The Hidden Link Between Addiction & Childhood Trauma ft. Dr. Riri & Mukul | Jist | Breaking Down
Author Name:Jist
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Title: The Hidden Link Between Addiction & Childhood Trauma ft. Dr. Riri & Mukul | Jist | Breaking Down
Author Name: Jist
Description: This conversation explores how childhood experiences can shape the way we think, behave, love, fight, cope and heal as adults. Psychotherapist Riri Trivedi breaks down childhood trauma, parental conflict, emotional neglect, people-pleasing, anger, addiction, and asks whether the behaviours we often label as “problematic” may sometimes be responses to something deeper.
We also discuss why people repeat unhealthy relationship patterns, how childhood experiences can influence partner choices and infidelity, how trauma can pass across generations, and what happens when children stop talking to their parents because they no longer feel safe. From attachment and family systems to ACEs, emotional regulation and memory reconsolidation, this conversation asks one powerful question: Are we really asking “What’s wrong with me?” when we should be asking, “What happened to me?”
00:00 – 01:42 – Montage
01:42 – 03:36 – Introduction
03:36 – 04:16 – Who Is The Right Specialist And How They Work
04:16 – 07:42 – Psychiatrist vs Psychologist vs Therapist
07:42 – 11:15 – Inner Child Therapy & Trauma-Driven Frugality
11:15 – 14:39 – How Phobias Form: The Rain Trauma Story
14:39 – 17:07 – "What Happened to Me?" vs "What's Wrong with Me?"
17:07 – 20:11 – Why Trauma Hits Later: The Camel Story
20:11 – 22:46 – Emotional Resilience & How Parents Break It
22:46 – 25:49 – When Your Boss Triggers Your Father Wound
25:49 – 28:48 – Why Beating Kids Is Normalized
28:48 – 34:04 – Parenting Styles: Permissive vs Balanced vs Friend
34:04 – 38:48 – Forced Feeding, Eating Disorders & Stress
38:48 – 41:43 – Emotional Abuse: Guilt-Tripping & Blackmail
41:43 – 46:05 – Exam Pressure, School Change & Toxic Shame
46:05 – 49:04 – Buffering Adults: One Person Can Save a Child
49:04 – 53:01 – Positive Childhood Experiences (PCEs)
53:01 – 56:57 – Should Struggling Couples Have Kids?
56:57 – 1:01:25 – Cool Parenting vs Parental Authority
1:01:25 – 1:09:06 – Why Teens Seek Love Outside & Men's Emotions
1:09:06 – 1:13:02 – Real Forgiveness: Mind vs Body
1:13:02 – 1:22:01 – Anger, Self-Sabotage & Nervous System Reset
1:22:01 – 1:26:01 – Self-Hypnosis & Guided Visualization
1:26:01 – 1:31:19 – Trauma & Addiction: Correlation vs Causation
1:31:19 – 1:38:43 – Working Parents, Nannies, Boarding & Social Anxiety
1:38:43 – 1:45:16 – Is Physical Punishment Ever Okay? + Gen Z Labels
1:45:16 – 1:56:05 – Kota Suicides, Why Kids Consider Suicide & Final Thoughts
#ChildhoodTrauma #MentalHealth #Psychology #Addiction #Relationships #TraumaHealing #Parenting #Therapy #BreakingDown
Transcript:
(00:03) जो बच्चे ज्यादातर नशा कर रहे हैं उनमें चाइल्डहुड ट्रॉमा का बैकग्राउंड है। 100% ये तो रिसर्च कहता है। मैं नहीं कह रही ग्लोबल रिसर्च तो आपके पास जजी आ रहे हैं। जेनजी एज अ जनरेशन हैज़ मच मच मोर मेंटल हेल्थ इश्यूज देन जेन एक्स और जेन वाई और मिलेनियल्स। तो बेसिकली आप ये कह रहे हो कि जितने भी तरह के एडिक्शन है चाहे ड्रग एडिक्शन हो, अल्कोहलिज्म हो, पोर्न एडिक्शन हो, दीज़ ऑल आर रिलेटेड टू दे आर नॉट डायरेक्ट कॉजेशन। इट इज़ अ कोरिलेशन। लड़कियों में भी मैंने जो ऑब्ज़र्व किया, वह अपने जो पहला प्यार है जो उनको 15 16 की उम्र में हो गया, उसको
(00:36) लेकर के इतना गंदा ट्रामा है उनके अंदर। लॉजिक सारा हाई जैक हो जाता है। फिर चाहे वो लड़का नशा करता हो, कैसे परिवार से आया हो, 6 महीने में पता चलेगा कि यह तो मैंने गलत अट्रैक्ट कर लिया। कोटा की अगर मैं बात करूं, सेल्फ हार्म और सुसाइड एक एक शहर ऐसा बसाया है जहां के इन एंड अराउंड यही चर्चा का विषय है। कौन से पेरेंट्स हैं जो यहां पर छोड़ करके आ रहे हैं अपने बच्चों को? उनकी क्या साइकी है? या तो मां-बाप के खुद के एंबिशंस हैं कि मैं आईआईटी नहीं कर पाया। मेरा बेटा उसमें जाएगा। एक बंदी आई थी हमारे पास उसको बारिश में हमेशा डिप्रेशन हमेशा
(01:07) बारिश में डिप्रेशन बारिश में डिप्रेशन शी वुड हेट द रेस। जब हमने उसके साथ काम शुरू किया तो पता चला कि वो जब छोटी [संगीत] थी स्कूल पिकनिक में गई थी तो स्कूल पिकनिक में जो उनका लीड इंस्ट्रक्टर था उसने इस लड़की का सेक्सुअल अब्यूज किया था पब्लिक टॉयलेट में और तब बारिश हो रही थी। तो आप कह रहे हो कि कंजूसी भी ट्रॉमा से आ सकती है। अनुभव से आ सकती। कोई बच्चा कंजूस तो पैदा नहीं होता ना। गुड पेरेंटिंग में माना जाता है कि हम अपने बच्चों को तो एकदम दोस्त की तरह ट्रीट करते हैं। आई गलत है। यह गलत है। बी अ फ्रेंडली पेरेंट बट डोंट
(01:35) बी अ फ्रेंड टू योर चाइल्ड। व्हाट्स रोंग? व्हाट्स रोंग? [गला साफ़ करने की आवाज़] हेलो एंड वेलकम। मेरा नाम है मुकुल सिंह चौहान और आप देख रहे हैं जस्ट ब्रेकिंग डाउन पॉडकास्ट। क्या आपने कभी सोचा है कि आप आम रोजमर्रा की जिंदगी में जो बिहेवियर करते हैं वो क्यों करते हैं? मसलन गुस्सा आप कैसे करते हैं? जब किसी को प्यार करते हैं तब कैसे रिएक्ट करते हैं या फिर अपने आसपास आप लोगों को लेकर के कितने संवेदनशील हैं। यह सारी चीजें कहीं ना कहीं आपके चाइल्डहुड से जुड़ी होती हैं। आपके साइकोलॉजी में होती हैं। आज हम इन्हीं सारी चीजों को समझने की कोशिश
(02:09) करेंगे। हमारे साथ मौजूद होंगी ऑथर और साइकोथरेपिस्ट डॉ. रीति त्रिवेदी जिनकी अभी पेंग्विन से किताब आई है। व्हाट्स रॉन्ग विद मी? जिसको उन्होंने काटा हुआ है और व्हाट हैपेंड टू मी? यानी मेरे साथ क्या हुआ है? ये ज्यादा अहम सवाल है बल्कि मेरे साथ क्या गड़बड़ है ये उतना अहम सवाल नहीं है। तो इंडियन पर्सपेक्टिव ऑन चाइल्डहुड ट्रॉमा एंड रिकवरी इसमें तो एकेडमिक बातें भी हुई हैं। बहुत सारी चीजें पता चलेंगी आपको। आज हम बड़े प्रैक्टिकल तरीके से समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर जो हम बिहेव करते हैं वो क्यों करते हैं और क्या हम अपने बिहेवियरल
(02:42) पैटर्न्स को चेंज कर सकते हैं? जैसे हम अपने एंगर पे क्या कंट्रोल कर सकते हैं। क्या हम अपने इमोशनल पर्सपेक्टिव को बहुत अच्छे से समझ सकते हैं? अपनी सुसाइडल या सेल्फ हार्म टेंडेंसी को क्या हम बदल सकते हैं? वो सारी बातें आपको समझने को यहां पर मिलेंगी जो हम सबको पता होनी चाहिए। और खासतौर पे आज हम पेरेंटिंग की बात करेंगे कि इस दुनिया में बच्चा लाने के लिए तो हर कोई हमें समझा रहा है, मोटिवेट कर रहा है, बात कर रहा है। लेकिन जब बच्चा दुनिया में आ गया तो उसको कैसे हमें परवरिश करनी है, इसकी कोई बात नहीं कर रहा है। तो आज हम
(03:14) इन्हीं सारी चीजों को समझेंगे। यह पडकास्ट हमेशा आपको बार-बार देखना चाहिए, समझाना चाहिए और लोगों को दिखाना चाहिए ताकि पेरेंट्स जो हैं बाकी जो अभी पेरेंट्स हो चुके हैं या होने वाले हैं उन तक भी यह पहुंचे और उन्हें पता रहे कि परवरिश करने के लिए आपको क्या-क्या चीजें एकदम जादू की तरह काम कर सकती हैं। तो चलिए आप देखिए इस पॉडकास्ट को। बहुत-बहुत शुक्रिया डॉ.
(03:38) रीरी आप यहां आई। आपने हमें वक्त दिया। बहुत-बहुत धन्यवाद। उम्मीद है कि आज हम बहुत सारी चीजों को आप एकेडमिकली समझा सकती हैं। मुझे पता है आप रिसर्च आपने किया हुआ है। बट मैं चाहूंगा आप मेरे दर्शकों को उनकी भाषा में और बहुत प्रैक्टिकल तरीके से समझाइए उनके एग्जांपल्स के साथ कि जो उनके साथ हो रहा है वो क्यों हो रहा है? वो कैसे इससे बाहर आ सकते हैं? उन सारी चीजों पे हम बात करेंगे। तो सबसे पहले तो सबसे बुनियादी सवाल से ही शुरू करते हैं कि इतना सारा हमने सुन लिया है ना कि थेरेपी, काउंसलिंग और साइकोथरेपिस्ट तमाम सारे नाम आ गए हैं।
(04:09) तो आप सबसे पहले तो ये बता दीजिए हमें कि किसका क्या काम होता है और कैसी समस्या के लिए हम किसके पास जाएं? तो हां जी। हां जी। तो देखिए एक तो होते हैं साइकेटिस्ट जो मेडिकल की पढ़ाई करते हैं तो वो वो जो होते हैं वो ब्रेन और जो पूरा फिजिकल बॉडी है जो हमारा हार्डवेयर है उसकी समझ है जैसे मेडिकल डॉक्टर्स की होती है तो साइकेटिस्ट वो लोग होते हैं जो उनकी पढ़ाई मेडिकल से होती है एमबीबीएस करके फिर एमडी साइकेट्री करते हैं और उनका ज्यादातर वो लोग पढ़ते हैं कि ब्रेन केमिकल्स के बारे में गॉट इट तो उनका प्राइमरी इंटरवेंशन रहता है
(04:44) दवाइयां देना एंटी डिप्रेसेंट हो या बेंजोडाइजरपिंग्स हो तो वो वो सब करते हैं। राइट? एक तरफ होते हैं साइकोलॉजिस्ट जिनकी पढ़ाई मेडिकल से कुछ लेना देना नहीं। उनका थ्योरेटिकल पढ़ाई रहती है। मतलब वो लोग बिहेवियर के बारे में पढ़ते हैं। अलग-अलग बिहेवियरल कांसेप्ट्स के बारे में पढ़ते हैं। फ्रॉयड है, यूंग है। सब अप्रोचेस टू चाइल्ड साइकोलॉजी, एडल्ट साइकोलॉजी वो सब। तो वो एक वो जो होते हैं वो बीए और एमए और एमफिल इन साइकोलॉजी करते हैं। उनका काम है कि लोगों के बिहेवियरों को समझना और उसके बाद साइकोलॉजी की पढ़ाई में तो नहीं पर उसके बाद वो लोग अलग-अलग
(05:19) टेक्निक सीखते हैं। जैसे सीबीटी, आरईबीटी, डीबीटी जैसे वो टेक्निक्स होती हैं जिससे आपके जो इशूज़ हैं एडिक्शन हो, एंगर हो उसको किस तरह से मैनेज किया जाए? हम जनरली आइडियल सिचुएशन में साइकोलॉजिस्ट और साइकोल साइकेटिस्ट साथ में काम करते हैं। जैसे समझो आपको आपके बच्चे को एग्जाम का डर आ गया। बच्चा सोच रहा है अभी मुझे एग्जाम नहीं देने जाऊंगा। तो अनफॉर्चूनेटली लोग सबसे पहले साइकेटिस्ट के पास चले जाते हैं। साइकेट्रिस्ट उनको सोने की दवाई या ऐसे एंटी एंजाइटटी दवाई दे देते हैं तो बच्चे को फर्क लगता है। फिर बच्चे को उसका एडिक्शन हो जाता है।
(05:53) रियलिटी में क्या होना चाहिए कि आपको एक साइकोलॉजिस्ट या काउंसलर के पास जाना चाहिए जो पहले तो बातचीत करके समझे। बच्चे की हिस्ट्री ले और कुछ तकनीकें सिखाएं माइंड बॉडी के ऊपर जो पहले बच्चा ट्राई करे। हम उसके बाद अगर ठीक नहीं हुआ तो साइकेट्रिस्ट के पास जाओ। ठीक है? तो कई ऐसे मेंटल हेल्थ इश्यूज हैं जिसमें साइकेटिस्ट के पास पहले जाना पड़ता है। जहां पे बहुत सीवियर है जैसे बहुत सीवियर स्किजोफ्रेनिया है, बाइपोलर है, बंदा दूसरों को मार रहा है, यू नो घर में वायलेंस हो रही है या बहुत ही साइकोसिस है। मतलब ऐसी बीमारियां जो बहुत इमीडिएट
(06:28) इंटरवेंशन चाहिए। जैसे सुसाइड अटेम्प्ट कर चुका है बंदा दो-तीन बार तो उसको मेडिकेशन की जरूरत पहले पड़ती है। हम तो हमने हमारी बुक में पूरा एक टेबल दिया है कि आप अपना जो मेंटल हेल्थ का जो चैलेंज है वो असेस कर सकते हो कि आपका कितना कॉम्प्लेक्स है अलग-अलग पैरामीटर के हिसाब से जैसे डिप्रेशन एंजायटी आपका बैक हिस्ट्री ट्रॉमा का कितना है। करंट प्रॉब्लम कितने उस हिसाब से आप देख सकते हो कि आपका कितना कॉम्प्लेक्स केस है आपका। हम अगर ज्यादा कॉम्प्लेक्स केस है तो दवाई की जरूरत पड़ती है। अगर कम कॉम्प्लेक्स सबसे कम कॉम्प्लेक्स केस है तो सेल्फ रेगुलेशन
(07:01) टेक्निक्स जो हम कहते हैं खुद जो टेक्निक्स कर सके उससे शुरू करना चाहिए और जो इन बिटवीन ज़ोन है वो एक कंबाइंड एफर्ट रहता है। जैसे काउंसलिंग अभी जैसे साइकोलॉजिस्ट मोस्टली काउंसलिंग करते हैं। काउंसलिंग मतलब क्या-क्या आपसे बातचीत करते हैं। फिर आपको बोलेंगे कि आप ये ये आप तीन चीजें ये हफ्ते में करो। आप ये पांच चीजें करो। राइट? तो ये साइकोलॉजिस्ट हुए। अभी साइकोलॉजिस्ट और साइकेटिस्ट के बीच बहुत सारे और भी थेरेपिस्ट हैं जो अभी हमारी सिस्टम में उनको रेगुलेटरी बॉडी में पहचाना नहीं जाता है। जैसे हिप्नोथेरेपी है, रेकी है, पास्ट लाइफ रिग्रेशन है। ये
(07:37) सब थेरेपीस माइंड पे सबकॉन्शियस माइंड पे काम करती है। हम तो इनको हम थेरेपिस्ट बोलते हैं। हिप्नोथेरेपिस्ट होते हैं। साइकोथरेपिस्ट होते हैं। जो अलग-अलग टेक्निक्स यूज़ करते हैं। जैसे रिग्रेशन, इनर चाइल्ड वर्क ये सब बहुत नया है अभी इंडिया में। बट अभी काफी लोग इसके बारे में बात करते हैं। जैसे मैं एक इनर चाइल्ड थेरेपिस्ट हूं। इनर चाइल्ड मतलब क्या? कि आपके अंदर का जो बच्चा है हम उसके ऊपर काम करना जो सबके अंदर है। सबके अंदर है। जैसे फॉर एग्जांपल आज अगर मुझे हर चीज के बारे में ऐसा लग रहा है कि अरे मेरा मैं इतनी सक्सेसफुल हूं। कुछ हो
(08:12) जाएगा। मेरा सब छीन जाएगा। मेरा सब निकल जाएगा। तो मेरे अंदर शायद एक इनसिक्योर बच्चा है जिसको बचपन में शायद बहुत ऐसा हुआ था कि यू नो कुछ तो चला जाएगा। निकल जाएगा। समझो मुझे पैसे के इशूज़ हैं। बहुत से लोग मेरे पास आते हैं। मैम मेरे पास सब कुछ है आज। इतने पैसे हैं ना बट पता नहीं मैं खर्च नहीं कर पाता हूं। मुझे थोड़ा सा भी खर्च करना पड़े ना तो ऐसे लगता है कि सब कुछ चला जाएगा। नहीं नहीं तो मेरी बीवी बोलती है कि तुम कैसे कंजूस हो। इतने पैसे पड़े तुमको प्रूफ है कि करोड़ों हैं बट ₹10 नहीं खर्च कर कर सकता हूं मैं। तो इनके अंदर एक बच्चा होता है जो शायद बचपन
(08:43) में जिसने [नाक से की जाने वाली आवाज़] गरीबी देखी है या जिसको बताया गया है मां-बाप ने कि देखो भाई पैसे मुश्किल से आते हैं। पैसे कभी आसानी से नहीं आते। कभी खर्च मत करना। या तो उसको एक ऐसा ट्रॉमा हुआ है जिससे ओवरनाइट सारे पैसे चले गए क्योंकि फादर ने स्टॉक मार्केट में गैंबल किया और वह रास्ते पे आ गए तो बच्चे ने वो छोटे से बच्चे ने वो बात पकड़ के रखी है कि भाई पैसे तो कभी भी निकल जाएंगे पकड़ के रखो। अब शरीर बड़ा हो जाता है। हम वो बच्चा तो अंदर रहता है। वो प्रोग्राम के साथ वो बिलीफ के साथ तो हम उस पे काम करते हैं। तो आप कह रहे हो कि कंजूसी भी ट्रॉमा से आ
(09:15) सकती है। अनुभव से आ सकती है। कोई बच्चा कंजूस तो पैदा नहीं होता ना। हम सही बात है। [हंसी] कोई बच्चा पैदा होते ही कंजूस तो नहीं होता। तो कुछ ना कुछ उनके पैदाइशी से लेके उनके जो बिहेवियर में कंजूसी दिख रही है उस उस बीच कुछ ना कुछ तो हुआ होता है। तभी तो वो प्रोग्राम बन जाता है। हम 80 से 90% हमारे प्रोग्राम हमारे एनवायरमेंट से ही आते हैं। बच्चे पैदाइशी से तो ये नहीं सोचते कि जैसे पुलिस मतलब डरना हम राइट? बताया गया। हां बताया गया है। वो बोला गया है कि खाना नहीं खाया ना तो अभी पुलिस को बुलाओगे तुमको अंदर कर देगा। देखो पुलिस अंकल
(09:50) आएंगे ना अभी ऐसे लोग बड़े होते हैं और मुझे बोलते हैं मैम हम ना ट्रैफिक सिग्नल पे बाजू में पुलिस की गाड़ी आती है ना तो हमारी धड़कनें बढ़ने लगती है। हमें लॉजिकली पता है कि मैंने कोई गुनाह नहीं किया है पर पता नहीं क्यों मुझे पुलिस से घबराहट होती है। बड़े लोग बड़े लोग बोलते हैं। फियर फोबियाज़ कहां से आते हैं आप बताओ। कुत्ते का फियर, चूहे कॉकरोच का फियर, अंधेरे का फियर कितने लोगों को होता है। पानी का डर होता है। एक बंदी आई थी हमारे पास उसको बारिश में हमेशा डिप्रेशन हमेशा बारिश में डिप्रेशन। बारिश में डिप्रेशन शी वुड हेट द रेंस
(10:21) और फिर उसको लॉजिकली याद नहीं था कुछ बोले बारिश और डिप्रेशन क्या से क्या लेना देना जब हमने उसके साथ काम शुरू किया तो पता चला कि वो जब छोटी थी स्कूल पिकनिक में गई थी हम तो स्कूल पिकनिक में जो उनका लीड इंस्ट्रक्टर था उसने इस लड़की का सेक्सुअल अब्यूज किया था पब्लिक टॉयलेट में और तब बारिश हो रही थी तो माइंड ने एसोसिएट सी माइंड सेल्स एवरीथिंग एज एसोसिएशंस माइंड ने एसोसिएट कर लिया कि बारिश मतलब घबराहट टेंशन एंज फियर अब्यूज शेम डर्टी फीलिंग शी हेट्स रेंस जब हमने वो उसका मेमोरी चेंज किया रिकंसोलिडेट किया फिर उसका मैसेज आया कि
(10:58) अभी मैं बारिश में डिप्रेशन नहीं होता मैं टोलरेट कर सकती हूं मैं मैनेज कर सकती हूं ऐसे हमारे पास 200 250 जितने डॉक्यूमेंटेड केसेस हैं जहां पे हमने उनका फियर फोबिया बिल्कुल निकाल दिया हो नॉट बाय मैजिक बाय वर्किंग ऑन मेमोरी बिकॉज़ ये आपके मेमोरी में है ना तो जैसे आप कह रहे हो कि आपने फियर फोबिया निकाल दिया इस इस पूरी पूरी प्रोसेस में कितना वक्त लगता होगा ऐसे एक सेशन से दो या तीन सेशन हमें पता चलना चाहिए शुरुआत कहां से हुई है उसमें ये टाइम लगता है अगर एक सेशन में शुरुआत हो गई तो हमें पता चल गया कि वो मेमोरी जैसे हम ये शूट शुरू हुआ उससे पहले बात कर रहे
(11:30) थे इंप्लसिस एक्सप्लस मेमोरी के राइट बच्चा पैदाइशी से कुत्ते से नहीं डरता है हम एक आध बार उसने उसको कुत्ते ने काटा या उसने देखा कि उसके दोस्त के ऊपर कुत्ता अटैक किया तो बच्चे के माइंड में क्या आ गया कुत्ता मतलब डेंजर हम ठीक है फिर एक दो बार गया होगा कुत्ते मम्मी ने बाजार में ऐसे हाथ जोड़ से पकड़ लिया। बेटा कुत्ता आ रहा है। चलो यहां से चलते हैं। तो दो-तीन अनुभव हो गए जिससे बच्चे के मन में डिसाइड हो गया कि भाई कुत्ता मतलब भाई बहुत डेंजरस है। भूल गया बच्चा इसके बारे में। बच्चा 30 साल का है या 28 साल का है। उसकी गर्लफ्रेंड को
(12:03) कुत्ते बहुत पसंद है। वो कह रही है कि मैं तो शादी करूंगी। अगर तूने मेरे तीनों कुत्तों को साथ में मेरे साथ ले आया तो। अब क्या करेगा वो? कुत्ते देख के उसको पैनिकिक अटैक हो रहा है। हम उसको थेरेपी में क्या करते हैं? वो सारे इवेंट्स जो हैं जो मेमोरी है जिसमें [गला साफ़ करने की आवाज़] माइंड ने डिसाइड कर लिया कि कुत्ता इक्वल टू डेंजरस वो मेमोरी हम उसको बॉडी को रिमाइंड करते हैं कब हुई थी कहां हुई थी मेमोरी कैसे होती है एक इमेज होता है हम साथ में एक साउंड होता है राइट आप तो जर्नलिस्ट हो आपको पता है कि हर इवेंट आप कैसे कवर करते हो साउंड होता है इमेज होती
(12:36) है साथ में खुद के बॉडी में क्या फील हुआ वो एक होता है एलिमेंट और आपने लॉजिकली क्या डिसाइड किया ये तीनों को हम आइसोलेट कर देते हैं जब इवन इवेंट से इमोशनल चार्ज निकल जाता है और एसोसिएशन बदल जाता है। तभी वो बंदा सोचता है हां कुत्ता मतलब ठीक ही है। कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे। ऐसे हमारे पास कितने मतलब मैंने कह रहा हूं 200 250 डॉक्यूमेंटेड केसेस हैं जहां पे ये निकल गया है। कितना अब इससे दवाई लेने की जरूरत ही नहीं पड़ती। लोग क्या करते हैं? इनको समझ नहीं आता कि ये मेमोरी रिलेटेड है। ये पढ़ाया नहीं जाता साइकोलॉजी में। ये न्यूरो साइंस की सब्जेक्ट है।
(13:09) हम तो लोग क्या करेंगे? इसके लिए साइकेटिस्ट के पास जाएंगे। साइकट्रिस्ट को यह पढ़ाया साइकेटिस्ट को तो पढ़ाया क्या गया है दवाई देना तो साइकेट्रिस्ट क्या करेगा आपको कुत्ते का फियर है अभी कुत्ता आपकी गर्लफ्रेंड लेके आती है तब आप वो एंटी एंजाइटटी पिल ले लेना हम तो आप स्लो हो जाओगे नींद आ जाएगी बॉडी स्लो हो जाएगा तो कुत्ते का रिएक्शन आपका स्लो डाउन हो जाएगा पर ये सॉलशन तो नहीं हुआ एक्सैक्टली तो ये हम इसको कहते हैं मेमोरी रिकंसोलिडेशन या रिकंसोलिडेशन ऑफ ट्रोैटिक मेमोरी आरटीएम जो बहुत नया ट्रॉमा का एक इंटरवेंशन है न्यूरो साइंस बेस्ड जिसके
(13:44) बारे में हमने दो पेपर पब्लिश किए हैं यूरोपियन जर्नल ऑफ ट्रॉमा और डिसोसिएशन में कि जिन लोगों को कॉम्प्लेक्स ट्रॉमा होता है जिन लोगों को ये बचपन के अब्यूज की वजह से बहुत स्ट्रोमा होता है उनके लिए ये सबसे इफेक्टिव मेथड है। मेमोरी पे सॉरी मेमोरी पे जो काम करती है। लॉजिक पे तो काम करने का फायदा नहीं है। लॉजिकली तो सबको पता है। जिसको कुत्ते का डर है उसको भी पता है कि भाई लॉजिकली तो ये तो मेरी गर्लफ्रेंड का कुत्ता कितना प्यारा है। मगर मैं परमिशन दूं तो मेरे मुंह पे भी चाटेगा। मुझे कुछ नहीं करेगा। इतना अच्छा कुत्ता है पर
(14:13) लॉजिक का काम ही नहीं इसमें। लॉजिक हाईजैक हो जाता है। कौन हाईजैक करता है? आपका बॉडी। क्यों हाईजैक करता है? क्योंकि बॉडी इज ऑपरेटिंग फ्रॉम अ सर्वाइवल मोड। जब आपको कुत्ते ने 2 साल की उम्र में काटा था तब बॉडी को सर्वाइव करने के लिए यह डिसाइड करना पड़ता था कि कुत्ते से दूर रहो भाई। बिल्कुल। तो ये सर्वाइवल वाली डिसीजन हुई। हम सर्वाइवल वाली डिसीजन हमेशा पावरफुल होती है। लॉजिकल डिसीजन से भी ज्यादा। तो लॉजिक को हाईजैक कर देती है। इसमें आप बहुत एक बेसिक फंडामेंटल बात कर रही हैं। लेकिन मुझे ऐसा लगा कि आप बहुत [गला साफ़ करने की आवाज़] इंपॉर्टेंट बात
(14:45) बोलती हैं। जब आपने इसकी शुरुआत ही की है। व्हाट्स रोंग विद मी? यह गलत सवाल है। व्हाट हैपेंड टू मी सवाल है वो जो सही है। यह जो एक फंडामेंटल शिफ्ट है ये कैसे सब कुछ बदल देता है? मतलब ऐसा अगर आप इसको बहुत सही से सोचो और पढ़ते हुए समझ में आता है कि यार ये तो मैजिक हुआ कि व्हाट हैपेंड टू मी से तो बहुत सारी चीजों के मुझे जवाब मिलते जा रहे हैं। तो ये आप आप यहां तक कैसे इस सवाल तक कैसे पहुंचे आप? तो देखिए हम इतने जो 121 साल से हम जो भी हमारी थेरेपी प्रैक्टिस कर रहे हैं जिसमें इतने सारे लोगों के साथ हम काम करते हैं उनके रिलेशनशिप्स पे फियर
(15:17) फोबियास पे एंजाइटटी डिप्रेशन सब पे काम करते हैं। लोग आजकल अभी पिछले 5 साल में ज्यादातर लोग लेबल्स लेके आते हैं। हम मुझे ए्जायटी है। हम मुझे डायग्नोस दिया गया है। मैंने सेल्फ डायग्नोस किया है। मुझे डिप्रेशन है। मुझे ये है। मुझे वो है। तो उनको एक लेबल आ जाता है। एडीएचडी है मुझे। हम राइट? मुझे इंसोमिया है। तो लोग इसमें उलझे रहते हैं। और वो उसको सॉल्व करने की कोशिश करते हैं। एंजाइटटी को कैसे ठीक करूं? डिप्रेशन को कैसे ठीक करूं? हां मेरी बीवी के साथ मेरी बनती नहीं है। कैसे ठीक करूं? और तीसरी बीवी है। पहली दो के साथ भी नहीं बना था।
(15:48) अभी तीसरी लाल तो सो देन वी व्हेन वी वर्क वि देम हमने समझ आया कि भ ये तो जो आप डिस्क्राइब कर रहे हो कि व्हाट्स रोंग वि मी ये तो एक सिम्टम है जैसे आम के पेड़ के आम है हम अगर आम में प्रॉब्लम है तो आम के ऊपर काम नहीं करना है ना भाई पेड़ और उसकी जड़ पे काम करना है तब हमको लगा कि यार ये लोगों की सोच बदलना जरूरी है क्योंकि जब लोग आजकल जो लोग जो भी मेंटल हेल्थ प्रैक्टिशनर्स के पास जाते हैं साइकेटिस्ट के पास जाते हैं साइकोलॉजिस्ट के पास जाते कोई भी प्राणी किलर है कि वो लोग यह लेके जाते हैं कि व्हाट इज रोंग विथ मी? हम मैं फोकस नहीं कर पा रहा हूं। मैं
(16:24) कंसंट्रेट नहीं कर पा रहा हूं। मुझे जैसे कुत्ते का डर है। हां मैं सो नहीं पा रहा हूं। ओवरथिंकिंग बहुत रात को मैं सोचता रहता हूं। मुझे रिश्तों में मेरा हमेशा मुझे धोखा मिलता है या मुझे ना मैरिज से बहुत डर है। मैं शादी नहीं करना चाहता हूं। हम यह मेरा प्रॉब्लम है और ज्यादातर लोग यह यह प्रॉब्लम को सॉल्व करने में लगे रहते हैं। तो उनको सिर्फ सिम्टोमेटिक रिलीफ मिलता है। जैसे मैंने कहा कि गोली खा के सुन हो जाओ या तो यू नो या तो कुछ-कुछ कोप करके कर लो बिजी हो जाओ। हम बट जब हम यह पूछते हैं कि मुझे यह हुआ क्यों? जैसे मैंने आपको भी नहीं पूछा कि
(16:57) पैदाइशी से तो किसी को कुत्ते का डर नहीं होता है। तो यह हुआ क्यों? तो जब हम यह पूछते हैं कि व्हाट हैपेंड टू मी? तब हम उसकी रूट तक जा पाते हैं। कि भाई अगर मुझे शादी से डर है, कमिटमेंट से डर है तो वह प्रॉब्लम नहीं है। प्रॉब्लम यह है अगर सॉल्व करना है तो कहां सॉल्व करना है कि वो डर शुरू कहां से हुआ? अगर मुझे आज एंजायटी है तो ए्जायटी को दबाने से एंजायटी को सॉल्व करने से प्रॉब्लम सॉल्व नहीं होगा। एंजायटी क्यों हो रही है? क्योंकि शायद मेरे बचपन में मुझे बहुत प्रेशर था पढ़ाई का या बचपन में मेरा एनवायरमेंट ऐसा था कि मेरा बॉडी हमेशा नर्वस सिस्टम
(17:34) हाइपरविजिलेंट रहती थी। फाइट और फ्लाइट में रहती थी। घर में मां-बाप की बहुत लड़ाई होती रहती थी। और इसकी वजह से बचपन से मुझे मेरी आदत पड़ गई है कि हमेशा एक्सपेक्ट करना कि कुछ गलत होगा, गलत होगा, गलत होगा जो आज 30 साल में एंजायटी के फॉर्म में बाहर आ रहा है। और ये जो बचपन की मेमोरीज है वो जाती कहीं नहीं है। रहती हैं अंदर। तो यह प्रश्न जब हम पूछते हैं तो हम रूट कॉज तक जाते हैं। वरना हम ऊपर का ए्जायटी को दबा दिया। डिप्रेशन आ गया। डिप्रेशन को दबा दिया। फिर पता चला बंदा शराब पीने लग गया। अभी शराब की लत छूट गई तो अभी उसको
(18:07) पोंड की लत लग गई। तो कहीं ना कहीं हम क्या कर रहे हैं? हम इसको दबा के इसको दबा रहे। हां। तो कहीं ना कहीं। सो देन वी वी रियली आस्क्ड आवरसेल्व्स कि वी शुड गो। और मेरा तो यह चाइल्डहुड ट्रॉमा का अनुभव बहुत पहले का है। बिकॉज़ हम लोग जितने क्लाइंट्स के साथ काम करते हैं, हमें पता चला कि यह सब कुछ ज्यादातर बचपन से जुड़ा हुआ है। और लोगों को ये समझ नहीं है। लोग पूछते हैं ऐसे कैसे हो सकता है? वो तो 30 साल पहले की बात है मैम। बीच में तो कुछ भी नहीं हुआ। आपके लॉजिक से तो हमेशा मुझे एंजायटी होनी चाहिए। बीच में क्यों कुछ नहीं हुआ?
(18:35) राइट? अगर मेरा बचपन जीरो टू 18 इयर्स में समझो ट्र्रामा वाला था। घर में बहुत लड़ाई होती थी, गाली गलौज होती थी। मुझे बहुत स्ट्रेस रहता था। पर बीच में तो कुछ नहीं हुआ। फिर मुझे 30 साल की उम्र में क्यों पैनिकिक अटैक शुरू हो गए? यह कॉमन क्वेश्चन है लोगों का। बिल्कुल। और मेरा जवाब यही है। जवाब मैं एक छोटी सी कहानी में बताती हूं। कि मैं आज एक ऊंट जा रहा है डेजर्ट में। हां। मैंने उसके ऊपर 100 किलो का एक आलू का एक बोरी रख दिया। सैक रख दिया। ऊंट फिर भी चलेगा। दो एक और 100 किलो का रख दिया। तो ऊंट अभी धीरे चलने लग गया है।
(19:09) हम एक और 100 किलो। अभी 300 किलो ऊंट के पीठ पे है तो ऊंट खड़ा हो गया है। पर लोगों को तो क्या दिखता है? ऊंट अभी भी खड़ा है भाई। राइट? अब मैंने उसके ऊपर किताब रख दी और ऊंट गिर गया। हम लोगों को क्या लगता है? अरे मैम ने किताब रखी और ऊंट गिर गया। देखो किताब से किताब घर गिरी। किताब नहीं रखते तो नहीं गिरता। तो किताब की वजह से गिरा क्या? किताब के रखने से पहले जो कुछ वो उठा के चल रहा था उसकी वजह से गिरा है। पर आपको वो दिखा नहीं। तो लाइफ में यही होता है। 30 35 साल तक तो हम क्या करते हैं? फाइट मारते रहते हैं। पहले पढ़ाई करो, फिर अच्छी जॉब लो,
(19:45) फिर शादी करो, फिर उसके चैलेंजेस को सॉल्व करो। बच्चों को पढ़ाओ लिखाओ कुछ-कुछ करके हम स्मोक करके ड्रिंक करके कुछ के चला लेते हैं। बाद में जब सब सेटल होता है तब ये या तो फिर कुछ एक इंसिडेंट हो गया और पूरा हमारा पहाड़ टूट पड़ता है। हम बॉडी का एक एक रेजिलियंस लेवल होता है। कोई किसी की 20 साल में टूट जाता है। किसी का रेजिलियंस किसी का 30 साल में टूटता है। किसी का 50 तक नहीं टूटता है। किसी को 60 साल में डिप्रेशन आता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि वो है नहीं। वो पड़ा हुआ है। पड़ा हुआ है अंदर। पर आप कितना उसको दबा सकते हो। कितनी क्षमता है आपकी दबाने की?
(20:18) कितनी क्षमता है कि उसके बावजूद आप अपना चला रहे हो। वो ऊंट की कितनी क्षमता है? अगर ऊंट ने ज्यादा खाया पिया तगड़ा वगड़ा है, मसल ज्यादा है तो शायद और अच्छा तो क्या यहां ये ये भी समझाइए आप कि क्या उस क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। हां जी बिल्कुल 100% और ये भी हमने बुक में डाला हुआ है कि जब ये क्षमता को हम इमोशनल रेजिलियंस कहते हैं। तो इमोशनल रेजिलियंस मतलब क्या कि एक इलास्टिक रबर बैंड कैसा होता है कि आप जब जरूरत पड़े तो खींचेगा। हम जब जरूरत नहीं पड़ी तो वापस अपनी पोजीशन में आ जाएगा। हमारी इमोशनल स्ट्रेंथ रेिलियंस इसको
(20:51) बोलते हैं कि जब तनाव हो, जब स्ट्रेस हो तो हम उसके साथ कोप अप कर सके। हमारी नर्वस सिस्टम ऐसी होनी चाहिए कि जब तनाव में हम लड़ सके, भाग सके। राइट? पर जब वो तनाव चला गया है तब हमको वापस रिलैक्स मोड में आना चाहिए। अगर हमारी ये फ्लेक्सिबिलिटी है अंदर की तो हम तनावों को झेल सकते हैं। पर अगर हमने रबर बैंड को खींच खींच खींच के इतना खींचा कि वो टूट गया तो वो नहीं झेल पाएंगे। तो जब बच्चा बच्चे की ये जो नर्वस सिस्टम है वो वो जीरो से 18 साल की उम्र में अगर आपने इतना खींची इतनी खींची कि वो टूट गई तो वो बच्चा बड़ा हो के रेजिलियंट कैसे बनेगा?
