Nyāya Darshan: The Philosophy That Exposes Lies! | Hyper Quest Podcast Ft. Prof Arbind Jha
Author Name:Hyper Quest
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Transcript:
(00:00) हम एक गृणी को लेते हैं। मान लीजिए वो प्रश्न पूछती है मैं चाची हूं या मैं मां हूं या मैं मौसी हूं या मैं नानी हूं या मैं सिर्फ किसी की पत्नी हूं। इन सब में मैं कौन हूं? और जैसे ही वो जानने [संगीत] की कोशिश करेंगे कि मैं हूं कौन? कैसे जानू कि मैं हूं कौन? वही ज्ञान मेंसा है। आचार्य उदयन दुनिय [संगीत] के नशे में रहते थे। तो चुनौती देते हैं भगवान को और कहते हैं हे भगवान तुम जो इतने मदमस्त हो तुम्हें नहीं पता कि जब बौद्ध कहते हैं कि [संगीत] ईश्वर नाम की कोई सत्ता इस धरती पर नहीं है। मैं उदयनाचार्य अपने तर्कों से तुम्हारी सत्ता को [संगीत] इस धरती पर
(00:36) स्थापित करता हूं। तुम मुझे दर्शन नहीं दे रहे हो। बहुत ढेर सारे हमें सन्यासी दिखते हैं जो वेदांत से हैं। लेकिन मुझे ऐसा कोई योगी नहीं दिखता है जो बोले मैं न्याय का योगी हूं। जब वेदांतियों को भी न्याय की किसी बात का खंडन करना होता है तो न्याय के ही तर्क का वो सहारा लेते हैं। शंकराचार्य ने कहा कि ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या और हम जैसे न्यायिक फिर प्रश्न करते हैं शंकर से। न्याय दर्शन कहीं काम आ सकता है कि जो इंफॉर्मेशन मेरे तक आ रही है। मैं बता पाऊं वो इंफॉर्मेशन सही है या गलत है। पूरी वेस्टर्न मीडिया जान गई कि भारत में
(01:06) एक पार्टी बनी है जिसका नाम है कॉकरोच जनता पार्टी। पार्टी सीजेपी अब ये सही है कि गलत अब युवा कह रहे हैं कि हमें अधिकार है आलोचना करने का इस्तीफा दो इस्तीफा दो तो फिर हमें हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों की आलोचना करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए गौतम तो कहते हैं जो भी तुम्हारे तर्क से सत्य नहीं है उन सब की आलोचना करनी चाहिए उन सब सब पर रिफ्लेक्शन सब पर क्रिटिकल करना चाहिए। कैसे दो मनुष्य शास्त्रार्थ करता है और तीसरा नहीं होता है और वही दो तय कर लेता है कि तुम सही ज्ञान तक पहुंचे कि मैं हम जैसे लोग स्क्रीन नहीं देखते टीवी पे डिबेट न्याय
(01:52) दर्शन के पढ़ने के बाद लगता है यह सब बात कहां कर रहे हैं? ड्रग दो, ड्रग दो, ड्रग दो, ड्रग दो, ड्रग दो। तो मुझे यह निर्णय लेना है कि करियर ए चुनु कि करियर बी। ए के साथ दोस्ती निभाऊं या बी? मुझे दिल्ली में करियर बनाना चाहिए या मुंबई जाके बनाना चाहिए? क्या करेंगे आप? तो उसको कहा गया है पंचपाद सिद्धांत। [संगीत] अरविंद जी नमस्ते। नमस्ते नमस्ते। आपका सबसे पहले बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने अपने इतने व्यस्त जीवन से
(02:38) हमको समय दिया है। हमारी दर्शनों के प्रतीक हमारा प्रेम है और आप जिस तरह से पिछले विगत वर्षों में दर्शनों को विशेषकर न्याय दर्शन में अपना जीवन समर्पित किए हुए हैं। हमारी मतलब समझ लीजिए सौभाग्य है कि आज न्याय दर्शन को हम जनसामान्य के बीच में ले जा पाएंगे और मैं आश्वस्त हूं कि हम उसको आसान भी बना पाएंगे क्योंकि दर्शन पर हमने हाइपर क्वेस्ट पर बहुत पडकास्ट किए हैं। ज्यादातर विषय वेदांत के अराउंड रहता है। या तो द्वैत है, अद्वैत है। योग के विषय में भी लोग जानते ही हैं। थोड़ा बहुत तो इधर-उधर से पढ़ लेते हैं। लेकिन जो शत
(03:16) दर्शन की हमारी परंपरा है उसमें मुझे ऐसा लगता है न्याय दर्शन और वैशेषिक दर्शन इसकी चर्चा कहीं ना कहीं जनसामान्य के बीच कम है। एकेडमिया में तो होगी लेकिन ऐसे कोई इवेंट्स भी बहुत बड़े-बड़े मुझे होते नहीं दिखते हैं। आप बताइएगा तो मैं चाहता था कि न्याय पर एक अच्छा पॉडकास्ट एक अच्छा जहां पर हम इंट्रोड्यूस भी करा पाएं और जनसामान्य समझ पाए कि न्याय दर्शन क्यों आवश्यक है जीवन के लिए क्योंकि न्याय शब्द से हम सभी परिचित हैं। अभी हम टीम में भी जाकर सबसे पूछेंगे तो न्याय को लेकर सब बताएंगे जस्टिस या फिर न्याय मिलना चाहिए।
(03:51) ईश्वर न्यायकारी है। तो न्याय की जो अंडरस्टैंडिंग है वो हमारी जस्टिस तक सीमित है। तो क्या हमारा जो दर्शन है न्याय दर्शन वो जस्टिस कैसे देना चाहिए इस पर आधारित है? या न्याय दर्शन उससे ऊपर की चीज है तो आज हम इसी पर चर्चा करेंगे। सबसे पहले हम न्याय को समझने का प्रयास करेंगे। फिर वो परंपरा क्या है और कैसे हमारे जीवन को उन्नत कर सकती है। तो मेरा सौभाग्य है आप मैथमेटिशियन भी हैं तो और उसके बाद मुझे भी मैथमेटिक्स बहुत पसंद है। फिर आपने पूरी पीएचडी अपनी और विगत वर्ष न्याय दर्शन में ही दिए हैं। जगह-जगह पर आप व्याख्यान करते हैं। न्याय को
(04:28) पहुंचाते हैं, समझाते हैं। तो आज इसी से प्रारंभ करेंगे कि न्याय दर्शन है क्या? सबसे पहले हाइपर क्वेस्ट में मुझे आमंत्रित करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद और मुझे खुशी है कि हाइपर क्वेस्ट जिस क्वेस्ट पे है वो अपने आप में क्वेस्ट तो मुझे नहीं पता लेकिन क्वेस्ट इंपॉर्टेंट है क्योंकि कहा भी गया है कि क्वेस्ट इज मोरेंट देन द कॉन्क्वेस्ट। लोग जीवन में हमेशा समझते हैं कि हम जो हासिल करना चाहते हैं हासिल कर ले। उसके बाद क्या? क्वेस्ट कहता है कि नहीं जो हासिल किया वहीं तक नहीं खत्म होना है। उसकी जर्नी और आगे है। तो सबसे पहले आपने
(05:09) जो प्रश्न पूछा है इसको हम तीन चरणों में समझने की कोशिश करेंगे कि न्याय का अर्थ क्या है? न्याय का विषय वस्तु क्या है? और न्याय क्यों प्रासंगिक है? तो सबसे पहले हम शुरुआत करते हैं कि न्याय का अर्थ क्या है? देखिए न्याय जो है वो नी धातु से बना है। और नी का मतलब होता है टू लीड टू लीड टू व्हाट? तो टू लीड टू कंक्लूजन टू लीड टू अराइव एट राइट नॉलेज। तो पहला तो अर्थ ये है एक आपने कहा कि लोग समझते हैं न्याय का अर्थ कानून के दृष्टिकोण से कोर्ट और न्यायालय के दृष्टिकोण वो भी सही ही है। वहां भी मतलब जस्ट ही है। जस्ट किसका?
(05:50) राइट जस्ट। और राइट जस्ट कब होगा? जब सही ज्ञान होगा। उदाहरण के तौर पे कि कोई हत्यारा है या नहीं है? इस पे जब वाद और विवाद होगा, साक्ष्य रखे जाएंगे तो मकसद क्या है? जो हत्यारा है तो उसे सजा मिले और हत्यारा नहीं है तो उसे छोड़ दिया जाए। यानी ये तभी होगा जब राइट नॉलेज होगा। तो पहला तो सामान्य अर्थ यह समझ लेना चाहिए कि न्याय का अर्थ हां जस्टिस है लेकिन न्याय का अर्थ सही मायने में है सही ज्ञान। यानी सही समझ और सही कंक्लूजन। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो किसी ने सही कहा है कि न्याय निर्णय तक पहुंचना कैसे हम निर्णय तक पहुंचेंगे तो रीजन और
(06:32) आर्गुममेंट चाहिए ही चाहिए और उसके लिए तर्क हमें इसलिए न्याय का अर्थ है सही तर्क राइट रीजनिंग न्याय का एक अर्थ और भी है कि आप जब सही कंक्लूजन पे पहुंचना चाहते हैं कि जैसा मैंने अभी कहा कि दो इसके टूल है। एक का नाम है रीजनिंग और दूसरा का नाम है आर्गुमेंट। तो आप देखेंगे भी न्याय शास्त्र में ये बड़ी प्रमुखता से दी गई है। एक बात और थोड़ा सा हम दार्शनिक पक्ष इसमें लाते हैं। अगर हम दार्शनिक पक्ष लाएं तो दर्शन का मतलब बड़ा साफ है। एक कि उसमें मेटाफिजिक्स भी होनी चाहिए और एपिस्मोलॉजी भी होनी चाहिए। यानी तत्व ज्ञान भी हो और ज्ञान मीमांसा भी हो। अगर
(07:09) किसी भी दर्शन में अगर आप देखेंगे वेस्टर्न फिलॉसफी में भी तो तीन आयाम होते हैं। पहले को कहते हैं मेटाफिजिक्स या ऑनटोलॉजी। दूसरे को कहते हैं कि क्या जानना है और दूसरी बात कैसे जानना है यानी एपिस्टमोलॉजी और जानते हुए किस नैतिकता का पालन करना है यानी एक्जियोलॉजी। तो अगर न्याय दर्शन को आप देखेंगे तो इसमें दोनों ही तत्व प्रमुखता से है। इसमें तत्व ज्ञान भी है और ज्ञान भी है यानी एपिस्टमोलॉजी भी है। लेकिन इसमें एक खास बात क्या है कि इसकी जो ताकत है वो सिर्फ एपिस्टमोलॉजी नहीं है। इसकी मेथोडोलॉजी भी इसकी ताकत है। एक कहावत भी है कि जब वेदांतियों को
(07:49) भी न्याय की किसी बात का खंडन करना होता है तो न्याय के ही तर्क का वो सहारा लेते हैं। न्याय की ही मेथोलॉजी का वो सहारा लेते हैं। न्याय के ही वाद विवाद की जो श्रृंखला है उसका उपयोग करते हैं। क्यों? क्योंकि कंडीशंस एंड मेथड्स ऑफ ट्रू नॉलेज की बात अगर षट दर्शन में किसी ने विस्तार से और गंभीरता से की है तो वो न्यायिक दर्शन ने किया है। इसलिए इसका नाम तर्क का नियम है या हेतु विद्या भी है। लोग कहते हैं कि साइंस कॉजलिटी पे विश्वास करता है। जब आप न्याय दर्शन का अध्ययन करेंगे तो आपको पता चलेगा कि अरे साइंस ऑफ कॉजेस की पहली बार बात करने वाला और बड़ा ही
(08:27) सिस्टमैटिक तरीके से बात करने वाला कोई और नहीं महर्षि गौतम था। जैसे एक उदाहरण देता हूं। संस्कृत में एक कहावत है नियते अनेन इति न्याय। इसका अर्थ बड़ा साफ है कि दैट बाय व्हिच वन इज लीड टू कंक्लूजन। मुझे यहां आना चाहिए या नहीं आना चाहिए? भले मैंने तीन महीने का समय लिया। क्यों मैं इस कंक्लूजन पे पहुंचा और कैसे पहुंचा? कहीं मुझे जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए? कोई काम मुझे करना चाहिए या नहीं करना चाहिए? यह सब निर्णय आप लेते हैं और सुबह से ले शाम तक लेते हैं। लेकिन जब आप वही व्यक्ति जो बिल्कुल व्यवस्थित रूप से ये निर्णय लेता है तो न्यायिक हो जाता है और
(09:10) जो अव्यवस्थित रूप से लेता है तो कुछ सही होते हैं कुछ गलत होते हैं। न्याय कहते हैं कि जो भी करेंगे वो सही ही होगा। गलत का कोई स्थान नहीं है। ठीक उसी तरीके से गणित में दो ही चीज है। या तो सही या गलत। तो सामान्य स्तर पे ये आप कह सकते हैं कि वह न्याय वह है जिससे निष्कर्ष पे पहुंचा जाए। आप कहेंगे कि अच्छा इस निष्कर्ष का जीवन में क्या उपयोग है? तो आप कह सकते हैं वह जो व्यक्ति को सही मार्ग पर ले जाता हो और सब कुछ सही मार्ग पे ही जीवन जाया जाता है। तभी जीवन को आप जी सकते हैं। अगर कुमार्ग को लेंगे तो पतन निश्चित है। न्याय आपको उन दुखों से उन पतन से
(09:53) रोकता है। तो अगर जैसा आपने कहा कि न्याय लोग जस्टिस समझते हैं। वो भी गलत नहीं है। लेकिन न्याय का अर्थ केवल जस्टिस नहीं है। भारत की ज्ञान परंपरा में राइट नॉलेज है। ट्रू नॉलेज है। तो राइट जजमेंट भी है। वो राइट जजमेंट देते हैं। हम राइट नॉलेज करते हैं। तो कहा राइट जजमेंट कैसे देंगे आप? जब तक राइट नॉलेज नहीं होगा तब तक राइट जजमेंट नहीं कर पाएंगे। और राइट नॉलेज कब होगा? जब आप राइट रीजनिंग और राइट आर्गुमेंट और राइट एविडेंसेस को साक्ष्य में रखेंगे। तो न्याय का अर्थ एक और है जो विज्ञान के छात्रों को और गणित के छात्रों
(10:27) को ज्यादा अपील करता है। वो है अनविक्षी। अनविक्षी का मतलब होता है द साइंस ऑफ इंक्वायरी। जैसे पाश्चात्य सभ्यता में भी या पाश्चात्य दर्शन में एक शिक्षा दर्शन के बड़े अच्छे हुए हैं जॉन डेवी। तो उन्होंने पूछा कि अच्छा व्हाट इज द पर्पस ऑफ़ इंक्वायरी? आप इंक्वायरी इंक्वायरी इंक्वायरी इतनी बातें करते हैं। व्हाट इज द पर्पस ऑफ़ इंक्वायरी? तो उन्होंने कहा द पर्पस ऑफ़ इंक्वायरी इज टू इंक्वायर मोर। और बहुत खुशी हुई कि आपने अपने चैनल का नाम हाइपर क्वेस्ट रखा है। व्हाट इज द पर्पस ऑफ़ क्वेस्ट टू क्वेस्ट मोर? राइट? सो, साइंस ऑफ करेक्ट नॉलेज, साइंस ऑफ राइट
(11:08) रीजनिंग और और यह सब तक पहुंचने के लिए जिस विधा का नाम है उसको कहते हैं साइंस ऑफ सिलोजिज्म भी कहा है। और मैं तो कहता हूं पूरी दुनिया में तार्किक अनुमान की एक व्यवस्थित पद्धति अगर किसी ने दी, तो महर्षि गौतम और न्याय दर्शन ने दी है। दुर्भाग्य से हम अपने ही परंपरा के उस ज्ञान को नहीं जानते। तो यह हुआ न्याय का सामान्य अर्थ। एक जो खास बात है जो मुझे आज लगता है कि कम से कम विधि के क्षेत्र में यानी न्यायालय के क्षेत्र में कोर्ट में जो लोग भी काम करते हैं, चाहे वो न्यायाधीश हो या एक सामान्य लॉयर हो। उसे थ्यरी ऑफ़ डिबेट जरूर पढ़ना और समझना
(11:53) चाहिए। एक कमाल की परंपरा रही है थरी ऑफ डिबेट कैसे दो मनुष्य शास्त्रार्थ करता है और तीसरा नहीं होता है और वही दो तय कर लेता है कि तुम सही ज्ञान तक पहुंचे कि मैं तो ये थ्योरी ऑफ़ डिबेट की एक परंपरा है। जैसे कभी भारत में युद्ध के लिए एक बिल्कुल नीति बनाए गए थे और उन नीति का पालन किया जाता था। आज हम पढ़ते हैं जब थ्यरी ऑफ रिसर्च में तो हम शायद ही किसी विश्वविद्यालय में भारत के किस दार्शनिक ने किस चिंतक ने शोध कैसे किया जाए इस पर बात की जाए हम सब नाम लेते हैं कि उन लोगों ने हमें बताया कि शोध क्या है लेकिन ऐसा नहीं है। आप
(12:38) देखेंगे हम आगे बात करेंगे कि उद्देश्य लक्षणा और परीक्षा के रूप में शोध कैसे किया जाए वो भी इसका एक विषय वस्तु है। तब आप कहेंगे कि अच्छा केवल इसमें तर्क ज्ञान वाद विवाद संज्ञान निर्णय यही सब है नहीं इसमें तत्वज्ञान भी है और तत्व ज्ञान क्या है यही दर्शन कहता है कि ये सब किसके लिए तो कहता है निशयस को प्राप्त करने के लिए यानी लिबरेशन होने के लिए तो ये प्रश्न करता है किससे मुक्ति चाहिए तुम्हें किस लिए मुक्ति चाहिए और क्यों मुक्ति चाहिए तो कहते हैं सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति चाहिए सभी प्रकार के कुतर्कों से मुक्ति चाहिए मुझे सभी प्रकार के
(13:18) जो क्लेश है उससे मुक्ति चाहिए। इसीलिए इसको कहा गया है तो सवाल है कि कैसे होगा? तो कहा है न्याय दर्शन ने कि निश्रेयस की प्राप्ति सच्चे ज्ञान से संभव है। किसका सच्चा ज्ञान? तो महर्षि गौतम ने कहा है अपने प्रथम सूत्र में 16 पदार्थों के ज्ञान से। हम बात करेंगे उसकी चर्चा। अंत में इसी बात को जब हम पश्चिमी सभ्यता को समझाने की कोशिश करते हैं तो कहते हैं लिबरेशन थ्रू राइट नॉलेज ऑफ द 16 कैटेगरीज। राइट? ये तो हुआ न्याय के विषय वस्तु। अब हम थोड़ी सी बात करते हैं इसकी प्रासंगिकता पे। देखिए किस मनुष्य को समाज का ऐसा कौन व्यक्ति है
(14:00) जिसे निर्णय नहीं लेना होता है। सुबह उठने से ले शाम को बिस्तर पर जाने तक। राइट? और कौन ऐसा व्यक्ति है जो ज्ञानी नहीं होना चाहता है? आज आप देखिए कोई भी विद्यालय आप चलाइए और विद्यालय चलने लगता है। यानी गरीब से गरीब व्यक्ति भी यह समझ रखता है कि मेरा बच्चा जब विद्यालय में जाएगा, महाविद्यालय में जाएगा, विश्वविद्यालय में जाएगा तो ज्ञानी हो जाएगा। वो ज्ञान होगा और ज्ञान होगा तो उसके जीवन बदल जाएंगे। राइट? तो राइट नॉलेज किसको नहीं चाहिए? अब राइट नॉलेज किससे होगा? तो राइट लॉजिक से होगा। और राइट लॉजिक के लिए क्या आना चाहिए वो?
