Friday, May 8, 2026

How “Ghar Ka Khana” is ruining you

How “Ghar Ka Khana” is ruining you

Author Name:Garvit Goyal

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@garvittgoyal

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=j6fgkyggR80



Transcript:
(00:00) 62% ऑफ़ डेली कैलोरीज फॉर इंडियंस कम फ्रॉम कार्ब। ओनली 12% ऑफ कैलोरीज कम फ्रॉम प्रोटीन। व्हेन इट कम्स टू प्रोटीन मोर इज लेस फॉर मी इफ यू आर इंडियन। डांट मार लो आप प्रोटीन डेफिशिएंट हो। मैं बोलता हूं किसी को भी सड़क पे उठा लो वो प्रोटीन डेफिसिएंट है। ये है एक एवरेज 25 साल के इंडियन की बॉडी। हाथ पे मसल नहीं है और आगे छोटी सी तोंड निकली हुई है। यही इंसान जब 40 साल का हो जाएगा तो ऐसा दिखता है और 60 की ऐज आते ही चलने फिरने में दिक्कत आनी शुरू हो जाती है। घुटनों में दर्द रहने लगता है। डायबिटीज हो जाती है। इंडियन मैन आज फॉरेन
(00:34) वुमेन से भी वीक है। हमें बौना कहते हैं। एक फॉरेन वुमेन कहती है कि मेरे जिम में इंडियन मैन भरे पड़े हैं। अब मुझे 5 किलो के डंबल के लिए कमपीट करना पड़ेगा। इस तरह का मजाक उड़ाया जाता है कि इंडियन मैन वीक हैं, कमजोर हैं। आज इंडिया में 10 करोड़ लोग डायबिटिक हैं और 13 करोड़ ऑलरेडी रिस्क पर हैं। हर 10 में से नौ इंडियंस प्रोटीन डेफिशिएंट है। जिसका रिजल्ट है कि 71% इंडियंस की मसल हेल्थ अच्छी नहीं है। बाहर की कंट्रीज की 60-70 साल की औरतें भी जब इंडिया घूमने आती है तो बढ़िया वॉकिंग जॉगिंग करती मिलती हैं। और हमारी इंडियन
(01:04) वुमेन के यह फैट वाले बैग से बने मिलते हैं। और इसके पीछे हमारे इंडियन फूड और न्यूट्रिशन का बहुत बड़ा रोल है। जिसको लेके हम बहुत ही इमोशनल हो जाते हैं कि मां के हाथ का खाना, घर के स्वाद की बात ही क्या है। लेकिन आज यही मेन रूट कॉज है कि इंडियंस को ग्लोबली फिजिकली इनक्पिटेंट कहा जाता है। तो आखिर क्या है हमारे खाने की कहानी? आओ पूरी डिटेल में समझते हैं। अभी राजस्थान के बीकानेर में कैमल फेस्टिवल चल रहा था। जहां इंडियन वुमेन और फॉरेन वुमेन के बीच में टग ऑफ वॉर का मैच हुआ था। देखने में फॉरेन वुमेन इंडियन वुमेन से थोड़ी ओल्ड ही लग रही थी। लेकिन
(01:36) सरप्राइजिंगली वो यह मैच जीत जाती हैं और कमेंट्स भरे पड़े थे कि देसी घी कम पड़ गया। अब यह कोई प्रोफेशनल गेम तो नहीं था बट यह दिखाता है कि जिस देसी खाने में हम प्राइड लेते हैं वो खाना हमें ताकतवर नहीं आलसी बना रहा है। जैसे यह देखो यह है एक एवरेज इंडियन डाइट मां के हाथ का खाना। एक कटोरी दाल या सब्जी साथ में रोटी, चावल, प्याज और अचार। इसको लेके लोग बहुत इमोशनल हो जाते हैं कि यह तो घर का खाना है। बाहर से बहुत बढ़िया है। हां, बिल्कुल बाहर से बढ़िया होगा, पौष्टिक होगा। लेकिन न्यूट्रिशन वाइज बहुत ही वीक है। इसमें सिर्फ कार्बोहाइड्रेट्स और फैट्स हैं।