(21:27) हम [गला साफ़ करने की आवाज़] कैसे बच्चे की रेिलियंट टूटती है? जब बच्चे को हर बार बोला जाता है कि तू बेकार है। तेरे से कुछ नहीं होगा। देख तेरी बहन कितनी स्मार्ट है। तू कितना डफर है। या तो तू काला है। तेरी नाक गंदी है। तेरे से कोई शादी नहीं करेगा। या तो तू कभी सुनता ही नहीं है। पता नहीं तू क्यों पैदा हुआ। पता नहीं तू तो हमारे नाक कटवा के रहेगा। या तो फिर बच्चा घर में ही देखता है कि मम्मी पापा बहुत लड़ाई करते हैं। या तो साइलेंट ट्रीटमेंट देते हैं। तो ये सब चीजों की वजह से बच्चे की नर्वस सिस्टम हमेशा के लिए वो स्ट्रेस मोड में
(21:55) रहती है। बचपन से। बच्चा हमेशा एक्सपेक्ट करता है कि अभी अगले घंटे में कुछ होगा। देखो अभी पापा ऑफिस से आए ना अभी सब कुछ होने वाला है। अभी देखो अभी दादा जी आएंगे ना तभी इनकी लड़ाई होगी। पता है अभी देखो कल स्कूल जाऊंगा अभी टीचर मेरे को डांटने वाली है। पक्का मुझे पता है और अभी रिसर्च में ये बच्चे मेरे को मजाक करेंगे। तो बच्चा क्या करता है? कास्टेंटली एंटीिसिपेट करता है कि कुछ ना कुछ गलत होगा कुछ ना कुछ। तो उसकी नर्वस सिस्टम डिसरेगुलेट हो जाती है। तो नर्वस सिस्टम डिसरेगुलेट हो जाती है। उसके ब्रेन सेंटर्स पे इफेक्ट पड़ती है। ये बच्चा या
(22:22) तो शटडाउन हो जाता है। मतलब जैसे हमने कहा पत्थर जैसा कोई फर्क ही नहीं पड़ता यार जो करना है करो। हम या तो फिर बिल्कुल टूट के वो होते हैं ना बच्चे जो लो कॉन्फिडेंस लो सेल्फ वर्थ मैं बेचारा मेरे से कुछ नहीं होगा ऐसे हो जाते हैं या तो फिर बगावत करने लगते हैं हम जाओ सबको मारो पीटो मुझे घर पे मार पड़ती है मैं 10 बच्चों को स्कूल में जाके मारता हूं तो कहीं ना कहीं ये इमंबैलेंस दिखने लगता है बिल्कुल पर लोगों में अवेयरनेस नहीं है तो लोग इसके बारे में कुछ करते नहीं है फिर ये बच्चा बड़ा होगा शादी करेगा तो शादी पे इंपैक्ट होगी बच्चों पे इंपैक्ट होगी
(22:53) करियर पे भी इंपैक्ट होगी क्योंकि यही बच्चा ऑफिस में जाएगा अभी ऑफिस में अगर उसका बॉस निकला जो उसके बाप जैसा दिखता है तो ट्रिगर हो जाएगा। अब बॉस चाहे कितना भी अच्छा हो पर अगर उसकी मूछ उसके फादर जैसी है। मेरे पास एक क्लाइंट आया था। बोला था कि आईआईटीआईएम में पढ़ा हुआ गोल्ड मेडलिस्ट था और उसकी ट्रांसफर हुई थी एक अच्छी सी कंपनी में उसको जाना था। अभी वो नया बॉस उसको कुछ नहीं पता। जीरो बैकग्राउंड पर वो बॉस की मूछे उसके पापा जैसी। अब जैसे [नाक से की जाने वाली आवाज़] ही वो बॉस के कैबिन में आया उसकी हार्ट रेट बढ़ गई। उसको पसीने-पसीने छूट गए और वो कुछ बोल ही
(23:24) नहीं पा रहा है। अब ये बॉस ने तो कुछ किया ही नहीं। मतलब ही इज़ अ न्यू गाय। देन हमें पता चला कि ये बच्चे के पापा जो है वो मिलिट्री में अब डिफेंस में थे और उसको पढ़ाई नहीं की तो क्रिकेट बैट से मारते थे। तो ये बच्चा मार खा के आईआईटी किया, आईएम किया, गोल्ड मेडल सब कुछ किया। पर उसके अंदर वह फादर की जो मूछे थी और फादर की जो परसोना थे और दैट गॉट एसोसिएटेड विथ फ़ियर। तो अभी वो जब जॉब करने में जा रहा है तो बॉस की मूछ देख के उसका बॉडी अलार्म में चला जाता है। सोचो आप भाई साहब। अभी इसको हमने समझा नहीं तब उसको कनेक्शन पता ही
(23:58) नहीं चला। उसको लगा व्हाट इज रोंग विथ मी? मेरे में कुछ गड़बड़ है भाई। मैं पहले दिन ऑफिस में जाता हूं। मुझे क्यों पैनिकिक हो गया? मुझे क्यों पसीना हो गया? समथिंग इज रोंग विथ मी। मैं पागल हूं। अगर वो समझो जिस जिसने ये समझा नहीं उसके पास जाता तो उसको दवाई दे देता। तुम्हें एंजायटी है चलो एंजायटी की गोली खा लो। पर जब हमने यह समझा तो हमने फादर वाले जो सारी मेमोरीज थी वह हमने रिकंसोलिडेट करी। उसके बॉडी में जो फादर के लिए जो गुस्सा था जो बहुत सारी नफरत थी वो निकाली। फिर उसके नीचे पापा के लिए जो उसका प्यार था वो भी नहीं वो सब लेयर्स होते हैं।
(24:31) वो सब बाहर है। फिर बोलता है कि मैम अभी बॉस के आगे कुछ नहीं होता मेरा। अभी आई एम अबब्सोलुटली फाइन। तो क्या किया हमने? जादू नहीं किया हमने। हमने सिर्फ जो एसोसिएशन था हम वो बदल दिया। जैसे वो बुलेट वाला एग्जांपल आपको दिया तो जैसे ये ये हम लोग के यहां पे बहुत ज्यादा है। खासतौर से इंडियन सोसाइटी में तो परंपरा प्रतिष्ठा अनुशासन और जो भी परंपरा प्रतिष्ठा अनुशासन के बाहर जाएगा उसके साथ हर तरह का ट्रीटमेंट होगा यहां पर। मीम एक हम लोग देख रहे थे। एक रील थी सॉरी। तो उस रील में हंसी में ही थी वो। लेकिन बड़ी स्ट्रांग बात वो बोल रही थी
(25:05) रील कि कुछ भी गड़बड़ हुआ। अच्छा आज मन नहीं कर रहा है तो बच्चे को पीट दिया। कुछ गिर गया तो बच्चे को पीट दिया। नॉर्मलाइज कर देते हैं। अभी हंस हंस हंस के हम इसको नॉर्मलाइज कर तो ये लेकिन जिसके साथ हो रहा है ये आप उस फेस से बाहर आ गए हो तो फिर भी आप उसको देख सकते हो अलग तरह से बट जो क्योंकि बहुत सारे लोग इससे गुजर रहे हैं। तो ये जो बच्चों को पीट देने की टेंडेंसी है और इसको बहुत ही नॉर्मल माना जाता है कि मतलब मेरा ही तो बच्चा है। इसको अरे तो मारे अरे मुझे क्लाइंट्स ऐसा क्या कहते हैं बताइए? अरे हमें तो मैम बेल्ट ट्रीटमेंट मिलती थी। मतलब हम तो पापा रोज
(25:37) ही बेल्ट से मारते थे। तो हम तो ऊपर से कंपेयर करते थे। कहा तेरे को कितनी पड़ी? तेरे को 10 पड़ी। अच्छा मेरे को 12 पड़ी डस दैट मीन कि उसको इसकी असर नहीं हुई है। यह सिर्फ कवर है उससे कोप अप करने का। क्योंकि अगर आप हर बार वो बेल्ट ट्रीटमेंट के बारे में सोचोगे और उतना ही दुख अनुभव करोगे तो आप जी कैसे पाओगे? तो बॉडी क्या करता है? कोप अप करने के लिए इसकी हंसीज़ाक कर लेता है। फिर मैं उनको यह पूछती हूं कि जब आप पांच साल के थे, आठ साल के थे और जब ये बेल्ट पड़ती थी तब आपको हंसी आती थी? नहीं। तब नहीं आती थी। तब तो दुख होता था,
(26:06) गुस्सा आता था, तकलीफ होती थी। फिर एक पॉइंट आ गया कि तब आपने सोच लिया कि इतना दुख इतना तकलीफ, इतनी गुस्सा हर रोज अनुभव करना उससे अच्छा है भाई पत्थर ही बन जाओ कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा। सो वी नंबर सेव्स आउट। जब पत्थर बन जाते हैं तो पापा 10 बार मारे कि 15 बार मारे क्या फर्क पड़ता है? तो ये भी एक बॉडी का सर्वाइव करने का तरीका है। इसका मतलब ये नहीं कि बॉडी को ट्रॉमा नहीं हुआ है पर वो दब गया है। तो इसमें हम दोनों बातें करेंगे। यहां से शुरू करते हैं कि जैसे जो पेरेंट्स ये मान रहे हैं आज की तारीख में जो देख भी रहे होंगे दर्शक कि भाई मेरा बच्चा है
(26:36) और इसको मुझे सिखाना है इसको मुझे डिसिप्लिन में लाना है। अब इसको डिसिप्लिन में लाना है और जैसे मैं सोच रहा हूं वही मतलब उनकी डिसिप्लिन की जो भी परिभाषा है क्योंकि उनको ऐसे ही बड़ा किया गया है। उनको ऐसे ही बड़ा किया गया है। वो मान रहे हैं। ये उस बच्चे के लिए कितना घातक हो सकता है। ये उस बच्चे के लिए कितना डेंजरस हो सकता है। यस। यह बुक मैंने इसीलिए लिखी है। आई विल टेल यू ऑनेस्टली क्योंकि मैं मानती हूं कि अगर मां-बाप के पास सही तरीके मिले ना तो कोई मां-बाप देखो बच्चे को इसलिए नहीं पैदा करता कि उनको मारे। कोई मां-बाप इसलिए बच्चे दुनिया में नहीं
(27:06) लाते कि चल ना एक बच्चा और लाती हूं ताकि मैं मारू इसको रोज। राइट? मां-बाप के इरादे तो सही होते हैं। उनको जेनुइनली आई एम टॉकिंग ऑफ़ 95% पेरेंट्स। 5% होंगे जिनको मेंटल हेल्थ इश्यूज हैं। वो शायद पीटते होंगे जानबूझ के। बट मोस्ट पेरेंट्स जो बच्चों को मारते हैं उनको जेन्युइनली लगता कि मारने से मेरा बच्चा सुधरेगा और वो बोलते भी हैं कि तू कैसा है अगर तुझे मारा नहीं होता तो तू इतना नहीं आगे निकल आता पता नहीं कहां तू कुछ अभी भीख मांग रहा होता राइट बोलते हैं तो मां-बाप जेनुली तो उनको पता नहीं है सही तरीका उनको ये किसी ने एडजुकेट ही नहीं किया है
(27:36) कि भाई अगर बच्चा रोज मार खा रहा है तो उसके नर्वस सिस्टम पे क्या इंपैक्ट पड़ रहा है उसकी ब्रेन सेंटर्स पे क्या असर पड़ता है उसके एमेकडेला पे उसके हिपोकैंपस की उसकी मेमोरी सेंटर पे क्या इफेक्ट पड़ता है उसका जो प्रीफ्रंटल कॉर्टस के उस पे क्या इफेक्ट पड़ता है ये मां-बाप को पता नहीं है। इसलिए मां-बाप क्या करते हैं जो हमारे साथ किया वो इनके साथ करो। और मां-बाप को किसी ने यह भी नहीं सिखाया कि भ आप मार खा के बड़े हुए हो। पर आज अगर आपको 30 साल की 35 साल की उम्र में डायबिटीज है, ब्लड प्रेशर है, आपको तंबाकू खाने की जो नशा है, इसका आपके मार खाने से
(28:04) जुड़ा हुआ है। वो लोग समझते नहीं। हम ग्लोबल रिसर्च है। 30 साल का दुनिया भर का रिसर्च है। 100 से ज्यादा पेपर्स हैं इसके बारे में। दुनिया भर में सब लोग ये समझते हैं। सिर्फ हमारे देश में जब मैंने पीएचडी शुरू की तब ये दो-तीन पेपर्स थे सिर्फ छ आठ साल पहले चाइल्डहुड ट्रॉमा पे। तो इंडिया में इसकी हां दो और एक केरला से था एक कुछ पता नहीं कहीं तो कुछ ईस्टर्न स्टेट से था। कोई मैंने जब मेरा पीएचडी इस पे शुरू किया चाइल्डहुड ट्रॉमा एंड इंपैक्ट ऑन मेंटल हेल्थ तब इंडिया से मुश्किल से दो या तीन पेपर थे और बाहर के 100-100 से ज्यादा
(28:35) पेपर्स थे। और इस पे इसलिए मैंने पीएचडी किया और तब मुझे पता चला कि इंडिया में इसकी कितनी जानकारी का अभाव है। इसलिए मैं मेरे सोशल मीडिया हैंडल्स पे सिर्फ इसी के बारे में बात करती हूं। तो कमिंग टू योर पॉइंट के पेरेंट्स को सही तरीका पता नहीं है। हम पेरेंट्स को यह पता होना चाहिए कि जो चीज आप बच्चे को सिखा रहे हो ना वो मारपीट के बगैर भी सिखा सकते हो। पर उसके लिए आपको खुद रेगुलेटेड रहना पड़ेगा ना। अगर आपका गुस्सा आपकी नाक की टोच पे। अगर आपको ही आपके पिताजी ने और माताजी ने मार मार के बड़ा किया है तो योर नर्वस सिस्टम इज़
(29:05) डिसरेगुलेटेड। मतलब आपका ब्रेन सेंटर्स इस तरह से कुछ हो गया है कि या तो आप शट डाउन हो हम या तो आप एकदम हाइपर विजिलेंट और एशियस किस्म के पेरेंट हो बहुत जल्दी ट्रिगर हो जाते हो क्योंकि आपने वही देखा है मैंने हमने पहले बात की थी तीन रिस्पांस होते हैं बहुत स्ट्रेस में या तो आप वायलेंट हो जाते हो या तो आप शट डाउन हो जाते हो या तो आप बिल्कुल ही हेल्पलेस होपलेस हो जाते हो अभी ये जब बंदा पैरेंट बनता है तो पैरेंटिंग में भी यही आता है ना उसी वही तीन रिसों्ससेस हां हां तो यही पेरेंट्स हैं जो बच्चों को मारते हैं क्योंकि उनको उनको खुद उनका
(29:35) एंगर ही कंट्रोल नहीं हो पाता है। देखिए सही पैरेंटिंग के लिए ना मेहनत लगती है। सबसे आसान शॉर्टकट पैरेंटिंग के दो किस्म का। एक तो बच्चे को मारो पीटो कंट्रोल करो। मैंने कहा इसलिए करना है बस। और नो क्वेश्चंस आस्क्ड। उसमें जीरो टाइम लगता है। आंख दिखाई, डंडे से मारा, बच्चे ने रिजल्ट दे दिया, काम कर दिया। शॉर्टकट। हम दूसरा सबसे आसान तरीका है परमिसिव पेरेंटिंग। कुछ मतलब बच्चे को सब छूट दे दो। हम चल बेटा फोन चाहिए, फोन ले ले। बेटा पढ़ना नहीं है कोई बात नहीं मत पढ़ना हमारा घर का बिजनेस है तेरे सब संभल जाएगा डोंट वरी बेटा गाड़ी चलानी है 15 साल में ठीक है जा
(30:09) चला ले इसमें भी कोई मेहनत नहीं लगती है ये भी गलत है ये भी गलत है इसको परमिसिव पैरेंटिंग बोलते हैं मैंने ये बुक में लिखा हुआ है ये एक एक्सट्रीम परमिसिव पैरेंटिंग इसमें बच्चे सेल्फिश बनते हैं हम सेल्फ सेंटर्ड बनते हैं जो हम कहते हैं ना कि बड़े मां-बाप का बिगड़ा बच्चा टाइप्स जरूरी नहीं कि बड़े पैसे वाले परिवारों में हो ये मिडिल क्लास में भी रहते हैं कि ये बच्चे ऐसे होते हैं जो सोचते हैं कि दुनिया मेरे इर्द-गिर्द घूम सिर्फ मेरी जरूरतें क्यों? क्योंकि मां-बाप ने उसको ऐसा ही ट्रीट किया है कि बेटा तुझे क्या खाना है वही बनेगा। तुझे
(30:41) आज घर में भिंडी बनी नहीं खानी है। चलो बेटा मैं तुम्हारे यहां आलू बना देती हूं। तो ये बच्चा क्या सीखता है कि मैं जो कहूं वही होगा दुनिया में। दुनिया मेरे इर्द-गिर्द घूमेगी। माय नीड्स आरेंट। डिसिप्लिन रूल मुझे कोई नहीं अप्लाई करता है। अब ये बच्चा जब दुनिया में जाता है दुनिया तो वैसी है नहीं। फिर वो कूदेगा, रोएगा या तो दूसरों को ब्लेम करेगा। टीचर [गला साफ़ करने की आवाज़] खराब है, बॉस है, एनवायरमेंट टॉक्सिक है, लोग खराब है। बस मैं अच्छा हूं। तो यह परमिसिव पैरेंटिंग है। आजकल ज्यादा दिख रहा है। मजेदार बात ये है कि जो मां-बाप
(31:12) हम अपने बचपन में जिन्होंने ये जो अथॉरिटेरियन पैरेंटिंग देखा है हम हम यू नो द कंट्रोल, डिसिप्लिन, मारपिटाई वाला वो लोग परमिसिव बन जाते हैं जब मां-बाप बनते हैं तो। क्योंकि उनमें ये प्रोग्राम रहता है कि मैं मेरे पापा की तरह नहीं बनूंगा। भाई मेरे मम्मी पापा तो इतना मुझे कंट्रोल करते मेरे बेटे को मैं जब पेरेंट बनूंगा ना तो मेरे बच्चे को पूरी फ्रीडम दे दूंगा। तो क्या हुआ अभी आप दोनों एक्सट्रीम स्टाइल में ऑपरेट कर रहे हो। ये दोनों ही शॉर्टकट है। सही पैरेंट सही पैरेंटिंग वो मैंने इसमें लिखा है। इज अ गुड मिक्स ऑफ़ बोथ कि जहां
(31:47) पे आप पैरेंट बने रहो। दोस्त मत बनो। हम्म। बच्चे को रूल रेगुलेशन समझाना है। बच्चे को पता होना चाहिए कि घर में सब 8:00 बजे साथ में खाते हैं। हम बट उसमें बच्चे को फ्रीडम मिलनी चाहिए कि भाई ठीक है मुझे आज भिंडी नहीं खानी तो मैं सिर्फ रोटी और दही खा लूंगा। हम तो गुड मिक्स ऑफ कंट्रोल एंड रिसेप्टिवनेस टू द चाइल्ड। ये रिसर्च के ऊपर आधारित है। डायना बमरेन ने बहुत सालों पहले इसके ऊपर रिसर्च किया था पैरेंटिंग स्टाइल पे। उसके बाद बहुत सारा इसके ऊपर रिसर्च हुआ है। तो वो स्टाइल सबसे अच्छा है जिसमें देखा गया है कि बच्चों की इमोशनल रेिलियंस
(32:20) बढ़ती है। ये बच्चों की एकेडमिक परफॉर्मेंस भी बहुत ज्यादा बढ़ती है। जो बच्चे इस तरह से बड़े होते हैं कि जिनको एक अच्छा बैलेंस मिलता है। कंट्रोल भी होता है घर में पर बच्चों को अपना मंतव्य एक्सप्रेस करने की छूट मिलती है। बच्चों को अपना पॉइंट ऑफ व्यू एक्सप्रेस कर सकता है। बच्चा यह जरूर कह सकता है कि मुझे भिंडी नहीं अच्छी लगती है। नहीं खानी है। बट उसको यह पता है कि नहीं तो जो भी है बाकी का वह खाना पड़ेगा। सो देयर इज अ गुड मिक्स ऑफ कंट्रोल एंड रिसेप्टिवनेस। उसको बैलेंस्ड पैरेंटिंग बोलते हैं। इसके लिए मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि इसके लिए
(32:49) मां-बाप को पहले तो शांत रहना पड़ता है। हम अगर [नाक से की जाने वाली आवाज़] बच्चे ने भिंडी नहीं खाई तो उसको पुलिस की धमकी देके भिंडी खिलाना वो सबसे आसान है। या तो फोन आजकल तो मैं देखती हूं फोन रख देते हैं सामने। हां ये तो सबसे अरे मैं अभी एयरपोर्ट पे थी तो वो लॉन्ज में एक आई मदर ऐसे बेटी को बैठाया। अभी बेटी समझो 8 9 साल की है। छोटी नहीं है। ऐसे बेटी को बैठाया पूरा प्लेट भर के खाना ले आई। फोन रख दिया सामने और चम्मच भरभर के बेटी के मुंह में ठूस रही है। एक बार तो इतना गरम खाना आया कि बेटी ने ऐसे किया फिर भी वो अंदर। तो बेटी को कोई सेंस ही
(33:19) नहीं है कि मैं कितना खा रही हूं। मुझे कितनी भूख है। पेट भरा नहीं भरा। कुछ नहीं। बस मां का काम था खिलाना। तो फोन रख दिया और बेटी के मुंह में ठोसे ठोसे। जैसे प्लेट खत्म हो गई। मां को लगा खा लिया है। फ़ ले लिया हाथ से प्लेट [हंसी] रख के। ये क्या है? और लोग बड़ा गर्व से बताते हैं कि ये तो जब तक ये फलाना वाला वो पोकोमलन नहीं देखता है ना। अभी ये बच्चा अभी ये बच्चा ये बच्चा बड़ा होगा इसको बॉडी के साथ कोई कनेक्शन ही नहीं है। उसको समझ ही नहीं है कि मेरे पेट में कब भूख लगी है। कब मेरी भूख मिटी है। कब मुझे खाना दो रोटी से मेरी भूख आज खत्म
(33:53) होएगी कि तीन रोटी से। तो यह बच्चा बड़ा होके भी टीवी के सामने चार दो पिज़्ज़ा खा लेगा पूरा उसको समझ नहीं आएगा। तो ईटिंग डिसऑर्डर्स, ओबेसिटी, एनोरेक्सिया, बुलीमिया ये सब इससे जुड़ा हुआ है। उसको तो आदत पड़ चुकी है। वो बिना देखे खा ही नहीं। हां। और अगर समझो बिना देखे खाने बैठे तो उसको समझ नहीं आएगा कि कितना मतलब कम खा लेगा या ज्यादा खा लेगा। उसको समझ ही खाने की सेंस ही नहीं होगी। जो हर कुत्ते बिल्ली इंसान में होती है। जो मैमल्स आप देखो कुत्ते को जोर जबरदस्ती करके खिलाओ। वो नहीं खाएंगे। कोई एनिमल जबरदस्ती नहीं खिलाता। सिर्फ
(34:23) इंसान ऐसा है जो जबरदस्ती खिलाते हैं हम उसको ओवर ईटिंग आई एम अ पेट पेरेंट मेरे पास कुत्ता है मुझे पता है उसको कई दिन होंगे जब वो उपवास करेगा खाएगा ही नहीं क्योंकि उसको इंटेलिजेंस से समझ आ रहा है कि आज मेरे बॉडी में नहीं चाहिए और खाना तो वो एक दिन तक नहीं खाएगा ये इंसान में भी है ये कैपेबिलिटी बट हम उसको सिस्टेटिकली मार देते हैं क्योंकि मम्मीियों को तो यह रील देख देख के ऐसा किसी पेडियटिशियन ने बोल दिया किसी डॉक्टर ने बोल दिया किसी इन्फ्लुएंसर ने बोल दिया कि नहीं उसको तो कार्ब चाहिए प्रोटीन चाहिए वेजिटेबल्स चाहिए ये चाहिए वो चाहिए तो मम्मी वो पूरी
(34:52) प्लेट सजा के अभी यही खाना है। बट ऐसा नहीं होता है। बच्चे को बच्चे को हर दिन अलग-अलग रिक्वायर आज बच्चा दो रोटी खाएगा। कल एक ही खाएगा। इट्स ओके। बिकॉज़ उसने कल शायद वेदर अलग है। शायद उसका मूड नहीं है। शायद उसने कम मेहनत की है। तो बच्चे को समझ आना चाहिए। मुझे याद है मेरा बच्चा छोटा था ना तो हफ्ते में दो दिन तो ऐसे होते थे जब वो डिनर ही नहीं खाएगा। हम्म। तो और वैसे भी शुक्ला था तो लोग कहेंगे कैसी मम्मी है। इसको नाच गाना करके खिलाओ। इसको कुछ-कुछ टीवी देख के खिलाओ। कुछ भी करके इसको खिलाओ। मैंने कहा अरे ये इंसान का बच्चा इसको पता चलता है कब उसको नहीं
(35:25) खाना है तो नहीं खाना है मतलब ठीक है ना तो आई यूज्ड टू नॉट लेट हिम ईट ही वास फाइन आज वो 6.5 फुट का है भाई बराबर से एकदम स्टंग कुछ उसको प्रॉब्लम नहीं हुआ तो मुझे पेरेंट्स को बताना पड़ता है कि यार कभी-कभी बच्चा एक आध बार ना खाए दो चपाती के बदले एक चपाती खाया ना भी खाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता है। पर पेरेंट्स इसको ले इतना टॉक्सिक बना देते हैं खाने का समय हम मार बच्चे को डांटते हैं डराते हैं धमकाते हैं ताकि वो खा ले अभी इसमें मैंने समझाया है कि डरा के धमका के जब बच्चे को खिलाते हो तो उसका डाइजेशन जूसेस तो सीक्रेट ही नहीं
(36:01) होता ठीक से क्योंकि बच्चा फाइट एंड फ्लाइट में होता है। तो ये मैंने बहुत सिंपल भाषा में इसलिए समझाया है। जब आप स्ट्रेस में होते हो ना, तो आपका नर्वस सिस्टम कुछ इस तरह से भगवान ने बनाया है कि जब आप तनाव में होते हो तो योर बॉडी इज रेडी टू फाइट। फाइट और फ्लाइट। मतलब या तो आप झगड़ा मारो मतलब यू फाइट या तो भाग जाओ। उस समय आपके बॉडी का जो सारा ब्लड फ्लो है ना वो हाथ पैर में डायरेक्ट हो जाता है। ताकि आप एनिमी के साथ लड़ सको या भाग सको। तो सारा ब्लड फ्लो यहां से कम हो जाता है और हाथ पैर में आ जाता है। आपके मसल टाइट हो जाते हैं। आपका हार्ट रेट बढ़ जाता है।
(36:35) आपका ब्रीदीिंग बढ़ जाता है। और जो डाइजेस्टिव फंक्शन है, रिप्रोडक्टिव फंक्शन है वो सब डीप प्रायोरिटाइज कर देता है बॉडी। क्योंकि तो अब डाइजेस्ट करने की जरूरत नहीं है। जब आप डेंजर में हो, आपके ऊपर जब एक जंगली जानवर अटैक कर रहा है तो आपको तो खाना पचाने की थोड़ी ना पड़ी होती है। तब आपको तो भाग नहीं पड़ी होती है। तो जब बच्चा बच्चे के बॉडी को यह नहीं समझ आता है कि मम्मी इज डेंजरस और टाइगर इज डेंजरस। बच्चा तो स्ट्रेस में मतलब बॉडी विल ऑटोमेटिकली डीप प्रायोरिटाइज तो आपका जो डाइजेस्टिव जूसेस है उसका सिकक्रशन कम हो जाता है और कॉर्टिजोल
(37:05) एड्रिनल स्ट्रेस हॉर्मोन बॉडी में आने लगते हैं बच्चे का मसल टाइट हो जाता है बच्चा ब्रीथिंग फास्ट कर बच्चा बच्चा स्ट्रेस में है तब खाना जो आप कितना भी न्यूट्रिशियस खाना दो नहीं बचेगा अच्छा तो ये देखिए बहुत अच्छी आपने बात बोली एक पैटर्न मैंने देखा कि मैं मैंने डिबेटिंग की है कॉलेज के टाइम से तो जब भी मैं डिबेट में जाता था और अगर मैंने पहले खाना खा लिया है तो मुझे बहुत प्रॉब्लम होती थी हम्म मैं खा मतलब मैं नहीं कर सकता हूं। तब से आज तक का यह रूल है कि इफ आई हैव टू शूट इफ मैं कुछ भी ऐसा कर रहा हूं। मेरे को यह पडकास्ट रिकॉर्ड करना है। मैं दो
(37:36) ढाई तीन घंटे तक पहले कुछ नहीं खाता हूं। करेक्ट बिकॉज़ योर बॉडी इज नॉट डिज़ टू डाइजेस्ट फूड दैट टाइम। जब खतरा चला जाता है बॉडी जब पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम्स मोड में आता है जिसको हम रेस्ट और रिपेयर मोड कहते हैं। तब डाइजेस्टिव जूसेस सीक्रेट होंगे। आपका तब नींद होगा। तब आपकी जो रिप्रोडक्टिव हॉर्मोंस हैं वो बैलेंस होंगे। तब आपका सेक्स ड्राइव इसलिए तो क्रॉनिक स्ट्रेस की वजह से सेक्सुअल डिस्फंक्शन हो रहा है लोगों को। फर्टिलिटी कम हो रही है लोगों में। बिकॉज़ ये क्रॉनिक स्ट्रेस की वजह से स्ट्रेस यस। बिकॉज़ स्ट्रेस के टाइम पे
(38:04) रिप्रोडक्शन, डाइजेशन ये सब डीप प्रायोरिटाइज कर देता है बॉडी। बॉडी क्या प्रायोरिटाइज करता है? लड़ो, भागो, लड़ो, भागो, लड़ो, भागो या तो शट डाउन हो जाओ। तो कितनी बार मैं समझाती हूं मेरी रीलो में कि भाई बच्चों को डराधम के अगर बच्चा प्यार से रोटी, नमक भी खा रहा है ना बट बड़े रिलैक्स मूड में खा रहा है तो उसका फायदा होगा। बट आप उसको यार डरा के धमका के खिला रहे हो उसका कोई पॉइंट नहीं है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] हमारे यहां तो डायलॉग्स भी ऐसे हैं। शोले का नहीं है कि सो जाओ वरना गब्बर आ जाए। हां बस अरे [हंसी] मैं कह रही हूं मेरे पास देखो मैं बच्चों
(38:35) के साथ नहीं काम करती हूं। मैं सिर्फ बड़ों के साथ करती हूं। ठीक है। ऐसे ऐसे बड़े आते हैं जिनको भूत प्रेत का डर है। ये सब बचपन से ही आता है। बचपन से मम्मी ने डराया है। अभी एडल्ट हो के पता है कि ये सब नहीं है। प्रोवन नहीं है। बट उनको बस वो ऐसी बातें होती है तो उनको घबराहट होने लगती है। क्योंकि मम्मी ने बचपन से हर रोज खाने के टाइम पे बोला खाना नहीं तो काला बाबा आके तुमको उठा के ले जाएगा। तुम्हारा गला काट देगा, हाथ पैर काट देगा। ऐसे सब डराते हैं तो बच्चा डर के मारे खा लेता है। बट मां-बाप को पता नहीं है कि इसकी क्या
(39:01) इंपैक्ट होती है। ऑन अ सीरियस नोट कि जो जो पेरेंट्स इस तरह से अपने बच्चों को ट्रीट करते हैं जिन्हें लगता है कि वो तो मारपीट नहीं रहे हैं। वो सिर्फ ये डरा दे रहे हैं या ये सिर्फ कह दे रहे हैं पुलिस अंकल आ जाएंगे। ये तो लो ना इसको इमोशनल अब्यूज कहते हैं। या तो फिर पता है मम्मीियां क्या करती? गिल्ट ट्रिप। बेटा तूने नहीं खाया ना तो देखो मम्मा रोने लग जाएगी। बेटा तूने आज खाया नहीं तो मैं भूखा। एक मेरे पास क्लाइंट आता है। बोले मैम मैं ना एग्जाम में हर बार मैं फर्स्ट ही आता हूं। अगर मैं सेकंड भी आया ना तो पापा खाना नहीं खाएंगे दो
(39:31) दिन तक। सोचो आप प्रेशर एकोटा की बात कर रहे थे ना आप मां-बाप ऐसा करते हैं। अभी मतलब क्या इसको इसको मार मारा पीटा नहीं है पर इमोशनल अब्यूज कहते हैं इसको। क्योंकि बच्चे को कांस्टेंटली दिमाग में रहता है कि मेरी वजह से पापा भूखे जाएंगे तो मुझे लाना ही पड़ेगा। अभी ये बच्चा जब एक बार तीसरा चौथा रैंक आया पढ़ ही नहीं पाया। मरने जाएगा। वो बोलेगा मेरी वजह से पापा अब पापा को बोलो भाई आपको खाना है तो खाओ नहीं खाना है तो मत खाओ यार ये बेटे को क्यों आप ब्लैकमेल कर रहे हो और पेरेंट्स को लगता है कि इससे मेरा बेटा पढ़ेगा उनको ये नहीं समझ आ रहा है कि ये
(40:03) प्रेशर से बेटा कब तक झेलेगा ये प्रेशर 12 10वीं तक 11वीं तक फिर इन बच्चों को 12th जब घोड़े को रेस में दौड़ना होता है तब तो ब्रेकडाउन हो जाता है बर्न आउट हो जाता है ये बच्चे वो कितने बच्चे हमारे पास बड़े आते हैं मैम 10वीं तक हम हमेशा फर्स्ट आते थे फिर पता नहीं क्या हो गया। बस फिर सब डाउन ही ले गया। उसके बाद मैं आगे निकल ही नहीं पाया हूं। क्योंकि वो आर्टिफिशियल प्रेशर बना बना के आपने घोड़े को मार मार के भगा। एग्जांपल दिया आपने। होता ही है ये। पता नहीं क्यों बच्चों को बताता नहीं है कोई। बड़े भाइयों से पूछो। 11वें में सबके नंबर
(40:37) कम आते [हंसी] हैं। वो अरे मैं तो कहती हूं 10वें में भी कम आए तो क्या जब रियल एग्जाम है तब मैं पेरेंट्स को बहुत बोलती हूं। मेरा बेटा फिफ्थ ग्रेड में फेल। अरे फिफ्थ ग्रेड में सिक्स्थ ग्रेड में फेल होने दो। दो चार बार फेल होगा ना तो बच्चा सीखेगा कि भाई कैसे आगे बढ़ते हैं फेल हो के मां-बाप क्या करते हैं बच्चे को फेल ही नहीं होने देते प्रेशर बढ़ा-बढ़ा के अब ये बच्चा जब बड़ी एग्जाम होती है ना तब फेल होता है तब झेल ही नहीं पाता झेल ही नहीं पाता है मैं ज्योग्राफी में फेल हुई थी मुझे जिंदगी भर याद है एक बार फेल हुई थी ज्योग्राफी में 35 34 मार्क आए
(41:06) थे बाबा पर मुझे पता है कि वो वो फेलियर ठीक है इट इज़ इट इज़ मैनेजेबल मेरा बेटा भी वही इसमें मैंने बुक में मैंने बहुत पर्सनल नेक डोज़ लिखी मेरे बेटे ने भी हमने उसको वही बोला था कि बेटा तुझे क्या वो बोले मम्मी मम्मी मुझे जो सब्जेक्ट अच्छा लगता है मैं पढूंगा केमिस्ट्री बिल्कुल पसंद नहीं है। मुझे आगे काम भी नहीं है तो मैं उसमें जस्ट पास हो जाऊंगा। मैंने कहा ठीक है जस्ट पास वी अग्री ओके पर जिसमें इंटरेस्ट था मैथ्स उसमें 100 में से 100 लेके आया आर्ट में इंटरेस्ट था तो 96 लेके आया जिसमें इंटरेस्ट नहीं था नहीं लाया पर
(41:33) हम वी वर ओके वी सेड के बेटा करना क्या है मुझे ये अच्छा लगता है ठीक है वो जितना मन आए वो कर पेरेंट्स क्या करते हैं पता है जो तू जिसमें वीक है ना उसमें तू ज्यादा मेहनत कर अभी जिसमें आप वीक हो जो सब्जेक्ट आपको पसंद नहीं उसमें आप ज्यादा मेहनत करके कभी भी टॉप टॉप तो आ ही नहीं पाओगे ऊपर से आप कॉन्फिडेंस भी आपका धुल जाएगा और जितनी बार मेहनत करोगे और रिजल्ट नहीं मिलेगा आपको लगेगा अरे मैं तो बेकार हूं। उससे अच्छा है कि जिसमें आप अच्छे हो उसमें जितना घंटा निकालना है निकालो भाई। उसमें आप एक्सपर्ट हो सकते हो और जो नहीं अच्छे
(42:04) हो ना उसमें निकल जाओ बस काफी है। ये भी मैं पेरेंट्स को कहती हूं। पेरेंट्स तो ही समझते हैं। एक पर्सनल वाक्या कि मैं [हंसी] क्लास थर्ड तक हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ा। और हिंदी मीडियम भी एकदम वैसा हिंदी मीडियम जहां कक्ष लिखा रहता था। तृतीय, द्वितीय और हम लोग मे आई कम इन सर को बोलते थे आचार्य जी प्रवेश। अरे वाह। तो फिर हमारे घर वालों को पता चला कि नहीं यार ये तो अंग्रेजी तो पक्का सीखनी चाहिए। तो मुझे उठा के इंग्लिश मीडियम स्कूल में डाल दिया गया। और मेरे घर का माहौल हिंदी और मैं हिंदी मीडियम का टॉपर मतलब वही चीज। सेकंड आ गई तो मतलब कुछ जीवन खत्म।
(42:39) उस तरीके का है ना। मेरी मदर तो जाती ही नहीं थी। अगर पेरेंट्स मीटिंग में मैं फर्स्ट नहीं आया हूं। बाप रे तो शी विल नॉट गो। माय फादर माय फादर विल गो। शी विल नॉट गो। तो मां नहीं जाएंगी फिर। तो यह एक तरीके का वो भी था कि मम्मी को ले जाना है तो तुमको फर्स्ट ही आना पड़ेगा। बहुत अच्छी चीज बहुत ही छोटी की बात है। फोर्थ में मैं जिस अंग्रेजी माध्यम स्कूल में गया तो वहां की प्रेयर मुझे आज तक याद है। तो मुझे तो मैं या कुंदु तुषार हार धवला संस्कृत पढ़ता था। अब वहां पर वो लोग अंग्रेजी में सारी प्रेयर्स चल रही हैं। और मुझे आज भी याद है मेरे अगल-बगल के वो
(43:10) बच्चे आई वाज इन क्लास फोर्थ। और वो मैं लिप्सिंग कर रहा हूं। कुछ अजीब लिप्सिंग कर रहा हूं क्योंकि मुझे मैं इंग्लिश भी नहीं आती। अच्छा भाई अब ये हुआ तो वहां पर मैं पढ़ रहा हूं स्थानीय मान वहां पढ़ रहा है प्लेस वैल्यू फेस वैल्यू ये वो अगल-बगल इट इज एक्चुअली वेरी ट्रोैटिक बगल में बच्चा बैठे हुए हैं और मैं इत्तेफाक से मेरी टीचर जो क्लास टीचर थी उसने क्यों किया ऐसा क्या किया उन्होंने मुझे बैठाया एकदम जो क्लास के जब से वीक स्टूडेंट्स थे उनके आसपास अब वो बड़े नोटोोरियस हैं देयर इज नो वन टू अंडरस्टैंड मी मैं घर पे आ रहा हूं घर
(43:43) पे एकदम हिंदी ज्यादा माहौल है और सबको लग रहा है कि अरे इसके तो अब हम तो देखो कितना बड़ा त्याग कर रहे हैं कि इसको पढ़ा रहे हैं। मेरी रैंक आई कुछ क्लास में 45 45 बच्चे थे। मेरी रैंक आई कुछ 38 मेरा तो प्रोसेस ही नहीं हो पा रहा है। ये हो क्या रहा है? मेरे साथ हो क्या रहा है। करेक्ट करेक्ट करेक्ट। जो [हंसी] वो लेकर के जब घर पहुंचा हूं तो उनको भी नहीं प्रोसेस हो पा रहा है। पर यार ये कैसे यार मतलब देखो एक चीज बताऊं। बच्चा स्कूल बदलता है ना तो सिर्फ मार्क्स का लैंग्वेज का ट्रॉमा नहीं होता है। नया माहौल राइट? नए बच्चे तो अनसेफ फील होता है।
(44:17) बहुत कम बच्चे होते हैं जो कहते हैं कि मैम हर बार स्कूल बदली तो मुझे बहुत मजा आया। बहुत कम बच्चे होते हैं। ज्यादातर बच्चे बोलते हैं कि मैम शुरू का छ महीना तो आई डिडंट नो व्हाट आई वास डूइंग। कहां हूं मैं? क्या क्लास फोर्थ में हूं मैं। मतलब आप इमेजिन करिए कि अच्छा उसमें टीचर्स का आपको रोल बताता हूं। टीचर्स भी एकदम कुछ नहीं समझ रहे हैं। मतलब घर वाले भी नहीं समझ रहे। चलो ठीक है। कोई बात नहीं। टीचर भी नहीं समझ रहे हैं। टीचर्स नहीं समझ रहे हैं। वो बोल रहे हैं अरे तुम तो जब मतलब मुझे एक्जेक्टली याद है उनके शब्द मैं नाम नहीं लूंगा उन लोग
(44:45) सबका ही इसमें कंट्रीब्यूशन है। बट उनके शब्द थे कि जब तुम आए थे तो मुझे लगा था तुम तो बहुत ब्रिलियंट स्टूडेंट हो। बट सॉरी आई एम रियली डिसपॉइंटेड टॉक्सिक शेम। इससे शर्म आ जाती है। आपको ये ने बोला। उसके बाद का आपको मैं पैटर्न बताता हूं। मेरा कोई दोस्त नहीं है। मैं अकेले पढ़ता चला जा रहा हूं। घर में शेम हो रहा हूं। मेरी क्योंकि हमारा गांव पास में था तो हम ट्रेन से जाते थे। तो वहां पर आसपास के सब लोग हैं और वो पूछ रहे हैं कि और सब बच्चे से मिलेंगे तो क्या पूछेंगे भैया कैसी पढ़ाई चल रही है? अब वो पूछ रहे हैं मेरे
(45:14) से भैया आपकी कौन सी रैंक आई? अब मैं बोल रहा हूं वो ना मेरा हिंदी से [हंसी] इंग्लिश में कहानी बतानी पड़ती है। अब जब मेरी मम्मी को गुस्सा है। अरे तो मम्मी वो पूरा कि तुम्हें शर्म नहीं आती है। कोई पूछता है तो तुम ये पूरी राम गाथा बताते हो। कोई नहीं समझ पा रहा है। मेरे जो ट्यूशन टीचर्स आ रहे हैं वो भी नहीं समझ पा रहे हैं। वो भी सब शेम ही कर रहे हैं। एवरीबडी अराउंड मी वो सब शेम कर रहे हैं मेरे को। एनी हाउ पता नहीं क्या है। वो अपना है वो लड़ने की ताकत जो भी जब मैं वहां से तो वो प्राइमरी स्कूल था। फिफ्थ तक था। फिफ्थ के
(45:45) बाद उनकी बिल्डिंग चेंज हो जाती थी। तो फिफ्थ में जब मैं वहां से खत्म करके निकल रहा था तो मुझे वहां पर मेरी 11वीं रैंक आई 11th और वहां टॉप 10 के नाम लिखे जाते थे बोर्ड पे। तो जब मेरी 11वीं रैंक आई तो मैं तो रो पड़ा कि अरे यार ये तो बहुत क्रेजी हो गया। बस एक ही रैंक से तो रह गया इसमें आने के लिए। करेक्ट। तो [हंसी] मैंने बोला तो मैं रोने लगा तो मैम बोलती है कि हां हां नंबर इंप्रूव हो सकते थे। कोई नहीं बेटा रोते नहीं। मैंने कहा नहीं मैम मुझे तो इतने की भी उम्मीद नहीं थी। [हंसी] मेरी मां बाहर आई। बोलती वैसे थोड़ी बहुत
(46:19) तो इज्जत बची हुई थी। तूने ये क्यों? [हंसी] अरे यार तो मैं ये बताना चाह रहा हूं कि उस वक्त में मैं अब तो खैर अपनी मदर से भी सब बातें करता हूं। उनको भी नहीं पता था। वो अपने हिसाब की बहुत अच्छी पेरेंटिंग कर रही थी। बहुत सारी चीजें की। सो मेरा एक पूरी बात बताने का तात्पर्य यह है कि हमारे यहां पे बहुत सारी अवेयरनेस ही नहीं है जो आप ये कह रही है ना कि पेरेंटिंग करते कैसे हैं? आप इस पे बात कर रही हैं कम से कम। यह बात हुई नहीं है। हमारे यहां बच्चा पैदा करने को एक नियम बना रखा है कि शादी करनी है, बच्चा बड़ा हुआ है, शादी
(46:48) करनी है, बच्चा पैदा करना है। उसको पालना कैसे नोबडी नोस नोबडी टॉक्स अबाउट दैट कोई सास अपनी बहू को ये नहीं बता रही है कि वो ये बता रही है कि बच्चा चाहिए वंश आके पालना है लेकिन वो ये नहीं बता रही कि भैया पालना या तो फिर हमने पाला वैसे तुम पाला बहू पता है स्मार्ट स्मार्ट बहू क्या कहती है पता है इसीलिए आपकी तरीके से नहीं पालना है क्योंकि मैं देख रही हूं कि आपके पालन [हंसी] पोषण का क्या परिणाम के साथ मैं जी रही हूं तो ये है यस अच्छा हां इसमें एक लास्ट मैं इसको कंक्लूड कर दूं जब मैंने स्कूल चेंज हुआ मेरी बिल्डिंग चेंज हो गई जगह नई हो गई सब
(47:18) नया हो गया और मेरी एक टीचर मिली जिन्होंने मुझे क्लास मॉनिटर बना दिया। आई डोंट नो व्हाई। वहां से चीजें एकदम चेंज होने लगी कि यार मेरा एक एक पिछला जो मेरा पास्ट था वो पास्ट मेरे से एकदम कटा जब ना तो मुझे लगा नहीं मेरी लाइफ चेंज हो रही है। कुछ हो रहा है ये। कुछ तो बहुत बढ़िया हो रहा है। और वहां से फिर ट्रेजेक्टरी चेंज हो गई। अब इसमें कितने सुंदर इत्तेफाक हैं कि वैसी टीचर मुझे मिली। हैं? क्रेडिट गोज़ टू अपराजिता मैम। पता नहीं कहां है वो मुझे नहीं पता। अच्छा इसमें इंटरेस्टिंग चीज ये है कि जो बच्चे उस वक्त में मेरे से मिलना
(47:52) मतलब मुझे ऐसे हेयर दृष्टि से देखते थे अब उनके मैसेजेस आते हैं। हां और मुझे वो सब याद आ जाता है कि अच्छा देखिए आपने जो बताया ना अपराजिता मैम शी इज अ बफरिंग एडल्ट जो हम कहते हैं। मैंने ये बुक में बताया है कि जब बच्चों के ट्रोैटिक एक्सपीरियंसेस होते हैं। बचपन के बना बचपन के प्रतिकूल अनुभव बहुत सारे होते हैं। चाइल्डहुड ट्रोमा होता है। सर अगर उस बच्चे की लाइफ में कोई एक एडल्ट हो जो बच्चे को पॉजिटिव एक्सपीरियंस दे जिसको हम पीसीई बोलते हैं जिसका अभी दुनिया भर में बहुत नया रिसर्च चल रहा है तो वो पीसीईस हैव द कैपेबिलिटी टू ऑफसेट द
(48:25) नेगेटिव इंपैक्ट ऑफ एसीई हम पीसीई मतलब क्या पॉजिटिव चाइल्डहुड एक्सपीरियंस अगर कोई एक इंसान हो आपकी लाइफ में चलो मम्मी इमोशनल ब्लैकमेल कर रही है पापा साइलेंट ट्रीटमेंट दे रहे हैं समझो घर पे बहुत प्रेशर है घर पर समझो वातावरण तनाव पर स्कूल में एक टीचर है या आपका क्रिकेट कोच ऐसा है या आपका दादा दादा दादी या नाना नानी ऐसे हैं जो आपको मोटिवेट करे जो आपको बोले कि नहीं बेटा तू कर सकता है या बोले कि चल बेटा तुझे रोना है चल बैठ समझा क्या हुआ उसको हम बफरिंग एडल्ट बोलते हैं अगर एक भी ऐसा एडल्ट बच्चे की लाइफ में है ना तो चाइल्डहुड
(48:56) ट्रॉमा की इंपैक्ट कुछ बहुत हद तक कम हो सकती है ये भी रिसर्च कहता है और इसको बोलते हैं हम पीस पॉजिटिव चाइल्डहुड एक्सपीरियंसेस मतलब उस उसको क्या उसमें आता है कि बच्चा अगर ये फील करे कि कोई तो मुझे सुनने वाला है कोई तो मेरे में विश्वास रखने वाला है अगर घर में मां-बाप ने कह दिया कि तेरे तो कुछ भी नहीं होता है। तू तो नाक कटवा रहा है। तू तो मेरे सात पीढ़ी का कलंक है। पर अगर टीचर स्कूल में बोल रही है या तो अंकल आंटी पड़ोसी है कोई या तो कोई कोच है या तो कोई नाना नानी मौसा फूफी कोई भी है जो कह रहा है कि बेटा तू कर सकता है। मुझे
(49:28) तेरे पे विश्वास है। या वो बच्चे को जब रो रहा है उसको संभालते हैं। जिसको बोलते हैं इमोशनल सपोर्ट देते हैं। या बच्चों को यह फील कराते हैं कि यू बिलोंग। यू कैन डू इट। यू आर इंपॉर्टेंट। बेटा सुन रहा हूं मैं। तुझे क्या फील हो रही है? बता क्या लग रहा है तुझे? तो वो वो जो ट्रॉमा की इंपैक्ट वो बहुत हद तक कम हो सकती है। तो हम पता है इस पर कैसे आए? हमने स्टडी किया कि यार जो लोग हमारे पास मेंटल हेल्थ इश्यूज लेके आते हैं उनमें सब में ट्रॉमा तो है ही है। ज्यादा है। पर ऐसे बहुत से लोग हैं जिनको ट्रॉमा ज्यादा है पर फिर भी मेंटल हेल्थ इश्यूज
(50:02) नहीं है या बहुत कम है? तो उनमें क्या है? बिल्कुल सही बात। तफावत क्या है? कौन से [गला साफ़ करने की आवाज़] लोग ऐसे हैं इनमें क्या हुआ इनके साथ कि इतना ट्रॉमा होने के बावजूद भी आज वो अपनी लाइफ संभाल रहे हैं। आज वो ठीक-ठाक हैं। उनको कोई चैलेंजेस नहीं है। तब पता चला कि उनकी लाइफ में ऐसे पॉजिटिव चाइल्डहुड एक्सपीरियंस दे रहे हैं। फिर हमने ग्लोबल रिसर्च इंडिया में अभी तो भाई रिसर्च पता नहीं क्यों कोई नहीं कर रहा है। फिर हमने सारा ग्लोबल रिसर्च देखा। तो अभी बहुत नया पिछले कई सालों में ग्लोबल रिसर्च हुआ है व्हिच वैलिडेटेड आवर
(50:32) फीलिंग के यस इट इज द पीसीईस। अगर आप पीसीईस बच्चे की लाइफ में दो तो एसीस की इंपैक्ट बहुत हद तक कम हो सकती है। हर वर्ड का इसका स्टडी है। हां। अच्छा। और ये पीसीस क्या? मतलब बच्चे को ये लगे कि मैं बिलोंग करता हूं। बच्चे को अगर एक कम्युनिटी फीलिंग आए जैसे रिश्तेदारों में बच्चे को लगे कि हां कोई है मेरे अंकल आंटी है, फैमिली है मेरा। उनके बच्चे के दोस्त हैं जिसको जिसके साथ बच्चा बातचीत कर सके। तो ये लोग जल्दी टूट नहीं जाते। इनमें इमोशनल रेिलियंस बढ़ती है। पर जो बच्चा जिसका घर का माहौल खराब है, जो जिंदगी भर यह सुन रहा है कि तू कुछ नहीं कर सकता है।
(51:05) तू बेकार है, तेरे से कुछ होगा नहीं। जो घर में मारपिटाई देख रहा है, जिसको स्कूल में बुलिंग हो रहा है, जिसको टीचर्स ने भी राइट ऑफ कर दिया है, मतलब ये तो बेकार है। उसकी संभावना डिप्रेशन, ए्जायटी, सुसाइड की कई गुना बढ़ जाती है। और जिसके लाइफ में कोई ऐसा एडल्ट नहीं है जो उसको सपोर्ट कर पाए। हम जो स जो अच्छे भले एडल्ट्स हैं हम उनको पूछते हैं। हमने स्टडी करने पर पूछा था कि आपका इतना ट्रॉमा है फिर भी क्यों आपको ये सब नहीं है क्या? बोले नहीं आंटी मैम मेरी दादी थी ना 15 साल तक मेरी दादी थी तो वो मुझे संभालती थी। सुन लेती थी।
(51:37) सुन लेती थी। प्रोटेक्ट करती थी। सुनती थी। अगर मैं कुछ नहीं बोलती थी। उनका कुछ घर में चलता नहीं था। मम्मी पापा के आगे। पर मैं जाके उनके पास रो सकता था। दादी सुनती थी मेरी बात। दादी मुझे सपोर्ट करती थी। या तो कोई बोलता था कि मैम मैं क्रिकेट में जाता था। मेरा कोच था ना जिंदगी भर उसने मेरा हाथ पकड़ा। घर में तो क्या माहौल था मतलब घर में जाता ही नहीं था। घर में जाने से पहले मुझे पैनिकिक होता था कि आज घर में क्या नया होगा ड्रामा। पर बस मेरे क्रिकेट ग्राउंड पे जो कोच थे वो उन्होंने मुझे किसी ने बड़ी किसी गेस्ट से ही मेरी बात
(52:08) हो रही थी। तो हम कुछ इसी चीज पे बात कर रहे थे। तो उन्होंने ये पीसी को बोला था कि मुकुल ऐसे लोग एंज्स होते हैं। यस। तो मैं लोगों को कहती हूं कि अगर आपने चलो आपके बच्चे नहीं है पर आप किसी बच्चे की लाइफ में यह तो अनुभव दे सकते हो ना जरूरी नहीं कि यू हैव टू बी अ पेरेंट अगर आप पेरेंट नहीं हो पर आप एक कोलीग हो आप एक फ्रेंड हो आप एक नेबर हो आप एक अंकल हो आंटी हो मासी हो काका हो तो आप अगर आपके इर्द-गिर्द ऐसे बच्चे हैं जिनको ट्रॉमा हो रहा है उनके मां-बाप नहीं सुधर रहे हैं तो कम से कम आप तो वो बफरिंग एडल्ट बनो उस बच्चे के लिए
(52:40) क्या पता उसकी लाइफ की ट्रेजेक्टरी पूरी बदल जाए आपकी वजह से ये मैं सबको कहती हूं कि जरूरी नहीं नहीं है कि एक अच्छा पेरेंट ही अपने बच्चे को बना सकता है। बच्चे की लाइफ कई बार पेरेंट्स गंदे होने के बावजूद बच्चे की लाइफ बनती है। जब कोई एक या दो इंसान उसकी लाइफ में है जो पेरेंट नहीं है फिर भी उस बच्चे को संभाल लेते हैं। ट्रू अच्छा आपके थ्रू ये बात जरूर जानी चाहिए। जैसे बहुत सारे लोग हैं आज की जनरेशन में जो ये इस पक्ष में भी आ गए हैं कि यार हमको किड्स नहीं करते। है ना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] बहुत बहुत बड़ा वर्ग है। अब उसके लिए बहुत सारे
