Mystery of Manikarnika Ghat: Aghoris, Tantra & Death | Dr. Harsh Pandey on Body to Beiing- Shlloka
Author Name:SHLLOKA
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Transcript:
(00:00) मणिकर्णिका सभी तीर्थों का मणि है। भगवान शिव वहां पर शयन मुद्रा में है। मणिकर्णिका से ही कुछ डिस्टेंस की दूरी पर विशालाक्षी शक्तिपीठ है। मान्यता है कि भगवान शिव उस मंदिर में शयन यानी सोने के लिए आते हैं। मणिकर्णिका पर जाएं और वहां पर चिता ना जल रही हो और मैं दिन और रात दोनों की बात कर रहा हूं। 24ों घंटे अंग्रेजों ने इसे द बर्निंग हार्ट ऑफ इंडिया भी कहा। इट इज अ लार्जर फॉर्म ऑफ काल भैरव। मणिकर्णिका पे कभी भी आप भय का अनुभव नहीं करें क्योंकि यह साक्षात भैरव जी का स्थान है। जितने कदम आप काशी की गलियों में पैदल चलते हैं हर कदम पर आपको
(00:32) अश्वमेध यज्ञ जितना पुण्य प्राप्त होता है। मणिकर्णिका पर एक चक्र पुष्कर्णी तीर्थ है। 12:00 बजे के आसपास 33 कोटि देवी देवता आकर के इसी चक्र पुष्कर्णी तीर्थ में स्नान करते हैं। काशी में अलग-अलग जगहों पर शिवलिंग है। यदि उन शिवलिंग को एक डॉट के साथ आप जोड़ें तो साक्षात शिव जी के आकार में बनते हैं। किनाराम ने मणिकर्णिका के स्थान पर अग्नि ध्वनि एक प्रज्वलित करी जो आज तक 3400 सालों से वहां पर निरंतर जल रही है। एक लाश गंगा जी से बहते हुए जा रही थी। किसी ने उनको ऐसे चुनौतीपूर्ण रूप से कहा कि यह लाश जा रही है। यदि आप वाकई में परम सिद्ध
(01:07) हैं इसको आप जीवित करके दिखाइए। कीनाराम भगवान ने उस लाश को सबके समक्ष में हाथ रखा हाथ ऐसे फेरा जा उड़ गया वो उठ गया। डॉक्टर हर्ष पांडे काशी के रिव्यय टेंपल्स के महंत और काशी अर्चन फाउंडेशन के सीईओ हैं। जिन्होंने काशी की हेरिटेज को प्रिजर्व और प्रमोट करने के मिशन में अपने आप को पूरी तरह से डेडिकेट कर दिया है। उनके लीडरशिप ने काशी अर्चन फाउंडेशन काशी का संदेश पूरे विश्व तक पहुंच रही है और साथ ही उन्होंने विश्व के पहले भैरव गुरुकुल को बनाने का संकल्प किया है जो काल भैरव को समर्पित रहेगा। लाश के आसपास में मणिकर्णिका की पूरी साधना चलती है।
(01:46) जितने अधोरी हैं वो लाशों के आसपास क्योंकि पुण्य आत्माओं के पास में बैठकर के जो पुण्य जो उन्होंने अर्जित किए हैं उस ऊर्जा से जुड़कर के वो अपनी सद्गति, अपनी मुक्ति और अपने स्टेज ऑफ एक्सटसीव ब्लिस में जाने का निरंतर प्रयास करते रहते हैं। शव के ऊपर बैठकर के साधना करते हैं। वो पुण्य आत्मा को भी मोक्ष प्रद निश्चित हो जाता है। कई लोग तो निमंत्रण करते हैं अघोरियों को। कपाल क्रिया क्या है? जो अघोरी हैं जो मणिकर्णिका में रह के अघोर की साधना करते हैं तो उनके साथ में एक जब हम भस्म या तिलक यहां लगाते हैं तो हम हमेशा भैरव
(02:19) महाकाल का अभिषेक कर रहे हैं। मणिकर्णिका घाट को काशी का पंचतीर्थ माना जाता है। क्या कारण है? विश्वनाथ जी जाने से पहले गेट नंबर एक पर ढुंडी यानी ढुंडी राज गणपति का दर्शन हम करते हैं जो काशी के क्राउन प्रिंस भी माने जाते हैं। कौन लोग मणिकर्णिका घाट या दूसरा हरिश्चंद्र है? आई थिंक यही 80 घाटों में से यही दो घाट हैं जहां पर डेड बॉडीज प्रीमेट होती है। पहले पूरा काशी ही महाशम था। इसी दो में क्यों बॉडीज बर्न करी जाती हैं आजकल? आप ओमकारेश्वर जाएंगे तो काशी त्रिशूल पर है। त्रिशूल के तीन खंड हैं। तो जो तीसरा खंड है जो ओमकारेश्वर खंड है ये पांच
(02:52) शिवलिंगों को मिलकर के बना था। इसी ओमकारेश्वर शिवलिंग के समक्ष में भगवान ब्रह्मा को ओमकार स्वरूप का दर्शन हुआ। कुछ जगह है जहां सीक्रेटली बॉडीज बर्न होती हैं आज भी। वो श्मशान की तरह घोषित नहीं है। सीक्रेटली क्यों? मणिकर्णिका घाट में कौन लोग जा सकते हैं और कौन लोग नहीं जा सकते? वहां पर मशाननाथ महादेव एक हैं। उनके पास में भस्म की होली, राग भस्म की होली जो अंगोरी खेलते हैं। मणिकर्णिका घाट हो गया, हरिश्चंद्र घाट हो गया। जो जाना चाहता है उसको अप्रोच क्या करें? यदि हमने कुछ धागा वगैरह पहना है तो उसको बाहर कर लें। थोड़ा प्रोट्यूट कर लें।
(03:25) रुद्राक्ष अगर हमने यदि पहना हुआ है तो रुद्राक्ष हम अपना बाहर निकाल लें। काशी में एक स्थान है वो है पिशाच मोचन कुंड। तो आप देखेंगे बहुत सारे जो मृतक लोग हैं उनके फोटोस के आगे कील से उनको ठोका जाता है। वहां पर एक पेड़ है जहां पर माना जाता है कि भगवान गणपति ने प्रेत ज्ञानेंद्रिय को वहां पर प्रतिष्ठित किया है। इस पद्धति से कि उनको या उन प्रेत को हमने वहां पर बैठा दिया। काशी में कोई भूखा उठ तो सकता है पर कभी भी भूखा सोएगा नहीं। प्रलय के समय में भी काशी का विनाश नहीं होगा। यह आशीर्वाद भी शिवजी ने दिया है। महंत पांडे जी का इंटेंशन है कि वो दुनिया
(03:57) भर के भक्तों को भैरव और काशी के तीर्थ स्थानों से जोड़े ताकि ये ट्रेडिशंस आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे रहे। आज हम गर्व से उनका बॉडी टू बीइंग पॉडकास्ट पर स्वागत करते हैं। आज हम आपको ऐसी जगह ले जाएंगे जहां समय तो रुक जाता है पर धुआं कभी नहीं थमता। काशी द ओल्डेस्ट सिटी इन द वर्ल्ड। रिस्चर्स के मुताबिक यह सिटी 75,000 इयर्स पुरानी है और इस सिटी का सबसे रहस्यमई हिस्सा है मणिकर्णिका घाट। कहा जाता है कि यहां पर एक इंसान क्रिमेट हो जाए तो वो लाइफ, डेथ और रिब्थ की साइकिल से मुक्त हो सकता है। रोजाना यहां 200 से 300 बॉडीज क्रिमेट
(04:37) होती हैं और साल में 1 लाख से अधिक। दुनिया भर में होली गुलाल और रंगों से खेली जाती है। मगर यहां पर इंसानी चिता की राख से होली खेली जाती है। स्वागत है आपका काशी सीरीज के पहले एपिसोड में मणिकर्णिका घाट। प्लीज इस पॉडकास्ट को पूरा देखिए। ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करिए और अगर तो आप इस पॉडकास्ट का एक बेहतरीन ऑडियो एक्सपीरियंस चाहते हैं तो स्पॉटिफाई पे बॉडी टू बीइंग टाइप करें। काशी को कहा जाता है कि इट इज द ओल्डेस्ट सिटी इन द वर्ल्ड। मैं हाल ही में किसी के साथ एक पॉडकास्ट कर रही थी। वो एक रिसर्चर थे और उन्होंने मुझसे कहा कि काशी लगभग
(05:13) 75000 इयर्स पुराना है एंड इट वास बिल्ट मेनी टाइम्स ओवर। कहा जाता है कि अखंड ज्योत तो है ही है। यानी कि जो चिता है वो जल रही है फॉर आई थिंक क्लोज टू 3000 इयर्स। यह भी मैंने कहीं स्टैटिस्टिक पढ़ा। और यह एक पूरा काशी एक यंत्र है। एक तरीके का यंत्र हुआ। अब इसमें मुझे जो सबसे रहस्यमई चीज लगी वो लगी मणिकर्णिका घाट। तो मणिकर्णिका घाट में एक मान्यता है कि अगर तो वहां एक बार आप क्रिमेट हो जाएं तो आप लाइफ, डेथ और रिब्थ के साइकिल से ब्रेक कर सकते हैं। तो आज के इस मास्टर क्लास में मैं चाहती हूं कि आप ए टू जी हमें सब कुछ मणिकर्णिका घाट
(05:47) के बारे में बताइए। स्टार्ट विद द मोस्ट रहस्यमयी, मोस्ट सीक्रेटिव, मोस्ट अननोन फैक्ट्स जो लोग जानते ना हो। तो मणिकर्णिका जैसे समझ में आ रहा है ना, यह तीर्थों का मणि है। जो क्राउन झूल होता है। स्कंद पुराण में एक श्लोक भी आता है ना विश्वेश्वर समुलिंगम। कि काशी विश्वनाथ के समान कोई दूसरा शिवलिंग नहीं। न काशी सदृशी पुरी जो सप्त पुरिया हैं जो सात पुरियों को हमारे सनातन धर्म में सबसे ज्यादा प्रधानता दी गई है। इसमें अवंतिका, कांची, मथुरा सभी ये जो तीर्थ आते हैं उसमें काशी का स्थान सबसे उत्तम रखा गया। क्योंकि काशी मोक्षदायनी नहीं है। काशी
(06:22) महामोक्षदायनी है। वो महामोक्ष दायनी क्यों है? तो जो श्लोक का तीसरा हिस्सा है कि न मण करणिका समो तीर्थम कि मणिकर्णिका के समान कोई भी दूसरा तीर्थ इस धरती पर विराजमान नहीं है। और वह क्यों है? क्योंकि मणिकर्णिका अपने आप में जैसे मैंने कहा सभी तीर्थों का मणि है। जो मणिकर्णिका है उसको इस तरीके से देखें कि भगवान शिव वहां पर शयन मुद्रा में है। जनरली भगवान शिव को हम ध्यानस्थ देखते हैं। पर वहां भगवान शिव शयन मुद्रा में है। मतलब यानी वो लेटे हुए हैं। वो विराजमान है। योग निद्रा जिसको आप कह सकती हैं। हम मणिकर्णिका से ही कुछ डिस्टेंस की दूरी पर
(06:57) विशालाक्षी शक्तिपीठ है। 100 200 मीटर के आसपास जहां भगवती महा आदि शक्ति के लेफ्ट ईयर के लेफ्ट ईयर गिरा था जहां पर भगवती का बाया कान जहां पर गिरा आज भी मान्यता है कि भगवान शिव उस मंदिर में शयन यानी सोने के लिए आते हैं। दोपहर के समय में विश्राम आप देखेंगे तो मंदिर के ऊपर हेडलाइन ही लिखा हुआ है कि भगवान शिव कम्स टू रेस्ट हियर इन द आफ्टरनून अलोंग विद भगवती विशालाक्षी जो कि उनकी अर्धांगिनी मानी गई। तो भगवान शिव यहां शन और पूरा जो एक मणिकर्णिका जो श्मशान हम देखते हैं तो उसमें जो अखंड ज्योति है वो अखंड ज्योति वो जलती हुई चिताएं ही हैं जो हजारों साल
(07:35) से कभी बुझी नहीं। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि अमरणीकर्णिका पर जाएं और वहां पर चिता ना जल रही हो और मैं दिन और रात दोनों की बात कर रहा हूं। 24ों घंटे अंग्रेजों ने इसे द बर्निंग हार्ट ऑफ इंडिया भी कहा। तो अपने आप में जो मणिकर्णिका महाशमशान है इट इज अ लार्जर फॉर्म ऑफ काल भैरव। आप किसी श्मशान घाट पर जाते हैं तो वहां जो तत्व जो सबसे ज्यादा विद्यमान होता है दैट इज ऑफ अ वैराग्य एंड शांति भय भी लगता है श्मशान घाट में जाने से इसीलिए स्त्रियों को विशेषत मना किया जाता है बच्चों को मना किया जाता है क्योंकि इनको माना जाता है जनरली दे आर
(08:13) मोर एनर्जी सेंसिटिव ये एनर्जी को कैच जल्दी करते हैं इसके हिसाब से इनको मना करते हैं परंतु आप मणिकर्णिका पे यदि आप जाएंगे तो मणिकर्णिका पे कभी भी आप भय का अनुभव नहीं करेंगे। मणिकर्णिका पे सदैव आप अभय क्योंकि यह साक्षात भैरव जी का स्थान है। भैरव ही मणिकर्णिका है। मणिकर्णिका ही भैरव है। तो भैरव जहां पर विराजमान हो तो जैसे उनका अर्थ ही है कि भैरव जहां पर होंगे वहां भय नहीं लगेगा कभी भी। भैरव का अर्थ ही भय रहित जो क्षेत्र पूरा हो वो भैरव हो जाता है। यह शरीर भी यदि भय रहित हो तो यह भी भैरव है अपने आप में। तो मणिकर्णिका पर काल भैरव जी का साक्षात वरद
(08:50) हस्त है कि कभी भी किसी को वहां पर भय नहीं लगेगा और साक्षात जो मणिकर्णिका है एक तरीके से भैरव जी के शरीर के स्वरूप में है तो वहां बैठने मात्र से ज्ञान वैराग्य और वहां यदि व्यक्ति ने अंत्यष्टि अपनी करी तो मोक्ष यह शिव जी ने साक्षात इस चीज का वरदान दिया है। अच्छा जी यह बात सत्य है कि अगर तो मेरा क्रिमेशन वहां हो जाए तो मैं लाइफ डेथ और रिब्थ के साइकिल को ब्रेक कर दूं। जी जी ये भगवान शिव ने हमें यह आशीर्वाद और यह प्रॉमिस किया है। लेकिन मैं अपनी लाइफ कंपल्सिवली या पापों के साथ जी सकती हूं। जी फिर मैं जाके वहां पर बोलूं क्या मुझे
(09:25) अपने शरीर मणिकर्णिका घाट में छोड़ने हैं तो क्या मुझे फिर भी मुक्ति मिल जाएगी? नहीं इसके लिए भी भगवान ने एक विधान बनाया है जिसके लिए हम कहते हैं भैरवी यातना। भैरवी यातना तो पहले जब काशी की नगरी बनी वहां पर मणिकर्णिका जैसे तीर्थ थे। गंगा गंगा जी वहां पर पतित पावन उत्तर वाहिनी उत्तर वाहिनी गंगा बहुत कम दिखती है कि उत्तर की तरफ बह रही है हम तो ये काशी में आने के लिए देवी उत्तर वाहिनी हो जाती है भगवान शिव ने अपनी जंगों में धारण करके देवी की दिशा बदल दी काशी में ऐसा हम मानते हैं वैसे नॉर्थ टू साउथ गंगा फ्लो करती है
(09:56) व्यूअर्स के लिए यहां साउथ से ऊपर जा रही है ना जी जी जी तो ये काशी के लिए केवल भगवान शिव और वहां पर काशी में आप देखेंगे तो गंगा का स्वरूप बहुत सौम्य है तो भगवान चाहते थे कि विकराल रूप में भगवती गंगा जिसे हम पहाड़ी क्षेत्रों में देखते हैं उत्तराखंड और उधर की साइड में हिमाचल की तरफ तो वैसा देवी का स्वरूप यहां पर नहीं हमें मिलता है। बहुत ही सौम्य काम हमेशा देखने से ही गंगा को मन में स्थिरता आए ऐसा आप हमेशा देखेंगी तो क्योंकि यहां पर भैरव शिव सभी तीर्थ क्योंकि शिव जी ने अपने लिए काशी को चयनित किया कि मैं काशी में रहूंगा। शिव
(10:29) जी के आने से जितने भी सनातन धर्म में हमारे 33 कोटि देवी देवता हैं जिसमें सूर्य गणपति विष्णु भगवती भगवती के भी नाना स्वरूप सभी मतलब आप कह नहीं सकते काशी में बहुत सारी परिक्रमा यात्राएं इसीलिए होती हैं क्योंकि इतने सारे यहां देवी देवता हैं। एक तरीके से उनको कवर कर पाना ही असंभव है। शिव जी ने स्वयं कह दिया है कि एक जन्म में कोई भी व्यक्ति काशी के सभी शिवलिंगों का दर्शन नहीं कर सकता है। अच्छा। तो हर कोई काशी आना चाहता है इसके लिए कि यहां आने मात्र से जहां मोक्ष मिल जाए। दर्शन करने मात्र से जहां मुक्ति मिल जाए, पैर रख देने मात्र से जन्म जन्मांतर के
(11:04) पाप जहां कट जाएं। पैर रखने से पैर रखने मात्र से। तो ऐसे तो बहुत सारे लोग पैर रखते हैं काशी में। उन सबका मोक्ष है। बिल्कुल। ये अभी मैं आऊंगा इसके सेकंड हाफ पर भी। पर हां ये स्कंद पुराण में निश्चित रूप से वर्णित है कि आप जितने कदम काशी गलियां के लिए बहुत प्रचलित है ना। तो काशी में जितनी गलियां हैं उन गलियों में जितने भी आप भावपूर्ण शिव जी को भाव में ध्यान करते हुए जितने कदम आप काशी की गलियों में पैदल चलते हैं पैदल हर कदम पर आपको अश्वमेध यज्ञ जितना पुण्य प्राप्त होता है। तो ऐसा जभी हुआ यह सब भगवान ने काशी को वरदान
(11:35) दिया। उनके स्थान में रहने मात्र से काशी का जो स्वरूप बना हर कोई अपना जीवन का जो अंतिम समय वो काशी में बिताना चाहता था। इरिस्पेक्टिव उन्होंने जीवन भर क्या कुकर्म या सत्कर्म किए वो अपना अंतिम समय और ये आज भी है। आप देखेंगे काशी में बहुत सारे मुमुक्षु भवन बने हुए हैं। मोक्ष की कामना से जहां पर लोग रह रहे हैं उस भवन में और वो ज्यादातर उसमें एल्डर्ली और कई सारे डिस्कारेड भी होते हैं जिन्होंने मतलब बच्चों ने घर से निकाल दिया। वैसे भी काफी सारे लोग होते हैं और बहुत सारे लोग स्वेच्छा से भी आते हैं। भगवान को जब यह समझ में आया या यह प्रतीत हुआ कि इस वरदान
(12:09) का एक तरीके से दुष्प्रग हो रहा है, दुरुपयोग हो रहा है। तो भगवान ने एक कांसेप्ट क्रिएट किया भैरव जी के दंडाधिकारी बनाते हुए जिसको हम आज भैरवी यातना के रूप में जानते हैं। यानी कि आपने जीवन भर में क्या सत्कर्म किए, क्या कुकर्म किए, काशी में आप कब तक रहे, नहीं रहे। लेकिन जब आपके सामने आपका अंतिम स्वास आप ले रहे होंगे अंतिम सांस आपकी चल रही होगी। ठीक उसके पहले इसी इसी भौतिक शरीर पर आपको दोनों सुख और पीड़ा का सामना करना पड़ेगा इन प्रपोशन टू जो भी आपने पाप या पुण्य किए हैं वो इस शरीर पर भोग करके ही आप अपना अंतिम स्वास लेंगे जिसको हम
