Tuesday, August 4, 2026

Why Are Indians Ageing Faster? | The Shocking Truth About Protein, Diet & Genetics | StudyIQ IAS

Why Are Indians Ageing Faster? | The Shocking Truth About Protein, Diet & Genetics | StudyIQ IAS

Author Name:StudyIQ IAS

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@StudyIQEducationLtd

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=p3VOcd4_Pf0



Transcript:
(00:00) आइए सीधा डाटा से शुरू करते हैं। इंसान का शरीर करीब 25 से 30 साल की उम्र में अपनी सबसे ज्यादा मसल मास पर होता है। इसके बाद से मसल्स धीरे-धीरे गिरना शुरू हो जाती है। रिसर्च बताती है कि 30 के बाद हर 10 साल में एक आम इंसान अपनी मसल का करीब 3 से 8% खो देता है और 60 साल के बाद यह रफ्तार और भी तेज हो जाती है। अब देखिए ये एक नेचुरल प्रोसेस है। ये सबके साथ होता है और पूरी दुनिया में होता है। लेकिन अब इंडिया के नंबर्स देखते हैं और जानते हैं कि आखिर क्या होता है। तो 2020 में इनबॉडी और एप्सोस ने इंडिया के आठ शहरों में करीब
(00:30) 1243 एडल्ट्स पर एक स्टडी की। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, अहमदाबाद, लखनऊ, पटना और हैदराबाद में। और नतीजा यह था कि 30 से 55 साल के जितने इंडियंस हैं उनमें से करीब 71% लोगों की मसल हेल्थ एक्चुअली काफी खराब थी। यानी कि आप देखिए 10 में से सात इंडियंस की मसल्स जो है वो काफी वीक थी। और शहर दर शहर भी फर्क था। यानी कि लखनऊ में ये नंबर करीब 81% था। दिल्ली में करीब 64% ध्यान दीजिए यह 70 साल के बुजुर्ग नहीं है। यह एक्चुअली 30 से 55 साल के लोग हैं। यानी वो लोग जो अभी काम कर रहे हैं, जो घर चला रहे हैं, जो अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। यानी कि हमारे
(01:05) मां-बाप और बहुत से लोगों के लिए हम खुद भी इसी एज ग्रुप में होंगे। अब इसी के साथ एक दूसरा नंबर देखिए। के एक सर्वे के मुताबिक 73% इंडियंस प्रोटीन की कमी से झूझ रहे हैं और 90% से ज्यादा लोगों को यह पता भी नहीं है कि उन्हें रोज कितनी मात्रा के अंदर प्रोटीन की जरूरत है। तो यह सारे आंकड़े हमें बताते हैं कि एक इंपॉर्टेंट सवाल कि हम अपने आप को एक हेल्दी खाने वाला देश मानते हैं। घर का खाना खाते हैं। दाल चावल खाते हैं। रोटी सब्जी खाते हैं। घी दूध खाते हैं। हम वेस्टर्न फूड को ब्लेम करते हैं। फिर हमारे ही अंदर जो लोग हैं, हमारे ही जो
(01:40) लोग हैं, उनके अंदर से इतने कमजोर क्यों होते जा रहे हैं? और उससे भी अजीब बात यह है कि हम एक तरफ मोटापे के शिकार हो रहे हैं और दूसरी तरफ मसल्स को भी खो रहे हैं। भारी भी हो रहे हैं और कमजोर भी यह दोनों एक साथ कैसे हो सकता है? इसका जवाब एक्चुअली तीन चीजों में छुपा है। हमारी बॉडी की बनावट, हमारी थाली यानी कि हम जो खाना खाते हैं और दूसरा हमारे देश की पॉलिसीज। एक-एक कर देखते हैं इन सभी चीजों को। पहले यह समझना जरूरी है कि मसल्स असल में काम क्या करती है हमारे शरीर के अंदर? क्योंकि यही सबसे बड़ी गलतफहमी है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि मसल्स सिर्फ