(02:07) प्रोटीन के नाम पे कुछ भी नहीं है। और सबसे सैड बात है कि मेजोरिटी इंडियंस को यह पता ही नहीं है कि उन्हें डेली फंक्शनिंग के लिए कितना प्रोटीन चाहिए। आप रोज खाना तो खा रहे हो लेकिन आपकी बॉडी को जो रोज बेसिक रॉ मटेरियल चाहिए। मसल रिपेयर स्ट्रेंथ और ग्रोथ के लिए वो उसे मिल ही नहीं रहा है। और प्रोटीन सिर्फ जिम जाने वाले को नहीं चाहिए होता। हर एक इंसान की बेसिक ह्यूमन नीड है। इसी गैप की वजह से आप देखोगे कि 50-60 साल के फॉरेन टूरिस्ट स्टीव चढ़ाई भी इजीली कर लेते हैं। जबकि वही सेम एज के इंडियंस घुटने पे हाथ रख के चढ़ने में स्ट्रगल करते हैं।
(02:36) आगे बढ़ने से पहले प्रोटीन हमारी बॉडी में क्यों रिक्वायर्ड है उसको थोड़ा बेसिक लैंग्वेज में समझा देता हूं। प्रोटीन अमीनो एसिड से बनता है जो मसल रिपेयर करना, हॉर्मोस और एंजाइम्स बनाना, इम्युनिटी स्ट्रांग रखना और बॉडी की डेली रिकवरी करना यह सब काम करता है। जब बॉडी में प्रोटीन की कमी होती है तो बॉडी जल्दी थकती है, मसल मास जल्दी कम होता है और बॉडी की रिकवरी बहुत स्लो हो जाती है। एक 2017 का सर्वे बताता है कि 73% इंडियंस प्रोटीन डेफिशिएंट है और 93% इंडियंस को यह पता ही नहीं है कि उन्हें डेली कितना प्रोटीन चाहिए। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल
(03:07) रिसर्च कहती है कि एक नॉर्मल एडल्ट को अपनी बॉडी वेट का 0.8 से 1 ग्राम प्रोटीन नीडेड होता है। यानी अगर एक इंसान का वेट 60 किलो है तो उसे 60 ग्राम प्रोटीन ही नीडेड है। अब सुनने में डेली का 60 ग्राम प्रोटीन बहुत ही कम लगता है लेकिन इंडियंस वो भी नहीं ले पाते। ग्लोबली डेली प्रोटीन की एवरेज 68 ग्राम है। जबकि इंडिया में सिर्फ 47 ग्राम। यह पूरे एशिया में लोएस्ट है और इवन सब सारे अफ्रीकन कंट्रीज से भी कम है। अब जैसे हमने पहले एक इंडियन एवरेज थाली देखी थी जो कि प्योरली फैट्स और कार्बोहाइड्रेट से भरी पड़ी है। अब इसमें
(03:34) लोग कॉमन आर्गुमेंट देते हैं कि दाल वो तो प्रोटीन सोर्स है। हां बात सही है लेकिन प्रैक्टिकल नहीं है। 100 ग्राम अनकक्क्ड दाल में 20 ग्राम प्रोटीन होता है। लेकिन ऑब्वियसली आप अनक खा नहीं सकते तो उसे आप कुक करते हो। लेकिन कुकिंग करते हुए उसमें इतना पानी जाता है कि उसका सारा फाइबर निकल ही जाता है। जिसके बाद एक कटोरी में मात्र छ से 8 ग्राम प्रोटीन मिलता है। यानी अगर आपको एक बीम में 20 से 25 ग्राम प्रोटीन रिक्वायर्ड है तो आपको चार या पांच बाउ डाल के खाने पड़ेंगे जो रियलिस्टिकली पॉसिबल ही नहीं है। मतलब इंडियन डाइट में प्रोटीन सोर्सेस एक्सिस्ट
(04:02) करते हैं लेकिन उनकी क्वांटिटी इतनी ज्यादा खानी पड़ेगी जो रियलिस्टिकली पॉसिबल ही नहीं है। बॉडी को वो कंसिस्टेंटली सिग्नल ही नहीं मिलता कि वो प्रोटीन का यूज़ करके ग्रोथ करे। बॉडी में मसल ग्रोथ स्पेसिफिक अमीनो एसिड लुसिन पे डिपेंड करती है और इसका मिनिमम क्राइटेरिया होता है ढाई से 3 ग्राम पर मील। लेकिन हमारी इंडियन डाइट में ये थ्रेशहोल्ड भी मीट नहीं हो पाता। और यहां मसल ग्रोथ से मतलब बड़े-बड़े बाईसेप चेस्ट नहीं है। वो तो एक्स्ट्रा ग्रोथ है जो आप खुद के लिए करते हो। लेकिन आपकी लंबी उम्र तक फिट रहने के लिए हेल्दी रहने के लिए