(12:47) भैरवी यातना के रूप में जानते हैं तो भगवान सबके साथ हो गए भैरवी यात्रा सबके साथ में प्रपोशन वेरीरी करेगा प्रपोशन वेरीरी करेगा आपके पाप और पुण्य को ध्यान में रखते हुए जो भी आपने सत्कर्म अपने जीवन में किए आप काशी आए नहीं आए वो वो भी फिर फैक्ट नहीं रह जाता है। और इसकी जो जिम्मेदारी है वह साक्षात काल भैरव जी के हाथ में। इसीलिए आप देखेंगे तो काल भैरव जी ने अपने हाथ में दंड धारण किया है। यदि परस्पर हम कंपेयर करें शिव और भैरव के एट्रिब्यूट्स तो फिजिकल आई से कंट्राडिक्ट कर पाना मुश्किल है। कोई कंपैरिजन कर पाना कठिन है क्योंकि शिवजी
(13:20) ने भी हाथ में त्रिशूल धारण किया है। उनके भी तीसरे नेत्र हैं। उनकी भी जटाएं हैं। साक्षात वो भी दिगंबर स्वरूप में है। सर्पों को लपेटा हुआ है। तो कोई अंतर कर पाना वैसे कठिन है। लेकिन एक जो एक तरीके से वेपन भगवान भैरव जी एक्स्ट्रा लेते हैं। वो है दंड जो शिव जी धारण नहीं करते हैं। तो शिव जी जब दंडाधिकारी स्वरूप में हो जाते हैं तो शिव प्लस दंड अगर हमें इक्वल टू भैरव हो जाता है। तो और ये भैरवी यातना के साथ में जितने भी लोग काशी में जन्म लेते हैं तो फिर हम ऐसा मानते हैं कि ऐसे ब्रह्मा जी फिर हमारा लेखाजोखा नहीं लिखते हैं। काशी में जो भी
(13:53) व्यक्ति जन्म लेता है तो उसका जो लेखा लेखाजोखा है यानी दिस जर्नी फ्रॉम बी टू डी जर्नी फ्रॉम बर्थ टू डेथ ये जो जर्नी है तो इस बीच में जो भी उसने पाप किए और कर्म किए सत्कर्म किए तो उनका जो डॉक्यूमेंटेशन है जो हम मानते हैं हमारे धर्म में कि ब्रह्मा जी करते हैं हर व्यक्ति के लिए काशी में यदि किसी व्यक्ति ने जन्म लिया है या काशी में एक बार भैरव जी का दर्शन भी किसी ने व्यक्ति ने किया है उस पॉइंट ऑफ टाइम के बाद उसका लेखाजोखा मृत्यु तक भैरव जी ही लिखते हैं और उसी के अनुसार उसको दंड या फिर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। आपने बोला जिसकी भैरवी यातना होती है काशी
(14:30) में भैरवी यातना तो यह अलग है वो सबको सामना करना है। वो भैरव जी ही वो आपको आपके जैसे मैंने कहा पाप और पुण्य के प्रपोशन में इसी तो लोग कहते हैं ना कि मतलब ये सब इसी शरीर पे भोग के जाना है। ऐसा नहीं है कि अगले जन्म में इसी जन्म में सब काट के जाना है। तो जरूरी नहीं कि लोगों को जो दिखा है जीते जी बहुत सारे लोग कहते हैं ना ये तो बहुत कर्म गंदे किए लेकिन मतलब चले तो अच्छे से गए या फिर इनको ऐसा कोई सामना नहीं अच्छा जीवन इन्होंने व्यतीत किया तो वो क्या व्यतीत किया और जब वो स्वास छोड़ रहे थे तो वो तो हमने देखा नहीं ना हम कभी अनुभव कर सकते हैं उस चीज
(15:03) को तो इसीलिए जनरली ये कहा जाता है भैरवी यातना ये है पर भैरवी यातना आपको मिलेगा किससे जो भी लेखाजोखा आपके पाप कर्मों का है उसके अनुसार ही मिलेगा तो जीवन भर उनका लेखाजोखा होना भी तो तो वो जो लेखाजोखा है यानी जो डॉक्यूमेंटेशन है आपके लाइफ लॉन्ग जब भी आप जो एक काम कर रहे हैं जैसे मैं आपसे बात भी कर रहा हूं या आप मुझसे बात कर रही हैं इस संवाद को जो सुन रहे हैं तो छोटे से छोटी चीजों में भी अगर पाप पुण्य के हम भागी बनते हैं या इन जनरल कोई भी सत्कर्म हम करते हैं तो वो जो है उसको हमारे सनातन धर्म में ब्रह्मा जी लिखते
(15:35) हैं किसी भी व्यक्ति के लिए जैसे हमने जन्म ले लिया जन्म से लेकर के मृत्यु तक उस लेखाजोखा को ब्रह्मा जी हमारे लिए तैयार करते हैं। परंतु काशी में यदि आपने जन्म लिया या काशी में एक बार भी आकर के भैरव जी का दर्शन आपने किया तो दर्शन करने के उस पॉइंट ऑफ़ टाइम के बाद से लेकर के डेथ तक ब्रह्मा जी हैंड ओवर कर देते हैं भैरव जी को। फिर भैरव जी आपके एक तरीके से कार्यभार वो संभालते हैं। वो सर्वे सर्व आपके हो जाते हैं। हम हम बहुत कम लोग जानते हैं कि मणिकर्णिका पे एक चक्र पुष्कर्णी तीर्थ है। मणिकर्णिका तो है जो अपने आप में जैसे मैंने कहा
(16:06) साक्षात भैरव और सदा शिव का स्वरूप है। पर मणिकर्णिका पर एक चक्र पुष्कर्णी तीर्थ है। और बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रतिदिन दोपहर 12:00 बजे मध्यान काल के आसपास हमारे धर्म के सभी 33 कोटि देवी देवता आकर के इसी चक्र पुष्करणी तीर्थ में स्नान करते हैं और साल में एक बार ही सबके लिए खुलता है जो अक्षय तृतीया के दिन पर जिस दिन पर हम आज ये संवाद कर रहे हैं आपके साथ में इसी दिन पर काशी में अभी वहां पर लोगों का हुजूम टूटा होगा इसी चक्र पुष्कर्णी तीर्थ में स्नान करने के लिए हम जी और मणिकर्णिका अपने आप में एक गुण रहस्य मणिकर्णिका अनुभव करने का विषय है। जब भी
(16:44) आप मणिकर्णिका पे जाते हैं तो कई सारे लोग आपको अवघड़ सन्यासी तांत्रिक योगी और वो तरह-तरह के क्योंकि आज के समय में कलयुग का प्रवेश हर जगह पर है। वो मणिकर्णिका में भी है। परंतु फिर भी यह दावा है कि आज के समय में भी ऐसे ऐसे सिद्ध पुरुष मणिकर्णिका पर बैठकर के तप और जप कर रहे हैं जो संभवत पूरे ब्रह्मांड में आपको कहीं भी नहीं दिखेंगे। वो कितने युग वर्ष से वहां पर रह के यह कर रहे हैं हमें भी नहीं जानता। घोड़ी का जो रियल स्वरूप है यदि आपको अनुभव करना है एक दिन आप मणिकर्णिका पर बिताएं। आप या तो आपके जीवन जीने की शैली जो आप है उस पर
(17:21) प्रश्न करने लगेंगे या फिर आपकी जो सोचने का तरीका है वो सदैव सदैव के लिए एक रिवोल्यूशनरी स्टेट में मतलब एक गजब का चेंज उसमें आएगा। मणिकर्णिका में आप किसी भी व्यक्ति को देख के जज नहीं कर सकते कि इसकी अपनी जर्नी क्या रही है। इसका अपना स्पिरिचुअल प्रैक्टिस क्या रहा है। हम लोग तंग रह जाते हैं। कभी-कभी साधकों के साथ में बैठते हैं। एक मेरा इंसिडेंट रहा कि काशी में एक यात्रा होती है जिसे अंग यात्रा हम लोग जानते हैं। तो काशी में अलग-अलग जगहों पर काशी के अपने अभिमुक्त क्षेत्र में शिवलिंग हैं। यदि उन शिवलिंग को एक डॉट के साथ आप जोड़ें तो वो जो
(17:58) डॉट्स बनते हैं वो साक्षात शिव जी के आकार में बनते हैं। तो वो है क्या? तो अलग-अलग शिवलिंग जहां-जहां प्लेस्ड हैं हर शिवलिंग शिव जी के एक अंग को रिप्रेजेंट एक ऑर्गन को रिप्रेजेंट करता है। इसीलिए इसे अंग यात्रा कहते हैं। तो इसी क्रम में हम लोग मणिकर्णिका पर आए थे। क्योंकि मणिकर्णिका पर भी एक ऐसा शिवलिंग है जिसे मणिकर्णिकेश्वर महादेव के नाम से जानते हैं जो भगवान शिव का बाया दाहिना हाथ राइट हैंड माना जाता है अंग यात्रा के क्रम में वहां पर मेरी भेंट हुई एक साधक के साथ में जो लगभग नग्न अवस्था में केवल और केवल एक काला कपड़ा काला पट्टा उनके देह पर था
(18:36) विभूतिधारी थे और अकेले एकांत में वह बैठे हुए थे तो काला कपड़ा था तो मेरी रुचि जनरली ऐसे बढ़ी कि किस तरीके तरीके से भैरव साधक मुझे लगे जो कि वो थे भी जाकर के मैंने बात किया तो वो हार्व से लॉ में पीएचडी थे तो ऐसेऐसी विभूतियां बैठकर के मणिकर्णिका पर जप तप योग करती हैं और आप यह अक्सर सुनेंगी कई सारे लोग मणिकर्णिका में विशेषतः स्त्रियां कई सारे वीडियोस भी इंटरनेट पर वायरल हैं कि वो जाती हैं एक तरीके से दे गेट इंटू अ स्टेट ऑफ़ ट्रांस या दे लूज़ देयर स्टेट ऑफ इमोशंस क्योंकि जो एनर्जीज़ हैं वहां पर इतनी हाई है और रनिंग है और प्रतिदिन जो कर्म है बड़े से
(19:15) बड़े तांत्रिक योगी भी जो रहे जैसे हमारे यहां अघोर पीठ के जो स्थापति रहे कीनाराम आज भी उनको सदा शिव का स्वरूप माना जाता है। साक्षात शिव जी जिसके ऊपर हाथ रख दिया मनोकामना कभी ऐसा नहीं हुआ कि सिद्ध ना हो वो अघोर पीठ के संस्थापक माना गया कीनाराम महाराज को अभी भी है वो नहीं अभी तो नहीं ये आज उनका स्थान है समाधि है काशी में जिसे कीनाराम आश्रम या अघोर पीठ के रूप में पूजा इन्होंने क्रीम बीज की सिद्धि करी थी पूरी इनकी पद्धति और ग्रंथ भी है तो मंत्रों में क्रीम लगा के जो भी कामना होती थी वह भक्तों की प्रद करने में उनको साधना में आगे बढ़ने में यह
(19:51) मदद करते थे और इन्होंने माता हिंंगलाज जो शक्तिपीठ पाकिस्तान में आज हम जानते हैं हम माता हिंंगलाज को इन्होंने जागृत किया था। इनकी साधना इन्होंने सिद्ध करी थी। जैसे रामकृष्ण परमहंस ने काली को किया था। जैसे रामकृष्ण परमहंस ने काली को किया था। साक्षात मतलब शिव का ही अवतार भगवती के उपासकना के रूप में और अघोर पीठ की स्थापना क्योंकि ये वो भी चक्र समय था जब अंग्रेजों और मुसलमानों ने अपने पंथ को हमारे हिंदू धर्म और हमारे दर्शन पर काफी थोपने का प्रयास किया था। तो उस समय कहते हैं ना कि जब जब इस तरीके का अंधकार का एक समय आता है तो शिव और सदैव अपने रूप में
(20:24) इसे हम लोग छत्रपति शिवाजी को जानते हैं। तो वैसे ही वापस से अघोर पंथ की स्थापना और अघोर साधना को आगे बढ़ाने के लिए कीनाराम ने कितने नाना लोगों को उन्होंने अघोर साधना की तरफ प्रेरित किया और आज भी उनका दर्शन पढ़ के कितने लोग अघोर साधना की तरफ प्रेरित होते हैं। अघोर जीवन के बारे में अघोर दर्शन के बारे में जानने के लिए उत्सुक होते हैं। आज भी वहां पर उस किनाराम कुंड किनाराम जो आश्रम है वहां पर एक क्रीम कुंड है। जहां पर क्रीम बीच के माध्यम से उन्होंने उस कुंड को सिद्ध किया और देवी इंगलाज को वहां पर जागृत किया। अभी भी
(20:56) अभी भी प्रत्येक भाद्रपद जो भादव का महीना होता है जनरली कृष्ण जन्माष्टमी के जस्ट दो दिन पहले उस पीरियड के आसपास में जो षष्ठी तिथि है वहां लाखों महिलाएं आज भी जाकर के स्नान करती हैं लाखों की संख्या में और महिमा है उस दरबार की जिसने भी स्नान किया या जो भी कठिन से कठिन समय में गया सदैव उसको मार्गदर्शन मिला क्योंकि वो गुरु के स्वरूप में वहां विराजमान है। माताओं की वहां पर गोद भरी और पुत्र जितने थे जिनको भी कोई चर्म रोग था, कुष्ठ रोग था, स्किन से रिलेटेड प्रॉब्लम था, कॉग्निटिव डेवलपमेंट कम था। वैसे लोग जाकर के वहां दर्शन करें तो सदैव उनको अच्छा
(21:34) कुशाग्र बुद्धि, शार्प माइंड और इंटेलेक्ट का आशीर्वाद आज भी मिलता है। इतनी करिश्मा है और इतने मिरेकल्स हैं कि कहानी कम पड़ जाएगी किनाराम की। उन किनाराम ने मणिकर्णिका के स्थान पर। अच्छा। उन किनाराम ने मणिकर्णिका के स्थान पर अपने कालू डोम जो वहां के उनके गुरु बने। उनकी प्रेरणा समुदाय की उनकी प्रेरणा से वहां पर अग्नि ध्वनि एक प्रज्वलित करी जो आज तक तीन 400 सालों से वहां पर निरंतर जल रही है। आज तक कभी भी वो धनि बुझी नहीं। तो ये मुझे लगता है बहुत कम लोग इन मणिकर्णिका की चीजों के बारे में जानते हैं। हम हम ओके आपने कुछ मिरेकल्स की बात करी।
(22:09) मुझे बताइए इन मिरेकल्स के बारे में। मणिकर्णिका में जो हुए हैं जिसका लॉजिकल या साइंटिफिक कोई आंसर है नहीं। एक तो आर्किटेक्चरल मिरेकल है मणिकर्णिका पर आप वहां पर देखेंगे तो रत्नेश्वर महादेव का वहां पर एक मंदिर लीनिंग टावर ऑफ पिज़्ज़ा है हमारा नहीं उससे भी एक लीनिंग टावर ऑफ़ पिज़्ज़ा प्रो अगर हम लोग कहें क्योंकि जो जिस एंगल पर लीनिंग टावर ऑफ़ पिज़्ज़ा है उससे भी बड़े एंगल पर और लीनिंग टावर ऑफ़ पिज़्ज़ा को तो आर्किटेक्ट्स ने प्लान करके बनाया है ना लेकिन ये सदियों सदियों से यहां पर जो महादेव का मंदिर है वो वैसे ही और गीली मिट्टी पर क्योंकि हमेशा वो इनडेटेड रहता
(22:44) है गंगा जी वहां से आती जाती रहती हैं। तो मंदिर आधा समय वो डूबा रहता है। वैसे मिट्टी पर भी वो उस एंगल पर टिल्टेड है। तो एक तो यह मिरेकल मुझे लगता है बहुत ही मतलब पूरे भारतवर्ष क्या मुझे लगता है पूरे विश्व भर में ऐसा आर्किटेक्चरल मिरेकल बहुत ही कम होगा। साइंटिफिकली एक्सप्लेन ही नहीं किया गया कि ऐसा क्यों है। काफी लोगों ने प्रयास किया है इसके पीछे कि क्या कारण रहा होगा। पर अभी तक कोई ठोस पेपर आप इस पर आप देख नहीं पाएंगे कि एग्जैक्टली क्या उस समय प्रयोग किया गया। बेस में क्या यूज किया गया कि आज भी हम उस स्ट्रक्चर को वैसे ही इंटैक्ट देखते हैं।
(23:18) एक भी इंच या डिग्री इधर-उधर नहीं। वैसे का वैसा हम एक चमत्कार कह सकते हैं और ये अघोर सम्राट किनाराम को छोड़कर के संभवत कोई कर कह नहीं सकता या कोई कर नहीं सकता। जिसके साक्षी सभी काशीवासी बने थे। उन्होंने प्रत्यक्ष देखा कि एक लाश गंगा जी से बहते हुए जा रही थी। तो और वह अपने में मतलब मस्त रहते थे किनाराम भगवान तो किसी ने उनको ऐसे चुनौतीपूर्ण रूप से कहा कि यह लाश जा रही है यदि आप वाकई में परम सिद्ध हैं तो इसको आप जीवित करके दिखाइए। तो कीनाराम भगवान ने उस लाश को सबके समक्ष में हाथ रखा हाथ ऐसे फैला जा उठ गया वो उठ गया। ऐसा प्रत्यक्ष मिरेकल मतलब सोच से
(24:02) परे व्यक्ति सोच भी नहीं सकता है कि आज के समय में ऐसी घटना हो सकती है। वैसे भी योगी तपस्वी हमारे काशी में रहकर केनाराम भगवान ने उन्होंने सनातन और अोर पंथ की स्थापना और जागृति की। लाश के आसपास में मणिकर्णिका की पूरी साधना चलती है। जितने अघोरी हैं तो वो लाशों के आसपास क्योंकि कई सारी पुण्य आत्माएं भी मणिकर्णिका पर आती हैं। अच्छा और कई सारे पाप कृत आत्माएं भी काशी में आती हैं। भाई उसमें अब क्रिमिनल भी तो आ रहा है। क्रिमिनल भी क्रिमेट हो रहा है। संत महात्मा भी वही क्रिमेट हो रहे हैं। विशेषता अघोरी कुछ ऐसे होते हैं कि जिनको
(24:37) अपना तपोबल बढ़ाना होता है। वह तो पुण्य आत्माओं के पास में बैठकर के जो पुण्य जो उन्होंने अर्जित किए हैं उस ऊर्जा से जुड़कर के वह अपनी सद्गति, अपनी मुक्ति और अपने एक स्टेज ऑफ एक्सटसीव ब्लिस में जाने का निरंतर प्रयास करते रहते हैं कि कब वैसा एक पोर्टल उनके लिए खुल जाए और उनके माध्यम से वो अपनी जर्नी में आगे बढ़ जाए। तो कई सारे आप विजुअल्स देखेंगे अघोड़ियों का मणिकर्णिका पर आप यह किसी विश्व में श्मशान पर नहीं देख सकती। शव के ऊपर बैठकर के साधना करते हैं वहां पर मणिकर्णिका के घाट पर और उसमें परपेक्ष जैसे मैंने कहा
(25:11) यही होता है और इसमें जो अगोर पंथ के हैं वो यह मानते हैं कि अगर व्यक्ति उस केस में जो भी व्यक्ति है जो पुण्य आत्मा है यदि उनसे पुण्य ले रहे हैं या ऊर्जा ले रहे हैं वो पुण्य आत्मा को भी मोक्ष प्रद निश्चित हो जाता है यदि अघोरी बैठकर के उसके ऊपर साधना या उसके आसपास सन्निधि में साधना करते हैं तो कई लोग तो निमंत्रण करते हैं अघोरियों को कि उनका क्रिमेशन हो उसके उसके पहले कई सारे जो पापकृत आत्माएं होती हैं क्रिमिनल्स इत्यादि बहुत सारे जो क्रिमेट होते हैं तो वहां के केस में भी वो अघोरियों को निमंत्रित यदि वो स्वीकार
(25:43) करें तो कि मतलब इन्होंने तो जीवन में रहते हुए कोई अच्छा काम किया नहीं तो अभी मरणोपरांत इनके पास में यदि आप आशीर्वाद कर दें आप इनके शव पर हाथ रख दें यहां आप इनके सन्निधि में या इनके ऊपर बैठकर साधना करें तो संभवत यह भी मुक्ति को प्राप्त हो जाएंगे। यह भी एक ऊंचे लोक को प्राप्त करेंगे। इस कामना से कई सारे अधोरी आप हमेशा देखेंगे तो उनकी सभी साधनाएं वो शव के आसपास में भटकती है। सबके आसपास में होती रहती है। हम ये अधोरी साधना जो मणिकर्णिका घाट में होती है इसके बारे में थोड़ा बताएंगे क्योंकि मैंने तीन साधनाओं के बारे में