(14:39) राइट मेथड आना चाहिए ताकि आप राइट कंक्लूजन पे पहुंच सके। और ये सब किसके लिए? नहीं। पश्चमी सभ्यता कहता है कि ज्ञान नॉलेज फॉर द सेक ऑफ नॉलेज। इसलिए वो फिलोसफी कहते हैं। हम फिलोसफी नहीं कहते। हम दर्शन कहते हैं। कभी हम इस पर बात करेंगे कि दोनों पे क्या फर्क है। तो अंत में कहता है ये सब किसके लिए? तो कहता है हाईएस्ट गुड के लिए। यानी निश्रेयस को प्राप्त करने के लिए। अरिस्टोटल से भी कभी पूछा गया था। व्हाई आई शुड बी गुड? बी गुड फॉर द सेक ऑफ़ गुडनेस। तो हाईएस्ट गुड की बात करता है। सिर्फ गुड की बात नहीं करता। कहता है अच्छा हाईएस्ट गुड कैसे प्राप्त
(15:13) करेंगे? तो कहता है हाईएस्ट गुड इज अटेनेबल ओनली थ्रू हाईएस्ट नॉलेज। तो बताइए ऐसा कोई व्यक्ति है जो जिसे ज्ञान नहीं चाहिए। और हमारी परंपरा में जिसके पास ज्ञान नहीं है उसे हम मूर्ख कहते हैं। और कोई भी मूर्ख नहीं कहलाना चाहता है। चाहे वो राजा हो या रंक। राइट? सो उच्चतम अच्छाई केवल उच्चतम ज्ञान के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है और अगर यह सत्य है तो इसकी प्रासंगिकता थी है और सतह बनी रहेगी। तो मैं आपके इस प्रश्न के जवाब में बस इतना ही कहना चाहूंगा। अरविंद जी इससे पहले कि हम आगे बढ़े और न्याय दर्शन को और गहराई से समझे। दो-तीन चीज मैं क्लियर
(15:57) करना चाहूंगा। सो दैट कि अभी और इसको हम काफी आप इजी तो कर रहे हैं लेकिन कुछ-कुछ शब्द होते हैं जो अचानक से आते हैं तो लोगों को लगता है कि क्या है? तो उस पर जाने से पहले तो मैं यह जानना चाहूंगा कि आपने तो एज अ नया एक मतलब आप कैसे डिसाइड किया कि हाइपर क्वेस्ट पे आना है। तीन महीने आपको लगे। तो अब हुआ क्या कि मुझे लगा कि जो भी लोग जैसे आप जैसे लोग यंग इंजीनियर एक बड़ा ही ब्राइट फ्यूचर करियर उन सबको आप साथ में रखते हैं और भारत के लोगों की भारत की परंपरा का एहसास कराने के लिए एक तरीके से उस पथ पे चल रहे हैं जो पथ बहुत
(16:38) मुश्किल है। लेकिन यह जरूर है कि यह पथ जिस तरह की लिबरेशन आपको देगा वो हो सकता है कि Mercedes पे चलने के बाद ना दे BMW के नहीं दे तो मुझे लगता है कि जो लोग इस तरह के काम निस्वार्थ भाव से कर रहे हैं जीवन तो चलना ही है। तो हम जैसे लोग जिनको इन्हीं का अध्ययन करने के बाद आज एक प्रोफेसर के पद पे है या भारत में एक प्रतिष्ठा है या लोग कहते हैं कि फलाने को बुलाओ सुनना चाहते हैं तो क्यों ना उनकी मदद की जाए। तो आप जैसे कोई भी युवा हो मुझे अगर चाहे गणित को लेके विज्ञान को लेके या दर्शन के किसी आयाम को लेके और खासकर न्याय दर्शन को ले करें तो मैं तो
(17:18) मुझे लगता है कि मैं उनकी मदद नहीं कर रहा हूं। वो मेरी मदद कर रहा है। तो हाइपर क्वेस्ट अभी मेरी मदद की कि मेरी जो जर्नी रही है 30 वर्षों से लगभग मैं अध्यापक हूं शिक्षा में [नाक से की जाने वाली आवाज़] और जब भी दर्शन की बात छात्रों के साथ करता हूं तो उन सबका निचोड़ दुनिया के सामने रखने के लिए आपने मुझे एक मौका दिया। तो मैं आपकी मदद नहीं कर रहा हूं। आप मुझे मदद कर रहे हैं और जो मुझे मदद करता है तो मानव धर्म तो यही है कि उसकी मदद आप करें। तो जब हाइपर क्वेस्ट के तरफ से मेल आया या फोन आए या आपके एक साथी ने युवा साथी ने लगातार फॉलो अप लिया
(18:02) फॉलो अप लिया तो मैं कभी कहीं होता था कभी कहीं होता था। अंत मुझे लगा कि नहीं अब बहुत हो गया कि अब निश्चित रूप से करना चाहिए और फिर हमने ये निर्णय लिया कि एक सैटरडे हाइपरक्वेस्ट के नाम हो। नहीं बहुत-बहुत हम लोग आभारी हैं। इससे पहले कि हम थोड़ा सा और इस परंपरा को एक्सप्लोर करें। जैसे बहुत ढेर सारे वर्ड्स हो गए हैं। जैसे तीन तो मुख्य वर्ड्स हैं। जैसे आपने बोला कि किसी भी फिलॉसफी को या भारतीय दर्शन को तीन चीजों पे बात होती है। एक तो ऑनटोलॉजी पर होती है। एक एपिस्टमोलॉजी पर होती है और एक तीसरा एक्सियोलॉजी। तीनों को अगर 10 12 साल के
(18:35) बच्चे को बताना हो क्योंकि हमारे दर्शक मैं नहीं चाहता हूं कि उनको ये लगे कि ये बातें जो है बहुत बड़े लोगों के लिए टीचर्स के लिए है सन्यासियों के लिए या कुछ साइंटिस्ट रिस्चरर्स के लिए ऐसा न्याय दर्शन उनको ना लगे। उनको यह लगे कि हां अगर मैं 40 साल की गणी भी हूं या मैं एक दुकानदार भी हूं तब भी न्याय मेरे लिए उतना ही इंपॉर्टेंट है जितना मेरे लिए वेदांत इंपॉर्टेंट है। तो ये तीन चीज पहले उनकी भाषा में आप बता दीजिए फिर हम आगे बढ़ते हैं। देखिए उनकी भाषा बड़ी साफ सी बात है। हम एक गृणी को लेते हैं या 10 12 14 साल के बाद जिसने सोचना शुरू कर दिया
(19:09) है। एक बात तो बड़ी साफ है कि न्याय उसी को ज्ञान दिया जाए जिसको सोचना आता है या जो सोचने के राह पे अग्रसर हो चुका है। अगर सोचना नहीं आता है तो फिर नहीं होगा। मान लीजिए जो प्रश्न पूछती है कि हां मैं किसी की पत्नी हूं। पहले मैं किसी की बेटी थी। आज मैं किसी की पत्नी हूं। कल किसी की मां हूंगी। फिर दादी भी होंगी। फिर चाची भी, बुआ भी, मामी भी बहुत कुछ होगी। लेकिन ये मैं कौन है? अल्टीमेटली मैं चाची हूं या मैं मां हूं या मैं मौसी हूं या मैं नानी हूं या मैं सिर्फ किसी की पत्नी हूं या मैं सिर्फ एक औरत हूं। इन सब में मैं कौन हूं? तो जैसे ही वो पूछेगा आखिर
(19:54) उस मैं को जैसे ही ढूंढे तो यही तत्व ज्ञान है। आखिर मैं हूं कौन? जिसको मैं अपना पति कहती हूं वो पति कौन है? विशाल किसी के पति हैं। विशाल जी मान लीजिए मेरे पति हैं। तो इनका नाम तो विशाल है। और विशाल अगर पति है तो विशाल है कौन? ये शरीर जो विशाल मेरे साथ रहता है या वो मन विशाल का जो मेरे मन के साथ रहता है। या कुछ और जो मेरे साथ है तो केवल शरीर है मन है या कुछ और? तो जैसे ही वो कुछ और करेगा वो तत्व ज्ञान की ओर ले जाएगा। और जैसे ही वो जानने की कोशिश करेंगे कि मैं हूं कौन कैसे जानू कि मैं हूं कौन वही ज्ञान में है किन विधियों
(20:42) से जानू कि मैं कौन हूं वो एपिस्टमोलॉजी है वो एपिस्टमोलॉजी है मैं कौन हूं वो ऑनटोलॉजी है ऑनटोलॉजी है और कैसे मैं जानू किस विधि से जानू किस तर्क से जानू किस आर्गुमेंट से जानू किस सिलॉलजिज्म से मैं जानू वही तो ज्ञान मीमांसा है मतलब टूल्स एपिस्टेमोलॉजी जी [गला साफ़ करने की आवाज़] बिल्कुल और तीसरा ये सब जानते हुए ऐसा ना हो कि मैं कोई अनैतिक कार्य करता हूं। अनैतिक होने का मतलब यहां इमोरल नहीं है। ऐसा ना हो कि मैं मान लीजिए मैं अपने पति को जानना चाहती हूं और अब मैं अपने को भी जानना चाहती हूं। तो कुछ ऐसा ना कह दूं कि वो
(21:16) हर्ट हो जाए। क्योंकि वो शायद उसके लिए प्रश्न मायने नहीं है। उसके लिए सिर्फ इतने महत्वपूर्ण है कि तुम मेरी पत्नी हो और मैं तुम्हारा पति हूं। तो हम ऐसा ना कह दें आपको कि वह अनैतिक रूप से आपको हर्ट कर जाए तो फिर रिश्ते में तरह आ जाएगी। तो रिश्ता भी बचाना है। लेकिन उन सबको बचाते हुए मुझे ये भी जानना है कि मैं कौन हूं। ये एक्सियोलॉजी है। ये एक्सियोलॉजी है। ऐसा तो नैतिकता का मतलब सिर्फ ये गलत और सही नहीं है। किसी को कष्ट ना देना, किसी को हर्ट ना करना या कोई जो आज तक मुझे अपना समझ रहा है वो गैर ना समझ ले। वो भी नैतिकता का ही पार्ट है। तो यदि एक
(21:58) गणी न्याय दर्शन को समझने का प्रयास करती है तो उसको समझ में आ सकता है कि बिल्कुल आएगा क्योंकि बड़े ही सामान्य उदाहरणों के साथ ये समझाया गया है। अब देखिए क्यों मैंने गृहणी का एग्जांपल दिया क्योंकि न्याय में जो सबसे अच्छा उदाहरण दिया गया है जहांजहां धुआ वहां वहां आग और गणी का वक्त आपको पता है तो आग को देख रहे हैं। आग छक लगाती है तभी भी धुआ उठते हुए देखती है। आप कहेंगे गैस में धुआ का है। है ऐसा कहीं नहीं है कि नहीं है? तो अब इससे सामान्य उदाहरण क्या होगा? और इसी उदाहरण से सभी तर्क को स्थापित कर दिए गए। ईश्वर भी है कि नहीं है स्थापित कर दिए गए।
(22:45) ज्ञान है या नहीं आपके पास ये भी स्थापित कर दिए गए। तो निश्चित रूप से कोई देखिए जैसा कि नाम तो आपका क्वेस्ट है बस जानने की जिज्ञासा तो हो जानने की जिज्ञासा हो जब जानने की जिज्ञासा करते हैं। अब आपने कल हमारी कभी हमारी आपकी मुलाकात नहीं हुई और वर्चुअल हुई लेकिन 10 और 15 मिनट में आपने एक वाक्य कहा जो मेरे लिए और एक चुनौती खड़ी कर दी। तो मैंने कहा ओ यह व्यक्ति और मुझसे अपेक्षा करता है इसलिए मैं अपने विचारों को और सुदृढ़ करूं जरा और इसीलिए हमने ये प्रश्न वैसे भी उत्तर दिए जा सकते थे लेकिन जितने आप व्यवस्थित रूप से न्याय व्यवस्था का नाम है
(23:26) अरेंजमेंट का नाम है और वो मैं ही नहीं हूं तो फिर क्या फायदा तो आपने जैसे कहा कि कल की बातचीत मजेदार होने वाली है तो ये सिर्फ मुझे खुश करने के लिए नहीं था एक चुनौती भी है उस खुशी के साथ कि अब आपको और अध्ययन करना है और जानना है ताकि आप एक 10 से 12 साल के व्यक्ति को भी और एक 50 साल के व्यक्ति को भी समझा पाए कि देखिए क्यों न्याय दर्शन न्याय लॉजिक या न्याय एपिस्टमोलॉजी आपको समझना चाहिए। अरविंद जी आपने अभी ईश्वर तत्व की चर्चा की कि न्याय दर्शन से केवल राइट नॉलेज राइट नॉलेज ही हो गई तो ईश्वर तक तो पहुंचना ही है। लेकिन जब भी ईश्वर की बात होती है हमने
(24:09) बड़े-बड़े हमारे यहां जितने भी सन्यासी हुए, संत हुए या फिर योगी हुए तो कहीं ना कहीं उन्होंने सनातन धर्म की बात की है। लेकिन उनका पक्ष ज्यादातर ईश्वर पर रहा है और चिंतन में फिर वेदांत कहीं ना कहीं आ जाते हैं। जैसे स्वामी विवेकानंद हैं या फिर अगर आप योग की परंपरा देखेंगे तो बहुत ढेर सारे योग हमारे बीच में क्रिया योग है, अष्टांग योग है। तो योग में लोग आगे बढ़ते हैं। मेडिटेशन करते हैं। ईश्वर को जानना नाम जप करते हैं। मंत्रों का उच्चारण करते हैं। वेदांत में जाते हैं तो जगत ब्रह्म का संबंध देखने का प्रयास करते हैं। फिर वो अहम ब्रह्मास्म तत्व मसी पर
(24:46) चिंतन होता है। अंत में फिर वो ध्यान आदि ज्ञान मार्ग पर आगे बढ़ते हैं। बहुत ढेर सारे हमें सन्यासी दिखते हैं जो वेदांत से हैं। अभी मैं भी वेदांत से थोड़ा जुड़ा हूं तो मुझे भी दिखता है कि एक परंपरा है। जी बहुत से हमें अलग-अलग जैसे हमारे योगी आदित्यनाथ जी हैं तो नाथ परंपरा से हैं। खैर वो तो जो दर्शन की भी कई परंपराएं हैं। लेकिन मुझे ऐसा कोई योगी नहीं दिखता है जो बोले मैं न्याय का योगी हूं या न्याय का सन्यासी हूं। तो क्या न्याय में ईश्वर तत्व को अलग ही करके केवल लौकिक विषय है कि ईश्वर पे चिंतन कितना है? क्योंकि अगर एक व्यक्ति
(25:21) न्याय दर्शन में यदि ईश्वर से जुड़ता है तो वो ज्यादा जनसामान्य में आ जाता है। क्योंकि सबकी श्रद्धा ईश्वर में ज्यादा है। सभी साइंटिस्ट तो बनना नहीं चाहते। तो क्या न्याय दर्शन में ईश्वर को लेकर क्या है? देखिए ये प्रश्न बहुत ही गंभीर है। क्यों मैं कह रहा हूं कि गंभीर है? क्योंकि मुझ जैसे व्यक्ति हमेशा कहता रहा है भारत की भूमि तार्किक भूमि है। तर्क की भूमि है। और निश्चित रूप से मैं बिना किसी हिचकिचाहट के आपको कह रहा हूं कि तर्क की ही ये भूमि है। और खासकर अगर न्याय दर्शन की परंपरा से कोई भी व्यक्ति आएगा तो कहेगा ही ये तर्क की भूमि है। तो लेकिन
(25:58) जैसा कि मैंने कहा तर्क किसके लिए? तो सही ज्ञान के लिए। और सही ज्ञान ही तो मोक्ष को ले जाता है। ईश्वर किसके लिए आपको चाहिए? मोक्ष के लिए चाहिए ना। नहीं जैसे योग का आपने नाम लिया। योग का अर्थ ही है यूनियन। जुड़ जाना। किससे जुड़ना चाहते हैं आप? किससे? तो ईश्वर से आप जुड़ना चाहते हैं। ईश्वर से क्यों जुड़ना चाहते हैं? ईश्वर में जब विलीन हो जाएंगे तो सारे दुखों का हो जाएगा। अब तो वेदांत अब जैसा कि आपने कहा आप तो खुद उसके विद्यार्थी हैं कि ब्रह्म और जगत के संबंध को समझ में आता है और उसी ईश्वर को परिभाषित करते हुए शंकराचार्य ने
(26:35) कहा कि ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या नहीं ब्रह्म एक मात्र सत्य है और हम जैसे न्यायिक फिर प्रश्न करते हैं शंकर से आचार्य शंकर से भी हम प्रश्न करते हैं और मैं तो सोचता हूं कि किसी जन्म में किसी रूप से आचार्य शंकर से मेरा हो साक्षात तो मैं प्रश्न पूछता हूं उनसे किसका ब्रह्म? शंकर का ब्रह्म या अरविंद का ब्रह्म। अरविंद को जिस ब्रह्म को जानना है वो किसका ब्रह्म? अगर वो कहते हैं सबका ब्रह्म तो तो ठीक है। लेकिन अगर शंकर का ब्रह्म और अरविंद का ब्रह्म। फिर क्या है? दोनों ब्रह्म एक है या दोनों अलग है। नहीं। कभी हम [नाक से की जाने वाली आवाज़]
(27:12) चर्चा करेंगे कि जो चार धाम बनाए गए और चारों में जिसका आपने नाम लिया श्रृंगड़ी जाते वक्त उस पे एक चिंतन करने का मुझे मौका मिला जहां वो कहते हैं हम ब्रह्मास्म तत्व मसी या जब वो कहते हैं प्रज्ञानम ब्रह्मम देखिए न्याय की है धारणा वो प्रज्ञा को ही ब्रह्म मान रहे हैं वो विज्ञान को अब वही हम कह रहे हैं ना किसी भी दर्शन को उठाइए न्याय का बीज ना मिले तो ऐसा हो ही नहीं सकता है। ठीक? अब सवाल उठता है तो निश्चित रूप से महर्षि गौतम के अगर सूत्र को प्रथम सूत्र को देखेंगे या 528 सूत्र को देखेंगे तो जिस तरह से आज का समाज या आज की दुनिया
