Sunday, August 2, 2026

One of the Most Powerful Spiritual Conversations You'll Ever Hear | Swami Kailashanand Giri Ji

One of the Most Powerful Spiritual Conversations You'll Ever Hear | Swami Kailashanand Giri Ji

Author Name:Jai Madaan - Lady of Fortune

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@JaiMadaanLadyofFortune

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=6KMXMr2s7v0



Transcript:
(00:00) तो ये जो शैव्य और यह जो वैष्णव में जो अत्यंत काल झगड़ा चली जा रहा है यह शास्त्र की झगड़ा नहीं शास्त्र में तो नारायण ने महादेव की उपासना उपासना की शिव महिम स्तोत्र में भगवान नारायण ने एक बार 1000 कमल पुष्प महादेव को अर्पित करने का संकल्प लिया हमारे आश्रम में हजार बार ऐसा हुआ 25 सालों में जब महादेव अलग-अलग रूपों में आए आप मिलेगा मैंने पीछे मुड़ के देखा तो मैं देखा कि लगभग 6 फीट 4 इंच का एक साधु खड़ा है और उनके हाथ में उनसे लगभग 1 1/2 फीट ऊंचा त्रिशूल है। एक आम आदमी जो आप जैसी साधना ना कर सकता हो तो इसलिए जो व्यक्ति मेरे पास आता है दुख
(00:43) को लेकर के मैं उसको भगवती का बीज मंत्र देता हूं। एस्ट्रोलॉजी में बिलीव करते हैं। हर परमात्मा का फलादेश ज्योतिष के माध्यम से हुआ है। राम जब जन्म लेते हैं तो राम का फलादेश हो गया। कृष्ण जब जन्म लेते हैं तो कृष्ण का फलादेश हो गया। परीक्षित जब जन्म लेते हैं तो परीक्षित का फलादेश होगा। पैसे का रोल क्या है लाइफ में? अगर यह इंसान भी दुखी है। हर व्यक्ति को आत्मीय सुख चाहिए। वो पैसे से और पावर से प्राप्त होने वाला नहीं। अनुष्का शर्मा ने कुछ गले में तुलसी की माला पहनी होगी इन दिनों। मैं आई तो आपने मुझे रुद्राक्ष की [संगीत] माला दी। और
(01:17) मैं ये सोच रही थी कि सिर्फ माला पहनने से ही अगर इंसान बदल जाए तो क्या बात होगी। कबीर ने कहा कबीर कुत्ता में राम का मोती मेरा नाम गले बिच डोरी प्रेम का चित खींचे चित जा ये जो शैव्य और ये जो वैष्णव में जो अत्यंत काल यूज़लेस झगड़ा चली जा रहा है। आप भगवान एक दूसरे को मान रहे हैं। श्री राम रामेश्वरम की स्थापना कर रहे हैं। पर यह जो झगड़ा चला आ रहा है आपकी तो माता [संगीत] नारायण जी को मानती थी। आपके दादा जी ने राधा और कृष्ण जी को स्थापित किया हुआ था और आप महादेव को मानते हैं तो ये द्वंद के लिए मतलब इसका क्या हल निकालते
(01:58) हैं जब लोग आपके पास आते हैं जो शिव और विष्णु का एक यूज़लेस सा झगड़ा चला जाता है इसके लिए फिर कैसे संभव है मुझे लगता है कि ये हमारी बुद्धि की झगड़ा है। बुद्धि की झगड़ा है। स्वभाव का झगड़ा है। व्यवहारिक झगड़ा है। ये शास्त्र की झगड़ा नहीं है। नहीं है शास्त्र की घबरा शास्त्र में तो नारायण ने महादेव की उपासना की एक स्तोत्र आता है उस स्तोत्र का नाम है शिव महिम स्तोत्र शिव महिम शिव महिम स्तोत्र में भगवान नारायण ने एक बार 1000 कमल पुष्प महादेव को अर्पित करने का संकल्प लिया 1000 कमल पुष्प महादेव को अर्पित करने का संकल्प लिया 1000 नाम से
(02:45) 1000 पुष्प 1000 पुष्प महादेव को अर्पित करना था। एक पुष्प की कमी हो गई। एक पुष्प की चोरी हो गई। महादेव ने वो पुष्प धीरे से निकाल लिया। किसी से उठवा लिया। भगवान विष्णु से महादेव इस प्रकार से परीक्षा ले रहे हैं। एक पुष्प की कमी हुई। एक पुष्प की कमी होने के कारण जब 999 पुष्प महादेव को चढ़ा तो एक पुष्प की कमी हो गई। एक नाम रह गया। संकल्प अधूरा रह गया। संकल्प अधूरा रह रह गया तो भगवान विष्णु को लगा अब मैं क्या करूं इस समय यहां कमल तो है नहीं क्योंकि नारायण को वो कमल चढ़ा रहे थे वो जो भगवान महादेव को अत्यंत अप्रिय है।
(03:30) तो ब्रह्म कमल ब्रह्म कमल के लिए जाना पड़ता। तो भगवान विष्णु को लगा कि अब मैं क्या करूं? तो भगवान विष्णु ने उसी समय अपने दाएं नेत्र को निकाल के महादेव को अर्पित कर दिया। अपनी अंगुली तर्जनी अपनी आंख में लगाई और आंख निकाल के महादेव को अर्पित कर दिया। भगवान उस समय तुरंत महादेव देवाधिव ओडर दानी हमारे आराध्य एक पल में प्रकट हो के भगवान विष्णु को नयन दे देते हैं और नयन देकर के भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र प्रदान करते हैं। क्या करते हैं? सुदर्शन सुदर्शन चक्र। विष्णु के विष्णु जी के पास जो सुदर्शन चक्र है वो भगवान शिव के