(04:28) मसल ग्रोथ होनी बहुत जरूरी है। इसीलिए आप देखोगे ओवर द पास्ट 10 इयर्स ग्लोबली जहां पे एवरेज हाइट्स कंट्रीज की बढ़ती जा रही है। इंडिया में एवरेज हाइट्स डिक्रीज हो रही है ओ इनू लैक ऑफ न्यूट्रिशन और ये बहुत ही कंसर्निंग बात है। अब जो वेजिटेरियन प्रोडक्ट्स हाई प्रोटीन भी है तो उनके अंदर प्रोटीन की क्वालिटी वो अच्छी नहीं है। इसे कहते हैं बायो अवेलेबिलिटी यानी जितना अगर आप प्रोटीन एक सोर्स से ले रहे हो उसका कितना पोर्शन आपकी बॉडी अब्सॉर्ब कर रही है। ये जैसे चिकन, एग्स, मिल्क और वे प्रोडक्ट्स में 100% होता है। यानी इसमें जितना प्रोटीन
(04:57) है आपकी बॉडी सारा का सारा अब्सॉर्ब कर लेगी। लेकिन राइस, वीट, दाल, मूंग, चने इन सभी में ये 70 से 80% होता है। यानी आपकी बॉडी इनका सारा प्रोटीन अब्सॉर्ब कर ही नहीं पाती है। इसीलिए जो दाल आप यह समझ के खा रहे हो कि वो प्रोटीन सोर्स है। वो आपकी बॉडी पूरी तरीके से अब्सॉर्ब ही नहीं करती। इसका नेट इफेक्ट ये आता है कि आप खाना खाते हो, आपका पेट भी भर जाता है। लेकिन आपकी बॉडी को मसल रिकवरी और स्ट्रेंथ के लिए जो प्रोटीन चाहिए उसकी रिक्वायरमेंट पूरी नहीं हो पाती। और आपका एक एवरेज इंडियन बॉडी पैटर्न बन जाता है। स्किनी फैट यानी हाथ और पैर से तो पतले
(05:26) लगते हो लेकिन आगे छोटी सी तो निकल रही होती है। इंडिया में खाना सिर्फ न्यूट्रिशन का सोर्स नहीं होता बल्कि कल्चरल और इमोशनल भी होता है। घर का खाना ही बेस्ट है, साफ है, हाई क्वालिटी है। सब यही खाएंगे। और इस इमोशनल प्यार के चक्कर में न्यूट्रिशनल वैल्यू पे कभी ध्यान ही नहीं दिया जाता। आज अपने इंडियन घर में यह कह के देख लो कि मम्मी रोटी, चावल कम कर दो, दाल, पनीर, टोफू, प्रोटीन का सोर्स ये सब बढ़ा दो। तो आपके मुंह पे तीन टाइप के जवाब आएंगे कि रोज रोज, पनीर, दाल, मूंग कौन खाएगा? अंडे का नाम मत ले लियो। और यह प्रोटीन तो जिम
(05:57) वालों के लिए होता है। हमारे माइंडसेट में ही प्रोटीन को नेसेसिटी नहीं बल्कि लग्जरी मानते हैं। और इस पे ऐड कर दो इंडिया का वेजिटेरियनिज्म। इंडिया के मेजॉरिटी पॉपुलेशन आज वेजिटेरियन है। और जो लोग नॉन वेजिटेरियन भी है वो डेली मीट कंज्यूम नहीं करते। 10 में से सिर्फ एक इंडियन ही रोज नॉनवेज खाता है। वरना मेजॉरिटी लोग हफ्ते में दो-तीन बारी ही खाते हैं। यानी नॉन वेजिटेरियंस भी आधे हफ्ते वेजिटेरियन लो प्रोटीन डाइट पे ही डिपेंडेंट होते हैं। वेजिटेरियन डाइट में खुद में प्रॉब्लम नहीं है। बट उसकी ऑप्टिमाइजेशन वो जरूरी है। प्रोटीन में टोटल 20 अमीनो
(06:23) एसिड्स होते हैं। जिसमें से 11 हमारी बॉडी नेचुरली प्रोड्यूस करती है और बाकी के नौ हमें खाने से लेने होते हैं। इसीलिए इन्हें एसेंशियल अमीनो एसिड्स कहा जाता है। अब मीट जैसे फूड आइटम्स में नौ के नौ अमीनो एसिड्स प्रेजेंट होते हैं। लेकिन कोई भी वेजिटेरियन प्रोडक्ट्स में नौ के नैनो अमीनो एसिड्स होते ही नहीं है। और पनीर, टोफू जैसी प्रोटीन आइटम्स रोज खाने बैठ जाओ तो महीने के लास्ट में बड़ा बिल बैठ जाता है। वे प्रोटीन का 1 किलो का डब्बा ₹1500 से ₹3500 तक का आता है जो लगभग एक महीने चलता है जो कि मेजोरिटी इंडियंस के लिए फीसेबल ही नहीं है। एक
