणा लेते हैं। कैसे उसमें अपने क्षेत्र में उसका यूज़ करते हैं। तो आप भी इसको समझें और आप भी अपने क्षेत्र में आगे बढ़ें और इस दृष्टि से आप समाज को भी आप मजबूती प्रदान करें और अपना जीवन तो धन्य होगा। बिलकुल तो आपने हमें अवसर दिया हम बहुत बड़े आभारी हैं। नहीं हमको बहुत आनंद आता है आपसे बात करके और यही बस ईश्वर से प्रार्थना है। यही आचार्य शंकर से प्रार्थना है कि वो आशीर्वाद दे। जी
(1:08:22) जैसे उन्होंने अपने जीवन में ये करके दिखाया। हमारे वैदिक ज्ञान को हमारे दर्शन को उन्होंने स्थापित किया। यही प्रार्थना है कि हम सब शंकर के दूत बनके एकदम उस संस्कृति को उस महान परंपरा को उस वैदिक दर्शन को उसके मूल को स्थापित अपना आप तो जानते ही अपना जो मध्य प्रदेश सरकार का जो संस्कृति विभाग है उसमें आदि शंकराचार्य एकता न्यास है तो यह अपने यूथ को अवसर भी प्रदान करता है कि अद्वैत के कैंप लगते हैं और जो वहां हमारे जो यूथ हैं उनसे हम यह कहना भी चाहते हैं कि जो भी इच्छुक हैं वह उनके वेबसाइट से जुड़े रह और देखें और जब भी मन करे वहां जाएं और
(1:09:10) हमारे जो संत हैं ज्ञानी हैं उनके सानिध्य में वो 10 दिन या जितने दिनों का कैंप होता है वो करते हैं और वो फिर कुछ नया बन के निकलते बिल्कुल तो ये अवसर भी है बिल्कुल ये अवसर भी है तो उसका भी लाभ ले और यूथ आगे बढ़े उतष् जागृत प्राप्त बड़ा निबोधत लेकिन सुरस धारा निशिता दुरतया दुर्गम पथस्त कविती है हम सबके पास है और मुझे लगता है कि जो सब एक दिन हम उस लक्ष्य तक जरूर पहुंचेंगे। बहुत-बहुत धन्यवाद प्रणाम करें। आपको भी सादर प्रणाम। प्रणाम। [संगीत]
(1:10:06) फ्रॉम द टाइमलेस वेदास टू द वैरिएंट मोरियर्स फ्रॉम द विज़डम ऑफ द ऋषिज टू द ड्रीम्स ऑफ अ न्यू भारत आवर सिविलाइजेशन हैज़ नेवर स्टॉप्ड इंस्पायरिंग द वर्ल्ड प्राच्यम द वर्ल्ड्स फर्स्ट इंडिगो oटीt ब्रिंग्स द ग्लोरी ऑफ़ भारत टू द वर्ल्ड 400 प्लस फिल्म्स एंड सीरीज फ्रॉम हिस्ट्री टू हेरिटेज फ्रॉम डिवोशन टू डिस्कवरी एव्री स्टोरी इज एन ऑफरिंग टू आवर इटरनल सिविलाइजेशन फ्रॉम G20 टू टोक्यो
(1:10:52) द वर्ल्ड इज विटनेसिंग द वॉइस ऑफ़ भारत राइज अमंग। बहुत बड़ी सनातन की सेवा होती है। ज्ञान का पुनरुद्धारण का कार्य इस डूइंग एन अमेजिंग जॉब। 60 साल में हमने जो खोया है वो वापस लाने का काम कर रहा है। आपका ये प्रयत्न ईश्वर की आराधना ही है। [संगीत] योर कंट्रीब्यूशन इज नॉट अ डोनेशन। इट इज एन आहुति इन दिस महायज्ञ ऑफ द इंडिकेनिस। तो सब्सक्राइब करें प्रजन [संगीत] [संगीत]

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