(04:08) द्वारा दिया गया हुआ है। उस जगह पर पुष्पदंत ने लिखा हरिस्ते सहस्रम हरि ने सहस्र कमल चढ़ाने का संकल्प लिया। हरिस्ते सहस्रम कमल बलि माधाय पदयोर 100 बार ऐसी याचनाएं भगवान शिव की नारायण ने की। भगवान विष्णु से जब लोगों ने पूछा कि आप नारायण को कमल क्यों अर्पित कर रहे हैं? नयन रूपी कमल तो भगवान विष्णु ने कहा मेरे एक कमल की चोरी हो गई थी। कमी हो गई थी। मैं गिन के तो लाया था 1000 लेकिन एक कमी हो गई। तो इस कारण मेरा जो नयन है उसको कमल नयन कहा जाता है। भगवान विष्णु को राम को और कृष्ण को कमल नयन कहा गया है। कमल
(04:56) नयन तो कमल लोचन प्रभु ते अधिकाई गोस्वामी जी लिखते हैं परमात्मा का जो लोचन कमल है। कमल लोचन है। कमल नयन है। भगवान उस कमल नयन को अर्पित करके अपने संकल्प को पूरा करते हैं। महादेव वहां खड़े होकर के आकर तुरंत महादेव नारायण को नेत्र तो दे ही देते हैं लेकिन सुदर्शन चक्र भी देते हैं। तो भगवान विष्णु ने पूछा महादेव इतनी कठोर साधना आपका कौन कर पाएगा? तो भगवान विष्णु ने जब यह कहा तो महादेव ने कहा जो कठोर साधना मेरा करेगा वही मुझे प्राप्त करेगा। वही मुझे प्राप्त करेगा। तो इसलिए राम ने रामेश्वर की स्थापना की। तो राम जी से
(05:42) अगस्त ने कहा कि आप जिस शिवलिंग की स्थापना कर रहे हैं इनका नाम क्या रखना चाहेंगे? ये तो आपके महादेव हैं। आपके द्वारा स्थापित हैं। तो राम ने कहा मेरे द्वारा स्थापित हैं। इसलिए इनका नाम रामेश्वर रखा जाए। इनका नाम रामेश्वर रामेश्वर रखा जाए। महादेव को लगा ये तो मेरे आराध्य हैं। इनके नाम से अगर यह रामेश्वर होगा तो मैं इनका आराध्य हो जाऊंगा। इसलिए नहीं ये मेरे आराध्य हैं इसलिए मेरे नाम से इनका नाम होगा। तो रामेश्वर ईश्वर स रामेश्वर महादेव ने कहा जो रामेश्वर के ईश्वर हैं अर्थात माहेश्वर के जो ईश्वर हैं महेश्वर अर्थात माहेश्वरी के जो पति हैं पार्वती के जो
(06:20) पति हैं उनके जो ईश्वर हैं वो राम है। इसलिए इनका नाम रामेश्वर रखा गया। इनका नाम रामेश्वर रखा गया। लिंग थापी विधिवत कर पूजा शिव समान प्रिय मोहि न दूजा भगवान राम कह रहे हैं कि शिव के समान मेरा मुझे कोई और प्रिय नहीं है शिव के समान मुझे कोई प्रिय नहीं है तो शिव द्रोही मम दास कहावा सो नर सपनेहु मोहि न पावा जो शंकर का द्रोही है और राम का प्रिय है भगवान राम कहते हैं वह मुझे स्वप्न में भी नहीं पा सकता है। स्वप्न में भी नहीं पा सकता।
(07:04) इसलिए बिल्कुल भेद नहीं है। बिल्कुल भेद नहीं है। और कोई भेद करता है तो मुझे लगता है कि उनके जीवन में ज्ञान ऊपर से है। अंदर से ज्ञान नहीं है। बिल्कुल ठीक। अंदर से ज्ञान नहीं है। मुझे आपसे तीन सवाल और पूछने हैं और बहुत जरूरी सवाल हैं। एक जब आपके पास कोई आता है तो आप कोई तो हल देते होंगे यह पाठ कर लो, ये पूजा कर लो, ये ध्यान कर लो। जब कोई पैसे के लिए आता है तो आप उसको क्या बोलते हैं? क्या करना चाहिए? दोनों बात अच्छी है। देखो बहुत सारे लोग हैं जिनकी कुछ ना कुछ समस्या है। गोस्वामी जी लिखते हैं कि संसार में कोई ऐसा नहीं
(07:41) है जो दुखी नहीं है। जिसको दुख नहीं है। कोई न कोई दुख है। कोई किसी चीज से दुखी है। कोई किसी चीज से दुखी है। कोई किसी चीज से दुखी है। कोई तन दुखी, कोई मन दुखी, कोई धन बिन रहत उदास थोड़े थोड़े सब दुखी। अब हर व्यक्ति तो जया मददान हो नहीं सकता। [हंसी] नहीं क्या मैं तो कृपा में हूं वो दुख भी उसका सुख भी उसका दोनों मैं कह रहा हूं कोई तन दुखी कोई मन दुखी कोई धन बिन रहत उदास थोड़े थोड़े सब दुखी सुखी महादेव के दास सुखी राम के दास बिल्कुल तो कोई तन दुखी है सब कुछ है शरीर साथ नहीं देता है शरीर साथ देता है मन सुखी नहीं है मन में