(53:11) लॉजिक दिए जाते हैं। बताया जाता है कि नई दुनिया बदल रही है। एंटीनेटलिज्म जैसे कांसेप्ट्स आ गए हैं। अब लोग बहुत लिगेसी विगेसी नहीं बोलते हैं। भैया हम अपना जिएंगे और जी के जाएंगे। मत याद रखना उनको। तो उस एक उस तरफ हम बढ़ रहे हैं आधी दुनिया और अभी भी बाकी लोग भी लगे हुए हैं जो उसी प्रोसेस में हैं कि यार अब तो शादी हो गई। अभी मैं कुछ वक्त पहले एक दोस्त से बात कर रहा था। तो उसने बोला कि यार शादी हो गई है अब तो बस बच्चा करना है और ऐसा लग रहा था जैसे कि एक प्रक्रिया है ये [हंसी] कि प्रक्रिया करनी है अच्छा ठीक है तो यार
(53:45) बहुत तनाव हो रहा है जिंदगी में बहुत तनाव हो रहा है समझ नहीं पा रहा हूं मैं कि ये क्यों हो रही है ड्रिफ्ट क्यों आ रही है बड़ी मुश्किल हो जाती है लाइफ ये वो वो मैरिज की प्रॉब्लम्स बता रहा है देन व्हाट ही इज सेइंग एज अ स्यूशन कि यार बच्चा पैदा करना अरे भाई ये तो तो जो लोगों को यह लगता है बहुत बड़ी जनता है जिसको ये लगता है बहुत पेरेंट्स हैं जिनको लगता है कि भैया अच्छा दोनों में लड़ाई हो रही नहीं बन रही अभी बच्चा हो जाएगा सब सही हो जाएगा ऐसे लोग क्या कर रहे होते हैं उस बच्चे के साथ होने वाले बच्चे के साथ क्या करेंगे
(54:16) ऊपर से बच्चा ज्यादा लड़ाई में बड़ा होगा और बच्चे की वजह से और भी लड़ाईयां बढ़ेगी क्योंकि वैसे भी आपका तो कोई मन मन मेल हो नहीं रहा है पैरेंटिंग की वजह से भी बहुत ज्यादा झगड़े हो रहे हैं कपल्स में ऐसे कपल्स हैं जिनकी पहले बहुत अच्छी बनती थी बच्चे आने के बाद झगड़े ज्यादा शुरू हो गए क्योंकि पैरेंटिंग स्टाइल भी खुद के चाइल्डहुड के ऊपर डिपेंडेंट होती है। अभी समझो कि लड़का है ऐसे परिवार में बड़ा हुआ है जहां पे सब छूट मिलती है उसको। लड़की ऐसी बीवी उसकी ऐसे परिवार में से आई है जहां पे बहुत कंट्रोल है। तो बीवी सोचती है कि मेरा अप्रोच सही है। हस्बैंड
(54:46) सोचता है कि मेरा अप्रोच सही है। दोनों की लड़ाईयां होती है। उसमें बच्चा आ जाता है। हम तो बच्चा तो बिल्कुल पिस जाएगा बीच में। हम तो एक तो मैं ये कहूंगी पहले कि कि अगर शादीशुदा जीवन में प्रॉब्लम है तो प्लीज बच्चा मत लाओ। प्लीज मत लाओ। क्योंकि ऊपर से प्रॉब्लम्स मल्टीप्लाई होंगे बच्चे की वजह से क्योंकि बच्चा आने से हॉर्मोनल चेंजेस होते हैं वाइफ में पोस्टमार्टम डिप्रेशन भी आ सकता है और बच्चे के फिर हर डिसीजन में तनाव रहेगा क्योंकि आपको वैसे भी आपका तो कुछ सेटिंग है नहीं अभी बच्चे को कौन सी स्कूल में डालना कैसे खिलाना कब
(55:20) सुलाना बच्चा मस्ती कर रहा है तो उसको मारना चाहिए कि उसको नहीं मारना चाहिए इसमें भी लड़ाईयां होती है तो बच्चा पैदाइश से ही देखता है कि पापा मम्मी तो मैं पैदा हुआ तब से लड़ ही रहे हैं अभी मैं 50 का हूं अभी भी लड़ रहे हैं हम ये बच्चे हैं जो बड़े होकर शादी नहीं करना चाहते। हम कितने लोगों से बात की? बोले मैम शादी में क्या रखा है? हमने देखा है ना बड़े होते हुए मेरे मां-बाप आज तक लड़ रहे हैं। क्यों शादी करनी है? उनकी लड़ाई की वजह से मेरे मेंटल हेल्थ पे इतना इंपैक्ट पड़ा है। मुझे शादी नहीं करनी है। मुझे शादी पे विश्वास ही उठ गया है। क्या मिला है इनको
(55:49) शादी करके? पूरा दिन तो एक दूसरे के गले पे लगे रहते हैं पकड़ के। तो दिस इज अ होल जनरेशन हु डोंट वांट टू गेट मैरिड। आई एम नॉट सेइंग ऑल ऑफ देम का यह रीजन है पर मोस्ट पीपल का यह रीजन है कि उनको लग रहा है कि फायदा क्या हुआ इससे? क्योंकि पेरेंट्स भी कई बार बच्चों में कंफ करते हैं। जैसे मम्मी कंफाइड करती है कि अरे मैं तो इतना गोल्ड मेडलिस्ट हूं। मैंने यू नो एमएससी किया है और देखो मैंने शादी करके मेरी तो जिंदगी बर्बाद हो गई। ये साससुर की सेवा करते-करते ननंद के पैर चूतेचूते घर में सब काम करते-करते मैं तो आधी बूढ़ी हो गई। बेटा तू कभी ऐसा मत
(56:21) करना। हम कहती है मम्मीियां बहुत सारी कहती है। ऐसी मम्मीियां है जो शादी ना करने के लिए भी बोलती हैं। हां बोलती है ना बहुत कहती क्योंकि खुद का फ्रस्ट्रेशन है। बाद में उनको समझ आता है कि मैंने गलत किया। पर जब बच्ची छोटी होती है तो मम्मी को क्या लगता है कि बच्ची मेरी फ्रेंड है। आजकल पेरेंट्स में उनको ये लग रहा है कि भ वेस्टर्न मॉडल हम और वेस्ट का ये बड़ा कांसेप्ट है। कूल पेरेंट्स। तो कूल पेरेंट्स मतलब ये नहीं कि तुम बच्चे को अपना दोस्त मानो। बहुत से मम्मी ऐसा करती है। पापा भी करते हैं बच्चों को दोस्त मानने लगते हैं।
(56:47) नहीं मानना है दोस्त। नहीं मानना है। बिल्कुल नहीं मानना है। बच्चे के लाइफ में बहुत दोस्त हैं अपने उम्र के भाई। उनको मां-बाप चाहिए। मां-बाप की एक अलग जगह है। दोस्त की अलग जगह है। आप वो मिक्स अप मत करो। क्योंकि मां-बाप है जो स्ट्रक्चर दे सकते हैं, जो डिसिप्लिन दे सकते हैं, जो एक प्रेडिक्टेबिलिटी दे सकते हैं। फ्रेंड नहीं दे सकते ये। आप यह बोल रही हैं कि जो यह एक ट्रेंड के लिए हम सुनते हैं और बहुत गुड पेरेंटिंग में माना जाता है कि हम अपने बच्चों को तो एकदम दोस्त की तरह ट्रीट करते हैं। गलत है। बी अ फ्रेंडली पैरेंट बट डोंट बी
(57:18) अ फ्रेंड टू योर पे टू योर चाइल्ड। व्हाट्स रोंग? व्हाट्स रोंग? [गला साफ़ करने की आवाज़] जब दो आप अपने बच्चे को दोस्त की तरह ट्रीट करते हो। आपकी अथॉरिटी चली जाती है। ठीक है? बच्चा कहेगा कि नहीं मैं जो कहूंगा वही मम्मी करेगी क्योंकि वो मेरी दोस्त है। हम तो रिस्पेक्ट नहीं रहती। अथॉरिटी नहीं रहती। जब अथॉरिटी रिस्पेक्ट नहीं रहती तो कोई स्ट्रक्चर नहीं रहता। डिसिप्लिन नहीं रहता। अब बच्चे को बच्चे के डेवलपिंग ब्रेन को स्ट्रक्चर चाहिए। डिसिप्लिन चाहिए क्योंकि उससे उसको सिक्योरिटी और सेफ्टी फील होती है। हम पहले तो ये बाउंड्री फज हो जाती है।
(57:48) दूसरा कि बच्चे की लाइफ में कोई फिगर रहता ही नहीं कि जो बच्चा ये सोच सके कि मैं प्रॉब्लम में हूं। तो एक तो वो खंभा खड़ा रहेगा एक वो बड़े पेड़ की तरह जिसके नीचे मैं जाके जिसकी छांव में मैं बैठ सकूं वो पेड़ ही नहीं। मम्मी तो रोज उठ के दोस्त की तरह मुझे अपने प्रॉब्लम सुनाती है। तो जब मम्मीियां या पापा अपने बच्चों को दोस्त मानने लगते हैं तो एक बहुत बड़ी गलती करते हैं। वो क्या करते हैं? अपने छोटे-छोटे बच्चे को जो इमोशनली भी मैच्योर नहीं है। जिनमें कोई अनुभव नहीं है। ना उनको प्रॉब्लम सॉल्व करने की क्षमता है। उनको अपने सारे प्रॉब्लम शेयर करते हैं।
(58:16) बेटा देखो पापा के साथ मेरी लड़ाई हो गई। अब देखो पापा तो ऐसा ही करते हैं। मैं तो उनको 10 साल से जानती हूं। देखो तुम्हारे पापा कैसे हैं। अब यह कहने से आप क्या कर रहे हो? आपको लग रहा है कि मेरी बेटी दोस्त है। मैं उसके साथ सब शेयर कर रही हूं। पर बेटी के मन में पापा के लिए नफरत हो जाती है। चाहे वह कितना भी पापा अच्छा हो बेटी के लिए पर वह मम्मी का पॉइंट ऑफ व्यू से पापा को देखने लगती है। ऐसी कितनी लड़कियों के साथ मैंने काम किया है मुकुल जी जो कहती हैं कि मैम मेरे पापा के लिए मुझे इतनी नफरत थी हम 25 साल तक क्योंकि मेरी मम्मी ने पूरा
(58:47) टाइम उनकी बुराई की मेरे आगे और अब मुझे जब मैं जब घर से निकली और मैं जब थोड़ी न्यूट्रल हो गई पता चला तब मुझे पता चला कि मेरे पापा इतने बुरे नहीं है। इनफैक्ट मम्मी ने पूरा एक चश्मा मुझे पहना दिया है पापा के बारे में और अभी मुझे मम्मी के लिए ज्यादा नफरत हो रही है क्योंकि मम्मी ने मेरा बचपन ही पूरा मेरे पापा के साथ कोई कनेक्शन ही नहीं करने दिया। समझ में आ रहा है? ये सिर्फ मम्मीियां नहीं करती नॉट दैट कूल। नो नो कूल कूल पैरेंटिंग सी आई वुड से कि सी लोग क्या करते हैं? एक्सट्रीम में चले जाते हैं। कूल पैरेंटिंग इज व्हेन योर
(59:18) चिल्ड्रन कैन कम एंड टेल यू एनीथिंग। अगर बच्चे ने गलती की स्कूल में झूठ बोला पनिशमेंट में तो बच्चे को इतना आपसे डर नहीं होना चाहिए कि वो बता नहीं पाए। उसको कह रहे मम्मी आज स्कूल में मार पड़ी या स्कूल में टीचर मैंने गलती की मैंने चोरी कर ली पेंसिल टीचर ने पनिश किया स्कूल पेरेंट क्या कहते हैं अच्छा बेटा पनिश किया चल मैं टीचर कोई बात नहीं वैसे होता रहता है दिस इज नॉट ओके यू हैव टू टेल के नो बेटा ये गलत किया आपने म उसे बताएगा कौन हां हां उसे बताएगा कौन तो कूल पैरेंट इज वेयर गुड पैरेंटिंग आई वुड नॉट से कूल गुड पैरेंटिंग इज जब आप
(59:47) पेरेंट बने रहो हां आपका बच्चा 30 साल का हो रहा है एडल्ट हो रहा है तब आप एडल्ट वाली बात करो पर आपको छ साल के बच्चे को कह रहे हो कि अरे मुझे तो बिजनेस में बहुत नुकसान हो गया। मेरा तो इतने पैसे चले गए। अभी तो पता नहीं हम रास्ते पे आ जाएंगे। अभी आपके पास शायर सशन भी होगा इसका। पर वो पांच साल के बच्चे के लिए तो जिंदगी भर ये एक बहुत बड़ा ट्रॉमा बन के रह जाता है। क्या फायदा हुआ? वो आपकी हेल्प तो कर नहीं पा रहा है बच्चा। सिर्फ आपका तनाव ले रहा है। तो बच्चे को दूसरी बात जैसे मैंने कहा कि हर ये न्यूरो साइंस कहता है कि बच्चे का
(1:00:17) जब ब्रेन डेवलप हो रहा है तो उसको स्ट्रक्चर चाहिए। उसको सिस्टम चाहिए। उसको डिसिप्लिन चाहिए। हम वरना वह जानवर की तरह हो जाता है। अनस्ट्रक्चरर्ड, अनडिसिप्लिंड, केओटिक तो कौन देगा? अगर आप दोस्त बन गए तो कौन देगा? बच्चे को हेल्दी फियर होना चाहिए मां-बाप का। बच्चे को यह नहीं होना चाहिए कि मम्मी को कुछ भी बोल सकता हूं। बच्चे को यह नहीं होना चाहिए कि मेरी मम्मी को आज मैं कुछ भी लात भी मार। मेरे दोस्त को मैं गाली दूंगा, तो मम्मी को भी गाली दे सकता हूं। नो, दिस इज नॉट ओके। बच्चे को डिस्क्रीशन नहीं सिखा रहे हो आप। बच्चे को
(1:00:44) समझ आना चाहिए कि दोस्त अपनी जगह पे है। पेरेंट्स अपनी जगह पे है। हां, मैं पेरेंट्स को कुछ भी बता सकता हूं। पर मैं बेइज्जती नहीं कर सकता हूं या मैं बाहर जाकर कुछ भी करूं पर घर में मेरे घर में यह रूल है तो यह मुझे फॉलो करना है। हां अगर नहीं फॉलो करना है तो मैं मां-बाप से बात कर सकता हूं कि मुझे आई एम नॉट अग्रेबल विद दिस भाई ये मुझे ठीक नहीं लग रहा है चर्चा कर सकता हूं बट फिर भी जो रूल है वो है तो दैट इज बैलेंस पैरेंटिंग बी अ पेरेंट प्लीज डोंट बी अ फ्रेंड आपके बच्चे के बहुत दोस्त होंगे भाई उसकी उम्र के दोस्त उनको बनाने दो आप अपनी उम्र के
(1:01:18) दोस्त [गला साफ़ करने की आवाज़] बनाओ यह मिक्स मत करो। मिक्स करने से बच्चा कंफ्यूज हो जाता है। और बच्चों की जो एक चीज जो मुझे सबसे ज्यादा लगता है कंसर्निंग वो ये लगता है कि आपको जब घर पे नहीं सुना जा रहा है या आप वो महसूस नहीं कर पा रहे हो तो आप फिर बाहर ढूंढते हो। हां। इसमें दो तरह की चीजें होती हैं। खासतौर से जो मेरी ऑब्जरवेशन है कि लड़के ज्यादातर उस तरफ निकल जाते हैं कि वो नशे की तरफ वैसी दोस्तियां कर लेते हैं जिसमें उनको लगता है कि हां भाई कंफर्ट है। कहीं कोई किसी ने उनको बचा लिया तो उनको कहीं पे सेफ्टी नेट नजर आ रहा है या नशा करने
(1:01:53) लगते हैं। ये सब उम्र 14 15 16 मदर जैसे ही गर्लफ्रेंड अट्रैक्ट करते हैं जो उनका ध्यान उनको बच्चे की तरह रखे हैं। एक्सक्टली या तो यह करते हैं। लड़कियों में भी मैंने जो ऑब्जर्व किया मतलब बहुत सारी मेरी दोस्त उन्होंने दोस्तों ने मुझे बताया कि वो अपने जो पहला प्यार है जो उनको 15 16 की उम्र में हो गया उसको लेकर के इतना गंदा ट्रॉमा है उनके अंदर और [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसकी रीजनिंग जब धीरे-धीरे वही जो कनेक्ट करते हैं डॉट्स तो पता चलता है कि भाई क्योंकि उनको वो फील नहीं हो रहा था लव्ड या उनको ऐसा लग रहा था कि मैं तो वर्थलेस हूं
(1:02:26) हम तो उनको किसी इंसान ने महसूस करवाया कि अरे तुम तो बेशकीमती हो तुम तो तुम तो मेरे लिए मतलब वो [हंसी] इंसान बन जाता है वो इंसान भगवान बन जाता है उसके लिए तो वो और समझ है नहीं समझ है नहीं तो वो लोग इतना गंदी तरह से उस पहले प्यार को याद करते हैं ज्यादातर लोगों के एक्सपीरियंस ऐसे कि अरे यार वो तो मतलब बचपन की ऐसी वो उसके बारे में बात मत किया करो [हंसी] छी सही बात है तो ये दोनों समस्याएं हो रही है लड़कों के साथ भी लड़कियों के साथ भी इसका क्या सलूशन है आपने इसमें क्या ऑब्जर्व किया है मैंने यही बिल्कुल आपने कहा वैसे कि लड़के
(1:03:00) जो होते हैं जो उनके मन में ये है कि भई मुझे मेरी मम्मी जैसी तो बहू चाहिए चाहिए ही नहीं। उसके मम्मी जैसी तो लड़की चाहिए नहीं। क्यों? क्योंकि मम्मी बहुत चिल्लाती है, बहुत अग्रेसिव है। मम्मी बहुत गुस्सा करती है। तो मैं तो भाई ऐसी लड़की ढूंढूंगा जो बहुत शांत है। तो उन उनको जो जो नहीं चाहिए पर कई पर अनफॉर्चूनेटली वो जो शांत के नाम पे जो लड़की को अट्रैक्ट करते हैं वो भी अल्टीमेटली बाद में उनकी मम्मी जैसी ही निकलती है। ये एक मैंने पैटर्न देखा हुआ है। और दूसरा बात जो आप कह रहे हो कि हां जो घर में नहीं मिलता है वो बाहर ढूंढते हैं।
(1:03:31) बहुत सी लड़कियां मैंने देखी हैं जिनको घर में जैसे आपने मैंने कहा ना कि बहुत गंदा एनवायरमेंट है घर में टॉक्सिक वातावरण है घर में उसकी कोई मतलब किसी को पता ही नहीं कि आई गई ये एक्सिस्ट करती भी है कि नहीं तो उसको लग रहा है कि मेरी कोई इसमें वैल्यू ही नहीं है घर में तो सबसे पहला लड़का जो उसको कहता है कि यार तुम तो यार परी हो उसको 50 मैसेज दिन में भेजता है उसको लग रहा है कि अरे मैं इतनी इंपॉर्टेंट हूं इधर मम्मी पापा के आगे तो मैं कुछ बोलती हूं तो सुन सुनते भी नहीं है तो फिर वो लॉजिकल माइंड नहीं काम आता है उधर फिर उधर सर लॉजिक सारा हाईजैक हो जाता है।
(1:04:03) फिर चाहे वो लड़का नश नशा करता हो, कैसे परिवार से आया हो, वायलेंट हो, अब्यूसिव हो वो तब पता नहीं चलता है। वो तब तो वो लड़का उसकी तारीफ कर रहा है। उसको 50 मैसेज भेज रहा है तो फिर उसके साथ भाग जाएगी। छ महीने में पता चलेगा कि ये तो मैंने गलत अट्रैक्ट कर लिया। क्योंकि मैंने और कुछ तो देखा ही नहीं। तो किसी जैसे ना इंग्लिश में कहते हैं बिटवीन द डेविल एंड द डीप ब्लू सी। आप यहां से भागने के लिए वो खाई में से भागने के लिए कुएं में गिरे। ऐसा हो रहा है। लड़कों में भी यह हो रहा है कि अगर घर में उनको सेफ नहीं फील किया घर में तो लड़के ज्यादातर जैसे आपने सही
(1:04:38) बात कही कि वो नशे की तरफ जाते हैं। पोर्नर्न एडिक्शन हो अल्कोहल हो, ड्रग्स हो, स्मोकिंग हो उनसे उनको नम हो जाते हैं। उनको कुछ फीलिंग नहीं आती है। अभी लड़कों को वैसे भी हमारे दिमाग में फील करने की परमिशन दी नहीं जाती है। मैंने कितने मैन से बात की। वो बोलते हैं कि टीनएज इयर्स में भी हम हमें याद नहीं है कि हमारे दोस्तों के आगे हम जाके रो पड़े हैं कि आज घर में पापा मम्मी की लड़ाई हो गई और मुझे इतना डर लगा। इनफैक्ट अगर हम गलती से रो भी पड़े तो हमारी मजाक की जाती थी कि कैसे लड़की जैसा है चुप कर तो लड़कों को हमारे समाज में परमिशन ही
(1:05:07) नहीं है कि वो इमोशंस एक्सप्रेस करें रोए धोए तो वो क्या करते हैं बचपन से ही सीख जाते हैं कि भाई ये सब करो नम हो जाओ कुछ फील ही ना करो या तो फिर घर में जो नहीं मिला वो बाहर ढूंढने जाते हैं जैसे मैंने कहा वो पार्टनर में गर्लफ्रेंड में और वो मिलता नहीं है क्योंकि कहीं ना कहीं आपका ट्रॉमा आपको छोड़ता नहीं है कहीं ना कहीं आपके पीछे अच्छा आता ही है। आपको जो ऑोजिट अट्रैक्ट करता है वो वही ऑोजिट बाद में आपको खटकने लगता है। अच्छा आपने एक बात बोली कि वो अपनी मतलब मां जैसा नहीं चाहती। मां जैसा नहीं चाहता। तो वो मां जो जो प्रॉब्लमैटिक रही होंगी
(1:05:45) शायद उस उस केस में होगा। क्योंकि एक बहुत बड़ा वर्ग है। ये इनफैक्ट जावेद साहब ने भी मां वैसी ही चाहिए। कि मां जैसी चाहिए। वो वो हमेशा पूरी लाइफ कंपेयर ही करते रहते हैं कि तुम सब बहुत बढ़िया करती हो। लेकिन हमारी मां जो ये करती थी। क्योंकि वो मां ने क्या किया है कि वो बच्चे को बहुत लाड़ प्यार से बड़ा किया है। मां की पूरी दुनिया वो बच्चा ही है। तो बच्चा भी उसी माहौल में बड़ा होता है कि मैं सबसे इंपॉर्टेंट हूं। एक एक एक लेडी की लाइफ में एक एक फीमेल की लाइफ में मैं सबसे इंपॉर्टेंट हूं। मैं जो मांगता हूं मिलता है। मैं जो चाहता हूं वो
(1:06:16) होता है घर में। मुझे इतना प्यार मिलता है तो उसको यह लगता है कि फिर मुझे आगे भी यही होना चाहिए। अब जो उसको पार्टनर मिलती है वो जरूरी नहीं है कि वैसी हो या वैसा कर करके थक भी गई हो। हम तो वहां पे भी प्रॉब्लम शुरू हो जाता है क्योंकि तो सशन वो है कि वो समझे कि कहां से आ रहा है। यह हेल्दी है कि अनहेल्दी है कि ये एक्सट्रीम है। कई बार माएं भी बच्चों को सिखाती है कि देखना मैं तो कर रही हूं। अभी तुम्हारी बीवी नहीं करेगी। या तो मैं इतना तुम्हारे लिए कर रही हूं। अभी ढूंढ के ला चल तेरी बीवी करेगी तो मैं देखती हूं। तो माएं मांओं का भी बहुत
(1:06:46) इसमें रोल होता है। वो बच्चे को यही सब सिखाती है। मेहमान आए तो बेटी पानी लेके आती है। बेटा नहीं आता कभी। हम अगर खाने पे गेस्ट आए तो बेटी बर्तन करती है। बेटा बैठ के बातें करता है बाहर। सही बात है। तो यह अनकॉन्शियस कंडीशनिंग यह बोला नहीं जाता है। बट अनकॉन्शियसली बेटे के मन में रोज-ब रोज ये देखता है तो क्या प्रोग्रामिंग होती है कि मेरी बीवी बर्तन करेगी। मैं क्यों करूं भाई? मैं क्यों पानी दूं? ये तो उसका काम है। तो ऐसे ऐसे झगड़े आते हैं आपके पास। ऐसे आते हैं ना? आते हैं ना? आते हैं। हां। ऐसे भी झगड़े आते हैं जहां पे हस्बैंड
(1:07:16) वाइफ की लड़ाई क्यों हो रही है? क्योंकि वाइफ ऐसे माहौल में बड़ी हुई है जहां सब लोग शांत हैं घर में। मतलब कोई जोर से बोलता नहीं है। चुपचाप रहते हैं। अगर झगड़ा भी हुआ ना तो तब दबा देते हैं कि बोलना नहीं है। तो घर में उसने कभी आवाज बड़ी सुनी नहीं है। लड़ाई झगड़े नहीं देखे। है बहुत पॉलिटिक्स बहुत है बट पीठ के पीछे चिक चिक चिक चिक चिक होता रहता है। बड़ी आवाज में कोई बोलता नहीं। अभी ऐसे माहौल में से आई है। शादी होती है ऐसे घर में जहां सब चिकते-चिलाते हैं। हम सब इमोशंस दिखाते हैं। गुस्सा आए तो बहुत एक्सप्रेसिव है। और वो बड़ी हुई ऐसे
(1:07:46) फैमिली में जहां एक्सप्रेशनंस दिखाए नहीं जाते क्योंकि एक्सप्रेशनंस शर्मजनक होते हैं। जो भी बोलो। अब ये लोग शादी करते हैं। तो अभी ये लड़की ये लड़का थोड़ा सा भी एक्सप्रेशन दिखाए तो ट्रिगर हो जाती है। बोले अरे ये तो चिल्लाता है। हम मैं मुझे तो आदत ही नहीं है ऐसी सब सुनने की। लड़का बोलता है अरे भाई मैं तो नॉर्मल हूं। हमारे घर में तो ऐसे ही होता है। हम तो दोनों की रियलिटी अलग है। कोई गलत नहीं है इसमें। हम जो लड़के के लिए नॉर्मल है वो इसके लिए तो मतलब अरे बाप रे ऐसे कैसे बोल सकते हो आप? ये गलत है। तो शी थिंक्स दैट शी इज़ राइट
(1:08:16) एंड हर फैमिली इज राइट। बॉय थिंक्स कि आई एम राइट। माय फैमिली इज़ राइट। इसके फैमिली में तो कोई बोलता ही नहीं मैम। ये लोग तो सब चुप-चुप बैठे रहते हैं। हमारे तो देखो हम तो प्यार भी दिखाते हैं। गुस्सा भी दिखाते हैं। हम तो झगड़ते लड़ते हैं। फिर दूसरे दिन साथ में दारू भी पीते हैं और मजे करते हैं। इसकी फैमिली में तो कोई इमोशंस ही नहीं दिखाते। और यह लड़की की फैमिली बोलती है कि यह लोग तो देखो कैसे जंगली जैसे हम लोग तो बड़े सोफेस्टिकेटेड हम लोग कभी ऐसी ऊंची आवाज में बोलते नहीं ऐसे लोग अभी दिस इज द थिंग अभी शादी के टाइम लव मैरिज की होती है क्योंकि लड़की
(1:08:42) को वो लड़का बहुत पसंद लड़की इतने शांत माहौल में पड़ी उसको लड़का बड़ा अच्छा लगता है क्या जोर-जोर से हंसता है पार्टी की शान है ये तो क्या मस्त लड़का है लड़के को भी अच्छी लगती है अरे क्या कितनी शान कितनी कितनी काम लड़की है ना आ हा पर यही चीज जब साथ में रहने लगते हैं तो खटकने लगती है अभी अभी उसको वही चीज जो जिस पे प्यार आता था उस पे अभी गुस्सा आता है फिर नफरत होने लगती है। एक चीज ये बोली जाती है बड़ा अच्छे तौर तौर पे बोली जाती है। मैं भी कई दफा यूज कर देता था कि आई फॉरगिव बट आई नेवर फॉरगेट हाउ प्रॉब्लमेट इज प्रॉब्लमेटिक इज दिस और
(1:09:17) नहीं है प्रॉब्लमेटिक मैंने इसमें एक पूरा सेक्शन लिखा है फॉरगिवनेस के बारे में और ये आपने बहुत अच्छा क्वेश्चन पूछा देखो फॉरगिवनेस एक मेंटल कांसेप्ट है हम फॉरगिवनेस मतलब क्या आप दिमाग से सोचते हो कि ये बंदे ने गलत किया या इसकी वजह से गलत किया तो मैं उसको माफ कर देता हूं। इट्स एन इंटेलेक्चुअल कांसेप्ट। ठीक है? समझ रहे हो? तो समझो कि एक्सट्रीम केस है कि समझो एक किसी ने एक लड़की को मोलेस्ट किया रेप किया और फिर लड़की ने सालों बाद कहीं गई स्पिरिचुअल गुरु ने बोला कि नहीं यार पिछले जन्म में तो तू लड़का थी तूने इसके किया तो अभी इसको माफ कर दे अभी खत्म
(1:09:49) हो गया तो वो बोल रही है अच्छा इसमें इसको माफ कर दिया हम राइट तो लगता है कि ओके मैंने फॉरगिव कर दिया पर जब मैं उस लड़की को पूछती हूं कि तू बता ना उसके वो मोलेस्टेशन के बारे में क्या हुआ था और जब वो बातें करने लगती है तो उसका बॉडी वही गुस्सा वही हेल्पलेसनेस वही फियर दिखाने लगता है तो यह माफी नहीं हुई। यह क्या हुआ? कारपेट लगा दिया हमने माफी का। समझ रहे हो आप? मतलब बॉडी के अंदर अभी भी वो उसका चार्ज है। समझो दूसरा माइल्डर एग्जांपल देती हूं कि एक लड़की आती है बोल रही है मेरी सास सुबह बहुत मुझे अनापशनाब बोलती है। मैडम मैं ऐसे परिवार में से आई
(1:10:25) हूं जहां कोई गाली नहीं बोलता है और मैं शादी मैंने लव मैरिज की है जहां पे ये लोग देहातीती लोग हैं तो मेरी सास बहुत गालियां बोलती है। तो मुझे इतना उनपे गुस्सा आता है। पर अभी ठीक है मैंने ऐसे सब पढ़ा ये सब बुक्स तो अभी मैं उनको माफ कर दिया कि छोड़ो भाई ऐसी ही हैं। तो अभी मैं अभी कुछ फील नहीं करती हूं या फील करती हूं तो बताती नहीं हूं। माफी फॉरगिवनेस फिर मैं बोलती हूं अच्छा ठीक है अभी पिछले हफ्ते कुछ हुआ था तो बताओ ना क्या हुआ अभी वो बताते बताते ही रो पड़ती है तो ये माफी नहीं हुई मेरे हिसाब से ये इंटेलेक्चुअली आपने एक कोपिंग
(1:10:55) मैकेनिज्म बना लिया है कि चलो माफ कर दिया इसका मतलब ये है कि असर नहीं हुई बट सही माफी कब होती है जब आपने वो पेन को प्रोसेस किया बॉडी में से उसका जो भी इमोशनल चार्ज है उसको रिलीज किया और फिर जो खालीपन आता उसमें आपने एक न्यूट्रल फीलिंग की और इसका टेस्ट क्या है कि जब आपकी सांस आपके सामने आती है या आप उसके बारे में बात भी करते हो तो आपका हार्ट रेट नहीं बढ़ता। आपकी नर्वस सिस्टम एक्साइट नहीं होती है। आपका मसल रिलैक्स्ड होता है। हम इसका मतलब क्या कि बॉडी से माफी मांगी आप। बॉडी से वो न्यूट्रलाइज हो गया। हम समझ रहे हो आप?
(1:11:33) हम तो रियल फॉरगिवनेस अकॉर्डिंग टू मी इज व्हेन यू हैव हील्ड [नाक से की जाने वाली आवाज़] योर बॉडी फ्रॉम द ट्रोमा। नॉट जस्ट द माइंड। इज इट पॉसिबल टू 100% पॉसिबल 100% 100% मेमोरी पे काम करना है ना मैंने क्या बोला ट्रॉमा वाली मेमोरी पे काम करना है आज आप बोलो कि नहीं 5 साल पहले मेरे दोस्त ने मुझे धोखा दिया और मैंने उसको माफ कर दिया क्योंकि मैं बड़प्पन दिखाना चाहता हूं मैं थोड़ा इंटेलेक्चुअली स्मार्ट हूं और मैंने बहुत सा पढ़ा लिखा है और स्पिरिचुअल गुरु ने बोला कि बेटा माफ कर दे तो मैंने मैम उसको माफ कर दिया हम अभी अगर वो दोस्त आपके सामने आता है
(1:12:08) हम हां तो क्या आपके हार्ट में बॉडी में कोई फर्क नहीं पड़ता। न्यूट्रल न्यूट्रल हो आप। क्या दोबारा आप ऐसे ही दोस्त के साथ बिजनेस करोगे तो सही माफी हुई। वरना क्या हुआ पता है? के एक कारपेट लगा दिया। कह रही मैंने चल तेरे को माफ कर दिया। मतलब क्या कि मैं तेरे से बड़ा हूं। मैं तेरे से सही हूं और ठीक है तूने गलती कर दी। मैं ऊपर तेरे से हायर हूं। तो आई फॉरगिवन। इट्स अ कांसेप्ट। बट आगे जाके 5 साल बाद भी अगर वो आपके सामने आया, आपसे बातचीत कर रहा और आप ट्रिगर नहीं हुए हो। दैट मींस आपके बॉडी ने भी माफ़ कर दिया उसको। पर अगर आप ट्रिगर
(1:12:40) हो जाते हो मतलब क्या? फिर आप कहोगे उसकी मुझे शक्ल नहीं दिख। मैंने उसको माफ कर दिया पर अगले पार्टी में मिलेगा तो आप पिछले रास्ते से चले जाओगे। अगर आपसे बात करने आया तो आप मुंह कर दो वो साइड पे कर दोगे या आप वहां से निकल जाओगे। तो इसका मतलब क्या है कि इसका ट्रॉमा आपके बॉडी में अभी भी है। वो अभी भी आपको ट्रिगर कर रहा है। वह अभी भी आपको इफेक्ट कर रहा है। तो आप जो कह रही हैं मतलब जैसे जो हमारे ऑडियंस है और लोग बोलते हैं कि मैं अपने एक्स को कभी माफ नहीं कर सकता। मैं अपनी एक्स को कभी माफ नहीं कर सकता। तो वो कर सकते हैं माफ़। अगर चाहे तो
(1:13:13) अगर चाहे तो कर सकते हैं। बट वही कैसे जैसे समझो अगर आपका जैसे हमने एक थेरेपी में एक प्रोसेस की कि भ चलो तुम्हारी आपकी सांस को देखो यार। अभी ये पिलो में सारा गुस्सा पंच आउट करो। और सांस को जो नहीं बोल पाती थी सब निकाल दो। बहुत सारे शहरों में जैसे खासतौर से दिल्ली, मुंबई, बोर इन सारे शहरों में जहां ये बड़ी-बड़ी इमारतें हैं और इसमें लोग लैपटॉप में लगे रहते हैं। इन शहरों में हम देख रहे हैं आजकल एक बड़ा अच्छा नया अच्छा क्या नया कल्चर बना है जिसमें लोग बाग जाते हैं, सामान तोड़ते हैं। एंगर अपना जो गुस्सा है उसको क्या बोलते हैं?
(1:13:44) उसका टर्म क्या है? कोई बताएं। तो एंगर कुछ तो है मैंने। डिस्ट्रक्शन रूम कुछ इस तरीके का है। शायद कोई ओटीटी पे कोई वो बॉलीवुड वाइब्स के उसमें कुछ दिखाया था। बोर में है। तो मैंने एक अपने एक दोस्त से पूछा बोर में सबसे ज्यादा है। तो उन्होंने आईआईएम वगैरह से पास आउट हैं। हमारे हमारे ग्रुप में सबसे रईस आदमी वही हैं। तो हमने उनसे पूछा एक दिन मैंने कहा कि ये बताओ कि आपके यहां तो बहुत हैं। क्यों हैं? तो उन्होंने मुझे रीज़न समझाया। तो उन्होंने कहा यार मुकुल हमारे यहां पर उन्होंने बताया कि हम जिन बच्चों को हायर कर रहे हैं वो एनआईटी आईआईटी के बच्चे
(1:14:14) हैं। वो आए हुए हैं। उनका काम है कि उनको एक नाम डालना है वेबसाइट पे और उनको ये चेक करना है दिन में कई बार कि भाई वेबसाइट का नाम डालने पे वो रैंक कौन सी नंबर पे कर रही है। बहुत बेसिक सा कुछ काम है। और ये उसे करना है जिसके उसको बहुत पैसे मिल रहे हैं। इतने पैसे मिल रहे हैं कि मतलब बहुत मिल रहे हैं। हां। लेकिन वो कर क्या रहा है? उसने इसके लिए इतनी पढ़ाई की, इतने इतने ज्यादा घर वाले उसके गर्व कर रहे हैं कि अरे भाई बहुत अच्छी नौकरी लग गई है। लेकिन उस अच्छी नौकरी में वो ये काम कर रहा है जिसकी उसकी तनख्वाह बढ़िया मिल रही है।
(1:14:49) हां। किसी एक दिन ऐसी जरूरत पड़ेगी जिस दिन के लिए उसको तैयार रहना है। हां। उसके लिए कंपनी उसको इतना पे कर रही है। अब बोलेगी वो तुम्हें लग रहा है या सबको लग रहा है कि बहुत पैसे कमा रहा है। क्या क्रेजी लाइफ है ये है वो है। बट अल्टीमेटली उसने कभी भी ये करने के लिए तो ये सब नहीं किया था। करेक्ट डिसल्यूुजनमेंट हो जाता है। वो जा रहा है। गुस्सा निकाल गुस्सा। गुस्से दो प्रकार के होते हैं। खुद पे गुस्सा और दूसरों पे गुस्सा। हम हम खुद पे गुस्सा आता है ना। वो लोग अपना सर पटकते हैं। देखा है आपने? या काटते हैं, सर पटकते हैं, बाल खींचते हैं खुद के। या
(1:15:20) तो सेल्फ साबोटाजिंग बिहेवियर करते हैं जिसको हम बोलते हैं कि खुद को हानि पहुंचाए वैसे इनडायरेक्ट बिहेवियर्स जैसे नशा करना शराब पीना या जभी भी जॉब बार-बार बदलना ऐसा लगे कि अभी जॉब में ठीक चल रहा है तभी वो जॉब छोड़ देगा अनकॉन्शियस सेल्फ साबोटाजिंग बिहेवियर हम तो खुद के ऊपर गुस्सा और दूसरा दूसरे के ऊपर गुस्सा जब किसी ने आपके साथ गलत किया हो या किसी ने आपको सप्रेस किया हो या जो भी हो मां-बाप हो टीचर हो जो भी हो तो ये दो किस्म के गुस्से अभी गुस्सा इज़ लाइक अ बम ब्लास्ट ये अगर आपने शरीर के अंदर दबा के रखा है जैसे जैसे ग्लास में मैंने गन
(1:15:50) पाउडर भरभ के भरा है ये ग्लास में और अब एक यहां पे एक चिंगारी आई तो पूरा ब्लास्ट हो जाएगा ना पर दबाना मतलब क्या ढक्कन लगा देना तो लोग ज्यादातर हमारे सोसाइटी में क्या है एक्सप्रेस नहीं करने देते बच्चे को अगर गुस्सा आया तो हम क्या कहते हैं बेटा गुस्सा थूक दे थूकना स्टिल ओके बट बेटा गुस्सा मत कर गुस्सा मत कर यू नो बच्चा रो रहा है तो रो मत रो मत चल मैं तेरे को बूंस दिलाती हूं चल एक और टॉय दे देती हूं चल आधा घंटा फोन और यूज़ कर ले बेटा बट रो मत मैं पोटैटो चिप्स बना देती हूं तू रो मत तो हम क्या कहते हैं बच्चों को कि ये सारे नेगेटिव इमोशंस दबा दो भाई।
(1:16:20) निकालो मत। हम तो बॉडी की एक नेचुरल प्रोसेस होती है। ये सारे नॉर्मल इमोशंस हैं। गुस्सा, दुख, हेल्पलेसनेस, डर ये जब हम निकालेंगे नहीं एक्सप्रेस नहीं करेंगे तो दबे रहते हैं अंदर। एक इनकंप्लीट प्रोसेस की तरह और फिर वो गलत जगह पे निकलते हैं। गलत जगह पे ना निकले इसलिए ऐसे क्लनिक्स की जरूरत है जहां पे वो लोग जाके सब तोड़फोड़ करते हैं। उसके बाद उनको बहुत हल्का लगता है। मदद करता होगा। 100% हम थेरेपी में भी यह करवाते हैं। मेरे थेरेपी में कितने लोग आके ओ हो कितने टॉवल्स फाड़ चुके हैं। कितनी कितने कागज फाड़ चुके हैं। कितने पिलोस पे पंच कर
(1:16:54) चुके हैं। कितनी किक्स मार चुके हैं। क्या-क्या गाली गलौज दे चुके हैं। मेरी तो गालियों की वोकैबलरी हर भाषा में बढ़ गई है बाप। अभी देखो टीचर आपको हर रोज डांटता है मारता है। और आपके मुंह में यहां तक गाली आ गई है टीचर के लिए। बट आप बोल नहीं सकते भाई खराब है तो वो कहां सब गुस्सा अंदर रहता है। फिर हम थेरेपी में जब ये गुस्सा निकलवाते हैं ना उनको फिर ये निकलता नहीं है तो क्या होता है गलत जगह पे निकलता है या तो हेल्थ इश्यूज होने लगते हैं डायबिटीज ब्लड प्रेशर क्योंकि क्या है अंदर प्रेशर बिल्ड हो रहा है बाहर नहीं आ रहा है या तो बीवी पे निकलता है बच्चों पे
(1:17:23) निकलता है घर के काम वालों पे निकलता है गुस्सा पर जब हम थेरेपटिक स्पेस में निकालते हैं जब वो पंचवंच करके जाते हैं सारा टीचर टीचर को सामने विजुअलाइज करके पूरा गाली 5 साल की उम्र से 15 साल में जो देना था दे दिया फिर बोलते हैं मैम अभी-अभी इतना खालीपन लग रहा है अभी यहां पे फिर हम क्या उनको कहते हैं कि भ इसकी जगह पे कोई पॉजिटिव फीलिंग आप फील करो। हां मैं हवाई पे गया था। उधर मैं ना बीच पे बैठा था। बड़ी शांति लग रही थी। चलो वो फील करो। तो उनके बॉडी में क्या होता है कि एक जो दबा हुआ जो प्रेशर है वो सिटी की तरह निकल जाता है
(1:17:52) और दूसरा प्रेशर फिर नहीं बनता है। ये वो लोग हैं जिनको एंगर का इशू है वो वाले लोग। हां हां। फिर हम ईएफटी टैपिंग भी सिखाते हैं। तो हमारे बुक में एक पूरा एक सेक्शन है जिसमें हमने सेल्फ रेगुलेशन टेक्निक सिखाई है। जो टेक्निक्स करके आपको थेरेपी की जरूरत नहीं पड़ेगी। वो टेक्निक्स करके आप खुद ही ये सब निकाल सकते हो। जैसे एक टैपिंग टेक्निक है जिसमें आपको बहुत गुस्सा आ रहा है तो दो चार राउंड करो जो भी गुस्सा आ रहा है सब बोल दो टैप करते बोल दो ब्लो आउट करो फ के निकाल दो तो यू विल जस्ट योर बॉडी योर बॉडी इज इज नॉट इंटेलेक्चुअल योर
(1:18:20) बॉडी इज वै बेसिक बॉडी को लग रहा है कि निकल गया सब दो तीन टेक्निक्स बता दीजिए आप सब गुस्से तो हमने जैसे इस ये बुक में हमने एक पूरा सेक्शन लिखा है जिसमें हमने लोगों को जिसको चाइल्डहुड ट्रॉमा है जिसको ऐसा एंगर इशू है स्ट्रेस है उनके लिए ऐसी टेक्निक सिखाई है जिससे उनकी नर्वस सिस्टम रेगुलेट हो जैसे हमने शुरू में बात की थी ना कि जब हमको बहुत तनाव है, बहुत स्ट्रेस है तो नर्वस सिस्टम हमारे डिसरेगुलेट हो जाती है। मतलब फाइट फ्लाइट फ्रीज मोड में रहती है और ये मोड में आना उसको आता नहीं है। तो नर्वस सिस्टम को रेगुलेट करने के तरीके
(1:18:48) बहुत आसान है। एक तो हमिंग है। सिंपल हमिंग जो हमने बुक में बताया है। हम करके सिंपल मेरे हस्बैंड ने उस पर पीएचडी किया हुआ है। हमिंग पे हां हमिंग पे हमिंग की पॉजिटिव इंपैक्ट है। कार्डियोवस्कुलर सिस्टम पे इम्यून सिस्टम पे कंसंट्रेशन फोकस फीलिंग ऑफ पॉजिटिविटी रिमूवल एंड बेस्ट इज़ इंसोमिया पे पॉजिटिव इंपैक्टिया मतलब साइंटिफिक है ही हैज़ डन अ पीएचडी हां हमने हॉल्टर वाटर लोगों पे लगा के मेजर किया है कि भ नींद में ज्यादा रेस्ट मिलता है कि हमिंग से तो हमिंग से ज्यादा रेस्ट मिलता है नींद से भी ज्यादा हां डीप ब्रीथिंग से भी ज्यादा
(1:19:19) ओ हां तो हमिंग इज अ वेरी पावरफुल टेक्निक टू रेगुलेट द नर्वस सिस्टम और इसमें कोई मुद्रा मुद्रा नहीं है जस्ट सिंपल हमिंग 25 राउंड राउंड से शुरू करो। 20 मिनट तक जाओ। यह हम 3 साल चार साल के बच्चों को भी करा सकते हैं। इससे कंसंट्रेशन फोकस सब बढ़ता है। तो इस पे ये भी रिसर्च बुक में डाला हुआ है। कभी भी कर सकते हो। खाली पेट भरा पेट कोई कंडीशन नहीं है। हमिंग है। दूसरा कोहेरेंट ब्रीथिंग है। हार्ट फोकस ब्रीथिंग है। एक रिदममिक ब्रीदीिंग है जिसका रिसर्च हार्ट मैथ इंस्टट्यूट ने किया है यूएस में। तो उस उसका मैंने स्टडी किया है। मैं उसकी सर्टिफाइड कोच हूं। तो
(1:19:50) वो को वो एक डिवाइस आता है। डिवाइस के साथ भी कर सकते हो। डिवाइस के बगैर भी कर सकते हो। तो उसमें क्या रहता है कि आपका हार्ट की जो सिग्नल्स है वो एक रिदममिक पैटर्न में बनती है बिकॉज़ ऑफ़ द ब्रीथिंग। और वो हार्ट की जो रिदममिक सिग्नल है वो ब्रेन में जाती है। तो ब्रेन को लगता है कि सब ठीक है। चाहे कितना भी तनाव चल रहा हो। तो कोहेरेंट ब्रीथिंग से आप अभी ये सब सारी टेक्निकें कैसी है कि एक दिन में नहीं होगा। हम जैसे आपको साइकिल सीखने में कैसा टाइम लगता है? अभी साइकिल एक बार सीख ली फिर आपने बीच में 20 साल नहीं चलाई पर जब भागना पड़ा तो आप चला सकते हो।
(1:20:18) तो ये मसल मेमोरी बननी चाहिए। तो यह सारी टेक्निक्स टाइम लेती है। तीसरा हमने सिखाया ईएफटी इसमें डाला हुआ है जो सारा कचरा निकालने का काम करता है। जैसे रात को सोते हैं लोग तो उनको क्यों नहीं नींद आती? क्योंकि बहुत ओवरथिंकिंग करते हैं। आज मेरी कोलीग ने ये बोला ना मुझे ये बोलना चाहिए तो पूरे डायलॉग के डायलॉग चलते हैं लूप में। राइट? बॉस ने कुछ बोला अभी मैंने बोल तब नहीं बोला पर मैं ये सब बोलता अगर मुझे मौका मिलता। सो ओवरथिंकिंग वो सारी चीजें ईएफटी से निकल जाती। क्या है ईएफटी? ईएफटी का पूरा हमने डिस्क्राइब किया। एक पूरी स्टेप प्रोसेस है। इसमें टैपिंग करते
(1:20:46) हैं। इवन दो और हालांकि हां हालांकि मुझे अभी बहुत गुस्सा आ रहा है। मुझे लग रहा है कि मैं इसका गला दबा दूं। बहुत नालायक इंसान है। बट फिर भी मैं ये सारी अपने आप को स्वीकारती हूं और ये सारी इमोशंस को रिलीज करती हूं। ये कर करके सारा टैपिंग अलग-अलग मेरीडियन पॉइंट पे टैप करना होता है। फिर ब्लो करना होता है। अपनी आई मूवमेंट्स करनी हो ताकि ब्रेन की इंटीग्रेशन हो जाए और फिर ये तीन चार राउंड करो तो आपको लगेगा अभी खाली सब ब्लैंक हो जाता है। और वो सब निकल जाता है। नाइस करूंगी। तो ये ईएफटी भी है। इसकी भी वीडियो मेरे YouTube पे है। हिंदी में,
(1:21:15) इंग्लिश में और उसके मैंने क्यूआर कोड डाले तो वो वीडियो जिन जिसको सीखना है हिंदी में भी है, इंग्लिश में भी है। प्लीज फ्री में YouTube चैनल पर देख लो। दिस इज अ हेल्दी वे। हम कहते हैं मां-बाप को कि आप बच्चों को भी सिखाओ। क्योंकि बच्चे को भी क्या होता है कि स्कूल स्कूल से आता है टीचर पे गुस्सा है, दोस्त पे गुस्सा है। तो अगर बच्चों को ये सिखाओ तो वो क्या करता है कि उसको समझ आता है कि भाई ये हम बिना किसी को मारे पीटे बिना किसी को डांटे करे हम इसको पॉजिटिवली बॉडी से निकाल सकते हैं। हम पर ये मां-बाप जब खुद करेंगे तो बच्चे
(1:21:44) सीखेंगे ना। बच्चे तो यही सीखते हैं कि जब गुस्सा आएगा तो चपट लगा लो। खत्म हो गई बात। तो आई वांट टू टेल दैट यू हैव टू डू इट फॉर योर चिल्ड्रन टू लर्न। है ना? तो ये बहुत सी टेक्निक्स हमने लोगों को बताई है। तो पहला पहला अगर आपको चाइल्डहुड ट्रॉमा हुआ है तो सबसे पहला तरीका है इसमें मैंने क्वेश्चनयर दिया है 14 पॉइंट क्वेश्चनयर उसमें आप मार्क करो कि कितना है आपका। फिर उसमें मैंने सारे फॉर्म्स दिए हैं जो आप भरो तो पता चलेगा कि आपका कितना कॉम्प्लेक्सिटी केस है। आपका ट्रॉमा का कितना इंटेंस है। उस हिसाब से हमने इसमें बताया है कि आपको कैसे
(1:22:16) ट्रीटमेंट चाहिए होगी। अगर आपको अगर मिनिमम ट्रॉमा है। अगर आपकी कॉम्प्लेक्सिटी कम है तो सिर्फ ये टेक्निक्स करने से आपको ठीक हो जाएगा। गाइडेड [नाक से की जाने वाली आवाज़] विजुअलाइजेशन टेक्निक है जिसमें आप बैठते हो एक रिलैक्स स्टेट में बैठते हो और जो पूरी रिसर्च के ऊपर आधारित है जिसको हम बोलते हैं सेल्फ हिप्नोसिस प्रोटोकॉल 20 मिनट की प्रैक्टिस है जिसमें आप हमिंग करते हो फिर कोरेंट ब्रीथिंग करते हो फिर एक पॉजिटिव इमोशन को जागृत करते हो ताकि वो वाले हॉर्मोन सीक्रेट हो ऑक्सीटोसिन एंडोर्फिन जो आप साइकेटिस्ट गोलियों में
(1:22:43) देता है आपको और फिर आप एक विजुअलाइज करो जो आपको पॉजिटिव जैसे अब सपोज मेरा प्रॉब्लम है कि मैं बच्चों को बहुत चिल्लाती हूं सपोज और मुझे बनना है शांत पेरेंट तो मैं अभी मैं बच्चे चिल्ला रहे हैं फिर भी मैं बहुत शांति कर रही हूं। मेरे शोल्डर्स बड़े रिलैक्स है। मेरा बहुत शांत है। अब ये मैं जब बार-बार वो वाले स्टेट में जब विजुअलाइज करूंगी तो मेरे माइंड में वो नए प्रोग्राम बनना शुरू हो जाएंगे। मैं सबको बोलती हूं चाहे आप पेरेंट हो के ना आओ पर आप ऑफिस से घर जाओ तो पार्किंग लॉट में गाड़ी में बैठ के 20 मिनट हमिंग करके जाओ ना आपका पूरा माइंड
(1:23:17) फ्रेम बदल जाएगा घर। सबको जरूरत है भाई। आप सड़क चल रहे होते हैं। हम देखते हैं कि लोग कैसे बिहेव कर रहे हैं। जरा सी गाड़ी छू गई उस पे मरने मारने पे आ जा रहे हैं। क्योंकि उनका उनका उनका ब्रेन जैसे मैंने कहा ना कि चाइल्डहुड ट्रॉमा की वजह से जो इंपल्स जनरेट करने वाला ब्रेन है ब्रेन सेंटर है एमगडेला और ब्रेन स्टेम जो इंपल्सिव बिहेवियर जनरेट करता है। क्यों? क्योंकि दैट इज रिस्पांसिबल फॉर सर्वाइवल इंस्टि्स जैसे खाना पीना सोना लड़ना सर्वाइव करना वो ब्रेन ज्यादा डेवलप होता है जो बच्चों में ट्रॉमा होता है वो वो पार्ट ज्यादा ओवर डेवलप्ड होता है और
(1:23:52) जो आपका ब्रेन सेंटर है प्रीफ्रंटल कॉेक्स जो यहां फोरहेड के पीछे है पूरा ऐसा एक कवरिंग रहता है वो 25 साल तक डेवलप होता है जिसमें होता है लॉजिकल थिंकिंग रैशन थिंकिंग कि मैं ये करूंगा तो उसको कैसे लगेगा अभी मैं यहां आज ये करूंगा तो 2 साल बाद इसका क्या इंपैक्ट पड़ेगा? तो एग्जीक्यूटिव फंक्शन, लॉजिकल थिंकिंग, फीलिंग अबाउट अदर पीपल्स फीलिंग्स यह सब प्रीफ्रंटल कॉेक्स का काम है। और इंपल्स कंट्रोल करना भी प्रीफ्रंटल कॉेक्स का काम है। जिन बच्चों में सीिवियर ट्रॉमा है बचपन में उनका ये अंडर डेवलप्ड होता है। इसीलिए ये बच्चे आपको इंपल्सिव लगेंगे।
(1:24:27) इसीलिए ये बच्चे नशों की तरफ जाएंगे। एडिक्शन सबसे ज्यादा जो एडिक्ट एडिक्स होते हैं उनमें चाइल्डहुड ट्रॉमा बहुत हाई रहता है। जो बच्चे ज्यादातर नशा कर रहे हैं उनमें चाइल्डहुड ट्रॉमा का यस बैकग्राउंड है। 100% 100% ये तो रिसर्च कहता है मैं नहीं कह रही ग्लोबल रिसर्च है। चाइल्डहुड ट्रॉमा इज कनेक्टेड टू एडिकशंस, क्रिमिनल बिहेवियर्स, क्रॉनिक हेल्थ कंडीशंस जैसे ऑटोइ्यून डिसऑर्डर्स, कार्डियोवस्कुलर डिजीजसेस, थिंग्स लाइक कैंसर, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर जो बहुत जल्दी आ जाते हैं। क्यों? क्यों? क्योंकि चाइल्डहुड ट्रॉमा से आपकी पूरी नर्वस सिस्टम डिसरेगुलेट हो