(02:11) दिखने के लिए होती है या दिखाने के लिए होती है, जिम जाने वालों के लिए होती है या बॉडी बनाने वालों के लिए इंपॉर्टेंट है। लेकिन यह सोच मैं आपको बता दूं कि काफी गलत है। स्केलेटल मसल यानी कि मसल जो हमारी हड्डियों से जुड़ा होता है। शरीर का सबसे बड़ा मेटाबॉलिक ऑर्गन है। इसका सबसे बड़ा काम सिर्फ उठना बैठना नहीं है बल्कि इसका सबसे बड़ा काम है आपकी शुगर को संभालना। शुगर को अब्सॉर्ब करना। यानी कि जब हम खाना खाते हैं तो वो ग्लूकोज यानी शुगर बनकर खून में जाता है। अब उस शुगर को खून से निकालकर कहीं स्टोर करना होता है और रिसर्च यह कहती है कि इंसुलिन के थ्रू
(02:43) शुगर शरीर के अंदर जाती है और उसके करीब 80% हिस्सा जो है हमारे मसल्स यूज़ कर लेते हैं। मतलब कि मसल आपके शरीर का एक तरह से शुगर रखने वाला एक टैंक है या फिर शुगर बैंक है। इस तरह से आप सोच सकते हैं इसको। अब सोचिए अगर टैंक ही छोटा हो जाए तो आखिर क्या होगा? खाना वही रहेगा, शुगर वही बनेगी पर उसे रखने की जगह कम हो जाएगी। नतीजा शुगर खून में ही घूमती रहेगी बार-बार। पेनक्रियाज को ज्यादा इंसुलिन बनाना पड़ेगा इसे प्रोसेस करने के लिए और धीरे-धीरे आपके शरीर में जो प्रॉब्लम शुरू होगी उसे हम कहते हैं इंसुलिन रेजिस्टेंस जो कि टाइप टू डायबिटीज की एक्चुअली पहली
(03:18) स्टेप है जो आपको आगे जाकर बहुत परेशान करेगी। यही वजह है कि इंडिया में पतले दुबले लोग भी डायबिटीज के शिकार हो जाते हैं। जो वेस्टर्न डॉक्टर्स को हैरान कर देता है। उनका वेट नॉर्मल होता है पर उनका शुगर रखने वाला जो टैंक है यानी कि मसल्स वो बहुत ही कमजोर हो जाती है। और जब मसल बहुत ज्यादा गिर जाए तो इसका एक मेडिकल नाम है जिसे कहते हैं सरकोपीनिया। इसका मतलब है मसल मास और मसल स्ट्रेंथ दोनों का पैथोलॉजिकल रूप से कम हो जाना। इंडिया के अगर आप बुजुर्गों पर देखेंगे तो बुजुर्गों पर हुई एक अलग-अलग स्टडीज में इसकी प्रिविलेंस करीब 14 से 18% तक पाई गई और
(03:50) महिलाओं में यह सबसे ज्यादा थी इन आदमियों के मुकाबले लेकिन सैकोपीनिया अचानक 65 साल की उम्र में ट्रिगर नहीं होता है। वो 35 से 40 साल की उम्र में चुपचाप बनना शुरू हो जाता है और यही वो हिस्सा है जिसे हम पूरी तरह से मिस कर जाते हैं। अब दूसरी बात आप समझिए कि हमारे शरीर की बनावट आखिर कैसी है? क्योंकि इंडियंस इस मामले में दुनिया से थोड़े अलग हैं और यह बात 20 साल से साइंस के अंदर रजिस्टर्ड है। साइंस ने इसको पता कर लिया। 2004 में लसेट की एक छोटी सी पर बहुत ही मशहूर ऑब्जरवेशन छपी थी। इसे वाईवाई पैराडॉक्स कहते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] ये डॉक्टर्स की
(04:22) तुलना की गई कि एक ब्रिटिश कॉकेशियन और एक इंडियन दोनों को दोनों का बीएमआई बिल्कुल सेम था। 22.3 कागज पर दोनों का वेट नॉर्मल था। लेकिन जब उनके शरीर के अंदर की बनावट को नापा गया तो जो कोकेशियन डॉक्टर के शरीर में फैट था वो करीब 9.1% था और इंडियन डॉक्टर के शरीर में जो फैट था वो 21.