(06:51) स्टडी आई थी जहां पे 74% इंडियंस एक प्रॉपर हेल्दी बैलेंस डाइट अफोर्ड ही नहीं कर सकते। और इसमें बात सिर्फ पैसों की भी नहीं है। स्टडीज दिखाती है कि 73% अर्बन रिच भी प्रोटीन डेफिशिएंट है। यानी बात सिर्फ पैसों की नहीं है। हमारी ओवर द जनरेशंस फूड को लेके माइंडसेट की है। जिसमें प्रोटीन को कभीेंस मिली ही नहीं है। अब अगर मान लो प्रोटीन का डब्बा ₹1500 का है। वो महीने भर चलता है। तो आपका एक स्कूप प्रोटीन ₹50 का पड़ता है। जो कि अगर आप प्रोटीन के लेंस से देखोगे तो महंगा लगता है। लेकिन शाम को जब गोलगप्पे, चा मोमोज खाते हो ना उसमें इससे ज्यादा पैसे
(07:21) लग जाते हैं। यानी डिफरेंस सिर्फ अप्रोच का है। और इसमें सिस्टम की भी बहुत बड़ी गलती है। इंडिया का एग्रीकल्चर और फूड पॉलिसी हैवीली वीट और राइस पर सेंटर्ड है। सारी सब्सिडीज राशन डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम और लास्ट प्रोडक्शन इन्हीं क्रॉप्स की होती है। पल्ससेस और हाई प्रोटीन क्रॉप्स पे कोई भी इंसेंटिव नहीं मिलता। इनफैक्ट इंडिया पल्ससेस को इंपोर्ट करता है और हर साल रिकॉर्ड हाई इंपोर्ट करता है। तो जब आप बनाए कार्बोहाइड्रेट्स वाले गेहूं चावल रहे हो तो इंडिया में सबसे ज्यादा डिमांड भी उन्हीं चीजों की होगी क्योंकि वही सस्ते मिलेंगे और इसी वजह से आता है फिर
(07:49) अवेयरनेस गैप। इंडिया के 16 बड़े शहरों में एक सर्वे हुआ था जिसमें आगे आया कि 95% इंडियन मॉम्स को पता ही नहीं है कि प्रोटीन का फंक्शन क्या होता है। 20% को लगता है कि प्रोटीन हेल्थ के लिए बुरा है और 85% को लगता है कि प्रोटीन से वेट गेन होता है। इसीलिए फिर ऐसी बातें होती हैं कि प्रोटीन खराब है। बॉडी बिल्डर्स खाते हैं। ये क्या डब्बा खा रहा है। इससे शरीर खराब हो जाएगा। और चलो एक बार को मान लेते हैं कि हम वेजिटेरियंस हैं। खाने को लेके इमोशनल है। बाकियों का नॉनवेज तो हम 1 मिनट में छुड़वा देंगे। लेकिन ये नहीं देखेंगे कि हमारे वेजिटेरियन फूड को कैसे
(08:18) प्रोटीन रिच बनाएं। आज एक एवरेज इंडियन मेल की ग्रिप स्ट्रेंथ बाकी हर कंट्री के मेल से लो है। और इवन ब्राजील और पोलैंड की फीमेल्स जितनी है इतने वीक हैं हम। आप सुबह दिल्ली, मुंबई, बेंगलोर में जॉगिंग करने निकल जाओ। और 50-60 साल का फॉरेन टूरिस्ट या रेजिडेंट आपको जॉगिंग करता हुआ लैब्स मारते हुए दिखेगा। और हमारे इंडियन अंकल बेंच पे बैठ के हाहा ही ही लाफ कर रहे होते हैं। क्योंकि दौड़ने के लिए एस दे से घुटनों में ग्रीस ही नहीं है। और होगी भी कैसे? एक तो फिजिकल एक्टिविटी करने की कभी सोची नहीं है। आज इंडिया में सिर्फ 0.2% लोगों के पास एक्टिव जिम