(27:59) ईश्वर को समझती है वैसा ईश्वर तो नहीं है। देखिए ईश्वर की एक अवधारणा नहीं है। ईश्वर का जो स्वरूप भारतीय समझते हैं, ईश्वर का वही स्वरूप पश्चिमी सभ्यता नहीं समझता है। ये अरब की सभ्यता समझ ही नहीं सकता है। क्यों? क्योंकि उसके लिए ईश्वर कुछ और है और हमारे लिए कुछ ईश्वर कुछ और है। तो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि ईश्वर तत्व न्याय दर्शन में है नहीं। मैं एक आचार्य का नाम लेना चाहूंगा। उनका नाम है उदयनाचार्य और उनसे संबंधित पहले एक छोटी सी स्टोरी आपसे शेयर करता हूं और फिर हम ईश्वर क्या है और कैसे है? न्याय ने कहा है उस पर
(28:40) चर्चा करेंगे। हुआ यू कि आचार्य उदयन जिसको हम लोग श में उदयनाचार्य कहते हैं जैसे आचार्य शंकर को शंकराचार्य रहते थे तो उदयनाचार्य बहुत ही मस्त मौला बेफिक्र और हमेशा कहते हैं ना एक कहावत है कि जिसे ज्ञान का नशा है उसे जिंदगी में किसी और नशे की जरूरत नहीं होती है तो न्याय के नशे में रहते थे वो फिर अंत में एक दिन इच्छा हुई कि सब लोग तीर्थटन करने चलते हैं चलो हम भी भगवान भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने चलते हैं। तो पूरब मिथिला पूरब और मिथिला और जगन्नाथ एक ही पुराने क्षेत्र का पार्ट है। पता ही है कि आज का जो बिहार बंगाल असम उड़ीसा सब
(29:22) बंगाल में वो अपने कुछ शिष्यों के साथ चलते हैं और बाकी शिष्यों को कहते हैं तुम लोग ये चिंतन मनन करके रखना। इनको मैं रास्ते में पढ़ा दूंगा और आते ही फिर इस पे हम चर्चा करेंगे। शार्प शार्प उनको और किसी चीज से मतलब नहीं है भोजन मिलता है या नहीं मिलता है घर में खाने के लिए है या नहीं है कुछ नहीं चल देते हैं वहां पहुंचतेपहुंचते रात के 12:00 बज जाते हैं तो आपको पता है हमारी एक परंपरा है और मंदिरों की भी अपनी एक परंपरा है जिसका निर्वाह करते हैं क्योंकि उनकी अपनी मान्यताएं हैं और लॉर्ड जगन्नाथ के बारे में तो कहा जाता है कि गॉड परसोनिफाइड
(30:01) अगर इस धरती पर कोई है तो जगन्नाथ है यह उपाधि ना राम को मिली ना कृष्ण को। खैर कभी और मौका मिलेगा तो हम इस पर बात करेंगे कि गड पॉसिफाइड का अर्थ क्या है। लेकिन अभी तक के लिए इतना ही। वहां पहुंचने के बाद वो कहते हैं कि पंडो से कि पट खोलो भगवान का दर्शन करेंगे और तुरंत मुझे लौटना है क्योंकि मेरे छात्र वहां प्रतीक्षा कर रहे हैं। मुझे उनको न्याय पढ़ाना है। पंडित कहते हैं कि नहीं ये तो नहीं होगा। भगवान तो सो रहे हैं। अब आपको सुबह तक प्रतीक्षा करनी होगी। तभी जब पट खुलेगा तब भगवान के दर्शन होंगे। तो एक तरह से वो चुनौती देते हैं
(30:42) भगवान को और कहते हैं हे भगवान तुम जो इतने मदमस्त हो तुम्हें नहीं पता कि जब बौद्ध कहते हैं कि ईश्वर नाम की कोई सत्ता इस धरती पे नहीं है। मैं उदयनाचार्य अपने तर्कों से तुम्हारी सत्ता को इस धरती पे स्थापित करता हूं और तुम मुझे दर्शन नहीं दे रहे हो। और कहते हैं कि ऐसा कहते ही पट अपने आप खुलता है और भगवान विराट रूप में आचार्य उदयन को दर्शन देते हैं। इसका एक प्रमाण है। आचार्य उदयन के गांव आज भी आप जाएंगे तो वहां एक छोटा सा शिवालय का मंदिर है। लोग एक लोटा जल शिवलिंग पे चढ़ाते हैं और
(31:29) उसी का आधा पानी आचार्य उदयन पे भी चढ़ाते हैं। आज भी आज भी मैं यह कहना चाहता हूं कि निश्चित रूप से प्रारंभिक अगर आप पढ़ेंगे न्यायशास्त्र तो नहीं है लेकिन आचार्य उदयन ने तब एक पुस्तक लिखी अन्याय कुषांजलि और वो पूरा का पूरा पुस्तक तर्कों के माध्यम से ईश्वर सिद्धि पे ही है। लेकिन अगर गणित का छात्र हूं तो मुझसे आप पूछेंगे तो न्याय के 528 सूत्रों में कहीं है नहीं। ईश्वर नहीं है लेकिन इसका मतलब चेतना नहीं है ऐसा नहीं है। इसका मतलब ये नहीं है कि अल्टीमेट सत्ता नहीं है ऐसा नहीं है।
(32:13) लेकिन जिसको आप ईश्वर समझते हैं जो सामान्य व्यक्ति जिसको ईश्वर समझते है उसका वर्णन नहीं है। और इसीलिए हम जैसे लोग बड़ा साफ कहते हैं महर्षि गौतम के शरण में जाने के बाद कि महर्षि गौतम ने कहा है 16 पदार्थों के तार्किक तत्व ज्ञान से मनुष्य मुक्त हो सकता है। उस ब्रह्म चेतना को प्राप्त कर सकता है। प्रारंभिक अगर आप देखेंगे 16 पदार्थों में उसमें ईश्वर उस रूप में तो नहीं है जिस रूप में सामान्य व्यक्ति समझता है लेकिन अगर उधनाचार्य के न्याय कोषमांजाली को पढ़े और आप देखें कि ईश्वर सिद्धि कैसे की गई है तर्कों के माध्यम से तो मैं सबको
(32:50) कहूंगा कि जरूर आप उसे पढ़े और समझने की कोशिश करें और कभी हाइपरक्वेस्ट मुझे मौका दे तो इस पर भी हम बात करेंगे। जी तो अरविंद जी आपके माध्यम से आचार्य उद्यान जैसे एक आचार्य के बारे में पता चला। अब इसे हम अनफॉर्चूनेट कहें या दुर्भाग्य कहें कि बहुत ढेर सारे न्याय के जो आचार्य हैं उनके विषय में हम जनसामान्य को नहीं पता है। इनफैक्ट हम महर्षि पतंजलि के बारे में जानते हैं। वो भी मुझे लग रहा है बाबा रामदेव की के कारण महर्षि पतंजलि को भी लोग जानने लगे हैं। या फिर वेदांत में अगर हम ऐसे भी कहें तो आदि शंकराचार्य जी बहुत बड़ा नाम है। तो उनके विषय में भी
(33:26) लोग जानते हैं और फिर उनके इतने स्त्रोत्र हैं तो उसका भी पाठ होता है। तो आदि शंकराचार्य के विषय में भी लोग जानते हैं। फिर लोग जैसे जैसे आर्य समाज है तो दयानंद सरस्वती जी के बारे में जानते हैं। तो जो संस्थाएं हैं कहीं ना कहीं कुछ गुरु परंपरा को लेकर आगे बढ़ती हैं। बट ऐसी न्याय की तो कोई हमें संस्था इस जैसी आर्य समाज जैसी या फिर वेदांत की ही सोसाइटीज हैं। ऐसी तो कोई दिखती नहीं है। ऐसे में महर्षि गौतम की चर्चा नहीं हो पाती है। और आप की जर्नी ही वहीं से शुरू हुई जब न्यायाधी गौतम आपने बुक को देखी। तो आप क्या उनके विषय में भी पढ़ें? तो हम
(33:59) चाहेंगे कि थोड़ा समय हम उनके विषय में भी जानने का प्रयास करें कि उनको क्या हुआ और वो इस दिशा में आगे बढ़े और मुझे जहां तक पता है कि महर्षि गौतम काफी ये न्याय दर्शन जो है काफी प्राचीन दर्शन है। तो उनके विषय में कुछ बताइए जिससे हम उनके ग्रंथ में फिर आगे बढ़कर कुछ मेथड्स को एनालाइज कर पाए। जी बहुत अच्छा प्रश्न है आपका। देखिए जो लोग मैंने शुरू में भी कहा था और फिर कह रहा हूं। जो लोग दार्शनिक परंपरा से आते हैं कि भारतीय दर्शन को पढ़ते हैं वो तो जानते हैं कि न्याय महर्षि गौतम के द्वारा दिया गया या वैशेषिक महर्षि कणाद के
(34:35) द्वारा दिया गया या सांख्य महर्षि कपिल के द्वारा दिया गया या जैसा कि अभी आपने बताया कि योग महर्षि पतंजलि के द्वारा दिया गया या मीमांसा जो जैमिनी महर्षि के द्वारा दिया गया या वेदांत में आपने शंकराचार्य का नाम लिया लेकिन नब्क भी हैं रामानुजाचार्य भी हैं कई परंपरा माधवाचार्य उसमें भी अपनी परंपरा है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] देखिए दो बातें एक तो [गला साफ़ करने की आवाज़] यह बिल्कुल सैद्धांतिक मामला था इसलिए वो परंपरा नहीं दिखती है। लेकिन मैं थोड़ा सा आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा जब महर्षि गौतम थे। महर्षि गौतम के बारे में दो धारणाएं हैं।
(35:10) एक कि वो मिथिला से थे और मिथिला की भूमि पे उन्होंने न्याय दर्शन को जन्म दिया। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि वो दक्षिण भारतीय थे और आतेआते उन्होंने मिथिला को अपना कर्मभूमि बनाया और वो शुरू किया। तो अब क्यों नहीं है उसके पीछे मैंने बताया कि ये अगर आप हिस्ट्री के पॉइंट ऑफ व्यू से देखेंगे तो हम जैसे लोग ऐसा मानते हैं कि ये सबसे प्राचीन दर्शन है तो निश्चित रूप से और अगर वेदांत को आप देखेंगे तो 1000 साल पहले तक है उनका मिलता है कि उनके लोग थे और अभी भी देखने को मिलता है कि मठ है और ऐसे है खैर तो महर्षि गौतम के बारे में दुर्भाग्य से
(35:52) उनके निजी जीवन के बारे में बहुत कुछ नहीं मिलता है क्योंकि इतने पुराने हैं कि उस तरह से उनके जीवन के बारे में नहीं लिखा गया। लेकिन महर्षि में एक काम किया कि उन्होंने न्याय सूत्र लिखे जिसको हम न्याय सूत्र कहते हैं और न्याय सूत्र जैसा कि मैंने शुरू में बताया था कि इसमें टोटल पांच अध्याय हैं और 10 अनिकाएं हैं और 528 सूत्र तो महर्षि गौतम ने जो पहला सूत्र लिखा और उसी सूत्र को माध्यम बनाते हुए तो एक परंपरा है जो लोग न्याय को पढ़ते हैं आज भी खास खासकर विश्वविद्यालयों में वो जानते हैं कि सबसे पहले किसी चीज का सूत्र लिखा जाता है। गणित में भी ऐसा ही होता
(36:34) है। उसके बाद उस पे भाष्य लिखा गया जैसे वात्स ने भाष्य लिखा। फिर उसप एक टीका लिखी जाती है जिसको कमेंट्री कहते हैं। फिर तात्पर्य टीका लिखी जाती है और एक्सप्लेनेशन के साथ उसकी लिखी जाती है। और इस तरीके से एक लंबी परंपरा है। और अगर साहित्य के विचार से आप उससे पूछेंगे तो आज भी जितना साहित्य इस रूप में न्याय दर्शन के पास है वो किसी के पास नहीं है। सही में सही में मेरे लिए भी एक शौकी है क्योंकि सही न्याय के बहुत ढेर सारे ग्रंथों को मैं नहीं जानता हूं और आपके किसी भी श्रोता का इसमें हो तो मैं एक दिन केवल उस परंपरा पे ही बात करूंगा कि किस तरीके से
(37:16) और इसीलिए इसको सिस्टम कहना थोड़ा हम जैसे लोगों के लिए प्रॉब्लममेटिक रहता है। सिस्टम जैसे कह देते हैं तो क्लोज्ड कहते हैं ना न्याय की परंपरा कभी क्लोज्ड रही नहीं कि जो लिख दिया महर्षि गौतम ने लिख दिया नहीं उस पे टीका भाष्य हुए टीका हुई टिप्पण हुई तात्पर्य टीका हुआ और बढ़ते चले गए तो ये बात ठीक है इनके परंपरा के बहुत सारे लोगों को नहीं जानते हैं लेकिन अलग-अलग संस्कृतियों में लोग इनका नाम जानते हैं जैसे अगर न्याय सूत्र का जो पहला भाष्य लिखा वात्स ने लिखा उसके बाद और बहुत सारे लोगों ने लिखा जैसे अंत में अभी जी अब हम लोगों ने उदयनाचार्य का नाम
(37:52) लिया। उससे पहले बहुत सारे लोग हुए जैसे कश्मीर की परंपरा में जब न्याय था तो जयंत भट्ट का न्याय मंजरी है। इसी तरीके से आप देखेंगे नव न्याय की भी परंपरा में एक श्रंखला है पुस्तकों की। तो अलग से हम उस पर चर्चा कर सकते हैं। तो ऐसा नहीं है जो लोग उस परंपरा का अध्ययन कर वो बड़ी सीधी सी बात है कि अगर मैं गणित का विद्यार्थी हूं तो मुझसे आप पूछेंगे अच्छा रियल एनालिसिस से कौन-कौन किताबें हैं तो मैं बता पाऊंगा। अब जिसने रियल एनालिसिस का नाम ही नहीं सुना तो वो आपको कुछ नहीं बता पाएगा। या अगर मान लीजिए हम कहे हाइड्रोस्टैटिस्टिक्स में
(38:27) क्या किताबें हैं तो मैं बता सकता हूं जो पढ़ा है। नहीं ये होता है। ये कोई बड़ी बात नहीं है। क्योंकि ये सीधे-सीधे जीवन से है नहीं कि जन सामान्य इसको पढ़े और समझे। अब अगर तर्क न्याय के तर्क तो फिर भी समझे जा सकते हैं। अगर हम नव न्याय के तर्क पढ़ेंगे तो इतने हाईएस्ट लेवल के हैं कि आप तंग रह जाएंगे। इतने हाईएस्ट लेवल पे हैं। तंग रह जाएंगे कि उसके किसी एक पे 50 से 60 पेज लिख देंगे तो यूनिवर्सिटी ऑफ़ हवाई अमेरिका जैसे विश्वविद्यालय आपको उसमें पीएचडी अवार्ड कर देगा। मैंने एक देखी है यूनिवर्सिटी ऑफ़ हवाई अमेरिका की एक पीएचडी
(39:00) थीसिस एक महिला है जिन्होंने क्या मात्र 56 पेज की है। तो क्या व्याख्या करते, कैसे आप व्याख्या करते? इन चीजों पर निर्भर है। अब रही बात कि तो जो लोग जानते हैं तो अगर प्रथम सूत्र को देखेंगे है ना जिससे कम से कम हमें पता चलेगा कि अगला प्रश्न भी हम क्या करें और किस दिशा में जाए। तो पहला सूत्र ही कहता है प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टांत सिद्धांत तर्क निर्णय वाद जल्प वितंडा हेतुभास छल जाति निग्रह स्थानम तत्व ज्ञान निशयस अधिगमन पहला ही सूत्र कहता है अब ये महर्षि गौतम ने कहा कि ये 16 कैटेगरीज है
(39:45) 16 पदार्थ है इन सबके ज्ञान आपको हो जाए जब तो आप सुप्रीम लिबरेशन को प्राप्त कर सकते हैं। कैसे? तो पहले भी मैंने कहा और फिर क्या था थ्रू द ट्रू नॉलेज ऑफ द नेचर ऑफ ऑल दी कैटेगरीज। तो महर्षि गौतम जो लोग उस परंपरा से आते हैं वो बहुत पूजनीय है। आज भी अगर आप दरभंगा जाए तो गौतम कुंड है। अगर आप मिथिला विश्वविद्यालय जाए तो जिसका न्याय विभाग कभी बहुत समृद्ध हुआ करता था। और संस्कृत की परंपरा में जितने विश्वविद्यालय हैं ये सब पुस्तकें आपको मिलेंग। आज भी छप रही है, लिख रही है। अब वही है ना कि कितना आप जानना चाहते हैं यह इसलिए जब मैं उस समय में बात कर रहा था कि