(04:46) 2% था। यानी कि सेम बीएमआई पर्प भी फैट जो है वो दो गुना ज्यादा था। इसी को हम कहते हैं थिन फैट फिनोटाइप। मतलब बाहर से पतला दिखने वाला इंसान जिसके अंदर फैट ज्यादा है और मसल एक्चुअली कम है। और यह फैट खासकर पेट के अंदर ऑर्ग्स के आसपास जमा हो जाती है। जिसे हम कहते हैं विसरल फैट। यही फैट सबसे खतरनाक होती है। इसका सीधा मतलब यह है कि बीएमआई जिसे हम सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं इंडियंस के लिए झूठ बोला जाता है इस बारे में। आप नॉर्मल बीएएमआई के साथ भी अंदर से एक्चुअली मेटाबॉलिकली अफेक्टेड हो सकते हैं। इसलिए एशियंस के लिए बीएएमआई के कट ऑफ वेस्टर्न लोगों से कम रखे गए हैं और यह रखे भी जाते
(05:18) हैं। तो अब तक हमने यह देखा कि मसल जरूरी है और इंडियंस के शरीर में वो वैसे ही कम होती है। अब तीसरी और सबसे बड़ी बात जो हमारी थाली है यानी कि जो हम खाना खाते हैं उसके अंदर है और यहीं हम सबसे ज्यादा धोखा खाते हैं। हम मानते हैं कि इंडियन खाना दुनिया में सबसे ज्यादा बैलेंस खाते हैं। क्योंकि हमें नॉर्मली नोशन है कि हम लोग घर का बना हुआ खाना खाते हैं। हम लोग ताजा खाना खाते हैं। हम सब्जी वाला वेजिटेरियन खाना खाते हैं। हम घी वाला खाना खाते हैं। हम दाल खाते हैं। हम सोचते हैं कि प्रोटीन सिर्फ बर्गर और पिज़्ज़ा है। लेकिन नंबर कुछ और कहते हैं। दुनिया में
(05:49) एवरेज प्रोटीन कंसमशन करीब 68 ग्राम पर पर्सन पर डे है। इंडिया में यह सिर्फ करीब 47 ग्राम बनकर रह गया है। यह दूसरे एशियन देशों से भी काफी कम है। आईसीएमआर यानी कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च कहती है कि एक आम एडल्ट को रोज अपने हर किलो वेट के हिसाब से 0.8 से 1 ग्राम तक प्रोटीन चाहिए होता है। या उसकी जरूरत है हमें। मतलब कि 60 किलो के इंसान को करीब 48 से 60 ग्राम प्रोटीन खाना चाहिए। लेकिन इंडिया में एवरेज इंटेक सिर्फ करीब 0.