(08:24) दुख है मन और शरीर साथ दे रहा है धन की कमी है एक व्यक्ति ऐसा है जिसके पास खाने खाने के लिए बहुत है। खाने वाला नहीं है। खाने वाला खाने वाला नहीं है। एक व्यक्ति ऐसा है जिसके पास खाने वाला बहुत है। खाने के लिए नहीं है। खाने के लिए नहीं है। तो कोई तन दुखी कोई मन दुखी कोई धन बिन रहत उदास। थोड़े थोड़े सब दुखी सुखी राम के दास। हमने एक पंक्ति इस जगह पर अपने लिए जोड़ा है अपने तरफ से। तुलसी यह संसार में सबसे मिलिए धाए। ना जाने किस रूप में नारायण मिल जाए तुलसी या संसार में भांति भांति के लोग नर नारायण दो फिरत है जान सकत को
(09:06) को जान सकत को को ऐसा नहीं है हमारे आश्रम में हजार बार ऐसा हुआ 25 सालों में जब महादेव अलग-अलग रूपों में आए क्या बात है और मैं मिला आप मिले मिले एक बताइए अभी तो पिछले साल की घटना है मेरा पूजन के समय मेरा बाया पैर खराब हो गया हमारे अच्छा आप भी थे हां आनंद मैं बताया था सौरभ और नितेश तो हमारे थे ही साथ में रात को मैं करीबन 1120 पे उठता हूं प्रातः काल 7:35 7:36 7:40 7:50 पे मैं महादेव की सेवा के लिए बैठ जाता हूं। अधिकतम 8:00 बजे आसन मेरा सिद्धासन लग जाता है। सिद्धासन लग जाता है। फिर आसन बदलते नहीं। फिर हम आसन बदलते हैं रात को 12:120
(09:53) पे। 11 बज 20 मुझे 12:00 बजे से पहले गंगा मैया नहाना होता है। 12 12:00 बजे गंगा मां सो जाती है। फिर 12 से चार वो विश्राम करती हैं तो हम उसको छू नहीं सकते हैं। तो 11:20 पर उठते हैं। 15 मिनट में हम अपनी माई की पूजा करते हैं। महादेव की कामराज गुरु जी की पूजा करते हैं और हम सीधा गंगा जी हमको लोग उठा के गंगा जी ले दौड़ते हैं। हम हम 11:50 के आसपास गंगा जी पहुंच जाते हैं। हम 11:50 1140 1142 11:45 11 मतलब 11:50 से पहले गंगा जी हम पहुंच के गंगा मैया को नमस्कार करके संकल्प लेकर गंगा जी में हम अंदर चले जाते हैं। 10 से 8 से 10 मिनट 8 से 9 मिनट गंगा जी
(10:37) में रहते हैं। हम 11:58 पर हम गंगा जी से बाहर आ जाते हैं। उसके बाद हम फिर अपने कक्ष में हमें लोग बच्चे उठा के लाते हैं। हम तो चल नहीं सकते। हमारे हाथ पैर खराब रहते हैं। हमें तो उठा के लाते हैं। फिर हमें लोग वस्त्र पहनाते हैं। फिर हमें उठा के महादेव की सेवा में ले आते हैं। इस बार अभी वैसे तो हर साल की 5 10 15 घटनाएं होते हैं। इस साल की घटना है। आखिरी घटना है वो इस साल की कि मेरा यह बाया पैर खराब हो जाता है। और बाया पैर घुटना हमारा खराब हो जाता है। घुटने में हमारी सूजन है। हड्डियां हमारी निकली हुई है। पूरे पैर हमारे कटे हुए
(11:15) हैं। हम बैठ नहीं सकते हैं पूजन में। पूरी हमारी स्किन गल गई थी। कोई बात नहीं। मुझे दो पहलवान उठा के हमें लेकर आए और महादेव के पास लाकर मैं मुझे खड़ा कर दिया। मैं बैठने वाला था। तब तक मैंने पीछे मुड़ के देखा तो मैं देखा कि मेरे पीछे एक लगभग 6 फीट 4 इंच का एक साधु खड़ा है। अच्छा। और उनके हाथ में उनसे लगभग 1 1/2 फीट ऊंचा त्रिशूल है। 1 1/2 फीट ऊंचा त्रिशूल है। फोटो भी होगा। लाइव लाइव चल रहा था। 8 फीट का त्रिशूल। 8 फीट का त्रिशूल था। कोई बात नहीं। मैं मुड़ नहीं सकता था। मेरा यह दाया अंग खराब रहता है महादेव को बहुत जल चढ़ाने के
(11:57) कारण। तो मुझे किसी तरह लोगों ने घुमाया। उसके बाद क्या हुआ कि मैं जब पीछे मुड़ के उस महापुरुष को देखा तो वो मुझे देख के बच्चे जैसे रो पड़े। तो बच्चे जैसे जब रोने लगे तो मुझे बहुत खराब लगा। तो क्योंकि मैं तो सावन में बहुत कमजोर हो जाता हूं। तो मुझे देख के कोई रोए तो मुझे बहुत खराब लगता है कि भैया यह मुझे और कमजोर कर रहा है। तो मैंने उनको इशारा किया। मैं तो मौन रहता हूं। बोल नहीं सकता हूं। मैंने इशारा किया। हमने कहा आप रो क्यों रहे हो? तो बोले तुम मर जाओगे। तुम मर जाओगे। हमने कहा आप मुझे देख के ना रो। अगर आप मुझे
(12:35) देख के इस प्रकार रोगे तो मैं तो टूट जाऊंगा। मुझे तो आप आनंद के लिए आनंदित करो। आप रोओ मत। इतने में मेरा ध्यान गया उनके शरीर के ऊपर तो मैं उनके पैर से ऊपर तक देखा तो पूरे ऊपर से नीचे से ऊपर तक वो पसीने से भीगे हुए थे। तो मैंने इशारा करके ऐसे पूछा हमने कहा ऐसे इतना आपको पसीना कैसे आया? बड़ी बात ये थी कि मैं जो अंदर सोच रहा था वो वो वो सुन रहे थे। उसका जवाब दे रहे थे। उन्होंने कहा मैं जोशीमठ से चल के आ रहा हूं। कहां से चल के आ रहा हूं? से। यहां से 200 कि.मी.