(26:12) पढ़ा। अघो साधना, तंत्र विद्या और शक्ति उपासना और कपाल क्रिया भी शायद से कोई क्रिया है। यह चारों अलग नहीं एक तरीके से एक में इंटरलिंक्ड ही हैं। जो अघोर है वो भगवान सदा शिव का दक्षिण देखता हुआ मुख है। जब देवी शिव जी के दक्षिण हिस्से में बैठकर के तंत्र को सुनती हैं तो वो अघोर क्रिया हो जाती है। अघोरी साक्षात शिव ही हैं। उनका जो सबसे विशेष मंत्रों में भी सबसे विशेष मंत्र जो है जो भय को मुक्त करने वाला और शिव की भक्ति प्रदान करने वाला वो भी अघोर मंत्र ही कहा गया। महाकाल मंदिर में जो भस्म भी चढ़ती है संभवत उसमें अघोर
(26:47) मंत्र का ही प्रयोग जो मुझे वहां के साधकों ने बताया। और शिव जी को भी जनरली अगर हम भस्म चढ़ाते हैं, विभूति चढ़ाते तो सदैव अघोर मंत्र कह के ही हमें उनको अर्पित करना चाहिए। जरूरी नहीं कि हम अघोर साधना कर रहे हैं या नहीं। वो मंत्र है अघोरेभ्यो दघोरेभ्यो घोर घोर तरभ्यः सर्वेभ्य सर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्र रूपेभ्यः तो साक्षात जो रुद्र के अवतार में है वही अघोरी है वही शिव है और उनकी स्वरूप में रह के जो साधना है इनके पंथ में ऐसा माना जाता है कि हम शिव को किस-किस स्टेट में याद कर सकते हैं मतलब वो अच्छे से अच्छे में भी
(27:24) शिव है बुरे से बुरे में भी शिव है स्वर्ण का कोई पात्र है। अगर सोने का कोई यूटेंसिल है, वेज़ल है, उसमें भोजन मिल रहा है, तो उसमें भी शिव है। और जमीन में जो खाना गिर गया है, उसमें भी शिव है। अगर जो ह्यूमन बॉडी है वो उसका जो फ्लश है उसमें भी शिव है। जो चावल है उसमें भी शिव है। तो ये जो ड्यूलिटी का जो भेद हमारे मन में एकिस्ट करता है। यह भेद खत्म हो जाए। इसके निमित्त और हर स्टेट में जब वो भेद समाप्त भी हो रहा है या वो भेद हमारे मन में है भी। हर स्टेट में रहकर के हम शिव की ध्यान और योग को कर पाएं। बेसिकली यही समरी है
(27:59) अघोर साधना का कि हम अच्छे से अच्छे बुरे से बुरे अच्छे बुरे का जो फर्क है ये कैसे हम समाप्त करें कि हम सब में शिव खोजते हैं। इसीलिए आप काशी में जब इन अ घोड़ियों से आप मिलेंगे तो आपको अच्छा बुरा हमेशा शिव महादेव यही कह के बोध करेंगे। उनमें सबको मेन यही है कि शिव तत्व से कैसे जुड़ें और शिव तत्व तो सर्वस्व है, सर्वत्र है, सब में विराजमान है। उस शिव तत्व को हम अपने जीवन में कैसे उतारें और अच्छे बुरे का भेद खत्म कर दें। शिव जी अपने एकांत को सजाते हैं। शिव जी का कोई श्रृंगार अगर देखें तो भस्मधारी और क्या कहते हैं? दिगंबर स्वरूप में पूरे आसमान
(28:36) को उन्होंने वस्त्र बनाकर के धारण किया हुआ है। तो शिव जी का स्वरूप है। परंतु जो अघोरी जो बैठकर के वहां ध्यान करता है वो अपने एकांत को जैसे शिव जी एक एकांत में बैठे रहते हैं। वो अपने एकांत को सजाना चाहता है। एकांत को सवारना चाहता है। तो अघोर साधना उस एकांत को सजाने का माध्यम है। जो आपको उस रास्ते से लेकर के जाता है जिस रास्ते पर आपको अच्छे और बुरे का भेद रह नहीं जाता। वो समाप्त हो जाता है। तो इसलिए वो लोग कहा जाता है ह्यूमन फ्लेश को खाते हैं। जी हां खाते हैं मणिक। खाते हैं। कच्चा फ्लश खाते हैं। कच्चा फ्लश खाते हैं।
(29:08) डाइजेस्ट कैसे कर लेते हैं? यही तो रहस्य है मणिकर्ण का। बिकॉज़ हम कहते हैं जैसे योग में कि रॉ मीट को करीबन 72 आवर्स लगते हैं डाइजेस्ट होने में। तो ह्यूमन फ्लेश है। तो कार्मिक स्ट्रक्चर बहुत सॉलिड रहता है हमारा। मतलब एक साइंटिफिक चीज मेरे दिमाग में आई। जी। तपस्या होगी शायद से इतनी समप्राण जनरेट होती होगी नहीं। इसीलिए तो महा और परम योगी है ना और सबके बस की बात नहीं है और अोर पंथ कितने जन्मों की आपकी साधना और तपस्या हो तब जाकर के इस मार्ग में आता है। आप सोचिए जिस शिव जिस स्वरूप में स्वयं है विद्यमान उस स्वरूप से उस स्टेट से आप आना चाह रहे
(29:44) हैं मिलना चाह रहे हैं। अघोरियों का जो साधने का पंथ है वो यही शिव को साधना और उस स्टेट में साधना जिसमें हम भगवान को देखते हैं ध्यानस्थ जिसमें हम देखते हैं एकांत में उस उस स्टेट में पार्वती के साथ भी भगवान नहीं है। वो एकांत में ही बैठे हुए हैं। उसी एकांत को सवारने का प्रयत्न करते हैं। और उस चीज को करने के लिए जैसे मैंने कहा फिर ह्यूमन फ्लश ह्यूमन मीट अच्छा है नहीं है और एनिमल का भी फ्लश खाते हैं। लेकिन वो फिर उनके लिए कोई भेद नहीं रह जाता है। हम हम कपाल क्रिया क्या है? एक पंथ है भैरव साधना में। और भैरव में जो अष्ट भैरव हैं जो काशी में आठों
(30:19) डायरेक्शंस से जिनको गवर्न और गार्ड करते हैं उसमें जो आठवें भैरव हैं आठवें भैरव हैं बेसिकली वो कपाल भैरव हैं। उनका नाम है कपाल भैरव जो एथ अमंग अष्ट भैरव से तो कपाल भैरव या इन जनरली जो भैरव साधक होते हैं वो हाथ में अपने खप्पर लेकर के चलते हैं। स्कल लेकर के चलते हैं। कपाल ही जिसको भगवान काल भैरव जी के कनिष्ठ की उंगली से ब्रह्मा जी का कपाल चिपका उनको ब्रह्म हत्या का दोष लगा तो वो जब विचरण करते हुए वैुंठ धाम में गए तो वहां शिव जी ने उनको आज्ञा की कि आप काशी में आइए जैसे ही उन्होंने काशी में पैर रखा तो जिस स्थान पर उनका कपाल छूटा वो स्थान हुआ
(30:56) कपाल मोचन तीर्थ कपाल मोचन तीर्थ और जो मंदिर जहां आज पूजा जाता है वह हुआ कपाल भैरव जो अष्ट भैरव जो यह डायरेक्शन से काशी को घाट कर रहे हैं उनमें से एक भैरव है। आप देखेंगे क्रिमेशन जब व्यक्ति का पूरा हो जाता है तो लास्ट में उसका पूरा शरीर तो जल जाता है। कुछ बचता है तो उसका स्कल है। वो खोपड़ी नहीं जलती है। तो जो डोम है वहां पर वो अंत में उस स्कल के ऊपर बांस से प्रहार करते हैं। उसको तोड़ने के लिए बांस का प्रहार उस मस्तक पर करते हैं। तो एक तो इसको कपालकी कहा जाता है। दूसरा जो अघोरी है जो मणिकर्णिका में रह के अघोर
(31:36) की साधना करते हैं तो उनके साथ में एक खप्पर होता है हमेशा तो खप्पर रखते हैं और उसी खप्पर में बेसिकली वो यह प्रयास करते हैं जो भोग वो अर्पित करते हैं तो हमेशा वो जो कपाल जो ह्यूमन इंटेलेक्ट है ह्यूमन माइंड है जो ह्यूमन बॉडी से अटैच्ड है उस कपाल को उसमें सिद्ध करना चाहते हैं उस खप्पर में बेसिकली उनका इंटेंशन या ऐम यह होता है क्योंकि उसमें भोग आप अर्पित कर रहे हैं अर्पित कर रहे हैं आप भैरव और सदा शिव को वहां पर मणिकर्णिका में रह के तो हमने अपना मस्तक या हमने अपना जो माइंड है वो आपके चरणों में रख दिया भोग के स्वरूप
(32:09) में कि हमारा जो मस्तक है वो आपके चरणों में पड़ा रहे। बेसिकली जो समरी है कपाल साधना का या खप्पर साधना का वो इस कंडीशन में होता है और यह इसका एक बहुत ही नवांस्ड फॉर्म या ज्यादा प्रचलित फॉर्म जो है वो आप भैरव मंदिरों में देखेंगी जहां हर लोग जाकर के शराब चढ़ा रहे होते हैं। तो बेसिकली वो शराब कहां जाता है? तो भैरव मंदिर में जो खप्पर रखा होता है भैरव मंदिर में वही शराब अर्पित की जाती है। सही फॉर्म तो उसका यह होना चाहिए जभी हम कॉन्शियसली अनकॉन्शियसली जाने अनजाने में कर रहे हैं कि हमने जो अर्पित करी वो शराब वहां पर तो हमारे अंदर की जो नकारात्मकता
(32:44) है, जो मत्स्य है, माध्य है, क्रोध है, लोभ है, जो भी नाना प्रकार की हमारी दिक्कतें हैं या दुख भी है या फिर हमारे अंदर जो बुरी आदतें भी प्रवेश कर गई हैं। अल्कोहल एडिक्शन हो सकता है। किसी भी तरह का ड्रग एडिक्शन हो सकता है। तो वो हम सब छोड़ने के लिए और नकारात्मकता अपनी नेगेटिविटी बाबा भैरव के चरणों में छोड़ने के निमित्त हम जाकर के जो शराब है उनके खप्पर में अर्पित करते हैं। तो भैरव जी जैसे हाथ में उन्होंने ब्रह्मा का जो कपाल धारण किया है तो बेसिकली वो वो हम सबका ही कपाल है एक तरीके से उसको ही रिप्रेजेंट कर रहा है। तो भैरव आपके माथे का जो ये
(33:16) एलिमेंट है ना इसको गवर्न करते हैं। हम हमेशा भस्म भी यहीं लगाते हैं। तो जबजब हम भस्म या तिलक यहां लगाते हैं तो हम हमेशा भैरव महाकाल का अभिषेक कर रहे हैं। जब जब हम तिलक लगा रहे हैं क्योंकि वो साक्षात समय के स्वरूप है। हम काशी में कोई पूजा पाठ यज्ञ करते हैं तो कभी हम पंचांग खोल के नहीं देखते कि आज अच्छा समय है करने के लिए या नहीं है। ओके क्योंकि हम ये मानते हैं कि साक्षात महाकाल भैरव ही काशी में विराजमान है। और वो ड्यूलिटी नहीं होनी चाहिए। नहीं जी। तो काल भैरव समय के देवता समय के ऊपर जिन्होंने अधिपत्य किया वो ही जब काशी में
(33:45) विराजमान है तो सारा समय अपने आप शुभ हो जाता है। ऐसा मान करके हमेशा हम उनकी पूजा करते हैं। और इससे आप रिलेट भी कर सकती हैं। कभी आप लेट हो रही हैं। कोई स्ट्रेस है तो आप अपने हाथों में फील नहीं करती। हमेशा आप अपने माइंड पर यहां ही फील करेंगी। आप कहीं जाने में आपको लेट हो रहा है, कोई स्ट्रेस हो रही है, ए्जायटी हो रही है। तो, वह यहां पर बैठे हुए हैं। इसीलिए उनको भय रव भय से जो आपको रहित कर दे। है ना? क्योंकि अक्सर और ज्यादातर साधनाओं में जैसे कपाल साधना या खपर साधना भी होती है उनका तात्पर्य यह होता है कि हमारा जो अपने मन के अंदर भी बैठा हुआ जो
(34:17) डर है वो किसी भी चीज को लेकर के हो सकता है। वो फाइनेंशियल सोशल लीगल कुछ भी हो सकता है। कोई प्रॉब्लम हो सकती है। तो अक्सर क्या होता है वो प्रॉब्लम उतनी बड़ी नहीं होती है। लेकिन उस प्रॉब्लम के बारे में सोच करके जो अपना डर है वो हम प्रॉब्लम से भी बड़ा बना देते हैं। तो यह साधना उस डर को खत्म करने की एक प्रक्रिया है। हम हम ओके यहां पर कुछ आपने मुझे बोला था पुण्य आत्माएं भी होती हैं, प्रेत आत्माएं भी होती हैं। जी प्रेत आत्माएं भी आती हैं मुक्ति पाने के लिए यहां पर? देखिए काशी तो मोक्षदायनी है। हम काशी में जैसे मैंने कहा भगवान शिव का वरद
(34:53) हस्त है कि मच्छर भी मरेगा तो परम गति को प्राप्त करेगा। वो हो नहीं सकता ना टेक्निकली स्पीकिंग। कहते हैं ना कि ह्यूमन बर्थ ही लिबरेट कर सकता है। जो 64 लिबेरेट नहीं कर सकता तो भी आप अपने आने वाले योनि में तो आगे बढ़ सकते हैं ना। वो मच्छर नहीं बनेगा। आगे कुछ और बेहतर बनेगा। तो यह भगवान शिव का आशीर्वाद है इस धरती पर कि वो हर किसी को परम गति प्राप्त कराएं। माने उसकी अपनी गति में जो हाईएस्ट पॉसिबल जो स्टेट है वो मच्छर के लिए भी है वो इंसान के लिए भी है। यह भगवान शिव का वृद्धस्थ है। पर कर्मों के आधार पर यदि व्यक्ति ने अपने कुकर्म ज्यादा और सत्कर्म
(35:27) कम किए हैं तो उन आधार पर कई बार ऐसा होता है या विशेषतः ऐसे परिवार और केसेस में देखा जाता है। यदि अननेचुरल डेथ हुआ हो तो डेथ बाय सुसाइड, डेथ बाय एक्सीडेंट, डेथ बाय ड्राउनिंग या बहुत पेनफुल मतलब एक लंबा प्रोलोंग पीरियड वो व्यक्ति डेथ बेड पर ही पड़ा रहा। वेंटिलेटर पर लंबे समय तक थे, डेथ बेड पर थे। प्राण ही नहीं छोड़ रहे हैं। पैरालिसिस जी। ऑब्वियसली इस तरह के जो केसेस और बहुत ही कष्टदायक मृत्यु जिनको होती है। कई बार क्या होता है इनके केसेस में यह रेयर है लेकिन होता है अंत्यष्टि के बाद भी इनको मुक्ति नहीं मिलती है। यह पितृ योनि में
(36:06) नहीं जाते। जैसे हमारे जो पूर्वज हैं जिनका हमने अंत्यष्टि कर दिया, सत्कर्म सब कर दिया तो हम मानते हैं ये हमारे पितृ हो गए। पर ऐसी आत्माओं का यह प्रेत योनि में चले जाते हैं। यह प्रेत योनि में चले जाते हैं और वहीं पर कई बार हमें लक्षण मिलता है जिसको आज के समय में हम पितृ दोष जानते हैं। फिर वह हमारे स्वप्न में माध्यम से आकर के हमें इंंकित कराते हैं। हमारी जिम्मेदारियों को याद कराते हैं। यदि परिवार में लंबे समय से कोई पिंडदान कोई सत्कर्म अन्नदान का कर्म ना हुआ हो। परिवार की तीन पीढ़ियों में किसी का भी अननेचुरल डेथ हुआ हो। क्योंकि पितृ दोष
(36:43) ऐसा है वह हमेशा कुंडली में प्रत्यक्ष नहीं होता है। वो आप जीवन के कई सारे आधार और पहलू से भी निकाल करके आप समझ सकते हैं कि हां इनको पितृ दोष है। अच्छा जैसे कि यदि कुल की वृद्धि नहीं हो रही है। संतान प्राप्ति में कठिनाई हो रही है। कोई भी काम नहीं बार-बार काम अटकना खाने में बाल बार-बार मिलना। ये सब संकेत है पितृ दोष का। तो यदि ये चीज बार-बार हो रही है तो संभवत और आपके पिछले तीन पीढ़ियों में किसी की भी इस प्रकार से मृत्यु हुई तो वो भी प्रेत योनि में गए। इन सभी के लिए काशी में एक स्थान है वह है पिशाच मोचन कुंड। वहां पर आप जाएंगे तो आप
(37:16) देखेंगे बहुत सारे जो मृतक लोग हैं उनके फोटोस के आगे कील से उनको ठोका जाता है। उनका फोटो लगाया जाता है वहां पर और उस पेड़ में उनको कील से ठोका जाता है। वहां पर एक पेड़ है जहां पर माना जाता है कि भगवान गणपति ने प्रेत ज्ञानेंद्र को वहां पर प्रतिष्ठित किया है। उसी पेड़ पर इन सब मृत आत्माओं का जो प्रेत योनि में पहुंचे हुए हैं। उनको फोटो या आधार या पेन ऐसा भी कुछ लगा करके उनको कील से ठोका जाता है उस पेड़ में। इस पद्धति से कि उनको या उन प्रेत को हमने वहां पर बैठा दिया। अब वो वापस से प्रेत योनि में नहीं जाएंगे। वो मुक्ति को प्राप्त करेंगे। क्योंकि स्थान
(37:50) का यह महत्व है कि पिशाच नाम का एक ब्राह्मण था। अच्छा ब्राह्मण था वो। पिशाच नाम का ब्राह्मण था। वो केवल दान लेता था। दान देता नहीं था। ओके। तो मरणोपरांत उसको भी प्रेत योनि प्राप्त हुई। तो वहां पर इसी पिशाच मोचन के तीर्थ के पास स्थान में रह के उसने भगवान शिव की बड़ी आराधना करी। स्टार्टिंग में जो मैंने आपको अंग यात्रा बताया ना अलग शिवलिंग जो अलग-अलग अंगों का प्रतीक है उसी अंग यात्रा के क्रम में एक मुक्ति लिंग है काशी का जिसे कपरधीश्वर महादेव कहा जाता है जो कपरदी नामक गण द्वारा प्रतिष्ठित है इसी तीर्थ के आसपास रह के इस पिशाच नामक
(38:24) ब्राह्मण ने भगवान शिव की बहुत तपस्या करी तो फाइनली उनको भगवान शिव ने वहां पर मुक्ति प्रदान करी इसीलिए इसका नाम पिशाच मोचन माने पिशाच नामक ब्राह्मण को भी जहां मुक्ति मिली वो पिशाच मोचन तीर्थ हुआ तो उनका जो त्रिपिंडी है नारायण बलि है जो मरणोपरांत ये जो रिचुअल्स हम जानते हैं और ये जो होते हैं वो क्रम यहां पर फिर किया जाता है और हम सबका क्योंकि हम जो सनातन धर्म में जन्म लेते हैं या मानव शरीर में भी हम जो जन्म लेते हैं हम ये मानते हैं कि हर व्यक्ति तीन ऋण के साथ जन्म लेता है। देव ऋण, पितृ ऋण, ऋषि ऋण। तो पितरों के प्रति जो ऋण है वो तो जन्म
(38:57) से हमारे आता है। तो ये तभी पूर्ण होता है जब एक माध्यम से या दूसरे माध्यम से कांसेप्ट थोड़ा समझाइए। नया है ये। जी माने पितृ ऋण जो हमारा डेट है बेसिकली जो डेथ टुवर्ड्स आवर एनसेेस्टर्स हैं हम ऋषियों के प्रति हम क्यों ऋण मानते हैं क्योंकि ऋषियों ने ही आज ये सारे दर्शन हमें दिए जैसे सप्तशती का हम पाठ करते हैं तो मार्कंडेय ऋषि ने वो हमें दिया तो ऐसे ही जो सभी ऋषि हैं जितने ग्रंथ है पुराण हैं महापुराण है वो किसी न किसी ऋषि के माध्यम से ही हमें मिले हैं। अह तो उन ऋषियों के प्रति जो ऋण है हमेशा हमें उनको पूरा करने का और वह तब तक पूरा नहीं है जब