(06:17) 6 ग्राम पर किलो बनके रह गया है। और सिर्फ मात्रा की प्रॉब्लम नहीं है या क्वांटिटी की प्रॉब्लम नहीं है। साथ-साथ क्वालिटी की भी प्रॉब्लम है। हमारे प्रोटीन का करीब आधा हिस्सा एक्चुअली सीरियल्स से आता है। यानी चावल और गेहूं से। अब चावल और रोटी में थोड़ा प्रोटीन होता जरूर है पर उसकी क्वालिटी काफी वीक होती है, कमजोर होती है। उसमें अमीनो एसिड का प्रोफाइल अधूरा होता है और वो उतनी आसानी से शरीर में अब्सॉर्ब नहीं होता जितने आसानी से दाल, दूध, अंडा या पनीर का प्रोटीन होता है। और यहां सबसे बड़ा मिथ आता है कि हम रोज दाल खाते हैं तो हमें फिर आखिर प्रोटीन मिल ही
(06:49) जाता होगा। ऐसा लोग सोचते हैं। सच यह है कि पकाई हुई दाल की एक कटोरी में ज्यादातर पानी ही होता है। उसमें प्रोटीन सिर्फ करीब 3 से 4 ग्राम ही मिलता है। यानी कि अगर आप दिन में दो कटोरी दाल खा लें तो भी आपको उससे सिर्फ 8 ही ग्राम के आसपास प्रोटीन मिलेगा। और जरूरत तो आपको कितनी है? लगभग ऑन एन एवरेज आपके पास 50 ग्राम से ऊपर की जरूरत है। इसलिए एक सर्वे में ये पाया गया कि 84% वेजिटेरियन डाइट्स और 65% नॉन वेजिटेरियन डाइट्स दोनों प्रोटीन की कमी वाली ही होती है। मतलब नॉनवेज खाने वाले भी सुरक्षित नहीं है इस बात से क्योंकि वो भी अंडा या मीट कभी-कभी खाते
(07:21) हैं, रोज नहीं खाते हैं। और बाकी दिन वो रोटी या चावल पर ही निर्भर रहते हैं। और इस प्रॉब्लम की जड़ घर की थाली में नहीं है। वो एक्चुअली हमारी पॉलिसी में भी नहीं है। जिसे कोई बारे में इस बारे में कोई बात करना नहीं चाहता है। देखिए ग्रीन रिवोल्यूशन जब आया इंडिया में 1960 में तो उसके बाद हमारी पूरी खेती और पूरी फूड पॉलिसी एक ही चीज पर फोकस करती रही। वो है कैलोरीज कि कैसे तैसे करके इंसान पेट भर ले। सरकार ने चावल और गेहूं को मिनिमम सपोर्ट प्राइस दी। उन्हें खरीदा और पीडीएस के थ्रू सस्ता अनाज लोगों तक पहुंचाया। यह उस वक्त बिल्कुल जरूरी था। नो डाउट इसकी
(07:50) बहुत रिक्वायरमेंट थी क्योंकि देश भूखा था और पहला काम था कि लोगों का पेट भरा जाए। लेकिन हमने [नाक से की जाने वाली आवाज़] पेट भरना तो सीख लिया। शरीर बनाना नहीं सीखा। आज भी एक गरीब परिवार को सस्ता चावल और गेहूं तो मिल जाता है पर दाल, अंडा, दूध महंगे पड़ते हैं उसके लिए। और जब आपकी थाली का सबसे सस्ता हिस्सा कार्बोहाइड्रेट हो तो आपकी थाली कार्बोहाइड्रेट से भरी रहेगी। और ऊपर से दो मिथ्स ने और नुकसान किया। पहला कि 85% लोग यह मानते हैं कि प्रोटीन खाने से वजन बढ़ता है जो [गला साफ़ करने की आवाज़] कि बिल्कुल भी गलत है। और दूसरा ज्यादातर लोग सोचते हैं
(08:22) कि प्रॉब्लम सिर्फ जिम जाने वालों या प्रोटीन सिर्फ जिम जाने वालों के लिए है। आम आदमी के लिए प्रोटीन की बहुत ज्यादा जरूरत नहीं है। अब इन सबको आप जोड़ कर देखिए तो एक अजीब सी तस्वीर बनती है। एक अजीब सी पिक्चर सामने आती है और यही इस वीडियो का एक्चुअली सबसे इंपॉर्टेंट हिस्सा भी है। क्योंकि इंडिया एक ही समय पर दो उल्टी प्रॉब्लम्स झेल रहा है। हम भारी हो रहे हैं। हमारे वजन बढ़ रहा है और हम साथ-साथ कमजोर भी हो रहे हैं। यानी कि अगर आप ओबेसिटी का डाटा देखेंगे तो एनएफएचएस यानी कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक इंडिया में करीब 24%
(08:50) महिलाएं और 23% पुरुष ओवरवेट या फिर ओबीज हैं। इसके पहले वाले राउंड में एनएफएचएस फोर में ये नंबर था महिलाओं में करीब 20.6% और पुरुषों में करीब 18.9% यानी सिर्फ कुछ साल में ही बहुत बढ़ोतरी हो चुकी है ओबेसिटी में। WHO का अनुमान देखें तो 2022 तक करीब 29% इंडियंस ओवरवेट या ओबीज़ होंगे। जबकि 2016 में यह 23% फिगर ही था। और अब इस मैप को ध्यान से देखिए। शहर और गांव का फर्क आपको साफ दिख जाएगा। शहर की महिलाओं में ये करीब 36.