(13:10) है जोशीमठ। 230, 240, 250 कि.मी. है जोशीमठ। मैंने कहा जोशीमठ से पैदल आ रहे हैं। बोले हां मैंने आपने कुछ खाया? बोले नहीं हमने कुछ खाएंगे आप? बोले हां रोटी खाऊंगा। मैंने कितनी रोटी खाएंगे? उन्होंने इशारा किया चार। हमने एक बार लेते हैं दो बार। बोले नहीं एक बार लेते हैं। हमने चार रोटी लेंगे। हां। हमने और तो उन्होंने ऐसे इशारा किया गया का दूध। कोई बात नहीं। चीनी। हमने उनको चार रोटी, चीनी और दूध मंगवा करके दिया। मैं ऐसे खड़ा था रेलिंग पकड़ करके। कोई बात नहीं। मैंने कहा पूजन में आधे घंटे लेट हो जाएंगे। पहले इनकी सेवा कर लें। उन्होंने खाया खाने के बाद वो एक छोटी सी
(13:51) चबूतरा है। उस चबूतरे पे वो बैठ गए। ऐसी फर्श है आरसीसी की। उस पर बैठ गए। वो मेरे मन में आया कि मैं पूजन में जा रहा हूं तो मैं पुष्प पहले इनके ऊपर कुछ अर्पित कर दूं। इनके सिर पर पुष्प कुछ पुष्प डाल दूं। फिर मैं पूजन में जाऊं। मैंने उनके सिर पर पुष्प डाला। तो बोले घुटने में क्या हुआ? चल क्यों नहीं पा रहे हो? मैंने कहा मेरा पैर बाया खराब हो गया है। तो बोले अभी पूजन कितनी देर की बाकी है? हमने कहा पूजन अभी लगभग 7 घंटे की है। तो कैसे बैठोगे? पता नहीं। तो बोले अच्छा जाओ आसन लग जाएगा। क्या बोला उन्होंने? जाओ आसन। जाओ आसन लग जाएगा। और मैं रात को 1:50 पे
(14:33) बैठा और सुबह लगभग 10:0 पे उठा। 26 घंटे पूजन चला उस दिन महादेव की। 1010 पे 10 20 पे मैं उठा। 1020 पे आरती हुई। माई का दर्शन किया। 10 20 पे मैं कमरे में गया। मुझे लगता है एक घंटे हमारी थेरेपी हुई होगी। एक घंटे हम गर्म पानी से हमें बच्चों ने नहवाया होगा। हमारे गले हुए स्किन निकाले होंगे। हम 11 बज 5 मिनट 11:06 पे फिर वापस पूजन में आ गए। और फिर 23 घंटे पूजन चला। फिर पूजन चला 23 घंटे डेढ़ दिन वह महापुरुष आश्रम में रहे। डेढ़ दिन रहे दूसरे दिन चले गए। तो इस कलिकाल में भी संभव है। इस कलिकाल में भी लेकिन तब संभव है। जैसे
(15:18) इस बार आनंद जी और आनंद जी की धर्मपत्नी इनकी बिटियां तो नहीं थी। आप दोनों हवन में उस दिन हवन का टेंपरेचर 103 डिग्री था। 100 103 के ऊपर 103 के ऊपर था। पांच कितना डिग्री तापमान था? 103 से ऊपर। तीन से ऊपर। खैर ये तो पहली बार बैठे और सेठ हैं। बड़े लोग हैं, पैसे वाले हैं। कभी बैठे नहीं इतनी गर्मी में तो यह भी संकट है। तो ये अपने ऊपर पानी के पानी पानी के ऊपर पानी डाल रहे थे बोतल से कि हमें थोड़ी शांति मिले। दूसरे दिन तीसरे दिन चौथे दिन पांचव दिन सात दिन का हवन था। पांचव दिन या छठे दिन 108 डिग्री टेंपरेचर था लास्ट दिन लास्ट दिन तो यह हमारी जो
(16:00) तीसरी अंगुली है ये उंगली जल के इसकी हड्डी गल करके हड्डी मुड़ गई मुझे पता नहीं चला हम मुंबई से अवंतिका बिरला मेरी बेटी है अनुपमा सब हवन में बैठे थे हम और अनुपमा का मस्तक पूरा जल करके इसमें बड़े-बड़े फले पड़ गए इतना गर्मी था इतना गर्म था बजनाथ धाम उनके मुख्य पंडा वहां के प्रशासक हमारे रमेश रमेश परिहस्त जी मेरे शिष्य हैं। उनका ये बाया हाथ पूरे फूड़े फोले हो गए। लगभग डेढ़ महीने बाद ठीक हुआ है। तो मेरा कहने का तात्पर्य कि समय में भी साधना चरम सीमा की संभव है। लेकिन तब जब महादेव और माई चाहे।
(16:45) उनके बिना कैसे संभव? महादेव और माई चाहे। तो इसलिए जो व्यक्ति मेरे पास आता है दुख को लेकर के मैं उसको भगवती का बीज मंत्र देता हूं। आप इसको जपना। अब मुझे लगता है 10,000 लोगों ने अभी तक मेरी माई का दर्शन अपने स्वप्न में किया है। 10,000 लोगों ने और महालक्ष्मी का बीज मंत्र देता हूं। कि भैया इस महामंत्र बीज मंत्र का जप करना। तुम्हारे इच्छा के अनुसार तुम्हारे गुजारा के लिए भगवती तुम्हारे ऊपर कृपा कर देंगे। पर ये अपने हाथ से ही देते हैं कि स्क्रीन पर भी अपने अपने हाथ से देते हैं। कान में देते हैं। कान में देते हैं। ठीक है?
(17:21) तो अब ये लोग देख रहे हैं। उन्हें पता है कि जब उन्हें बीज मंत्र लेना हो तो उन्हें आपको कहां मिलने आना होगा? हम बीज मंत्र कान में देते हैं क्योंकि वो तो गुरु का बीज मंत्र है। क्योंकि हम उस बीज मंत्र को करोड़ों जपते हैं और करोड़ों जपने के बाद शिष्य और गुरु का संबंध पिता और पुत्र का है। बाप और बेटी का है। बाप और साधना काल में बाप और बेटी का है। पिता और पुत्र का है। तो उस कारण हम जिनको दीक्षा देते हैं अपना बीज मंत्र देते हैं। हम कभी किसी बाजार का किसी पुस्तक का कोई बीज मंत्र नहीं देते। उस कारण उनका मन ध्यान में लगता है और