(39:30) तक कि हम अपने सत्कर्मों के माध्यम से जैसे पितरों के लिए जो ऋण है वो तभी पूरा हो सकता है जब हम मानते हैं हम गया जी में उनको बैठा करके आएंगे और गया जी कब आप जाएंगे जब आप काशी में पितृ ऋण अपना पिंडदान त्रिपिंडी इत्यादि आप करके आगे जब बढ़ते हैं तो पहला स्टेज आपका हमेशा काशी होता है। काशी करके ही आप गया जा सकते हैं। तो आप गया चले जाते हैं और गया में श्राद्ध भाव पूर्वक आप अपने पितरों का करते तो माना जाता है आपको पितृ ऋण से मुक्ति मिल जाती है और पितरों एक ऐसा कांसेप्ट है जो हर किसी के लिए यूनिक है। जैसे पंचदेव की पूजा तो हर कोई कर रहे
(40:01) हैं। गणेश जी की पूजा हर कोई कर रहा है। लक्ष्मी जी की पूजा कर रहे हैं। विष्णु जी देवी की सूर्य भगवान प्रत्यक्ष हैं। शंकर जी की भैरव जी की भी हर कोई पूजा कर रहे हैं। ये कॉमन शायद आप मेरे पूजा मंदिर में जाएंगे तो इन देवी देवताओं को आप मेरे यहां भी देख लेंगे। मैं आपके पूजा के मंदिर में जाऊंगा तो यह वहां पर मुझे भी मिल जाएंगे। पर जो मेरे पित हैं उनकी पूजा मैं ही कर सकता हूं। मेरे पित्र की पूजा आप नहीं कर सकती। जो आपके पित हैं वो आपकी पूजा आप स्वयं ही कर सकती हैं। यह यूनिक होता है उसी व्यक्ति। इसीलिए उस कुल का व्यक्ति वही जाकर के जब श्राद्ध करता है
(40:30) तो उस पुण्य आत्मा को यदि वो प्रेत योनि में भी हो तो उसे मुक्ति मिलती है। अच्छा। ओके। कई बार डर लोगों को रहता है। हम कहते हैं ना कि ह्टेड जगह आप जाएं जी। तो भूत चिपकने का डर रहता है। तो कई लोगों को लगता है हम श्मशान घाट में जाएं। कोई अच्छा कार्य करने क्यों ना जाए। पर ये हमारी जो डिसबॉडी बी जिनको हम कहते हैं वो हमारे साथ आ सकती हैं। तो इसके बारे में ये डर आप कैसे क्वेल करेंगे? ऐसा बहुत कम चांस है कि इस तरीके की क्रिया हो सकती है। क्योंकि मैंने कहा ना वो हमारे साथ फिर इस लोक पे तो नहीं रहते हैं। वो भले ही अगर पितृ योनि में नहीं गए
(41:05) तो भी प्रेत योनि में जाएंगे। लेकिन हां वो पूर्व स्मृति से हमें स्मरण जरूर कराएंगे। वो विजुअल के माध्यम से हो सकता है। वो ड्रीम्स के माध्यम से हो सकता है। वो फ्लैशेस या पोजेशंस अक्सर होते हैं। अब वो पोजेशन क्या है वो वेरीफाई कर पाना कठिन होता है। क्योंकि पोज़ेशन में लोग बहुत कुछ क्लेम करते हैं। कई लोग तो क्लेम करते हैं कि दुर्गा ही उनके शरीर में आती है। तो इसलिए पोजेशन का केस थोड़ा ट्रिकी हो जाता है। ये नहीं कि नहीं आ सकती हैं। आ सकती हैं। परंतु वो टेस्टिफाई कर पाना कठिन है। तो ऐसे केसेस में पितरों आपको पूर्व स्मृति से ये याद दिलाते हैं। और
(41:37) जनरली जो भी व्यक्ति यह मैंने अपने एक्सपीरियंस में देखा है डिवोशनल ज्यादा होता है। धर्म के प्रति आस्था रखता है। पूजा पाठ में मान्यता रखता है या उस व्यक्ति से उसका जुड़ाव अधिक था। अभी मैं दिल्ली में आपके वहां पर ही था तो एक मुझे अभी बच्ची कल मिली कि मेरे जो दादाजी हैं वो अक्सर मेरे सपने में आते हैं। कभी मेरा हाथ पकड़ते हैं, कभी मुझे कहीं लेकर के जा रहे होते हैं। कभी मुझसे बात करते हैं। कभी रूठते हैं, कभी नाराज होते हैं, कभी खुश होते हैं। और बहुत ही यंग बच्ची। उस बच्ची का जुड़ाव अपने दादा जी के साथ बहुत लंबे समय से था। तो मैंने उसको बताया कि
(42:08) हो सकता है कि आपके जो दादाजी हैं, आपके जो पित्र हैं इस केस में वो आपके ऊपर आश्रित हैं कि आप उनके लिए ये कर्म करें। तो इस माध्यम से जरूरी नहीं कि वो चिपक जाए या पज़ेस हो जाए। ये थोड़ा डार्क साइड हो जाता है और बात कर पाना ऐसे प्लेटफार्म पे थोड़ा कठिन है। अनलेस एंटिल कोई इंडिविजुअल केस को व्यक्ति स्टडी करें। ठीक है? परंतु जेनेरिक फॉर्म में आप हमेशा यह देखेंगे कोई भी एक व्यक्ति परिवार में होगा जिसको पितरों के स्वप्न बहुत ज्यादा आते होंगे। वो अक्सर ही सपने में अपने पूर्वजों को देखता होगा और वो किसी फॉर्म में हो सकता है। तो किसी ना किसी माध्यम
(42:40) से वो हमें इंडिकेशन करते हैं और यह बहुत प्रैक्टिकल होता है। जैसे एक चेन्नई में एक लेडी हैं। वो मेरे से दीक्षित भी हैं। समय-समय पर वो कई बार उनको एक ऐसा पूरा पैच पिछले गर्मी के सीजन में था कि बार-बार उनके पिताजी आकर के उनको पानी मांगते थे। तो कुछ साधना के बल पर मैंने उनको ऐसा मार्गदर्शन दिया कि संभवतः इनके अंत्यष्टि के बाद आपने अन्नदान और अन्नदान के बाद में जो हमें घड़ा दान देते हैं जो भी ब्राह्मण आते हैं उनको आसन देते हैं ये चीजें देते हैं संभवत यह क्योंकि गर्मी के समय उनकी मृत्यु हुई तो ये चीज आप करना चूक गए क्योंकि उनकी जो परम गति है एक बार
(43:14) वो पार कर गए इस योनि को इस भूलोक को तो उनका भी एक जर्नी है टुवर्ड्स साल्वेशन और मोक्ष यहां जो अन्नदान के माध्यम से जो भोजन हम देते हैं जो जल के माध्यम से हम पानी उनको पिलाते हैं यही उनको मिलता देता है हमारे सनातन हिंदू दर्शन के अनुसार तब वह मोक्ष की तरफ अग्रसर होते हैं। तो हमारे पितृ ऐसे हमें हमारी कर्मों को दायित्व को और उनकी आवश्यकताओं को हमें याद दिलाते हैं और फिर हमारा ये दायित्व बनता है कि पितृ ऋण यह भी पितृ ऋण का हिस्सा यानी कि 13 दिन का अंत्यष्टि कर दिया तो हमारा सब वहां समाप्त हो गया। गया जी बैठा करके आ गए तो वहां समाप्त हो गया।
(43:45) कुछ भी ऐसी आवश्यकता है तो हमेशा हमें वो याद करेंगे और हमारी जिम्मेदारी है क्योंकि उनके लिए हम ही कर सकते हैं। वो हमारे पित हैं। उनकी पूजा या उनके लिए कुछ और कोई कर नहीं सकता। करेगा भी तो वो स्वीकार नहीं करेंगे। हम हम क्या यह सच है कि मरते समय अ शिवजी स्वयं मरने वाले के कांड में तारक का मंत्र चंट करते हैं? जी ये बिल्कुल सत्य है और इसके पीछे एक एपिसोड बहुत सुंदर जुड़ा हुआ है। नमस्कारम। आई एम श्लोका। वी स्पेंड अ लॉट ऑफ़ टाइम इन डेवलपिंग दिस प्रोडक्ट व्हिच इज द ऑथेंटिक ए2 गिरकाऊ घी बाय द ब्रांड नेम योगिक ऑर्गेनिक। वी स्पेंड सेवरल
(44:24) इयर्स टू ब्रिंग दिस प्रोडक्ट टू यू। माई एंड एवर वास् टू ब्रिंग टू यू द रियल गुडनेस ऑफ़ ऑथेंटिक A टू गिरकाऊ घी। एंड हियर इट इज। प्रीआर्डर्स आर नाउ ओपन। टू ऑर्डर जस्ट कॉल और WhatsApp ऑन +918493863427। तो इस माध्यम से जरूरी नहीं कि वो चिपक जाएं या पोज़ेस हो जाएं। ये थोड़ा डार्क साइड हो जाता है और बात कर पाना ऐसे प्लेटफार्म पे थोड़ा कठिन है। अनलेस अंटिल कोई इंडिविजुअल केस को व्यक्ति स्टडी करे। ठीक है? परंतु जेरिक फॉर्म में आप हमेशा यह देखेंगे कोई भी एक व्यक्ति परिवार में होगा जिसको पितरों के सपने बहुत ज्यादा आते होंगे। वो अक्सर ही सपने में अपने
(44:56) पूर्वजों को देखता होगा और वो किसी फॉर्म में हो सकता है। तो किसी ना किसी माध्यम से वो हमें इंडिकेशन करते हैं और यह बहुत प्रैक्टिकल होता है। जैसे एक चेन्नई में एक लेडी है वो मेरे से दीक्षित भी हैं। समय-समय पर वो कई बार उनको एक ऐसा पूरा पैच पिछले गर्मी के सीजन में था कि बार-बार उनके पिताजी आकर के उनको पानी मांगते थे। तो कुछ साधना के बल पर मैंने उनको ऐसा मार्गदर्शन दिया कि संभवत इनके अंत्यष्टि के बाद आपने अन्नदान और अन्नदान के बाद में जो हमें घड़ा दान देते हैं जो भी ब्राह्मण आते हैं उनको आसन देते हैं ये चीजें देते हैं संभवत यह क्योंकि गर्मी के
(45:32) समय उनकी मृत्यु हुई तो ये चीज आप करना चूक गए क्योंकि उनकी जो परम गति है एक बार वो पार कर गए इस योनि को इस भूलोक को तो उनका भी एक जर्नी है टुवर्ड्स सल्वेशन और मोक्ष यहां जो अन्नदान के माध्यम से जो भोजन हम देते हैं जो जल के माध्यम से हम पानी उनको पिलाते हैं यही उनको मिलता देता है हमारे सनातन हिंदू दर्शन के अनुसार तब वह मोक्ष की तरफ अग्रसर होते हैं। तो हमारे पितृ ऐसे हमें हमारी कर्मों को दायित्वों को और उनकी आवश्यकताओं को हमें याद दिलाते हैं और फिर हमारा ये दायित्व बनता है कि पितृ ऋण यह भी पितृ ऋण का हिस्सा ही नहीं कि 13 दिन का अंत्यष्टि कर
(46:03) दिया तो हमारा सब वहां समाप्त हो गया। गया जी बैठा करके आ गए तो वहां समाप्त हो गया। कुछ भी ऐसी आवश्यकता है तो हमेशा हमें वो याद करेंगे और हमारी जिम्मेदारी है क्योंकि उनके लिए हम ही कर सकते हैं। वो हमारे पित हैं। उनकी पूजा या उनके लिए कुछ और कोई कर नहीं सकता। करेगा भी तो वो स्वीकार नहीं करेंगे। हम हम क्या यह सच है कि मरते समय अ शिवजी स्वयं मरने वाले के कान में तारक का मंत्र चांट करते हैं? जी ये बिल्कुल सत्य है और इसके पीछे एक एपिसोड बहुत सुंदर जुड़ा हुआ है कि भगवान शिव जब इस पूरे सृष्टि में त्राहिमाम अन्न का जो अन्न विहीन सृष्टि हो गई थी। तो शिव
(46:41) जी ने इस अपने प्रिय नगरी काशी को अन्नवीहीन बचाने के लिए वो भगवती अन्नपूर्णा के दरबार में जाते हैं। अन्नपूर्णा के दरबार में जाते तो आप अन्नपूर्णा जी का आइकोनोग्राफी भी कभी देखेंगी तो हमेशा शिव जी उनके सामने ऐसे पात्र लेकर के खड़े हैं और अन्नपूर्णा जी चम्मच से उनके पात्र में जो भिक्षा है वो दे रही हैं। तो भिक्षा तो वो ले रहे हैं लेकिन वो भिक्षा लेते हुए पूरे सिंबॉलिकली काशी नगरी को ये आशीर्वाद अन्नपूर्णा जी से दिलवा रहे हैं कि काशी में कोई भूखा सो तो सकता है। भूखा उठ तो सकता है पर कभी भी भूखा सोएगा नहीं चाह करके। तो यह जो
(47:11) आइकोनोग्राफी है ना इस क्रम में यदि आप देखेंगे कि अन्नपूर्णा देवी भिक्षा दे रही हैं। शिव जी भिक्षा ले रहे हैं। तो बेसिकली इसमें जो शिव जी और अन्नपूर्णा जी एक दूसरे को प्रॉमिस कर रहे हैं। अन्नपूर्णा जी कहती हैं जीविते अन्नदातित्वम कि जब तक व्यक्ति इस धराधाम काशीपुरी पे जीवित रहेगा उसके उदर पोषण नरिशमेंट की जिम्मेदारी मेरी है। भगवान शिव जो है वो उसको रिटर्न भगवती को एक प्रॉमिस कर रहे हैं। वो कह रहे हैं मृते मोक्षम ददाम्याम। कि जब व्यक्ति इस शरीर को मानव शरीर को काशी में यदि छोड़े तो तो मैं स्वयं उसके कान में तारक मंत्र देकर
(47:44) के अभय मुक्ति निर्वाण सद्गति और मोक्ष उत्तम गति तक वो प्राप्त हो यह मेरी जिम्मेदारी हो जाती है। तो शिव जी ये वादा कर रहे हैं। तो दोनों अन्नपूर्णा जी और शिव जी प्रतिज्ञाबद्ध हैं काशी में एक दूसरे के प्रति। तो निश्चित रूप से हम ये मानते हैं ये भी और ये भी कि प्रलय के समय में भी हम काशी का विनाश नहीं होगा। यह आशीर्वाद भी शिव जी ने दिया है। हां कि प्रलय में भी भगवान त्रिशूल पर इस प्रिय नगरी काशी को उठा लेंगे। ये क्या अभियुक्त कुछ बोलते हैं ना इसको? क्या अभिमुक्त क्षेत्र अभिमुक्त क्षेत्र अच्छा जब एपोक्लिप्स होगा महाप्रलय
(48:16) महाप्रलय जब होगा तो ऐसे तो शिव जी माया मुक्त हैं। माया में नहीं है। ध्यानस्थ हैं। तो लेकिन भगवती से वो कहते हैं कि भगवती आपके बिना तो कई कल्प मैंने कई सदियां कई हजार साल मैंने बिता दिए। आपके वियोग में शायद भविष्य में भी मैं यह कर सकूं लेकिन काशी के बिना मैं नहीं रह सकता क्योंकि काशी अच्छा ऐसा नहीं कि काशी में शिव जी हैं। शिव जी के अंदर काशी है। अच्छा शिव जी का जो हृदय है वो काशी है। तो जब आप काशी में चल रही हैं तो आप ये समझिए आप शिव जी के हृदय पर पैर रख के चल रही हैं। उनके हार्ट के ऊपर आपका पैर है। इसलिए ध्यान से चलना चाहिए जब आप काशी में चल
(48:51) रहे हैं तो। तो भगवान और भगवती दोनों ही इस तरीके से प्रतिज्ञाबद्ध हैं और भगवान ने प्रलय में भी जैसे कहा इसीलिए वो काशी के लिए मोह में भी आ जाते हैं। वो काशी से दूर रह के रोते भी हैं, विलाप भी करते हैं। भगवान ऐसे जुड़े हुए हैं काशी से। कंकर कंकर जहां का शंकर है वैसे ही पतित पावन विमुक्त क्षेत्र नगरी हमारी काशी है। तो भगवान कहते हैं कि प्रलय कभी अगर आएगा तो इस काशी को मैं अपने त्रिशूल पर उठा लूंगा और प्रलय में भी इसको समाप्त नहीं होने दूंगा। हां। और वही त्रिशूल के जो तीन खंड है वह काशी के तीन सबसे जरूरी शिवलिंग बन जाते हैं।
(49:24) जिसमें सबसे पहले काशी विश्वनाथ, मध्य में केदार और हमारे ओमकारेश्वर में ओमकारेश्वर। ओके। मणिकर्णिका घाट को काशी का पंचतीर्थ माना जाता है। जी। क्या कारण है? और क्यों? काशी में एक यात्रा होती है जिसको एकान कहते हैं। एकायतन यानी मान लीजिए एक मैं ले मैन टर्म्स में यदि समझाऊं तो यदि आपके पास एक दिन है और आपको काशी यात्रा का पूर्ण फल प्राप्त करना है तो एक दिन में आप क्या-क्या जाएंगे? तो काशी में स्कंद पुराण में एक श्लोक मिलता है जो कुछ इस तरीके से है कि विश्वेश्वरम माधवम धुंडम दंडपाणि च भैरवम वंदे काशी गुहाम गंगा भवानी मणिकर्णिका इन स्थानों
(50:07) पर यदि व्यक्ति एक दिन में यदि दर्शन कर ले विश्वेश्वरम काशी विश्वनाथ माधवम बिंदु माधव साक्षात विष्णु जी का स्वरूप है विश्वेश्वरम माधवम धुंडिम विश्वनाथ जी जाने से पहले गेट नंबर एक पर ढुंडी यानी ढुंडीराज गणपति का दर्शन हम करते हैं जो काशी के क्राउन प्रिंस भी माने जाते हैं हमारे राजकुमार हैं गणेश जी तो उनका दर्शन करके तब विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए जाना चाहिए तो तीसरे ढुंडीम यानी ढूंढीराज गणेश डंड पाणी भैरव जी तो सभी लोग आते हैं लेकिन भैरव जी के ठीक पीछे दंडपाणी का मंदिर है। जिन्होंने अपने हाथ में दंड को धारण किया जो दंडधारी
(50:40) स्वरूप है भगवान भैरव जी का जो आपके पाप और पुण्य का एक्चुअली में लेखाजोखा लिखते हैं प्रत्यक्ष जिस स्थान पर वो है दंडपाणी। तो भैरव जी का भी दर्शन तब पूर्ण होता है जब आप दंडपाणी का जाकर के दर्शन करें। दंडपाणिम च भैरवम भैरव जी का आपने दर्शन किया। वंदे काशी गुहाम गंगा एक ईश्वर गंगी पर स्थान है काशी में। वहां पर दर्शन करें। भवानी मणिकर्णिका जो साक्षात देवी के स्वरूप में मणिकर्णिका है जो मणिकर्णिका घाट है दूर से भी यदि उसका दर्शन करने तो इन स्थानों पर जाने से ही पूर्ण रूप से काशी यात्रा का जो पूरा फल है वो जातक को मिलता है।
(51:11) तो मणिकर्णिका घाट जाना ही चाहिए। मणिकर्णिका का दर्शन करना चाहिए। जाना मैं सब आप बोर्ड से भी तो देख सकती हैं। देख प्रणाम कर सकती हैं। जो धुनी जल रही है उसको भी प्रणाम आप कर सकती हैं। और यदि जाएं तो एक सेफ डिस्टेंस पर रह करके यदि आपको कोई जप साधना भी करना है तो यदि आप दीक्षित हैं तो आप शव के पास में भी जाकर करें क्योंकि ये सब तो वहां कॉमन है। अनलेस एंड अंटिल आप कुछ अनएथिकल नहीं कर रहे हैं तो हर कोई जाकर के कर सकता है। उसके लिए स्थान भी वहां पर नियोजित है बने हुए हैं। यदि आप दीक्षित हैं। आपको गुरु का मार्गदर्शन है। तो निश्चित रूप से आप