(40:31) जब वो कहते हैं प्रमा प्रमेय प्रमाण तो अब प्रमा मीन्स ऑफ वैलिड नॉलेज पूरा डिटेल डिस्क्रिप्शन है। प्रमेय क्या जाना जाए? ऑब्जेक्ट्स ऑफ वैलिड नॉलेज। तो इन सबके बारे में देखा गया तो ये तो एक हुआ जो तर्क की परंपरा है। अगर आप देखेंगे कि किसी व्यक्ति को जैसा मैंने पहले कहा कि शंकराचार्य और मंडन मिश्र हालांकि दोनों अलग-अलग परंपरा से थे। एक वेदांत की परंपरा से एक मीमांसा की परंपरा से। लेकिन दोनों शास्त्रार्थ करते हैं। वो ठीक है कि हम मानते हैं कि भारती जज बनी थी। लेकिन भारतीय जज नहीं बनी थी। वो दोनों ही स्वीकार कर लेते थे कि मैं
(41:11) यहां जीतना और हारना नहीं था। सत्य ज्ञान तक पहुंचना था। कौन पहुंचा? वो मान लिया जाता था। इसीलिए तो अनुयाई भी बन जाते। अनुयाय भी बन जाते थे। अब उसमें अवयव का प्रयोग किया जाता था। सिद्धांत का प्रयोग किया जाता था। तर्क का प्रयोग किया जाता था। और हराना ही केवल है तो हम वाद जल्प वितंडा हेत्वास छल जाति सब का प्रयोग करेंगे और फिर हम पहुंच जाएंगे तो महर्षि गौतम जो न्याय की परंपरा से आते हैं मैं ये बताना चाहूंगा कि उनको पता है कि क्या है और महर्षि गौतम का क्या काम है संक्षेप में अगर आप देखेंगे महर्षि गौतम के इस सूत्र को तो मैंने एक फार्मूला बनाया था
(41:52) जब मैं उस समय क्योंकि मैं तो संस्कृत का विद्यार्थी था गणित का था तो 4:12 16 तो लोग कहते ये क्या है? हमने कहा देखो महर्षि गौतम ने 16 कैटेगरीज बनाई है। पदार्थ बताई है। नहीं जिसको कैटेगरीज कहते हैं। फिर उन्होंने कहा ये तो पदार्थ हुआ। पदार्थ फिर प्रमेय की बात करते हैं। तो 12 प्रमेय बताए हैं उन्होंने। और इन सबको कैसे जाने? तो कहा चार प्रमाण प्रत्यक्ष अनुमान उपमान और शब्द। तो सत्य जानने के उन्होंने कहा चार साधन है। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द। अब अगर आप प्रत्यक्ष देखेंगे केवल आंखों से दिखना नहीं है। इसलिए दर्शन कहते हैं हम
(42:31) सब कुछ प्रतीत होता है। प्रतीत होने का मतलब एक्सपीरियंस्ड नॉलेज है। वो और अनुमान यहां असेसमेंट नहीं है। यहां अनुमान इनफेंस है। इनफ कर लेना। किसी चीज को जो खुली आंखों से नहीं देख सकता वो मन की आंख देख ले। महर्षि गौतम को अक्षपाद भी कहा जाता है। कहते वो इतने तार्किक थे लोगों के आंख तो सिर्फ सिर में होते हैं। उनके आंख पैरों में भी थे। और वो आंख बंद करके भी चलते थे तो पैर को पता था कहां सही रास्ते पे चले। हालांकि इसकी दूसरी भी एक लोकोक्ति है कि वो मतलब कभी-कभी इतने लॉस्ट होते थे तार्किक रूप से इस जगत और ईश्वर को समझने में कि वो
(43:14) कहां चलने लगते थे पता नहीं होता था। तो उन्होंने कहा कि चलो आज के बाद मैं इस आंख का उपयोग सिर्फ अपने मन से करूंगा। मन के लिए करूंगा। एक दूसरा आंख लगा देता हूं। यह अपना यह देखेगा कि जाना है। ऐसे बहुत सारी है। लेकिन एक्चुअल में अक्षपात का मतलब होता है जिसके पास दो नहीं चार आंख हो। दो ऊपर और दो नीचे। यानी जो बहुत ज्ञानी हो। तो जानना ही ईश्वर को प्राप्त करना है। महर्षि गौतम ने यही कहा सत्य ज्ञान को जानना ही है। चाहे वो गणित के माध्यम से जाने, भौतिक के माध्यम से जाने, खगोल शास्त्री जाने, भाषा जाने, जीवन जाने, ईश्वर जाने, जैसे जाने। तो ये
(43:56) उस समय हमने ये फार्मूला 4 12 16 का बनाया था कि मेथड के रूप में जब देखेंगे तो चार है। किसको जाना जाए? क्या जाना जाए वो 12 है। और किन सबको जाने ले कि अब और कुछ जानने की जरूरत नहीं पड़े तो वो 16 है। जैसे हमने अभी आपने ईश्वर का प्रश्न किया। सीधे तौर पर अगर मुझे कोई पूछता अगर न्याय शास्त्र का विद्यार्थी पूछता और पूछता मैं कहता नहीं कहीं नहीं है मुझे दिखाओ क्योंकि महर्षि गौतम ने कहा प्रत्यक्षम कि प्रमाणम तो दिखाओ वो तो लिखा ही नहीं ईश्वर शब्द कहीं है ही नहीं श्रेष्ठ शब्द है लिबरेशन मोक्ष मुक्ति का शब्द है लेकिन जब हम उसकी हिस्टोरिसिटी में समझने की
(44:38) कोशिश करते हैं तो जो छोटी सी लोक कहानी हमने आपके साथ शेयर की आचार्य उदयन के बारे में उन्होंने कहा कि नहीं नहीं ईश्वर की भी सत्ता है। तो कुछ चीजें संसार में है जो सबको अपील नहीं कर सकती। ईश्वर सबको अपील करता है। क्योंकि भारत की भूमि थी तार्किक भूमि लेकिन वो तर्क भी ईश्वर के लिए था। तो ये ईश्वरत्व की भूमि है। तो ईश्वरत्व को हर कोई प्राप्त करना चाहता है। मनुष्यत्व से ईश्वरत्व की यात्रा सब करना चाहते हैं। तो सबको अच्छा लगेगा ही। तो ये एक संक्षेप में मैं ये बात आपके समक्ष रखना चाहता था। अरविंद जी आपने जैसे जब न्याय को आप समझा रहे थे तो आपने बोला
(45:16) कि यह थ्यरी ऑफ डिबेट भी है और आज तो डिबेट कल्चर आप टीवी खोलिए तो बस डिबेट ही डिबेट दिखती है हर जगह हमने भी एक छोटा सा प्रोग्राम बनाने का प्रयास किया था वो काइंड ऑफ डिबेट उस तरह की नहीं थी क्योंकि लोगों को आज क्या होता है कि वो टीआरपी और मसाला के लिए वो लड़ाई झगड़ा गाली गलौज वो तो हम करवा नहीं सकते यहां बैठ के क्योंकि हमारा चिंतन ही सत्य की खोज पर है जो पारंपरिक शास्त्रार थे वही हम चाहते भी थे तो तो हम डिस्कशन कराते थे कंट्रास्टिंग पॉइंट ऑफ व्यूज पर। लेकिन अभी आप टीवी खोलिए तो मुझे तो लगता है कि पक्ष और विपक्ष दोनों पेड होता है और आपस में बस
(45:49) लड़ाई झगड़े के लिए ही वो करते हैं। तो डिबेट्स लेकिन लोगों को देखने का मन करता है क्योंकि लोगों को थोड़ा लड़ाई झगड़ा भी देखने का मन करता है। और डिबेट्स का कल्चर भारत का बहुत पुराना कल्चर है शास्त्रार्थ का। तो जैसा कि आपने बताया कि पहले तो मध्यस्थ की भी आवश्यकता नहीं थी। ऐसे रूल हम बना लें [नाक से की जाने वाली आवाज़] कि हम डिबेट कर ही इसलिए रहे हैं कि हम सत्य तक पहुंच जाए और जिस सत्य तक पहुंचे हम दोनों उसके ही अनुयाई हो जाए। तो इस पर बहुत ढेर सारा चिंतन किया होगा महर्षि गौतम जी ने तो आप क्या कुछ आज के बच्चों को बता सकते हैं क्योंकि ये भी डिबेट करते
(46:21) ही होंगे धोनी अच्छा है कि कोहली अच्छा है इस तरह की डिबेट्स देख के यही कर रहे हैं। तो क्या मतलब कुछ बेसिक्स आप बताइए कि डिबेट में ये चीज होनी चाहिए। मतलब इसके बिना अगर डिबेट हो रही है तो वो वेस्ट ऑफ टाइम है। विशाल जी आपने बिल्कुल सही कहा कि एक समय था जब वाद विवाद का लक्ष्य था सत्य ज्ञान तक पहुंचा जाए और जो सत्य तक पहुंचते थे वो दोनों उसके हो जाते थे या कहते थे कि आप मुझसे श्रेष्ठ ज्ञानी है और मैं कल्याणी वहां जय और [गला साफ़ करने की आवाज़] पराजय नहीं था। और अष्टावक्र की कहानी मिथिला की भूमि में इसी से मिलताजुलता कहानी है कि राजा जनक
(47:01) के दरबार में अष्टावक्र के पिता जब शास्त्रार्थ कर रहे हैं एक महर्षि से तो पराजित होते हैं और उस समय का समाज में था कि पराजित होने का मतलब था जल समाधि ले लेना। तो ये अष्टावक्र जब पैदा हुए तो अपनी माता से पूछते थे कि सबके पिता है मेरे पिता कहां है? तो मां जब छोटे थे तब तक तो टालते रहे। बाद में उन्हें पता चल गया। फिर वो अध्ययन करने लगे और अध्ययन करने लगे तो मां ने कहा कि तुम्हारे पिताजी से नहीं पराजित कर सके। अष्टावक्र का अर्थ ही है। आप समझ गए कि आठ जगह से तो तुम कैसे कर पाओगे? कहा कि नहीं नहीं मैं करूंगा। और वही अष्टावक्र फिर उसी ऋषि को
(47:45) शास्त्रार्थ करने जनक के दरबार में जाते हैं और दोनों का शास्त्रार्थ होता है और अष्टावक्र उस वाद विवाद में सत्य तक पहुंचते हैं और जो अपोनेंट है वो पराजित होते हैं। वो कहते हैं मैं अब जल्द समाधि लूंगा। कहा कि ना वाद विवाद में सत्य तक पहुंचना है। किसी की जान लेना और मृत्यु नहीं है। आज आप देखेंगे आपने जैसा कि कहा कि टीवी पे दूसरे को जलील करना, खंडन करना, किसी को मतलब असत्य को ही स्थापित करना बिना कॉन्टेक्स्ट को समझे हुए और तब हम मान लेते हैं कि यही सत्य है। नहीं जो ज्यादा चिल्ला रहा है। जो जो चिल्ला रहा है। चिल्लाने की तो
(48:28) आवश्यकता ही नहीं है। इसलिए कहते हैं जो मनुष्य तार्किक है वो मनुष्य कभी चिल्लाएगा नहीं। उसके शब्द में जोड़ भी नहीं होगा। शब्द में ही इतनी ताकत होगी कि अगर वो तार्किक है तो सामने वाला कहेगा बात तो सही कह रहा है। नहीं लेकिन आपने खुद ही अपने प्रश्न का उत्तर दिया कि सब कुछ टीआरपी के लिए है और भारतीयों के बारे में तो कहा जाता है वी द आर्गुमेंटेटिव इंडियंस। तो आर्गुममेंट हमें अच्छा लगता है। लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि आर्गुमेंट किसके लिए और आर्गुमेंट कैसे? तो जो वाद विवाद आज जो टीवी पे आपको देखने को मिलता है उसका है
(49:04) खंडन और मंडन। किसी को नीच दिखाना, किसी को गलत साबित करना और कुछ नहीं। यह जानते हुए भी कि जो मैं कह रहा हूं वो गलत है और सामने वाला जो कह रहा है वो सही है। नहीं अभी हाल फिलहाल जितनी घटनाएं घटी हैं चाहे वो तेल का बढ़ कीमत बढ़ जाना या कहना कि भाई आप सोने ना खरीदें। ये सब तार्किक है। जो लोग समझते हैं इस फाइनेंस को फॉरेन पॉलिसी के संदर्भ में वो सब कहेंगे हां ये सब तो बिल्कुल सही है। ये तो होना चाहिए। क्यों नहीं किया? 12,000 करोड़ का हर दिन घाटा हो रहा है। आप अब तक आपने क्यों नहीं बढ़ाया? लेकिन जो नहीं समझता कि वो आप तो कहते थे कि हम
(49:46) नहीं कीमत बढ़ाएंगे। अब संदर्भ को क्योंकि मकसद ये नहीं है कि सत्य जानना कि होना चाहिए नहीं होना चाहिए। नहीं क्यों किया? खंडन बन जाए। तो सबसे पहले इसमें क्या होता है? इसका एक पूरा का पूरा डिबेट में महर्षि गौतम ने एक क्रमबद्ध आपको ताज्जुब होगा कि तरीका दिया हुआ है कि जब दो व्यक्ति शास्त्रार्थ करेंगे तो क्या करेंगे? तो कहता है कि सबसे पहले प्रतिज्ञा यानी प्रपजीिशन करेंगे। उसके बाद कहा प्रमाण दोगे तुम उस प्रतिज्ञा का। फिर किसका प्रमाण दे रहे हो? ऑब्जेक्ट्स ऑफ नॉलेज। फिर कहा कि उससे डाउट होगा जैसे हम कहें कि युद्ध अच्छा है युद्ध बुरा है।
(50:26) तो अभी जो लोग आर्म बेस इंडस्ट्री में पैसा लगाया होगा शेयर मार्केट को देखिए उनके लिए तो युद्ध अच्छा है ना क्योंकि उसका ऊपर जा रहा है वो कमा रहे हैं तो युद्ध बुरा तो नहीं है तो एक तरफ कह रहे हैं मैंने कहा थीसिस के रूप में युद्ध बुरा आपने एंटीथीसिस के रूप में कहा कि युद्ध अच्छा तो संशय होगा कि फिर क्या है अच्छा है कि बुरा है तो अब आप क्या करेंगे अब आप जो आप एग्जांपल देंगे दृष्टांत देंगे कि क्यों युद्ध अच्छा या क्यों युद्ध बुरा तब आप एक एस्टैब्लिश्ड फैक्ट्स के आधार पे ठीक है आप सिद्धांत देते हैं। ऐसा करते हुए आपको सिलोजिज्म का
(51:07) प्रयोग करना पड़ता है। मैं आऊंगा उस जिसको पंचपाद सिद्धांत भी कहा गया है। उसमें पांच चरण होते हैं। तर्क ऐसे नहीं है कि कुछ भी बोल देंगे। और मैं यहां आपको बताना चाहूंगा कि संसार का पहला सिलोजिज्म जो एरिस्टोटलियन सिलोजिज्म है और न्याय सिलोजिज्म जो उनसे बहुत पहले है आप दोनों की जब तुलना करेंगे कहेंगे वाह हमारा सिलोजिज्म का लॉजिक ही ज्यादा ऑथेंटिक है और तब अंत में निग्रह स्थाना डिफीट जैसे आपने कहा कि युद्ध अच्छा या युद्ध बुरा ठीक हम इसी का एग्जांपल लेते हैं तो सबसे पहले थीसिस या एक प्रस्ताव रखा कि युद्ध संसार के लिए बुरा है यह
(51:44) प्रतिज्ञा है। यह प्रतिज्ञा हो गई। यह एक पक्ष के लिए यह प्रत्यक्ष के लिए। अब अब इसमें हमें प्रमाण देना होगा कि क्यों बुरा है? तो क्या हम देंगे प्रमाण? प्रमाण देंगे कि देखिए कि अगर इजराइल ने ईरान पे अटैक किया या ईरान ने उसके रिटाइजेशन में इजराइल पे भी किया, सऊदी अरेबिया पे भी किया, यूएई पे भी किया, क़तर पे किया। अंत में हुआ क्या? सब जगह तो लोग ही मारे गए। और केवल लोग नहीं मारे जा रहे हैं। युद्ध देखिए जो पहले नहीं होता था। आज ऊर्जा संकट को पैदा कर दिया। युद्ध लड़ रहे हैं तीन देश और दुनिया के सब देश उससे प्रभावित हो गए।
(52:26) जैसे अभी हॉर्मोज को बंद कर दिया। अब अगर क्राइसिस हो रही है यूरोप में भी हो जाए, एशिया में भी हो जाए, अफ्रीका में भी हो जाए तो सब कहेंगे क्या? नहीं हॉर्मोज खोलो। वो कहेगा हम खोलेंगे नहीं। आप कहेंगे खोलो। तो क्या होगा? सब लोग युद्ध करने लग जाए। तो इस तरीके से हम अपने थीसिस के पक्ष में एग्जांपल्स देते रहेंगे जिसको दृष्टांत कहा गया है यानी उदाहरण कहा गया। ठीक? अब ऐसा करने के लिए नहीं कि कुतर्क नहीं करेंगे आप। आप लॉजिक का प्रयोग करेंगे। अच्छा और उसमें चार प्रमाण तो हम देंगे। एक तो देंगे प्रत्यक्ष का, अनुमान का, उपमान का, शब्द का कि देखो
(53:02) फलाने फलाने जो वार्ड एक्सपर्ट्स हैं उन्होंने ऐसा कहा है कि इस तरह की चीजें होंगी। जैसा आज कहते हैं कि तो ये सारे लॉजिक देते हुए हम पांच का प्रयोग करते हैं जिसकी हम थोड़ी देर में चर्चा करेंगे। प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निष्कर्ष। ये सिलोजिज्म के आर्ट है। आप देखिएगा कि अरिस्टोटल सिलोजिज्म में तीन ही पद है। मेजर प्रमाइस, माइनर प्रमाइस, कंक्लूजन मैं बात करूंगा अगर इस तरह के प्रश्न आएंगे आगे तो। तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] लॉजिक के साथ वाद विवाद के साथ आगे बढ़ाया जाता है। और यही अवयव की भूमिका है। अब क्या होगा?