(17:54) उनको माई मिलती है। माई उन पर कृपा करती हैं और साधना में स्वप्न में उनको मेरी माई दर्शन दे देती है। तो बहुत ही खूबसूरत बात है। तो मुझे बताइए कि आप एस्ट्रोलॉजी में बिलीव करते हैं? मैं ही नहीं क्योंकि हर परमात्मा का अ फलादेश ज्योतिष के माध्यम से हुआ है। राम जब जन्म लेते हैं तो राम का फलादेश हो गया। कृष्ण जब जन्म लेते हैं तो कृष्ण का फलादेश हो गया। परीक्षित जब जन्म लेते हैं तो परीक्षित का फलादेश हो गया। इवन गुरु नानक देव जी का भी फलादेश। हां ये तो अभी की बात है। मैं तो ये तो 5 साल 500 साल 500 साल पुराने की बात है।
(18:32) मैं तो 5 लाख वर्ष पुराने की बात कर रहा हूं। मैं तो 5 लाख वर्ष पुराने की बात कर रहा हूं। मैं तो कृष्ण काल की बात कर रहा हूं। 5000 वर्ष मैं राम की बात कर रहा हूं। लगभग करीबन 23 लाख वर्ष। 23 लाख वर्ष। तो भगवान राम का जब जन्म होता है तो उस समय भगवान राम का जन्म के लिए यज्ञ होते हैं। यज्ञ होते हैं। यज्ञ के लिए कहा जाता है योग लगन ग्रह व योग लगन ग्रहवार तिथि सकल भय अनुकूल चर अरु अचर हरस जुत राम जन्म सुख मूल योग
(19:16) लगन ग्रह वार और तिथि पांच जब अनुकूल होंगे तब राम तब राम का जन्म होगा तब राम का राम का जन्म अब राम कौन सी तिथि में जन्म ले रहे हैं? नवमी तिथि मध मास पुनीता शुक्ल पक्ष अभिजित हरि प्रीता मध्य दिवस अति शीतल घामा पावन काल लोक विश्रामा भगवान राम तिथि नवमी में जन्म लेते हैं। ज्योतिष के माध्यम से राम नवमी मनाते हैं। राम नवमी मनाते हैं। ज्योतिष के अनुसार नवमी तिथि को रिक्त कहा जाता है। नवमी तिथि में कोई शुभ कार्य नहीं होता। तीन तिथियां हैं। चौथ,
(20:02) चतुर्दशी और नवमी। ये तीन तिथि है। चौथ, चतुर्दशी और नवमी रिक्ता। ये तीन तिथि रिक्त माने गए। लेकिन भगवान राम नवमी में ही जन्म ले रहे हैं। और मध्यकाल में ले रहे हैं। पूरे 12:00 बजे। क्योंकि 12:00 बजे ना पूजन का समय है और ना संध्या का समय है, ना गायत्री जप का समय है, ना पाठ का समय है। 12:00 बजे भोजन और विश्राम का समय है। बिल्कुल। 12:00 बजे भोजन और विश्राम अभिजीत मुहूर्त लेकिन भगवान राम ने पूरे 12:00 बजे जन्म लेकर के अभिजीत मुहूर्त को सिद्ध करके दिया कि जो अभिजीत मुहूर्त में कार्य करेगा वो सिद्ध होगा सिद्धि को प्राप्त करेगा और 12:00 बजे कोई
(20:40) तिथि समय दिन अशुद्ध नहीं है अपवित्र नहीं है हम इसको पवित्र करेंगे तो इसलिए जो ज्योतिष है ज्योतिष किससे आधारित है सूर्य से और चंद्रमा से सूर्य से और चंद्रमा से तो सूर्यांश और चंद्रांश सूर्याश और चंद्रांश वेद कहता है आकृष्णन रजसामान निवेशय मृतमत च हिरण्य सविताना देवो जाति भना निपसन सूर्य किसके देवता है ज्ञान के सूर्य किसके देवता हैं ज्ञान के चंद्रमा किसके देवता हैं मन के चंद्रमा मन के वेद कहता है चंद्रमा मनसो जातो सूरजो अास श्रोत्रा वायुस प्राणस मुखाद
(21:27) यग्न रजायत जो चंद्रमा की उपासना करेगा उसका मन शांत रहेगा उसका मन शांत रहेगा तो ज्योतिष चंद्रमा और सूर्य से आधारित है ज्योतिष किसी व्यक्ति से तो आधारित है नहीं और तीन ज्योतिष है विकृति ज्योतिष कृति ज्योतिष और रमल ज्योतिष तीन ज्योतिष है तो आज से पांडव काल समय में भी जो रमल ज्योतिष था उसके आचार्य मामा शकुनी थे हम आचार्य मामा शकुन शकुनी थे मामा शकुनी अगर चाहते तो दुर्योधन का विनाश नहीं होता बिल्कुल लेकिन मामा शकुनी चाहता था कि दुर्योधन का विनाश हो दुर्योधन का विनाश हो इस कारण ज्योतिष का सही फलादेश करके गलत अर्थ बताता था
(22:11) ज्योतिष जब रमल डाला जाता है तो उसका अर्थ तो सही होगा लेकिन उसका अर्थ गलत बताया गलत बताया जाता था टाइम गलत बताया जाता था उसमें निकलता था 11 बज 52 पर दुर्योधन यदि तुम वार करोगे तो तुम्हारा विजय होगा। तो वो 11:56 का टाइम बताता था कि 11:56 पर दुर्योधन तुम वार करोगे तो तुम्हारा विजय होगा। दुर्योधन दुर्योधन की हार होती थी। दुर्योधन इस शब्द को गीता में कह रहा है कि दादा भीष्म आप सब मेरे साथ हैं। कि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र समवेता्स मामका पांडवासव किम कुरत संजय विणाम द्रुपद पुत्रण तवषण धीमता अत्रसुरा महवासा भीमा अर्जुन समायुधि युध विराटस द्रुपदस
(23:01) महारथ दृष्टकेतु काशीराजस वीर्यवान पुरजित कुंत भोजस सेस नरपंग योधा मनुस विक्रांत उत्तमोस्तास वीर्यवान भगवान कृष्ण इस जगह पर कहते हैं इसमें जितने सारे वीर योद्धा हैं महत्वपूर्ण योद्धा हैं वो सब दुर्योधन के साथ सब दुर्योधन दुर्योधन के साथ फिर भी दुर्योधन का हार हो रहा है। तो दादा भीष्म के सामने दुर्योधन ने कहा कि दादा जी आप खाते हैं कौरवों का और लगता है पक्ष लेते हैं पांडवों का पक्ष लेते हैं पांडवों का वरना मेरा हार नहीं होता। मेरे लोग मारे नहीं जाते। तो इसका सीधा अर्थ आ रहा है कि मामा सपनी नहीं चाहते थे कि दुर्योधन का विजय हो।