(51:37) जाकर कर सकते हैं। नहीं तो मणिकर्णिका का दर्शन ही अपने आप में बहुत फलदाई है। हम कौन लोग मणिकर्णिका घाट या दूसरा हरिश्चंद्र है? आई थिंक यही 80 घाटों में से यही दो घाट हैं जहां पर डेड बॉडीज क्रिमेट होती है। राइट? पहले पूरा काशी ही महाश्मशान था। अच्छा जी। उसमें केदार घाट वगैरह सब आ जाते थे। सब महाशमशान वरुणा तक हम मानते हैं कि वरुणा से 80 वाराणसी जो है तो वरुणा से ही वो श्मशान शुरू हो जाता था। पुराने अगर आप देखेंगे उस तरीके से तो पर आज के समय में तो प्रत्यक्ष रूप से हमें हरिश्चंद्र घाट और मणिकर्णिका घाट ये दो का ही हमें दर्शन
(52:11) होता है। क्यों इसी दो में क्यों बॉडीज बर्न करी जाती हैं आजकल? ऐसा है कि कलयुग का जो प्रकोप है वो केवल श्मशान के ऊपर नहीं कई सारे देवी देवताओं के साथ में भी रहा है। तो बहुत सारे शिवलिंग भी जो हमें पहले दर्शन होते थे जैसे कि अभिमुक्तेश्वर ये विश्वनाथ जी से भी पुराने शिवलिंग माने जाते हैं। तो समय के साथ में इनका लोप हो गया। कई सारे ऐसे देवी देवता हैं। जैसे आप ओमकारेश्वर जाएंगे तो काशी त्रिशूल पर है। त्रिशूल के तीन खंड हैं। तो जो तीसरा खंड है जो ओमकारेश्वर खंड है ये ओमकारेश्वर खंड पांच शिवलिंगों को मिलकर के बना था।
(52:43) इसी ओमकारेश्वर शिवलिंग के समक्ष में भगवान ब्रह्मा को ओमकार स्वरूप का दर्शन हुआ था। सबसे पहले ओम आकृति का दर्शन सबसे पहले यहां पर हुआ था। एक ओमकारेश्वर ऐसा शिवलिंग जिसका दर्शन कर लेने से पूरे ब्रह्मांड के सभी शिवलिंग के दर्शन का पुण्य यहां पर प्राप्त होता हो। सभी दुनिया भर के तीर्थों में स्नान करने का पुण्य जहां पर प्राप्त होता वो है ओमकारेश्वर। यदि आप शिवलिंग देखेंगे तो आज तीन शिवलिंग हमें दिखते हैं। परंतु वो पांच शिवलिंग मिलकर के ओमकारेश्वर महादेव को बनाते थे। जिसमें थे अकार, उकार, मकार, नाद और बिंदु ये पांच शिवलिंगों के नाम
(53:18) थे। नाद और बिंदु का तो लोप हो गया। अकार उकार मकार हमें ऐसे दर्शन होते हैं। ऐसे तमाम देवी देवताएं ऐसे चतुष्ठी योगिनी 64 योगिनियां भी काशी में तो उसमें भी काफी सारी योगिनियां हैं जिनका लोप हो गया है। तो उसी समकल और भगवान ने स्वयं ये कहा है कि मतलब समय के साथ में ये सारे तीर्थ नहीं विद्यमान रहेंगे। तो कई सारे तीर्थ आज हमें नहीं दिखते हैं। मणिकर्णिका और आपका जो हरिश्चंद्र घाट है यह श्मशान प्रत्यक्ष हमें दिखता है। पर आज भी काशी है वो अपने आप में महाशमशान ही है। आपने वर्ड दिखता है यूज़ किया। क्या एक्चुअलिटी में होते हैं पर हमको दिखते
(53:50) नहीं है? बॉडीज बर्न होती है बाकी घाटों में भी पर हमको नजर नहीं आती। नहीं ऐसा नहीं कह सकते। लेकिन हां कुछ जगह है जहां सीक्रेटली बॉडीज बर्न होती हैं आज भी वो श्मशान की तरह घोषित नहीं है। सीक्रेटली क्यों? सीक्रेटली बहुत सारे लोग हैं जैसे अभी अननेचुरल डेथ के जो बहुत सारे केसेस हो गए हैं तो एक एरिया बनते जा रहा है काशी में जहां पर इस तरह की प्रैक्टिससेस और जहां पर अगर वो क्रिमेशन करने के पहले यदि कोई क्रिया करनी है या इलिसिटली भी करना है हम नहीं चाहते कि दुनिया समाज को पता चले तो फिर उन घाटों का प्रयोग करते हैं और वह
(54:23) बहुत गुप्त और कम और छोटी संख्या में और उनका डायमीटर या जो एरिया है वह भी बहुत बड़ा नहीं है। वह चुपके से वहां पर अंत्यष्टि करके आ जाते हैं। जिनकी अननेचुरल डेथ हुई है वह मणिकर्णिका घाट में नहीं उनका अंतिम संस्कार हो सकता है। नहीं बिल्कुल हो सकता है। पर यह प्रचलन है। कुछ ऐसे पॉकेट्स बनते जा रहे हैं वाराणसी में। वाराणसी भी अब बड़ा होते जा रहा है ना। श्मशानों की भी अपनी लिमिटेशंस हैं कि इतना वो बॉडी बर्न कर सकते हैं। और ज्योग्राफिकली भी कभी-कभी कन्वीनिएंट हो जाता है। लोग बाहर से आते हैं वो करने के लिए। तो वैसे पॉकेट्स उस हिसाब से बनते
(54:52) जा रहे हैं। पर प्रत्यक्ष जैसे मैंने कहा जो विज़िबल है जिनका दर्शन है वो तो हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका ही आज हम और हां इसी को प्रमाणिक मानना चाहिए। अगर तो मुझे अपना क्रिमेशन करवाना है या फिर किसी फैमिली मेंबर का क्रिमेशन कराना है तो मैं कैसे चूज़ करूं कि क्या मुझे मणिकर्णिका जाना चाहिए हरिश्चंद्र? अ और डिफरेंस क्या है दोनों में? कोई डिफरेंस नहीं है। शिव जी का एक बाया हाथ है। शिव जी का एक दाया हाथ है। वहां जाके भी हरिश्चंद्र में जाके भी मुक्ति मिल जाएगी मुझे। बिल्कुल हमारे परिवार में सभी लोग जो है उनका हरिश्चंद्र घाट पर ही अंत्यष्टि होता है। अगर मैं भी
(55:22) इस शरीर को जब कभी छोडूंगा तो हरिश्चंद्र पर ही मेरा अंत्यष्टि होना वो तय है। तो कुल परंपरा से ये लीनियत से ये तय रहता है। जो काशी में लोग जो रहते हैं स्पेशली तो उनको पता होता है कि हमारा जो है वो मणिकर्णिका जाता है या हरिश्चंद्र पर जाता है। अच्छा मणिकर्णिका घाट में कौन लोग जा सकते हैं और कौन लोग नहीं जा सकते? एक साधना के लिए दूसरा क्रिमेशन के लिए। अ आपके पास जाने का सबको अधिकार है। आजाद भारत देश में तो कोई रोक-टोक है नहीं और सभी लोग जाते भी हैं। और एक साल में एक अवसर आता भी है जिसे हम मशान होली कहते हैं। जो काशी में हमारे रंग भरी एकादशी
(55:59) होती है। जो होली के पहले होली हम पूर्णिमा को मनाते हैं। पूर्णिमा के पहले जो एकादशी पड़ती है। रंग भरी एकादशी से ही काशी जी में क्योंकि हम मानते हैं कि इसी एकादशी के दिन पर माता अन्नपूर्णा और काशी विश्वनाथ जी सबसे पहले काशी में आए थे। तो काशीवासी जितने थे उनका वेलकम करने के लिए सभी ने होली मनाई थी। रंगों से त्यौहार सभी ने सेलिब्रेट किया था। अपने किंग यानी काशी विश्वनाथ और अपनी क्वीन यानी माता अन्नपूर्णा को काशी में पहली बार वेलकम करने की क्योंकि शिवरात्रि पर उनका विवाह होता है। पर उनका गौना जब वो पहली बार काशी में आते हैं वो रंग भरी एकादशी को
(56:33) होता है। तो इसी रंग भरी एकादशी के पास में एक त्यौहार काशी में प्रचलित कुछ समय से ज्यादा हो गया है जिसे हम मशान होली के नाम से जानते हैं। इसी मशान होली में अह अब तो बहुत सारे यंगस्टर्स भी आने लगे। फीमेल्स भी आने लगी। पर पहले यह केवल अवघड़ सन्यासियों और अघोरियों का पर्व था। जो राग और भस्म से ये होली जो चिता की भस्म थी उससे ये होली मनाते। पर आज के समय में ह्यूमन ऐश से ह्यूमन एशेस से हर कोई खेलने लगा है। वो डिसिस्पेक्ट नहीं माना जाता था। निश्चित रूप से अघोरियों को तो अधिकार है। वो तो दिन रात चिता भस्म में लपेटे हुए
(57:05) हैं। तो उनको तो उसमें कोई अंतर है नहीं। वही उनका श्रृंगार है। पर हम और आप क्योंकि यह समझे हम आप मणिकर्णिका या किसी भी श्मशान में जाते भी हैं। हम जाने के बाद में स्नान करते हैं। क्योंकि हम मानते हैं कि उस समय के यहां पर आने के से ही हमें एक 100 समय लगता है। तो आकर के हम वापस से हम स्नान करते हैं। वस्त्र अपने बदलते हैं। पहने हुए वस्त्र संभवत दान में दे देते हैं। यदि हम अंत्यष्टि से वापस जा रहे हैं। कई जगह ऐसा भी प्रचलन होता है। तो वैसी स्थिति में हम मणिकर्णिका को जहां इतना पवित्र मानते हैं और उस जगह की गरिमा को इतना अधिक मानते हैं तो वहां आकर के जो
(57:38) चिता की भस्म की होली स्वयं से खेलना ये हाल फिलहाल में और Instagram और सोशल मीडिया का इसमें बहुत बड़ा रोल है इसको ग्लैमराइज करने में। पर ये क्या ये प्रामाणिक है? तो बिल्कुल भी प्रामाणिक नहीं है। क्या सभी को मणिकर्णिका जाना चाहिए? हां, जाइए। मणिकर्णिका में कई सारे तीर्थ हैं। आप चक्र पुष्कर्णिका का दर्शन करिए। मणिकर्णिकेश्वर महादेव का आप दर्शन करिए। आप सभी मणिकर्णिका में हैं तो हैं तो प्रोटेक्टेड आप सभी किसी को भी कोई दिक्कत परेशानी नहीं होगी। नहीं होगी। महाशमशान तो बहुत सारे हैं। जैसे कि एक तारापीठ आप भगवती का स्थान है वेस्ट बंगाल
(58:09) में वहां पे भी एक शमशान है। कई सारे शक्ति के जो तंत्र हैं कामाख्या में आसपास में कई सारे ऐसे शमशान लेकिन वो वहां की क्रियाएं अलग हैं। हम यहां पर जैसे मैंने कहा साक्षात भैरव जी का ही कवच है। तो किसी को भी कोई दिक्कत तो ऐसे नहीं है। दर्शन करने के लिए हर कोई जाए। लेडीज जा सकते हैं, बच्चे जा सकते हैं। लेडी बिल्कुल जाना चाहिए। मणिकर्णिका आप काशी आए हैं तो मणिकर्णिका को जैसे मैंने कहा यह नहीं कि घाट पर पैर रख के ही आप दूर से प्रणाम कर सकते हैं। नाव से जाते हुए उनका आप दर्शन कर सकते हैं। यदि आप मणिकर्णिका पर आ भी गए हैं तो मणिकर्णिका
(58:36) के तीर्थों का दर्शन करिए। चक्र पुष्कर्णी तीर्थ है। मणिकर्णिकेश्वर महादेव है। थोड़ा सा ऊपर आप चढ़ेंगे तो वहां पर नौ नरसिंहों में से एक नरसिंह भगवान का वहां पर दर्शन होता है। गंगा जी में वहां पर स्नान करिए मणिकर्णिका के घाट पर। लेकिन अब जब साधना की दृष्टि से हम आ जाते हैं। हर किसी को अधिकार नहीं है। ना ही वो सुरक्षित है। अच्छा हां। फिर सुरक्षित कैसे नहीं है? सुरक्षित ऐसे नहीं है क्योंकि मंडल आपके पास नहीं है। हम मानते यह है कि साधना में जब आप बैठते हैं अच्छा ये तीन चीज अलग-अलग है। मैं आपके दर्शकों को यह बताना चाहूंगा
(59:04) उपासना उपदेश और साधना। जैसे मैं यहां पर मैंने यह संवाद ये हमारा चल रहा है। मैंने आपको कहा कि आप ओम नमः शिवाय का जप करिए। आप ओम नमः शिवाय का जप शुरू कर दीजिए। यह मैंने आपको उपदेश किया कि आप नमः शिवाय का जाप कर सकते हैं। तो मेरे उपदेश करने के मात्र से आपको एक लाइसेंस बेसिक हुआ कि अब आप इस मंत्र को करने के अधिकारी हुए। जब आप इस मंत्र को करने लगे अब आप बैठ गए हैं आसन लगाकर के इस मंत्र को रुद्राक्ष पे आप जप कर रहे हैं। तब आप उपासना कर रहे हैं इसी मंत्र का। यानी आपने अपने साथ में भगवान को भी एक आसन दे दिया है अपने बगल
(59:39) में। भगवान का भी आवाहन अपने साथ में कर दिया है। आप उपासना की पद्धति में आ गए। जब इसी उपासना को करते हुए अब आपने संकल्प ले लिया हाथ में जल लेकर के और आपने एक तरीके का प्रॉमिस भगवान से ईश्वर से जिस भी देवता की आप साधना करने जा रहे हैं उनको आपने यह कमिट कर दिया कि अब मैं यह मंत्र का जाप इतने संख्या में इतने दिनों में प्रपोर्शन में मैं करूंगा। अब आप साधना में आ गए। यह साधना का जो संकल्प या लक्ष्य है वह किसी भी असाध्य को जब हम साधने चले जाते हैं कुछ भी ऐसा जो इनक्रेबल है कठिन है मुश्किल है इस फिजिकल फॉर्म में जब उसको हम साधने के लिए चले
(1:00:16) जाते हैं तब हम साधना में आते हैं तो सबसे पहले तो भगवान कोई साधना बहुत कठिन है भगवान कोई सरल चीज तो है नहीं कलयुग में दर्शन सबके लिए नहीं है तो उस पद्धति से जब हम साधना जब देवता की उपासना और साधना क्योंकि यही सबसे प्रमाणिक मार्ग है कि साधना के माध्यम से हम भग भगवान भगवान की प्राप्ति कर सकते हैं। क्योंकि ग्रहधीनम जगत सर्वम पूरी जो सृष्टि है वह ग्रहों के अधीन है। ग्रह किसके अधीन है? तो ग्रह जो है यह देवताओं के अधीन है। देवता किसके अधीन है? तो देवता मंत्रों के अधीन है। मंत्र किसके अधीन है? मंत्र ब्राह्मणों के आधीन है क्योंकि ब्राह्मणों ने अपने
(1:00:49) कंठस्थ किया हुआ है मंत्रों को याद किया हुआ है। ध्यान किया है। गायत्री की उपासना करी है। यज्ञ पवित को धारण किया हुआ है। इसलिए हम ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं। यही मंत्र जब स्वयं लेकर के हम अपने से ईश्वर के मार्ग में निकल जाते हैं तो अब हम साधना के मार्ग में आ गए। तो जब आप साधना के मार्ग में आ गए तो आपको चाहिए गुरु का मंडल। बिना गुरु के मंडल के आप साधना में बस एक ऐसे आप व्यक्ति हैं जो मतलब निकल तो गए हैं लेकिन कहां गड्ढा मिल जाएगा और कहां गिर जाएंगे वो आपको नहीं पता। क्योंकि आजकल लोग यही कहते हैं ना गुरु से क्यों हम ले गुरु से साधना क्यों
(1:01:18) ले हम तो खुद फिगर आउट कर लेंगे आपने सुना ही होगा ये यंगस्टर्स काफी सुनते हैं जी 500 600 साल की पद्धति है हमारी जो भी अ किसी भी संप्रदाय आप मत मजहब में जाएंगे हमारे हिंदू धर्म में विशेष मैं किसी भी दर्शन में कहूं तो विशेष जो संप्रदाय हैं कम से कम 500 600 साल की एक परंपरा मिलेगी और अधिक भी मिल सकती है जैसे मेरी भी अपनी 450 साल की परंपरा तो हम लोग अपनी लीनिएज की जानते हैं जो हमारे भैरव कुल में जो हमारी परंपरा उस परंपरा पर कितने लोग चले उसी रास्ते पर बढ़े और अपनी परम गति को प्राप्त किया। हमारे गुरुओं का दर्शन ही हमारे लिए सबसे
(1:01:52) प्रमाणिक होता है। और गुरु का कार्य है वो आपको बताएगा। जैसे मैंने कहा कि यहां गड्ढा है यहां संभल करके चलना तो आपको ही है। गुरु आपके लिए नहीं चलेंगे। लेकिन आपको मिल गया और गुरु आपको मंडल देते हैं। सबसे जरूरी जो साधना में होता है। गुरु मंडल यदि आपके साथ में है। आप किसी भी स्थान पर जाएंगे गुरु का कवच। क्योंकि गुरु प्रत्यक्ष रूप में तो आपके साथ रहते नहीं है हर समय। तो गुरु आपको मंडल देते हैं। उस मंडल में जब तक आप हैं आप प्रोटेक्टेड हैं और कोई भी बाहरी एक्सटर्नल फोर्सर्सेस से आपको कभी थ्रेट नहीं होगा। तो ये गुरु मंडल नहीं है तो
(1:02:20) मणिकर्णिका पर बैठकर साधना नहीं करना। अच्छा और घाट में भी नहीं जाना चाहिए। घाट तमाम है। मणिकर्णिका घाट मणिकर्ण नहीं जा तो मैंने कैटेगराइज कर दिया कि जा सकते हैं जाकर के तीर्थों का दर्शन करें। नहीं घाट में जहां बॉडीज को जैसे फॉर एग्जांपल गौतम बुद्धा ने ये बोला था अपने मंक्स को कि आप तीन महीने तक जाइए और डेड बॉडीज को बर्न करते हुए देखिए। कि वो खुद में एक साधना है क्योंकि आप एक डिटचमेंट अपने फिजिकल बॉडी से एक डिटचमेंट क्रिएट कर देते हैं। डेथ के साथ एक एक्सेप्टेंस आ जाती है। जैसे हम मैं बहुत करती हूं वो। तो क्या ये कोई भी इंसान कर
(1:02:48) सकता है जिसने जो साधना के मार्ग में नहीं है जिसने दीक्षा नहीं ली हुई है। ऐसे ही वो जाना चाहता है और वो एक्सपीरियंस करना चाहता है डेड बॉडीज को बर्न करते हुए। क्या ये ठीक है? दूर से दर्शन करिए। अच्छा। क्योंकि शव तो शिव के समान है। तो यह नहीं कि शव का दर्शन हमारे लिए अशुभ है या फिर हमारे लिए कुछ दुष्कर्म या फिर किसी नेगेटिविटी का कारक बनेगा। वैसा नहीं है। जहां भी दिखे आप दूर से बैठकर के शव लेकिन साधना अलग हो जाती है। दर्शन करना अलग हो जाता है। देखना अलग हो जाता है। समझ गए? ओके। काफी प्रिस्रिप्शंस होते हैं श्मशान
(1:03:20) घाट में जाने के लिए। हम मैं जब पिछली बार बनारस में थी और जब मैं हरिश्चंद्र गई थी तो मैंने देखा वहां डॉक्यूमेंट्रीज बन रही हैं। लोग शूटिंग कर रहे हैं। अ कुत्ते बिल्ली घूम रहे हैं। मतलब एक नजारा ही कुछ अलग था। जी। तो मैं समझ नहीं पाई कि क्या ये इस घाट का एसेंस है या फिर इसको एक तरीके से एडल्टरेट कर दिया गया है। यू नो करप्ट हो चुका है। ये माहौल जो है। तो मैं जानना चाह रही थी कि हम हम ये घाटों को अप्रोच कैसे करें? मणिकर्णिका घाट हो गया, हरिश्चंद्र घाट हो गया। जो जाना चाहता है उसको अप्रोच क्या करें और प्रिस्क्रिप्शंस क्या-क्या हैं?