(53:36) इसके बाद चर्चा तो शुरू हुई। सबसे पहले थीसिस के समर्थन में कुछ साख रखे जाते हैं। ये महर्षि गौतम के अनुसार कह रहा हूं। यदि विपक्षी तार्किक तरीकों का पालन करने में असमर्थ होता है। अगर असमर्थ होता है कि भाई अब तो हम कह नहीं पा रहे हैं कि क्यों युद्ध अच्छा है क्योंकि इन्होंने तो कहा युद्ध बुरा है तो वो क्या करेगा? वो व्यर्थ के वितर्क देगा जिसको जल्प कहा गया है। व्यर्थ के वितर्क देगा। और उससे भी नहीं उसका काम चलेगा। तो वितंडा खड़ा करा होगा। देखिए वितंडा बड़ा ही कॉमन शब्द है भारतीय संस्कृति में। क्यों बात का वितंडा
(54:08) बना रहे हो? वितंडा का मतलब यहां पे क्या है? छल पूर्ण खंडन करने के लिए शब्दों का। जैसे मैं कहूं रोको मत जाने दो। नहीं आपने ये नहीं कहा कि रोको मत जाने दो। आपने कहा रोको मत जाने दो। हम बात को घुमाना। घुमाना। तो छल पूर्ण खंडन जैसी अनुचित प्रक्रियाओं का सहारा लेता है। जिसका मुख्य उद्देश्य केवल अपने पक्ष का बचाव करना होता है और इसमें विफल रहने पर विपक्षी किसी भ्रामक तर्क यात्व अवैश का उपयोग करता है। जैसे यह तर्क देगा कि थीसिस ही गलत है तुम्हारा। हमारी थीसिस है तुम्हारी थसिस ही गलत है या उसका मुख्य पक्ष या गौण पक्ष का अभाव
(54:52) है इसमें जैसे हम कहते हैं ना तीन प्रमाइस है मेजर प्रमाइस माइनर अरे माइनर प्रमाइस की तो तुमने बात ही नहीं की कंक्लूजन पे कैसे पहुंच गए या हम कह दें कि मेजर प्रमाइस ही गलत है। अब कहेंगे ये शब्द कहां से आ गया? तो एरिस्टोटल सिलोसिज्म की परंपरा में तीन पद होते हैं। मेजर प्रमाइस, माइनर प्रमाइस और कंक्लूजन। ऑल मैन आर मल। ये इसको मेजर प्रमाइस कहते हैं। अरविंद इज ए मैन। सो व्हाट इज अ कंक्लूजन? तो कंक्लूजन कहते हैं अरविंद इज अ मल। अब हम कहते हैं कि नहीं तुमने जो माइनर प्रमाइस कोट किया वो गलत है। पहले ये प्रूफ करूं मैंने।
(55:24) हां। तो जब जब ये प्रयास भी व्यर्थ साबित हो जाता है। तो थीसिस क्या था थीसिस हमारा? युद्ध खराब है। युद्ध बुरा है। युद्ध हानिकारक है। युद्ध विध्वंसक है। तो अस्पष्ट या छल पर आधारित कहकर उसकी निंदा की जाती है। यदि फिर भी थीसिस सच साबित होती है तो प्रतिवादी जिसने कहा कि युद्ध अच्छा है। इससे इस आधार पर खारिज करता है कि यह जाति है। जाति का मतलब यहां पे है तार्किक त्रुटि या झूठी मान्यता पे आधारित है। क्योंकि दुनिया बताए गए ये कुछ हद तक सही भी लगता है कि संसार के जितने रीऑर्गेनाइजेशन हुए वो युद्ध से ही हुए। आज जर्मनी जितना बड़ा है वो तो कभी था ही
(56:08) नहीं। नहीं आज अगर बांग्लादेश पाकिस्तान से हटा तो युद्ध के कारण ही हटा। युद्ध ना हुआ होता बांग्लादेश नहीं बना होता देश का नहीं निर्माण होता। इस तरह की वो देगा कुतर्क। लेकिन आपको ये साबित करना है कि लेकिन हुआ क्या? अलनबे तो मनुष्य ही मरे हैं। उस युद्ध में क्या हुआ? पाकिस्तानी कम मरे, बांग्लादेश ज्यादा मरे क्योंकि वो सारे सैनिक वहां थे। हुआ क्या? भारत ने जरूर समर्थन किया। मरे कौन? मनुष्य का जीवन तो सबसे इंपॉर्टेंट है। कहते भी हैं कि नथिंग इज मोरेंट देन मी एंड माय लाइफ। राइट? और मैं [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो आज के
(56:43) युवा को कहता भी हूं कि जीवन की शुरुआत ही करो। नथिंग इज मोरेंट देन माय लाइफ। और अंततः जब यह सभी प्रयास बेकार हो जाते हैं तो प्रतिवादी को हार हो जाती है और इसी को महर्षि गौतम ने निग्रह निवा और तर्क की इन्हीं प्रक्रियाओं के द्वारा अंततः निष्कर्ष या निगमन स्थापित हो जाता है कि युद्ध बुरा है। लेकिन आप बताइए कि इतनी चीजों को ध्यान में रख के पिछले 10 साल का कोई डिबेट आप निकाल लें 20 साल का किसी भी टीवी चैनल पे किसी रेडियो वार्ता पे आपको सुनाई देता हो क्यों हम भारतीय तो हैं लेकिन हमें अपनी परंपरा में ही
(57:30) शास्त्रार्थ का कोई ज्ञान नहीं है। इस तरह से होता था कि स्विंग मान लो। आज हम कहते हैं तीसरा फैसला करेगा कि मानव अब तीसरा अगर अज्ञानी हो तो अज्ञान पूर्वक फैसला करेगा। उसको भी ज्ञानी होना जरूरी है। तभी तो एजुकेटर होगा। जैसे अगर आप मुझसे पूछेंगे हम जैसे लोग इसलिए नहीं देखते हैं टीवी पे डिबेट। अब सच कहता हूं। पहले बहुत मजा आता था जब छोटे थे। लेकिन न्याय दर्शन के पड़ने के बाद लगता है यह सब बात कहां कर रहे हैं? संवाद की तो बात छोड़िए। बात ही नहीं कर रहे हैं। यह सब तो सिर्फ विदंडा है जिसका एकमात्र लक्षण है। पक्ष को जलील करना,
(58:07) नीचा दिखाना। सारे तथ्य गलत देंगे और कहेंगे आप झूठ बोल रहे हैं। शुरुआत ही करेंगे। आपने जो कुछ कहा झूठ कहा आपने जो डाटा दिया वो झूठ दिया। अरे तो डाटा भाई पांच पांच है और चार चार है। लेकिन उसको भी कहेंगे कि नहीं चार पांच है और पांच चार है। क्योंकि आपको जलील करना है। आपको खंडन करना है। आपका मंडन करना है। और फिर वितंडा से एक कदम और आगे चली गई है हमारी चैनल्स। जहां सिर्फ है चीखना चिल्लाना। प्रश्न पूछेंगे उत्तर नहीं देने देंगे हम। क्योंकि प्रश्न पूछना भी तो एक कौशल है। एक कला है। तो आर्ट ऑफ डिबेटिंग में आर्ट ऑफ क्वेश्चनिंग आपको नहीं पता है। आर्ट ऑफ
(58:49) रीजनिंग नहीं पता है। आर्ट ऑफ आर्गुममेंट नहीं पता है। तो कंक्लूजन कहां पहुंचेंगे? तो वाद नहीं ये डिबेट नहीं है। ये वितंडा है। तो जो लोग मुझे सुन रहे हैं या सुनेंगे आपकी पोडकास्ट के माध्यम से मैं तो उनको यही कहूंगा कि उनको कम से कम कहा जाए वितंडा खड़ा मत करो बात करो ताकि हम समझे कि आज की परिस्थिति की हम बात करें तो पेट्रोल की प्राइस बढ़ना जायज है कि नाजायज है? या सोना नहीं खरीदना जायज है कि नाजायज है? उस पर डिबेट होनी चाहिए। डिबेट होनी चाहिए। बहस करिए, वाद करिए, विदंडा मत करिए। तो वो तब होगा जब आपके पास तथ्य भी हो और तर्क भी हो। तो महर्षि
(59:32) गौतम ने तो यही कहा है कि कोई भी काम करोगे उसके लिए दो चीज तो चाहिए। तथ्य भी और तर्क भी। उसके बिना और इसकी पूरी सुदृढ़ परंपरा है जिसका फॉलो करना है। एक भी नहीं आप फॉलो करते हैं तो आप पराजित होते रहते हैं। तो अरविंद जी जैसे आप बता रहे हैं कि आपने टीवी डिबेट्स अब लगभग देखते ही नहीं है क्योंकि आपको पता है कि परंपरा क्या है? किस तरह से डिबेट्स होनी चाहिए। अगर ऐसी डिबेट्स हो इनफैक्ट अभी कुछ चैनल ट्राई भी करते हैं। हम खुद प्रयास कर रहे हैं कि हम ऐसे शास्त्रार्थ की परंपरा को ऑनलाइन और ऑफलाइन भी हम दोबारा रिवाइव कर पाएं कि जहां पर यह
(1:00:05) व्यवस्था हो कि हां ये स्ट्रक्चर है। जहां पर आप पहले प्रतिज्ञा करते हैं, हेतु देते हैं, उसके बाद जो प्रोसेस है उस प्रोसेस को फॉलो करते हैं तो वो किया जाए। तो चलिए टीवी डिबेट तो अभी मुझे लग रहा है टीवी बच्चे भी नहीं देखते हैं या दर्शक भी बहुत ज्यादा टीवी नहीं देखते हैं। लेकिन एक और चीज है जिस पर बहुत ज्यादा समय बिताते हैं वो है सोशल मीडिया। और अभी जब से सोशल मीडिया घर-घर पर पहुंच चुका है, सबके पास मोबाइल है और नैरेटिव बनाने वाली जो फर्सेस हैं वो भी बहुत स्ट्रांग है। क्योंकि बीजेपी को भी जितनातना है, कांग्रेस को भी जीतना है या बीजेपी
(1:00:35) कांग्रेस तो पॉलिटिकल पार्टी हो गई। बाकी लेफ्ट का कुछ नैरेटिव है, राइट का नैरेटिव है या इसके साथ-साथ कंपनीज़ होती है उनको अपनी मार्केटिंग करनी होती है। उनको भी आपके दिमाग में घुसना होता है। तो बहुत ढेर सारा नैरेटिव चल रहा होता है। ऐसे में जो सामान्य व्यक्ति है वो जो चीज नहीं भी खरीदना चाहता है वो खरीद लेता है या जो नहीं भी देखना चाहता है देख लेता है या जिस समाज से या जिस कम्युनिटी से नहीं भी जुड़ना होता कभी उसका वो जुड़ जाता है। तो बहकावे में आ जाता है या फिर हमारे साथ स्कैम हो जाते हैं। यहां पे [नाक से की जाने वाली आवाज़] पढ़े
(1:01:04) लिखे लोग ओटीपी दे देते हैं। तो नैरेटिव को बहुत बुरी तरह से फंस जाते हैं। जस्ट बिकॉज़ कि हमारे पास इंटरनेट, सोशल मीडिया, मोबाइल्स बहुत इज़ली अवेलेबल है। तो इसमें न्याय दर्शन कहीं काम आ सकता है कि जो इंफॉर्मेशन मेरे तक आ रही है क्या मेरे पास वो बेसिक चेतना हो या बेसिक फ्रेमवर्क हो न्याय से कि मैं बता पाऊं वो इंफॉर्मेशंस एटलीस्ट मैं समझ पाऊं कि वो सही है या गलत है। इस पर कुछ महर्षि गौतम जी ने या न्याय की परंपरा ने डेवलप किया। उस जमाने में तो इंटरनेट नहीं था। सोशल मीडिया नाम की कोई चीज नहीं थी। समाज ही सोशल मीडिया था। हम्।