(23:45) दुर्योधन का पराजय हो। दुर्योधन का तो इसलिए ज्योतिष तो अनादि काल से बस ज्योतिष का फलादेश जो है वह साधना से संबंधित है। साधना से संबंधित है। गणित कितना भी कोई कर ले ईश्वर के बिना संभव नहीं है। तो गणित कोई भी कितना कर ले लेकिन यदि वो साधना नहीं करता है। साधक नहीं है। ईश्वर की कृपा उस पर नहीं है। उनके आराध्य की कृपा उसप नहीं है। उनके इष्ट की कृपा उनप नहीं है। तो उस की वाणी कभी फलित नहीं होगी। बिल्कुल ठीक बात है। तो आपने सूर्य और चंद्रमा से जुड़े हुए ज्योतिष में आपने शनि का रत्न आपने नीलम धारण किया और बहुत ही खूबसूरत
(24:23) शनि हमारे स्वग्रही है। शनि हमारे स्वग्रही है और शनि के कारण हम साधु बने। जी अगर शनि वैराग दिया हां शनि अगर हमारे स्वग्रही नहीं होते शनि हमारे उच्च के नहीं होते। शनि हमारे मित्र नहीं होते तो हम गृहस्थ होते तो हम गस्थ होते हम किसी न किसी भी सर्विस में होते। लेकिन शनि उच्च होने के कारण शनि हमारे स्वग्रही होने के कारण शनि हमारे मित्र होने के कारण हम परम वैरागी हुए और वैराग धारण किया और महादेव से जुड़े क्योंकि भगवान शिव से शनि का बहुत प्रेम है। प्रेम है भगवान शिव से शनि का बहुत प्रेम है और शिव से मेरा बहुत प्रेम है। शिव से हमारा बहुत
(24:58) प्रेम है। तो उस कारण शनि से मेरा बहुत प्रेम है। तो आप अपनी कुंडली खुद ही देख लेते हैं या और देख लेते हैं। देख लेते हैं। हम रमल ज्योतिष के आचार्य हैं। हम फलादेश नहीं करते। हमने रमल को बहुत अच्छे तरीके से पढ़ा है, लगाया है, धारण किया है और हमारे पास रमल के सभी पास आए हैं। हम हम बिल्कुल उसका फलादेश करते हैं। माई के लिए, माई की पूजन के लिए और माई की प्रसन्नता के लिए। और अभी मैं आपसे जब मिलने आई तो मैंने आपके हाथ में एक खूबसूरत कमंडल देखा। तो मुझे बताइए कि ये कैसे आया आपके पास? आइए ये कमंडल है। इसको हम अपनी साधु साई भाषा
(25:38) में चिप्पी कहते हैं। चिप्पी कहते हैं। ये इसका अर्थ ये भी है कि इसका जब हम निरूपण निरूपण का अर्थ इसका जब हम प्रतिष्ठा करते हैं इसको बनवा के इसकी प्रतिष्ठा करते हैं तो ये नारियल है। ये साउथ अफ्रीका का नारियल है। ये साउथ अफ्रीका का नारियल है। और नारियल भगवती को अत्यंत प्रिय है। भगवती को अत्यंत प्रिय है। तो उस कारण इस नारियल को हम संस्कृत में अक्षय पात्र भी कहते हैं। अक्षय पात्र भी कहते हैं। तो इसमें से हम यदि कोई भी वस्तु रख के भगवती को अर्पित करते हैं तो उसका कभी क्षय नहीं होता। उसका कभी क्षय नहीं होता। वो अक्षय
(26:17) रहता है। तो उस कारण ये अक्षय पात्र है। दूसरी क्योंकि नारियल है। ये कभी अशुद्ध नहीं होता और इसका और कोई सेवन करता नहीं। ये तो केवल भगवान के लिए है। महादेव इससे जलपान करते हैं। माई जलपान करती है। गंगा जी जलपान करते हैं। गणेश जी करते हैं। भगवान नारायण करते हैं। नारायण करते हैं। क्योंकि जितने नाम मैंने लिए सबको नारियल प्रिय है। सबको नारियल का जल प्रिय है। तो जो भगवती है महालक्ष्मी है या 10 महाविद्या है। दसों महाविद्याओं को नारियल अत्यंत प्रिय है। हम तो उस कारण ये चिपी है और ये कमंडल है। तो इससे क्या है कि भगवान का जब हम इससे अलग-अलग चीजों से
(26:58) अभिषेक करते हैं। कभी हमने इसमें नारियल तेल रख दिया। कभी इसमें हमने गन्ने का रस रख दिया। कभी हमने इसमें घी रख दिया। कभी हमने इसमें शहद रख दिया। कभी हमने इसमें गुलाब जल रख दिया। कभी इसमें हमने मिश्रित जल रख दिया। और उससे हम महादेव को स्नान कराते हैं। महादेव का हम अभिषेक करते हैं। उस समय महादेव अत्यंत प्रसन्नता से इस जल को स्वीकार करते हैं। तो एक आम आदमी जो आप जैसी साधना ना कर सकता हो तो वो भी अगर महादेव के ऊपर यानी कि शिवलिंग के ऊपर नारियल का जल चढ़ाए या फिर भगवती मां का अभिषेक करे तो आपको लगता है उसकी परेशानियां भी
(27:31) बिल्कुल अगर महादेव और मां काली को या भगवती को केवल नारियों नार नारियल जल हम दो प्रकार के जल होते हैं। एक तो हरे नारियल के और एक सूखे नारियल। सूखे नारियल। तो कोई भी जल यदि हम एकत्रित करके और महादेव का ओम नमः शिवाय महादेव का ओम नमः शिवाय भगवती का बीज मंत्र या महालक्ष्मी का श्रीम श्री महालक्ष्मी नमः छोटे से मंत्र हैं। अगर इसके द्वारा हम भगवती का स्नान कराते हैं। कर भगवती को हम स्नान कराते हैं। भगवती को हम इस जल से अभिषेक करते हैं। भगवती का तो निसंदेह भगवती प्रसन्न भी होंगी। महादेव प्रसन्न भी होंगे और जो दैहिक, दैविक, भौतिक धर्म, अर्थ, काम और
(28:12) मोक्ष इन चारों चीजों की आवश्यकता जिसको होगी वो प्राप्त भी हो जाएगा। और मुझे बताइए आपने ये माथे पे बहुत ही खूबसूरत चंदन लगाया है। इसमें थोड़ा सा केसर भी मिला है शायद और थोड़ी सी हल्दी भी लग रही है। तो ये चार ही क्यों? ये खूबसूरत नहीं है क्योंकि ये जो है ये त्रिपुंड है और त्रिपुंड तो तीन है ना? एक दो तीन धारी है रेखाचार है ऊपर तो उसमें क्या है कि इसमें केसर है कस्तूरी है अंबर है और मलियागरी चंदन है गुलाब जल है गंगाजल है ये सात चीज मिले होते सात चीज मिले होते हैं सातों के द्वारा हम चंदन को पा पत्थर पर घिसवाते हैं और अभिषेक में