(1:03:56) ऐसे आप यह कपड़ा पहने या यह चीज़ नहीं जैसे हमें बोला जाता है जब आप में साइकिल में हैं तो वुमेन को नहीं जाना चाहिए। तो मैं उस चीज का ख्याल रखती हूं। या आप सफेद कपड़े पहने आके या तो कपड़ा जला दें या नहाएं या उसको धोएं। तो ऐसी कुछ प्रिस्रिप्शंस आप बताइए लोगों के लिए। जो लोग केवल दर्शन और दर्शन के पर्सपेक्टिव से आए हैं। मतलब आप काशी कुछ दिन आए हैं और कुछ दिन बाद आप चले जाएंगे। अगर मैं उन लोगों की बात कर रहा हूं। आप दर्शन करने के पर्सपेक्टिव से आए हैं। तो प्रयास यह करें कि जब इन घाटों पर जा रहे हैं तो जो भी संत महात्मा अघोरी क्योंकि
(1:04:28) काशी में किसी भी व्यक्ति ने यदि भस्म भी धारण की हुई है तो साक्षात वो चंद्रशेखर के स्वरूप में हैं। मेन इनका दर्शन है। उनको आप प्रणाम करते हुए चलें। प्रिस्रिप्शंस की बात है कि क्या कॉशन हम रख सकते हैं? क्या चीजें हैं? यदि हमने कुछ धागा वगैरह पहना है तो उसको बाहर कर लें। थोड़ा प्रोट्यूट कर लें। रुद्राक्ष अगर हमने यदि पहना हुआ है तो रुद्राक्ष हम अपना बाहर निकाल लें क्योंकि इन चीजों में ये हमें दी इसीलिए गए हैं कि नेगेटिविटीज को ऑब्जर्व करें क्योंकि उस श्मशान के क्रम से जब आप गुजर रहे हैं तो आप कितनी आंखों से गुजर रहे हैं और वो हर आंख जो
(1:05:01) वहां पर बैठी है वो अपना मतलब स्कैन कर रही है आपसे कई सारे लोग आपको दृष्टि से देख सकते हैं और आप जानते नहीं होंगे वहां पर तो जब इन जगहों पर से आप गुजरे तो अगर ऐसा कुछ सिंबॉलिक चीज आपने पहना है धारण किया है या कुछ कवच आपके पास में है उसको आप निकाले बाहर कर लें ले यह जो क्लटर है कैमरा और यह सब क्या मैं इसके समर्थन में हूं तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए। जहां चिताएं बल रही है हर किसी का एक डिग्निफाइड डेथ का राइट है। हम देखते हैं बड़े-बड़े जो लीडर्स हैं उनका भी जब क्रिमेशन होता है और कहीं पर भी होता है। कभी आप उनके बॉडी या फेस को नहीं देख
(1:05:35) सकते। वह एक अ मार्क ऑफ रिस्पेक्ट होता है। वह दूर से ही हम एक ग्लास को देख रहे होते हैं और उस पर ही जो भी पुष्प अर्पित किया जा रहा है और श्रद्धांजलि अपनी दी जा रही है। सेम डिग्निटी हमें आसपास के शवों के साथ में भी यह चीज रखनी चाहिए और इसका ध्यान हमें खुद को रखना चाहिए। यदि ऐसा कुछ सिंबल या ऐसा कुछ भी आप नहीं पहने हुए हैं। एक केवल यदि काला धागा आप पहन सकें जो साधकों के लिए आज के समय में क्योंकि नरमुंड तो पहनकर चलते नहीं साधक या फिर हमारे जो हम आप गृहस्थ में भी हैं गृहस्थ में रहकर के अपनी साधना करते हैं तो नरमुंड की माला पहनना वो फिजिबल भी नहीं
(1:06:10) है पॉसिबल भी नहीं है और कई सारे दृष्टि से आज भी सही नहीं समझा जाएगा। तो एक काला धागा जो होता है जो थोड़ा आगे से मोटा और प्रिट्यूडेड होता है। जैसे काल भैरव मंदिर काल भैरव में जैसे हम लोग बांधते हैं एक्सैक्टली क्या बोलते हैं उसको? वो है तो नरमुंड का ही स्वरूप लेकिन आज के समय में उसे गंडा धागा कहते हैं। वो ऐसा धागा आप पहन करके यदि घाटों पर जाएं तो निश्चित रूप से एक प्रोटेक्शन तो आप लेकर के अपने साथ में जाते हैं। यदि अंत्यष्टि में जा रहे हैं। काशी दर्शन वगैरह आपका वो नहीं है। केवल आप अंत्यष्टि यानी किसी के अंतिम संस्कार को अटेंड करने के लिए आप जा
(1:06:42) रहे हैं। वहां पर क्रियाएं काफी बदल जाती हैं। उस स्टेट में अगर हो सके तो जो शव है उसको बर्न करने के पहले मुखांजलि दी जाती है। उसके मुख में गंगा जी के हाथ से उसको पानी दिया जाता है। सम्मान भाव से वो देना चाहिए। जब तक कि वो पूरी चिता वो जल नहीं जाती और डोम आ करके कपाल के ऊपर प्रहार करके जो अंतिम चीजें हैं वह ना कर दे। वहां से हटना भी नहीं चाहिए। वह पूरी क्रिया वहां दर्शन करके तब फिर आपको गंगा स्नान करना चाहिए। गंगा स्नान करने के बाद फिर आप घर पर जाएं। घर पर आपको फिर से एक बार स्नान करना चाहिए और जो भी वस्त्र आप
(1:07:17) पहन करके घाट पर गए थे हो सके तो किसी व्यक्ति को धोबी को दान में ले देना चाहिए। तो ये क्रिया यदि आप अपनाएं तो आप गृहस्थ में रहते हुए भी जा भी सकते हैं और सभी मर्यादाओं का आप ध्यान भी रख सकते हैं। अच्छा एक और चीज जो काफी देखने को मिलती है वो है कि इन घाटों में लोग खाने पीने की चीजें खाते हैं हम ले जाते हैं खाते भी हैं पानी भी पी रहे हैं और कहा जाता है कि श्मशान घाटों में खाना पीना नहीं चाहिए। जी इसके बारे में थोड़ा क्लेरिटी दीजिए। हां एक बफर एरिया है श्मशान का स्पेशली जहां पर क्रिमेशन होता है तो वहां पर बैठकर के खाना पीना ना ही सिर्फ एक हमारी
(1:07:54) डिसेंसी के खिलाफ है पर जो वो शव या मृत है या जहां जिसका अंत्यष्टि हो रहा है उसके सम्मान के मोरल डिग्निटी के भी खिलाफ है। वहां पर बैठकर के खाना पीना लटिंग लिटरिंग ये चीजें हमें अवॉइड करनी चाहिए। स्पेशली जो मैंने यह बफर एरिया कहा इन चीजों से दूर रह कर हम ऑब्वियसली खा सकते हैं क्योंकि अंत्यष्टि करने में जो लोग जाते हैं तो ये छोटी प्रक्रिया तो होती नहीं है। 3 घंटे 4 घंटे होते हैं। अब मान लीजिए अभी कोई एक ऐसे हैं जो बहुत कम एज में चले गए हैं। उनका अंत्यष्टि करने के लिए उनका छोटा बेटा ही आया हुआ है जो हार्डली चल भी पा रहा है नहीं पा रहा है।
(1:08:27) तो वो अंत्यष्टि करेगा। वो जाएगा तो वो भूखा तो पूरा समय रह नहीं सकता। उसके आसपास वाले जो भी हैं वो भी कॉन्शियसली प्रयास करते हैं। उसको कुछ भोजन कराएं। तो लेकिन हां ये सभी दूर जाकर के ऐसे श्मशान घाट पर बैठकर के खाना पीना वो फिर वो अलग भोजन में वो गिनती हो जाता है। अच्छा अच्छा तो हम साइंटिफिकली अगर तो ये चीज देखें पास्ट में हम कहते हैं तीन आइस एजेस आ चुकी हैं। हर बार जब युग बदलता है करीबन 3000 का एक युग माना जाता है। तो महाप्रलय होता है। आपको लगता है काशी हमेशा अनस्केद्ड रहा। हमेशा बचा हुआ रहा पास्ट में भी। निश्चित
(1:09:02) रूप से आदि अनादि मतलब जिसका कोई अंत ना है मतलब अगर आप पीछे डेट प्रीडेट में आप जाएंगी तो कब से शुरुआत आप ये कोई भी बोलेगा तो हमेशा एज एन एस्टीमेट ही बोलेगा कि 500 वर्ष 60 हजार वर्ष 70 हजार वर्ष एक एस्टीमेट फिगर ही हमेशा वो बता पाएगा आदिल जब से प्रकृति है तब से काशी है ये मैं कह सकता हूं और जब तक प्रकृति रहेगी तब तक काशी रहेगी हम ये जो प्रक्रियाएं होती हैं फॉर द डेड मणिकर्णिका घाट में यह कैसी प्रक्रियाएं होती हैं? बेसिकली यह तो हमारे हिंदू धर्म के अनुसार जो अंत्यष्टि संस्कार इसको हम कहते हैं या फिर अंतिम संस्कार कई लोग इसको कहते हैं।
(1:09:45) तो ये जो प्रक्रिया है बेसिकली जो हम इस फॉर्म को लूज़ करके दूसरे फॉर्म में जब हम जाते हैं वो जिस भी हम गति के लिए हमारा नियोजित होता है। तो गति तो तुरंत हम सांस जैसे रुकती है तो कहीं ना कहीं सुनिश्चित होता है कि हम इस गति को प्राप्त करेंगे। पर ये जो यह शरीर है हमारा मानव शरीर है इसको एक रिस्पेक्टेबल अंतिम विदाई जो पंचभूत से बना हुआ शरीर वापस से पंचभूत में मिल जाता है उस पंचभूत में मिलाने की जो प्रक्रिया है वही है अंत्यष्टि संस्कार हम इसके क्रम में आप देखेंगे तो केवल अंत्यष्टि तक ये नहीं होता है। फिर पोस्ट डेथ हमारे रिचुअल्स 13 दिन तक चलते हैं।
(1:10:20) 13 दिन तक हम और किसी देवी देवता की पूजा नहीं करते हैं। हमारा यह है कि जो हमारे जो डिसीज्ड हैं जो हमारे पित हैं उनकी स्मृति में ही हम रहते हैं। और उनकी स्मृति में रहते हुए भी जब 12th डे हमारा आता है तो 12th डे पर जो कुछ दान के क्रम होते हैं सीजिया दान और उस व्यक्ति से जुड़े हुए कुछ प्रिय चीजें होती हैं जो भी वो अपने जीवन काल में रहते हुए जिन चीजों का भोग ज्यादा करता था उनको दान करके वो बेड हो सकता है सोफा हो सकता है किसी को म्यूजिक सुनना पसंद था तो स्पीकर हो सकता है ऐसी चीजों का जो हमारे घर के पुरोहित जो कुल परंपरा से चले आ रहे हैं सेजिया
(1:10:54) दान का इसको एक क्रम कहा जाता है उनको यह दान करके तब फिर हम अपने जो जीवन कार्य में गणेश जी को पहले पूजा करके उस दिन से हम अपनी दिनचर्या को रिज्यूम करते हैं। तो बेसिकली जैसे मैंने कहा पंचभूत का शरीर पंचभूत में मिल जाए इस बीच का जो क्रम है उसे हम अंतिम संस्कार या अंत्यष्टि कर सकते हैं। आपने देखा होगा बहुत सारे लोग हरिद्वार, काशी यदि वो नहीं भी आ पाए तो वो काशी में या हरिद्वार में या इन पुनीत जगहों पर वो अस्थि लेकर के आते हैं। अस्थियों का विसर्जन करने आते हैं। कई सारे लोग वो जीते जी काशी नहीं आ पाते तो उनकी इच्छा होती है कि मरणोपरांत उनकी जो
(1:11:28) अस्थि है कम से कम वो काशी के जो पुनीत पावन क्षेत्र है उसमें विलीन हो जाए शिवमय क्योंकि पूरी काशी ही शिवमय है जैसे मैंने कहा गंगा भी साक्षात शिव के जटा से निकली है तो उनका भाव यह होता है कि उसका स्पर्श करने मात्र से कहीं शिव का स्पर्श हमें मिल जाए तो इस भाव से पोस्ट डेथ रिचुअल्स भी साउथ इंडिया में तो साल भर चलता है। आप साल भर उसी तिथि पर यदि व्यक्ति अष्टमी को उसका देहांत हुआ तो प्रत्येक महीने की अष्टमी पर उसका श्राद्ध होता है। नॉर्थ इंडिया में 6 महीने 12 महीने का कांसेप्ट होता है जिसे हम छमसी और बरसी कहते हैं कि
(1:12:00) उस पर्टिकुलर डेट ऑफ डेथ से छ महीने जब होंगे तब उनका क्षमसी करते हैं। सिक्स मंथ रिचुअल फिर फाइनली हम बरसी यानी 12 मंथ रिचुअल हम करते हैं। हम हम हम तो क्या यह जो ये जो प्रक्रियाएं हैं ये अलग हैं मणिकर्णिका घाट में या काशी में फॉर दैट मैटर इन कंपैरिजन टू रेस्ट ऑफ इंडिया? ये हर जगह यूनिक है। हर जगह यूनिक है। हर जगह यूनिक है क्योंकि कुछ चीजों में शास्त्र पीछे हो जाता है। लोक परंपरा आगे हो जाती है। जैसे आप देखेंगे शादियां हमारे आप देखेंगे बंगाल में शादी का अलग परंपरा है। महाराष्ट्र में शादी का अलग परंपरा है। सब अलग है।
(1:12:32) ये परंपरा कहीं शास्त्रों में आपको नहीं मिलेगी। वो लोक परंपरा यानी उस परिवार में उस कुलदेवी का जो लीनेज है कुलदेवी की जिनकी भी आप पूजा कर रहे हैं। वहां से जो परंपराएं निकल रही हैं आपके परिवार में जो पालन हुआ है कि शादी के पहले शादी के बाद यहां जाकर माथा टेकना है। यहां पर हाथ का छापा लगाना है। शादी के समय में भी सेहरा जो है परिवार का यह व्यक्ति ही दूल्हे को पहनाएगा। यह जो छोटे-छोटे जो कर्म है ना यहां शास्त्र लोक परंपरा को आगे कर देता है। मरणोपरांत यानी डेथ रिचुअल्स में भी कुछ ऐसा ही है और वह हर जगह वेरीरी करता
(1:13:02) है। हर जगह अलग है। सिमिलरली काशी में अलग है। आप साउथ इंडिया में जैसे मैंने कहा प्रत्येक महीने में आपको श्राद्ध कर्म करना है। वही आप हमारे नॉर्थ इंडिया में आएंगे वो अलग है। आप ईस्ट इंडिया में जाएंगे वो अलग है। वो बहुत सूक्ष्म हो जाता है। तो ये डायवर्जन और ये केवल यह नहीं कि श्राद्ध कर्म की विधि है। वो तंत्र मंत्र यंत्र तीनों की पूजा में आप देवताओं के मंदिर खुलने बंद होने का समय जैसे अभी मैं कामाख्या गया तो वहां पर जो मंदिर है वो भगवती का 7 8:00 बजे खुलता है। हम लोग मंदिर 4:00 बजे खोल देते हैं भगवान का मंगला आरती करके हम
(1:13:32) और आप इसी तरीके से साउथ में जाएंगे तो वहां प्रत्येक समय होता है कि मंदिर बंद रहने का। जरूरी नहीं हमारे कई सारे हमारे मंदिर तो ऐसे हैं कि दिन रात भगवान दर्शन देने से हमारे वासनी शक्तिपीठ है। 24 घंटे देवी वहां पर झांकी दर्शन देती हैं। आप अंदर नहीं जा सकते तो भी बाहर से आप देवी का दर्शन कर सकते हैं। ये लोक परंपराएं जगह-जगह की उनके अपने लोकल फैक्टर्स को कल्चर, हेरिटेज, क्लाइमेट, फूड, क्लाइमेटिक कंडीशंस को ध्यान में रख के अपनाया जाता है और वही सही है। अच्छा बट जो कोर वैदिक विधि होगी जैसे शादी की भी जो वैदिक विधि है
(1:14:04) जी वो कोर 45 मिनट्स की सेम है जो योगिक टाइम से चली आ रही है हजारों साल पहले से फिर कल्चर हैज़ कम इन बिटवीन वो पूरा एक तरीके से कहेंगे एक ऐड ऑन इफेक्ट हुआ तो ऐसी तरीके से डेथ रिचुअल्स में भी ये चीज होल्ड करती है कि जो बेसिक है वैदिक जो कोर प्रिंसिपल्स हैं वो सेम है 13 दिन का अंत्यष्टि तो सभी को करना है और जो मेथड होता है मेथड भी लगभग लगभग परस्पर सबके लिए सेम है कि आपको जो 10थ डे है मतलब जो अंत्यष्टि कर रहा है जिस भी व्यक्ति ने दाग संस्कार जो आग दे रहा है वह तो तुरंत ही उसको बाल बनवाने होते हैं। वो अपना मुंडन संस्कार
(1:14:38) तुरंत कर देता है। परंतु बाकी जो परिवार के सदस्य हैं वो 10थ डे पर 10वें दिन पर अपना मुंडन संस्कार कराते हैं। 11th डे पर कई सारे केसेस में जो एकादिष्ट होता है। एक श्राद्ध की एक विधि एकोदिष्ट वो श्राद्ध के कर्म 11थ डे पर होते हैं। अह 12थ डे पर नारायण बलि और गणेश जी की पूजा और 13थ डे पर ब्राह्मण का भोजन करके अह जो क्रम है वह हम मानते हैं कि पूरा हो गया। जब ब्राह्मण को हम आसन के साथ भोजन के साथ और दक्षिणा के साथ विदाई कर देते हैं और भोजन की भी जो ब्राह्मणों की भोजन की भी जो संख्या है वो ऑड नंबर्स में 11 21 51 101 तो ये जो हम क्रम पूरा करते थे