(09:22) 5% है। जबकि गांव की महिलाओं में करीब 19.7% शहर के पुरुषों में करीब 26.6% है और गांव में करीब 17.9% यानी शहर जितना बढ़ता है, मोटापा उतना बढ़ता है। क्योंकि शहर में काम कुर्सी पर होता है, खाना पैकेट में आता है और चलना गाड़ी ने खत्म कर दिया है ऑलमोस्ट लगभग। लेकिन सबसे जरूरी नंबर है ये है कि जब एनएफएचएस फाइव में पहली बार कमर का नाप यानी वेस्ट सरकम्फ्रेंस लिया गया तो पता चला कि 40% महिलाएं और 12% पुरुष एक्चुअली एब्डोमिनल ओबेसिटी का शिकार हैं। यानी कि उनके पेट बढ़े हुए हैं और 30 से 50 साल की महिलाओं में 10 में से पांच महिलाएं पेट के मोटापे के शिकार थी।
(09:59) पांच या पांच से छ के आसपास थी। अब दोनों चीजों को एक साथ रखिए। एक तरफ 40% महिलाओं के पेट पर खतरनाक फैट है और दूसरी तरफ 30 से 55 साल के 71% लोगों में कमजोर मसल्स का भी प्रिवेलेंस है। इसका मतलब यह है कि हमारे शरीर में जो वेट बढ़ रहा है वो मसल्स का नहीं है। एक्चुअली वो वेट फैट का बढ़ रहा है। और जो चीज घट रही है वो एक्चुअली मसल्स है। मेडिकल भाषा में इस कॉम्बिनेशन को कहते हैं सारकोपेनिक ओबेसिटी। यानी कि मोटापा और मसल लॉस दोनों आपका एक साथ हो रहा है। वजन बढ़ रहा है और मसल भी लॉस हो रहा है। और यह सबसे खराब कॉम्बिनेशन माना जाता है क्योंकि इसमें
(10:31) मोटापे का नुकसान भी मिलता है और मसल कम होने की कमजोरी का भी नुकसान आप ही को झेलना पड़ता है। अब दूसरे देशों में तुलना करिए इस बात का ताकि आपको तस्वीर क्लियर हो जाए। अगर आप अमेरिका और यूरोप में मोटापा इंडिया से कंपेयर करेंगे तो एक्चुअली काफी ज्यादा है। वहां आधी से ज़्यादा आबादी ओवरवेट है। लेकिन उनकी एवरेज डाइट में प्रोटीन भी काफी ज्यादा होता है और उनकी बॉडी कंपोजिशन काफी अलग होती है। दूसरी तरफ आप जापान और साउथ कोरिया जैसे देशों को देखिए जहां मोटापा दुनिया में सबसे कम भी है। और उनका खाना देखेंगे अगर प्रोटीन से तो वो खासकर मछली या सोयाबीन
(11:01) से भरा जाता है। हम अगर इंडिया की बात करें इन दोनों से अलग जगह इंडिया खड़ा रहता है। हमारी बीएमआई कागज पर कम दिखती है। हम पतले दिखते हैं। इसलिए हमें लगता है कि हम तो शायद ठीक ही होंगे या पतले हैं तो वजन कम है तो हम ठीक ही होंगे। पर हमारे अंदर फैट एक्चुअली काफी ज्यादा है। मसल भी कम है और फैट ज्यादा है और प्रोटीन सबसे कम हम खाते ही हैं। यानी कि हम कम वेट और ज्यादा खतरा वाली कैटेगरी के अंदर आएंगे। और इंडिया के पास एक और बड़ा आंकड़ा है। WHO के अनुमान के मुताबिक इंडिया में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ओबीज पॉपुलेशन अब होने वाली है अमेरिका और