(1:25:00) गई होती है। आपकी नर्वस सिस्टम हमेशा इट्स लाइक अ कार दैट यू आर ड्राइविंग विदाउट ब्रेक्स। क्या होगा वो गाड़ी का? तो इसका भी आउटकम है। और ये जनरेशंस तक आती है। रिसर्च ये कहता है कि इट गोस जनरेशन टू जनरेशन। पास ऑन होता है। 100% पास ऑन होता है। इसी तरह पास ऑन होता है। क्योंकि अगर आपने समझो समझो यू हैव गॉन थ्रू ट्रॉमा। आप इसलिए आपका इंपल्स सेंटर बहुत एक्टिवेटेड है। इंपल्स कंट्रोल वाला सेंटर अंडर एक्टिवेटेड है। हिपोकस जो आपका लॉन्ग टर्म मेमोरी सेंटर है वो श्रिंक हो जाता है बिकॉज़ ऑफ़ ट्रॉमा। इसलिए आपको कोई मेमोरी नहीं होगी। आप
(1:25:30) कहोगे ना मुझे कोई मेमोरी नहीं है 12 साल के पहले की। ट्रॉमा की वजह से बच्चों की याददाश्त पे असर पड़ता है। और ये एक साइक्लिकल ट्रॉमा रहता है। मतलब देखो जो बच्चा घर में माहौल खराब है ना वो पढ़ाई में अच्छा नहीं होगा। हम ज्यादातर पढ़ाई में अच्छा नहीं इसलिए और पिटता है। जितना पिटता है उतना कॉर्टिजोल वाला ब्लड ब्रेन में जाता है। हिपोकैंपस जो मेमोरी सेंटर है लर्निंग वो वो श्रिंक हो जाता है तो और भी उसकी मेमोरी खराब होती जाती है। तो और पिटता है और भी खराब होती है मेमोरी। मैं पेरेंट्स को बोलती हूं अगर आपका बच्चा कुछ याद नहीं कर पा रहा है।
(1:25:59) अगर उसको एग्जाम का स्ट्रेस है तो सबसे पहले उसको शांत कराओ। आप [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसको स्ट्रेस में डाल के पढ़ाओगे ना तो वो याद नहीं रख पाएगा। क्योंकि जो लॉन्ग टर्म हिपोकैंपस जो ब्रेन में है ना वो लॉन्ग टर्म मेमोरी का सेंटर है जो आपको मेमोरी रिट्रीव कराता है। हम वो रिसर्च कहता है कि ट्रॉमा से वो श्रिंक हो जाता है। तो बेसिकली आप ये कह रहे हो कि जितने भी तरह के एडिक्शन है चाहे ड्रग एडिक्शन हो, अल्कोहलिज्म हो, पोर्न एडिक्शन हो, दीज़ ऑल आर रिलेटेड टू रिलेटेड दे आर नॉट डायरेक्ट कॉजेशन। इट इज़ इट इज़ इट इज़ नॉट कॉजेशन इट इज़ अ कोरिलेशन।
(1:26:30) अच्छा। रिसर्च में इसका फर्क क्या है? मतलब जिस जिन सबको चाइल्डहुड ट्रोमा हुआ है वो सब अल्कोहलिक नहीं होंगे। ठीक है? पर जो अल्कोहलिक्स हैं हम उनमें ज्यादा से ज्यादा चाइल्डहुड ट्रॉमा वाले होते हैं। ओके गॉट समझ रहे हो आप? हां आप समझ गए। सेम फॉर सुसाइड बिहेवियर्स। अगर समझो 100 लोगों ने सुसाइड किया है हम तो उसमें से 90% लोगों में चाइल्डहुड ट्रॉमा होगा। बट जिसमें चाइल्डहुड ट्रॉमा है वो सब सुसाइड करने नहीं जाएंगे। हम दिस इज़ व्हाट रिसर्च सेस। अच्छा। क्यों? क्यों? क्योंकि बहुत से फैक्टर्स हमने देखे ना अगर चाइल्डहुड ट्रॉमा है बट
(1:27:03) अगर पीसीई है, पॉजिटिव चाइल्डहुड एक्सपीरियंस है, आपको बफरिंग एडल्ट मिला है तो आपका ट्रेजेक्टरी अलग होगा। हम पर अगर आपका चाइल्डहुड ट्रॉमा हुआ है, कोई बफरिंग एडल्ट नहीं है। आप पूरा जिंदगी अकेला महसूस किया है, सपोर्टेड नहीं महसूस किया है। या तो आप परफेक्शनिस्ट बन गए हो ट्रॉमा की वजह से। आप पूरा टाइम आपने सक्सेस बैक टू बैक सक्सेस अचीव किया है। आप कभी फेल ही नहीं हुए हो। और इसके प्रेशर में आप डिप्रेशन और लोनलीनेस महसूस करते हो। और आप एडिक्शन की तरफ चले जाते हो। यह भी होता है। 100% होता है। सक्सेस मतलब आपके इर्द-गिर्द सक्सेस रही
(1:27:34) है हमेशा। आप सक्सेसफुल रहे हो तो दुनिया के लिए है ना भाई। अंदर क्या चल रहा है आपको पता है? हमारे पास बहुत हमारे यहां बहुत सक्सेसफुल लोग हैं। एक बहुत इंटरेस्टिंग बात बताता हूं। सो नीरजा चौधरी जी हैं। जर्नलिस्ट हैं बहुत वेटन जर्नलिस्ट। उन्होंने एक किताब लिखी हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड। उस किताब में उन्होंने शुरुआत जो की है सोचिए आप कि उन्होंने पूरे प्रधानमंत्री जो रहे हैं उनकी जो बातों की पहला पन्ना है उसमें वो सारे प्रधानमंत्रीियों की लोनलीनेस पे बात करती हैं और उसमें बताती हैं कि इंदिरा गांधी जी के कमरे उन्होंने बताया उन्हें कि पता चला कि
(1:28:05) जब उनके कमरे में कोई दाखिल होता है तो उन्होंने बताया कि मुझे पता चल जाता है कि क्यों आया है। अटल बिहारी वाजपेयी साहब की लोनलीनेस की बात की है उस किताब में। शुरुआत होती है यहां से। हम तो इसका मतलब ये होता है सी व्हाट हैपेंस इज यू नो बट व्हाई इज इट सो मतलब जैसे अ सक्सेसफुल आदमी जैसे लोनली नहीं सब सक्सेसफुल लोनली नहीं होते बट लोनली वाले लोग सक्सेसफुल हो सकते हैं हम समझ रहे हो आप लोगों को सक्सेस दिखता है मतलब क्या अच्छा इसके पास पैसे हैं गाड़ी है उसके पास बहुत अच्छा करियर है या बिजनेस है पर उसके अंदर की दुनिया क्या है
(1:28:36) आपको पता है हमारे पास कितने क्लाइंट्स आते हैं जो बाहर से इतने सक्सेसफुल दिखते हैं आपको लगेगा कि इसकी लाइफ भगवान मुझे एक दिन के लिए दे दो पर उनके अंदर अंदर है इनसिक्योरिटी। सुबह उठ के सब कुछ चला जाएगा तो मैं क्या करूंगा? मुझे कैंसर हो गया तो मैं क्या करूंगा? मेरे बच्चों के साथ मेरा कनेक्शन नहीं है। बच्चे मेरे से दूर भागते हैं। मैम कल को मैं बेड पे आ गया, बिस्तर पे आ गया तो मेरे बच्चे मेरे के सामने देखेंगे भी कि नहीं? ये लोग दुनिया को नहीं बताएंगे ये सब। ये इनके अंदर का लोनलीनेस है। अंदर ही चल रहा है। लैक ऑफ सोशल सपोर्ट आ
(1:29:04) रहे हैं मेरे से। इनके बच्चों को भी इरादा है कि मेरे से कुछ ले। इनको विश्वास नहीं है किसी पे। क्योंकि बचपन से इनका ट्रॉमा इस तरह का रहा है कि दे हैव ग्रोन अप इन वेरी अनसेफ एनवायरमेंट्स। देखिए परफेक्शनिज्म ज्यादातर कहां से आता है? इनसिक्योरिटी क्यों आती है? दो तरीके से आती है। जब बचपन में बच्चे को ये मैंने बहुत सारे हाई अचीवर्स देखे हैं। उनके घर का माहौल इतना खराब है कि उनको पढ़ाई के अलावा कोई ऑप्शन ही नहीं है। मतलब उनको यह है कि भाई एक चीज मेरी लाइफ में जो अच्छी है वो कि मैं क्लास में फर्स्ट आता हूं। बाकी घर में इतना सब खराब
(1:29:36) है कि मैं एक चीज तो सही करूं। दैट इज द ओनली थिंग इन माय कंट्रोल कि मैं हर बार फर्स्ट आऊं और जैसे ही मैं फर्स्ट आऊं 12th के बाद इट विल गिव मी अ टिकट कि मैं यहां से निकलूं भाई यहां से भागूं तो लोग इसकी तारीफ करते हैं तो ये बच्चा क्या सीख जाता है कि यार दिस इज मी आई एम अ परफेक्शनिस्ट मतलब नथिंग शुड गो रोंग दूसरा परफेक्शनिज्म कम्स फ्रॉम व्हेन द चाइल्ड ग्रोस अप इन अ लॉट ऑफ़ इनसिक्योरिटी एंड अनसर्टेनिटी। जैसे घर पे स्ट्रक्चर नहीं है, सिक्योरिटी नहीं है। कैसे घर में होता है जब मम्मी को मेंटल हेल्थ इश्यूज होते हैं, घर में लड़ाई झगड़े होते हैं।
(1:30:06) पापा अल्कोहलिक हैं। तो घर में क्या है? कोई किस्म का प्रेडिक्टेबिलिटी नहीं होती है। ग्रोइंग ब्रेन को प्रेडिक्टेबिलिटी चाहिए कि भ सुबह नाश्ता मिलेगा फिर मैं स्कूल जाऊंगा। आऊंगा तो मम्मी घर पे होगी या कोई होगा, फिर हम खाएंगे, फिर हम सो जाएंगे। एक स्ट्रक्चर पर जिनके घर में अल्कोहलिक फादर है, लड़ाईयां होती है, उनको हर रोज सुबह उठ के ये होता है कि आज क्या नया ड्रामा होगा भाई घर में। आज क्या होने वाला है? तो उनका एक सिस्टम ये हो जाता है कि नथिंग इज सर्टेन इन लाइफ। सो द ओनली थिंग आई कैन डू इज बी परफेक्ट इन व्हाट आई एम डूइंग। दैट
(1:30:35) विल गिव मी अ सेंस ऑफ कंट्रोल। तो मैं एक जो ओरिजिनल बात ये थी कि जो बाहर से जो सक्सेसफुल लगते हैं जरूरी नहीं है कि वो एक्चुअली सक्सेसफुल हो। और जो लाइफ में सक्सेसफुल है वो जो अंदर से सही है ना वो कई बार बाहर से सक्सेसफुल हमें दिखते नहीं है। दे मे बी नॉर्मल पीपल जो बहुत अच्छे पेरेंट्स हैं। बच्चों को बड़ा करते हैं प्यार से आराम से अपनी जिंदगी जी रहे हैं। कुछ बड़ा कुछ तोड़फोड़ काम नहीं करते हैं। हां एक गाड़ी है उनके घर पे चलाते हैं। पर बच्चों को मेमोरी देते हैं। बच्चों को उनके लिए इतना प्यार है कि वो मां-बाप जब बूढ़े होते हैं तो
(1:31:07) बच्चे उनकी सेवा करते हैं। उनके बगैर रह नहीं सकते हैं। यह वो बच्चे जिनको लग रहा है कि नहीं मेरे मां-बाप ने मेरे लिए सब कुछ अच्छा किया है और मुझे भी उनके लिए करना है। दिस इज पर यह सक्सेसफुल शायद नहीं दिखते हैं। हमारे पास बहुत क्लाइंट्स आते हैं जो बाहर से बहुत सक्सेसफुल दिखते हैं पर हमें ही पता है अंदर का सब कीचड़ कैसा है घर में। हम बच्चों को फिर सारा ट्रांजैक्शनल रिलेशनशिप हो जाता है। यह जो ये जो परफेक्शनिस्ट होते हैं वो 7 दिन हफ्ते के काम करते हैं। अपने बच्चे के लिए घर पे होते ही नहीं है। मिसिंग पेरेंट बच्चे को उनके लिए कोई कनेक्शन ही नहीं
(1:31:38) है। जब बच्चा कंप्लेंट करता है तो गिफ्ट ला के दे देते हैं। तो बच्चे भी इसी तरह बड़े होते हैं कि पापा से कुछ चाहिए भाई तो पैसे मांग लो। जितने पैसे निकलवाने हैं निकालो और कुछ एक्सपेक्ट मत करो पापा से। यह बहुत फिर आपने एक बातचीत का नया सिरा खोला कि यह जो यह एक एक है कि आज के टाइम पे बहुत ज्यादा है। दोनों पेरेंट्स काम कर रहे हैं। दोनों जा रहे हैं, कमा के ला रहे हैं। अच्छा दिख रहा है बाहर से। बढ़िया लंबी वाली गाड़ी है, बढ़िया घर है। लेकिन वहां पर जो बच्चे पल बढ़ रहे हैं नैनीस के साथ। डेनीस के साथ में या बहुत सारे लोग हैं जो डे बोर्डिंग में पढ़ रहे
(1:32:08) हैं। तो जैसे मेरे जो दोस्त हैं जो बोर्डिंग में पढ़े हैं वह बताते हैं कि हम हमें जब सबसे ज्यादा जरूरत थी जब मैं आठ साल का था, 10 साल का था, 11 साल का था तब तो आप एक वार्डन के यहां मुझे छोड़ो आए थे। तो वार्डन जैसे चाहता था 25 बच्चों को हाकता था, वैसे ही हमें भी हांक देता था। करेक्ट? तो आप आज की तारीख में जब मेरे ऊपर आ के ऐसे हक दिखाते हो कि तुम्हारी हर लाइफ डिसीजन मेरा होगा। तुम किस लड़की से बात करोगे, किससे शादी करोगे? तो वो जो बच्चे हैं उनके साथ क्या हो रहा है और हाउ हाउ इट इज मतलब ये जो जनरेशन हो रही है जो दोनों काम कर रहे हैं उनके लिए क्या है
(1:32:43) फिर वो मैनेज इसीलिए तो मैंने कहा ना कि नई जनरेशन में मेंटल हेल्थ इश्यूज क्यों ज्यादा दिख रहे हैं क्योंकि परिवार छोटे हो रहे हैं हम प्रॉब्लम ये भी हो रहा है कि हस्बैंड वाइफ तो काम करते हैं। पहले ये होता था कि चलो परिवार साथ में रहता था। हम चाहे झगड़े वगड़े होते थे पर एक से हर चीज का प्राइस पे ऑफ होता है। परिवार बड़े होते थे तो बफरिंग एडल्ट बच्चे को मिल जाता था। चलो मां-बाप बिजी हैं। मां-बाप स्ट्रेस में है, तनाव में हैं, पर दादा-दादी हैं। हम्। नाना-नानी है। जिनके साथ बच्चे रहते थे, इमोशंस सीखते थे, अपने आप का कॉन्फिडेंस
(1:33:11) बढ़ाते थे, होता था। आजकल नैनी के पास बड़े होते हैं। अभी नैनी तो पैसे के लिए कर रही है। तो नैनी क्यों बच्चे को सही चीज सिखाएगी? नैनी तो उसको जितना काम उसका कम हो, बच्चे को फोन देके खाना खिलाएगी। राइट? बच्चे को सब हां में हां मिलाएगी क्योंकि उसको नौकरी चाहिए। नैनी कभी वो चीज नहीं कर सकती जो मम्मी करती है। तो बच्चों और पेरेंट्स के बीच वो कनेक्शन नहीं बन रहा है तो बच्चे भी सोशली आइसोलेटेड बन रहे हैं। बच्चों को भी फिर क्या रहता है? दिन भर अकेले रहते हैं घर में या तो डिवाइसेस पे रहते हैं, टेक्नोलॉजी पे रहते हैं, कंप्यूटर पे रहते
(1:33:42) हैं या एक आध दोस्त जिसके साथ प्ले डेट अरेंज की है मम्मी ने उसके साथ उनको खेलना आता है। आज मैं देख रही हूं 10-10 साल के बच्चों में सोशल एंजाइटटी हो रही है। क्योंकि उनको एक्सपोज़र ही नहीं मिला है। पहले क्या होता था? हर शादी में हर सबको जाना होता था। तो शादियों में जाते थे, रिश्तेदारों के घर जाते थे। तो अलग-अलग किस्म के लोगों को बच्चे मिलते थे। उनको पता था कि ये अंकल ना बहुत चिल्लाते हैं। ये आंटी बड़ी अच्छी है। ये आंटी ना पीछे से चुगली करती है। दे यूज्ड टू नो हाउ टू हैंडल एवरीबॉडी। आजकल बच्चे की लाइफ क्यूरेट कर रखी है
(1:34:11) पेरेंट्स ने। काम करते हैं एक तो उनको पता है कि हम बच्चे को टाइम नहीं दे पा रहे हैं। इसलिए ब्राइब करते हैं। बच्चा जो मांगता है दे देता है क्योंकि उनको लग रहा है कि शाम को यार 2 घंटे बच्चे के साथ मिलती है। उसमें कौन किटकिट करेगा? सिर्फ 2 घंटा मेरे पास है बच्चे के लिए। तो बच्चा जो मांग रहा है दे दो ना भाई। क्यों इसको रुलाना है? तो करीज के लिए रहा हूं। यह सब इतनी तो भाई पैसे ही तो और गिल्टी पैरेंटिंग गिल्टी पैरेंटिंग उनको गिल्ट है ना उनको गिल्ट है कि मैं बच्चे को टाइम नहीं दे पा रहा हूं तो मैं क्या करूं बच्चा जो मांग रहा है दे दूं
(1:34:37) बच्चा तो खुश है ना बच्चा मेरे को पसंद करेगा बच्चा मेरे से क्लोज होगा तो गिल्टी पैरेंटिंग की वजह से बच्चों को पैंपर कर रहे हैं तो बच्चे भी मतलबी बन रहे हैं। उनको भी ये प्रोग्रामिंग हो रखा है कि भाई मम्मी वो 2 घंटा ऑफिस से आती है ना तभी जो चाहिए मांग लो या तो थोड़ा रोना धोना कर लो तो मम्मी दे देगी या तो मम्मी को बोलो कि तुम सबसे गंदे मम्मी हो तुम मुझे टाइम नहीं देते हो इमोशनल ब्लैकमेल सीख जाते हैं बच्चे बचपन से मैनपुलेशन सीख जाते हैं क्योंकि उनको पता है कि यार ये मम्मी पापा का वीक पॉइंट है उनको गिल्ट है समझ में आ रहा है और यह भी है कि आजकल ये
(1:35:10) पैरेंटिंग की अवेयरनेस बढ़ रही है तो ज्यादा से ज्यादा कपल्स को अपने मां-बाप के साथ बच्चों को नहीं बड़ा करना हम हमने इसमें लिखा है कि प्लीज अगर आप बच्चे प्लान कर रहे हो ना तो टेक हेल्प बिकॉज़ एक बंदा एक कपल अकेला बच्चे को नहीं बड़ा कर सकता है। हमारी हजारों साल की हिस्ट्री है ह्यूमन बीइंग्स की कि वी हैव ऑलवेज लिव्ड एज अ कम्युनिटी। बिल्कुल सही भाई। कभी पिछले सिर्फ 50 साल में हम आइसोलेटेड हो रहे हैं। 50 भी नहीं 15 साल में ये सोशल मीडिया फोन से आइसोलेशन वरना हम कम्युनिटी में बड़े हुए। तो बच्चे को कोई ना कोई तो मिल ही जाता था जो बच्चे को सपोर्ट देता
(1:35:42) है सिखा। आजकल क्या हो रहा है कि मम्मियों को सांस के साथ या पापा को अपने पापा के साथ नहीं बनती है कि मेरे पापा मम्मी बड़े टॉक्सिक है। मेरे बच्चे को उसके सामने नहीं लाना है। तो क्या हो रहा है कि बच्चा सिर्फ मां-बाप के साथ पड़ा हो रहा है। हम और इसकी वजह से सिर्फ मां-बाप की दुनिया वो देखता है। सिर्फ मां-बाप के तनाव देखता है। सिर्फ मां-बाप जो चाहते हैं उस तरह की लाइफ जीता है। उसको आगे एक्सपोज़र ही नहीं मिलता है। पहले ये होता था कि बच्चा हर उम्र के लोगों के साथ बातचीत करना सीख जाता था। हर उम्र के लोगों के साथ एडजस्ट
(1:36:13) करना सीख जाता था। चलो एडजस्ट नहीं तो टैकल करना सीख जाता था। उनको पता है दादी के साथ इस तरह से अप्रोच करना है। दादाजी के साथ इस तरह से अप्रोच करना। राइट और रोंग? अभी ये नहीं सीख पा रहे हैं बच्चे। इसलिए जब प्ले स्कूल डालते हैं तो महीने महीने भर तक रोते हैं। फिर उनको पार्टी में ले जाओ तो नहीं जाना होता है। पेरेंट्स बोलते हैं हम तो कूल पेरेंट्स हैं। बच्चे को नहीं ले जाते। उसने मना किया तो नहीं ले। अरे भाई पॉजिटिव चाइल्डहुड एक्सपीरियंसेस का बहुत बड़ा हिस्सा है कि बच्चे को सोशल होना जरूरी है। बच्चे को सोशल सपोर्ट मिलना
(1:36:40) जरूरी है। जो बच्चे अकेले बड़े होते हैं, चाहे कितनी भी प्रिविलेज लाइफ हो, 10 नैनी हो पर अकेले बड़े हो रहे हैं उनमें लोनलीनेस, डिप्रेशन और आगे जाके सेल्फ हार्मिंग और सुसाइड बिहेवियर्स की संभावना बहुत बढ़ जाती है। बढ़ जाती है। वर्सेस बच्चे जो कम्युनिटी में बड़े क्योंकि उसको दफ्तर तो जाना होगा कभी ना कभी। जब वहां जाएगा कॉलेज जाना है। उनको स्ट्रेस हो जाता है। नहीं नहीं हमारे पास आते हैं सोशल एंजाइटटी को लेके कि हम पार्टी में नहीं जा सकते। जहां बड़ी भीड़ है हम नहीं जा सकते। हमको पैनिक हो जाता है भीड़ में। नए लोगों के साथ हम बात नहीं
(1:37:08) कर पा रहे हैं क्योंकि मैम हमें एंजाइटटी हो जाती है नए लोगों के को देख के। हम सोशल फंक्शनंस भी नहीं जाते। सिर्फ हमारे गिनेचुने चार दोस्तों के साथ ही हम बैठ पाते हैं। तो ये एक लिमिटेशन हुआ ना? प्रॉब्लम हुआ है। और ये लोग अकेले दे आर वेरी लोनली देन। सो आई वुड टेल पेरेंट्स के पेरेंट्स यही कहते हैं कि पढ़ाई लिखाई पे ध्यान दो। ये सब ये चीजों पे भी ध्यान देना है। क्या आपका बच्चा क्या दोस्त बना पा रहा है? आपके बच्चे के लाइफ में दोस्त हैं। आपके बच्चे हर उम्र के लोगों के साथ बातचीत कर सकते हैं। आपके बच्चे आज इमरजेंसी है। कुछ
(1:37:41) आपको हो गया तो क्या वो 10 लोगों को अप्रोच करके काम निकलवा सकते हैं अपना? मोस्ट केसेस आंसर इज़ नो। और इसी इसी का एक पक्ष ये भी है। बड़ा ये भी बड़ा अजीब सा है कि हम जहां देखते हैं दो-तीन बच्चे हैं घर में हां। वहां पर जो कंपैरिजन ड्रॉ होते हैं बहुत खराब हो गया। उससे बुरा तो कुछ नहीं हो सकता। कुछ नहीं हो सकता है। बहुत खराब। कंपैरिजन इज इमोशनल अब्यूज अगेन कि देख तू भाई देख कितना स्मार्ट है तू कितना डफर है तो वो पेरेंट्स को लगता है कि इसे मोटिवेशन मिलेगा पेरेंट्स को लग रहा है कि कंपेयर करने से मेरा बच्चा और अच्छा करेगा पर
(1:38:13) रिसर्च ये कहता है कि कंपेयर किए हुए बच्चे कभी अच्छा करते ही नहीं है इनफैक्ट वो और भी बुरा करते हैं और जो अच्छा करता है उसके लिए जिंदगी भर नफरत हो जाती है उनको नफरत होती है उनको जिसके साथ कंपेयर किया जाता है ना उनके लिए उनको बहुत नफरत होती है चाहे वो खुद का सगा भाई बहन क्यों ना हो ट्रू इसकी वजह से मुझे सुनना पड़ता है क्यों क्यों भाई ये इतना होशियार क्यों है? इसकी वजह से मुझे डांट खानी पड़ती है। तो दे स्टार्ट हेटिंग। तो ऊपर से रिश्ता भी खराब हो जाता है इनका भाई-बन के बीच का और अच्छा तो उससे कुछ होता ही नहीं है।
(1:38:41) तो ये भी एक बहुत गलत चीज है। ये इंडिया में होती है। जॉइंट फैमिलीज में होती है। दादादादी नाना नानी करते हैं। ये बड़े समझदार लोग करते हैं। अनकॉन्शियसली करते हैं। अरे तुम कर तो ये रहे हो लेकिन उसके जैसा नहीं कर पाओगे। अरे क्यों कहनी है ये बात? हां। सब अपने-अप इंडिविजुअल हर इंसान इंडिविजुअल है। हर यूनिक है। ये क्यों कहना है? पर यह कहते हैं पेरेंट्स। तो इसलिए क्या होता है कि आजकल नए कपल्स को अपने मां-बाप को इन्वॉल्व नहीं करना पैरेंटिंग में। तो इसका फायदा भी है बट इसका नुकसान भी है। क्या ज्यादा क्या है? फायदा क्या है?
(1:39:09) ज्यादा है नुकसान ज्यादा है। बहुत कह नहीं सकते। डिपेंडिंग अभी आपके पेरेंट्स अगर टॉक्सिक हैं, घर में गाली गलौज कर रहे हैं। आपके बच्चे को मारपिटाई कर रहे हैं तो ऑब्वियसली आपको उनके साथ नहीं बड़ा बच्चा करना है। बट हां अगर आपके पेरेंट्स मतलब ठीक है। मैं कि मैं ये कहूंगी कि सब में बैलेंस देखो। मतलब आपके अगर पेरेंट्स आपके बच्चों को बड़ा कर रहे हैं, आपको सपोर्ट दे रहे हैं, तो उसके साथ-साथ वह पैकेज डील में कुछ बहुत इधर-उधर आएगा। हम आपकी वो क्षमता होनी चाहिए कि आप अपने हिसाब से डिसीजन लो कि फायदे ज्यादा है कि नुकसान ज्यादा है।
(1:39:38) अच्छा बच्चे को समझाने के क्रम में थोड़ी बहुत मारपिटाई वैलिड है या जीरो मारपिटाई है। नहीं नहीं आई वुड से कि सी मैं कभी रिकॉर्ड पे नहीं कहूंगी कि मारपिटाई इज नीडेड बिकॉज़ बिना मारपिटाई [हंसी] बिना मारपिटाई के भी बच्चे बड़े हो सकते हैं। जैसे मैंने मेरे बच्चों को मारा पिटाई शायद एक बार मेरे बेटे को एक बार मैंने मारा था और बेटी को शायद एक आधा बार मारा था। हम और दोनों बार मुझे बराबर याद है कि मैंने इसलिए माना था क्योंकि मैं अपने गुस्से को कंट्रोल नहीं कर पाई थी। उनकी गलती नहीं थी। बच्चे तो बच्चे ही होते हैं ना। बच्चे अगर बड़े जैसे बिहेव करने लगे तो
(1:40:10) फिर बच्चे की काहे के होंगे? तो दोनों टाइप आई वाज़ आउट ऑफ कंट्रोल। अदरवाइज आई कैन वेरी कॉन्फिडेंटली से कि बिना मारे पीटे आप बच्चे को बड़ा भी कर सकते हो, डिसिप्लिन भी कर सकते हो। हां कोई परफेक्ट नहीं है। एक आध बार थप्पड़ पड़ गई, एक आध बार आपने मार भी दिया तो आपको संभलना है। आपको सॉरी कहना है और आपको शांत बैठ के 10 मिनट 20 मिनट सोचना है कि ये मार के पीछे प्रॉब्लम क्या था? बच्चे की बिहेवियर के उसने मेरा कुछ ट्रिगर किया है। हम हमेशा बच्चे आपके हॉट बटन दबाएंगे। आपके अंदर जो अनहिल्ड है वही ट्रिगर करेंगे। हम आज मुझे अगर समझो मेरी सेल्फ एस्टीम नहीं
(1:40:47) है। मुझे अगर बचपन से बहुत बॉडी शेमिंग किया है और मेरी इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स मुझे बहुत है। सबने समझो मुझे मोटी-मोटी कहके क्या है तो मेरे अंदर वो बहुत स्ट्रांग प्रोग्राम होगा कि मेरी बच्ची को ऐसा नहीं होना चाहिए। तो मेरी बच्ची थोड़ा सा भी जंक फूड खाएगी मैं उसको मारूंगी। तो वो वहां से आ रहा है क्योंकि मुझे इरादा बहुत अच्छा है। मुझे मेरी बेटी को मोटा नहीं देखना है क्योंकि वरना मेरी बेटी को भी वही सहना पड़ेगा जो मैंने सहा है। तो मैं उसको पॉजिटिवली समझाने के बदले क्या होती है? जब भी ऐसा कुछ हुआ तो मैं हाथ उठ जाता है।
(1:41:18) आखिरी की तरफ हम बढ़ रहे हैं। एक तो आपके पास जजी आ रहे हैं। हां बहुत आ रहे हैं भाई। मेरे दोनों बच्चे भी जजी है। जजी है। हां बच्चे जजी जजी इसलिए आ रहे हैं क्योंकि उनमें अवेयरनेस है। हम उनमें बहुत सारा इनेशन है। तो डबल एजेड स्वॉर्ड है। ऐसे जेंजी आ रहे हैं जो अपने आप को सेल्फ डायग्नोस करके बोलते हैं कि अरे मुझे तो एडीएचडी है। मुझे बायपोलर है। मुझे बॉर्डर लाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर है। मुझे ये है मुझे वो है। और दूसरे जेंट्स ही आ रहे हैं जो जेनुइनली अवेयर हैं। जिनको थेरेपी की जरूरत है। ऐसे भी आते हैं जो कहते हैं कि हमारे मां-बाप नहीं मैम एग्री कर रहे हैं।
(1:41:48) उनको लग रहा है थेरेपी वैपी सब बकवास है। पैसे बनाने का बिजनेस है। हम बट मैम हमें एंजाइटटी है। हमें दवाइयां नहीं लेनी है तो मुझे हेल्प चाहिए। तो क्या है? एजेंसी का हाल क्या है? क्योंकि बड़ा इसलिए मैं स्पेसिफिक सवाल पूछ रहा हूं क्योंकि बड़ा अलग तरह से इस जनरेशन को देखा जा रहा है। एक तो ये अवेयर है। फिर दूसरा ये इतनी अवेयर है कि हर जगह पर वो डाल देती है कि आपने मेरे से पूछ दिया कि ये कैसे क्यों नहीं किया? मेरी तो ए्जायटी ट्रिगर हो गई। [हंसी] तो वो लोग यूज़ भी करते हैं लेबल्स को। इसलिए हमने कहा है व्हाट? व्हाट हैपेंड टू
(1:42:18) मी इट्स यूजिंग लाइक अ लेबल। मुझे एंजायटी है। मेरी बहन पढ़ाती है कॉलेज में। बोलती है हमें डर लगता है बच्चों को असाइनमेंट नहीं मांग सकते क्योंकि असाइनमेंट अगर मांगा बोले कि हमें तो एंजाइटी हो गई। हम पूरी रात जागे मैम एंजाइटी की वजह से। आपके असाइनमेंट की वजह से हमें एंजाइटी हो गई है। तो उनसे असाइनमेंट नहीं मांग सकते। टू देम ये हाल होगा। इसका रास्ता क्या है फिर? बैलेंस मिड पॉइंट। क्योंकि देखो हर चीज न्यूक्लियर की तरह है। न्यूक्लियर पावर को आप एनर्जी आप इरीगेशन में पावर जनरेशन में यूज़ कर सकते हो या किसी देश को उड़ाने में
(1:42:49) यूज कर सकते हो। तो इसी तरह मेंटल हेल्थ की अवेयरनेस है। उससे हम ऐसे लोगों को बचा भी सकते हैं जिन हेल्प कर सकते हैं जिनको वाकई में जरूरत है। बट उसके साथ-साथ ऐसे भी लोग आएंगे जो इसका अब्यूज कर रहे हैं। जो इसके नाम पे गलत चीजें कर रहे हैं और उसके साथ आगे ऐसे ऐसे आते हैं लोग जो कहते हैं कि यार पेरेंट्स को बोलते हैं कि देखो आपने मुझे इतना चाइल्डहुड ट्रॉमा दिया है। आपने मेरी जिंदगी खराब कर दी है। अभी मैं कुछ काम तो कर नहीं सकता हूं क्योंकि मुझे ट्रॉमा है। तो अभी आप करके खिलाओ मुझे। मैं तो अभी कुछ नहीं करूंगा। हम आपका आपकी जिम्मेदारी है। अभी आप भुगतो
(1:43:19) इसका पश्चाताप करो और मुझे मेरे मुझे सपोर्ट करो फाइनशियली। यह गलत बात है। ऐसा भी हो रहा है। ऐसा भी हो रहा है। जैन [गला साफ़ करने की आवाज़] जी मैं जजी को के बारे में मैंने बहुत वीडियोस बनाई है। मेरे दोनों बच्चे भी हैं। मैं कहूंगी कि बहुत ये जनरेशन का वायरिंग अलग ही है हमसे क्योंकि दे आर डिजिटल नेटिव्स। हम लोगों ने ये सब डिजिटल टेक्नोलॉजी अडॉप्ट की। यह लोग पैदाइशी से इसके साथ चले आ रहे हैं। इसीलिए अवेयरनेस ज्यादा है, सेंसिटिविटी ज्यादा है। हम कनेक्टेड ज्यादा है। मेरे टाइम में मुझे कभी नहीं पता होता था कि नेपाल में क्या हो रहा है, हॉर्मोस में
(1:43:56) क्या हो रहा है, ईरान में क्या हो रहा है? कभी दूरदर्शन न्यूज़ ने कुछ दिखा दिया तो पता चलता था। तो मुझे उसके साथ जुड़ी हुई एंजाइटटी भी नहीं होती थी। आजकल के बच्चों में एंजायटी इसलिए हो रही है। इसलिए नहीं हो रही है कि वीक जनरेशन है। लोग कह रहे हैं जंजी बहुत वीक है। एक्चुअली इनको इतना इंफॉर्मेशन मिल रहा है कि उनको ऐसा लग रहा है कि दुनिया सब खत्म हो रही है। क्योंकि वो एल्गोरिदम की वजह से ना अगर आपने एक अर्थक्वेक की रील देख ली तो आपको 50 अर्थक्वेक की रील दिखी। कि आपको लग रहा है दुनिया तो खत्म हो रही है। तो इनके पास
(1:44:20) टेक्नोलॉजी बहुत है, टूल्स बहुत है। हमने उनका माहौल ऐसा बना रखा है। फैमिलीज़ कम हो रहे हैं। पेरेंट्स के साथ कनेक्शन कम हो रहे हैं। ये जजी के पेरेंट्स इतने ज्यादा अवेयर हैं कि वो चाहे अपने मां-बाप की गलतियां नहीं दोहराएं बट खुद भी खुद की एंजायटी बच्चों को दे रहे हैं। दुनिया इतनी कॉम्पिटिटिव हो गई है। मेरे जमाने में मेरे 75% मार्क्स आए थे तो मेरे मां-बाप तो पार्टी दी आज 75% मार्क्स वाला बच्चा लूजर गिना जाता है क्योंकि 99.
(1:44:46) 9 पे भी आपको एडमिशन नहीं मिलती है। तो प्रेशर भी बहुत है इस जनरेशन पे। तो इस जनरेशन जैन जी एज अ जनरेशन हैज़ मच मच मोर मेंटल हेल्थ इश्यूज देन जैन एक्स और जैन व और मिलेनियल्स। ये पहले की सब पीढ़ियों से सब ये मैंने मेरे पीएचडी का मैंने जब डॉक्टरेट किया ना तो उसमें ये बाहर आया क्योंकि मैंने इस इसी सब्जेक्ट पे पीएचडी किया है। तो जब मैंने डाटा देखा तो पता चला कि ये जनरेशन में एंजायटी सबसे ज्यादा डिप्रेशन सबसे ज्यादा है। मेंटल हेल्थ इश्यूज सबसे ज्यादा है पहले की पीढ़ियों के कंपैरिजन में में जसी में इसीलिए तो मैंने कहा कि हमारे देश का डेमोग्राफिक डिविडेंड है वो एक्चुअली
(1:45:20) डेमोग्राफिक लायबिलिटी बन रही है। क्योंकि इनकी पहले की पीढ़ियां हम सब काम करती है। सब काम करती थी। 10-10 घंटे काम करके इकॉनमी को बढ़ा रही थी। यह पीढ़ी ऐसी है जो मेंटल हेल्थ इश्यूज की वजह से काम नहीं कर रही है जितना करना चाहिए। अच्छी बात ये है कि ये वर्क लाइफ बैलेंस में मानती है। हम जो हमारी पीढ़ी नहीं मान रही थी। राइट? पर वर्क लाइफ बैलेंस के चक्कर में ये वो भी नहीं कर रही हैं जो इनको करना चाहिए। तनतोड़ मेहनत, पर्सिवियरेंस क्योंकि इनका अटेंशन फोकस नहीं है। सोशल मीडिया की वजह से यह लोग वहां पर लगे रहते हैं। एडिकशंस
(1:45:55) हैं इनको। इनके घर के माहौल जैसे मैंने कहा फैमिलीज़ छोटे हो रहे हैं। पेरेंट्स के खुद के मेंटल हेल्थ चैलेंजेस हैं। तो इसलिए बच्चों पे इंपैक्ट पड़ रही हैं। तो मेरे पास बहुत जजी क्लाइंट्स आ रहे हैं। बहुत मेंटल हेल्थ इश्यूज लेके आ रहे हैं। हम उनको हेल्प कर भी पा रहे हैं। कई बार नहीं भी कर पा रहे हैं। इट्स अ मिक्स्ड बैग। अच्छा। पर इसका इंपैक्ट देश पे पड़ेगा। [गला साफ़ करने की आवाज़] पड़ेगा ही पड़ेगा। क्योंकि हर देश तभी आगे बढ़ता है जब उसकी युवा पीढ़ी काम कर सके। देश के देश के इकॉनमी में कंट्रीब्यूशन दे सके दे सके। जब ये युवा पीढ़ी का खुद का इतना ट्रॉमा
(1:46:24) है जिसकी वजह से ये वोलेटाइल है, ट्रिगरर्ड है। इमोशनली इमंबैलेंस्ड है। मेंटल हेल्थ इश्यूज लेके चल रही हैं तो कैसे कर पाएंगे? जॉब में हर दिन जो लड़ाई होती है बॉस के साथ या तो शट डाउन हो गए होते हैं या तो फिर इनको आदत पड़ गई है डिप्रेशन की गोलियां खाने की एंजायटी की गोलियां खाने की जिसकी वजह से सोते रहते हैं पूरे दिन एडिक्शनंस हैं ड्रग कर रहे हैं कुछ ज्यादा बहुत एक चीज पे और हम बात करना चाह रहे थे कि सेल्फ हार्म और सुसाइड जो हमारी सोसाइटी में बहुत ज्यादा हम देख रहे हैं कि पूरा हमने एक एक शहर ऐसा बसाया जहां के इन एंड अराउंड यही
(1:47:00) चर्चा का विषय है कोटा की अगर मैं बात करूं तो पहला तो मेरा सवाल यही है कि इतना ज्यादा बच्चों पे जो बोझ डाल दिया गया है कि पेरेंट्स फोन करके पूछ रहे हैं कि बेटा वो पिछली बार वाले में इतने आए थे 20 में अब की कितने आए हुए हैं ये बच्चों तक पहुंच रहा है। पेरेंट्स इतना सैक्रिफाइस करके भेज रहे हैं कि बच्चे पे ऑलरेडी प्रेशर है। फिर हमें पता चलता है कि भाई बच्चे ने सुसाइड कर लिया। मैं खुद कोटा गया। वहां मैंने देखा कि वहां पर सुस एंटी सुसाइड हॉस्टल्स बने हुए हैं कि वो और वहां के जो मैनेजर्स हैं बड़े गर्व से हमें पूरा एक्सप्लेन कर रहे थे, घुमा रहे
(1:47:33) थे। पंखा जाली लगा लेते हैं पंखे। पंखा है पंखे में लोड है। तो अगर मान लीजिए कि आप 40 किलो से ज्यादा उस पे ला देंगे तो गिर जाएगा। ओ बाप रे। तो उन्होंने ऐसे सिस्टम बना रखे हैं 30 केजी का लगा रखा है कि अगर 30 केजी से ज्यादा लोड आप डालेंगे। इनको लग रहा है कि वही तरीका है सुसाइड करने का। और कोई तरीका दूसरा भी है। तो उन्होंने बताया बड़े गर्व से बोले कि देखिए साहब इसमें ना सर अगर बच्चा लटक गया मान लीजिए मर रहा मरेगा नहीं फिर उन्होंने आगे हमें दिखाया कि ये देखिए और मैनेजर बता रही हैं कि ये जो गेट है हम इस पे लॉक लगाते हैं अगर बच्चा बारिश हो धूप हो वो
(1:48:06) छत पे नहीं जा सकता हमारे यहां परमानेंट लॉक रहता है ये इसकी चाबी सिर्फ दो लोगों के पास रहती है मैंने कहा अच्छा वो तो इसको उस तरह से दिखा रहे थे बहुत अच्छी चीज है। फिर उन्होंने खिड़कियां दिखाई तो खिड़कियों के बाहर वहां लंबे-लंबे नेट लगे हुए हैं। बोले, बच्चा अगर कूदेगा, तो हम मरने नहीं देंगे। मतलब इसका क्या मतलब? और वो वहां का सबसे बेहतरीन हॉस्टल है। जो सबसे ज्यादा चार्ज कर रहा है। तो मैं यह जानना चाह रहा हूं कि पेरेंट्स की वो कौन सी साइकी है जो अपने बच्चे को एक ऐसे हॉस्टल में छोड़ आती है? जहां उसका मैनेजर उनको पक्का मैं लिख के
(1:48:41) दे सकता हूं। जैसे वो मुझे विजिट करा रहा था, वैसे ही पेरेंट्स को करवाता होगा कि इसमें आपका बच्चा लटकेगा तो मरेगा नहीं, कूदेगा तो मरेगा नहीं। पर ये क्यों नहीं पूछ रहे हैं कि बच्चा लटकने तक पहुंचता क्यों है? बच्चा कूदने का सोच क्यों रहा है? ये तो मैं यहां पे पेरेंट्स की वो साइकोलॉजी समझना चाह रहा हूं कि वो कहां से आ रही है कि वो इतना स्टुपिडिटी है। ये अरे ये पैसे बनाने का कमर्शियल इनोवेशन है। इट्स लाइक सेइंग के यार मतलब यही तरीके हैं। बच्चा जाके गोली खा लेगा। बच्चा लाके नदी में कूद पड़ेगा। बच्चा जाके ट्रक के आगे गिरेगा। सुसाइड करने के
(1:49:10) तो 50 तरीके हैं। आप कब तक आप बच्चे को प्रोटेक्ट करोगे? इससे सही सवाल यह है कि हमें क्या करना चाहिए सिस्टम में, माहौल में, घर के माहौल में, कोटा के माहौल में ताकि बच्चे सुसाइड के बारे में सोचे ही नहीं। ये कितना ट्विस्टेड थिंकिंग है इनका। मुझे मुझे तो एक्चुअली दुख हंसी तो आ रही है पर दुख हो रहा है कि लोग इतना कॉमन सेंस नहीं है इन लोगों में समझ नहीं आ रही है। और मैं वहां बच्चों से मिला। नीचे खाना खा रहे हैं। इट्स लाइक फूड पोइजनिंग हुआ है ना, तो उल्टी बंद कर दो और डायरिया बंद कर दो। तो फूड पोइजन ही सॉल्व हो जाएगा। अरे ऊपर से
(1:49:44) पोइजन तो अंदर ही अंदर रहेगा। ये थोड़ी ना सशन है। दिस कौन से पेरेंट्स हैं जो यहां पर छोड़ के आ रहे हैं अपने बच्चों को उनकी क्या साइकी है? पता नहीं यही है कि पेरेंट्स को शायद कल्चरली या जो पेरेंट्स ऐसे सोशियोइकोनॉमिक जगह से आते हैं जहां उनको दिमाग में ये है कि बेटा अगर इंजीनियर नहीं बढ़ा आईआईटी में नहीं गया तो उसका लाइफ नहीं बनेगा। हम राइट? तो पेरेंट्स भी मेरे हिसाब से तो सही इरादे से [गला साफ़ करने की आवाज़] कर रहे होंगे कि बेटा मेरा डॉक्टर इंजीनियर बनेगा या जो भी पढ़ेगा तो ही हम इस कंडीशन से बाहर आएंगे। ये बेटा हमारा घर का शान
(1:50:17) है या बेटा हमको इसमें से बाहर निकालेगा। या तो मां-बाप के खुद के एंबिशंस हैं कि मैं आईआईटी नहीं कर पाया। मेरा बेटा उसमें जाएगा। या तो बचपन से बेटे ने बहुत अच्छा जैसे मैंने कहा परफेक्शनिज्म दिखाया है। अच्छा एक कोपिंग स्ट्रक्चर दिखा। मां-बाप को लगता है कि नहीं नहीं अभी बेटे को तो मुझे बनाना है। मुझे इंजीनियर बनाना है। आईआईटी में टॉपर बनाना है। तो मेरा सपना मेरा बेटा पूरा करेगा। तो ये सब प्रेशर्स हैं। तो ये वो मां-बाप है जो यहां पे भेजते होंगे मेरे हिसाब से। पर मां-बाप को ये समझना है भाई कि इसके बारे में बातचीत करो। सी मुकुल इंडिया में
(1:50:49) लोग सुसाइड के बारे में बातचीत ही नहीं करते। मां-बाप को ये लगता है कि हम इसके बारे में बातचीत करेंगे तो बच्चे को आईडिया देंगे। आईडिया देंगे। कहते हैं कि सुसाइड के बारे में बच्चे से बात करेंगे तो बच्चा सुसाइड करना सोचेगा। अरे आपको अकल नहीं है। बच्चा आपका सुसाइड के बारे में पहली बार फोन दिया तभी उसको तो पता चल गया था कि सुसाइड क्या है। ऐसे सेक्सुअल कन्वर्सेशन भी लोग नहीं करना चाहते बच्चों। सेफ सेक्स के बारे में अरे नहीं बोल सकते वरना बच्चे को लगेगा कि हम आईडिया दे रहे हैं उसको। अरे आपके बच्चे को आपको आपसे 10 गुना ज्यादा सब पता है
(1:51:14) इसके बारे में। मां-बाप ही इतने इसके बारे में बिल्कुल अनअवेयर हैं। तो सुसाइड के बारे में बातचीत होनी चाहिए घर में। मैं तो कहती हूं किस किस्म की बातचीत होनी चाहिए कि बेटा ये पेपर में हम पढ़ते हैं। आपने रील में देखा होगा। ऐसा होता है। आप क्या सोचते हो इसके बारे में? अगर आपका बेटा बोल रहा है अरे मम्मी ये तो सबसे आसान है। अगर कोई प्रॉब्लम हो जाए तो सुसाइड कर लो। तो नाउ यू नो कि आपके बेटे की थॉट प्रोसेस क्या है? तो आप उसको कोच करो कि ये सही ये गलत है। अगर बेटा ये कह रहा है कि नहीं मम्मी कुछ भी हो जाए सुसाइड नहीं करना चाहिए। तो
(1:51:44) यू नो कि आपके बेटे की थॉट प्रोसेस सही है। राइट? आपके बच्चों के साथ कनेक्शन बनाए रखो। प्रेशर मत डालो। बच्चों को क्या करना है वो समझो। ये तो सीधी सी समझने वाली बात है भाई। हम सुसाइड वही बच्चे करते हैं जो मैं कह रही हूं हमने इतने करीबन यह बुक लिखी थी ना लास्ट ईयर का डाटा है हमने करीबन 900 लोगों से साथ बात की थी जिन्होंने सुसाइड अटेम्प्ट किए हैं एक्टिव अटेम्प्ट किए सबका मैंने जैसे कहा दे हैव एक्सपीरियंस लोनलीनेस हम डिप्रेशन हम इमोशनल अब्यूज इमोशनल नेगलेक्ट हम फियर आइसोलेशन डोमेस्टिक वायलेंस जब घर में माहौल ऐसा होता है कि मां-बाप
(1:52:22) बहुत झड़ लड़ झगड़ रहे बच्चे को हर रोज ऐसा फील हुआ है कि मेरा दुनिया में कोई है ही नहीं। भाई मैं अकेला ही हूं। तो यह बच्चा वो है जो सबसे पहला मर जाए मरने की कोशिश करेगा। क्योंकि उसके पास कोई है ही नहीं जिस जो उसकी बात सुने समझे और यह वो बच्चे जिनको बचपन से कहा गया कि तू कुछ नहीं कर सकता है। तेरे से कुछ होगा नहीं। तो बेचारा कोप अप करने के लिए टॉपर रहेगा रहेगा रहेगा। कब तो बर्न आउट हो जाएगा ना वह बच्चा। जैसे आप घोड़े को हर रेस में दौड़ाओगे तो कभी तो उसको रेस्टिंग पीरियड चाहिए ना। फार्मूला वन गाड़ी का भी पिट स्टॉप होता है। पिच स्टॉप के बगैर वो
(1:52:55) गाड़ी जल जाएगी। बट ये प्रेशर आप अति महत्वाकांक्षाओं का बोझ नहीं डाल सकते। नहीं डाल सकते हो। वही बच्चे करते हैं। और जिनको सपोर्ट नहीं अगर आपको समझो बच्चा बोल रहा है मुझे वर्ल्ड चैंपियन बनना है। तो तब प्रेशर आएगा। आप उसको सपोर्ट करो। तो नहीं टूटेगा वो। वी हैव सीन सो मेनी। ये जो चेस चैंपियंस वगैरह है। कितनी तकलीफ इन्होंने सहन किया। बट उनका पेरेंट्स के साथ कनेक्शन है। वो आइसोलेटेड नहीं है। अगर पेरेंट्स नहीं है तो कोच के साथ कोई तो उनकी लाइफ में है जो उनको कास्टेंटली सपोर्ट करता है। ये बच्चे कभी फेलियर में नहीं मरेंगे। कभी सुसाइड नहीं करेंगे। वही
(1:53:30) करेंगे जो हर रोज फील करते हैं कि कोई मेरे लिए है। अगर मैं नहीं रहा तो किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा। ये पांचप छह साल के बच्चे बोलते हैं। 10 साल का बच्चा बोलता है। डजंट मैटर इफ आई लिव। आई नोबडी केयर्स अबाउट मी। और यह ऐसा नहीं है कि बहुत गरीब वाले बच्चे हैं। यह वही वो भी बच्चे जो बहुत बड़े-बड़े बंगले में रहते हैं। बहुत पैसे वाले हैं। पर इनके मां-बाप के पास इनके लिए टाइम ही नहीं है। [हंसी] तो बहुत [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] सारी बातें तो रह गई हैं। वो तो मैंने कहा। बहुत सारी दो किताबें जितनी बातें हैं। [हंसी] आज हमने मुझे लगा
(1:54:03) था करनी थी वो किताब की बात बट घूम-घूम के यही किताब की पे आ जाती है। पैरेंटिंग पे ही सब चीजें आती हैं। नहीं दोनों ही चीजें बहुत कनेक्टेड हैं। मैं दोनों ही दोनों ही दिखा दीजिए। [हंसी] हां जी ये देखिए भाई ये बहुत जरूरी चीज है कि हम लोगों के यहां पर सोसाइटी में बच्चे पैदा करने के बाद कोई बता नहीं रहा है कि करना क्या है इनका ये जो आ गए हैं। तो इसके लिए आपके पास बड़ी अच्छी किताब है पेंग्विन से ही दोनों आई हैं। हां दोनों पेंग्विन की तो दिस बुक विल वोंट टीच यू पेरेंटिंग। एक तो यह किताब है और यह किताब है व्हाट हैपेंड टू मी व्हाट्स रोंग विद मी कट है
(1:54:35) और व्हाट हैपेंड टू मी इंडियन पर्सपेक्टिव ऑन चाइल्डहुड ट्रॉमा एंड रिकवरी। तो इन दोनों ही किताबों को पढ़िए। कई दफा हमें लगता है कि हमारे साथ क्यों ये जो हो रहा है वो हो क्यों रहा है पता ही नहीं चल पाता है और हम गलत जगहों पे इसके जवाब ढूंढ रहे होते हैं। हम फ्रस्ट्रेट रह रहे होते हैं। तो बहुत सारे मुझे खुद पर्सनली बहुत सारे जवाब मिले और दफ्तर में अब जब कभी ऐसे-ऐसे करता मिलूं [हंसी] [खांसने की आवाज़] तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] आपके साथ भी कभी मिलूं तो हमिंग वमिंग करूं तो समझ जाइएगा। [हंसी] बाकी इसमें सिर्फ और सिर्फ हमने ये बात
(1:55:06) नहीं की कि प्रॉब्लम्स क्या हैं? हमने स्यूशन की तरह अभी बात की। इसमें बहुत सारी स्यूशन की तरफ बातें की गई कि आप क्या-क्या करके इन चीजों से बाहर आ सकते हैं। तो कई दफा सिर्फ आप किसी साइकोलॉजिस्ट के पास पहुंचे या साइकोथरेपिस्ट के पास पहुंचे वही जरूरी नहीं होता। आप अपने स्तर पे भी बहुत सारी चीजें कर सकते हैं। आपकी पूरी बातचीत कैसी रही? आपकी क्या एक्सपीरियंसेस रहे हैं? आप अपने बच्चों को किस तरह से ट्रीट करते हैं? क्या अपेक्षा रखते हैं? ये सारी चीजें भी आप हमें कमेंट सेक्शन में बता सकते हैं। डॉक्टर रीरी का धन्यवाद कर सकते
(1:55:33) हैं। उन्होंने हमारे साथ इतनी सारी बातें इतने अच्छे से शेयर की। मेरे बहुत सारे सवाल रह गए हैं। उम्मीद करते हैं कभी और फिर से बात करेंगे हम। जरूर मैं ऑलवेज रेडी हूं। ये मेरा मिशन है, विज़ है कि इंडिया में हो सके उतने पेरेंट्स तक और लोगों तक ये बात पहुंचे। इसके बारे में बातचीत हो जो नहीं हो रही है अभी। तो जब भी भी मौका दे मैं आ जाऊंगी। बिल्कुल। तो बातचीत करिए और लोगों को भी बताइए आसपास अपने और इसको शेयर करिएगा ताकि और भी लोग अवेयर हो सके। बहुत-बहुत शुक्रिया पॉडकास्ट देखने के लिए। बहुत-बहुत धन्यवाद। अपना प्यार और दुलार
(1:56:05) बनाए रखिए।
Author Name:Jist
Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@jistnews
Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=YkfM9k-Wy-U
Title: The Hidden Link Between Addiction & Childhood Trauma ft. Dr. Riri & Mukul | Jist | Breaking Down
Author Name: Jist
Description: This conversation explores how childhood experiences can shape the way we think, behave, love, fight, cope and heal as adults. Psychotherapist Riri Trivedi breaks down childhood trauma, parental conflict, emotional neglect, people-pleasing, anger, addiction, and asks whether the behaviours we often label as “problematic” may sometimes be responses to something deeper.