(1:15:15) तब हम मानते हैं कि अब हमारा जो यह पितृ है ये 13 दिनों का यह अब हो गया। अब ये अब अपने जीवन के संस्कारों में अभी आगे की तरफ गति में बढ़ेंगे। ओके। किसी को अगर तो अपना खुद मनी करने का घाट में कभी उनकी इच्छा होती है ना कि हम हमारा अंतिम संस्कार वहां हो। स्पेशली जिनकी फैमिली ना हो। जी या फिर जिनकी फैमिली हो वो अपनी फैमिली वालों के लिए अगर तो करना चाह रहे हैं तो प्रोसेस क्या है? बहुत ही सरल और सिंपल प्रोसेस है। और क्या नाम है? अब तो सरकारों की तरफ से बहुत सारी सुविधा भी हो गई हैं। कई सारे एंबुलेंस भी है, बोट एंबुलेंस भी है। नाव
(1:15:49) के माध्यम से भी आ सकते हैं। आप जब मणिकर्णिका पर पहुंचते हैं तो जो लकड़ियां हैं जो लकड़ियां वहां पर एक पूरा मार्केट बना हुआ है और उनको आप परचेस करके जो भी जितना भी लकड़ी और उसके साथ में साखला जो लगता है बेसिकली यह भी एक तरह का हवन ही है ना। तो जितनी सामग्रियां हवन में लगती हैं, करीब-करीब वही सारी सामग्रियां इस शरीर की आहुति देने में भी लगती हैं। तो घी, साकला, लकड़ी, कपूर ये सारी चीजें इस शरीर का अंत्यष्टि करने में जो लगती हैं वो आप वहां से कर सकते हैं। कोई भी एक व्यक्ति आपका पुरोहित रूप में यदि क्योंकि कई सारे लोगों के तो पुरोहित तय होते हैं।
(1:16:25) वो जाते हैं उसके पहले उनको पता होता है इनको फोन करना है। हमारा यही कराएंगे जो उनके कुल परिवार में जो लोग कराते हैं और जो जिनको नहीं पता है तो वह किसी भी व्यक्ति को वहां पर जाकर के किसी भी डोम के साथ में किसी भी पुरोहित के साथ में बात करके एक पंडित होता है पंडित आपको जो वैदिक कृति करानी है कितने प्रदक्षिणा करना है मुखाग्नि कैसे देनी है ये सारी चीजें आपको वो गाइड करता है और जो डोम होता है तो शरीर से जुड़े हुए जितने कृत्य हैं स्पर्श करके वो सारे कर्म वो करेगा ओके क्या लेडीज ये प्रोसेस कर सकती हैं अपनी फैमिली मेंबर्स के लिए
(1:16:59) यदि परिवार में कोई भी व्यक्ति मेल मेंबर ना हो तो उनको करने का अधिकार है। बिल्कुल वो कर सकती हैं। अच्छा यह भी जगहों जगहों पर वेरीरी करता है। जैसे गया में सीता जी ने खुद श्राद्ध किया। तो वहां पर तो पूर्णत यह मान्यता है कि पूरा अधिकार है स्त्रियों को श्राद्ध कर्म करने का और मैं भी इसका समर्थक हूं। परंतु जो शास्त्र कहते हैं वह जेष्ठ पुत्र जो परिवार में बड़ा जो पुत्र है यदि भाई बहन भी हैं तो पुत्र यदि बड़ा है तो उसको करने का अधिकार है या छोटा भी है तो पुत्र को करने का पहला अधिकार ये हमारे शास्त्रों से ये प्रमाण मिलता है लेकिन जो
(1:17:37) उनके संस्कार में अन्य बहुत सारी चीजें होती हैं। अह इसीलिए हम कहते हैं ना कि जब घर से हम निकलते हैं तो जीवन भर जो हमने अर्जित किया वो वहीं रह जाता है। शास्त्रों का यह उल्लेख है। हमने धन इकट्ठा किया, सोना इकट्ठा किया, चांदी इकट्ठा किया, वह सब ज्वेलरी बॉक्स में ही हमारे रह जाता है। घर की जो स्त्रियां हैं, वह दरवाजे के कपाट तक हमारा साथ देती हैं। वहां से फिर जो हमारे मित्रगण, बंधुगण, वो हमें श्मशान तक लेकर के आते हैं। अब बहुत रेयरली आपने कभी ये फुटेज नहीं देखा होगा कि बहुत रेयर यह होगा कि कोई स्त्री जो है कंधा देकर के लेकर के जा रही है शव को।
(1:18:11) मैंने मंदिरा बेदी को देखा था हाल ही में। जी मैं रेयर मैंने कहा। यह मैंने नहीं कहा कि नहीं है। तो जब वहां पर जाते हैं तो फिर वहां तक तो हमारा फिर शरीर भी नहीं है। फिर ये शरीर जो हमने जो हमारा शरीर जो भी ये है पंचभूत से बना हुआ ये शरीर भी हमारा वहीं छूट जाता है। तो स्त्रियों का जो बताया गया स्त्रियों का स्थान वो दरवाजे के गेट तक है। वहां तक वो हमें विदा करती हैं। आगे बहुत सारे उसके अपने उस समय के भी कारण थे जो सोशियोइकोनमिक कंडीशंस और बहुत सारे पैटर्न्स जो हुआ करते थे उनको यह विश्वास नहीं था कि जो स्त्रियां महिलाएं हैं ये
(1:18:43) वहां की ऊर्जा को या जो एक्सट्रीम जो एक रिस्पांस उनका होता है ऐसे सिचुएशन में जो घबराहट और बहुत सारी चीजें हम लोग देखते हैं हमेशा बहुत ही यूजुअल है। ऐसा कुछ घर परिवार में होता है तो सबसे वर्स्ट अफेक्टेड इमोशनली कौन होता है घर में। तो हम जानते हैं उसका उत्तर क्या आएगा। उसी घर की कोई ना कोई फीमेल मेंबर ही होगी। तो उनको उस चीज से अवॉइड करने के लिए उनके जो जाने का प्रोसेस है अग्निह करने का जो प्रोसेस है तो एक जो ट्रॉमा और पेन है उससे उनको इम्यून करने के लिए ये चीजें कांसेप्ट उस समय बनाई गई थी आज के समय में बहुत ब्लर है लगभग हर कोई स्त्रियां जाती
(1:19:14) हैं जाती हैं श्मशान घाट पर और जैसे मैंने कहा यदि परिवार में कोई नहीं है तब तो अधिकार है यदि है तो जो इसे शास्त्र कहते हैं और जैसे आपके घर परिवार परंपरा में माना जाता है ये कोई इसका थंब ऐसा एक वैसा थंब रूल आंसर नहीं है घर परिवार शास्त्र और वो आपके कुल के पुरोहित या घर के बड़े आपको बताएंगे क्या परंपरा माननी चाहिए। उस हिसाब से ही एंथस्टी करनी चाहिए। लोग आजकल इंक्लूडिंग मी काफी पेट्रियाकल कांसेप्ट्स को क्वेश्चन करते हैं कि औरतें कन्यादान फॉर एग्जांपल आज चैलेंज में है कि कन्यादान तो मनु से आया था। कन्यादान तो शास्त्रों में मेंशन भी नहीं
(1:19:46) है। दूसरी चीज ये है आग देना। जैसे मैं इकलौती बेटी हूं। तो मैं क्यों ना मेरा भाई भी होता तो भी मैं आग देती। जी। तो वो एक चीज अगर और आपने बहुत सही बात बोली कि दे विल गेट मोर ओवरवेल बाय इमोशंस। बट अगर तो एक स्त्री बहुत ही बैलेंस्ड है इमोशनली वो आग तो बिल्कुल दे सकती है ना इफ शी नॉट ऑन हर हर हर हर हर हर हर हर हर हर पीरियड आजकल देते हैं लोग ऐसा नहीं है कि नहीं देते हैं हम हम हां बट एक चीज को ये समझना कि कौन सी जो परंपरा है वो पास्ट से आ रही है इन कंजक्शन विद दैट सोशियो इकोनमिक कंडीशन और कौन सी अब अवॉयडेबल है क्योंकि वो सोशियो
(1:20:19) इकोनोमिक कंडीशन आज पे तो लागू ही नहीं होती जैसे कि अपनी सबरीमाला में बात कर रहे थे ये सबरीमाला में बहुत अकल्ट प्रैक्टिससेस होती है अकल्ट प्रैक्टिसेस वुमेन के रेप्रोडक्टिव सिस्टम के लिए सही ही नहीं हैं। शनि की काफी प्रैक्टिससेस होती है वहां पर। तो नेचुरल सी बात है वुमेन को नहीं जाना चाहिए। बोला जाता था पहले कि जो हमारे मंदिर थे बहुत पहाड़ों में उनमें भी महिलाओं को नहीं जाना जाता था। बिकॉज़ वुमेन में साइकिल में होगी शेर आएगा सीधा सूंघ लेगा खून को। वो खा शी विल बी द फर्स्ट प्र। लेकिन आज वो शायद से कांसेप्ट अप्लाई नहीं करता। तो मंदिर के
(1:20:47) आज जो टेंपल्स में जब में साइकिल में भी आज वुमेन जा सकती हैं। तो मेरे ख्याल से वो एक डिस्टिंशन बनाना कि कौन सा लिंक करता है एक ऐसी परंपरा को जो आज की डेट पे मूड है। इट डजंट रियली अप्लाई। और ऐसी कौन सी चीज है जिसके पीछे एक बहुत बड़ा मिस्टिकल प्रोसेस इन्वॉल्वड है। क्योंकि मिस्टिसिज्म इंडियन अल्कमी जो है वो मंदिरों के साथ तो बहुत गहरी तरह से जुड़ा हुआ है। तो उसको एक तरीके से रिस्पेक्ट करना और समझना कि इट कैन कॉज मोर हार्म टू यू इफ यू यू यू यू यू यू यू डोंट रिस्पेक्ट इट। बायोलॉजिकली, फिजियोलॉजिकली। वेरी ट्रू। बहुत सारी चीजें हमारे शास्त्रों में जो
(1:21:19) कही वो उस पर्टिकुलर टाइम स्पेस और कंडीशन के हिसाब से कही गई थी। तो हमें आज के समय में कॉन्टेक्स्ट में उनको जज नहीं करना चाहिए। नंबर एक और नंबर दूसरा हमारा जो सनातन धर्म का कांसेप्ट है वो डायवर्सिटी के प्रिंसिपल पर बेस्ड है। डिस्क्रिमिनेशन के प्रिंसिपल पर बेस्ड नहीं है। यदि किसी कार्य में पुरुष को आगे किया गया है तो यह मतलब थोड़ी कि महिला का कोई रोल नहीं रह जाता है। यदि सारे लोग घाट पर ही चले जाएंगे तो घर देखने वाला कौन रहेगा? तो उस समय उस हिसाब से भी कहा गया कि स्त्रियां घर तक रहती थी। पुरुष चले जाते थे आगे। और
(1:21:51) बहुत सारे जो अंत्यष्टि से लेकर के मान लीजिए ब्राह्मणों का भोजन बनाना है। उस उस क्रियाकर्म के बाद में लेट से लोग घर वापस आया करते थे। तो जो उनका भोजन पकाना है, तैयार करना है, चीजें करनी है वो स्त्रियां घर में रह के करती थी। तो ये यही परस्पर बैलेंस तो हमारे सनातन धर्म में सिखाता है। तो ये डिस्क्रिमिनेशन नहीं है कि औरत नहीं कर सकती है और पुरुष कर सकता है। बल्कि ये रोल का डेफिनेशन जो उस समय के सोसाइटियल टाइम स्पेस कंडीशन को ध्यान में रख के डिफाइन किया गया था जो आज के समय में काफी ही ब्लर होता हुआ दिखता है। अंडरस्टुड
(1:22:20) और ये केवल यहां पर ही नहीं बहुत सारे लोग ये भी क्वेश्चन करते हैं कि भाई इस मंदिर में से सबरीमाला एक मंदिर बहुत लंबे समय तक इसका केस सबजुडिश कोर्ट में चला कि वहां पर पुरुष ही क्यों जाए? महिला क्यों नहीं जा सकती वहां पे? कई सारे ऐसे मंदिर हैं साउथ में दक्षिण भारत में जहां पुरुष केवल स्त्रियां जाती हैं, पुरुष नहीं जा सकते। तो ये जो हमारा धर्म है ना ये डायवर्सिटी का जो इस फंडामेंटल बैलेंस पर एक बना है। मेरा मानना है अगर इसके साथ छेड़छाड़ ज्यादा करें तो हम अपने एसेंस को क्योंकि हम यूनिफॉर्मिटी में कहीं नहीं मानते हैं।
(1:22:51) जैसे मैंने कहा कि जगह बदलते ही अंत्यष्टि संस्कार का रिचुअल बदल जाता है। मैरिज का रिचुअल बदल जाता है। तो अगर ये मूल तत्व को ही आप छेड़ देंगे तो फिर यूनिफिटी तो जैसे बाकी जगहों पर हुआ उनकी जो लोक परंपराएं हैं, लोक मान्यताएं जो क्षीण होती गई तो हमारे साथ भी ये क्षीण होती जाएंगी। ये समझने की बात है कि ये कहीं से भी डिस्क्रिमिनेशन आपके साथ में नहीं है। काशी में कहा जाता है कि ये जो तपस्वी या योगी होते हैं जो साधना करते हैं जब इनका डेथ का वक्त होता है, मृत्यु का वक्त आता है तब यमराज लेने नहीं आते। शिव लेने आते हैं, नंदी लेने आते हैं। इसके बारे में
(1:23:23) थोड़ा बताइए। ये किसी भी साधक के लिए तय है। अच्छा। और वह जहां कहीं से भी साधना कर रहा है जैसे हम भगवती मां शक्ति के उपासक हैं। तो हम यह दृढ़ निश्चय से मानते हैं कि जब हमारा प्राण छूटेगा क्योंकि हम तो साधना ही इसके लिए कर रहे हैं ना। भैरव साधना तो हम कर ही इसके लिए रहे हैं कि अंत समय जब हम आ रहा है तो हम भैरव अंग की तरह अपना जीवन याप जो है ये समाप्त करें। पूरा जीवन पद्धति से ही जिए। सत्य की राह पर चलें। करुणा के भाव से जिएं। तब जाकर के यह संभव होता है कि भैरव या भैरव के गण स्वयं लेने के लिए हमें आते हैं इस शरीर
(1:23:56) को। वैसे ही भगवती के जो उपासक हैं तो वो मानते हैं कि मां काली उनको लेने के लिए आती हैं। मां काली की गणिकाएं जो हैं वो उनको लेने के लिए आती हैं। और काशी में तो सभी का समावेश है ना। काशी में तो 10 महाविद्या भी हैं। काली, तारा, भुवनेश्वरी, त्रिपुर सुंदरी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला देवी सारी की सारी 10 महाविद्या छिनमस्ता समेत सभी काशी में अपने पूर्ण रूप से विराजमान है। इसलिए काशी और काशी विश्वनाथ का स्वरूप इतना बड़ा इतना प्रकांड है कि वैष्णव, शाक्त, शैव, गणपत्यज्ञ जितने भी उपासक हैं जिसको किसी को भी मानने वाले हैं। हर किसी का
(1:24:32) उपासना पद्धति आपको काशी में मिल जाता है। इसीलिए मैंने कहा ज्योतिर्लिंग तो है काशी लेकिन शक्तिपीठ भी है। इसी काशी में नौ गौरी का दर्शन होता है। नव दुर्गा का दर्शन होता है। दश की दसों महाविद्या केवल कामाख्या और काशी ऐसा स्थान है पूरे इस ब्रह्मांड में जहां पर 10 महाविद अपने प्रत्यक्ष रूप में विराजमान है। कामाख्या में भी जल का स्रोत है। यदि आप कभी कामाख्या गई हैं तो आप देखेंगे उन 10 महाविद के स्थान से पानी निकल रहा है। तो जहां-जहां उन 10 पॉइंट्स पर पहाड़ पे पानी निकल रहा है वो 10 महाविद के स्थान है। लेकिन काशी में तो ये सभी दश महाविद्याएं
(1:25:03) सदेह जागृत अवस्था में दर्शन देती हैं। अच्छा ओके क्योंकि उनका लाइफ फिजिकल फॉर्म है। जी प्रत्यक्ष स्वरूप में मूर्ति रूप में कोई प्राण प्रतिष्ठित है। कोई स्वयंभू है कोई चल के वहां पर आई हैं। अच्छा बहुत ही मिस्टिकल कहानी है। माने दश महाविद्या काशी का एक ऐसा हिडन पोर्टल है। के साधक जो भी अपने जीवन में देवी का जाप नहीं भी करते हो, ध्यान नहीं भी करते हो। वैसे ले मैन टर्म्स में भी केवल आप ये 10 मंदिरों में दर्शन करके आ जाए। निश्चित रूप से देवी साधना के प्रति आपका आकर्षण जबरदस्त रूप से आगे बढ़ेगा। अच्छा वंडरफुल ग्रेट आपने डोम के बारे डोम