(1:01:34) तो अब वही सवाल है कि उस ज्ञान को या उस कौशल को आज हम कैसे उपयोग करें? और कहा है कि ज्ञान कभी बेकार तो जाता नहीं। यही एकमात्र ऐसी पूंजी है जो जीवन के अंतिम क्षण तक आपके साथ रहता है। कहां मैंने कब पीएचडी की और थोड़े-थोड़े दिनों के बाद भारत में उसकी आवश्यकता महसूस होती है और कभी-कभी हमें आप जैसे लोग प्लेटफार्म देते हैं कि अपनी बात को कहा जाए। तो आज जो सोशल मीडिया का दौर जो प्रश्न मैं समझ पा रहा हूं आप ये समझ रहे हैं कि मुझे फेक न्यूज़ और राइट न्यूज़ में फर्क करना आ जाए या कौन सा झूठ है और या कौन सा सत्य है तो इंटरनेट पे कैसे माने? देखिए जब इंटरनेट
(1:02:13) की शुरुआत हुई थी तो उसी समय हम जैसे लोग कहना शुरू किए थे कि सबसे बड़ी चुनौती जो खड़ी करेगा इंटरनेट व्हाट इज राइट एंड व्हाट इज रोंग का? व्हाट इज ऑथेंटिक एंड व्हाट इज फेक का? नहीं। और वो आज होगी। नहीं तो सत्य और असत्य को कैसे पहचाने? तो महर्षि गौतम कहते हैं कि प्रमाण के आधार पर देखो कि कौन सा सत्य है और कौन सा सत्य है। यानी तर्क और प्रमाण का आधार हमें अंधविश्वास या सुनी सुनाई बातों को मानने के बजाय चार प्रमुख प्रमाणों प्रत्यक्ष अनुमान उपमान और शब्द के माध्यम से सत्य तक पहुंच सिखाता है। उदाहरण देते हैं। बड़े लेटेस्ट एग्जांपल बनी।
(1:02:58) अब पूरी वेस्टर्न मीडिया जान गई कि भारत में एक पार्टी बनी है जिसका नाम है कॉकरेच जनता पार्टी। अब ये कोई पार्टी तो है नहीं। अब डिबेट कल से दूसरा डिबेट शुरू हुआ है। बीबीसी ने भी कोट किया। आपको ताज्जुब होगा। भारत की मीडिया केवल नहीं की है। भारत के टीवी चैनलों ने नहीं की है।कि एक्स पे आया और फिर इंस्टा पे चला गया। तो बीबीसी ने भी कोट किया है कि भारत पे एक पार्टी बनाई गई जिसका नाम है कॉकरोच जनता पार्टी। अब अमेरिका में बैठा हुआ कोई भारतीय कहेगा हां भारतीय जनता पार्टी बन गई तो अब डिबेट चल रहा है कि अभी भारत सरकार ने फैसला
(1:03:34) लिया कि उसको बैन कर दिया है एक्स पे तो क्योंकि एक्स के साथ यही समर्थन है कि जो कान गैर कानूनन होगा उसका तुरंत आप करेंगे अब ये सही है कि गलत पहले उसका पार्टी नाम देना सही है क्या पार्टी है भी या नहीं है तो आपको प्रत्यक्ष अनुमान उपमान और शब्द लगा के आप जानेंगे वो तो पार्टी ही नहीं है एक फेक नेम है क्योंकि जब आप राजनीतिक सिस्टम में पार्टी कहते हैं तो उसका पहला काम क्या होता है? इलेक्शन कमीशन के साथ आपका रजिस्ट्रेशन। आपने रजिस्ट्रेशन कराया नहीं और पार्टी का नाम दे दिया। अब [नाक से की जाने वाली आवाज़] युवा कह रहे
(1:04:04) हैं कि हमें अधिकार है आलोचना करने का। मैं नाम नहीं लेना चाहूंगा। अभी एक बडिंग लॉयर के साथ मेरी इस बात पे बहस हो रही थी। तो उन्होंने कहा कि क्यों नहीं हम सरकार की आलोचना कर सकते? हमने कहा बिल्कुल करिए। तो आप उसका नाम रखिए। आप पार्टी नहीं कहेंगे ना। पार्टी जैसे ही कहेंगे तो आज के डिस्कोर्स में वो पॉलिटिकल सिस्टम है और पॉलिटिकल सिस्टम के लिए एक प्रोविजन बनाया हुआ है जो कानूनन होना चाहिए। तो मैंने उस बडिंग लॉयर से पूछा कि आपने ये तो कहा कि सरकार की आलोचना होना चाहिए। आपने कहा जनसामान्य की आलोचना होनी चाहिए। फिर ये थोड़ा सा और
(1:04:43) पॉलिटिकल है लेकिन मैं कह रहा हूं क्योंकि मैं तर्क का छात्र हूं तो फिर हमें हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों की आलोचना करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए? महर्षि गौतम तो कहते हैं जो भी तुम्हारे तर्क से सत्य नहीं है उन सब की आलोचना करनी चाहिए। उन सब पर रिफ्लेक्शन उन सब पर क्रिटिकल करना चाहिए। ये क्यों नहीं व्यवस्था है? तो जरा हम चारों प्रमाणों को लेते हैं। दो मिनट का समय लूंगा मैं। लेकिन मैं इसे चाहूंगा कि आपके श्रोताओं तक ये पहुंचे कि चार प्रमाणों के आधार पे मैं दावे के साथ कहता हूं कि आप फेक न्यूज़ एंड राइट न्यूज़ में अंतर कर
(1:05:19) पाएंगे। कैसे? तो प्रत्यक्ष का क्या अर्थ है? प्रत्यक्ष का अर्थ मैंने पहले भी कहा और फिर कह रहा हूं कि केवल आनंगी आंखों से देखना नहीं है। सो प्रत्यक्ष का सिद्धांत हमें सिखाता है कि किसी भी वायरल सामग्री पर तुरंत विश्वास करने के बजाय उसे अन्य साक्ष्यों द्वारा तर्क की कसौटी पर कसना और फिर उसकी मूल पृष्ठभूमि की पहचान करना कि क्या सच में कॉकरोच जनता पार्टी पॉलिटिकल पार्टी है या नहीं है। या जैसे आपने कहा नैरेटिव आज देखिए मीडिया कितना जैसे जभी भी मैं रिफ्लेक्ट करता हूं आपने भी पढ़ा होगा आप एक अच्छे संस्थान से पढ़े लिखे हैं कि भाई एडवर्टाइजमेंट आज हर चीज
(1:06:01) के लिए है ब्लेड का एडवर्टाइजमेंट है रेजर का और उसमें एक ब्यूटीफुल वुमेन हम दिखा रहे हैं नहीं जिसकी कोई आवश्यकता नहीं तो क्यों ऐसा कर रहे हैं वो तमाम सिनेमा के जिसको हम स्टार कहते हैं जो एक्चुअली एक्टर वो जिन चीजों की आज करता है एडवर्टाइजमेंट वो स्वयं नहीं उसका उपयोग करता है। वो स्वयं नहीं खाता है। मुंह में भी नहीं लेता है। और देखिए वो करता है। तो क्यों ऐसा करता है? क्या इसके पीछे कारण है? तो जब तक आप पूरी पहचान नहीं कर लेंगे, समझ नहीं लेंगे। अरे वो पैसे के लिए कर रहा है। वोकि चीजों में क्वालिटी है इसलिए नहीं कर रहा। ये तो एक पक्ष हुआ। दूसरा
(1:06:44) कैसे हम माने कि आज भारत की जो आर्थिक स्थिति है वो सही है या खराब है या जब ये नैरेटिव आ रहा है कि अमेरिका ये सब इसलिए कर रहा है कि उसकी अपनी आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई इसलिए वो अंधाधुंध टेरिफ सब पे लग रहा है क्योंकि पैसा कमाएगा तभी उसकी आर्थिक स्थिति ठीक होगी। किस सत्यता को आप मानेंगे? तो यह वाला साफ कहता है कि तुरंत विश्वास करने के बजाय अगर इस तरह के नैरेटिव्स आपको मिलते हैं उसे अन्य साक्ष्यों द्वारा किसने कहा, कब कहा, किस लिए कहा? ये सब समझने की जरूरत है। अन्य साक्ष्यों द्वारा तर्क की कसौटी पर कसना और फिर उसकी मूल्य पृष्ठभूमि को पहचान
(1:07:27) करना ये प्रत्यक्ष आपको सिखाएगा। अब आते हैं अनुमान की बात कि कैसे आपको सही और गलत में फेक न्यूज़ या करेक्ट नहीं उसमें कराएगा। देखिए तर्क और कारण संबंध भी इनफेंस को माना जाता है। किसी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए एक कासेप्ट दिया है न्यायदर्शन ने। उसको कहते हैं व्याप्ति जिसका अंग्रेजी होता है इनवेरेबल कंकमिटेंस। हम नहीं जाएंगे उसकी विस्तार में। व्याप्ति यानी कारण और प्रभाव के अटूट संबंध को समझना जरूरी है। आपने देखा अभी इलेक्शन हुआ। तो एक पार्टी ने दूसरे पार्टी पर आरोप लगाया कि फलाने मुख्यमंत्री की पत्नी की जो इतने पासपोर्ट
(1:08:06) सब विदेशी हैं और इतने इतने हैं। अब वो तो अच्छा है कि थैंक्स टू उस की जनता उस पर भरोसा नहीं किया। अगर वो बहुत पावरफुल होता तो कर लेते। लेकिन अनुमान कहता है इनफेंस कहता है नहीं तुम अनुमान लगाओ कि इस वक्त क्यों कर रहा है? इस वक्त क्यों किया गया? सो कोई खबर या सूचना कितना सच है यह परखने के लिए हमें उसके पीछे के कारणों का इनफोरेंस करना चाहिए अनुमान लगाना चाहिए तीसरा लेते हैं उपमान हम कहते हैं ना दूसरों को जब भी कुछ समझाना हो तो उपमान दो एग्जांपल्स दो कंपैरिजन बताओ हम अगर एक शॉर्ट भी खरीदने जाते हैं तो ये अच्छा है कि अच्छा है कैसे
(1:08:52) आप निर्धारित करते हैं ये रंग लेना है या वो रंग लेना है आज मुझे पढ़ना है तो तो आज पहले मैं न्यायिक का तर्क पढूं या वैशेषिक का तर्क पढूं या सांख्य का पढूं या वेदांत का पढूं कुछ भी करते हैं तो आप कंपैरिजन तो करते हैं। तो ये अज्ञात तथ्यों के आधार पे मतलब तुलना और समानता क्या है? कि अज्ञात तथ्यों के आधार पर अज्ञात की सत्यता का पता लगाने की प्रक्रिया वही उपमान है। सो किसी फेक न्यूज़ की सच्चाई परखने के लिए उसकी तुलना अन्य विश्वसनीय और वेल एस्टैब्लिश्ड मीडिया इंस्टिट्यूशन से कर सकते हैं। दो देश के बीच युद्ध हुआ। दोनों के जहाज गिराए गए। राइट?