(28:57) और फिर महादेव को और भगवती को अभिषेक में लगाते हैं। फिर उनके बचे हुए चंदन हम रख के हम अपना नित्य लगाते हैं। ये तो नित्य की सेवा है। और जो आप ये हाथ पर लगाते हैं ये ऐसे जैसे प्रभु ने हाथ पकड़ा हो आपका ये आपको ये हमारे शरीर में जो है नौ अंग है शरीर में नौ द्वार नौ द्वार है तो इन नौ द्वारों को नौ अंगों को हम इन चंदों से चंदनों से अभिमंत्रित करके चंदन लगाते हैं और भगवती के लगाए हुए चंदन है तो ये हमारे शरीर में कवच का काम करता है हम लोग कोई कवच तो पहनते नहीं कवच तो पहनते नहीं तो हमारा कवच ही यही है तो हम इस कवच से संरक्षित होते हैं और
(29:34) निश्चिंत भाव से भारतीय परंपरा के प्रचार के लिए पूरे देश और दुनिया में भ्रमण करते हैं। और मैंने देखा आपके पास आने से पहले कि सब तरीके के नेता, अभिनेता, मंत्री बाकी इससे ज्यादा नाम लेना तो ठीक नहीं होगा। बट सब तरीके के लोग आपके पास आते हैं। तो वो लोग जिसको दुनिया जिसके जैसा बनना चाहती है और जब वो आपके पास आते हैं निश्चय ही परेशानी होती होगी, तकलीफ होती होगी। अपनी बात दिल की आपसे करते होंगे तो आपको ऐसा लगता होगा कि पैसे का रोल क्या है लाइफ में? अगर यह इंसान भी दुखी है या अगर यश का रोल क्या है जिंदगी में? अगर यह
(30:12) आदमी भी दुखी है या पावर का रोल क्या है? अगर यह आदमी भी दुखी है तो यह एहसास आपको होना शुरू हो गया था कि यह सारी चीजें लंबी चलती नहीं है। देखो मुझे लगता है पावर का या उनके पैसे का ठीक है मुझे जहां तक मेरा एक मानना है कि हर व्यक्ति को आत्मीय सुख चाहिए हर व्यक्ति को आत्मीय सुख चाहिए और वो पैसे से और पावर से प्राप्त होने वाला नहीं है। वो पैसे से और पावर से प्राप्त होने वाला नहीं है। वो प्रकृति से प्राप्त होने वाला है। वो शांति कहां से मिलने वाली है? मन से। प्रकृति से। मन से। मन जब परमात्मा से से जुड़ता है,
(30:56) जुड़ता है और वो उसके लिए मठ, सिद्ध पीठ, साधक और तपस्वीयों से अच्छा कोई स्थान नहीं हो सकता। बिल्कुल। ठीक। तो आज सबको इस बात का एहसास होता है कि भगवान शिव का हो, भगवती का हो, गंगा मैया का हो, गणेश जी का हो या भगवान नारायण का हो। चारों कठोर साधना में महादेव और भगवती के तो सर्वोपरि तो उस परम कठोर तपस्या में मेरा वो नाम रखते हैं। तो उस कारण मुझे लगता है कि वो यहां आकर के और उनको कुछ पल के लिए बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो यहां घंटों प्रतीक्षा करते हैं। मेरे [गला साफ़ करने की आवाज़] मिलने की घंटों प्रतीक्षा करते हैं। बड़े लोग होते
(31:39) हैं। खूब पैसे वाले होते हैं। खूब बड़े पद पे होते हैं। खूब बड़े अधिकार होता है। बड़े पावर होता है उनके पास। फिर भी उनको यहां आनंद मिलता है। फिर भी उनको यहां आनंद मिलता है। मुझे लगता है उस वो आनंद का एकमात्र कारण तप है। हम आनंद का एकमात्र कारण तपस्या है। आनंद का एकमात्र कारण भगवती है मेरी मेरी माई है। तो इसलिए इस जगह पर क्योंकि बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनके पावर पद रहते पावर नहीं है। हम पद रहते हुए अधिकार नहीं है। पद रहते हुए काम नहीं कर सकते हैं। पर आपने तो अपने पीछे दो अशोका स्तंभ लगाए हुए हैं। सत्यमेव जयते के साथ। इतनी पावर
(32:17) आपने अपनी चेयर पे इकट्ठी कर ली। मुझे नहीं पता आपने बनवाई कि ये गलती से बनकर आ गई या किसी ने भेंट की बट इट्स अ कंप्लीट पावर सिंबल और मुझे पता चला कि आप यहां पे सबसे मिलते हैं जहां पर हम बैठे हैं। नहीं बन के नहीं आ गई। हमारे यहां कोई चीज अपने आप तो आती नहीं। नहीं खुद बनवाई। नहीं ऐसा भी होता है ना कि कई बार कोई बहुत प्रेम करता है तो वो भेंट दे जाता है। हां लेकिन उनको बताना पड़ता है। कि क्या चाहिए? क्या चाहिए? तो यह बस यही अब इसी बात पर आते हैं क्योंकि खुला शेर का मुंह यह पावर नहीं यह सच बोलने की क्षमता भी है कि भ
(32:48) तुमको अच्छा लगे बुरा लगे मैंने तो बोल दिया अब तुम्हारी मर्जी है फिर आपके सिर के पीछे आपके गुरु भी हैं बिल्कुल आपके हेड के पीछे जो एक आशीर्वाद मुद्रा में आपको पूरी तरीके से ज्ञान और विचारधारा की क्षमता दे रहे हैं। दो तरफ मोर भी हैं। और यह जो मोर है, यह इस चीज का प्रतीक है कि पूरी तरीके से स्वच्छता और ब्रह्मचर्य जो मोर का प्रतीक है और उसको पूरी तरीके से धारण किया और फिर साइड में दो अशोक स्तंभ है। तो ये ये मैंने ऐसे नहीं देखा। मैं बहुत लोगों से मिलती हूं। हां, इस सिंहासन का कुछ एक विशेष प्रयोजन है। एक विशेष प्रयोजन है और विशेष कारण