We also discuss why people repeat unhealthy relationship patterns, how childhood experiences can influence partner choices and infidelity, how trauma can pass across generations, and what happens when children stop talking to their parents because they no longer feel safe. From attachment and family systems to ACEs, emotional regulation and memory reconsolidation, this conversation asks one powerful question: Are we really asking “What’s wrong with me?” when we should be asking, “What happened to me?”
00:00 – 01:42 – Montage
01:42 – 03:36 – Introduction
03:36 – 04:16 – Who Is The Right Specialist And How They Work
04:16 – 07:42 – Psychiatrist vs Psychologist vs Therapist
07:42 – 11:15 – Inner Child Therapy & Trauma-Driven Frugality
11:15 – 14:39 – How Phobias Form: The Rain Trauma Story
14:39 – 17:07 – "What Happened to Me?" vs "What's Wrong with Me?"
17:07 – 20:11 – Why Trauma Hits Later: The Camel Story
20:11 – 22:46 – Emotional Resilience & How Parents Break It
22:46 – 25:49 – When Your Boss Triggers Your Father Wound
25:49 – 28:48 – Why Beating Kids Is Normalized
28:48 – 34:04 – Parenting Styles: Permissive vs Balanced vs Friend
34:04 – 38:48 – Forced Feeding, Eating Disorders & Stress
38:48 – 41:43 – Emotional Abuse: Guilt-Tripping & Blackmail
41:43 – 46:05 – Exam Pressure, School Change & Toxic Shame
46:05 – 49:04 – Buffering Adults: One Person Can Save a Child
49:04 – 53:01 – Positive Childhood Experiences (PCEs)
53:01 – 56:57 – Should Struggling Couples Have Kids?
56:57 – 1:01:25 – Cool Parenting vs Parental Authority
1:01:25 – 1:09:06 – Why Teens Seek Love Outside & Men's Emotions
1:09:06 – 1:13:02 – Real Forgiveness: Mind vs Body
1:13:02 – 1:22:01 – Anger, Self-Sabotage & Nervous System Reset
1:22:01 – 1:26:01 – Self-Hypnosis & Guided Visualization
1:26:01 – 1:31:19 – Trauma & Addiction: Correlation vs Causation
1:31:19 – 1:38:43 – Working Parents, Nannies, Boarding & Social Anxiety
1:38:43 – 1:45:16 – Is Physical Punishment Ever Okay? + Gen Z Labels
1:45:16 – 1:56:05 – Kota Suicides, Why Kids Consider Suicide & Final Thoughts
#ChildhoodTrauma #MentalHealth #Psychology #Addiction #Relationships #TraumaHealing #Parenting #Therapy #BreakingDown
Transcript:
(00:03) जो बच्चे ज्यादातर नशा कर रहे हैं उनमें चाइल्डहुड ट्रॉमा का बैकग्राउंड है। 100% ये तो रिसर्च कहता है। मैं नहीं कह रही ग्लोबल रिसर्च तो आपके पास जजी आ रहे हैं। जेनजी एज अ जनरेशन हैज़ मच मच मोर मेंटल हेल्थ इश्यूज देन जेन एक्स और जेन वाई और मिलेनियल्स। तो बेसिकली आप ये कह रहे हो कि जितने भी तरह के एडिक्शन है चाहे ड्रग एडिक्शन हो, अल्कोहलिज्म हो, पोर्न एडिक्शन हो, दीज़ ऑल आर रिलेटेड टू दे आर नॉट डायरेक्ट कॉजेशन। इट इज़ अ कोरिलेशन। लड़कियों में भी मैंने जो ऑब्ज़र्व किया, वह अपने जो पहला प्यार है जो उनको 15 16 की उम्र में हो गया, उसको
(00:36) लेकर के इतना गंदा ट्रामा है उनके अंदर। लॉजिक सारा हाई जैक हो जाता है। फिर चाहे वो लड़का नशा करता हो, कैसे परिवार से आया हो, 6 महीने में पता चलेगा कि यह तो मैंने गलत अट्रैक्ट कर लिया। कोटा की अगर मैं बात करूं, सेल्फ हार्म और सुसाइड एक एक शहर ऐसा बसाया है जहां के इन एंड अराउंड यही चर्चा का विषय है। कौन से पेरेंट्स हैं जो यहां पर छोड़ करके आ रहे हैं अपने बच्चों को? उनकी क्या साइकी है? या तो मां-बाप के खुद के एंबिशंस हैं कि मैं आईआईटी नहीं कर पाया। मेरा बेटा उसमें जाएगा। एक बंदी आई थी हमारे पास उसको बारिश में हमेशा डिप्रेशन हमेशा
(01:07) बारिश में डिप्रेशन बारिश में डिप्रेशन शी वुड हेट द रेस। जब हमने उसके साथ काम शुरू किया तो पता चला कि वो जब छोटी [संगीत] थी स्कूल पिकनिक में गई थी तो स्कूल पिकनिक में जो उनका लीड इंस्ट्रक्टर था उसने इस लड़की का सेक्सुअल अब्यूज किया था पब्लिक टॉयलेट में और तब बारिश हो रही थी। तो आप कह रहे हो कि कंजूसी भी ट्रॉमा से आ सकती है। अनुभव से आ सकती। कोई बच्चा कंजूस तो पैदा नहीं होता ना। गुड पेरेंटिंग में माना जाता है कि हम अपने बच्चों को तो एकदम दोस्त की तरह ट्रीट करते हैं। आई गलत है। यह गलत है। बी अ फ्रेंडली पेरेंट बट डोंट
(01:35) बी अ फ्रेंड टू योर चाइल्ड। व्हाट्स रोंग? व्हाट्स रोंग? [गला साफ़ करने की आवाज़] हेलो एंड वेलकम। मेरा नाम है मुकुल सिंह चौहान और आप देख रहे हैं जस्ट ब्रेकिंग डाउन पॉडकास्ट। क्या आपने कभी सोचा है कि आप आम रोजमर्रा की जिंदगी में जो बिहेवियर करते हैं वो क्यों करते हैं? मसलन गुस्सा आप कैसे करते हैं? जब किसी को प्यार करते हैं तब कैसे रिएक्ट करते हैं या फिर अपने आसपास आप लोगों को लेकर के कितने संवेदनशील हैं। यह सारी चीजें कहीं ना कहीं आपके चाइल्डहुड से जुड़ी होती हैं। आपके साइकोलॉजी में होती हैं। आज हम इन्हीं सारी चीजों को समझने की कोशिश
(02:09) करेंगे। हमारे साथ मौजूद होंगी ऑथर और साइकोथरेपिस्ट डॉ. रीति त्रिवेदी जिनकी अभी पेंग्विन से किताब आई है। व्हाट्स रॉन्ग विद मी? जिसको उन्होंने काटा हुआ है और व्हाट हैपेंड टू मी? यानी मेरे साथ क्या हुआ है? ये ज्यादा अहम सवाल है बल्कि मेरे साथ क्या गड़बड़ है ये उतना अहम सवाल नहीं है। तो इंडियन पर्सपेक्टिव ऑन चाइल्डहुड ट्रॉमा एंड रिकवरी इसमें तो एकेडमिक बातें भी हुई हैं। बहुत सारी चीजें पता चलेंगी आपको। आज हम बड़े प्रैक्टिकल तरीके से समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर जो हम बिहेव करते हैं वो क्यों करते हैं और क्या हम अपने बिहेवियरल
(02:42) पैटर्न्स को चेंज कर सकते हैं? जैसे हम अपने एंगर पे क्या कंट्रोल कर सकते हैं। क्या हम अपने इमोशनल पर्सपेक्टिव को बहुत अच्छे से समझ सकते हैं? अपनी सुसाइडल या सेल्फ हार्म टेंडेंसी को क्या हम बदल सकते हैं? वो सारी बातें आपको समझने को यहां पर मिलेंगी जो हम सबको पता होनी चाहिए। और खासतौर पे आज हम पेरेंटिंग की बात करेंगे कि इस दुनिया में बच्चा लाने के लिए तो हर कोई हमें समझा रहा है, मोटिवेट कर रहा है, बात कर रहा है। लेकिन जब बच्चा दुनिया में आ गया तो उसको कैसे हमें परवरिश करनी है, इसकी कोई बात नहीं कर रहा है। तो आज हम
(03:14) इन्हीं सारी चीजों को समझेंगे। यह पडकास्ट हमेशा आपको बार-बार देखना चाहिए, समझाना चाहिए और लोगों को दिखाना चाहिए ताकि पेरेंट्स जो हैं बाकी जो अभी पेरेंट्स हो चुके हैं या होने वाले हैं उन तक भी यह पहुंचे और उन्हें पता रहे कि परवरिश करने के लिए आपको क्या-क्या चीजें एकदम जादू की तरह काम कर सकती हैं। तो चलिए आप देखिए इस पॉडकास्ट को। बहुत-बहुत शुक्रिया डॉ.
(03:38) रीरी आप यहां आई। आपने हमें वक्त दिया। बहुत-बहुत धन्यवाद। उम्मीद है कि आज हम बहुत सारी चीजों को आप एकेडमिकली समझा सकती हैं। मुझे पता है आप रिसर्च आपने किया हुआ है। बट मैं चाहूंगा आप मेरे दर्शकों को उनकी भाषा में और बहुत प्रैक्टिकल तरीके से समझाइए उनके एग्जांपल्स के साथ कि जो उनके साथ हो रहा है वो क्यों हो रहा है? वो कैसे इससे बाहर आ सकते हैं? उन सारी चीजों पे हम बात करेंगे। तो सबसे पहले तो सबसे बुनियादी सवाल से ही शुरू करते हैं कि इतना सारा हमने सुन लिया है ना कि थेरेपी, काउंसलिंग और साइकोथरेपिस्ट तमाम सारे नाम आ गए हैं।
(04:09) तो आप सबसे पहले तो ये बता दीजिए हमें कि किसका क्या काम होता है और कैसी समस्या के लिए हम किसके पास जाएं? तो हां जी। हां जी। तो देखिए एक तो होते हैं साइकेटिस्ट जो मेडिकल की पढ़ाई करते हैं तो वो वो जो होते हैं वो ब्रेन और जो पूरा फिजिकल बॉडी है जो हमारा हार्डवेयर है उसकी समझ है जैसे मेडिकल डॉक्टर्स की होती है तो साइकेटिस्ट वो लोग होते हैं जो उनकी पढ़ाई मेडिकल से होती है एमबीबीएस करके फिर एमडी साइकेट्री करते हैं और उनका ज्यादातर वो लोग पढ़ते हैं कि ब्रेन केमिकल्स के बारे में गॉट इट तो उनका प्राइमरी इंटरवेंशन रहता है
(04:44) दवाइयां देना एंटी डिप्रेसेंट हो या बेंजोडाइजरपिंग्स हो तो वो वो सब करते हैं। राइट? एक तरफ होते हैं साइकोलॉजिस्ट जिनकी पढ़ाई मेडिकल से कुछ लेना देना नहीं। उनका थ्योरेटिकल पढ़ाई रहती है। मतलब वो लोग बिहेवियर के बारे में पढ़ते हैं। अलग-अलग बिहेवियरल कांसेप्ट्स के बारे में पढ़ते हैं। फ्रॉयड है, यूंग है। सब अप्रोचेस टू चाइल्ड साइकोलॉजी, एडल्ट साइकोलॉजी वो सब। तो वो एक वो जो होते हैं वो बीए और एमए और एमफिल इन साइकोलॉजी करते हैं। उनका काम है कि लोगों के बिहेवियरों को समझना और उसके बाद साइकोलॉजी की पढ़ाई में तो नहीं पर उसके बाद वो लोग अलग-अलग
(05:19) टेक्निक सीखते हैं। जैसे सीबीटी, आरईबीटी, डीबीटी जैसे वो टेक्निक्स होती हैं जिससे आपके जो इशूज़ हैं एडिक्शन हो, एंगर हो उसको किस तरह से मैनेज किया जाए? हम जनरली आइडियल सिचुएशन में साइकोलॉजिस्ट और साइकोल साइकेटिस्ट साथ में काम करते हैं। जैसे समझो आपको आपके बच्चे को एग्जाम का डर आ गया। बच्चा सोच रहा है अभी मुझे एग्जाम नहीं देने जाऊंगा। तो अनफॉर्चूनेटली लोग सबसे पहले साइकेटिस्ट के पास चले जाते हैं। साइकेट्रिस्ट उनको सोने की दवाई या ऐसे एंटी एंजाइटटी दवाई दे देते हैं तो बच्चे को फर्क लगता है। फिर बच्चे को उसका एडिक्शन हो जाता है।
(05:53) रियलिटी में क्या होना चाहिए कि आपको एक साइकोलॉजिस्ट या काउंसलर के पास जाना चाहिए जो पहले तो बातचीत करके समझे। बच्चे की हिस्ट्री ले और कुछ तकनीकें सिखाएं माइंड बॉडी के ऊपर जो पहले बच्चा ट्राई करे। हम उसके बाद अगर ठीक नहीं हुआ तो साइकेट्रिस्ट के पास जाओ। ठीक है? तो कई ऐसे मेंटल हेल्थ इश्यूज हैं जिसमें साइकेटिस्ट के पास पहले जाना पड़ता है। जहां पे बहुत सीवियर है जैसे बहुत सीवियर स्किजोफ्रेनिया है, बाइपोलर है, बंदा दूसरों को मार रहा है, यू नो घर में वायलेंस हो रही है या बहुत ही साइकोसिस है। मतलब ऐसी बीमारियां जो बहुत इमीडिएट
(06:28) इंटरवेंशन चाहिए। जैसे सुसाइड अटेम्प्ट कर चुका है बंदा दो-तीन बार तो उसको मेडिकेशन की जरूरत पहले पड़ती है। हम तो हमने हमारी बुक में पूरा एक टेबल दिया है कि आप अपना जो मेंटल हेल्थ का जो चैलेंज है वो असेस कर सकते हो कि आपका कितना कॉम्प्लेक्स है अलग-अलग पैरामीटर के हिसाब से जैसे डिप्रेशन एंजायटी आपका बैक हिस्ट्री ट्रॉमा का कितना है। करंट प्रॉब्लम कितने उस हिसाब से आप देख सकते हो कि आपका कितना कॉम्प्लेक्स केस है आपका। हम अगर ज्यादा कॉम्प्लेक्स केस है तो दवाई की जरूरत पड़ती है। अगर कम कॉम्प्लेक्स सबसे कम कॉम्प्लेक्स केस है तो सेल्फ रेगुलेशन
(07:01) टेक्निक्स जो हम कहते हैं खुद जो टेक्निक्स कर सके उससे शुरू करना चाहिए और जो इन बिटवीन ज़ोन है वो एक कंबाइंड एफर्ट रहता है। जैसे काउंसलिंग अभी जैसे साइकोलॉजिस्ट मोस्टली काउंसलिंग करते हैं। काउंसलिंग मतलब क्या-क्या आपसे बातचीत करते हैं। फिर आपको बोलेंगे कि आप ये ये आप तीन चीजें ये हफ्ते में करो। आप ये पांच चीजें करो। राइट? तो ये साइकोलॉजिस्ट हुए। अभी साइकोलॉजिस्ट और साइकेटिस्ट के बीच बहुत सारे और भी थेरेपिस्ट हैं जो अभी हमारी सिस्टम में उनको रेगुलेटरी बॉडी में पहचाना नहीं जाता है। जैसे हिप्नोथेरेपी है, रेकी है, पास्ट लाइफ रिग्रेशन है। ये
(07:37) सब थेरेपीस माइंड पे सबकॉन्शियस माइंड पे काम करती है। हम तो इनको हम थेरेपिस्ट बोलते हैं। हिप्नोथेरेपिस्ट होते हैं। साइकोथरेपिस्ट होते हैं। जो अलग-अलग टेक्निक्स यूज़ करते हैं। जैसे रिग्रेशन, इनर चाइल्ड वर्क ये सब बहुत नया है अभी इंडिया में। बट अभी काफी लोग इसके बारे में बात करते हैं। जैसे मैं एक इनर चाइल्ड थेरेपिस्ट हूं। इनर चाइल्ड मतलब क्या? कि आपके अंदर का जो बच्चा है हम उसके ऊपर काम करना जो सबके अंदर है। सबके अंदर है। जैसे फॉर एग्जांपल आज अगर मुझे हर चीज के बारे में ऐसा लग रहा है कि अरे मेरा मैं इतनी सक्सेसफुल हूं। कुछ हो
(08:12) जाएगा। मेरा सब छीन जाएगा। मेरा सब निकल जाएगा। तो मेरे अंदर शायद एक इनसिक्योर बच्चा है जिसको बचपन में शायद बहुत ऐसा हुआ था कि यू नो कुछ तो चला जाएगा। निकल जाएगा। समझो मुझे पैसे के इशूज़ हैं। बहुत से लोग मेरे पास आते हैं। मैम मेरे पास सब कुछ है आज। इतने पैसे हैं ना बट पता नहीं मैं खर्च नहीं कर पाता हूं। मुझे थोड़ा सा भी खर्च करना पड़े ना तो ऐसे लगता है कि सब कुछ चला जाएगा। नहीं नहीं तो मेरी बीवी बोलती है कि तुम कैसे कंजूस हो। इतने पैसे पड़े तुमको प्रूफ है कि करोड़ों हैं बट ₹10 नहीं खर्च कर कर सकता हूं मैं। तो इनके अंदर एक बच्चा होता है जो शायद बचपन
(08:43) में जिसने [नाक से की जाने वाली आवाज़] गरीबी देखी है या जिसको बताया गया है मां-बाप ने कि देखो भाई पैसे मुश्किल से आते हैं। पैसे कभी आसानी से नहीं आते। कभी खर्च मत करना। या तो उसको एक ऐसा ट्रॉमा हुआ है जिससे ओवरनाइट सारे पैसे चले गए क्योंकि फादर ने स्टॉक मार्केट में गैंबल किया और वह रास्ते पे आ गए तो बच्चे ने वो छोटे से बच्चे ने वो बात पकड़ के रखी है कि भाई पैसे तो कभी भी निकल जाएंगे पकड़ के रखो। अब शरीर बड़ा हो जाता है। हम वो बच्चा तो अंदर रहता है। वो प्रोग्राम के साथ वो बिलीफ के साथ तो हम उस पे काम करते हैं। तो आप कह रहे हो कि कंजूसी भी ट्रॉमा से आ
(09:15) सकती है। अनुभव से आ सकती है। कोई बच्चा कंजूस तो पैदा नहीं होता ना। हम सही बात है। [हंसी] कोई बच्चा पैदा होते ही कंजूस तो नहीं होता। तो कुछ ना कुछ उनके पैदाइशी से लेके उनके जो बिहेवियर में कंजूसी दिख रही है उस उस बीच कुछ ना कुछ तो हुआ होता है। तभी तो वो प्रोग्राम बन जाता है। हम 80 से 90% हमारे प्रोग्राम हमारे एनवायरमेंट से ही आते हैं। बच्चे पैदाइशी से तो ये नहीं सोचते कि जैसे पुलिस मतलब डरना हम राइट? बताया गया। हां बताया गया है। वो बोला गया है कि खाना नहीं खाया ना तो अभी पुलिस को बुलाओगे तुमको अंदर कर देगा। देखो पुलिस अंकल
(09:50) आएंगे ना अभी ऐसे लोग बड़े होते हैं और मुझे बोलते हैं मैम हम ना ट्रैफिक सिग्नल पे बाजू में पुलिस की गाड़ी आती है ना तो हमारी धड़कनें बढ़ने लगती है। हमें लॉजिकली पता है कि मैंने कोई गुनाह नहीं किया है पर पता नहीं क्यों मुझे पुलिस से घबराहट होती है। बड़े लोग बड़े लोग बोलते हैं। फियर फोबियाज़ कहां से आते हैं आप बताओ। कुत्ते का फियर, चूहे कॉकरोच का फियर, अंधेरे का फियर कितने लोगों को होता है। पानी का डर होता है। एक बंदी आई थी हमारे पास उसको बारिश में हमेशा डिप्रेशन हमेशा बारिश में डिप्रेशन। बारिश में डिप्रेशन शी वुड हेट द रेंस
(10:21) और फिर उसको लॉजिकली याद नहीं था कुछ बोले बारिश और डिप्रेशन क्या से क्या लेना देना जब हमने उसके साथ काम शुरू किया तो पता चला कि वो जब छोटी थी स्कूल पिकनिक में गई थी हम तो स्कूल पिकनिक में जो उनका लीड इंस्ट्रक्टर था उसने इस लड़की का सेक्सुअल अब्यूज किया था पब्लिक टॉयलेट में और तब बारिश हो रही थी तो माइंड ने एसोसिएट सी माइंड सेल्स एवरीथिंग एज एसोसिएशंस माइंड ने एसोसिएट कर लिया कि बारिश मतलब घबराहट टेंशन एंज फियर अब्यूज शेम डर्टी फीलिंग शी हेट्स रेंस जब हमने वो उसका मेमोरी चेंज किया रिकंसोलिडेट किया फिर उसका मैसेज आया कि
(10:58) अभी मैं बारिश में डिप्रेशन नहीं होता मैं टोलरेट कर सकती हूं मैं मैनेज कर सकती हूं ऐसे हमारे पास 200 250 जितने डॉक्यूमेंटेड केसेस हैं जहां पे हमने उनका फियर फोबिया बिल्कुल निकाल दिया हो नॉट बाय मैजिक बाय वर्किंग ऑन मेमोरी बिकॉज़ ये आपके मेमोरी में है ना तो जैसे आप कह रहे हो कि आपने फियर फोबिया निकाल दिया इस इस पूरी पूरी प्रोसेस में कितना वक्त लगता होगा ऐसे एक सेशन से दो या तीन सेशन हमें पता चलना चाहिए शुरुआत कहां से हुई है उसमें ये टाइम लगता है अगर एक सेशन में शुरुआत हो गई तो हमें पता चल गया कि वो मेमोरी जैसे हम ये शूट शुरू हुआ उससे पहले बात कर रहे
(11:30) थे इंप्लसिस एक्सप्लस मेमोरी के राइट बच्चा पैदाइशी से कुत्ते से नहीं डरता है हम एक आध बार उसने उसको कुत्ते ने काटा या उसने देखा कि उसके दोस्त के ऊपर कुत्ता अटैक किया तो बच्चे के माइंड में क्या आ गया कुत्ता मतलब डेंजर हम ठीक है फिर एक दो बार गया होगा कुत्ते मम्मी ने बाजार में ऐसे हाथ जोड़ से पकड़ लिया। बेटा कुत्ता आ रहा है। चलो यहां से चलते हैं। तो दो-तीन अनुभव हो गए जिससे बच्चे के मन में डिसाइड हो गया कि भाई कुत्ता मतलब भाई बहुत डेंजरस है। भूल गया बच्चा इसके बारे में। बच्चा 30 साल का है या 28 साल का है। उसकी गर्लफ्रेंड को
(12:03) कुत्ते बहुत पसंद है। वो कह रही है कि मैं तो शादी करूंगी। अगर तूने मेरे तीनों कुत्तों को साथ में मेरे साथ ले आया तो। अब क्या करेगा वो? कुत्ते देख के उसको पैनिकिक अटैक हो रहा है। हम उसको थेरेपी में क्या करते हैं? वो सारे इवेंट्स जो हैं जो मेमोरी है जिसमें [गला साफ़ करने की आवाज़] माइंड ने डिसाइड कर लिया कि कुत्ता इक्वल टू डेंजरस वो मेमोरी हम उसको बॉडी को रिमाइंड करते हैं कब हुई थी कहां हुई थी मेमोरी कैसे होती है एक इमेज होता है हम साथ में एक साउंड होता है राइट आप तो जर्नलिस्ट हो आपको पता है कि हर इवेंट आप कैसे कवर करते हो साउंड होता है इमेज होती
(12:36) है साथ में खुद के बॉडी में क्या फील हुआ वो एक होता है एलिमेंट और आपने लॉजिकली क्या डिसाइड किया ये तीनों को हम आइसोलेट कर देते हैं जब इवन इवेंट से इमोशनल चार्ज निकल जाता है और एसोसिएशन बदल जाता है। तभी वो बंदा सोचता है हां कुत्ता मतलब ठीक ही है। कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे। ऐसे हमारे पास कितने मतलब मैंने कह रहा हूं 200 250 डॉक्यूमेंटेड केसेस हैं जहां पे ये निकल गया है। कितना अब इससे दवाई लेने की जरूरत ही नहीं पड़ती। लोग क्या करते हैं? इनको समझ नहीं आता कि ये मेमोरी रिलेटेड है। ये पढ़ाया नहीं जाता साइकोलॉजी में। ये न्यूरो साइंस की सब्जेक्ट है।
(13:09) हम तो लोग क्या करेंगे? इसके लिए साइकेटिस्ट के पास जाएंगे। साइकट्रिस्ट को यह पढ़ाया साइकेटिस्ट को तो पढ़ाया क्या गया है दवाई देना तो साइकेट्रिस्ट क्या करेगा आपको कुत्ते का फियर है अभी कुत्ता आपकी गर्लफ्रेंड लेके आती है तब आप वो एंटी एंजाइटटी पिल ले लेना हम तो आप स्लो हो जाओगे नींद आ जाएगी बॉडी स्लो हो जाएगा तो कुत्ते का रिएक्शन आपका स्लो डाउन हो जाएगा पर ये सॉलशन तो नहीं हुआ एक्सैक्टली तो ये हम इसको कहते हैं मेमोरी रिकंसोलिडेशन या रिकंसोलिडेशन ऑफ ट्रोैटिक मेमोरी आरटीएम जो बहुत नया ट्रॉमा का एक इंटरवेंशन है न्यूरो साइंस बेस्ड जिसके
(13:44) बारे में हमने दो पेपर पब्लिश किए हैं यूरोपियन जर्नल ऑफ ट्रॉमा और डिसोसिएशन में कि जिन लोगों को कॉम्प्लेक्स ट्रॉमा होता है जिन लोगों को ये बचपन के अब्यूज की वजह से बहुत स्ट्रोमा होता है उनके लिए ये सबसे इफेक्टिव मेथड है। मेमोरी पे सॉरी मेमोरी पे जो काम करती है। लॉजिक पे तो काम करने का फायदा नहीं है। लॉजिकली तो सबको पता है। जिसको कुत्ते का डर है उसको भी पता है कि भाई लॉजिकली तो ये तो मेरी गर्लफ्रेंड का कुत्ता कितना प्यारा है। मगर मैं परमिशन दूं तो मेरे मुंह पे भी चाटेगा। मुझे कुछ नहीं करेगा। इतना अच्छा कुत्ता है पर
(14:13) लॉजिक का काम ही नहीं इसमें। लॉजिक हाईजैक हो जाता है। कौन हाईजैक करता है? आपका बॉडी। क्यों हाईजैक करता है? क्योंकि बॉडी इज ऑपरेटिंग फ्रॉम अ सर्वाइवल मोड। जब आपको कुत्ते ने 2 साल की उम्र में काटा था तब बॉडी को सर्वाइव करने के लिए यह डिसाइड करना पड़ता था कि कुत्ते से दूर रहो भाई। बिल्कुल। तो ये सर्वाइवल वाली डिसीजन हुई। हम सर्वाइवल वाली डिसीजन हमेशा पावरफुल होती है। लॉजिकल डिसीजन से भी ज्यादा। तो लॉजिक को हाईजैक कर देती है। इसमें आप बहुत एक बेसिक फंडामेंटल बात कर रही हैं। लेकिन मुझे ऐसा लगा कि आप बहुत [गला साफ़ करने की आवाज़] इंपॉर्टेंट बात
(14:45) बोलती हैं। जब आपने इसकी शुरुआत ही की है। व्हाट्स रोंग विद मी? यह गलत सवाल है। व्हाट हैपेंड टू मी सवाल है वो जो सही है। यह जो एक फंडामेंटल शिफ्ट है ये कैसे सब कुछ बदल देता है? मतलब ऐसा अगर आप इसको बहुत सही से सोचो और पढ़ते हुए समझ में आता है कि यार ये तो मैजिक हुआ कि व्हाट हैपेंड टू मी से तो बहुत सारी चीजों के मुझे जवाब मिलते जा रहे हैं। तो ये आप आप यहां तक कैसे इस सवाल तक कैसे पहुंचे आप? तो देखिए हम इतने जो 121 साल से हम जो भी हमारी थेरेपी प्रैक्टिस कर रहे हैं जिसमें इतने सारे लोगों के साथ हम काम करते हैं उनके रिलेशनशिप्स पे फियर
(15:17) फोबियास पे एंजाइटटी डिप्रेशन सब पे काम करते हैं। लोग आजकल अभी पिछले 5 साल में ज्यादातर लोग लेबल्स लेके आते हैं। हम मुझे ए्जायटी है। हम मुझे डायग्नोस दिया गया है। मैंने सेल्फ डायग्नोस किया है। मुझे डिप्रेशन है। मुझे ये है। मुझे वो है। तो उनको एक लेबल आ जाता है। एडीएचडी है मुझे। हम राइट? मुझे इंसोमिया है। तो लोग इसमें उलझे रहते हैं। और वो उसको सॉल्व करने की कोशिश करते हैं। एंजाइटटी को कैसे ठीक करूं? डिप्रेशन को कैसे ठीक करूं? हां मेरी बीवी के साथ मेरी बनती नहीं है। कैसे ठीक करूं? और तीसरी बीवी है। पहली दो के साथ भी नहीं बना था।
(15:48) अभी तीसरी लाल तो सो देन वी व्हेन वी वर्क वि देम हमने समझ आया कि भ ये तो जो आप डिस्क्राइब कर रहे हो कि व्हाट्स रोंग वि मी ये तो एक सिम्टम है जैसे आम के पेड़ के आम है हम अगर आम में प्रॉब्लम है तो आम के ऊपर काम नहीं करना है ना भाई पेड़ और उसकी जड़ पे काम करना है तब हमको लगा कि यार ये लोगों की सोच बदलना जरूरी है क्योंकि जब लोग आजकल जो लोग जो भी मेंटल हेल्थ प्रैक्टिशनर्स के पास जाते हैं साइकेटिस्ट के पास जाते हैं साइकोलॉजिस्ट के पास जाते कोई भी प्राणी किलर है कि वो लोग यह लेके जाते हैं कि व्हाट इज रोंग विथ मी? हम मैं फोकस नहीं कर पा रहा हूं। मैं
(16:24) कंसंट्रेट नहीं कर पा रहा हूं। मुझे जैसे कुत्ते का डर है। हां मैं सो नहीं पा रहा हूं। ओवरथिंकिंग बहुत रात को मैं सोचता रहता हूं। मुझे रिश्तों में मेरा हमेशा मुझे धोखा मिलता है या मुझे ना मैरिज से बहुत डर है। मैं शादी नहीं करना चाहता हूं। हम यह मेरा प्रॉब्लम है और ज्यादातर लोग यह यह प्रॉब्लम को सॉल्व करने में लगे रहते हैं। तो उनको सिर्फ सिम्टोमेटिक रिलीफ मिलता है। जैसे मैंने कहा कि गोली खा के सुन हो जाओ या तो यू नो या तो कुछ-कुछ कोप करके कर लो बिजी हो जाओ। हम बट जब हम यह पूछते हैं कि मुझे यह हुआ क्यों? जैसे मैंने आपको भी नहीं पूछा कि
(16:57) पैदाइशी से तो किसी को कुत्ते का डर नहीं होता है। तो यह हुआ क्यों? तो जब हम यह पूछते हैं कि व्हाट हैपेंड टू मी? तब हम उसकी रूट तक जा पाते हैं। कि भाई अगर मुझे शादी से डर है, कमिटमेंट से डर है तो वह प्रॉब्लम नहीं है। प्रॉब्लम यह है अगर सॉल्व करना है तो कहां सॉल्व करना है कि वो डर शुरू कहां से हुआ? अगर मुझे आज एंजायटी है तो ए्जायटी को दबाने से एंजायटी को सॉल्व करने से प्रॉब्लम सॉल्व नहीं होगा। एंजायटी क्यों हो रही है? क्योंकि शायद मेरे बचपन में मुझे बहुत प्रेशर था पढ़ाई का या बचपन में मेरा एनवायरमेंट ऐसा था कि मेरा बॉडी हमेशा नर्वस सिस्टम
(17:34) हाइपरविजिलेंट रहती थी। फाइट और फ्लाइट में रहती थी। घर में मां-बाप की बहुत लड़ाई होती रहती थी। और इसकी वजह से बचपन से मुझे मेरी आदत पड़ गई है कि हमेशा एक्सपेक्ट करना कि कुछ गलत होगा, गलत होगा, गलत होगा जो आज 30 साल में एंजायटी के फॉर्म में बाहर आ रहा है। और ये जो बचपन की मेमोरीज है वो जाती कहीं नहीं है। रहती हैं अंदर। तो यह प्रश्न जब हम पूछते हैं तो हम रूट कॉज तक जाते हैं। वरना हम ऊपर का ए्जायटी को दबा दिया। डिप्रेशन आ गया। डिप्रेशन को दबा दिया। फिर पता चला बंदा शराब पीने लग गया। अभी शराब की लत छूट गई तो अभी उसको
(18:07) पोंड की लत लग गई। तो कहीं ना कहीं हम क्या कर रहे हैं? हम इसको दबा के इसको दबा रहे। हां। तो कहीं ना कहीं। सो देन वी वी रियली आस्क्ड आवरसेल्व्स कि वी शुड गो। और मेरा तो यह चाइल्डहुड ट्रॉमा का अनुभव बहुत पहले का है। बिकॉज़ हम लोग जितने क्लाइंट्स के साथ काम करते हैं, हमें पता चला कि यह सब कुछ ज्यादातर बचपन से जुड़ा हुआ है। और लोगों को ये समझ नहीं है। लोग पूछते हैं ऐसे कैसे हो सकता है? वो तो 30 साल पहले की बात है मैम। बीच में तो कुछ भी नहीं हुआ। आपके लॉजिक से तो हमेशा मुझे एंजायटी होनी चाहिए। बीच में क्यों कुछ नहीं हुआ?
(18:35) राइट? अगर मेरा बचपन जीरो टू 18 इयर्स में समझो ट्र्रामा वाला था। घर में बहुत लड़ाई होती थी, गाली गलौज होती थी। मुझे बहुत स्ट्रेस रहता था। पर बीच में तो कुछ नहीं हुआ। फिर मुझे 30 साल की उम्र में क्यों पैनिकिक अटैक शुरू हो गए? यह कॉमन क्वेश्चन है लोगों का। बिल्कुल। और मेरा जवाब यही है। जवाब मैं एक छोटी सी कहानी में बताती हूं। कि मैं आज एक ऊंट जा रहा है डेजर्ट में। हां। मैंने उसके ऊपर 100 किलो का एक आलू का एक बोरी रख दिया। सैक रख दिया। ऊंट फिर भी चलेगा। दो एक और 100 किलो का रख दिया। तो ऊंट अभी धीरे चलने लग गया है।
(19:09) हम एक और 100 किलो। अभी 300 किलो ऊंट के पीठ पे है तो ऊंट खड़ा हो गया है। पर लोगों को तो क्या दिखता है? ऊंट अभी भी खड़ा है भाई। राइट? अब मैंने उसके ऊपर किताब रख दी और ऊंट गिर गया। हम लोगों को क्या लगता है? अरे मैम ने किताब रखी और ऊंट गिर गया। देखो किताब से किताब घर गिरी। किताब नहीं रखते तो नहीं गिरता। तो किताब की वजह से गिरा क्या? किताब के रखने से पहले जो कुछ वो उठा के चल रहा था उसकी वजह से गिरा है। पर आपको वो दिखा नहीं। तो लाइफ में यही होता है। 30 35 साल तक तो हम क्या करते हैं? फाइट मारते रहते हैं। पहले पढ़ाई करो, फिर अच्छी जॉब लो,
(19:45) फिर शादी करो, फिर उसके चैलेंजेस को सॉल्व करो। बच्चों को पढ़ाओ लिखाओ कुछ-कुछ करके हम स्मोक करके ड्रिंक करके कुछ के चला लेते हैं। बाद में जब सब सेटल होता है तब ये या तो फिर कुछ एक इंसिडेंट हो गया और पूरा हमारा पहाड़ टूट पड़ता है। हम बॉडी का एक एक रेजिलियंस लेवल होता है। कोई किसी की 20 साल में टूट जाता है। किसी का रेजिलियंस किसी का 30 साल में टूटता है। किसी का 50 तक नहीं टूटता है। किसी को 60 साल में डिप्रेशन आता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि वो है नहीं। वो पड़ा हुआ है। पड़ा हुआ है अंदर। पर आप कितना उसको दबा सकते हो। कितनी क्षमता है आपकी दबाने की?
(20:18) कितनी क्षमता है कि उसके बावजूद आप अपना चला रहे हो। वो ऊंट की कितनी क्षमता है? अगर ऊंट ने ज्यादा खाया पिया तगड़ा वगड़ा है, मसल ज्यादा है तो शायद और अच्छा तो क्या यहां ये ये भी समझाइए आप कि क्या उस क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। हां जी बिल्कुल 100% और ये भी हमने बुक में डाला हुआ है कि जब ये क्षमता को हम इमोशनल रेजिलियंस कहते हैं। तो इमोशनल रेजिलियंस मतलब क्या कि एक इलास्टिक रबर बैंड कैसा होता है कि आप जब जरूरत पड़े तो खींचेगा। हम जब जरूरत नहीं पड़ी तो वापस अपनी पोजीशन में आ जाएगा। हमारी इमोशनल स्ट्रेंथ रेिलियंस इसको
(20:51) बोलते हैं कि जब तनाव हो, जब स्ट्रेस हो तो हम उसके साथ कोप अप कर सके। हमारी नर्वस सिस्टम ऐसी होनी चाहिए कि जब तनाव में हम लड़ सके, भाग सके। राइट? पर जब वो तनाव चला गया है तब हमको वापस रिलैक्स मोड में आना चाहिए। अगर हमारी ये फ्लेक्सिबिलिटी है अंदर की तो हम तनावों को झेल सकते हैं। पर अगर हमने रबर बैंड को खींच खींच खींच के इतना खींचा कि वो टूट गया तो वो नहीं झेल पाएंगे। तो जब बच्चा बच्चे की ये जो नर्वस सिस्टम है वो वो जीरो से 18 साल की उम्र में अगर आपने इतना खींची इतनी खींची कि वो टूट गई तो वो बच्चा बड़ा हो के रेजिलियंट कैसे बनेगा?