(1:09:35) [नाक से की जाने वाली आवाज़] कंट्री ए को लगता है कि अगर हम यह लिख देंगे तो हमारी जनता को लगेगा कि हम हार रहे हैं। कंट्री बी को लगता है कि हम यह लिख देंगे तो हमारी जनता को भी हार रहेगा। तो कंट्री ए ने भी नहीं लिखा, कंट्री बी ने भी नहीं लिखा। लेकिन कंट्री सी ने कहीं छाप दिया कि ऐसा ऐसा हुआ। तो कैसे करेंगे? वेल एस्टैब्लिश्ड मीडिया इंस्टीट्यूशन से आप करिए। अब चौथा प्रमाण आते हैं शब्द। वर्बल टेस्टिमनी। देखिए शब्द का मतलब यहां सिर्फ मुंह से निकला हुआ शब्द नहीं है। इसका मतलब होता है विश्वसनीय स्रोत। न्याय का अध्ययन करने वाला न्याय का
(1:10:10) पारंगत पंडित न्याय को ज्यादा समझेगा या कोई व्यक्ति एक दिन बताएगा न्याय ने कहा है चार प्रमाण। आज भी हम मानते हैं कि अथॉरिटी होता है। नहीं। तो यहां शब्द प्रमाण का अर्थ है किसी विश्वसनीय या विशेषज्ञ के कथन पर भरोसा करना। न्याय दर्शन के अनुसार केवल उन्हीं स्रोतों पर विश्वास करें जो अपने बयानों के लिए जवाबदेह हो। आजकल हम क्या कहते हैं? ए ये WhatsApp यूनिवर्सिटी का ज्ञान है तो अपने पास रखो। क्यों ऐसा हुआ? क्योंकि लोग मानने लगे कि ज्यादातर सूचनाएं जो उस पे आती है वो अधूरी, अपूर्ण और असत्य है। वरना ये नैरेटिव नहीं बनता।
(1:10:49) तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] पूरा का पूरा जो अरेंजमेंट है पूरी की पूरी जो व्यवस्था है न्याय में सत्य और असत्य के बीच में भेद को जानना ही तो है। तो मुझे लगता है कि जो लोग इसको थोड़ा पढ़े लिखे हैं जो सोचे समझे वो सतर्क हो जाते हैं। भारत से बड़ा तो गसिप वाला कोई देश नहीं है ना ये इसलिए नहीं कि हम दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश इसलिए नहीं हमारी परंपरा में है। वरना महर्षि गौतम ऐसे लोगों को क्यों अलग से सत्य ज्ञान के लिए इतनी मशक्कत करने पड़ते वो भी दूसरे दर्शनों की तरह ये ब्रह्मांड कैसे बना है मैं शशि करद ने तो
(1:11:34) इस पे अपना वक्त लगाया मैं तो कहता हूं और वो भी मिथिला की भूमि पे और देखिएगा मैं ये खास कररेक्टरिस्टिक्स होती है या कपिल ये जानने के लिए ब्रह्मांड बना कैसे? वो कहते हैं ब्रह्मांड किससे बना? ये कहते हैं ब्रह्मांड बना कैसे? कैसे? और फिर कहते हैं कि अच्छा इस ब्रह्मांड को जिस चेतना ने बनाया उस परम सत्ता उस ब्रह्म को जानने की कोशिश करते हैं। तो क्यों नहीं किया? यह बहुत ही समसामयिक है। दुर्भाग्य से इसको हमने अपने पाठ्यक्रमों में हमने आम चर्चा में हमने अपनी शैक्षिक संस्थानों में जगह नहीं दिया है। और चाहे गणित के छात्र हो, विज्ञान के हो, कोई किसी विषय
(1:12:17) को तर्क तो आपको चाहिए ना। बिना तर्क के आप निर्णय पे कैसे पहुंचेंगे? और मनुष्य होने का मतलब ही है तार्किक होना। चाहे ईश्वर की समझने के लिए करें या मनुष्य स्वयं को समझने के लिए करें या सामने अगर मेरे सामने विशाल रूपी कोई मनुष्य है जिनका नाम विशाल है उनको समझने की कोशिश करें तो ये तो चाहिए ही चाहिए। मतलब अगर आपको इंटेलेक्चुअली शार्प होना है आपका कम्युनिकेशन स्ट्रांग होना चाहिए। डिबेट में आप एक्सेल कर पाओ। आपको कोई आसानी से गुमराह ना कर पाए तो उसके लिए न्याय दर्शन की शिक्षा हमारे भारतीय परंपरा में भी आनी चाहिए। स्कूलों में भी
(1:12:57) आनी चाहिए और लोगों को खुद भी समय देना चाहिए। जैसे आपने बताया कि केवल चार अगर हम चीजें करते हैं किसी न्यूज़ के साथ तो हम एटलीस्ट इस पोजीशन में आ जाएंगे कि फेक है कि सही है। कुछ ना कुछ तक हम जान पाएंगे। उसमें जो आपने चारों प्रमाण लिए और उसका एक-एक एग्जांपल दिया है। तो इस तरह से अगर बच्चों को बताया जाए इनफैक्ट हम भी चलाते हैं। कई-क बार ऐसा होता है कि कुछ लोग बड़े-बड़े लोग फंस जाते हैं फेक न्यूज़ में। ये हनी [गला साफ़ करने की आवाज़] सिंह की डेथ हो गई, अमिताभ बच्चन की डेथ हो गई तो ये हो गया। उसमें भी लोग शेयर कर देते
(1:13:28) हैं। फिर कहते हैं हमें तो पता ही नहीं था। क्यों नहीं पता था? क्योंकि हम एक मिनट रुक आपने बड़ी अच्छी बात कही कि देखिए ना आजकल फॉरवर्ड का जो मन है फॉरवर्ड पहले सूचना कब दी जाती थी जब वह ऑथेंटिक सोर्सेस से ऑथेंटिक हो हम वैसे ही नहीं भेज देते थे वो सूचना उसका तथ्य के आधार पे परख कर लेते थे जांच कर लेते थे तब फॉरवर्ड करते आज का कल्चर देखिए क्योंकि हमें लगता है कहीं से आया तो सही होगा सही होगा तो ऐसा तो होता नहीं है लेकिन फिर अरविंद जी यही होता है कि ये तो हम समझ गए कि अगर किसी को सच में अपनी स्किल बढ़ानी है, ओरिटरी स्किल बढ़ानी है या फिर
(1:14:06) रिसर्च शोध भी करने वाले जो बच्चे हैं उनमें भी अगर अपनी रिगर बढ़ाना है तो न्यायदर्शन बहुत ही उत्तम एक विधा है जिसको हमें जानना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ क्योंकि पडकास्ट एंड हो रहा है। फिर से अगेन मैं जनमानस की तरफ जाऊंगा क्योंकि सब लोग रिसर्च नहीं कर रहे हैं। सबको डिबेट नहीं करनी है। लेकिन व्यक्ति के जीवन में कुछ-कुछ निर्णय होते हैं। जैसे पार्टनर को चुनना, रिलेशनशिप्स होती हैं। घर में अगर कोई विपत्ति आ गई तो उस समय करियर चुनना हो गया। जी तो ये जो बड़े डिसीजंस होते हैं अब मैंकि क्लोजिंग की तरफ हम बढ़ रहे हैं। तो आपकी तरफ से ऐसे लोगों को जो जिनको लगे
(1:14:44) कि हां मतलब अगर मैं बहुत ऐसा कुछ करियर वाइज भी नहीं कर रहा हूं। लेकिन मेरे सामान्य जीवन में भी कुछ निर्णय है जो काफी मेरे लिए इंपॉर्टेंट है तो उसको मैं न्याय के दृष्टिकोण से एक बार परखूं, जानू और फिर डिसीजन लूं। तो एटलीस्ट उनको क्या-क्या पढ़ना चाहिए या फिर क्या-क्या चीज आस्पेक्ट पे ध्यान देना चाहिए इसको अगर हम थोड़ा सा और समझ लेंगे तो और रुचि बढ़ जाएगी। हो सकता है कि लोग न्याय दर्शन को अपने जीवन में उतारना भी प्रारंभ कर दें। जी बहुत अच्छा प्रश्न आपने पूछा और खासकर यह प्रश्न हमारे युवाओं के दृष्टिकोण से बहुत इंपॉर्टेंट है क्योंकि
(1:15:20) उनको अपने करियर, अपने रिश्ते या जीवन के अन्य फैसले में वो अक्सर अपने को उलझा हुआ पाते हैं। [हंसी] कोई आपने ठीक कहा कि कोई बहुत ही हैंडसम है और तीन प्रपोजल आ जाए तो उसको समझ में नहीं आना पड़ता है। प्रपोजल ए ले कि प्रपोजल बी ले कि प्रपोजल सी ले। नहीं। न्याय की थिंकिंग पद्धति या तार्किक पद्धति क्या है? तो उसको कहा गया है पंचपाद सिद्धांत। क्यों कहा गया पंचपाद? क्योंकि उसके फाइव ऑर्ग्स हैं। फाइव स्टेप्स हैं। मैंने भी अभी कहा कि स्टेप बाय स्टेप। तो पहला है प्रतिज्ञा। दूसरा है हेतु, तीसरा है उदाहरण, चौथा है उपनय और लास्ट है निगमन। निगमन। निगमन क्या है?