(11:32) चाइना के बाद में। क्योंकि हमारी आबादी इतनी बड़ी है कि 24% का मतलब है करोड़ों लोग। क्योंकि जब 140 करोड़ लोग हम देखेंगे तो 24% काफी बड़ा नंबर आएगा। अब सवाल यह है कि एक हेल्थ प्रॉब्लम से आगे बढ़कर एक देश की प्रॉब्लम कैसे बन जाती है? जैसे हमें लगता है एक हेल्थ प्रॉब्लम एक इंडिविजुअल की प्रॉब्लम लेकिन वो पूरे देश की प्रॉब्लम है। इसके लिए एक सिंपल डेमोग्राफिक बात समझिए। आज हम गर्व से कहते हैं कि इंडिया एक जवान देश है। हमारे पास डेमोग्राफिक डिविडेंड है। यह बात भी सच है। कोई मना नहीं कर सकता इसको। लेकिन यह जवानी परमानेंट नहीं है। और जो लोग आज
(12:02) 30 से 55 के हैं, जिनमें से 71% की मसल हेल्थ खराब हो रही है, वो अगले 10 से 15 साल में 45 से 70 के हो जाएंगे। और मसल जो पहले से ही कम है वो और गिरेगी क्योंकि उम्र के साथ में मसल लॉस नेचुरल भी है। और यहां एक साइकिल शुरू हो जाती है जो अपने आप को धीरे-धीरे बढ़ाती रहती है। कम मसल का मतलब है कि कम बेसल मेटाबॉलिक रेट यानी कि शरीर आराम से रहता हुए कम कैलोरीज जलाता है। इसका मतलब यह है कि फैट और आसानी से आपकी बॉडी में बढ़ता जाएगा। ज्यादा फैट और कम मसल का मतलब है कि आपको ज्यादा थकान रहेगी और कम एनर्जी आपके पास रहेगी और थके हुए इंसान की फिजिकल
(12:37) एक्टिविटी और कम हो जाती है और कम एक्टिविटी से मसल और गिरने लगती है। यह एक्चुअली एक विशियस सर्कल बनता रहता है। और इसका अंजाम क्या होता है? इसका अंजाम होता है कि एक ऐसी वर्किंग पापुलेशन जो अपने सबसे प्रोडक्टिव एज में क्रॉनिक थकान और इंसुलिन रेजिस्टेंस और डायबिटीज और ब्लड प्रेशर और कमजोरी से एक्चुअली झूझ रही होती है। अगर आप बुजुर्गों में कम मसल का मतलब है गिरना, हड्डी टूटना और दूसरों पर निर्भर हो जाना। अगर मसल सही नहीं होंगी तो यह सब प्रॉब्लम उनको हो सकती है। और यह सीधा पैसे की बात बन जाती है। काम के दिन कम, प्रोडक्टिविटी कम और हेल्थ
(13:07) केयर पर खर्चा आपका बढ़ जाता है आउट ऑफ द पॉकेट। यानी कि जिसे हम डेमोग्राफिक डिविडेंड कह रहे हैं वो आसानी से आगे जाकर डेमोग्राफिक लायबिलिटी भी बन सकता है अगर हम अलर्ट नहीं हुए हैं। तो अब सबसे जरूरी सवाल यह है कि इसमें आखिर किया क्या जा सकता है? क्या सशन है इस प्रॉब्लम का? और अच्छी बात यह है कि मसल उन चीजों में से है जो वापस एक्चुअली बनाई जा सकती है किसी भी उम्र के अंदर। यह बात जानना बहुत जरूरी है। इसलिए हमें तीन लेवल्स पर पॉलिसी को देखना होगा। पॉलिसी, क्लीनिकल और पर्सनल लेवल पर। पहला अगर अपन पॉलिसी लेवल पर देखें तो सरकार क्या चेंज कर सकती है? तो