(08:48) सब्सक्रिप्शन है। सिर्फ 0.2%। यह नंबर नॉर्वे और स्वीडन में 22% पर है। ऊपर से माइंडसेट भी ऐसा है कि अगर किसी की तोल निकली हुई है तो कहते हैं खाते पीते घर का है भाई साहब। और अगर कोई लीन बॉडी डेवलप करना चाहे तो कहते हैं तो कमजोर है। हड्डी कवर्ड है। जबकि खुद 90 किलो के होंगे। खुद से शरीर से हिला भी नहीं जाता। स्टडीज रिपीटेडली यह शो करती हैं कि मिड 30ज के बाद आपका मसल मास और भी जल्दी डिक्लाइन होना शुरू कर देता है। जिसके लिए आपका प्रॉपर प्रोटीन न्यूट्रिशन और भी ज्यादाेंट हो जाता है। वरना बॉडी जल्दी थकना शुरू कर देती है। हाथों पैरों में
(09:18) जोर खत्म हो जाता है। एंड नॉट जस्ट फिजिकल हेल्थ आपको मेंटली भी ज्यादा थकान होती है। और ना सिर्फ मसल्स प्रोटीन आपकी बॉडी में एंटीबॉडीज एंजाइम्स भी बनाता है। और अगर प्रोटीन कम होता है तो आपकी छोटी-छोटी इंजरीज भी हील होने में टाइम लेती है और आपको इनफेक्शंस और जल्दी हो जाते हैं। और इसको देखते हुए अब इंडिया के अंदर प्रोटीन को लेके एक नया प्यार उमड़ा है। अर्बन यूथ प्रोटीन फोकस ईटिंग पे शिफ्ट कर रहे हैं। प्रोटीन शेक्स, बार्स और सप्लीमेंट्स रैपिडली एक्सपेंड हो रहे हैं। इंडिया की डाइट सप्लीमेंट मार्केट 2025 में ₹201 बिलियन डॉलर्स की थी और हर साल 12% से
(09:47) ग्रो कर रही है। इसमें गवर्नमेंट ने भी काफी अच्छा काम किया है। जहां पे जन औषधि केंद्र में प्रोटीन मिलना शुरू हो गया है। इनकी वेबसाइट पे आपको ये $300 का डिब्बा मिल जाएगा जो कि गवर्नमेंट का काफी अच्छा इनिशिएटिव है। इंडिया के बिगेस्ट डेरी जाइंट अमूल ने अपना प्रोटीन रेवोल्यूशन शुरू कर ही दिया है। दूध, लस्सी, छाछ, मिठाई, आइसक्रीम सब कुछ प्रोटीन बेस लेकर आ रही है। वो भी काफी अफोर्डेबल रेट्स पर और इसी वजह से वो पूरे टाइम आउट ऑफ स्टॉक भी रहता है। बाकी डेयरी कंपनीज़ को भी ये Amul से सीखना चाहिए कि इसी टेस्ट के बहाने लोग प्रोटीन खाना तो सीखेंगे।
(10:14) इंडिया में सबसे बड़ी आयरन ही यही है कि इंडियन फूड इज वन ऑफ द बेस्ट इन द वर्ल्ड। यहां के स्पाइसेस, फ्लेवर्स, स्ट्रीट फूड इतना वैरायटी का है कि एक जिंदगी कम पड़ जाएगी सारा कुछ ट्राई करने में। और यही सबसे मेन प्रॉब्लम भी है कि इंडियन फूड कल्चर टेस्ट ड्रिवन है। लोगों की जेब प्रोटीन अफोर्ड कर नहीं पाती और रोड साइड पे ₹30 के दो तेल वाले भटूरे और छोले वो ही खिलाती है। गवर्नमेंट पॉलिसीज कार्बोहाइड्रेट बेस्ड क्रॉप्स को इंसेंटिवाइज करती है और अवेयरनेस बिल्कुल भी नहीं है। इंडियन डाइट एंटायरली गलत नहीं है। उसकी ऑप्टिमाइजेशन वीक है। आपको
(10:42) बॉडी में कैलोरीज तो मिल जाती है। आपका पेट भी बढ़ जाता है। लेकिन इंटरनली आपकी बॉडी की ग्रोथ नहीं होती और इसको चेंज करने का सशन कोई एक्सट्रीम नहीं है। ना तो आपको सप्लीमेंट्स पे जाना है ना ही डाइट को कंप्लीटली चेंज करना है। रियल चेंज अवेयरनेस से आता है जहां पे आप डेली बेसिस पे अपने डाइट में थोड़े-थोड़े चेंज कर रहे हो और उससे थोड़ा प्रोटीन रिच बना रहे हो। क्योंकि प्रोटीन लेना सिर्फ जिम वालों के लिए नहीं होता। आपकी बॉडी का लॉन्ग टर्म सर्वाइवल प्रोटीन पे ही बेस्ड है। आपको उसके बारे में क्या लगता है? टेल मी इन द कमेंट्स बिलो। जाने से पहले चैनल को
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