(21:27) हम [गला साफ़ करने की आवाज़] कैसे बच्चे की रेिलियंट टूटती है? जब बच्चे को हर बार बोला जाता है कि तू बेकार है। तेरे से कुछ नहीं होगा। देख तेरी बहन कितनी स्मार्ट है। तू कितना डफर है। या तो तू काला है। तेरी नाक गंदी है। तेरे से कोई शादी नहीं करेगा। या तो तू कभी सुनता ही नहीं है। पता नहीं तू क्यों पैदा हुआ। पता नहीं तू तो हमारे नाक कटवा के रहेगा। या तो फिर बच्चा घर में ही देखता है कि मम्मी पापा बहुत लड़ाई करते हैं। या तो साइलेंट ट्रीटमेंट देते हैं। तो ये सब चीजों की वजह से बच्चे की नर्वस सिस्टम हमेशा के लिए वो स्ट्रेस मोड में
(21:55) रहती है। बचपन से। बच्चा हमेशा एक्सपेक्ट करता है कि अभी अगले घंटे में कुछ होगा। देखो अभी पापा ऑफिस से आए ना अभी सब कुछ होने वाला है। अभी देखो अभी दादा जी आएंगे ना तभी इनकी लड़ाई होगी। पता है अभी देखो कल स्कूल जाऊंगा अभी टीचर मेरे को डांटने वाली है। पक्का मुझे पता है और अभी रिसर्च में ये बच्चे मेरे को मजाक करेंगे। तो बच्चा क्या करता है? कास्टेंटली एंटीिसिपेट करता है कि कुछ ना कुछ गलत होगा कुछ ना कुछ। तो उसकी नर्वस सिस्टम डिसरेगुलेट हो जाती है। तो नर्वस सिस्टम डिसरेगुलेट हो जाती है। उसके ब्रेन सेंटर्स पे इफेक्ट पड़ती है। ये बच्चा या
(22:22) तो शटडाउन हो जाता है। मतलब जैसे हमने कहा पत्थर जैसा कोई फर्क ही नहीं पड़ता यार जो करना है करो। हम या तो फिर बिल्कुल टूट के वो होते हैं ना बच्चे जो लो कॉन्फिडेंस लो सेल्फ वर्थ मैं बेचारा मेरे से कुछ नहीं होगा ऐसे हो जाते हैं या तो फिर बगावत करने लगते हैं हम जाओ सबको मारो पीटो मुझे घर पे मार पड़ती है मैं 10 बच्चों को स्कूल में जाके मारता हूं तो कहीं ना कहीं ये इमंबैलेंस दिखने लगता है बिल्कुल पर लोगों में अवेयरनेस नहीं है तो लोग इसके बारे में कुछ करते नहीं है फिर ये बच्चा बड़ा होगा शादी करेगा तो शादी पे इंपैक्ट होगी बच्चों पे इंपैक्ट होगी
(22:53) करियर पे भी इंपैक्ट होगी क्योंकि यही बच्चा ऑफिस में जाएगा अभी ऑफिस में अगर उसका बॉस निकला जो उसके बाप जैसा दिखता है तो ट्रिगर हो जाएगा। अब बॉस चाहे कितना भी अच्छा हो पर अगर उसकी मूछ उसके फादर जैसी है। मेरे पास एक क्लाइंट आया था। बोला था कि आईआईटीआईएम में पढ़ा हुआ गोल्ड मेडलिस्ट था और उसकी ट्रांसफर हुई थी एक अच्छी सी कंपनी में उसको जाना था। अभी वो नया बॉस उसको कुछ नहीं पता। जीरो बैकग्राउंड पर वो बॉस की मूछे उसके पापा जैसी। अब जैसे [नाक से की जाने वाली आवाज़] ही वो बॉस के कैबिन में आया उसकी हार्ट रेट बढ़ गई। उसको पसीने-पसीने छूट गए और वो कुछ बोल ही
(23:24) नहीं पा रहा है। अब ये बॉस ने तो कुछ किया ही नहीं। मतलब ही इज़ अ न्यू गाय। देन हमें पता चला कि ये बच्चे के पापा जो है वो मिलिट्री में अब डिफेंस में थे और उसको पढ़ाई नहीं की तो क्रिकेट बैट से मारते थे। तो ये बच्चा मार खा के आईआईटी किया, आईएम किया, गोल्ड मेडल सब कुछ किया। पर उसके अंदर वह फादर की जो मूछे थी और फादर की जो परसोना थे और दैट गॉट एसोसिएटेड विथ फ़ियर। तो अभी वो जब जॉब करने में जा रहा है तो बॉस की मूछ देख के उसका बॉडी अलार्म में चला जाता है। सोचो आप भाई साहब। अभी इसको हमने समझा नहीं तब उसको कनेक्शन पता ही
(23:58) नहीं चला। उसको लगा व्हाट इज रोंग विथ मी? मेरे में कुछ गड़बड़ है भाई। मैं पहले दिन ऑफिस में जाता हूं। मुझे क्यों पैनिकिक हो गया? मुझे क्यों पसीना हो गया? समथिंग इज रोंग विथ मी। मैं पागल हूं। अगर वो समझो जिस जिसने ये समझा नहीं उसके पास जाता तो उसको दवाई दे देता। तुम्हें एंजायटी है चलो एंजायटी की गोली खा लो। पर जब हमने यह समझा तो हमने फादर वाले जो सारी मेमोरीज थी वह हमने रिकंसोलिडेट करी। उसके बॉडी में जो फादर के लिए जो गुस्सा था जो बहुत सारी नफरत थी वो निकाली। फिर उसके नीचे पापा के लिए जो उसका प्यार था वो भी नहीं वो सब लेयर्स होते हैं।
(24:31) वो सब बाहर है। फिर बोलता है कि मैम अभी बॉस के आगे कुछ नहीं होता मेरा। अभी आई एम अबब्सोलुटली फाइन। तो क्या किया हमने? जादू नहीं किया हमने। हमने सिर्फ जो एसोसिएशन था हम वो बदल दिया। जैसे वो बुलेट वाला एग्जांपल आपको दिया तो जैसे ये ये हम लोग के यहां पे बहुत ज्यादा है। खासतौर से इंडियन सोसाइटी में तो परंपरा प्रतिष्ठा अनुशासन और जो भी परंपरा प्रतिष्ठा अनुशासन के बाहर जाएगा उसके साथ हर तरह का ट्रीटमेंट होगा यहां पर। मीम एक हम लोग देख रहे थे। एक रील थी सॉरी। तो उस रील में हंसी में ही थी वो। लेकिन बड़ी स्ट्रांग बात वो बोल रही थी
(25:05) रील कि कुछ भी गड़बड़ हुआ। अच्छा आज मन नहीं कर रहा है तो बच्चे को पीट दिया। कुछ गिर गया तो बच्चे को पीट दिया। नॉर्मलाइज कर देते हैं। अभी हंस हंस हंस के हम इसको नॉर्मलाइज कर तो ये लेकिन जिसके साथ हो रहा है ये आप उस फेस से बाहर आ गए हो तो फिर भी आप उसको देख सकते हो अलग तरह से बट जो क्योंकि बहुत सारे लोग इससे गुजर रहे हैं। तो ये जो बच्चों को पीट देने की टेंडेंसी है और इसको बहुत ही नॉर्मल माना जाता है कि मतलब मेरा ही तो बच्चा है। इसको अरे तो मारे अरे मुझे क्लाइंट्स ऐसा क्या कहते हैं बताइए? अरे हमें तो मैम बेल्ट ट्रीटमेंट मिलती थी। मतलब हम तो पापा रोज
(25:37) ही बेल्ट से मारते थे। तो हम तो ऊपर से कंपेयर करते थे। कहा तेरे को कितनी पड़ी? तेरे को 10 पड़ी। अच्छा मेरे को 12 पड़ी डस दैट मीन कि उसको इसकी असर नहीं हुई है। यह सिर्फ कवर है उससे कोप अप करने का। क्योंकि अगर आप हर बार वो बेल्ट ट्रीटमेंट के बारे में सोचोगे और उतना ही दुख अनुभव करोगे तो आप जी कैसे पाओगे? तो बॉडी क्या करता है? कोप अप करने के लिए इसकी हंसीज़ाक कर लेता है। फिर मैं उनको यह पूछती हूं कि जब आप पांच साल के थे, आठ साल के थे और जब ये बेल्ट पड़ती थी तब आपको हंसी आती थी? नहीं। तब नहीं आती थी। तब तो दुख होता था,
(26:06) गुस्सा आता था, तकलीफ होती थी। फिर एक पॉइंट आ गया कि तब आपने सोच लिया कि इतना दुख इतना तकलीफ, इतनी गुस्सा हर रोज अनुभव करना उससे अच्छा है भाई पत्थर ही बन जाओ कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा। सो वी नंबर सेव्स आउट। जब पत्थर बन जाते हैं तो पापा 10 बार मारे कि 15 बार मारे क्या फर्क पड़ता है? तो ये भी एक बॉडी का सर्वाइव करने का तरीका है। इसका मतलब ये नहीं कि बॉडी को ट्रॉमा नहीं हुआ है पर वो दब गया है। तो इसमें हम दोनों बातें करेंगे। यहां से शुरू करते हैं कि जैसे जो पेरेंट्स ये मान रहे हैं आज की तारीख में जो देख भी रहे होंगे दर्शक कि भाई मेरा बच्चा है
(26:36) और इसको मुझे सिखाना है इसको मुझे डिसिप्लिन में लाना है। अब इसको डिसिप्लिन में लाना है और जैसे मैं सोच रहा हूं वही मतलब उनकी डिसिप्लिन की जो भी परिभाषा है क्योंकि उनको ऐसे ही बड़ा किया गया है। उनको ऐसे ही बड़ा किया गया है। वो मान रहे हैं। ये उस बच्चे के लिए कितना घातक हो सकता है। ये उस बच्चे के लिए कितना डेंजरस हो सकता है। यस। यह बुक मैंने इसीलिए लिखी है। आई विल टेल यू ऑनेस्टली क्योंकि मैं मानती हूं कि अगर मां-बाप के पास सही तरीके मिले ना तो कोई मां-बाप देखो बच्चे को इसलिए नहीं पैदा करता कि उनको मारे। कोई मां-बाप इसलिए बच्चे दुनिया में नहीं
(27:06) लाते कि चल ना एक बच्चा और लाती हूं ताकि मैं मारू इसको रोज। राइट? मां-बाप के इरादे तो सही होते हैं। उनको जेनुइनली आई एम टॉकिंग ऑफ़ 95% पेरेंट्स। 5% होंगे जिनको मेंटल हेल्थ इश्यूज हैं। वो शायद पीटते होंगे जानबूझ के। बट मोस्ट पेरेंट्स जो बच्चों को मारते हैं उनको जेन्युइनली लगता कि मारने से मेरा बच्चा सुधरेगा और वो बोलते भी हैं कि तू कैसा है अगर तुझे मारा नहीं होता तो तू इतना नहीं आगे निकल आता पता नहीं कहां तू कुछ अभी भीख मांग रहा होता राइट बोलते हैं तो मां-बाप जेनुली तो उनको पता नहीं है सही तरीका उनको ये किसी ने एडजुकेट ही नहीं किया है
(27:36) कि भाई अगर बच्चा रोज मार खा रहा है तो उसके नर्वस सिस्टम पे क्या इंपैक्ट पड़ रहा है उसकी ब्रेन सेंटर्स पे क्या असर पड़ता है उसके एमेकडेला पे उसके हिपोकैंपस की उसकी मेमोरी सेंटर पे क्या इफेक्ट पड़ता है उसका जो प्रीफ्रंटल कॉर्टस के उस पे क्या इफेक्ट पड़ता है ये मां-बाप को पता नहीं है। इसलिए मां-बाप क्या करते हैं जो हमारे साथ किया वो इनके साथ करो। और मां-बाप को किसी ने यह भी नहीं सिखाया कि भ आप मार खा के बड़े हुए हो। पर आज अगर आपको 30 साल की 35 साल की उम्र में डायबिटीज है, ब्लड प्रेशर है, आपको तंबाकू खाने की जो नशा है, इसका आपके मार खाने से
(28:04) जुड़ा हुआ है। वो लोग समझते नहीं। हम ग्लोबल रिसर्च है। 30 साल का दुनिया भर का रिसर्च है। 100 से ज्यादा पेपर्स हैं इसके बारे में। दुनिया भर में सब लोग ये समझते हैं। सिर्फ हमारे देश में जब मैंने पीएचडी शुरू की तब ये दो-तीन पेपर्स थे सिर्फ छ आठ साल पहले चाइल्डहुड ट्रॉमा पे। तो इंडिया में इसकी हां दो और एक केरला से था एक कुछ पता नहीं कहीं तो कुछ ईस्टर्न स्टेट से था। कोई मैंने जब मेरा पीएचडी इस पे शुरू किया चाइल्डहुड ट्रॉमा एंड इंपैक्ट ऑन मेंटल हेल्थ तब इंडिया से मुश्किल से दो या तीन पेपर थे और बाहर के 100-100 से ज्यादा
(28:35) पेपर्स थे। और इस पे इसलिए मैंने पीएचडी किया और तब मुझे पता चला कि इंडिया में इसकी कितनी जानकारी का अभाव है। इसलिए मैं मेरे सोशल मीडिया हैंडल्स पे सिर्फ इसी के बारे में बात करती हूं। तो कमिंग टू योर पॉइंट के पेरेंट्स को सही तरीका पता नहीं है। हम पेरेंट्स को यह पता होना चाहिए कि जो चीज आप बच्चे को सिखा रहे हो ना वो मारपीट के बगैर भी सिखा सकते हो। पर उसके लिए आपको खुद रेगुलेटेड रहना पड़ेगा ना। अगर आपका गुस्सा आपकी नाक की टोच पे। अगर आपको ही आपके पिताजी ने और माताजी ने मार मार के बड़ा किया है तो योर नर्वस सिस्टम इज़
(29:05) डिसरेगुलेटेड। मतलब आपका ब्रेन सेंटर्स इस तरह से कुछ हो गया है कि या तो आप शट डाउन हो हम या तो आप एकदम हाइपर विजिलेंट और एशियस किस्म के पेरेंट हो बहुत जल्दी ट्रिगर हो जाते हो क्योंकि आपने वही देखा है मैंने हमने पहले बात की थी तीन रिस्पांस होते हैं बहुत स्ट्रेस में या तो आप वायलेंट हो जाते हो या तो आप शट डाउन हो जाते हो या तो आप बिल्कुल ही हेल्पलेस होपलेस हो जाते हो अभी ये जब बंदा पैरेंट बनता है तो पैरेंटिंग में भी यही आता है ना उसी वही तीन रिसों्ससेस हां हां तो यही पेरेंट्स हैं जो बच्चों को मारते हैं क्योंकि उनको उनको खुद उनका
(29:35) एंगर ही कंट्रोल नहीं हो पाता है। देखिए सही पैरेंटिंग के लिए ना मेहनत लगती है। सबसे आसान शॉर्टकट पैरेंटिंग के दो किस्म का। एक तो बच्चे को मारो पीटो कंट्रोल करो। मैंने कहा इसलिए करना है बस। और नो क्वेश्चंस आस्क्ड। उसमें जीरो टाइम लगता है। आंख दिखाई, डंडे से मारा, बच्चे ने रिजल्ट दे दिया, काम कर दिया। शॉर्टकट। हम दूसरा सबसे आसान तरीका है परमिसिव पेरेंटिंग। कुछ मतलब बच्चे को सब छूट दे दो। हम चल बेटा फोन चाहिए, फोन ले ले। बेटा पढ़ना नहीं है कोई बात नहीं मत पढ़ना हमारा घर का बिजनेस है तेरे सब संभल जाएगा डोंट वरी बेटा गाड़ी चलानी है 15 साल में ठीक है जा
(30:09) चला ले इसमें भी कोई मेहनत नहीं लगती है ये भी गलत है ये भी गलत है इसको परमिसिव पैरेंटिंग बोलते हैं मैंने ये बुक में लिखा हुआ है ये एक एक्सट्रीम परमिसिव पैरेंटिंग इसमें बच्चे सेल्फिश बनते हैं हम सेल्फ सेंटर्ड बनते हैं जो हम कहते हैं ना कि बड़े मां-बाप का बिगड़ा बच्चा टाइप्स जरूरी नहीं कि बड़े पैसे वाले परिवारों में हो ये मिडिल क्लास में भी रहते हैं कि ये बच्चे ऐसे होते हैं जो सोचते हैं कि दुनिया मेरे इर्द-गिर्द घूम सिर्फ मेरी जरूरतें क्यों? क्योंकि मां-बाप ने उसको ऐसा ही ट्रीट किया है कि बेटा तुझे क्या खाना है वही बनेगा। तुझे
(30:41) आज घर में भिंडी बनी नहीं खानी है। चलो बेटा मैं तुम्हारे यहां आलू बना देती हूं। तो ये बच्चा क्या सीखता है कि मैं जो कहूं वही होगा दुनिया में। दुनिया मेरे इर्द-गिर्द घूमेगी। माय नीड्स आरेंट। डिसिप्लिन रूल मुझे कोई नहीं अप्लाई करता है। अब ये बच्चा जब दुनिया में जाता है दुनिया तो वैसी है नहीं। फिर वो कूदेगा, रोएगा या तो दूसरों को ब्लेम करेगा। टीचर [गला साफ़ करने की आवाज़] खराब है, बॉस है, एनवायरमेंट टॉक्सिक है, लोग खराब है। बस मैं अच्छा हूं। तो यह परमिसिव पैरेंटिंग है। आजकल ज्यादा दिख रहा है। मजेदार बात ये है कि जो मां-बाप
(31:12) हम अपने बचपन में जिन्होंने ये जो अथॉरिटेरियन पैरेंटिंग देखा है हम हम यू नो द कंट्रोल, डिसिप्लिन, मारपिटाई वाला वो लोग परमिसिव बन जाते हैं जब मां-बाप बनते हैं तो। क्योंकि उनमें ये प्रोग्राम रहता है कि मैं मेरे पापा की तरह नहीं बनूंगा। भाई मेरे मम्मी पापा तो इतना मुझे कंट्रोल करते मेरे बेटे को मैं जब पेरेंट बनूंगा ना तो मेरे बच्चे को पूरी फ्रीडम दे दूंगा। तो क्या हुआ अभी आप दोनों एक्सट्रीम स्टाइल में ऑपरेट कर रहे हो। ये दोनों ही शॉर्टकट है। सही पैरेंट सही पैरेंटिंग वो मैंने इसमें लिखा है। इज अ गुड मिक्स ऑफ़ बोथ कि जहां
(31:47) पे आप पैरेंट बने रहो। दोस्त मत बनो। हम्म। बच्चे को रूल रेगुलेशन समझाना है। बच्चे को पता होना चाहिए कि घर में सब 8:00 बजे साथ में खाते हैं। हम बट उसमें बच्चे को फ्रीडम मिलनी चाहिए कि भाई ठीक है मुझे आज भिंडी नहीं खानी तो मैं सिर्फ रोटी और दही खा लूंगा। हम तो गुड मिक्स ऑफ कंट्रोल एंड रिसेप्टिवनेस टू द चाइल्ड। ये रिसर्च के ऊपर आधारित है। डायना बमरेन ने बहुत सालों पहले इसके ऊपर रिसर्च किया था पैरेंटिंग स्टाइल पे। उसके बाद बहुत सारा इसके ऊपर रिसर्च हुआ है। तो वो स्टाइल सबसे अच्छा है जिसमें देखा गया है कि बच्चों की इमोशनल रेिलियंस
(32:20) बढ़ती है। ये बच्चों की एकेडमिक परफॉर्मेंस भी बहुत ज्यादा बढ़ती है। जो बच्चे इस तरह से बड़े होते हैं कि जिनको एक अच्छा बैलेंस मिलता है। कंट्रोल भी होता है घर में पर बच्चों को अपना मंतव्य एक्सप्रेस करने की छूट मिलती है। बच्चों को अपना पॉइंट ऑफ व्यू एक्सप्रेस कर सकता है। बच्चा यह जरूर कह सकता है कि मुझे भिंडी नहीं अच्छी लगती है। नहीं खानी है। बट उसको यह पता है कि नहीं तो जो भी है बाकी का वह खाना पड़ेगा। सो देयर इज अ गुड मिक्स ऑफ कंट्रोल एंड रिसेप्टिवनेस। उसको बैलेंस्ड पैरेंटिंग बोलते हैं। इसके लिए मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि इसके लिए
(32:49) मां-बाप को पहले तो शांत रहना पड़ता है। हम अगर [नाक से की जाने वाली आवाज़] बच्चे ने भिंडी नहीं खाई तो उसको पुलिस की धमकी देके भिंडी खिलाना वो सबसे आसान है। या तो फोन आजकल तो मैं देखती हूं फोन रख देते हैं सामने। हां ये तो सबसे अरे मैं अभी एयरपोर्ट पे थी तो वो लॉन्ज में एक आई मदर ऐसे बेटी को बैठाया। अभी बेटी समझो 8 9 साल की है। छोटी नहीं है। ऐसे बेटी को बैठाया पूरा प्लेट भर के खाना ले आई। फोन रख दिया सामने और चम्मच भरभर के बेटी के मुंह में ठूस रही है। एक बार तो इतना गरम खाना आया कि बेटी ने ऐसे किया फिर भी वो अंदर। तो बेटी को कोई सेंस ही
(33:19) नहीं है कि मैं कितना खा रही हूं। मुझे कितनी भूख है। पेट भरा नहीं भरा। कुछ नहीं। बस मां का काम था खिलाना। तो फोन रख दिया और बेटी के मुंह में ठोसे ठोसे। जैसे प्लेट खत्म हो गई। मां को लगा खा लिया है। फ़ ले लिया हाथ से प्लेट [हंसी] रख के। ये क्या है? और लोग बड़ा गर्व से बताते हैं कि ये तो जब तक ये फलाना वाला वो पोकोमलन नहीं देखता है ना। अभी ये बच्चा अभी ये बच्चा ये बच्चा बड़ा होगा इसको बॉडी के साथ कोई कनेक्शन ही नहीं है। उसको समझ ही नहीं है कि मेरे पेट में कब भूख लगी है। कब मेरी भूख मिटी है। कब मुझे खाना दो रोटी से मेरी भूख आज खत्म
(33:53) होएगी कि तीन रोटी से। तो यह बच्चा बड़ा होके भी टीवी के सामने चार दो पिज़्ज़ा खा लेगा पूरा उसको समझ नहीं आएगा। तो ईटिंग डिसऑर्डर्स, ओबेसिटी, एनोरेक्सिया, बुलीमिया ये सब इससे जुड़ा हुआ है। उसको तो आदत पड़ चुकी है। वो बिना देखे खा ही नहीं। हां। और अगर समझो बिना देखे खाने बैठे तो उसको समझ नहीं आएगा कि कितना मतलब कम खा लेगा या ज्यादा खा लेगा। उसको समझ ही खाने की सेंस ही नहीं होगी। जो हर कुत्ते बिल्ली इंसान में होती है। जो मैमल्स आप देखो कुत्ते को जोर जबरदस्ती करके खिलाओ। वो नहीं खाएंगे। कोई एनिमल जबरदस्ती नहीं खिलाता। सिर्फ
(34:23) इंसान ऐसा है जो जबरदस्ती खिलाते हैं हम उसको ओवर ईटिंग आई एम अ पेट पेरेंट मेरे पास कुत्ता है मुझे पता है उसको कई दिन होंगे जब वो उपवास करेगा खाएगा ही नहीं क्योंकि उसको इंटेलिजेंस से समझ आ रहा है कि आज मेरे बॉडी में नहीं चाहिए और खाना तो वो एक दिन तक नहीं खाएगा ये इंसान में भी है ये कैपेबिलिटी बट हम उसको सिस्टेटिकली मार देते हैं क्योंकि मम्मीियों को तो यह रील देख देख के ऐसा किसी पेडियटिशियन ने बोल दिया किसी डॉक्टर ने बोल दिया किसी इन्फ्लुएंसर ने बोल दिया कि नहीं उसको तो कार्ब चाहिए प्रोटीन चाहिए वेजिटेबल्स चाहिए ये चाहिए वो चाहिए तो मम्मी वो पूरी
(34:52) प्लेट सजा के अभी यही खाना है। बट ऐसा नहीं होता है। बच्चे को बच्चे को हर दिन अलग-अलग रिक्वायर आज बच्चा दो रोटी खाएगा। कल एक ही खाएगा। इट्स ओके। बिकॉज़ उसने कल शायद वेदर अलग है। शायद उसका मूड नहीं है। शायद उसने कम मेहनत की है। तो बच्चे को समझ आना चाहिए। मुझे याद है मेरा बच्चा छोटा था ना तो हफ्ते में दो दिन तो ऐसे होते थे जब वो डिनर ही नहीं खाएगा। हम्म। तो और वैसे भी शुक्ला था तो लोग कहेंगे कैसी मम्मी है। इसको नाच गाना करके खिलाओ। इसको कुछ-कुछ टीवी देख के खिलाओ। कुछ भी करके इसको खिलाओ। मैंने कहा अरे ये इंसान का बच्चा इसको पता चलता है कब उसको नहीं
(35:25) खाना है तो नहीं खाना है मतलब ठीक है ना तो आई यूज्ड टू नॉट लेट हिम ईट ही वास फाइन आज वो 6.5 फुट का है भाई बराबर से एकदम स्टंग कुछ उसको प्रॉब्लम नहीं हुआ तो मुझे पेरेंट्स को बताना पड़ता है कि यार कभी-कभी बच्चा एक आध बार ना खाए दो चपाती के बदले एक चपाती खाया ना भी खाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता है। पर पेरेंट्स इसको ले इतना टॉक्सिक बना देते हैं खाने का समय हम मार बच्चे को डांटते हैं डराते हैं धमकाते हैं ताकि वो खा ले अभी इसमें मैंने समझाया है कि डरा के धमका के जब बच्चे को खिलाते हो तो उसका डाइजेशन जूसेस तो सीक्रेट ही नहीं
(36:01) होता ठीक से क्योंकि बच्चा फाइट एंड फ्लाइट में होता है। तो ये मैंने बहुत सिंपल भाषा में इसलिए समझाया है। जब आप स्ट्रेस में होते हो ना, तो आपका नर्वस सिस्टम कुछ इस तरह से भगवान ने बनाया है कि जब आप तनाव में होते हो तो योर बॉडी इज रेडी टू फाइट। फाइट और फ्लाइट। मतलब या तो आप झगड़ा मारो मतलब यू फाइट या तो भाग जाओ। उस समय आपके बॉडी का जो सारा ब्लड फ्लो है ना वो हाथ पैर में डायरेक्ट हो जाता है। ताकि आप एनिमी के साथ लड़ सको या भाग सको। तो सारा ब्लड फ्लो यहां से कम हो जाता है और हाथ पैर में आ जाता है। आपके मसल टाइट हो जाते हैं। आपका हार्ट रेट बढ़ जाता है।
(36:35) आपका ब्रीदीिंग बढ़ जाता है। और जो डाइजेस्टिव फंक्शन है, रिप्रोडक्टिव फंक्शन है वो सब डीप प्रायोरिटाइज कर देता है बॉडी। क्योंकि तो अब डाइजेस्ट करने की जरूरत नहीं है। जब आप डेंजर में हो, आपके ऊपर जब एक जंगली जानवर अटैक कर रहा है तो आपको तो खाना पचाने की थोड़ी ना पड़ी होती है। तब आपको तो भाग नहीं पड़ी होती है। तो जब बच्चा बच्चे के बॉडी को यह नहीं समझ आता है कि मम्मी इज डेंजरस और टाइगर इज डेंजरस। बच्चा तो स्ट्रेस में मतलब बॉडी विल ऑटोमेटिकली डीप प्रायोरिटाइज तो आपका जो डाइजेस्टिव जूसेस है उसका सिकक्रशन कम हो जाता है और कॉर्टिजोल
(37:05) एड्रिनल स्ट्रेस हॉर्मोन बॉडी में आने लगते हैं बच्चे का मसल टाइट हो जाता है बच्चा ब्रीथिंग फास्ट कर बच्चा बच्चा स्ट्रेस में है तब खाना जो आप कितना भी न्यूट्रिशियस खाना दो नहीं बचेगा अच्छा तो ये देखिए बहुत अच्छी आपने बात बोली एक पैटर्न मैंने देखा कि मैं मैंने डिबेटिंग की है कॉलेज के टाइम से तो जब भी मैं डिबेट में जाता था और अगर मैंने पहले खाना खा लिया है तो मुझे बहुत प्रॉब्लम होती थी हम्म मैं खा मतलब मैं नहीं कर सकता हूं। तब से आज तक का यह रूल है कि इफ आई हैव टू शूट इफ मैं कुछ भी ऐसा कर रहा हूं। मेरे को यह पडकास्ट रिकॉर्ड करना है। मैं दो
(37:36) ढाई तीन घंटे तक पहले कुछ नहीं खाता हूं। करेक्ट बिकॉज़ योर बॉडी इज नॉट डिज़ टू डाइजेस्ट फूड दैट टाइम। जब खतरा चला जाता है बॉडी जब पैरासिंैथेटिक नर्वस सिस्टम्स मोड में आता है जिसको हम रेस्ट और रिपेयर मोड कहते हैं। तब डाइजेस्टिव जूसेस सीक्रेट होंगे। आपका तब नींद होगा। तब आपकी जो रिप्रोडक्टिव हॉर्मोंस हैं वो बैलेंस होंगे। तब आपका सेक्स ड्राइव इसलिए तो क्रॉनिक स्ट्रेस की वजह से सेक्सुअल डिस्फंक्शन हो रहा है लोगों को। फर्टिलिटी कम हो रही है लोगों में। बिकॉज़ ये क्रॉनिक स्ट्रेस की वजह से स्ट्रेस यस। बिकॉज़ स्ट्रेस के टाइम पे
(38:04) रिप्रोडक्शन, डाइजेशन ये सब डीप प्रायोरिटाइज कर देता है बॉडी। बॉडी क्या प्रायोरिटाइज करता है? लड़ो, भागो, लड़ो, भागो, लड़ो, भागो या तो शट डाउन हो जाओ। तो कितनी बार मैं समझाती हूं मेरी रीलो में कि भाई बच्चों को डराधम के अगर बच्चा प्यार से रोटी, नमक भी खा रहा है ना बट बड़े रिलैक्स मूड में खा रहा है तो उसका फायदा होगा। बट आप उसको यार डरा के धमका के खिला रहे हो उसका कोई पॉइंट नहीं है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] हमारे यहां तो डायलॉग्स भी ऐसे हैं। शोले का नहीं है कि सो जाओ वरना गब्बर आ जाए। हां बस अरे [हंसी] मैं कह रही हूं मेरे पास देखो मैं बच्चों
(38:35) के साथ नहीं काम करती हूं। मैं सिर्फ बड़ों के साथ करती हूं। ठीक है। ऐसे ऐसे बड़े आते हैं जिनको भूत प्रेत का डर है। ये सब बचपन से ही आता है। बचपन से मम्मी ने डराया है। अभी एडल्ट हो के पता है कि ये सब नहीं है। प्रोवन नहीं है। बट उनको बस वो ऐसी बातें होती है तो उनको घबराहट होने लगती है। क्योंकि मम्मी ने बचपन से हर रोज खाने के टाइम पे बोला खाना नहीं तो काला बाबा आके तुमको उठा के ले जाएगा। तुम्हारा गला काट देगा, हाथ पैर काट देगा। ऐसे सब डराते हैं तो बच्चा डर के मारे खा लेता है। बट मां-बाप को पता नहीं है कि इसकी क्या
(39:01) इंपैक्ट होती है। ऑन अ सीरियस नोट कि जो जो पेरेंट्स इस तरह से अपने बच्चों को ट्रीट करते हैं जिन्हें लगता है कि वो तो मारपीट नहीं रहे हैं। वो सिर्फ ये डरा दे रहे हैं या ये सिर्फ कह दे रहे हैं पुलिस अंकल आ जाएंगे। ये तो लो ना इसको इमोशनल अब्यूज कहते हैं। या तो फिर पता है मम्मीियां क्या करती? गिल्ट ट्रिप। बेटा तूने नहीं खाया ना तो देखो मम्मा रोने लग जाएगी। बेटा तूने आज खाया नहीं तो मैं भूखा। एक मेरे पास क्लाइंट आता है। बोले मैम मैं ना एग्जाम में हर बार मैं फर्स्ट ही आता हूं। अगर मैं सेकंड भी आया ना तो पापा खाना नहीं खाएंगे दो
(39:31) दिन तक। सोचो आप प्रेशर एकोटा की बात कर रहे थे ना आप मां-बाप ऐसा करते हैं। अभी मतलब क्या इसको इसको मार मारा पीटा नहीं है पर इमोशनल अब्यूज कहते हैं इसको। क्योंकि बच्चे को कांस्टेंटली दिमाग में रहता है कि मेरी वजह से पापा भूखे जाएंगे तो मुझे लाना ही पड़ेगा। अभी ये बच्चा जब एक बार तीसरा चौथा रैंक आया पढ़ ही नहीं पाया। मरने जाएगा। वो बोलेगा मेरी वजह से पापा अब पापा को बोलो भाई आपको खाना है तो खाओ नहीं खाना है तो मत खाओ यार ये बेटे को क्यों आप ब्लैकमेल कर रहे हो और पेरेंट्स को लगता है कि इससे मेरा बेटा पढ़ेगा उनको ये नहीं समझ आ रहा है कि ये
(40:03) प्रेशर से बेटा कब तक झेलेगा ये प्रेशर 12 10वीं तक 11वीं तक फिर इन बच्चों को 12th जब घोड़े को रेस में दौड़ना होता है तब तो ब्रेकडाउन हो जाता है बर्न आउट हो जाता है ये बच्चे वो कितने बच्चे हमारे पास बड़े आते हैं मैम 10वीं तक हम हमेशा फर्स्ट आते थे फिर पता नहीं क्या हो गया। बस फिर सब डाउन ही ले गया। उसके बाद मैं आगे निकल ही नहीं पाया हूं। क्योंकि वो आर्टिफिशियल प्रेशर बना बना के आपने घोड़े को मार मार के भगा। एग्जांपल दिया आपने। होता ही है ये। पता नहीं क्यों बच्चों को बताता नहीं है कोई। बड़े भाइयों से पूछो। 11वें में सबके नंबर
(40:37) कम आते [हंसी] हैं। वो अरे मैं तो कहती हूं 10वें में भी कम आए तो क्या जब रियल एग्जाम है तब मैं पेरेंट्स को बहुत बोलती हूं। मेरा बेटा फिफ्थ ग्रेड में फेल। अरे फिफ्थ ग्रेड में सिक्स्थ ग्रेड में फेल होने दो। दो चार बार फेल होगा ना तो बच्चा सीखेगा कि भाई कैसे आगे बढ़ते हैं फेल हो के मां-बाप क्या करते हैं बच्चे को फेल ही नहीं होने देते प्रेशर बढ़ा-बढ़ा के अब ये बच्चा जब बड़ी एग्जाम होती है ना तब फेल होता है तब झेल ही नहीं पाता झेल ही नहीं पाता है मैं ज्योग्राफी में फेल हुई थी मुझे जिंदगी भर याद है एक बार फेल हुई थी ज्योग्राफी में 35 34 मार्क आए
(41:06) थे बाबा पर मुझे पता है कि वो वो फेलियर ठीक है इट इज़ इट इज़ मैनेजेबल मेरा बेटा भी वही इसमें मैंने बुक में मैंने बहुत पर्सनल नेक डोज़ लिखी मेरे बेटे ने भी हमने उसको वही बोला था कि बेटा तुझे क्या वो बोले मम्मी मम्मी मुझे जो सब्जेक्ट अच्छा लगता है मैं पढूंगा केमिस्ट्री बिल्कुल पसंद नहीं है। मुझे आगे काम भी नहीं है तो मैं उसमें जस्ट पास हो जाऊंगा। मैंने कहा ठीक है जस्ट पास वी अग्री ओके पर जिसमें इंटरेस्ट था मैथ्स उसमें 100 में से 100 लेके आया आर्ट में इंटरेस्ट था तो 96 लेके आया जिसमें इंटरेस्ट नहीं था नहीं लाया पर
(41:33) हम वी वर ओके वी सेड के बेटा करना क्या है मुझे ये अच्छा लगता है ठीक है वो जितना मन आए वो कर पेरेंट्स क्या करते हैं पता है जो तू जिसमें वीक है ना उसमें तू ज्यादा मेहनत कर अभी जिसमें आप वीक हो जो सब्जेक्ट आपको पसंद नहीं उसमें आप ज्यादा मेहनत करके कभी भी टॉप टॉप तो आ ही नहीं पाओगे ऊपर से आप कॉन्फिडेंस भी आपका धुल जाएगा और जितनी बार मेहनत करोगे और रिजल्ट नहीं मिलेगा आपको लगेगा अरे मैं तो बेकार हूं। उससे अच्छा है कि जिसमें आप अच्छे हो उसमें जितना घंटा निकालना है निकालो भाई। उसमें आप एक्सपर्ट हो सकते हो और जो नहीं अच्छे
(42:04) हो ना उसमें निकल जाओ बस काफी है। ये भी मैं पेरेंट्स को कहती हूं। पेरेंट्स तो ही समझते हैं। एक पर्सनल वाक्या कि मैं [हंसी] क्लास थर्ड तक हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ा। और हिंदी मीडियम भी एकदम वैसा हिंदी मीडियम जहां कक्ष लिखा रहता था। तृतीय, द्वितीय और हम लोग मे आई कम इन सर को बोलते थे आचार्य जी प्रवेश। अरे वाह। तो फिर हमारे घर वालों को पता चला कि नहीं यार ये तो अंग्रेजी तो पक्का सीखनी चाहिए। तो मुझे उठा के इंग्लिश मीडियम स्कूल में डाल दिया गया। और मेरे घर का माहौल हिंदी और मैं हिंदी मीडियम का टॉपर मतलब वही चीज। सेकंड आ गई तो मतलब कुछ जीवन खत्म।
(42:39) उस तरीके का है ना। मेरी मदर तो जाती ही नहीं थी। अगर पेरेंट्स मीटिंग में मैं फर्स्ट नहीं आया हूं। बाप रे तो शी विल नॉट गो। माय फादर माय फादर विल गो। शी विल नॉट गो। तो मां नहीं जाएंगी फिर। तो यह एक तरीके का वो भी था कि मम्मी को ले जाना है तो तुमको फर्स्ट ही आना पड़ेगा। बहुत अच्छी चीज बहुत ही छोटी की बात है। फोर्थ में मैं जिस अंग्रेजी माध्यम स्कूल में गया तो वहां की प्रेयर मुझे आज तक याद है। तो मुझे तो मैं या कुंदु तुषार हार धवला संस्कृत पढ़ता था। अब वहां पर वो लोग अंग्रेजी में सारी प्रेयर्स चल रही हैं। और मुझे आज भी याद है मेरे अगल-बगल के वो
(43:10) बच्चे आई वाज इन क्लास फोर्थ। और वो मैं लिप्सिंग कर रहा हूं। कुछ अजीब लिप्सिंग कर रहा हूं क्योंकि मुझे मैं इंग्लिश भी नहीं आती। अच्छा भाई अब ये हुआ तो वहां पर मैं पढ़ रहा हूं स्थानीय मान वहां पढ़ रहा है प्लेस वैल्यू फेस वैल्यू ये वो अगल-बगल इट इज एक्चुअली वेरी ट्रोैटिक बगल में बच्चा बैठे हुए हैं और मैं इत्तेफाक से मेरी टीचर जो क्लास टीचर थी उसने क्यों किया ऐसा क्या किया उन्होंने मुझे बैठाया एकदम जो क्लास के जब से वीक स्टूडेंट्स थे उनके आसपास अब वो बड़े नोटोोरियस हैं देयर इज नो वन टू अंडरस्टैंड मी मैं घर पे आ रहा हूं घर
(43:43) पे एकदम हिंदी ज्यादा माहौल है और सबको लग रहा है कि अरे इसके तो अब हम तो देखो कितना बड़ा त्याग कर रहे हैं कि इसको पढ़ा रहे हैं। मेरी रैंक आई कुछ क्लास में 45 45 बच्चे थे। मेरी रैंक आई कुछ 38 मेरा तो प्रोसेस ही नहीं हो पा रहा है। ये हो क्या रहा है? मेरे साथ हो क्या रहा है। करेक्ट करेक्ट करेक्ट। जो [हंसी] वो लेकर के जब घर पहुंचा हूं तो उनको भी नहीं प्रोसेस हो पा रहा है। पर यार ये कैसे यार मतलब देखो एक चीज बताऊं। बच्चा स्कूल बदलता है ना तो सिर्फ मार्क्स का लैंग्वेज का ट्रॉमा नहीं होता है। नया माहौल राइट? नए बच्चे तो अनसेफ फील होता है।
(44:17) बहुत कम बच्चे होते हैं जो कहते हैं कि मैम हर बार स्कूल बदली तो मुझे बहुत मजा आया। बहुत कम बच्चे होते हैं। ज्यादातर बच्चे बोलते हैं कि मैम शुरू का छ महीना तो आई डिडंट नो व्हाट आई वास डूइंग। कहां हूं मैं? क्या क्लास फोर्थ में हूं मैं। मतलब आप इमेजिन करिए कि अच्छा उसमें टीचर्स का आपको रोल बताता हूं। टीचर्स भी एकदम कुछ नहीं समझ रहे हैं। मतलब घर वाले भी नहीं समझ रहे। चलो ठीक है। कोई बात नहीं। टीचर भी नहीं समझ रहे हैं। टीचर्स नहीं समझ रहे हैं। वो बोल रहे हैं अरे तुम तो जब मतलब मुझे एक्जेक्टली याद है उनके शब्द मैं नाम नहीं लूंगा उन लोग
(44:45) सबका ही इसमें कंट्रीब्यूशन है। बट उनके शब्द थे कि जब तुम आए थे तो मुझे लगा था तुम तो बहुत ब्रिलियंट स्टूडेंट हो। बट सॉरी आई एम रियली डिसपॉइंटेड टॉक्सिक शेम। इससे शर्म आ जाती है। आपको ये ने बोला। उसके बाद का आपको मैं पैटर्न बताता हूं। मेरा कोई दोस्त नहीं है। मैं अकेले पढ़ता चला जा रहा हूं। घर में शेम हो रहा हूं। मेरी क्योंकि हमारा गांव पास में था तो हम ट्रेन से जाते थे। तो वहां पर आसपास के सब लोग हैं और वो पूछ रहे हैं कि और सब बच्चे से मिलेंगे तो क्या पूछेंगे भैया कैसी पढ़ाई चल रही है? अब वो पूछ रहे हैं मेरे
(45:14) से भैया आपकी कौन सी रैंक आई? अब मैं बोल रहा हूं वो ना मेरा हिंदी से [हंसी] इंग्लिश में कहानी बतानी पड़ती है। अब जब मेरी मम्मी को गुस्सा है। अरे तो मम्मी वो पूरा कि तुम्हें शर्म नहीं आती है। कोई पूछता है तो तुम ये पूरी राम गाथा बताते हो। कोई नहीं समझ पा रहा है। मेरे जो ट्यूशन टीचर्स आ रहे हैं वो भी नहीं समझ पा रहे हैं। वो भी सब शेम ही कर रहे हैं। एवरीबडी अराउंड मी वो सब शेम कर रहे हैं मेरे को। एनी हाउ पता नहीं क्या है। वो अपना है वो लड़ने की ताकत जो भी जब मैं वहां से तो वो प्राइमरी स्कूल था। फिफ्थ तक था। फिफ्थ के
(45:45) बाद उनकी बिल्डिंग चेंज हो जाती थी। तो फिफ्थ में जब मैं वहां से खत्म करके निकल रहा था तो मुझे वहां पर मेरी 11वीं रैंक आई 11th और वहां टॉप 10 के नाम लिखे जाते थे बोर्ड पे। तो जब मेरी 11वीं रैंक आई तो मैं तो रो पड़ा कि अरे यार ये तो बहुत क्रेजी हो गया। बस एक ही रैंक से तो रह गया इसमें आने के लिए। करेक्ट। तो [हंसी] मैंने बोला तो मैं रोने लगा तो मैम बोलती है कि हां हां नंबर इंप्रूव हो सकते थे। कोई नहीं बेटा रोते नहीं। मैंने कहा नहीं मैम मुझे तो इतने की भी उम्मीद नहीं थी। [हंसी] मेरी मां बाहर आई। बोलती वैसे थोड़ी बहुत
(46:19) तो इज्जत बची हुई थी। तूने ये क्यों? [हंसी] अरे यार तो मैं ये बताना चाह रहा हूं कि उस वक्त में मैं अब तो खैर अपनी मदर से भी सब बातें करता हूं। उनको भी नहीं पता था। वो अपने हिसाब की बहुत अच्छी पेरेंटिंग कर रही थी। बहुत सारी चीजें की। सो मेरा एक पूरी बात बताने का तात्पर्य यह है कि हमारे यहां पे बहुत सारी अवेयरनेस ही नहीं है जो आप ये कह रही है ना कि पेरेंटिंग करते कैसे हैं? आप इस पे बात कर रही हैं कम से कम। यह बात हुई नहीं है। हमारे यहां बच्चा पैदा करने को एक नियम बना रखा है कि शादी करनी है, बच्चा बड़ा हुआ है, शादी
(46:48) करनी है, बच्चा पैदा करना है। उसको पालना कैसे नोबडी नोस नोबडी टॉक्स अबाउट दैट कोई सास अपनी बहू को ये नहीं बता रही है कि वो ये बता रही है कि बच्चा चाहिए वंश आके पालना है लेकिन वो ये नहीं बता रही कि भैया पालना या तो फिर हमने पाला वैसे तुम पाला बहू पता है स्मार्ट स्मार्ट बहू क्या कहती है पता है इसीलिए आपकी तरीके से नहीं पालना है क्योंकि मैं देख रही हूं कि आपके पालन [हंसी] पोषण का क्या परिणाम के साथ मैं जी रही हूं तो ये है यस अच्छा हां इसमें एक लास्ट मैं इसको कंक्लूड कर दूं जब मैंने स्कूल चेंज हुआ मेरी बिल्डिंग चेंज हो गई जगह नई हो गई सब
(47:18) नया हो गया और मेरी एक टीचर मिली जिन्होंने मुझे क्लास मॉनिटर बना दिया। आई डोंट नो व्हाई। वहां से चीजें एकदम चेंज होने लगी कि यार मेरा एक एक पिछला जो मेरा पास्ट था वो पास्ट मेरे से एकदम कटा जब ना तो मुझे लगा नहीं मेरी लाइफ चेंज हो रही है। कुछ हो रहा है ये। कुछ तो बहुत बढ़िया हो रहा है। और वहां से फिर ट्रेजेक्टरी चेंज हो गई। अब इसमें कितने सुंदर इत्तेफाक हैं कि वैसी टीचर मुझे मिली। हैं? क्रेडिट गोज़ टू अपराजिता मैम। पता नहीं कहां है वो मुझे नहीं पता। अच्छा इसमें इंटरेस्टिंग चीज ये है कि जो बच्चे उस वक्त में मेरे से मिलना
(47:52) मतलब मुझे ऐसे हेयर दृष्टि से देखते थे अब उनके मैसेजेस आते हैं। हां और मुझे वो सब याद आ जाता है कि अच्छा देखिए आपने जो बताया ना अपराजिता मैम शी इज अ बफरिंग एडल्ट जो हम कहते हैं। मैंने ये बुक में बताया है कि जब बच्चों के ट्रोैटिक एक्सपीरियंसेस होते हैं। बचपन के बना बचपन के प्रतिकूल अनुभव बहुत सारे होते हैं। चाइल्डहुड ट्रोमा होता है। सर अगर उस बच्चे की लाइफ में कोई एक एडल्ट हो जो बच्चे को पॉजिटिव एक्सपीरियंस दे जिसको हम पीसीई बोलते हैं जिसका अभी दुनिया भर में बहुत नया रिसर्च चल रहा है तो वो पीसीईस हैव द कैपेबिलिटी टू ऑफसेट द
(48:25) नेगेटिव इंपैक्ट ऑफ एसीई हम पीसीई मतलब क्या पॉजिटिव चाइल्डहुड एक्सपीरियंस अगर कोई एक इंसान हो आपकी लाइफ में चलो मम्मी इमोशनल ब्लैकमेल कर रही है पापा साइलेंट ट्रीटमेंट दे रहे हैं समझो घर पे बहुत प्रेशर है घर पर समझो वातावरण तनाव पर स्कूल में एक टीचर है या आपका क्रिकेट कोच ऐसा है या आपका दादा दादा दादी या नाना नानी ऐसे हैं जो आपको मोटिवेट करे जो आपको बोले कि नहीं बेटा तू कर सकता है या बोले कि चल बेटा तुझे रोना है चल बैठ समझा क्या हुआ उसको हम बफरिंग एडल्ट बोलते हैं अगर एक भी ऐसा एडल्ट बच्चे की लाइफ में है ना तो चाइल्डहुड
(48:56) ट्रॉमा की इंपैक्ट कुछ बहुत हद तक कम हो सकती है ये भी रिसर्च कहता है और इसको बोलते हैं हम पीस पॉजिटिव चाइल्डहुड एक्सपीरियंसेस मतलब उस उसको क्या उसमें आता है कि बच्चा अगर ये फील करे कि कोई तो मुझे सुनने वाला है कोई तो मेरे में विश्वास रखने वाला है अगर घर में मां-बाप ने कह दिया कि तेरे तो कुछ भी नहीं होता है। तू तो नाक कटवा रहा है। तू तो मेरे सात पीढ़ी का कलंक है। पर अगर टीचर स्कूल में बोल रही है या तो अंकल आंटी पड़ोसी है कोई या तो कोई कोच है या तो कोई नाना नानी मौसा फूफी कोई भी है जो कह रहा है कि बेटा तू कर सकता है। मुझे
(49:28) तेरे पे विश्वास है। या वो बच्चे को जब रो रहा है उसको संभालते हैं। जिसको बोलते हैं इमोशनल सपोर्ट देते हैं। या बच्चों को यह फील कराते हैं कि यू बिलोंग। यू कैन डू इट। यू आर इंपॉर्टेंट। बेटा सुन रहा हूं मैं। तुझे क्या फील हो रही है? बता क्या लग रहा है तुझे? तो वो वो जो ट्रॉमा की इंपैक्ट वो बहुत हद तक कम हो सकती है। तो हम पता है इस पर कैसे आए? हमने स्टडी किया कि यार जो लोग हमारे पास मेंटल हेल्थ इश्यूज लेके आते हैं उनमें सब में ट्रॉमा तो है ही है। ज्यादा है। पर ऐसे बहुत से लोग हैं जिनको ट्रॉमा ज्यादा है पर फिर भी मेंटल हेल्थ इश्यूज
(50:02) नहीं है या बहुत कम है? तो उनमें क्या है? बिल्कुल सही बात। तफावत क्या है? कौन से [गला साफ़ करने की आवाज़] लोग ऐसे हैं इनमें क्या हुआ इनके साथ कि इतना ट्रॉमा होने के बावजूद भी आज वो अपनी लाइफ संभाल रहे हैं। आज वो ठीक-ठाक हैं। उनको कोई चैलेंजेस नहीं है। तब पता चला कि उनकी लाइफ में ऐसे पॉजिटिव चाइल्डहुड एक्सपीरियंस दे रहे हैं। फिर हमने ग्लोबल रिसर्च इंडिया में अभी तो भाई रिसर्च पता नहीं क्यों कोई नहीं कर रहा है। फिर हमने सारा ग्लोबल रिसर्च देखा। तो अभी बहुत नया पिछले कई सालों में ग्लोबल रिसर्च हुआ है व्हिच वैलिडेटेड आवर
(50:32) फीलिंग के यस इट इज द पीसीईस। अगर आप पीसीईस बच्चे की लाइफ में दो तो एसीस की इंपैक्ट बहुत हद तक कम हो सकती है। हर वर्ड का इसका स्टडी है। हां। अच्छा। और ये पीसीस क्या? मतलब बच्चे को ये लगे कि मैं बिलोंग करता हूं। बच्चे को अगर एक कम्युनिटी फीलिंग आए जैसे रिश्तेदारों में बच्चे को लगे कि हां कोई है मेरे अंकल आंटी है, फैमिली है मेरा। उनके बच्चे के दोस्त हैं जिसको जिसके साथ बच्चा बातचीत कर सके। तो ये लोग जल्दी टूट नहीं जाते। इनमें इमोशनल रेिलियंस बढ़ती है। पर जो बच्चा जिसका घर का माहौल खराब है, जो जिंदगी भर यह सुन रहा है कि तू कुछ नहीं कर सकता है।
(51:05) तू बेकार है, तेरे से कुछ होगा नहीं। जो घर में मारपिटाई देख रहा है, जिसको स्कूल में बुलिंग हो रहा है, जिसको टीचर्स ने भी राइट ऑफ कर दिया है, मतलब ये तो बेकार है। उसकी संभावना डिप्रेशन, ए्जायटी, सुसाइड की कई गुना बढ़ जाती है। और जिसके लाइफ में कोई ऐसा एडल्ट नहीं है जो उसको सपोर्ट कर पाए। हम जो स जो अच्छे भले एडल्ट्स हैं हम उनको पूछते हैं। हमने स्टडी करने पर पूछा था कि आपका इतना ट्रॉमा है फिर भी क्यों आपको ये सब नहीं है क्या? बोले नहीं आंटी मैम मेरी दादी थी ना 15 साल तक मेरी दादी थी तो वो मुझे संभालती थी। सुन लेती थी।
(51:37) सुन लेती थी। प्रोटेक्ट करती थी। सुनती थी। अगर मैं कुछ नहीं बोलती थी। उनका कुछ घर में चलता नहीं था। मम्मी पापा के आगे। पर मैं जाके उनके पास रो सकता था। दादी सुनती थी मेरी बात। दादी मुझे सपोर्ट करती थी। या तो कोई बोलता था कि मैम मैं क्रिकेट में जाता था। मेरा कोच था ना जिंदगी भर उसने मेरा हाथ पकड़ा। घर में तो क्या माहौल था मतलब घर में जाता ही नहीं था। घर में जाने से पहले मुझे पैनिकिक होता था कि आज घर में क्या नया होगा ड्रामा। पर बस मेरे क्रिकेट ग्राउंड पे जो कोच थे वो उन्होंने मुझे किसी ने बड़ी किसी गेस्ट से ही मेरी बात
(52:08) हो रही थी। तो हम कुछ इसी चीज पे बात कर रहे थे। तो उन्होंने ये पीसी को बोला था कि मुकुल ऐसे लोग एंज्स होते हैं। यस। तो मैं लोगों को कहती हूं कि अगर आपने चलो आपके बच्चे नहीं है पर आप किसी बच्चे की लाइफ में यह तो अनुभव दे सकते हो ना जरूरी नहीं कि यू हैव टू बी अ पेरेंट अगर आप पेरेंट नहीं हो पर आप एक कोलीग हो आप एक फ्रेंड हो आप एक नेबर हो आप एक अंकल हो आंटी हो मासी हो काका हो तो आप अगर आपके इर्द-गिर्द ऐसे बच्चे हैं जिनको ट्रॉमा हो रहा है उनके मां-बाप नहीं सुधर रहे हैं तो कम से कम आप तो वो बफरिंग एडल्ट बनो उस बच्चे के लिए
(52:40) क्या पता उसकी लाइफ की ट्रेजेक्टरी पूरी बदल जाए आपकी वजह से ये मैं सबको कहती हूं कि जरूरी नहीं नहीं है कि एक अच्छा पेरेंट ही अपने बच्चे को बना सकता है। बच्चे की लाइफ कई बार पेरेंट्स गंदे होने के बावजूद बच्चे की लाइफ बनती है। जब कोई एक या दो इंसान उसकी लाइफ में है जो पेरेंट नहीं है फिर भी उस बच्चे को संभाल लेते हैं। ट्रू अच्छा आपके थ्रू ये बात जरूर जानी चाहिए। जैसे बहुत सारे लोग हैं आज की जनरेशन में जो ये इस पक्ष में भी आ गए हैं कि यार हमको किड्स नहीं करते। है ना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] बहुत बहुत बड़ा वर्ग है। अब उसके लिए बहुत सारे