(1:25:38) समुदाय के बारे में मैं जानना चाह रही थी। कहते हैं कि चिताओं में जो आग होती है वो डोम संप्रदाय का कोई व्यक्ति ही देता है। इसके बारे में थोड़ा दर्शकों को ये डोम एक तरीके से हमारे यहां एक कम्युनिटी बनी क्योंकि श्मशान पर आ तो सभी रहे हैं लेकिन इन श्मशान पर जो आने वाले जो शव और क्रिमेशन है इनका क्रमेशन अंत्यष्टि कौन करेगा? सही विधि पद्धति कौन बताएगा? तो सभी ने इसके लिए हाथ खड़े कर दिए थे। कोई भी वर्ण इसके लिए रेडी नहीं था। अच्छा। तो उस सिचुएशन में जो मणिकर्णिका घाट है वहां पर एक समुदाय ने इसकी जिम्मेदारी ली और शिव जी को संकल्पित करते हुए यह सेवा
(1:26:12) एक तरीके से उन्होंने शुरू करी कि जो भी कोई मणिकर्णिका के घाट पर आएगा। परम गति प्राप्त क्योंकि एक तरीके से शिव के दूत हैं जो डोम है इनको शिव के दूत के रूप में आज भी माना जाता है और उसी सम्मान भाव से माना जाता है। तो ये जो सर्कल है जो सद्गति पाने का जो एक तरीका है डोम भी इसमें एक इंपॉर्टेंट एलिमेंट है कि काशी में मरने से जो मुक्ति है तो एक तरीके से ये डोम के हाथ से जब यह क्रिया अंत्यष्टि और सही विधि से हम करते हैं। उनके गाइडेंस में उनके बताए हुए मार्ग और रास्ते से क्योंकि अन्य कोई यह काम को कर नहीं सकता। वो ही इसको करने के अधिकारी हैं। तो उस
(1:26:47) पद्धति से जब भी हम चलते हैं और उनके मार्गदर्शन में तो हम भी सद्गति या मुक्ति मोक्ष की तरफ प्रशस्त होते हैं। इस विश्वास के साथ में आज भी जो डोम की कम्युनिटी है वो हमारे वाराणसी के घाटों पर है। सेवाओं को निरंतर कर रही है। यदि आप सोचिए ये बड़ी कम्युनिटी यदि हाथ खड़ा करती तो कितना बड़ा क्राइसिस कभी ऐसा नहीं हुआ। कोरोना काल में भी अपनी जान की परवाह किए बिना इस कम्युनिटी ने अंत्यष्टि को किया और अपने संकल्पों का निर्वहन किया। किसी की मृत्यु नहीं हुई कोरोना में भी। ऐसे डिफिकल्ट और बहुत ही सल चीज को हैंडल करते हुए भी क्योंकि वो तो बहुत ही
(1:27:21) इनफेशियस वायरस था। मतलब बहुत ही कंटजियस था। क्या-क्या प्रकॉशन हम नहीं रख रहे थे? उस समय भी ये सेवा बंद नहीं हुई। तो ये कम्युनिटी को हमें धन्यवाद देना चाहिए। इस पॉडकास्ट के माध्यम से उनको प्रणाम करना चाहिए। बिल्कुल बिल्कुल। अगर तो कोई मणिकर्णिका घाट जा रहा है तो किन मंदिरों का दर्शन करना चाहिए या फिर कोई हरिश्चंद्र घाट जा रहा है तो किन मंदिरों का दर्शन करना चाहिए? अच्छा यह घाट ही अपने आप में पूरे तीर्थ हैं। तीर्थ के स्वरूप में ही वहां पर विराजमान है। बहुत सारे देवी देवता सभी लगभग लगभग सभी 33 कोटि देवी देवताओं का
(1:27:51) दर्शन इन्हीं तीर्थों पर हो जाता है। दोनों शमशान पर जैसे अगर हरिश्चंद्र घाट देखें तो अष्ट भैरव में जो दूसरे भैरव यानी रू भैरव है वो हरिश्चंद्र घाट को प्रोटेक्ट करते हैं। हमेशा सदैव वहां पर रक्षा और भक्तों को परम गति प्रदान करते हैं। हरिश्चंद्र से थोड़ा सा ही पहले इंटरलिंक था पर बहुत दूर नहीं आज भी है वो है केदार घाट जो काशी का बहुत ही पुनीत तीर्थ माना जाता है। एक समय वो भी श्मशान था। आज मंदिर के रूप में वहां गौरी केदारेश्वर हैं। जिनका एक बार दर्शन करना हिमालय के ऊपर चढ़ के सात बार दर्शन करने केदारनाथ के बराबर है। उनका हमें दर्शन
(1:28:25) करना चाहिए। और साथ ही में जो द्वादश ज्योतिर्लिंग की यात्रा होती है उसमें रामेश्वर महादेव जो है वो भी हमें उनका दर्शन भी हमें उनके पास हरिश्चंद्र घाट के पास में हनुमान घाट है वहां पर ही उनका दर्शन हमें प्राप्त होता है। मणिकर्णिका पर जब हम जाते हैं तो मणिकर्णिका पर मणिकर्णिका जाने के पहले ही हमें वाराही देवी और विशालाक्षी देवी का दर्शन होता है। वाराही देवी को मानते हैं कि जैसे भैरव जी दिन में काशी की रक्षा करते हैं तो वाराही देवी रात्रि में काशी की रक्षा करती हैं। विशालाक्षी साक्षात काशी विश्वर की विश्वेश्वरी स्वरूपा जो अर्धांगिनी जिस
(1:28:57) रूप में विराजमान है शक्तिपीठ बहुत लोग जानते हैं काशी केवल ज्योतिर्लिंग है पर शक्तिपीठ भी है काशी में अच्छा तो विशालाक्षी देवी का स्थान वो है जहां विश्वनाथ स्वयं शयन या फिर आराम करने के लिए आते हैं और मणिकर्णिकेश्वर महादेव है विष्णु भगवान ने अपने हाथ से मणिकर्णिकेश्वर महादेव की स्थापना करी जिनके दर्शन करने माग से मुक्ति की जो परम गति है वो एक साधक या भक्त को प्राप्त होती है। ये मणिकर्णिकेश्वर महादेव उनके स्थान का महत्व है। रत्नेश्वर महादेव है। मणिकर्णिकेश्वर के पास में उनका दर्शन होना चाहिए। और ये पूरा जो मणिकर्णिका का
(1:29:28) जो क्षेत्र है ना ये विश्वेश्वर खंड के अंतर्गत आता है। अच्छा यानी काशी विश्वनाथ भी इसी के अंदर में आ जाएंगे। अच्छा मणिकर्णिका क्षेत्र विश्वेश्वर खंड जो है यानी विश्वेश्वर महादेव यानी काशी विश्वनाथ का जो एक स्फीयर ऑफ इन्फ्लुएंस है। त्रिशूल का एक हाथ विश्वनाथ जी का भी है ना। विश्वनाथ जी के आसपास में जितने क्षेत्र हैं और उन क्षेत्र में जितने भी मंदिर हैं वह सभी विश्वेश्वर खंड के अंदर में आते हैं और विश्वेश्वर खंड के अंतर्गत जितने भी मंदिर हैं वो सभी का दर्शन लगभग मणिकर्णिका तीर्थ के आसपास में ही अधिकतर का दर्शन होता है।
(1:30:00) हां हां अब तो कॉरिडोर बन जाने से आप मणिकर्णिका से निकले और विश्वनाथ जी पहुंच गए ऐसा हो गया है। मणिकर्णिका घाट में हाल ही में कॉरिडोर बना है। काफी तोड़फोड़ हो रही है। काफी चर्चा में था। ये काफी कंट्रोवर्सी में था। आपके व्यूज क्या है इसमें? मैं डेवलपमेंट के खिलाफ तो नहीं हूं। डेवलपमेंट जरूरी है जिससे साफ सफाई की काफी दिक्कत है मणिकर्णिका पर। और यह मैं नहीं कोई भी व्यक्ति जो कभी भी मणिकर्णिका घाट पर आया है वो स्वयं को यह बता देगा डस्टबिन जगह-जगह पर होने चाहिए जो काफी कुछ बेटर फॉर अ बेटर स्टार्ट भी हुआ था। पर फिर भी क्योंकि आप समझिए एक जगह की
(1:30:33) कैपेसिटी है। अगर उस जगह पर एक समय में यही मणिकर्णिका घाट से हम लोग जब महाकुंभ के समय गुजरते थे पैर रखने की जगह नहीं होती कई बार स्टैंपीट तक का सिचुएशन बना था। इसी मणिकर्णिका घाट पर इतने सारे लोग क्रिमिशन के लिए आ रहे हैं। पिंडदान के लिए आ रहे हैं। गंगा स्नान करने के लिए आ रहे हैं। दर्शनों के लिए आ रहे हैं। वो घाट छोटा सा है। तो निश्चित रूप से इन टर्म्स ऑफ इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट कुछ बेसिक अम्युनिटीज वहां पर होना बहुत ही जरूरी है। जो आज के समय में ह्यूमैनिटेरियन ग्राउंड्स पे नीड ऑफ़ दी आर है। वाशरूम नहीं है अगर लेडीज के लिए
(1:31:04) तो मेरा मानना है ये सब बहुत ही आवश्यक है। जरूरी। लेकिन यह कहने के साथ में यदि मणिकर्णिका घाट पर कैफेरिया बनता है कि वहां पर बैठकर के लोग कॉफी और चाय पी रहे हैं और लेट करके श्मशान को देख रहे हैं बढ़िया काउच पर तो मैं ऐसे डेवलपमेंट के खिलाफ हूं। सेंटिटी को मेंटेन करते हुए क्योंकि अगर मणिकर्णिका पर वो रोनेस वो एनर्जी ही नहीं रहेगी। जैसे आपने स्टार्टिंग में कहा कि श्मशान पर गए तो मुझे काफी क्लटर दिखा। लोग डॉक्यूमेंट्री भी शूट कर रहे हैं। कुत्ते बिल्ली घूम रहे हैं। कुत्ते बिल्ली तो घूमेंगे ही। वो तो मान लीजिए उनका जगह
(1:31:35) है। वो नहीं घूमेंगे तो वहां पर कौन घूमेगा? मतलब श्मशान हमारे पिक्चर परफेक्ट जगह नहीं ना है। कि जैसा हम पिक्चराइज करते हैं, आइडियलाइज करते हैं वैसे हमारे लिए शमशान। श्मशान तो अपने आप में ही रॉ है। हम एक लाइव वायर, एक लाइव स्वॉट की तरह श्मशान है। तो वो जो प्रारूप है अगर वो क्षीण किया जाएगा बीच में एक कुछ ऐसे भ्रामक स्थिति फैलाने की कोशिश की गई थी कि मंदिरों को कोई मंदिर को तोड़ा नहीं गया। मणिकर्णिका पे किसी भी टेंपल को डिस्ट्रॉय नहीं किया गया है। कुछ चबूतरे थे उनको डिस्प्लेस किया गया है और वह वापस से वहीं पर लगा दिए
(1:32:06) जाएंगे। वो इंटैक्ट जो गवर्नमेंट ने प्रॉमिस किया है। तो ऐसे डेवलपमेंट के मैं पक्ष में हूं। हैविंग सेड दैट हम सबको एक क्लोज आई रखना चाहिए कि क्या डेवलपमेंट मणिकिका पर हो रहा है और वो सेंटिटी के साथ में छेड़छाड़ उसमें नहीं होनी चाहिए। ओके ओके। दश महाविद्या में दसों रूप तो है देवी का लेकिन इसमें सबसे विशेष रूप कौन सा होगा? सभी विशेष हैं और मुझे निजी रूप से मां भगवती, मां तारा, मां काली, मां कमला और मां बगलामुखी की साधना इस दास को मिली हुई है। तो मैं स्वयं इन सभी भगवती की उपासना करता हूं। परंतु यदि काशी के परिपेक्ष में
(1:32:38) बात करें तो एक ऐसा परम सिद्ध स्थान है जहां पर करोड़ों सिद्धों का जो प्रेजेंस है आज भी सूक्ष्म माइक्रोफॉर्म में आज भी उनका प्रेजेंस मिलता है। आप इंटरनेट पे देखेंगे तो कई सारे विजुअल्स आपको मिलेंगे। बॉलीवुड के एक्टर्स जूही चावला एक्सट्रा सद्गुरु सभी स्थान पर जाकर के मेडिटेट करते हुए दिखेंगे आपको। यह मातंगी देवी का स्थान है काशी में जहां पर चंद्रकूप हमें आज भी दिखता है। वो चंद्रकूप साक्षात चंद्र भगवान ने अपने हाथ से इस चंद्रकूप की रचना की थी। एक मिसकंसेप्शन है कि अगर चंद्रकूप में हम देख रहे हैं हमारी परछाई ना दिखे तो हमारी
(1:33:12) मृत्यु तक हो सकती है विद इन 41 डेज। पर जो मेन महत्व है चंद्रकूप में दर्शन करने का है। और इस कूप को बनाया इसलिए था क्योंकि चंद्र भगवान ने काशी के इसी प्रिमाइससेस में चंद्रेश्वर महादेव की स्थापना की और यह गंगा जी के एग्जिस्टेंस से भी प्रिडेट करता है। तो उनको जल चढ़ाने के लिए चंद्रकूप की प्रतिष्ठा की गई। ठीक चंद्रकूप के राइट हैंड साइड में एक रेड्ड प्लेटफार्म है। वहां कलयुगेश्वर महादेव हैं। ऐसा माना जाता है कि उस परम सिद्ध स्थान में जिसकी मैं बात कर रहा हूं वहां कलयुग का प्रवेश नहीं है। कोई भी व्यक्ति अगर दो-ती मिनट बैठकर भी अच्छे से ध्यान
(1:33:46) केवल केवल ध्यान करे। कोई जप वगैरह नहीं। आंख बंद करके बस एक स्मूथ ब्रीदीिंग का प्रोसेस अगर वह फॉलो करता है। वो खुद देखेगा एक नेचुरल स्टेट ऑफ़ ट्रांस में वो जा रहा है। एक नेचुरल स्टेट ऑफ़ लूजिंग वंस मने वहां पर है भी और नहीं भी है जो एक स्टेट होता है। उस स्टेट में वो अपने आप को जाता हुआ महसूस करेगा। मातंगी देवी जो हमारे थ्रोट चक्र को रिप्रेजेंट करती हैं और संगीत कला वाक शक्ति शत्रु संहार कारिणी साक्षात भगवती का जो स्वरूप है और वहां पर मातंगी देवी अगर हम देखें तो शी इस नाइंथ महाविद्या उनके ठीक सामने नवदुर्गा का स्थान है इसी मातंगी देवी के
(1:34:20) प्रिमाइससेस में जो एक दूसरे को फेस करते हैं और वो नाइंथ दुर्गा में सिद्धेश्वरी देवी हैं नाइंथ महाविद्या लुकिंग टुवर्ड्स नाइंथ दुर्गा ये रेयर कॉम्बिनेशन पूरे ब्रह्मांड में कहीं नहीं मिल सकता है केवल काशी में आपको दर्शन करने को मिलेगा। हम हम बढ़िया श्री महंत हर्ष पांडे थैंक यू सो मच आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। सबसे पहले मैंने बहुत लंबे टाइम में एक पॉडकास्ट किया जहां मैं बहुत इंस्पायर्ड हुई कि मैं शुद्ध हिंदी में जितना बात कर सकूं करूं। आपके ओरिएटरी स्किल्स इतने ब्रिलियंट है। आई एम सो इंस्पायर्ड और वो भी इतनी छोटी
(1:34:51) उम्र में। सो लॉट ऑफ स्ट्रेंथ टू यू। आई थिंक ये टाइम है जहां पर स्पिरिचुअलिटी यूथ के हाथ में है। तो एंड आई एम सो ग्लैड कि आप जैसे लीडर्स आ रहे हैं और स्पिरिचुअलिटी इन इट्स ट्रू ऑथेंटिक फॉर्म विथ इट्स प्योर डेप्थ एंड सेंटिटी स्प्रेड कर रहे हैं। सो वेरी प्राउड ऑफ यू वेरी इंस्पायर्ड बाय यू एंड थैंक यू सो मच। और पार्ट टू क्या होगा हमारे पडकास्ट में? नहीं निश्चित से देवी की इच्छा रहेगी तो वापस से हम आएंगे और मेरे प्लेटफार्म पे क्योंकि मैं इंग्लिश में टॉक्स देता हूं तो आपका जैसा स्थान है मुझे मौका मिलता है हिंदी कहने का हिंदी बोलने का तो मेरी जो
(1:35:25) ऑडियंस जो शायद मुझे इंग्लिश में नहीं सुन पाती तो उनके लिए भी अवसर होगा और मैं आपको भी बहुत बधाई दूंगा कि जो जिन तरीकों से प्रश्न आपने किए हैं पॉडकास्ट तो बहुत सारे हम लोग करते हैं पर जवाब उतने ही बेहतर हो सकते हैं जितना बेहतर कि प्रश्न हो तो वो जो भगवती की कृपा सरस्वती देवी की आशीर्वाद आपके साथ में है मेरी मेरी बहुत शुभकामनाएं आपके इस इनिशिएटिव और पॉडकास्ट के लिए। मुझे बहुत विश्वास है आपके ऑडियंस को बहुत लाभ ऐसे इनिशिएटिव से होगा। आप काशी आए आपको और आपके प्लेटफार्म के माध्यम से आप सभी दर्शकों को मेरा निमंत्रण है।
(1:35:55) अब्सोलुटली कब आए? आप जब बोले हम आ जाएंगे। काशी में भैरवम गुरुकुल है या आप Google मैप पे काशी अर्चन फाउंडेशन सर्च करें। हमेशा मैं आपको वहां पर मिलूंगा। ग्रेट। थैंक यू। सो मच। हर हर महादेव। थैंक यू। इन केस यू वुड लाइक टू बी अ पार्ट ऑफ आवर ऑनलाइन एंड इनपर्सन योगा, डाइट एंड स्पिरिचुअल प्रोग्राम्स, यू कैन जॉइन आवर WhatsApp ग्रुप बिलो वेयर वी पोस्ट ऑल आवर अपकमिंग प्रोग्राम्स एंड गिव फ्री टिप्स ऑन हेल्थ, डाइट एंड लाइफस्टाइल।
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