(13:37) हमारी फूड पॉलिसी को कैलोरीज से हटकर एक्चुअली न्यूट्रिशन पर फोकस करना होगा। यानी कि पीडीएस जो राशन सिस्टम है अभी मुख्य रूप से चावल और गेहूं देता है। इसमें दाल और मिलेट्स को और मजबूती से जोड़ने की जरूरत है ताकि गरीब परिवारों को प्रोटीन सस्ता मिल सके सरकार की मदद से। इसी तरह से जो मिड डे मील है और आईसीडीएस जैसे प्रोग्राम्स हैं उनमें अंडा या दूध या दाल का हिस्सा बढ़ाया जा सकता है। और खेती के लेवल पर देखें जैसे हमने देखा कि एमएसपी का पूरा ढांचा जो है चावल और गेहूं की तरफ झुक चुका है। दलहन यानी कि पल्ससेस की खेती उतनी ही उनको भी उतना ही सपोर्ट
(14:06) मिलना चाहिए पल्ससेस और ऑयल सीड्स को। इंडिया दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक है। फिर भी हम दाल को इंपोर्ट करते हैं क्योंकि हमारी प्रोडक्टिविटी काफी कम है। दूसरा आप देखेंगे क्लीनिकल इंटरवेंशन कि डॉक्टर्स को सिर्फ बीएमआई और वेट मशीन पर डिपेंड करना बंद करना होगा। जैसे हमने वाईवाई पैराडॉक्स में देखा कि बीएमआई इंडियंस के लिए गलत तस्वीर देता है। तो एनुअल चेकअप के अंदर कमर का नाप और हो सके तो मसल मास्क की जांच भी शामिल हो जानी चाहिए। आयुष्मान भारत के हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स पर 30 साल से ऊपर के लोगों की स्क्रीनिंग अब होने लगी है। यह एक बहुत
(14:36) अच्छी बात है। उनमें सिर्फ शुगर और बीपी नहीं बॉडी कंपोजशन को भी अगर हम जोड़ देंगे तो यह एक बहुत ही इंपॉर्टेंट इंटरवेंशन होगा हेल्थ के लेवल पर। और तीसरा पर्सनल लेवल पर जो कि आप खुद भी चेंज कर सकते हैं जो सबसे तेज असर करेगा आपके लिए कि एक प्रोटीन को पूरे दिन में बांट कर खाइए। एक साथ मत खाइए बांट के टुकड़े-टुकड़ों में खाइए। सिर्फ रात के खाने में नहीं। हर मील में कुछ प्रोटीन डालिए। जैसे दाल, दही, दूध, पनीर, सोया, अंडा जो भी आप खाते हैं। दाल और चावल साथ खाने से अमीनो एसिड का प्रोफाइल बेहतर हो जाता है। यह पुरानी इंडियन समझदारी है जो
(15:07) सही भी है। बस मात्रा आपको थोड़ी बढ़ानी होगी दाल को यानी कि पतली दाल की जगह। थोड़ी गाढ़ी दाल आप खा सकते हैं। दो और यह सबसे ज्यादा इग्नोर किए जाती है कि स्ट्रेंथ ट्रेनिंग। सिर्फ वॉकिंग काफी नहीं है। वॉकिंग दिल के लिए अच्छी है। कार्डियो के लिए अच्छी है। लेकिन मसल बनाने के लिए तो शरीर को रेजिस्टेंस की जरूरत है। यानी कि आप जितना उसके मसल्स को यूज़ करेंगे। हफ्ते में दो से तीन बार चाहे वो वेट्स हो या रेजिस्टेंस बैंड हो या सिर्फ अपने शरीर के वेट से स्क्वाड्स पुश अप्स स्टेप्स चल चढ़ना ये सब कुछ आप कर सकते हैं। इसके लिए महंगा जिम जाना