(1:16:02) तो रिड्यूस करना है, कंक्लूड करना है। तो जब हम कहते हैं कि जो लोग इन शब्दों से पहली बार परिचित हो रहे हैं उनके लिए अंग्रेजी शब्द में कह दूं कि जब हम कहते हैं कि प्रतिज्ञा यानी प्रपजीशन क्या है? तो मुझे यह निर्णय लेना है कि करियर ए चुनू कि करियर बी या रिलेशन में मुझे जाना है, मैरिज में जाना है या दोस्ती बनाना है। ए के साथ दोस्ती निभाऊं या बी? नहीं। या मैं एक लॉयर हूं। मुझे दिल्ली में रहना चाहिए, करियर बनाना चाहिए या मुंबई जाकर बनाना चाहिए या मद्रास चले जाना चाहिए? और चौथा ऑप्शन मेरे पास यह भी है कि मैं ना अपने इन तीनों शहरों के अलावा विदेश चला
(1:16:44) जाऊं। तो क्या करेंगे अब आप? तो एक थीसिस तो आपके पास हो गई ना। प्रपजीिशन हो गई जिसको प्रतिज्ञा कहा गया है। तो अंग्रेजी मोटा मोटा समझ लीजिए प्रपजीिशन। ओके? अब दूसरा पद है कि भाई कारण क्या है? हेतु हेतु हेतु हो गया रीच तीसरा क्या है तो अब आप कुछ जो अब तक चीजें हुई है उसको अप्लाई करेंगे ना कि अप्लाई क्या करेंगे कि फलाना फलाना व्यक्ति डॉक्टर बना तो उसका जीवन ऐसा रहा फलाना फलाना व्यक्ति इंजीनियर बना तो उसका जीवन ऐसा रहा अरे इसमें तो बहुत भरमार है कुछ ऐसे व्यक्ति ने इन दोनों को छोड़ा ब्रिलियंट से लॉयर बने और कमाल के
(1:17:22) रहे हमारे पास साक्ष्य है कि जो आईएफएस कर लिए आईएस कर लिए वो छोड़ के लॉ में रहे और पूरी दुनिया दुनिया जानती है उनको। ठीक? तो ऐसे उदाहरण आप लेंगे। अब उन उदाहरण को अप्लाई करेंगे जिसको उपनय कहा जाता है यानी एप्लीकेशन करेंगे। और इन सब के आधार पे अंतिम में आप निर्णय लेंगे। ओ मेरे लिए ये उपयुक्त है और ये सब उपयुक्त नहीं है। क्योंकि मेरी प्रकृति को सूट करता है। मेरी परिस्थिति को सूट करता है। मेरी सोच को सूट करता है। मेरे विचार को करता है। और मेरी जो भावी योजना है कि आज के बाद मैं अपने को 25 साल के बाद कैसा देखना चाहता हूं।
(1:17:59) नहीं ये सबको करता है तो समस्या या लक्ष्य का स्पष्ट कथन प्रतिज्ञा हो गई प्रतिज्ञा हो गई मुझे किसी प्रोफेशन को अपनाना चाहिए या किसका करियर बनाना चाहिए दूसरा हेतु इस फैसले के पीछे जैसे मान लीजिए और उदाहरण देते हैं कि मैं एक जगह नौकरी करता हूं और मैं परेशान हूं तो मुझे नौकरी में बने रहना चाहिए मुझे नौकरी छोड़ देनी चाहिए आजकल के युवा को सबसे ज्यादा ये हो रहा है। ठीक हेतु इस फैसले के पीछे कारण क्या है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो मेंटल डिस्टरबेंस हो सकता है, एडजस्टमेंट हो सकता है या बेहतर पैकेज हो सकता है। नहीं। जैसे अभी एक लिखा आया था
(1:18:41) कि आप [नाक से की जाने वाली आवाज़] जब गुड़गांव, दिल्ली, मुंबई जाते हैं तो सैलरी तो बढ़ती है लेकिन क्वालिटी ऑफ़ लाइफ नहीं बढ़ती है। उस कंपनी महंगी है कि जो चीजें आप कहीं छोटे शहर में कम में ले सकते हैं। यहां ज्यादा में भी नहीं होता है। तो इस फैसले के पीछे कारण क्या है? तो मान लीजिए नौकरी मैं छोड़ना चाहता हूं तो आप कहेंगे मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच रहा है इसलिए मुझे छोड़ देना चाहिए। अब तीसरा जैसे कि जब पहले मैं दबाव में था या फलाना व्यक्ति दबाव में था या मेरा मित्र दबाव वाले माहौल में था या जब मैं ही उस माहौल में
(1:19:16) था मैं अपनी क्षमता का उपयोग सही से नहीं कर पाता था। ठीक आपके पास मतलब उदाहरण होने चाहिए। उदाहरण हो गए। अब उपनय यह नया कार्यस्थल भी वैसा ही दबाव वाला है। सिमिलरिटी अप्लाई कर रहे हैं उस ज्ञान को। नया कार्यस्थल भी वैसा ही दबाव वाला है। तो क्या करना चाहिए मुझे? तो निगमन साफ कहता है सही निष्कर्ष कि यह नौकरी मेरे लिए उपयुक्त नहीं है और मुझे छोड़ देनी चाहिए। तो हमारे युवा जब तार्किक होंगे राइट? इन पदों का कम से कम इन पांच पदों का ही उपयोग करेंगे तो मुझे लगता है वो निर्णय की सही स्थिति में। दूसरा हम लोगों ने पहले ही चर्चा की है कि भाई आप ज्ञान
(1:20:02) की सत्यता को जानना चाहते हैं तो चारों प्रमाणों का उपयोग कर लीजिए। आप भ्रम और संदेह का निवारण चाहते हैं तो भी वही कर लेंगे। आप दोषों पर नियंत्रण चलना चाहते में कोई डिफेक्ट्स है और मैं [नाक से की जाने वाली आवाज़] उससे दूर होना चाहता हूं। अभी किसी व्यक्ति से मैंने बात किया वो मांसाहारी भी था। वो शराब भी पीता था। कहा नहीं मैं पिछले दो वर्षों से छोड़ दिया है। हमने कहा क्या किया आपने? सब लोग जानना चाहते हैं क्योंकि बहुत सारे लोग कुछ चीजों को छोड़ना चाहते हैं और कुछ लोगों चीजों को अपनाना चाहते हैं। तो किस तर्क का प्रयोग करेंगे कि जिसको छोड़ना चाहते
(1:20:35) हैं आप छोड़ दें और जिसको अपनाना चाहते हैं आप अपना लें। तो दोषों पर नियंत्रण भी इन्हीं तार्किक हुए हो सकता है। और कंस्ट्रक्टिव डिबेट अपने से भी आपको करना पड़ता है। निर्णय लेने में केवल पक्ष और विपक्ष नहीं लिखते। जैसे मैं तो करता हूं। शुरुआती दौर में मुझे एक छोटा सा फ्लैट लेना था कि मैं दिल्ली में लूं कि गुड़गांव में लूं। तो मैंने सारे लिखे लेफ्ट साइड में फायदे और राइट साइड में नुकसान और उन्होंने कहा कि नहीं आज की परिस्थिति में ये सही है और ये कर लेना है। तो आप जब खुद से भी डिबेट करते हैं वाद केवल दूसरे से नहीं होता है। आपके
(1:21:14) अंदर जब उलझन में मन होता है तो एक संवाद आपसे करता है कि आप बताओ क्या करोगे? और उसका भी फ्रेमवर्क हो तो बहुत अच्छा है। तो बहुत अच्छा है। ताकि एक हम यह नहीं कहते हैं कि हर वक्त सही निर्णय पे वो पहुंचाएगा। एक आदत सी बन जाएगी आपकी। और कहते हैं कि मनुष्य कुछ और नहीं। अपनी आदतों का पुतला है। तो सही सोच की आदत कर लीजिए। सही तर्क की आदत कर लीजिए। सही संवाद की कर लीजिए। तो जीवन तो अच्छा है। नहीं यह यह पॉइंट भी मुझे बहुत अच्छा लगा कि दोषों के निवारण के लिए भी जो आवश्यक है क्योंकि जैसे मैं जब जॉब करता था बीपीसीएल में और
(1:21:49) वहां कॉर्पोरेट लाइफ में तो होता ही है कि हर संडे पार्टी चल रही है। बॉस के साथ पीना ही है नहीं पिएंगे। मतलब वो एक काइंड ऑफ कल्चर बन जाता है। तो उससे निकलने के लिए आपकी अपने आप से लड़ाई चल रही होती है। क्या होता है कि कुछ दिन तो आप एंजॉय कर लेते हैं। लेकिन फिर आपको लगता है नहीं यार जीवन में कुछ करना भी है। तो अब क्या है जैसे ही ये आया कि जीवन में कुछ करना भी है। तो अब क्या है कि अब वो आप में एक आत्म संघर्ष शुरू हो गया। तो अब मुझे समझ में आ रहा है कि उस समय जो मैंने सोचा समझा वो कहीं ना कहीं न्याय में ही गिर रहा है।
(1:22:20) क्योंकि प्रतिज्ञा लेनी है कि मुझे छोड़ना है। हेतु क्या है? कारण क्या है? कि मुझे कुछ बड़ा करना है। उसके बाद उदाहरण आएंगे कि भाई जो लोग बड़ा किए हैं फिर मैंने क्रिस्टियानो रोनाल्डो को देखा कि भाई वो जीवन में अगर आज स्टार हैं हम उनके ग्लैमर पे क्यों जा रहे हैं? उन्होंने अल्कोहल छोड़ा होगा ना उसको देखो संग फिर उसको अप्लाई करना है। मैंने 15 दिन 20 दिन छोड़ी 30 दिन छोड़ी तो मुझे समझ में आया कि देखिए शराब छोड़ने से मेरा जीवन में क्या परिवर्तन है और फिर उससे वो एक अंत में मुझे निगमन मिला और वो शक्ति मिली कि आज आप भी ये सब कर रहे हैं।
(1:22:51) तो वो जो दोष वाला है ये भी बहुत अच्छा है। हमें इस पडकास्ट से इतना समझ में आ गया कि हमारे न्याय दर्शन में ऐसे फ्रेमवर्क्स हैं जो आपकी उलझनों को आपके दोषों को दूसरों के उलझनों को दूसरों के जो नैरेटिव्स हैं उनको ब्रेक करने के लिए एटलीस्ट आप उनको आत्मसात करके इन चीजों में बहुत उत्तम कर सकते हैं और धीरे-धीरे आप भी तार्किक हो जाएंगे और तार्किक व्यक्ति को कौन नहीं पसंद करता है। आज बोलते भी हैं कि हमारा बच्चा धर्म नहीं साइंस पढ़ेगा क्योंकि उसको तार्किक बनना है। तो आज इस पॉडकास्ट से ये भी लोगों ने देख लिया कि हमारे धर्म में या हमारे
(1:23:24) दर्शन में जो हमारे धर्म का आधार है उसमें कितना तर्क है कि महर्षि गौतम जी ने पूरा 528 सूत्र ही लिख दिए तो बहुत ही अद्भुत पॉडकास्ट रहा अरविंद जी आपके साथ आपने समय दिया चर्चा की हमने पूरा इंश्योर किया कि इस पॉडकास्ट में लोगों को वो क्यूरियोसिटी और आशा दिखे कि ऐसा नहीं है कि आज समाज जिस तरह से जिस तरफ बढ़ चला है तो हम केवल केवल समस्याओं में ही घिरे रहे। सशंस भी हैं। सशंस पर भी हम बात कर सकते हैं। तो अभी आप कुछ मैंने तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] कुछ किताबें नोट कर ली फटाफट कि मैं अंत में फिर से एक बार दर्शकों को बता दूंगा। जैसे एक आपने
(1:24:03) न्याय दी गौतमा बुक बताई थी। फिर न्याय कुषांजलि अगर ईश्वर पर चिंतन करना है न्याय के दृष्टिकोण से। फिर इनका भाष्य न्याय मंजरी की बातति मिश्र की पुस्तक पढ़ी जाए। और अगर आप भाट को पढ़ा जाए। मिश्र के बारे में मैं तर्क संग्रह पढ़ना प्रारंभ किया हूं। वो एकदम ही बेसिक बिलकुल बिलकुल वहीं से शुरू करना है। अगर तर्क के दृष्टिकोण से न्याय दर्शन को पढ़ना है तो तर्क संग्रह से ही शुरुआत करनी चाहिए। तो ऐसे बहुत सारे पुस्तक हैं और एक लंबी लिस्ट है 250 पुस्तक और आपने भी कुछ पुस्तकें लिखी है जी। मेरी पुस्तक का नाम है न्याय फिलॉसफी
(1:24:39) एपिस्टमोलॉजी एंड एजुकेशन। अच्छा जी तो ये Amazon पे मिल जाए तो आपकी भी पुस्तक को लोग देखें क्योंकि क्या है कि कहीं से एंट्री मिले ऐसा भी ना हो कि संस्कृत का दबाव आ जाए और उनको लगे हम अभी संस्कृत नहीं मैंने तो अंग्रेजी भाषा में लिखी क्योंकि मैंने आपसे जिक्र किया था अनौपचारिक बातचीत में हमें कहा गया कि नहीं हिंदी संस्कृत नहीं अंग्रेजी में लिखना है तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] और मुझे खुशी है ये बात कहते हुए कि वो पुस्तक मेरी पहली पुस्तक थी कि वो आज संस्कृत विश्वविद्यालय में भी, एजुकेशन में भी और फिलॉसफी में भी तीनों जगह
(1:25:15) नहीं इनफ हमारे ही पार्टनर ने आपको श्रृंगेरी में सुना था इसलिए बोला था कि हमें अरविंद जी इसके साथ करना है और हम अपना इंग्लिश पडकास्ट भी ल्च करने वाले हैं बहुत जल्दी और उस पर भी बहुत अच्छे से हम काम कर रहे हैं। तो हम चाहेंगे कि इस नॉलेज को हम ग्लोबल भी ले जाएं। भारत के भी बहुत से ऐसे हमारे भारतीय हैं जो हिंदी भाषा को नहीं समझते हैं तो उनके लिए भी हो जाएगा और ये ज्ञान देश विदेश बाहर फॉरेन में भी जाना चाहिए तो हम इंग्लिश में भी आपके साथ जुड़ने के अंत में हम इस पडकास्ट को खत्म करने से पहले एक बात जरूर कहना चाहूंगा
(1:25:50) जी कि देखिए जब लोग हम छात्र थे और आज भी जो शिक्षा के क्षेत्र में पढ़ रहे हैं या जो लॉजिक को समझ रहे या जो मेथड पे काम कर रहे हैं वो पूरा वेस्ट ने हमें दो एक चीजें सिखाई। इंडक्शन इज अपोजिट टू डिडक्शन एंड डिडक्शन इज अपोजिट टू इंडक्शन। आपको ताज्जुब होगा न्याय दर्शन उस संदर्भ में कहता है कि नहीं दोनों एक दूसरे के अपोजिट नहीं है। एक साथ लाओ। दे आर द टू फसेस ऑफ़ द सेम कॉइन। जैसे कॉइन होने के लिए दो हेड एंड टेल दोनों चाहिए। वरना कॉइन नहीं है। एक तरफ घस दीजिए तो सिक्का नहीं चलता था कभी जमाने में। तो आज भी वो कहते हैं। इन्हीं बातों को हमने
(1:26:30) अपनी पुस्तक में और आज साइंटिफिक कम्युनिटी के सामने हम जैसे लोग कहते हैं और खासकर मैं कहता हूं कि नो इंडक्शन इज पॉसिबल विदाउट डिडक्शन एंड नो डिडक्शन इज पॉसिबल विदाउट इंडक्शन। ये न्याय तर्क का ज्ञान हम जैसे लोगों को जो आज भी पढ़ाते किताबों में वही लिखा है। अगर हम भारतीय ज्ञान परंपरा में लौट के और न्याय के तार्किक परंपरा में देखेंगे तो बहुत सारे नैरेटिव्स जो दिए गए जो असत्य आपको प्रतीत होगा और वो तार्किक आधार पर ये नहीं कि सिर्फ कि केवल इमोशनल लगाव है तो एक ये जो आपके श्रोता होंगे जो खासकर मेथड में क्योंकि मेथोडोलॉजी इज द मेन स्टे ऑफ़
(1:27:10) न्याय फिलॉसोफी तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसमें अगर रखते हैं भरोसा और जो लोग इंडक्टिव लॉजिक और डिडक्टिव लॉजिक को गहराई से जानना चाहते हैं उन वो भी अगर यह पढ़ें तो गणित और विज्ञान दोनों के लिए एक बहुत ही अच्छा होगा आपने मुझे कुछ मैं ये बोल रहा हूं कि अभीकि इस पडकास्ट से लोग न्याय में थोड़ा सा इनिशिएट इनिशिएशन हो गया उनका तो अब जो इसमें और एडवांस चीजें हैं जैसे कि मान लीजिए नव्य न्याय है या फिर हमें क्यों हमारा जो लॉजिकल सिस्टम है न्याय का वो कंप्यूटेशनल कैसे क्या आगे बन सकता है या कुछ आसार है कि इसका हम फ्यूचर
(1:27:48) में कैसे उपयोग कर सकते हैं एआई में कैसे कर सकते हैं तो इस पर हम आपसे एक पॉडकास्ट एक फॉलो पडकास्ट जरूर करेंगे निश्चित मुझे खुशी होगी आपने एक मौका दिया कि अपनी बात को आपके चैनल हाइपर क्वेस्ट के माध्यम से उन तमाम श्रोताओं तक पहुंचाऊं जो मतलब शैक्षिक संस्थानों में तो मैं करता रहा लेकिन आम लोगों तक पहुंचे इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। बहुत-बहुत धन्यवाद अरविंद जी समय के
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