(53:11) लॉजिक दिए जाते हैं। बताया जाता है कि नई दुनिया बदल रही है। एंटीनेटलिज्म जैसे कांसेप्ट्स आ गए हैं। अब लोग बहुत लिगेसी विगेसी नहीं बोलते हैं। भैया हम अपना जिएंगे और जी के जाएंगे। मत याद रखना उनको। तो उस एक उस तरफ हम बढ़ रहे हैं आधी दुनिया और अभी भी बाकी लोग भी लगे हुए हैं जो उसी प्रोसेस में हैं कि यार अब तो शादी हो गई। अभी मैं कुछ वक्त पहले एक दोस्त से बात कर रहा था। तो उसने बोला कि यार शादी हो गई है अब तो बस बच्चा करना है और ऐसा लग रहा था जैसे कि एक प्रक्रिया है ये [हंसी] कि प्रक्रिया करनी है अच्छा ठीक है तो यार
(53:45) बहुत तनाव हो रहा है जिंदगी में बहुत तनाव हो रहा है समझ नहीं पा रहा हूं मैं कि ये क्यों हो रही है ड्रिफ्ट क्यों आ रही है बड़ी मुश्किल हो जाती है लाइफ ये वो वो मैरिज की प्रॉब्लम्स बता रहा है देन व्हाट ही इज सेइंग एज अ स्यूशन कि यार बच्चा पैदा करना अरे भाई ये तो तो जो लोगों को यह लगता है बहुत बड़ी जनता है जिसको ये लगता है बहुत पेरेंट्स हैं जिनको लगता है कि भैया अच्छा दोनों में लड़ाई हो रही नहीं बन रही अभी बच्चा हो जाएगा सब सही हो जाएगा ऐसे लोग क्या कर रहे होते हैं उस बच्चे के साथ होने वाले बच्चे के साथ क्या करेंगे
(54:16) ऊपर से बच्चा ज्यादा लड़ाई में बड़ा होगा और बच्चे की वजह से और भी लड़ाईयां बढ़ेगी क्योंकि वैसे भी आपका तो कोई मन मन मेल हो नहीं रहा है पैरेंटिंग की वजह से भी बहुत ज्यादा झगड़े हो रहे हैं कपल्स में ऐसे कपल्स हैं जिनकी पहले बहुत अच्छी बनती थी बच्चे आने के बाद झगड़े ज्यादा शुरू हो गए क्योंकि पैरेंटिंग स्टाइल भी खुद के चाइल्डहुड के ऊपर डिपेंडेंट होती है। अभी समझो कि लड़का है ऐसे परिवार में बड़ा हुआ है जहां पे सब छूट मिलती है उसको। लड़की ऐसी बीवी उसकी ऐसे परिवार में से आई है जहां पे बहुत कंट्रोल है। तो बीवी सोचती है कि मेरा अप्रोच सही है। हस्बैंड
(54:46) सोचता है कि मेरा अप्रोच सही है। दोनों की लड़ाईयां होती है। उसमें बच्चा आ जाता है। हम तो बच्चा तो बिल्कुल पिस जाएगा बीच में। हम तो एक तो मैं ये कहूंगी पहले कि कि अगर शादीशुदा जीवन में प्रॉब्लम है तो प्लीज बच्चा मत लाओ। प्लीज मत लाओ। क्योंकि ऊपर से प्रॉब्लम्स मल्टीप्लाई होंगे बच्चे की वजह से क्योंकि बच्चा आने से हॉर्मोनल चेंजेस होते हैं वाइफ में पोस्टमार्टम डिप्रेशन भी आ सकता है और बच्चे के फिर हर डिसीजन में तनाव रहेगा क्योंकि आपको वैसे भी आपका तो कुछ सेटिंग है नहीं अभी बच्चे को कौन सी स्कूल में डालना कैसे खिलाना कब
(55:20) सुलाना बच्चा मस्ती कर रहा है तो उसको मारना चाहिए कि उसको नहीं मारना चाहिए इसमें भी लड़ाईयां होती है तो बच्चा पैदाइश से ही देखता है कि पापा मम्मी तो मैं पैदा हुआ तब से लड़ ही रहे हैं अभी मैं 50 का हूं अभी भी लड़ रहे हैं हम ये बच्चे हैं जो बड़े होकर शादी नहीं करना चाहते। हम कितने लोगों से बात की? बोले मैम शादी में क्या रखा है? हमने देखा है ना बड़े होते हुए मेरे मां-बाप आज तक लड़ रहे हैं। क्यों शादी करनी है? उनकी लड़ाई की वजह से मेरे मेंटल हेल्थ पे इतना इंपैक्ट पड़ा है। मुझे शादी नहीं करनी है। मुझे शादी पे विश्वास ही उठ गया है। क्या मिला है इनको
(55:49) शादी करके? पूरा दिन तो एक दूसरे के गले पे लगे रहते हैं पकड़ के। तो दिस इज अ होल जनरेशन हु डोंट वांट टू गेट मैरिड। आई एम नॉट सेइंग ऑल ऑफ देम का यह रीजन है पर मोस्ट पीपल का यह रीजन है कि उनको लग रहा है कि फायदा क्या हुआ इससे? क्योंकि पेरेंट्स भी कई बार बच्चों में कंफ करते हैं। जैसे मम्मी कंफाइड करती है कि अरे मैं तो इतना गोल्ड मेडलिस्ट हूं। मैंने यू नो एमएससी किया है और देखो मैंने शादी करके मेरी तो जिंदगी बर्बाद हो गई। ये साससुर की सेवा करते-करते ननंद के पैर चूतेचूते घर में सब काम करते-करते मैं तो आधी बूढ़ी हो गई। बेटा तू कभी ऐसा मत
(56:21) करना। हम कहती है मम्मीियां बहुत सारी कहती है। ऐसी मम्मीियां है जो शादी ना करने के लिए भी बोलती हैं। हां बोलती है ना बहुत कहती क्योंकि खुद का फ्रस्ट्रेशन है। बाद में उनको समझ आता है कि मैंने गलत किया। पर जब बच्ची छोटी होती है तो मम्मी को क्या लगता है कि बच्ची मेरी फ्रेंड है। आजकल पेरेंट्स में उनको ये लग रहा है कि भ वेस्टर्न मॉडल हम और वेस्ट का ये बड़ा कांसेप्ट है। कूल पेरेंट्स। तो कूल पेरेंट्स मतलब ये नहीं कि तुम बच्चे को अपना दोस्त मानो। बहुत से मम्मी ऐसा करती है। पापा भी करते हैं बच्चों को दोस्त मानने लगते हैं।
(56:47) नहीं मानना है दोस्त। नहीं मानना है। बिल्कुल नहीं मानना है। बच्चे के लाइफ में बहुत दोस्त हैं अपने उम्र के भाई। उनको मां-बाप चाहिए। मां-बाप की एक अलग जगह है। दोस्त की अलग जगह है। आप वो मिक्स अप मत करो। क्योंकि मां-बाप है जो स्ट्रक्चर दे सकते हैं, जो डिसिप्लिन दे सकते हैं, जो एक प्रेडिक्टेबिलिटी दे सकते हैं। फ्रेंड नहीं दे सकते ये। आप यह बोल रही हैं कि जो यह एक ट्रेंड के लिए हम सुनते हैं और बहुत गुड पेरेंटिंग में माना जाता है कि हम अपने बच्चों को तो एकदम दोस्त की तरह ट्रीट करते हैं। गलत है। बी अ फ्रेंडली पैरेंट बट डोंट बी
(57:18) अ फ्रेंड टू योर पे टू योर चाइल्ड। व्हाट्स रोंग? व्हाट्स रोंग? [गला साफ़ करने की आवाज़] जब दो आप अपने बच्चे को दोस्त की तरह ट्रीट करते हो। आपकी अथॉरिटी चली जाती है। ठीक है? बच्चा कहेगा कि नहीं मैं जो कहूंगा वही मम्मी करेगी क्योंकि वो मेरी दोस्त है। हम तो रिस्पेक्ट नहीं रहती। अथॉरिटी नहीं रहती। जब अथॉरिटी रिस्पेक्ट नहीं रहती तो कोई स्ट्रक्चर नहीं रहता। डिसिप्लिन नहीं रहता। अब बच्चे को बच्चे के डेवलपिंग ब्रेन को स्ट्रक्चर चाहिए। डिसिप्लिन चाहिए क्योंकि उससे उसको सिक्योरिटी और सेफ्टी फील होती है। हम पहले तो ये बाउंड्री फज हो जाती है।
(57:48) दूसरा कि बच्चे की लाइफ में कोई फिगर रहता ही नहीं कि जो बच्चा ये सोच सके कि मैं प्रॉब्लम में हूं। तो एक तो वो खंभा खड़ा रहेगा एक वो बड़े पेड़ की तरह जिसके नीचे मैं जाके जिसकी छांव में मैं बैठ सकूं वो पेड़ ही नहीं। मम्मी तो रोज उठ के दोस्त की तरह मुझे अपने प्रॉब्लम सुनाती है। तो जब मम्मीियां या पापा अपने बच्चों को दोस्त मानने लगते हैं तो एक बहुत बड़ी गलती करते हैं। वो क्या करते हैं? अपने छोटे-छोटे बच्चे को जो इमोशनली भी मैच्योर नहीं है। जिनमें कोई अनुभव नहीं है। ना उनको प्रॉब्लम सॉल्व करने की क्षमता है। उनको अपने सारे प्रॉब्लम शेयर करते हैं।
(58:16) बेटा देखो पापा के साथ मेरी लड़ाई हो गई। अब देखो पापा तो ऐसा ही करते हैं। मैं तो उनको 10 साल से जानती हूं। देखो तुम्हारे पापा कैसे हैं। अब यह कहने से आप क्या कर रहे हो? आपको लग रहा है कि मेरी बेटी दोस्त है। मैं उसके साथ सब शेयर कर रही हूं। पर बेटी के मन में पापा के लिए नफरत हो जाती है। चाहे वह कितना भी पापा अच्छा हो बेटी के लिए पर वह मम्मी का पॉइंट ऑफ व्यू से पापा को देखने लगती है। ऐसी कितनी लड़कियों के साथ मैंने काम किया है मुकुल जी जो कहती हैं कि मैम मेरे पापा के लिए मुझे इतनी नफरत थी हम 25 साल तक क्योंकि मेरी मम्मी ने पूरा
(58:47) टाइम उनकी बुराई की मेरे आगे और अब मुझे जब मैं जब घर से निकली और मैं जब थोड़ी न्यूट्रल हो गई पता चला तब मुझे पता चला कि मेरे पापा इतने बुरे नहीं है। इनफैक्ट मम्मी ने पूरा एक चश्मा मुझे पहना दिया है पापा के बारे में और अभी मुझे मम्मी के लिए ज्यादा नफरत हो रही है क्योंकि मम्मी ने मेरा बचपन ही पूरा मेरे पापा के साथ कोई कनेक्शन ही नहीं करने दिया। समझ में आ रहा है? ये सिर्फ मम्मीियां नहीं करती नॉट दैट कूल। नो नो कूल कूल पैरेंटिंग सी आई वुड से कि सी लोग क्या करते हैं? एक्सट्रीम में चले जाते हैं। कूल पैरेंटिंग इज व्हेन योर
(59:18) चिल्ड्रन कैन कम एंड टेल यू एनीथिंग। अगर बच्चे ने गलती की स्कूल में झूठ बोला पनिशमेंट में तो बच्चे को इतना आपसे डर नहीं होना चाहिए कि वो बता नहीं पाए। उसको कह रहे मम्मी आज स्कूल में मार पड़ी या स्कूल में टीचर मैंने गलती की मैंने चोरी कर ली पेंसिल टीचर ने पनिश किया स्कूल पेरेंट क्या कहते हैं अच्छा बेटा पनिश किया चल मैं टीचर कोई बात नहीं वैसे होता रहता है दिस इज नॉट ओके यू हैव टू टेल के नो बेटा ये गलत किया आपने म उसे बताएगा कौन हां हां उसे बताएगा कौन तो कूल पैरेंट इज वेयर गुड पैरेंटिंग आई वुड नॉट से कूल गुड पैरेंटिंग इज जब आप
(59:47) पेरेंट बने रहो हां आपका बच्चा 30 साल का हो रहा है एडल्ट हो रहा है तब आप एडल्ट वाली बात करो पर आपको छ साल के बच्चे को कह रहे हो कि अरे मुझे तो बिजनेस में बहुत नुकसान हो गया। मेरा तो इतने पैसे चले गए। अभी तो पता नहीं हम रास्ते पे आ जाएंगे। अभी आपके पास शायर सशन भी होगा इसका। पर वो पांच साल के बच्चे के लिए तो जिंदगी भर ये एक बहुत बड़ा ट्रॉमा बन के रह जाता है। क्या फायदा हुआ? वो आपकी हेल्प तो कर नहीं पा रहा है बच्चा। सिर्फ आपका तनाव ले रहा है। तो बच्चे को दूसरी बात जैसे मैंने कहा कि हर ये न्यूरो साइंस कहता है कि बच्चे का
(1:00:17) जब ब्रेन डेवलप हो रहा है तो उसको स्ट्रक्चर चाहिए। उसको सिस्टम चाहिए। उसको डिसिप्लिन चाहिए। हम वरना वह जानवर की तरह हो जाता है। अनस्ट्रक्चरर्ड, अनडिसिप्लिंड, केओटिक तो कौन देगा? अगर आप दोस्त बन गए तो कौन देगा? बच्चे को हेल्दी फियर होना चाहिए मां-बाप का। बच्चे को यह नहीं होना चाहिए कि मम्मी को कुछ भी बोल सकता हूं। बच्चे को यह नहीं होना चाहिए कि मेरी मम्मी को आज मैं कुछ भी लात भी मार। मेरे दोस्त को मैं गाली दूंगा, तो मम्मी को भी गाली दे सकता हूं। नो, दिस इज नॉट ओके। बच्चे को डिस्क्रीशन नहीं सिखा रहे हो आप। बच्चे को
(1:00:44) समझ आना चाहिए कि दोस्त अपनी जगह पे है। पेरेंट्स अपनी जगह पे है। हां, मैं पेरेंट्स को कुछ भी बता सकता हूं। पर मैं बेइज्जती नहीं कर सकता हूं या मैं बाहर जाकर कुछ भी करूं पर घर में मेरे घर में यह रूल है तो यह मुझे फॉलो करना है। हां अगर नहीं फॉलो करना है तो मैं मां-बाप से बात कर सकता हूं कि मुझे आई एम नॉट अग्रेबल विद दिस भाई ये मुझे ठीक नहीं लग रहा है चर्चा कर सकता हूं बट फिर भी जो रूल है वो है तो दैट इज बैलेंस पैरेंटिंग बी अ पेरेंट प्लीज डोंट बी अ फ्रेंड आपके बच्चे के बहुत दोस्त होंगे भाई उसकी उम्र के दोस्त उनको बनाने दो आप अपनी उम्र के
(1:01:18) दोस्त [गला साफ़ करने की आवाज़] बनाओ यह मिक्स मत करो। मिक्स करने से बच्चा कंफ्यूज हो जाता है। और बच्चों की जो एक चीज जो मुझे सबसे ज्यादा लगता है कंसर्निंग वो ये लगता है कि आपको जब घर पे नहीं सुना जा रहा है या आप वो महसूस नहीं कर पा रहे हो तो आप फिर बाहर ढूंढते हो। हां। इसमें दो तरह की चीजें होती हैं। खासतौर से जो मेरी ऑब्जरवेशन है कि लड़के ज्यादातर उस तरफ निकल जाते हैं कि वो नशे की तरफ वैसी दोस्तियां कर लेते हैं जिसमें उनको लगता है कि हां भाई कंफर्ट है। कहीं कोई किसी ने उनको बचा लिया तो उनको कहीं पे सेफ्टी नेट नजर आ रहा है या नशा करने
(1:01:53) लगते हैं। ये सब उम्र 14 15 16 मदर जैसे ही गर्लफ्रेंड अट्रैक्ट करते हैं जो उनका ध्यान उनको बच्चे की तरह रखे हैं। एक्सक्टली या तो यह करते हैं। लड़कियों में भी मैंने जो ऑब्जर्व किया मतलब बहुत सारी मेरी दोस्त उन्होंने दोस्तों ने मुझे बताया कि वो अपने जो पहला प्यार है जो उनको 15 16 की उम्र में हो गया उसको लेकर के इतना गंदा ट्रॉमा है उनके अंदर और [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसकी रीजनिंग जब धीरे-धीरे वही जो कनेक्ट करते हैं डॉट्स तो पता चलता है कि भाई क्योंकि उनको वो फील नहीं हो रहा था लव्ड या उनको ऐसा लग रहा था कि मैं तो वर्थलेस हूं
(1:02:26) हम तो उनको किसी इंसान ने महसूस करवाया कि अरे तुम तो बेशकीमती हो तुम तो तुम तो मेरे लिए मतलब वो [हंसी] इंसान बन जाता है वो इंसान भगवान बन जाता है उसके लिए तो वो और समझ है नहीं समझ है नहीं तो वो लोग इतना गंदी तरह से उस पहले प्यार को याद करते हैं ज्यादातर लोगों के एक्सपीरियंस ऐसे कि अरे यार वो तो मतलब बचपन की ऐसी वो उसके बारे में बात मत किया करो [हंसी] छी सही बात है तो ये दोनों समस्याएं हो रही है लड़कों के साथ भी लड़कियों के साथ भी इसका क्या सलूशन है आपने इसमें क्या ऑब्जर्व किया है मैंने यही बिल्कुल आपने कहा वैसे कि लड़के
(1:03:00) जो होते हैं जो उनके मन में ये है कि भई मुझे मेरी मम्मी जैसी तो बहू चाहिए चाहिए ही नहीं। उसके मम्मी जैसी तो लड़की चाहिए नहीं। क्यों? क्योंकि मम्मी बहुत चिल्लाती है, बहुत अग्रेसिव है। मम्मी बहुत गुस्सा करती है। तो मैं तो भाई ऐसी लड़की ढूंढूंगा जो बहुत शांत है। तो उन उनको जो जो नहीं चाहिए पर कई पर अनफॉर्चूनेटली वो जो शांत के नाम पे जो लड़की को अट्रैक्ट करते हैं वो भी अल्टीमेटली बाद में उनकी मम्मी जैसी ही निकलती है। ये एक मैंने पैटर्न देखा हुआ है। और दूसरा बात जो आप कह रहे हो कि हां जो घर में नहीं मिलता है वो बाहर ढूंढते हैं।
(1:03:31) बहुत सी लड़कियां मैंने देखी हैं जिनको घर में जैसे आपने मैंने कहा ना कि बहुत गंदा एनवायरमेंट है घर में टॉक्सिक वातावरण है घर में उसकी कोई मतलब किसी को पता ही नहीं कि आई गई ये एक्सिस्ट करती भी है कि नहीं तो उसको लग रहा है कि मेरी कोई इसमें वैल्यू ही नहीं है घर में तो सबसे पहला लड़का जो उसको कहता है कि यार तुम तो यार परी हो उसको 50 मैसेज दिन में भेजता है उसको लग रहा है कि अरे मैं इतनी इंपॉर्टेंट हूं इधर मम्मी पापा के आगे तो मैं कुछ बोलती हूं तो सुन सुनते भी नहीं है तो फिर वो लॉजिकल माइंड नहीं काम आता है उधर फिर उधर सर लॉजिक सारा हाईजैक हो जाता है।
(1:04:03) फिर चाहे वो लड़का नश नशा करता हो, कैसे परिवार से आया हो, वायलेंट हो, अब्यूसिव हो वो तब पता नहीं चलता है। वो तब तो वो लड़का उसकी तारीफ कर रहा है। उसको 50 मैसेज भेज रहा है तो फिर उसके साथ भाग जाएगी। छ महीने में पता चलेगा कि ये तो मैंने गलत अट्रैक्ट कर लिया। क्योंकि मैंने और कुछ तो देखा ही नहीं। तो किसी जैसे ना इंग्लिश में कहते हैं बिटवीन द डेविल एंड द डीप ब्लू सी। आप यहां से भागने के लिए वो खाई में से भागने के लिए कुएं में गिरे। ऐसा हो रहा है। लड़कों में भी यह हो रहा है कि अगर घर में उनको सेफ नहीं फील किया घर में तो लड़के ज्यादातर जैसे आपने सही
(1:04:38) बात कही कि वो नशे की तरफ जाते हैं। पोर्नर्न एडिक्शन हो अल्कोहल हो, ड्रग्स हो, स्मोकिंग हो उनसे उनको नम हो जाते हैं। उनको कुछ फीलिंग नहीं आती है। अभी लड़कों को वैसे भी हमारे दिमाग में फील करने की परमिशन दी नहीं जाती है। मैंने कितने मैन से बात की। वो बोलते हैं कि टीनएज इयर्स में भी हम हमें याद नहीं है कि हमारे दोस्तों के आगे हम जाके रो पड़े हैं कि आज घर में पापा मम्मी की लड़ाई हो गई और मुझे इतना डर लगा। इनफैक्ट अगर हम गलती से रो भी पड़े तो हमारी मजाक की जाती थी कि कैसे लड़की जैसा है चुप कर तो लड़कों को हमारे समाज में परमिशन ही
(1:05:07) नहीं है कि वो इमोशंस एक्सप्रेस करें रोए धोए तो वो क्या करते हैं बचपन से ही सीख जाते हैं कि भाई ये सब करो नम हो जाओ कुछ फील ही ना करो या तो फिर घर में जो नहीं मिला वो बाहर ढूंढने जाते हैं जैसे मैंने कहा वो पार्टनर में गर्लफ्रेंड में और वो मिलता नहीं है क्योंकि कहीं ना कहीं आपका ट्रॉमा आपको छोड़ता नहीं है कहीं ना कहीं आपके पीछे अच्छा आता ही है। आपको जो ऑोजिट अट्रैक्ट करता है वो वही ऑोजिट बाद में आपको खटकने लगता है। अच्छा आपने एक बात बोली कि वो अपनी मतलब मां जैसा नहीं चाहती। मां जैसा नहीं चाहता। तो वो मां जो जो प्रॉब्लमैटिक रही होंगी
(1:05:45) शायद उस उस केस में होगा। क्योंकि एक बहुत बड़ा वर्ग है। ये इनफैक्ट जावेद साहब ने भी मां वैसी ही चाहिए। कि मां जैसी चाहिए। वो वो हमेशा पूरी लाइफ कंपेयर ही करते रहते हैं कि तुम सब बहुत बढ़िया करती हो। लेकिन हमारी मां जो ये करती थी। क्योंकि वो मां ने क्या किया है कि वो बच्चे को बहुत लाड़ प्यार से बड़ा किया है। मां की पूरी दुनिया वो बच्चा ही है। तो बच्चा भी उसी माहौल में बड़ा होता है कि मैं सबसे इंपॉर्टेंट हूं। एक एक एक लेडी की लाइफ में एक एक फीमेल की लाइफ में मैं सबसे इंपॉर्टेंट हूं। मैं जो मांगता हूं मिलता है। मैं जो चाहता हूं वो
(1:06:16) होता है घर में। मुझे इतना प्यार मिलता है तो उसको यह लगता है कि फिर मुझे आगे भी यही होना चाहिए। अब जो उसको पार्टनर मिलती है वो जरूरी नहीं है कि वैसी हो या वैसा कर करके थक भी गई हो। हम तो वहां पे भी प्रॉब्लम शुरू हो जाता है क्योंकि तो सशन वो है कि वो समझे कि कहां से आ रहा है। यह हेल्दी है कि अनहेल्दी है कि ये एक्सट्रीम है। कई बार माएं भी बच्चों को सिखाती है कि देखना मैं तो कर रही हूं। अभी तुम्हारी बीवी नहीं करेगी। या तो मैं इतना तुम्हारे लिए कर रही हूं। अभी ढूंढ के ला चल तेरी बीवी करेगी तो मैं देखती हूं। तो माएं मांओं का भी बहुत
(1:06:46) इसमें रोल होता है। वो बच्चे को यही सब सिखाती है। मेहमान आए तो बेटी पानी लेके आती है। बेटा नहीं आता कभी। हम अगर खाने पे गेस्ट आए तो बेटी बर्तन करती है। बेटा बैठ के बातें करता है बाहर। सही बात है। तो यह अनकॉन्शियस कंडीशनिंग यह बोला नहीं जाता है। बट अनकॉन्शियसली बेटे के मन में रोज-ब रोज ये देखता है तो क्या प्रोग्रामिंग होती है कि मेरी बीवी बर्तन करेगी। मैं क्यों करूं भाई? मैं क्यों पानी दूं? ये तो उसका काम है। तो ऐसे ऐसे झगड़े आते हैं आपके पास। ऐसे आते हैं ना? आते हैं ना? आते हैं। हां। ऐसे भी झगड़े आते हैं जहां पे हस्बैंड
(1:07:16) वाइफ की लड़ाई क्यों हो रही है? क्योंकि वाइफ ऐसे माहौल में बड़ी हुई है जहां सब लोग शांत हैं घर में। मतलब कोई जोर से बोलता नहीं है। चुपचाप रहते हैं। अगर झगड़ा भी हुआ ना तो तब दबा देते हैं कि बोलना नहीं है। तो घर में उसने कभी आवाज बड़ी सुनी नहीं है। लड़ाई झगड़े नहीं देखे। है बहुत पॉलिटिक्स बहुत है बट पीठ के पीछे चिक चिक चिक चिक चिक होता रहता है। बड़ी आवाज में कोई बोलता नहीं। अभी ऐसे माहौल में से आई है। शादी होती है ऐसे घर में जहां सब चिकते-चिलाते हैं। हम सब इमोशंस दिखाते हैं। गुस्सा आए तो बहुत एक्सप्रेसिव है। और वो बड़ी हुई ऐसे
(1:07:46) फैमिली में जहां एक्सप्रेशनंस दिखाए नहीं जाते क्योंकि एक्सप्रेशनंस शर्मजनक होते हैं। जो भी बोलो। अब ये लोग शादी करते हैं। तो अभी ये लड़की ये लड़का थोड़ा सा भी एक्सप्रेशन दिखाए तो ट्रिगर हो जाती है। बोले अरे ये तो चिल्लाता है। हम मैं मुझे तो आदत ही नहीं है ऐसी सब सुनने की। लड़का बोलता है अरे भाई मैं तो नॉर्मल हूं। हमारे घर में तो ऐसे ही होता है। हम तो दोनों की रियलिटी अलग है। कोई गलत नहीं है इसमें। हम जो लड़के के लिए नॉर्मल है वो इसके लिए तो मतलब अरे बाप रे ऐसे कैसे बोल सकते हो आप? ये गलत है। तो शी थिंक्स दैट शी इज़ राइट
(1:08:16) एंड हर फैमिली इज राइट। बॉय थिंक्स कि आई एम राइट। माय फैमिली इज़ राइट। इसके फैमिली में तो कोई बोलता ही नहीं मैम। ये लोग तो सब चुप-चुप बैठे रहते हैं। हमारे तो देखो हम तो प्यार भी दिखाते हैं। गुस्सा भी दिखाते हैं। हम तो झगड़ते लड़ते हैं। फिर दूसरे दिन साथ में दारू भी पीते हैं और मजे करते हैं। इसकी फैमिली में तो कोई इमोशंस ही नहीं दिखाते। और यह लड़की की फैमिली बोलती है कि यह लोग तो देखो कैसे जंगली जैसे हम लोग तो बड़े सोफेस्टिकेटेड हम लोग कभी ऐसी ऊंची आवाज में बोलते नहीं ऐसे लोग अभी दिस इज द थिंग अभी शादी के टाइम लव मैरिज की होती है क्योंकि लड़की
(1:08:42) को वो लड़का बहुत पसंद लड़की इतने शांत माहौल में पड़ी उसको लड़का बड़ा अच्छा लगता है क्या जोर-जोर से हंसता है पार्टी की शान है ये तो क्या मस्त लड़का है लड़के को भी अच्छी लगती है अरे क्या कितनी शान कितनी कितनी काम लड़की है ना आ हा पर यही चीज जब साथ में रहने लगते हैं तो खटकने लगती है अभी अभी उसको वही चीज जो जिस पे प्यार आता था उस पे अभी गुस्सा आता है फिर नफरत होने लगती है। एक चीज ये बोली जाती है बड़ा अच्छे तौर तौर पे बोली जाती है। मैं भी कई दफा यूज कर देता था कि आई फॉरगिव बट आई नेवर फॉरगेट हाउ प्रॉब्लमेट इज प्रॉब्लमेटिक इज दिस और
(1:09:17) नहीं है प्रॉब्लमेटिक मैंने इसमें एक पूरा सेक्शन लिखा है फॉरगिवनेस के बारे में और ये आपने बहुत अच्छा क्वेश्चन पूछा देखो फॉरगिवनेस एक मेंटल कांसेप्ट है हम फॉरगिवनेस मतलब क्या आप दिमाग से सोचते हो कि ये बंदे ने गलत किया या इसकी वजह से गलत किया तो मैं उसको माफ कर देता हूं। इट्स एन इंटेलेक्चुअल कांसेप्ट। ठीक है? समझ रहे हो? तो समझो कि एक्सट्रीम केस है कि समझो एक किसी ने एक लड़की को मोलेस्ट किया रेप किया और फिर लड़की ने सालों बाद कहीं गई स्पिरिचुअल गुरु ने बोला कि नहीं यार पिछले जन्म में तो तू लड़का थी तूने इसके किया तो अभी इसको माफ कर दे अभी खत्म
(1:09:49) हो गया तो वो बोल रही है अच्छा इसमें इसको माफ कर दिया हम राइट तो लगता है कि ओके मैंने फॉरगिव कर दिया पर जब मैं उस लड़की को पूछती हूं कि तू बता ना उसके वो मोलेस्टेशन के बारे में क्या हुआ था और जब वो बातें करने लगती है तो उसका बॉडी वही गुस्सा वही हेल्पलेसनेस वही फियर दिखाने लगता है तो यह माफी नहीं हुई। यह क्या हुआ? कारपेट लगा दिया हमने माफी का। समझ रहे हो आप? मतलब बॉडी के अंदर अभी भी वो उसका चार्ज है। समझो दूसरा माइल्डर एग्जांपल देती हूं कि एक लड़की आती है बोल रही है मेरी सास सुबह बहुत मुझे अनापशनाब बोलती है। मैडम मैं ऐसे परिवार में से आई
(1:10:25) हूं जहां कोई गाली नहीं बोलता है और मैं शादी मैंने लव मैरिज की है जहां पे ये लोग देहातीती लोग हैं तो मेरी सास बहुत गालियां बोलती है। तो मुझे इतना उनपे गुस्सा आता है। पर अभी ठीक है मैंने ऐसे सब पढ़ा ये सब बुक्स तो अभी मैं उनको माफ कर दिया कि छोड़ो भाई ऐसी ही हैं। तो अभी मैं अभी कुछ फील नहीं करती हूं या फील करती हूं तो बताती नहीं हूं। माफी फॉरगिवनेस फिर मैं बोलती हूं अच्छा ठीक है अभी पिछले हफ्ते कुछ हुआ था तो बताओ ना क्या हुआ अभी वो बताते बताते ही रो पड़ती है तो ये माफी नहीं हुई मेरे हिसाब से ये इंटेलेक्चुअली आपने एक कोपिंग
(1:10:55) मैकेनिज्म बना लिया है कि चलो माफ कर दिया इसका मतलब ये है कि असर नहीं हुई बट सही माफी कब होती है जब आपने वो पेन को प्रोसेस किया बॉडी में से उसका जो भी इमोशनल चार्ज है उसको रिलीज किया और फिर जो खालीपन आता उसमें आपने एक न्यूट्रल फीलिंग की और इसका टेस्ट क्या है कि जब आपकी सांस आपके सामने आती है या आप उसके बारे में बात भी करते हो तो आपका हार्ट रेट नहीं बढ़ता। आपकी नर्वस सिस्टम एक्साइट नहीं होती है। आपका मसल रिलैक्स्ड होता है। हम इसका मतलब क्या कि बॉडी से माफी मांगी आप। बॉडी से वो न्यूट्रलाइज हो गया। हम समझ रहे हो आप?
(1:11:33) हम तो रियल फॉरगिवनेस अकॉर्डिंग टू मी इज व्हेन यू हैव हील्ड [नाक से की जाने वाली आवाज़] योर बॉडी फ्रॉम द ट्रोमा। नॉट जस्ट द माइंड। इज इट पॉसिबल टू 100% पॉसिबल 100% 100% मेमोरी पे काम करना है ना मैंने क्या बोला ट्रॉमा वाली मेमोरी पे काम करना है आज आप बोलो कि नहीं 5 साल पहले मेरे दोस्त ने मुझे धोखा दिया और मैंने उसको माफ कर दिया क्योंकि मैं बड़प्पन दिखाना चाहता हूं मैं थोड़ा इंटेलेक्चुअली स्मार्ट हूं और मैंने बहुत सा पढ़ा लिखा है और स्पिरिचुअल गुरु ने बोला कि बेटा माफ कर दे तो मैंने मैम उसको माफ कर दिया हम अभी अगर वो दोस्त आपके सामने आता है
(1:12:08) हम हां तो क्या आपके हार्ट में बॉडी में कोई फर्क नहीं पड़ता। न्यूट्रल न्यूट्रल हो आप। क्या दोबारा आप ऐसे ही दोस्त के साथ बिजनेस करोगे तो सही माफी हुई। वरना क्या हुआ पता है? के एक कारपेट लगा दिया। कह रही मैंने चल तेरे को माफ कर दिया। मतलब क्या कि मैं तेरे से बड़ा हूं। मैं तेरे से सही हूं और ठीक है तूने गलती कर दी। मैं ऊपर तेरे से हायर हूं। तो आई फॉरगिवन। इट्स अ कांसेप्ट। बट आगे जाके 5 साल बाद भी अगर वो आपके सामने आया, आपसे बातचीत कर रहा और आप ट्रिगर नहीं हुए हो। दैट मींस आपके बॉडी ने भी माफ़ कर दिया उसको। पर अगर आप ट्रिगर
(1:12:40) हो जाते हो मतलब क्या? फिर आप कहोगे उसकी मुझे शक्ल नहीं दिख। मैंने उसको माफ कर दिया पर अगले पार्टी में मिलेगा तो आप पिछले रास्ते से चले जाओगे। अगर आपसे बात करने आया तो आप मुंह कर दो वो साइड पे कर दोगे या आप वहां से निकल जाओगे। तो इसका मतलब क्या है कि इसका ट्रॉमा आपके बॉडी में अभी भी है। वो अभी भी आपको ट्रिगर कर रहा है। वह अभी भी आपको इफेक्ट कर रहा है। तो आप जो कह रही हैं मतलब जैसे जो हमारे ऑडियंस है और लोग बोलते हैं कि मैं अपने एक्स को कभी माफ नहीं कर सकता। मैं अपनी एक्स को कभी माफ नहीं कर सकता। तो वो कर सकते हैं माफ़। अगर चाहे तो
(1:13:13) अगर चाहे तो कर सकते हैं। बट वही कैसे जैसे समझो अगर आपका जैसे हमने एक थेरेपी में एक प्रोसेस की कि भ चलो तुम्हारी आपकी सांस को देखो यार। अभी ये पिलो में सारा गुस्सा पंच आउट करो। और सांस को जो नहीं बोल पाती थी सब निकाल दो। बहुत सारे शहरों में जैसे खासतौर से दिल्ली, मुंबई, बोर इन सारे शहरों में जहां ये बड़ी-बड़ी इमारतें हैं और इसमें लोग लैपटॉप में लगे रहते हैं। इन शहरों में हम देख रहे हैं आजकल एक बड़ा अच्छा नया अच्छा क्या नया कल्चर बना है जिसमें लोग बाग जाते हैं, सामान तोड़ते हैं। एंगर अपना जो गुस्सा है उसको क्या बोलते हैं?
(1:13:44) उसका टर्म क्या है? कोई बताएं। तो एंगर कुछ तो है मैंने। डिस्ट्रक्शन रूम कुछ इस तरीके का है। शायद कोई ओटीटी पे कोई वो बॉलीवुड वाइब्स के उसमें कुछ दिखाया था। बोर में है। तो मैंने एक अपने एक दोस्त से पूछा बोर में सबसे ज्यादा है। तो उन्होंने आईआईएम वगैरह से पास आउट हैं। हमारे हमारे ग्रुप में सबसे रईस आदमी वही हैं। तो हमने उनसे पूछा एक दिन मैंने कहा कि ये बताओ कि आपके यहां तो बहुत हैं। क्यों हैं? तो उन्होंने मुझे रीज़न समझाया। तो उन्होंने कहा यार मुकुल हमारे यहां पर उन्होंने बताया कि हम जिन बच्चों को हायर कर रहे हैं वो एनआईटी आईआईटी के बच्चे
(1:14:14) हैं। वो आए हुए हैं। उनका काम है कि उनको एक नाम डालना है वेबसाइट पे और उनको ये चेक करना है दिन में कई बार कि भाई वेबसाइट का नाम डालने पे वो रैंक कौन सी नंबर पे कर रही है। बहुत बेसिक सा कुछ काम है। और ये उसे करना है जिसके उसको बहुत पैसे मिल रहे हैं। इतने पैसे मिल रहे हैं कि मतलब बहुत मिल रहे हैं। हां। लेकिन वो कर क्या रहा है? उसने इसके लिए इतनी पढ़ाई की, इतने इतने ज्यादा घर वाले उसके गर्व कर रहे हैं कि अरे भाई बहुत अच्छी नौकरी लग गई है। लेकिन उस अच्छी नौकरी में वो ये काम कर रहा है जिसकी उसकी तनख्वाह बढ़िया मिल रही है।
(1:14:49) हां। किसी एक दिन ऐसी जरूरत पड़ेगी जिस दिन के लिए उसको तैयार रहना है। हां। उसके लिए कंपनी उसको इतना पे कर रही है। अब बोलेगी वो तुम्हें लग रहा है या सबको लग रहा है कि बहुत पैसे कमा रहा है। क्या क्रेजी लाइफ है ये है वो है। बट अल्टीमेटली उसने कभी भी ये करने के लिए तो ये सब नहीं किया था। करेक्ट डिसल्यूुजनमेंट हो जाता है। वो जा रहा है। गुस्सा निकाल गुस्सा। गुस्से दो प्रकार के होते हैं। खुद पे गुस्सा और दूसरों पे गुस्सा। हम हम खुद पे गुस्सा आता है ना। वो लोग अपना सर पटकते हैं। देखा है आपने? या काटते हैं, सर पटकते हैं, बाल खींचते हैं खुद के। या
(1:15:20) तो सेल्फ साबोटाजिंग बिहेवियर करते हैं जिसको हम बोलते हैं कि खुद को हानि पहुंचाए वैसे इनडायरेक्ट बिहेवियर्स जैसे नशा करना शराब पीना या जभी भी जॉब बार-बार बदलना ऐसा लगे कि अभी जॉब में ठीक चल रहा है तभी वो जॉब छोड़ देगा अनकॉन्शियस सेल्फ साबोटाजिंग बिहेवियर हम तो खुद के ऊपर गुस्सा और दूसरा दूसरे के ऊपर गुस्सा जब किसी ने आपके साथ गलत किया हो या किसी ने आपको सप्रेस किया हो या जो भी हो मां-बाप हो टीचर हो जो भी हो तो ये दो किस्म के गुस्से अभी गुस्सा इज़ लाइक अ बम ब्लास्ट ये अगर आपने शरीर के अंदर दबा के रखा है जैसे जैसे ग्लास में मैंने गन
(1:15:50) पाउडर भरभ के भरा है ये ग्लास में और अब एक यहां पे एक चिंगारी आई तो पूरा ब्लास्ट हो जाएगा ना पर दबाना मतलब क्या ढक्कन लगा देना तो लोग ज्यादातर हमारे सोसाइटी में क्या है एक्सप्रेस नहीं करने देते बच्चे को अगर गुस्सा आया तो हम क्या कहते हैं बेटा गुस्सा थूक दे थूकना स्टिल ओके बट बेटा गुस्सा मत कर गुस्सा मत कर यू नो बच्चा रो रहा है तो रो मत रो मत चल मैं तेरे को बूंस दिलाती हूं चल एक और टॉय दे देती हूं चल आधा घंटा फोन और यूज़ कर ले बेटा बट रो मत मैं पोटैटो चिप्स बना देती हूं तू रो मत तो हम क्या कहते हैं बच्चों को कि ये सारे नेगेटिव इमोशंस दबा दो भाई।
(1:16:20) निकालो मत। हम तो बॉडी की एक नेचुरल प्रोसेस होती है। ये सारे नॉर्मल इमोशंस हैं। गुस्सा, दुख, हेल्पलेसनेस, डर ये जब हम निकालेंगे नहीं एक्सप्रेस नहीं करेंगे तो दबे रहते हैं अंदर। एक इनकंप्लीट प्रोसेस की तरह और फिर वो गलत जगह पे निकलते हैं। गलत जगह पे ना निकले इसलिए ऐसे क्लनिक्स की जरूरत है जहां पे वो लोग जाके सब तोड़फोड़ करते हैं। उसके बाद उनको बहुत हल्का लगता है। मदद करता होगा। 100% हम थेरेपी में भी यह करवाते हैं। मेरे थेरेपी में कितने लोग आके ओ हो कितने टॉवल्स फाड़ चुके हैं। कितनी कितने कागज फाड़ चुके हैं। कितने पिलोस पे पंच कर
(1:16:54) चुके हैं। कितनी किक्स मार चुके हैं। क्या-क्या गाली गलौज दे चुके हैं। मेरी तो गालियों की वोकैबलरी हर भाषा में बढ़ गई है बाप। अभी देखो टीचर आपको हर रोज डांटता है मारता है। और आपके मुंह में यहां तक गाली आ गई है टीचर के लिए। बट आप बोल नहीं सकते भाई खराब है तो वो कहां सब गुस्सा अंदर रहता है। फिर हम थेरेपी में जब ये गुस्सा निकलवाते हैं ना उनको फिर ये निकलता नहीं है तो क्या होता है गलत जगह पे निकलता है या तो हेल्थ इश्यूज होने लगते हैं डायबिटीज ब्लड प्रेशर क्योंकि क्या है अंदर प्रेशर बिल्ड हो रहा है बाहर नहीं आ रहा है या तो बीवी पे निकलता है बच्चों पे
(1:17:23) निकलता है घर के काम वालों पे निकलता है गुस्सा पर जब हम थेरेपटिक स्पेस में निकालते हैं जब वो पंचवंच करके जाते हैं सारा टीचर टीचर को सामने विजुअलाइज करके पूरा गाली 5 साल की उम्र से 15 साल में जो देना था दे दिया फिर बोलते हैं मैम अभी-अभी इतना खालीपन लग रहा है अभी यहां पे फिर हम क्या उनको कहते हैं कि भ इसकी जगह पे कोई पॉजिटिव फीलिंग आप फील करो। हां मैं हवाई पे गया था। उधर मैं ना बीच पे बैठा था। बड़ी शांति लग रही थी। चलो वो फील करो। तो उनके बॉडी में क्या होता है कि एक जो दबा हुआ जो प्रेशर है वो सिटी की तरह निकल जाता है
(1:17:52) और दूसरा प्रेशर फिर नहीं बनता है। ये वो लोग हैं जिनको एंगर का इशू है वो वाले लोग। हां हां। फिर हम ईएफटी टैपिंग भी सिखाते हैं। तो हमारे बुक में एक पूरा एक सेक्शन है जिसमें हमने सेल्फ रेगुलेशन टेक्निक सिखाई है। जो टेक्निक्स करके आपको थेरेपी की जरूरत नहीं पड़ेगी। वो टेक्निक्स करके आप खुद ही ये सब निकाल सकते हो। जैसे एक टैपिंग टेक्निक है जिसमें आपको बहुत गुस्सा आ रहा है तो दो चार राउंड करो जो भी गुस्सा आ रहा है सब बोल दो टैप करते बोल दो ब्लो आउट करो फ के निकाल दो तो यू विल जस्ट योर बॉडी योर बॉडी इज इज नॉट इंटेलेक्चुअल योर
(1:18:20) बॉडी इज वै बेसिक बॉडी को लग रहा है कि निकल गया सब दो तीन टेक्निक्स बता दीजिए आप सब गुस्से तो हमने जैसे इस ये बुक में हमने एक पूरा सेक्शन लिखा है जिसमें हमने लोगों को जिसको चाइल्डहुड ट्रॉमा है जिसको ऐसा एंगर इशू है स्ट्रेस है उनके लिए ऐसी टेक्निक सिखाई है जिससे उनकी नर्वस सिस्टम रेगुलेट हो जैसे हमने शुरू में बात की थी ना कि जब हमको बहुत तनाव है, बहुत स्ट्रेस है तो नर्वस सिस्टम हमारे डिसरेगुलेट हो जाती है। मतलब फाइट फ्लाइट फ्रीज मोड में रहती है और ये मोड में आना उसको आता नहीं है। तो नर्वस सिस्टम को रेगुलेट करने के तरीके
(1:18:48) बहुत आसान है। एक तो हमिंग है। सिंपल हमिंग जो हमने बुक में बताया है। हम करके सिंपल मेरे हस्बैंड ने उस पर पीएचडी किया हुआ है। हमिंग पे हां हमिंग पे हमिंग की पॉजिटिव इंपैक्ट है। कार्डियोवस्कुलर सिस्टम पे इम्यून सिस्टम पे कंसंट्रेशन फोकस फीलिंग ऑफ पॉजिटिविटी रिमूवल एंड बेस्ट इज़ इंसोमिया पे पॉजिटिव इंपैक्टिया मतलब साइंटिफिक है ही हैज़ डन अ पीएचडी हां हमने हॉल्टर वाटर लोगों पे लगा के मेजर किया है कि भ नींद में ज्यादा रेस्ट मिलता है कि हमिंग से तो हमिंग से ज्यादा रेस्ट मिलता है नींद से भी ज्यादा हां डीप ब्रीथिंग से भी ज्यादा
(1:19:19) ओ हां तो हमिंग इज अ वेरी पावरफुल टेक्निक टू रेगुलेट द नर्वस सिस्टम और इसमें कोई मुद्रा मुद्रा नहीं है जस्ट सिंपल हमिंग 25 राउंड राउंड से शुरू करो। 20 मिनट तक जाओ। यह हम 3 साल चार साल के बच्चों को भी करा सकते हैं। इससे कंसंट्रेशन फोकस सब बढ़ता है। तो इस पे ये भी रिसर्च बुक में डाला हुआ है। कभी भी कर सकते हो। खाली पेट भरा पेट कोई कंडीशन नहीं है। हमिंग है। दूसरा कोहेरेंट ब्रीथिंग है। हार्ट फोकस ब्रीथिंग है। एक रिदममिक ब्रीदीिंग है जिसका रिसर्च हार्ट मैथ इंस्टट्यूट ने किया है यूएस में। तो उस उसका मैंने स्टडी किया है। मैं उसकी सर्टिफाइड कोच हूं। तो
(1:19:50) वो को वो एक डिवाइस आता है। डिवाइस के साथ भी कर सकते हो। डिवाइस के बगैर भी कर सकते हो। तो उसमें क्या रहता है कि आपका हार्ट की जो सिग्नल्स है वो एक रिदममिक पैटर्न में बनती है बिकॉज़ ऑफ़ द ब्रीथिंग। और वो हार्ट की जो रिदममिक सिग्नल है वो ब्रेन में जाती है। तो ब्रेन को लगता है कि सब ठीक है। चाहे कितना भी तनाव चल रहा हो। तो कोहेरेंट ब्रीथिंग से आप अभी ये सब सारी टेक्निकें कैसी है कि एक दिन में नहीं होगा। हम जैसे आपको साइकिल सीखने में कैसा टाइम लगता है? अभी साइकिल एक बार सीख ली फिर आपने बीच में 20 साल नहीं चलाई पर जब भागना पड़ा तो आप चला सकते हो।
(1:20:18) तो ये मसल मेमोरी बननी चाहिए। तो यह सारी टेक्निक्स टाइम लेती है। तीसरा हमने सिखाया ईएफटी इसमें डाला हुआ है जो सारा कचरा निकालने का काम करता है। जैसे रात को सोते हैं लोग तो उनको क्यों नहीं नींद आती? क्योंकि बहुत ओवरथिंकिंग करते हैं। आज मेरी कोलीग ने ये बोला ना मुझे ये बोलना चाहिए तो पूरे डायलॉग के डायलॉग चलते हैं लूप में। राइट? बॉस ने कुछ बोला अभी मैंने बोल तब नहीं बोला पर मैं ये सब बोलता अगर मुझे मौका मिलता। सो ओवरथिंकिंग वो सारी चीजें ईएफटी से निकल जाती। क्या है ईएफटी? ईएफटी का पूरा हमने डिस्क्राइब किया। एक पूरी स्टेप प्रोसेस है। इसमें टैपिंग करते
(1:20:46) हैं। इवन दो और हालांकि हां हालांकि मुझे अभी बहुत गुस्सा आ रहा है। मुझे लग रहा है कि मैं इसका गला दबा दूं। बहुत नालायक इंसान है। बट फिर भी मैं ये सारी अपने आप को स्वीकारती हूं और ये सारी इमोशंस को रिलीज करती हूं। ये कर करके सारा टैपिंग अलग-अलग मेरीडियन पॉइंट पे टैप करना होता है। फिर ब्लो करना होता है। अपनी आई मूवमेंट्स करनी हो ताकि ब्रेन की इंटीग्रेशन हो जाए और फिर ये तीन चार राउंड करो तो आपको लगेगा अभी खाली सब ब्लैंक हो जाता है। और वो सब निकल जाता है। नाइस करूंगी। तो ये ईएफटी भी है। इसकी भी वीडियो मेरे YouTube पे है। हिंदी में,
(1:21:15) इंग्लिश में और उसके मैंने क्यूआर कोड डाले तो वो वीडियो जिन जिसको सीखना है हिंदी में भी है, इंग्लिश में भी है। प्लीज फ्री में YouTube चैनल पर देख लो। दिस इज अ हेल्दी वे। हम कहते हैं मां-बाप को कि आप बच्चों को भी सिखाओ। क्योंकि बच्चे को भी क्या होता है कि स्कूल स्कूल से आता है टीचर पे गुस्सा है, दोस्त पे गुस्सा है। तो अगर बच्चों को ये सिखाओ तो वो क्या करता है कि उसको समझ आता है कि भाई ये हम बिना किसी को मारे पीटे बिना किसी को डांटे करे हम इसको पॉजिटिवली बॉडी से निकाल सकते हैं। हम पर ये मां-बाप जब खुद करेंगे तो बच्चे
(1:21:44) सीखेंगे ना। बच्चे तो यही सीखते हैं कि जब गुस्सा आएगा तो चपट लगा लो। खत्म हो गई बात। तो आई वांट टू टेल दैट यू हैव टू डू इट फॉर योर चिल्ड्रन टू लर्न। है ना? तो ये बहुत सी टेक्निक्स हमने लोगों को बताई है। तो पहला पहला अगर आपको चाइल्डहुड ट्रॉमा हुआ है तो सबसे पहला तरीका है इसमें मैंने क्वेश्चनयर दिया है 14 पॉइंट क्वेश्चनयर उसमें आप मार्क करो कि कितना है आपका। फिर उसमें मैंने सारे फॉर्म्स दिए हैं जो आप भरो तो पता चलेगा कि आपका कितना कॉम्प्लेक्सिटी केस है। आपका ट्रॉमा का कितना इंटेंस है। उस हिसाब से हमने इसमें बताया है कि आपको कैसे
(1:22:16) ट्रीटमेंट चाहिए होगी। अगर आपको अगर मिनिमम ट्रॉमा है। अगर आपकी कॉम्प्लेक्सिटी कम है तो सिर्फ ये टेक्निक्स करने से आपको ठीक हो जाएगा। गाइडेड [नाक से की जाने वाली आवाज़] विजुअलाइजेशन टेक्निक है जिसमें आप बैठते हो एक रिलैक्स स्टेट में बैठते हो और जो पूरी रिसर्च के ऊपर आधारित है जिसको हम बोलते हैं सेल्फ हिप्नोसिस प्रोटोकॉल 20 मिनट की प्रैक्टिस है जिसमें आप हमिंग करते हो फिर कोरेंट ब्रीथिंग करते हो फिर एक पॉजिटिव इमोशन को जागृत करते हो ताकि वो वाले हॉर्मोन सीक्रेट हो ऑक्सीटोसिन एंडोर्फिन जो आप साइकेटिस्ट गोलियों में
(1:22:43) देता है आपको और फिर आप एक विजुअलाइज करो जो आपको पॉजिटिव जैसे अब सपोज मेरा प्रॉब्लम है कि मैं बच्चों को बहुत चिल्लाती हूं सपोज और मुझे बनना है शांत पेरेंट तो मैं अभी मैं बच्चे चिल्ला रहे हैं फिर भी मैं बहुत शांति कर रही हूं। मेरे शोल्डर्स बड़े रिलैक्स है। मेरा बहुत शांत है। अब ये मैं जब बार-बार वो वाले स्टेट में जब विजुअलाइज करूंगी तो मेरे माइंड में वो नए प्रोग्राम बनना शुरू हो जाएंगे। मैं सबको बोलती हूं चाहे आप पेरेंट हो के ना आओ पर आप ऑफिस से घर जाओ तो पार्किंग लॉट में गाड़ी में बैठ के 20 मिनट हमिंग करके जाओ ना आपका पूरा माइंड
(1:23:17) फ्रेम बदल जाएगा घर। सबको जरूरत है भाई। आप सड़क चल रहे होते हैं। हम देखते हैं कि लोग कैसे बिहेव कर रहे हैं। जरा सी गाड़ी छू गई उस पे मरने मारने पे आ जा रहे हैं। क्योंकि उनका उनका उनका ब्रेन जैसे मैंने कहा ना कि चाइल्डहुड ट्रॉमा की वजह से जो इंपल्स जनरेट करने वाला ब्रेन है ब्रेन सेंटर है एमगडेला और ब्रेन स्टेम जो इंपल्सिव बिहेवियर जनरेट करता है। क्यों? क्योंकि दैट इज रिस्पांसिबल फॉर सर्वाइवल इंस्टि्स जैसे खाना पीना सोना लड़ना सर्वाइव करना वो ब्रेन ज्यादा डेवलप होता है जो बच्चों में ट्रॉमा होता है वो वो पार्ट ज्यादा ओवर डेवलप्ड होता है और
(1:23:52) जो आपका ब्रेन सेंटर है प्रीफ्रंटल कॉेक्स जो यहां फोरहेड के पीछे है पूरा ऐसा एक कवरिंग रहता है वो 25 साल तक डेवलप होता है जिसमें होता है लॉजिकल थिंकिंग रैशन थिंकिंग कि मैं ये करूंगा तो उसको कैसे लगेगा अभी मैं यहां आज ये करूंगा तो 2 साल बाद इसका क्या इंपैक्ट पड़ेगा? तो एग्जीक्यूटिव फंक्शन, लॉजिकल थिंकिंग, फीलिंग अबाउट अदर पीपल्स फीलिंग्स यह सब प्रीफ्रंटल कॉेक्स का काम है। और इंपल्स कंट्रोल करना भी प्रीफ्रंटल कॉेक्स का काम है। जिन बच्चों में सीिवियर ट्रॉमा है बचपन में उनका ये अंडर डेवलप्ड होता है। इसीलिए ये बच्चे आपको इंपल्सिव लगेंगे।
(1:24:27) इसीलिए ये बच्चे नशों की तरफ जाएंगे। एडिक्शन सबसे ज्यादा जो एडिक्ट एडिक्स होते हैं उनमें चाइल्डहुड ट्रॉमा बहुत हाई रहता है। जो बच्चे ज्यादातर नशा कर रहे हैं उनमें चाइल्डहुड ट्रॉमा का यस बैकग्राउंड है। 100% 100% ये तो रिसर्च कहता है मैं नहीं कह रही ग्लोबल रिसर्च है। चाइल्डहुड ट्रॉमा इज कनेक्टेड टू एडिकशंस, क्रिमिनल बिहेवियर्स, क्रॉनिक हेल्थ कंडीशंस जैसे ऑटोइ्यून डिसऑर्डर्स, कार्डियोवस्कुलर डिजीजसेस, थिंग्स लाइक कैंसर, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर जो बहुत जल्दी आ जाते हैं। क्यों? क्यों? क्योंकि चाइल्डहुड ट्रॉमा से आपकी पूरी नर्वस सिस्टम डिसरेगुलेट हो