(15:36) बहुत ज्यादा जरूरी नहीं है। और तीसरा उस मिथ को तोड़ना होगा कि प्रोटीन सिर्फ जिम वाले लोग खाते हैं या उससे जो है मोटापा बढ़ता है। यह सब इंडियन बातें हमें भूलनी होंगी। प्रोटीन हर उस इंसान के लिए है जिसका शरीर खासकर 40 के बाद और खासकर महिलाओं के लिए जिनमें मसल लॉस और हड्डी की कमजोरी दोनों ही बहुत ज्यादा होती है। तो अब आप समझते हैं कि पूरी बात एक जगह अगर हम रखने की कोशिश करें तो जो ग्रीन रिवोल्यूशन आया उसने इंडिया का पेट तो भरना सीख लिया और शरीर बनाना नहीं सीखा। हमने कैलोरीज की प्रॉब्लम हल कर दी और प्रोटीन की प्रॉब्लम छोड़ दी और इस बीच हम
(16:12) एक नए तरह की कमजोरी में पहुंच गए। जहां हमारा वजन भी बढ़ता रहा पर हमारी ताकत धीरे-धीरे गिरने लगी। और सबसे खतरनाक बात यह है कि यह सब दिखता नहीं है इंसान को। मोटापा दिखता है इसलिए लोग उस पर बात करते हैं। लेकिन मसल का गिरना यह किसी को नजर नहीं आता। यह एकदम छुपा रहता है। आपका वेट वेइंग मशीन जो है वो वही नंबर दिखाता रहेगा। आपका बीएएमआई नॉर्मल रहेगा और अंदर से आपका शुगर संभालने वाला सिस्टम यानी कि मसल्स धीरे-धीरे श्रिंक होता जा रहा है। इसलिए मसल्स को फिटनेस की चीज समझना बंद करिए। मसल असल में आपके बुढ़ापे का एक तरह
(16:45) का इंश्योरेंस है। जो आप आज बनाते हैं, वही आपको 60 से 70 साल की उम्र में अपने पैरों पर खड़ा रखने में हेल्प करेगा। और यह बात सिर्फ हमारे लिए नहीं है। हमारे मां-बाप वो पीढ़ी है जिन्होंने कभी जानबूझकर प्रोटीन या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के बारे में एक्चुअली सोचा ही नहीं। क्योंकि उन्हें कभी बताया ही नहीं गया। उनके लिए यह सवाल पूछना एक्चुअली हमारी जनरेशन का काम है क्योंकि इस देश की ताकत सिर्फ उसकी आबादी की उम्र से नहीं नापी जा सकती या डेमोग्राफिक डिविडेंड से नहीं नापी जा सकती वो एक्चुअली उस आबादी के शरीर से से आप नापी जा सकती है और अगर हमें अगले 20
(17:19) साल एक प्रोडक्टिव देश बनाना है तो सिर्फ कैलोरीज गिलना नहीं होगा हमें एक्चुअली मसल बनाना भी शुरू करना होगा माय नेम इज मंगल सिंह आप देख रहे थे स्टडी आईक्यू एक्सप्लेंस आपको स्टडी आईक्यू एक्सप्लेन कैसा लगता है कमेंट करके बताएं इस इशू के बारे में आपको क्या सोचना है वह बताएं और आप किन इशज़ पर वीडियोस चाहते हैं यह भी हमें कमेंट करके बताएं और यह मेरा क्यूआर कोड जिससे आप मेरा Telegram चैनल ज्वाइन कर सकते हैं और मेरा Instagram हैंडल भी ज्वाइन कर सकते हैं। थैंक यू सो मच। स्टडी आईक्यू आईएस आपका सिलेक्शन [संगीत] हमारा मिशन।

No comments:

Post a Comment