(1:25:00) गई होती है। आपकी नर्वस सिस्टम हमेशा इट्स लाइक अ कार दैट यू आर ड्राइविंग विदाउट ब्रेक्स। क्या होगा वो गाड़ी का? तो इसका भी आउटकम है। और ये जनरेशंस तक आती है। रिसर्च ये कहता है कि इट गोस जनरेशन टू जनरेशन। पास ऑन होता है। 100% पास ऑन होता है। इसी तरह पास ऑन होता है। क्योंकि अगर आपने समझो समझो यू हैव गॉन थ्रू ट्रॉमा। आप इसलिए आपका इंपल्स सेंटर बहुत एक्टिवेटेड है। इंपल्स कंट्रोल वाला सेंटर अंडर एक्टिवेटेड है। हिपोकस जो आपका लॉन्ग टर्म मेमोरी सेंटर है वो श्रिंक हो जाता है बिकॉज़ ऑफ़ ट्रॉमा। इसलिए आपको कोई मेमोरी नहीं होगी। आप
(1:25:30) कहोगे ना मुझे कोई मेमोरी नहीं है 12 साल के पहले की। ट्रॉमा की वजह से बच्चों की याददाश्त पे असर पड़ता है। और ये एक साइक्लिकल ट्रॉमा रहता है। मतलब देखो जो बच्चा घर में माहौल खराब है ना वो पढ़ाई में अच्छा नहीं होगा। हम ज्यादातर पढ़ाई में अच्छा नहीं इसलिए और पिटता है। जितना पिटता है उतना कॉर्टिजोल वाला ब्लड ब्रेन में जाता है। हिपोकैंपस जो मेमोरी सेंटर है लर्निंग वो वो श्रिंक हो जाता है तो और भी उसकी मेमोरी खराब होती जाती है। तो और पिटता है और भी खराब होती है मेमोरी। मैं पेरेंट्स को बोलती हूं अगर आपका बच्चा कुछ याद नहीं कर पा रहा है।
(1:25:59) अगर उसको एग्जाम का स्ट्रेस है तो सबसे पहले उसको शांत कराओ। आप [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसको स्ट्रेस में डाल के पढ़ाओगे ना तो वो याद नहीं रख पाएगा। क्योंकि जो लॉन्ग टर्म हिपोकैंपस जो ब्रेन में है ना वो लॉन्ग टर्म मेमोरी का सेंटर है जो आपको मेमोरी रिट्रीव कराता है। हम वो रिसर्च कहता है कि ट्रॉमा से वो श्रिंक हो जाता है। तो बेसिकली आप ये कह रहे हो कि जितने भी तरह के एडिक्शन है चाहे ड्रग एडिक्शन हो, अल्कोहलिज्म हो, पोर्न एडिक्शन हो, दीज़ ऑल आर रिलेटेड टू रिलेटेड दे आर नॉट डायरेक्ट कॉजेशन। इट इज़ इट इज़ इट इज़ नॉट कॉजेशन इट इज़ अ कोरिलेशन।
(1:26:30) अच्छा। रिसर्च में इसका फर्क क्या है? मतलब जिस जिन सबको चाइल्डहुड ट्रोमा हुआ है वो सब अल्कोहलिक नहीं होंगे। ठीक है? पर जो अल्कोहलिक्स हैं हम उनमें ज्यादा से ज्यादा चाइल्डहुड ट्रॉमा वाले होते हैं। ओके गॉट समझ रहे हो आप? हां आप समझ गए। सेम फॉर सुसाइड बिहेवियर्स। अगर समझो 100 लोगों ने सुसाइड किया है हम तो उसमें से 90% लोगों में चाइल्डहुड ट्रॉमा होगा। बट जिसमें चाइल्डहुड ट्रॉमा है वो सब सुसाइड करने नहीं जाएंगे। हम दिस इज़ व्हाट रिसर्च सेस। अच्छा। क्यों? क्यों? क्योंकि बहुत से फैक्टर्स हमने देखे ना अगर चाइल्डहुड ट्रॉमा है बट
(1:27:03) अगर पीसीई है, पॉजिटिव चाइल्डहुड एक्सपीरियंस है, आपको बफरिंग एडल्ट मिला है तो आपका ट्रेजेक्टरी अलग होगा। हम पर अगर आपका चाइल्डहुड ट्रॉमा हुआ है, कोई बफरिंग एडल्ट नहीं है। आप पूरा जिंदगी अकेला महसूस किया है, सपोर्टेड नहीं महसूस किया है। या तो आप परफेक्शनिस्ट बन गए हो ट्रॉमा की वजह से। आप पूरा टाइम आपने सक्सेस बैक टू बैक सक्सेस अचीव किया है। आप कभी फेल ही नहीं हुए हो। और इसके प्रेशर में आप डिप्रेशन और लोनलीनेस महसूस करते हो। और आप एडिक्शन की तरफ चले जाते हो। यह भी होता है। 100% होता है। सक्सेस मतलब आपके इर्द-गिर्द सक्सेस रही
(1:27:34) है हमेशा। आप सक्सेसफुल रहे हो तो दुनिया के लिए है ना भाई। अंदर क्या चल रहा है आपको पता है? हमारे पास बहुत हमारे यहां बहुत सक्सेसफुल लोग हैं। एक बहुत इंटरेस्टिंग बात बताता हूं। सो नीरजा चौधरी जी हैं। जर्नलिस्ट हैं बहुत वेटन जर्नलिस्ट। उन्होंने एक किताब लिखी हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड। उस किताब में उन्होंने शुरुआत जो की है सोचिए आप कि उन्होंने पूरे प्रधानमंत्री जो रहे हैं उनकी जो बातों की पहला पन्ना है उसमें वो सारे प्रधानमंत्रीियों की लोनलीनेस पे बात करती हैं और उसमें बताती हैं कि इंदिरा गांधी जी के कमरे उन्होंने बताया उन्हें कि पता चला कि
(1:28:05) जब उनके कमरे में कोई दाखिल होता है तो उन्होंने बताया कि मुझे पता चल जाता है कि क्यों आया है। अटल बिहारी वाजपेयी साहब की लोनलीनेस की बात की है उस किताब में। शुरुआत होती है यहां से। हम तो इसका मतलब ये होता है सी व्हाट हैपेंस इज यू नो बट व्हाई इज इट सो मतलब जैसे अ सक्सेसफुल आदमी जैसे लोनली नहीं सब सक्सेसफुल लोनली नहीं होते बट लोनली वाले लोग सक्सेसफुल हो सकते हैं हम समझ रहे हो आप लोगों को सक्सेस दिखता है मतलब क्या अच्छा इसके पास पैसे हैं गाड़ी है उसके पास बहुत अच्छा करियर है या बिजनेस है पर उसके अंदर की दुनिया क्या है
(1:28:36) आपको पता है हमारे पास कितने क्लाइंट्स आते हैं जो बाहर से इतने सक्सेसफुल दिखते हैं आपको लगेगा कि इसकी लाइफ भगवान मुझे एक दिन के लिए दे दो पर उनके अंदर अंदर है इनसिक्योरिटी। सुबह उठ के सब कुछ चला जाएगा तो मैं क्या करूंगा? मुझे कैंसर हो गया तो मैं क्या करूंगा? मेरे बच्चों के साथ मेरा कनेक्शन नहीं है। बच्चे मेरे से दूर भागते हैं। मैम कल को मैं बेड पे आ गया, बिस्तर पे आ गया तो मेरे बच्चे मेरे के सामने देखेंगे भी कि नहीं? ये लोग दुनिया को नहीं बताएंगे ये सब। ये इनके अंदर का लोनलीनेस है। अंदर ही चल रहा है। लैक ऑफ सोशल सपोर्ट आ
(1:29:04) रहे हैं मेरे से। इनके बच्चों को भी इरादा है कि मेरे से कुछ ले। इनको विश्वास नहीं है किसी पे। क्योंकि बचपन से इनका ट्रॉमा इस तरह का रहा है कि दे हैव ग्रोन अप इन वेरी अनसेफ एनवायरमेंट्स। देखिए परफेक्शनिज्म ज्यादातर कहां से आता है? इनसिक्योरिटी क्यों आती है? दो तरीके से आती है। जब बचपन में बच्चे को ये मैंने बहुत सारे हाई अचीवर्स देखे हैं। उनके घर का माहौल इतना खराब है कि उनको पढ़ाई के अलावा कोई ऑप्शन ही नहीं है। मतलब उनको यह है कि भाई एक चीज मेरी लाइफ में जो अच्छी है वो कि मैं क्लास में फर्स्ट आता हूं। बाकी घर में इतना सब खराब
(1:29:36) है कि मैं एक चीज तो सही करूं। दैट इज द ओनली थिंग इन माय कंट्रोल कि मैं हर बार फर्स्ट आऊं और जैसे ही मैं फर्स्ट आऊं 12th के बाद इट विल गिव मी अ टिकट कि मैं यहां से निकलूं भाई यहां से भागूं तो लोग इसकी तारीफ करते हैं तो ये बच्चा क्या सीख जाता है कि यार दिस इज मी आई एम अ परफेक्शनिस्ट मतलब नथिंग शुड गो रोंग दूसरा परफेक्शनिज्म कम्स फ्रॉम व्हेन द चाइल्ड ग्रोस अप इन अ लॉट ऑफ़ इनसिक्योरिटी एंड अनसर्टेनिटी। जैसे घर पे स्ट्रक्चर नहीं है, सिक्योरिटी नहीं है। कैसे घर में होता है जब मम्मी को मेंटल हेल्थ इश्यूज होते हैं, घर में लड़ाई झगड़े होते हैं।
(1:30:06) पापा अल्कोहलिक हैं। तो घर में क्या है? कोई किस्म का प्रेडिक्टेबिलिटी नहीं होती है। ग्रोइंग ब्रेन को प्रेडिक्टेबिलिटी चाहिए कि भ सुबह नाश्ता मिलेगा फिर मैं स्कूल जाऊंगा। आऊंगा तो मम्मी घर पे होगी या कोई होगा, फिर हम खाएंगे, फिर हम सो जाएंगे। एक स्ट्रक्चर पर जिनके घर में अल्कोहलिक फादर है, लड़ाईयां होती है, उनको हर रोज सुबह उठ के ये होता है कि आज क्या नया ड्रामा होगा भाई घर में। आज क्या होने वाला है? तो उनका एक सिस्टम ये हो जाता है कि नथिंग इज सर्टेन इन लाइफ। सो द ओनली थिंग आई कैन डू इज बी परफेक्ट इन व्हाट आई एम डूइंग। दैट
(1:30:35) विल गिव मी अ सेंस ऑफ कंट्रोल। तो मैं एक जो ओरिजिनल बात ये थी कि जो बाहर से जो सक्सेसफुल लगते हैं जरूरी नहीं है कि वो एक्चुअली सक्सेसफुल हो। और जो लाइफ में सक्सेसफुल है वो जो अंदर से सही है ना वो कई बार बाहर से सक्सेसफुल हमें दिखते नहीं है। दे मे बी नॉर्मल पीपल जो बहुत अच्छे पेरेंट्स हैं। बच्चों को बड़ा करते हैं प्यार से आराम से अपनी जिंदगी जी रहे हैं। कुछ बड़ा कुछ तोड़फोड़ काम नहीं करते हैं। हां एक गाड़ी है उनके घर पे चलाते हैं। पर बच्चों को मेमोरी देते हैं। बच्चों को उनके लिए इतना प्यार है कि वो मां-बाप जब बूढ़े होते हैं तो
(1:31:07) बच्चे उनकी सेवा करते हैं। उनके बगैर रह नहीं सकते हैं। यह वो बच्चे जिनको लग रहा है कि नहीं मेरे मां-बाप ने मेरे लिए सब कुछ अच्छा किया है और मुझे भी उनके लिए करना है। दिस इज पर यह सक्सेसफुल शायद नहीं दिखते हैं। हमारे पास बहुत क्लाइंट्स आते हैं जो बाहर से बहुत सक्सेसफुल दिखते हैं पर हमें ही पता है अंदर का सब कीचड़ कैसा है घर में। हम बच्चों को फिर सारा ट्रांजैक्शनल रिलेशनशिप हो जाता है। यह जो ये जो परफेक्शनिस्ट होते हैं वो 7 दिन हफ्ते के काम करते हैं। अपने बच्चे के लिए घर पे होते ही नहीं है। मिसिंग पेरेंट बच्चे को उनके लिए कोई कनेक्शन ही नहीं
(1:31:38) है। जब बच्चा कंप्लेंट करता है तो गिफ्ट ला के दे देते हैं। तो बच्चे भी इसी तरह बड़े होते हैं कि पापा से कुछ चाहिए भाई तो पैसे मांग लो। जितने पैसे निकलवाने हैं निकालो और कुछ एक्सपेक्ट मत करो पापा से। यह बहुत फिर आपने एक बातचीत का नया सिरा खोला कि यह जो यह एक एक है कि आज के टाइम पे बहुत ज्यादा है। दोनों पेरेंट्स काम कर रहे हैं। दोनों जा रहे हैं, कमा के ला रहे हैं। अच्छा दिख रहा है बाहर से। बढ़िया लंबी वाली गाड़ी है, बढ़िया घर है। लेकिन वहां पर जो बच्चे पल बढ़ रहे हैं नैनीस के साथ। डेनीस के साथ में या बहुत सारे लोग हैं जो डे बोर्डिंग में पढ़ रहे
(1:32:08) हैं। तो जैसे मेरे जो दोस्त हैं जो बोर्डिंग में पढ़े हैं वह बताते हैं कि हम हमें जब सबसे ज्यादा जरूरत थी जब मैं आठ साल का था, 10 साल का था, 11 साल का था तब तो आप एक वार्डन के यहां मुझे छोड़ो आए थे। तो वार्डन जैसे चाहता था 25 बच्चों को हाकता था, वैसे ही हमें भी हांक देता था। करेक्ट? तो आप आज की तारीख में जब मेरे ऊपर आ के ऐसे हक दिखाते हो कि तुम्हारी हर लाइफ डिसीजन मेरा होगा। तुम किस लड़की से बात करोगे, किससे शादी करोगे? तो वो जो बच्चे हैं उनके साथ क्या हो रहा है और हाउ हाउ इट इज मतलब ये जो जनरेशन हो रही है जो दोनों काम कर रहे हैं उनके लिए क्या है
(1:32:43) फिर वो मैनेज इसीलिए तो मैंने कहा ना कि नई जनरेशन में मेंटल हेल्थ इश्यूज क्यों ज्यादा दिख रहे हैं क्योंकि परिवार छोटे हो रहे हैं हम प्रॉब्लम ये भी हो रहा है कि हस्बैंड वाइफ तो काम करते हैं। पहले ये होता था कि चलो परिवार साथ में रहता था। हम चाहे झगड़े वगड़े होते थे पर एक से हर चीज का प्राइस पे ऑफ होता है। परिवार बड़े होते थे तो बफरिंग एडल्ट बच्चे को मिल जाता था। चलो मां-बाप बिजी हैं। मां-बाप स्ट्रेस में है, तनाव में हैं, पर दादा-दादी हैं। हम्। नाना-नानी है। जिनके साथ बच्चे रहते थे, इमोशंस सीखते थे, अपने आप का कॉन्फिडेंस
(1:33:11) बढ़ाते थे, होता था। आजकल नैनी के पास बड़े होते हैं। अभी नैनी तो पैसे के लिए कर रही है। तो नैनी क्यों बच्चे को सही चीज सिखाएगी? नैनी तो उसको जितना काम उसका कम हो, बच्चे को फोन देके खाना खिलाएगी। राइट? बच्चे को सब हां में हां मिलाएगी क्योंकि उसको नौकरी चाहिए। नैनी कभी वो चीज नहीं कर सकती जो मम्मी करती है। तो बच्चों और पेरेंट्स के बीच वो कनेक्शन नहीं बन रहा है तो बच्चे भी सोशली आइसोलेटेड बन रहे हैं। बच्चों को भी फिर क्या रहता है? दिन भर अकेले रहते हैं घर में या तो डिवाइसेस पे रहते हैं, टेक्नोलॉजी पे रहते हैं, कंप्यूटर पे रहते
(1:33:42) हैं या एक आध दोस्त जिसके साथ प्ले डेट अरेंज की है मम्मी ने उसके साथ उनको खेलना आता है। आज मैं देख रही हूं 10-10 साल के बच्चों में सोशल एंजाइटटी हो रही है। क्योंकि उनको एक्सपोज़र ही नहीं मिला है। पहले क्या होता था? हर शादी में हर सबको जाना होता था। तो शादियों में जाते थे, रिश्तेदारों के घर जाते थे। तो अलग-अलग किस्म के लोगों को बच्चे मिलते थे। उनको पता था कि ये अंकल ना बहुत चिल्लाते हैं। ये आंटी बड़ी अच्छी है। ये आंटी ना पीछे से चुगली करती है। दे यूज्ड टू नो हाउ टू हैंडल एवरीबॉडी। आजकल बच्चे की लाइफ क्यूरेट कर रखी है
(1:34:11) पेरेंट्स ने। काम करते हैं एक तो उनको पता है कि हम बच्चे को टाइम नहीं दे पा रहे हैं। इसलिए ब्राइब करते हैं। बच्चा जो मांगता है दे देता है क्योंकि उनको लग रहा है कि शाम को यार 2 घंटे बच्चे के साथ मिलती है। उसमें कौन किटकिट करेगा? सिर्फ 2 घंटा मेरे पास है बच्चे के लिए। तो बच्चा जो मांग रहा है दे दो ना भाई। क्यों इसको रुलाना है? तो करीज के लिए रहा हूं। यह सब इतनी तो भाई पैसे ही तो और गिल्टी पैरेंटिंग गिल्टी पैरेंटिंग उनको गिल्ट है ना उनको गिल्ट है कि मैं बच्चे को टाइम नहीं दे पा रहा हूं तो मैं क्या करूं बच्चा जो मांग रहा है दे दूं
(1:34:37) बच्चा तो खुश है ना बच्चा मेरे को पसंद करेगा बच्चा मेरे से क्लोज होगा तो गिल्टी पैरेंटिंग की वजह से बच्चों को पैंपर कर रहे हैं तो बच्चे भी मतलबी बन रहे हैं। उनको भी ये प्रोग्रामिंग हो रखा है कि भाई मम्मी वो 2 घंटा ऑफिस से आती है ना तभी जो चाहिए मांग लो या तो थोड़ा रोना धोना कर लो तो मम्मी दे देगी या तो मम्मी को बोलो कि तुम सबसे गंदे मम्मी हो तुम मुझे टाइम नहीं देते हो इमोशनल ब्लैकमेल सीख जाते हैं बच्चे बचपन से मैनपुलेशन सीख जाते हैं क्योंकि उनको पता है कि यार ये मम्मी पापा का वीक पॉइंट है उनको गिल्ट है समझ में आ रहा है और यह भी है कि आजकल ये
(1:35:10) पैरेंटिंग की अवेयरनेस बढ़ रही है तो ज्यादा से ज्यादा कपल्स को अपने मां-बाप के साथ बच्चों को नहीं बड़ा करना हम हमने इसमें लिखा है कि प्लीज अगर आप बच्चे प्लान कर रहे हो ना तो टेक हेल्प बिकॉज़ एक बंदा एक कपल अकेला बच्चे को नहीं बड़ा कर सकता है। हमारी हजारों साल की हिस्ट्री है ह्यूमन बीइंग्स की कि वी हैव ऑलवेज लिव्ड एज अ कम्युनिटी। बिल्कुल सही भाई। कभी पिछले सिर्फ 50 साल में हम आइसोलेटेड हो रहे हैं। 50 भी नहीं 15 साल में ये सोशल मीडिया फोन से आइसोलेशन वरना हम कम्युनिटी में बड़े हुए। तो बच्चे को कोई ना कोई तो मिल ही जाता था जो बच्चे को सपोर्ट देता
(1:35:42) है सिखा। आजकल क्या हो रहा है कि मम्मियों को सांस के साथ या पापा को अपने पापा के साथ नहीं बनती है कि मेरे पापा मम्मी बड़े टॉक्सिक है। मेरे बच्चे को उसके सामने नहीं लाना है। तो क्या हो रहा है कि बच्चा सिर्फ मां-बाप के साथ पड़ा हो रहा है। हम और इसकी वजह से सिर्फ मां-बाप की दुनिया वो देखता है। सिर्फ मां-बाप के तनाव देखता है। सिर्फ मां-बाप जो चाहते हैं उस तरह की लाइफ जीता है। उसको आगे एक्सपोज़र ही नहीं मिलता है। पहले ये होता था कि बच्चा हर उम्र के लोगों के साथ बातचीत करना सीख जाता था। हर उम्र के लोगों के साथ एडजस्ट
(1:36:13) करना सीख जाता था। चलो एडजस्ट नहीं तो टैकल करना सीख जाता था। उनको पता है दादी के साथ इस तरह से अप्रोच करना है। दादाजी के साथ इस तरह से अप्रोच करना। राइट और रोंग? अभी ये नहीं सीख पा रहे हैं बच्चे। इसलिए जब प्ले स्कूल डालते हैं तो महीने महीने भर तक रोते हैं। फिर उनको पार्टी में ले जाओ तो नहीं जाना होता है। पेरेंट्स बोलते हैं हम तो कूल पेरेंट्स हैं। बच्चे को नहीं ले जाते। उसने मना किया तो नहीं ले। अरे भाई पॉजिटिव चाइल्डहुड एक्सपीरियंसेस का बहुत बड़ा हिस्सा है कि बच्चे को सोशल होना जरूरी है। बच्चे को सोशल सपोर्ट मिलना
(1:36:40) जरूरी है। जो बच्चे अकेले बड़े होते हैं, चाहे कितनी भी प्रिविलेज लाइफ हो, 10 नैनी हो पर अकेले बड़े हो रहे हैं उनमें लोनलीनेस, डिप्रेशन और आगे जाके सेल्फ हार्मिंग और सुसाइड बिहेवियर्स की संभावना बहुत बढ़ जाती है। बढ़ जाती है। वर्सेस बच्चे जो कम्युनिटी में बड़े क्योंकि उसको दफ्तर तो जाना होगा कभी ना कभी। जब वहां जाएगा कॉलेज जाना है। उनको स्ट्रेस हो जाता है। नहीं नहीं हमारे पास आते हैं सोशल एंजाइटटी को लेके कि हम पार्टी में नहीं जा सकते। जहां बड़ी भीड़ है हम नहीं जा सकते। हमको पैनिक हो जाता है भीड़ में। नए लोगों के साथ हम बात नहीं
(1:37:08) कर पा रहे हैं क्योंकि मैम हमें एंजाइटटी हो जाती है नए लोगों के को देख के। हम सोशल फंक्शनंस भी नहीं जाते। सिर्फ हमारे गिनेचुने चार दोस्तों के साथ ही हम बैठ पाते हैं। तो ये एक लिमिटेशन हुआ ना? प्रॉब्लम हुआ है। और ये लोग अकेले दे आर वेरी लोनली देन। सो आई वुड टेल पेरेंट्स के पेरेंट्स यही कहते हैं कि पढ़ाई लिखाई पे ध्यान दो। ये सब ये चीजों पे भी ध्यान देना है। क्या आपका बच्चा क्या दोस्त बना पा रहा है? आपके बच्चे के लाइफ में दोस्त हैं। आपके बच्चे हर उम्र के लोगों के साथ बातचीत कर सकते हैं। आपके बच्चे आज इमरजेंसी है। कुछ
(1:37:41) आपको हो गया तो क्या वो 10 लोगों को अप्रोच करके काम निकलवा सकते हैं अपना? मोस्ट केसेस आंसर इज़ नो। और इसी इसी का एक पक्ष ये भी है। बड़ा ये भी बड़ा अजीब सा है कि हम जहां देखते हैं दो-तीन बच्चे हैं घर में हां। वहां पर जो कंपैरिजन ड्रॉ होते हैं बहुत खराब हो गया। उससे बुरा तो कुछ नहीं हो सकता। कुछ नहीं हो सकता है। बहुत खराब। कंपैरिजन इज इमोशनल अब्यूज अगेन कि देख तू भाई देख कितना स्मार्ट है तू कितना डफर है तो वो पेरेंट्स को लगता है कि इसे मोटिवेशन मिलेगा पेरेंट्स को लग रहा है कि कंपेयर करने से मेरा बच्चा और अच्छा करेगा पर
(1:38:13) रिसर्च ये कहता है कि कंपेयर किए हुए बच्चे कभी अच्छा करते ही नहीं है इनफैक्ट वो और भी बुरा करते हैं और जो अच्छा करता है उसके लिए जिंदगी भर नफरत हो जाती है उनको नफरत होती है उनको जिसके साथ कंपेयर किया जाता है ना उनके लिए उनको बहुत नफरत होती है चाहे वो खुद का सगा भाई बहन क्यों ना हो ट्रू इसकी वजह से मुझे सुनना पड़ता है क्यों क्यों भाई ये इतना होशियार क्यों है? इसकी वजह से मुझे डांट खानी पड़ती है। तो दे स्टार्ट हेटिंग। तो ऊपर से रिश्ता भी खराब हो जाता है इनका भाई-बन के बीच का और अच्छा तो उससे कुछ होता ही नहीं है।
(1:38:41) तो ये भी एक बहुत गलत चीज है। ये इंडिया में होती है। जॉइंट फैमिलीज में होती है। दादादादी नाना नानी करते हैं। ये बड़े समझदार लोग करते हैं। अनकॉन्शियसली करते हैं। अरे तुम कर तो ये रहे हो लेकिन उसके जैसा नहीं कर पाओगे। अरे क्यों कहनी है ये बात? हां। सब अपने-अप इंडिविजुअल हर इंसान इंडिविजुअल है। हर यूनिक है। ये क्यों कहना है? पर यह कहते हैं पेरेंट्स। तो इसलिए क्या होता है कि आजकल नए कपल्स को अपने मां-बाप को इन्वॉल्व नहीं करना पैरेंटिंग में। तो इसका फायदा भी है बट इसका नुकसान भी है। क्या ज्यादा क्या है? फायदा क्या है?
(1:39:09) ज्यादा है नुकसान ज्यादा है। बहुत कह नहीं सकते। डिपेंडिंग अभी आपके पेरेंट्स अगर टॉक्सिक हैं, घर में गाली गलौज कर रहे हैं। आपके बच्चे को मारपिटाई कर रहे हैं तो ऑब्वियसली आपको उनके साथ नहीं बड़ा बच्चा करना है। बट हां अगर आपके पेरेंट्स मतलब ठीक है। मैं कि मैं ये कहूंगी कि सब में बैलेंस देखो। मतलब आपके अगर पेरेंट्स आपके बच्चों को बड़ा कर रहे हैं, आपको सपोर्ट दे रहे हैं, तो उसके साथ-साथ वह पैकेज डील में कुछ बहुत इधर-उधर आएगा। हम आपकी वो क्षमता होनी चाहिए कि आप अपने हिसाब से डिसीजन लो कि फायदे ज्यादा है कि नुकसान ज्यादा है।
(1:39:38) अच्छा बच्चे को समझाने के क्रम में थोड़ी बहुत मारपिटाई वैलिड है या जीरो मारपिटाई है। नहीं नहीं आई वुड से कि सी मैं कभी रिकॉर्ड पे नहीं कहूंगी कि मारपिटाई इज नीडेड बिकॉज़ बिना मारपिटाई [हंसी] बिना मारपिटाई के भी बच्चे बड़े हो सकते हैं। जैसे मैंने मेरे बच्चों को मारा पिटाई शायद एक बार मेरे बेटे को एक बार मैंने मारा था और बेटी को शायद एक आधा बार मारा था। हम और दोनों बार मुझे बराबर याद है कि मैंने इसलिए माना था क्योंकि मैं अपने गुस्से को कंट्रोल नहीं कर पाई थी। उनकी गलती नहीं थी। बच्चे तो बच्चे ही होते हैं ना। बच्चे अगर बड़े जैसे बिहेव करने लगे तो
(1:40:10) फिर बच्चे की काहे के होंगे? तो दोनों टाइप आई वाज़ आउट ऑफ कंट्रोल। अदरवाइज आई कैन वेरी कॉन्फिडेंटली से कि बिना मारे पीटे आप बच्चे को बड़ा भी कर सकते हो, डिसिप्लिन भी कर सकते हो। हां कोई परफेक्ट नहीं है। एक आध बार थप्पड़ पड़ गई, एक आध बार आपने मार भी दिया तो आपको संभलना है। आपको सॉरी कहना है और आपको शांत बैठ के 10 मिनट 20 मिनट सोचना है कि ये मार के पीछे प्रॉब्लम क्या था? बच्चे की बिहेवियर के उसने मेरा कुछ ट्रिगर किया है। हम हमेशा बच्चे आपके हॉट बटन दबाएंगे। आपके अंदर जो अनहिल्ड है वही ट्रिगर करेंगे। हम आज मुझे अगर समझो मेरी सेल्फ एस्टीम नहीं
(1:40:47) है। मुझे अगर बचपन से बहुत बॉडी शेमिंग किया है और मेरी इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स मुझे बहुत है। सबने समझो मुझे मोटी-मोटी कहके क्या है तो मेरे अंदर वो बहुत स्ट्रांग प्रोग्राम होगा कि मेरी बच्ची को ऐसा नहीं होना चाहिए। तो मेरी बच्ची थोड़ा सा भी जंक फूड खाएगी मैं उसको मारूंगी। तो वो वहां से आ रहा है क्योंकि मुझे इरादा बहुत अच्छा है। मुझे मेरी बेटी को मोटा नहीं देखना है क्योंकि वरना मेरी बेटी को भी वही सहना पड़ेगा जो मैंने सहा है। तो मैं उसको पॉजिटिवली समझाने के बदले क्या होती है? जब भी ऐसा कुछ हुआ तो मैं हाथ उठ जाता है।
(1:41:18) आखिरी की तरफ हम बढ़ रहे हैं। एक तो आपके पास जजी आ रहे हैं। हां बहुत आ रहे हैं भाई। मेरे दोनों बच्चे भी जजी है। जजी है। हां बच्चे जजी जजी इसलिए आ रहे हैं क्योंकि उनमें अवेयरनेस है। हम उनमें बहुत सारा इनेशन है। तो डबल एजेड स्वॉर्ड है। ऐसे जेंजी आ रहे हैं जो अपने आप को सेल्फ डायग्नोस करके बोलते हैं कि अरे मुझे तो एडीएचडी है। मुझे बायपोलर है। मुझे बॉर्डर लाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर है। मुझे ये है मुझे वो है। और दूसरे जेंट्स ही आ रहे हैं जो जेनुइनली अवेयर हैं। जिनको थेरेपी की जरूरत है। ऐसे भी आते हैं जो कहते हैं कि हमारे मां-बाप नहीं मैम एग्री कर रहे हैं।
(1:41:48) उनको लग रहा है थेरेपी वैपी सब बकवास है। पैसे बनाने का बिजनेस है। हम बट मैम हमें एंजाइटटी है। हमें दवाइयां नहीं लेनी है तो मुझे हेल्प चाहिए। तो क्या है? एजेंसी का हाल क्या है? क्योंकि बड़ा इसलिए मैं स्पेसिफिक सवाल पूछ रहा हूं क्योंकि बड़ा अलग तरह से इस जनरेशन को देखा जा रहा है। एक तो ये अवेयर है। फिर दूसरा ये इतनी अवेयर है कि हर जगह पर वो डाल देती है कि आपने मेरे से पूछ दिया कि ये कैसे क्यों नहीं किया? मेरी तो ए्जायटी ट्रिगर हो गई। [हंसी] तो वो लोग यूज़ भी करते हैं लेबल्स को। इसलिए हमने कहा है व्हाट? व्हाट हैपेंड टू
(1:42:18) मी इट्स यूजिंग लाइक अ लेबल। मुझे एंजायटी है। मेरी बहन पढ़ाती है कॉलेज में। बोलती है हमें डर लगता है बच्चों को असाइनमेंट नहीं मांग सकते क्योंकि असाइनमेंट अगर मांगा बोले कि हमें तो एंजाइटी हो गई। हम पूरी रात जागे मैम एंजाइटी की वजह से। आपके असाइनमेंट की वजह से हमें एंजाइटी हो गई है। तो उनसे असाइनमेंट नहीं मांग सकते। टू देम ये हाल होगा। इसका रास्ता क्या है फिर? बैलेंस मिड पॉइंट। क्योंकि देखो हर चीज न्यूक्लियर की तरह है। न्यूक्लियर पावर को आप एनर्जी आप इरीगेशन में पावर जनरेशन में यूज़ कर सकते हो या किसी देश को उड़ाने में
(1:42:49) यूज कर सकते हो। तो इसी तरह मेंटल हेल्थ की अवेयरनेस है। उससे हम ऐसे लोगों को बचा भी सकते हैं जिन हेल्प कर सकते हैं जिनको वाकई में जरूरत है। बट उसके साथ-साथ ऐसे भी लोग आएंगे जो इसका अब्यूज कर रहे हैं। जो इसके नाम पे गलत चीजें कर रहे हैं और उसके साथ आगे ऐसे ऐसे आते हैं लोग जो कहते हैं कि यार पेरेंट्स को बोलते हैं कि देखो आपने मुझे इतना चाइल्डहुड ट्रॉमा दिया है। आपने मेरी जिंदगी खराब कर दी है। अभी मैं कुछ काम तो कर नहीं सकता हूं क्योंकि मुझे ट्रॉमा है। तो अभी आप करके खिलाओ मुझे। मैं तो अभी कुछ नहीं करूंगा। हम आपका आपकी जिम्मेदारी है। अभी आप भुगतो
(1:43:19) इसका पश्चाताप करो और मुझे मेरे मुझे सपोर्ट करो फाइनशियली। यह गलत बात है। ऐसा भी हो रहा है। ऐसा भी हो रहा है। जैन [गला साफ़ करने की आवाज़] जी मैं जजी को के बारे में मैंने बहुत वीडियोस बनाई है। मेरे दोनों बच्चे भी हैं। मैं कहूंगी कि बहुत ये जनरेशन का वायरिंग अलग ही है हमसे क्योंकि दे आर डिजिटल नेटिव्स। हम लोगों ने ये सब डिजिटल टेक्नोलॉजी अडॉप्ट की। यह लोग पैदाइशी से इसके साथ चले आ रहे हैं। इसीलिए अवेयरनेस ज्यादा है, सेंसिटिविटी ज्यादा है। हम कनेक्टेड ज्यादा है। मेरे टाइम में मुझे कभी नहीं पता होता था कि नेपाल में क्या हो रहा है, हॉर्मोस में
(1:43:56) क्या हो रहा है, ईरान में क्या हो रहा है? कभी दूरदर्शन न्यूज़ ने कुछ दिखा दिया तो पता चलता था। तो मुझे उसके साथ जुड़ी हुई एंजाइटटी भी नहीं होती थी। आजकल के बच्चों में एंजायटी इसलिए हो रही है। इसलिए नहीं हो रही है कि वीक जनरेशन है। लोग कह रहे हैं जंजी बहुत वीक है। एक्चुअली इनको इतना इंफॉर्मेशन मिल रहा है कि उनको ऐसा लग रहा है कि दुनिया सब खत्म हो रही है। क्योंकि वो एल्गोरिदम की वजह से ना अगर आपने एक अर्थक्वेक की रील देख ली तो आपको 50 अर्थक्वेक की रील दिखी। कि आपको लग रहा है दुनिया तो खत्म हो रही है। तो इनके पास
(1:44:20) टेक्नोलॉजी बहुत है, टूल्स बहुत है। हमने उनका माहौल ऐसा बना रखा है। फैमिलीज़ कम हो रहे हैं। पेरेंट्स के साथ कनेक्शन कम हो रहे हैं। ये जजी के पेरेंट्स इतने ज्यादा अवेयर हैं कि वो चाहे अपने मां-बाप की गलतियां नहीं दोहराएं बट खुद भी खुद की एंजायटी बच्चों को दे रहे हैं। दुनिया इतनी कॉम्पिटिटिव हो गई है। मेरे जमाने में मेरे 75% मार्क्स आए थे तो मेरे मां-बाप तो पार्टी दी आज 75% मार्क्स वाला बच्चा लूजर गिना जाता है क्योंकि 99.
(1:44:46) 9 पे भी आपको एडमिशन नहीं मिलती है। तो प्रेशर भी बहुत है इस जनरेशन पे। तो इस जनरेशन जैन जी एज अ जनरेशन हैज़ मच मच मोर मेंटल हेल्थ इश्यूज देन जैन एक्स और जैन व और मिलेनियल्स। ये पहले की सब पीढ़ियों से सब ये मैंने मेरे पीएचडी का मैंने जब डॉक्टरेट किया ना तो उसमें ये बाहर आया क्योंकि मैंने इस इसी सब्जेक्ट पे पीएचडी किया है। तो जब मैंने डाटा देखा तो पता चला कि ये जनरेशन में एंजायटी सबसे ज्यादा डिप्रेशन सबसे ज्यादा है। मेंटल हेल्थ इश्यूज सबसे ज्यादा है पहले की पीढ़ियों के कंपैरिजन में में जसी में इसीलिए तो मैंने कहा कि हमारे देश का डेमोग्राफिक डिविडेंड है वो एक्चुअली
(1:45:20) डेमोग्राफिक लायबिलिटी बन रही है। क्योंकि इनकी पहले की पीढ़ियां हम सब काम करती है। सब काम करती थी। 10-10 घंटे काम करके इकॉनमी को बढ़ा रही थी। यह पीढ़ी ऐसी है जो मेंटल हेल्थ इश्यूज की वजह से काम नहीं कर रही है जितना करना चाहिए। अच्छी बात ये है कि ये वर्क लाइफ बैलेंस में मानती है। हम जो हमारी पीढ़ी नहीं मान रही थी। राइट? पर वर्क लाइफ बैलेंस के चक्कर में ये वो भी नहीं कर रही हैं जो इनको करना चाहिए। तनतोड़ मेहनत, पर्सिवियरेंस क्योंकि इनका अटेंशन फोकस नहीं है। सोशल मीडिया की वजह से यह लोग वहां पर लगे रहते हैं। एडिकशंस
(1:45:55) हैं इनको। इनके घर के माहौल जैसे मैंने कहा फैमिलीज़ छोटे हो रहे हैं। पेरेंट्स के खुद के मेंटल हेल्थ चैलेंजेस हैं। तो इसलिए बच्चों पे इंपैक्ट पड़ रही हैं। तो मेरे पास बहुत जजी क्लाइंट्स आ रहे हैं। बहुत मेंटल हेल्थ इश्यूज लेके आ रहे हैं। हम उनको हेल्प कर भी पा रहे हैं। कई बार नहीं भी कर पा रहे हैं। इट्स अ मिक्स्ड बैग। अच्छा। पर इसका इंपैक्ट देश पे पड़ेगा। [गला साफ़ करने की आवाज़] पड़ेगा ही पड़ेगा। क्योंकि हर देश तभी आगे बढ़ता है जब उसकी युवा पीढ़ी काम कर सके। देश के देश के इकॉनमी में कंट्रीब्यूशन दे सके दे सके। जब ये युवा पीढ़ी का खुद का इतना ट्रॉमा
(1:46:24) है जिसकी वजह से ये वोलेटाइल है, ट्रिगरर्ड है। इमोशनली इमंबैलेंस्ड है। मेंटल हेल्थ इश्यूज लेके चल रही हैं तो कैसे कर पाएंगे? जॉब में हर दिन जो लड़ाई होती है बॉस के साथ या तो शट डाउन हो गए होते हैं या तो फिर इनको आदत पड़ गई है डिप्रेशन की गोलियां खाने की एंजायटी की गोलियां खाने की जिसकी वजह से सोते रहते हैं पूरे दिन एडिक्शनंस हैं ड्रग कर रहे हैं कुछ ज्यादा बहुत एक चीज पे और हम बात करना चाह रहे थे कि सेल्फ हार्म और सुसाइड जो हमारी सोसाइटी में बहुत ज्यादा हम देख रहे हैं कि पूरा हमने एक एक शहर ऐसा बसाया जहां के इन एंड अराउंड यही
(1:47:00) चर्चा का विषय है कोटा की अगर मैं बात करूं तो पहला तो मेरा सवाल यही है कि इतना ज्यादा बच्चों पे जो बोझ डाल दिया गया है कि पेरेंट्स फोन करके पूछ रहे हैं कि बेटा वो पिछली बार वाले में इतने आए थे 20 में अब की कितने आए हुए हैं ये बच्चों तक पहुंच रहा है। पेरेंट्स इतना सैक्रिफाइस करके भेज रहे हैं कि बच्चे पे ऑलरेडी प्रेशर है। फिर हमें पता चलता है कि भाई बच्चे ने सुसाइड कर लिया। मैं खुद कोटा गया। वहां मैंने देखा कि वहां पर सुस एंटी सुसाइड हॉस्टल्स बने हुए हैं कि वो और वहां के जो मैनेजर्स हैं बड़े गर्व से हमें पूरा एक्सप्लेन कर रहे थे, घुमा रहे
(1:47:33) थे। पंखा जाली लगा लेते हैं पंखे। पंखा है पंखे में लोड है। तो अगर मान लीजिए कि आप 40 किलो से ज्यादा उस पे ला देंगे तो गिर जाएगा। ओ बाप रे। तो उन्होंने ऐसे सिस्टम बना रखे हैं 30 केजी का लगा रखा है कि अगर 30 केजी से ज्यादा लोड आप डालेंगे। इनको लग रहा है कि वही तरीका है सुसाइड करने का। और कोई तरीका दूसरा भी है। तो उन्होंने बताया बड़े गर्व से बोले कि देखिए साहब इसमें ना सर अगर बच्चा लटक गया मान लीजिए मर रहा मरेगा नहीं फिर उन्होंने आगे हमें दिखाया कि ये देखिए और मैनेजर बता रही हैं कि ये जो गेट है हम इस पे लॉक लगाते हैं अगर बच्चा बारिश हो धूप हो वो
(1:48:06) छत पे नहीं जा सकता हमारे यहां परमानेंट लॉक रहता है ये इसकी चाबी सिर्फ दो लोगों के पास रहती है मैंने कहा अच्छा वो तो इसको उस तरह से दिखा रहे थे बहुत अच्छी चीज है। फिर उन्होंने खिड़कियां दिखाई तो खिड़कियों के बाहर वहां लंबे-लंबे नेट लगे हुए हैं। बोले, बच्चा अगर कूदेगा, तो हम मरने नहीं देंगे। मतलब इसका क्या मतलब? और वो वहां का सबसे बेहतरीन हॉस्टल है। जो सबसे ज्यादा चार्ज कर रहा है। तो मैं यह जानना चाह रहा हूं कि पेरेंट्स की वो कौन सी साइकी है जो अपने बच्चे को एक ऐसे हॉस्टल में छोड़ आती है? जहां उसका मैनेजर उनको पक्का मैं लिख के
(1:48:41) दे सकता हूं। जैसे वो मुझे विजिट करा रहा था, वैसे ही पेरेंट्स को करवाता होगा कि इसमें आपका बच्चा लटकेगा तो मरेगा नहीं, कूदेगा तो मरेगा नहीं। पर ये क्यों नहीं पूछ रहे हैं कि बच्चा लटकने तक पहुंचता क्यों है? बच्चा कूदने का सोच क्यों रहा है? ये तो मैं यहां पे पेरेंट्स की वो साइकोलॉजी समझना चाह रहा हूं कि वो कहां से आ रही है कि वो इतना स्टुपिडिटी है। ये अरे ये पैसे बनाने का कमर्शियल इनोवेशन है। इट्स लाइक सेइंग के यार मतलब यही तरीके हैं। बच्चा जाके गोली खा लेगा। बच्चा लाके नदी में कूद पड़ेगा। बच्चा जाके ट्रक के आगे गिरेगा। सुसाइड करने के
(1:49:10) तो 50 तरीके हैं। आप कब तक आप बच्चे को प्रोटेक्ट करोगे? इससे सही सवाल यह है कि हमें क्या करना चाहिए सिस्टम में, माहौल में, घर के माहौल में, कोटा के माहौल में ताकि बच्चे सुसाइड के बारे में सोचे ही नहीं। ये कितना ट्विस्टेड थिंकिंग है इनका। मुझे मुझे तो एक्चुअली दुख हंसी तो आ रही है पर दुख हो रहा है कि लोग इतना कॉमन सेंस नहीं है इन लोगों में समझ नहीं आ रही है। और मैं वहां बच्चों से मिला। नीचे खाना खा रहे हैं। इट्स लाइक फूड पोइजनिंग हुआ है ना, तो उल्टी बंद कर दो और डायरिया बंद कर दो। तो फूड पोइजन ही सॉल्व हो जाएगा। अरे ऊपर से
(1:49:44) पोइजन तो अंदर ही अंदर रहेगा। ये थोड़ी ना सशन है। दिस कौन से पेरेंट्स हैं जो यहां पर छोड़ के आ रहे हैं अपने बच्चों को उनकी क्या साइकी है? पता नहीं यही है कि पेरेंट्स को शायद कल्चरली या जो पेरेंट्स ऐसे सोशियोइकोनॉमिक जगह से आते हैं जहां उनको दिमाग में ये है कि बेटा अगर इंजीनियर नहीं बढ़ा आईआईटी में नहीं गया तो उसका लाइफ नहीं बनेगा। हम राइट? तो पेरेंट्स भी मेरे हिसाब से तो सही इरादे से [गला साफ़ करने की आवाज़] कर रहे होंगे कि बेटा मेरा डॉक्टर इंजीनियर बनेगा या जो भी पढ़ेगा तो ही हम इस कंडीशन से बाहर आएंगे। ये बेटा हमारा घर का शान
(1:50:17) है या बेटा हमको इसमें से बाहर निकालेगा। या तो मां-बाप के खुद के एंबिशंस हैं कि मैं आईआईटी नहीं कर पाया। मेरा बेटा उसमें जाएगा। या तो बचपन से बेटे ने बहुत अच्छा जैसे मैंने कहा परफेक्शनिज्म दिखाया है। अच्छा एक कोपिंग स्ट्रक्चर दिखा। मां-बाप को लगता है कि नहीं नहीं अभी बेटे को तो मुझे बनाना है। मुझे इंजीनियर बनाना है। आईआईटी में टॉपर बनाना है। तो मेरा सपना मेरा बेटा पूरा करेगा। तो ये सब प्रेशर्स हैं। तो ये वो मां-बाप है जो यहां पे भेजते होंगे मेरे हिसाब से। पर मां-बाप को ये समझना है भाई कि इसके बारे में बातचीत करो। सी मुकुल इंडिया में
(1:50:49) लोग सुसाइड के बारे में बातचीत ही नहीं करते। मां-बाप को ये लगता है कि हम इसके बारे में बातचीत करेंगे तो बच्चे को आईडिया देंगे। आईडिया देंगे। कहते हैं कि सुसाइड के बारे में बच्चे से बात करेंगे तो बच्चा सुसाइड करना सोचेगा। अरे आपको अकल नहीं है। बच्चा आपका सुसाइड के बारे में पहली बार फोन दिया तभी उसको तो पता चल गया था कि सुसाइड क्या है। ऐसे सेक्सुअल कन्वर्सेशन भी लोग नहीं करना चाहते बच्चों। सेफ सेक्स के बारे में अरे नहीं बोल सकते वरना बच्चे को लगेगा कि हम आईडिया दे रहे हैं उसको। अरे आपके बच्चे को आपको आपसे 10 गुना ज्यादा सब पता है
(1:51:14) इसके बारे में। मां-बाप ही इतने इसके बारे में बिल्कुल अनअवेयर हैं। तो सुसाइड के बारे में बातचीत होनी चाहिए घर में। मैं तो कहती हूं किस किस्म की बातचीत होनी चाहिए कि बेटा ये पेपर में हम पढ़ते हैं। आपने रील में देखा होगा। ऐसा होता है। आप क्या सोचते हो इसके बारे में? अगर आपका बेटा बोल रहा है अरे मम्मी ये तो सबसे आसान है। अगर कोई प्रॉब्लम हो जाए तो सुसाइड कर लो। तो नाउ यू नो कि आपके बेटे की थॉट प्रोसेस क्या है? तो आप उसको कोच करो कि ये सही ये गलत है। अगर बेटा ये कह रहा है कि नहीं मम्मी कुछ भी हो जाए सुसाइड नहीं करना चाहिए। तो
(1:51:44) यू नो कि आपके बेटे की थॉट प्रोसेस सही है। राइट? आपके बच्चों के साथ कनेक्शन बनाए रखो। प्रेशर मत डालो। बच्चों को क्या करना है वो समझो। ये तो सीधी सी समझने वाली बात है भाई। हम सुसाइड वही बच्चे करते हैं जो मैं कह रही हूं हमने इतने करीबन यह बुक लिखी थी ना लास्ट ईयर का डाटा है हमने करीबन 900 लोगों से साथ बात की थी जिन्होंने सुसाइड अटेम्प्ट किए हैं एक्टिव अटेम्प्ट किए सबका मैंने जैसे कहा दे हैव एक्सपीरियंस लोनलीनेस हम डिप्रेशन हम इमोशनल अब्यूज इमोशनल नेगलेक्ट हम फियर आइसोलेशन डोमेस्टिक वायलेंस जब घर में माहौल ऐसा होता है कि मां-बाप
(1:52:22) बहुत झड़ लड़ झगड़ रहे बच्चे को हर रोज ऐसा फील हुआ है कि मेरा दुनिया में कोई है ही नहीं। भाई मैं अकेला ही हूं। तो यह बच्चा वो है जो सबसे पहला मर जाए मरने की कोशिश करेगा। क्योंकि उसके पास कोई है ही नहीं जिस जो उसकी बात सुने समझे और यह वो बच्चे जिनको बचपन से कहा गया कि तू कुछ नहीं कर सकता है। तेरे से कुछ होगा नहीं। तो बेचारा कोप अप करने के लिए टॉपर रहेगा रहेगा रहेगा। कब तो बर्न आउट हो जाएगा ना वह बच्चा। जैसे आप घोड़े को हर रेस में दौड़ाओगे तो कभी तो उसको रेस्टिंग पीरियड चाहिए ना। फार्मूला वन गाड़ी का भी पिट स्टॉप होता है। पिच स्टॉप के बगैर वो
(1:52:55) गाड़ी जल जाएगी। बट ये प्रेशर आप अति महत्वाकांक्षाओं का बोझ नहीं डाल सकते। नहीं डाल सकते हो। वही बच्चे करते हैं। और जिनको सपोर्ट नहीं अगर आपको समझो बच्चा बोल रहा है मुझे वर्ल्ड चैंपियन बनना है। तो तब प्रेशर आएगा। आप उसको सपोर्ट करो। तो नहीं टूटेगा वो। वी हैव सीन सो मेनी। ये जो चेस चैंपियंस वगैरह है। कितनी तकलीफ इन्होंने सहन किया। बट उनका पेरेंट्स के साथ कनेक्शन है। वो आइसोलेटेड नहीं है। अगर पेरेंट्स नहीं है तो कोच के साथ कोई तो उनकी लाइफ में है जो उनको कास्टेंटली सपोर्ट करता है। ये बच्चे कभी फेलियर में नहीं मरेंगे। कभी सुसाइड नहीं करेंगे। वही
(1:53:30) करेंगे जो हर रोज फील करते हैं कि कोई मेरे लिए है। अगर मैं नहीं रहा तो किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा। ये पांचप छह साल के बच्चे बोलते हैं। 10 साल का बच्चा बोलता है। डजंट मैटर इफ आई लिव। आई नोबडी केयर्स अबाउट मी। और यह ऐसा नहीं है कि बहुत गरीब वाले बच्चे हैं। यह वही वो भी बच्चे जो बहुत बड़े-बड़े बंगले में रहते हैं। बहुत पैसे वाले हैं। पर इनके मां-बाप के पास इनके लिए टाइम ही नहीं है। [हंसी] तो बहुत [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] सारी बातें तो रह गई हैं। वो तो मैंने कहा। बहुत सारी दो किताबें जितनी बातें हैं। [हंसी] आज हमने मुझे लगा
(1:54:03) था करनी थी वो किताब की बात बट घूम-घूम के यही किताब की पे आ जाती है। पैरेंटिंग पे ही सब चीजें आती हैं। नहीं दोनों ही चीजें बहुत कनेक्टेड हैं। मैं दोनों ही दोनों ही दिखा दीजिए। [हंसी] हां जी ये देखिए भाई ये बहुत जरूरी चीज है कि हम लोगों के यहां पर सोसाइटी में बच्चे पैदा करने के बाद कोई बता नहीं रहा है कि करना क्या है इनका ये जो आ गए हैं। तो इसके लिए आपके पास बड़ी अच्छी किताब है पेंग्विन से ही दोनों आई हैं। हां दोनों पेंग्विन की तो दिस बुक विल वोंट टीच यू पेरेंटिंग। एक तो यह किताब है और यह किताब है व्हाट हैपेंड टू मी व्हाट्स रोंग विद मी कट है
(1:54:35) और व्हाट हैपेंड टू मी इंडियन पर्सपेक्टिव ऑन चाइल्डहुड ट्रॉमा एंड रिकवरी। तो इन दोनों ही किताबों को पढ़िए। कई दफा हमें लगता है कि हमारे साथ क्यों ये जो हो रहा है वो हो क्यों रहा है पता ही नहीं चल पाता है और हम गलत जगहों पे इसके जवाब ढूंढ रहे होते हैं। हम फ्रस्ट्रेट रह रहे होते हैं। तो बहुत सारे मुझे खुद पर्सनली बहुत सारे जवाब मिले और दफ्तर में अब जब कभी ऐसे-ऐसे करता मिलूं [हंसी] [खांसने की आवाज़] तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] आपके साथ भी कभी मिलूं तो हमिंग वमिंग करूं तो समझ जाइएगा। [हंसी] बाकी इसमें सिर्फ और सिर्फ हमने ये बात
(1:55:06) नहीं की कि प्रॉब्लम्स क्या हैं? हमने स्यूशन की तरह अभी बात की। इसमें बहुत सारी स्यूशन की तरफ बातें की गई कि आप क्या-क्या करके इन चीजों से बाहर आ सकते हैं। तो कई दफा सिर्फ आप किसी साइकोलॉजिस्ट के पास पहुंचे या साइकोथरेपिस्ट के पास पहुंचे वही जरूरी नहीं होता। आप अपने स्तर पे भी बहुत सारी चीजें कर सकते हैं। आपकी पूरी बातचीत कैसी रही? आपकी क्या एक्सपीरियंसेस रहे हैं? आप अपने बच्चों को किस तरह से ट्रीट करते हैं? क्या अपेक्षा रखते हैं? ये सारी चीजें भी आप हमें कमेंट सेक्शन में बता सकते हैं। डॉक्टर रीरी का धन्यवाद कर सकते
(1:55:33) हैं। उन्होंने हमारे साथ इतनी सारी बातें इतने अच्छे से शेयर की। मेरे बहुत सारे सवाल रह गए हैं। उम्मीद करते हैं कभी और फिर से बात करेंगे हम। जरूर मैं ऑलवेज रेडी हूं। ये मेरा मिशन है, विज़ है कि इंडिया में हो सके उतने पेरेंट्स तक और लोगों तक ये बात पहुंचे। इसके बारे में बातचीत हो जो नहीं हो रही है अभी। तो जब भी भी मौका दे मैं आ जाऊंगी। बिल्कुल। तो बातचीत करिए और लोगों को भी बताइए आसपास अपने और इसको शेयर करिएगा ताकि और भी लोग अवेयर हो सके। बहुत-बहुत शुक्रिया पॉडकास्ट देखने के लिए। बहुत-बहुत धन्यवाद। अपना प्यार और दुलार
(1:56:05) बनाए रखिए।
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