(33:26) इसको बनाया गया। विशेष कारण इसको बनाया गया जिससे इस पर हम बैठकर कभी थकेंगे नहीं। और आपसे पहले ये कभी था भी नहीं। यह आपके लिए बना और आप ही के द्वारा बताया गया। कुछ बताएंगे? बिल्कुल अच्छा है क्योंकि देखो आसन जो है एक अष्टावक्र गीता है। आपने पढ़ा होगा कभी अष्टावक्र गीता है। उस अष्टावक्र गीता में महाराज जनक जी का एक संदेह है। जी संदेह क्या है जनक जी का कि भारत के जो सिद्ध लोग हैं, भारत के जो ज्ञानी लोग हैं, भारत के जो प्रबुद्ध महापुरुष हैं, वो साधु भी हो सकते हैं, गृहस्थ भी हो सकते हैं, विद्वान भी हो सकते हैं, ऋषि भी
(34:03) हो सकते हैं, मनीषी भी हो सकते हैं। और साधारण चलने फिरने वाले जो याचक लोग हैं वह भी ज्ञानी हो सकते हैं। बिलकुल तो महाराज जनक के द्वारा तीन सवाल किए गए कि ज्ञान क्या है? मुक्ति क्या है? और वैराग्य क्या है? जो ज्ञान के बारे में सही अर्थ मुझे बता देगा वही मेरा गुरु होगा। वही मेरा गुरु गुरु होगा। जो मुक्ति के बारे में सही अर्थ बता देगा वही मेरा गुरु होगा। जो वैराग्य के बारे में सही अर्थ बता देगा वही मेरा गुरु होगा। बहुत सारे सिद्धों को बुलाया गया महाराज जनक ने अपनी सभा में लेकिन कोई उत्तर सही उनको नहीं मिल पाई। नहीं मिल पाई तो राजा जनक राजा होने के
(34:45) कारण राजा को लगा कि ये तो अज्ञानी नहीं है। अज्ञानी है। हम तो इनको काल कोठरी में डाल दो। तो सबको कालकोठरी में डाल दिया। तो अष्टावक्र जी अपने मां के गर्भ में थे। हम अष्टावक्र अपनी मां के गर्भ में थे और अष्टावक्र के पिता हवन कर रहे हैं। हम तो उस हवन में कोई त्रुटि हो गई होगी। कोई मंत्र की उच्चारण में कोई विधि में समय में कोई अशुद्धियां रह गई होगी। कमी रह गया कमियां रह गई होगी। तो उस जगह अष्टावक्र अपनी मां के गर्भ से बोल पड़े अलम संस्कृत का वाक्य है अलम रुको पिता श्री मामा पितु अलम पिता श्री रुको आप मेरे पिता श्री आप रुको
(35:28) बोले क्यों बोले जिस कार्य को आप कर रहे हो यह कार्य ऐसे नहीं ऐसे है हम पिता को बहुत क्रोध हुआ पिता को लगा ये तो अपनी मां के गर्भ में है हम और मेरी अशुद्धियों को देख रहा है अगर यह बाहर आ गया तो क्या करेगा हम पिता ने श्राप दे दिया। तुमने पिता धर्म का पितृ धर्म का अपमान किया है। जाओ मेरा श्राप है तुम्हें कि तुम आठ जगह से टेढ़े हो जाओ। अष्टावक्र हो जाओ। क्या हो जाओ? अष्टावक्र। अष्टावक्र हो जाओ। टेढ़ा हो गए। हम जन्म अष्टावक्र का हुआ तो आठ जगहों से टेढ़े थे। आठ अंग टेढ़े थे। उस परिस्थिति और उस काल के का समय में कालखंड के समय में उनके पिता को जनक ने
(36:12) बंदी गृह में डाल दिया गया। अष्टावक्र ने अपनी मां से कहा कि मेरे पिता कहां है? मां बोली तुम्हारे पिता वन में साधना करने गए हैं। नहीं मुझे सच बताओ। तो मां बोली कि देखो मैं मां हूं। मुझे मेरा झूठ बोलना सही नहीं है। तुम्हारे पिता को राजा जनक ने बंदी बना लिया। क्यों? तुम्हारे पिता से कुछ सवाल किया था उन्होंने। जिसका सही उत्तर उन्हें नहीं मिल पाया। अष्टावक्र सभा में गए तो अष्टावक्र के सभा में बड़े-बड़े विद्वान बैठे थे। महाराज जनक के सभा में तो ऐसे ही दिव्य सिंहासन पर वो तो स्वर्ण का रहा होगा ये तो कास्ट का है स्वर्ण का रहा होगा
(36:48) दिव्य सिंहासन पर महाराज अष्टावक्र को महाराज जनक ने बिठाया अष्टावक्र को देखकर के सभी लोग हंस पड़े सभी लोग हंस पड़े तो महाराज जनक से अष्टावक्र ने कहा महाराज जनक तुमने इन चर्मकारों की सभा कहां से इकट्ठा कर लिया है हम तो बड़े-बड़े महात्मा बड़े-बड़े ऋष ऋषि बड़े-बड़े तपस्वी सब लोग थे। सब ने कहा आप मुझे चर्मकार कैसे कह सकते हो? बोले आपको केवल चमड़े का ज्ञान है। केवल चमड़े चमड़े का ज्ञान है। बोले चमड़े का ज्ञान कैसे है? मैं तो वेद का, अध्याय का, दर्शन का, प्रस्थान अत्राई का, ब्रह्मसूत्र का, गीता का, भागवत का, रामायण का, इतिहास का,
(37:27) वेदांत का विद्वान हूं। बोले फिर भी तुम्हें केवल चमड़े का ज्ञान है। महाराज जनक ने कहा कि महाराज ये तो आपने सही नहीं किया। हम यह तो बड़े-बड़े महात्मा है। तो अष्टावक्र ने कहा कि महाराज मैंने बिल्कुल सही कहा। मैंने जो कहा है बिल्कुल सही है। ये सब चर्मकार है। इनको केवल चमड़े का ज्ञान है। बोले मुझे उसका सही अर्थ बताओ आप। बोले महाराज मेरी हड्डियां मांसपेशियां और मेरा मांस मेरे मेरी चमड़ी टेढ़ी है। मेरा ज्ञान टेढ़ा नहीं है। मेरा ज्ञान टेढ़ा नहीं है। गन्ने गन्ना कितना भी टेढ़ा होता है महाराज लेकिन जब उसे कोलू में डालते हैं
(38:07) तो उसका रस सीधा निकलता है। गंगा गंगोत्री से निकल कर के गंगा सागर में आकर के समाई महाराज। गंगा 2552 कि.मी. यात्रा तय की और गंगा सागर में जाकर के समाने के लिए गंगा पर्वत की अलग-अलग श्रृंखलाओं को चीरती हुई टेढ़ी-मेढ़ी रास्तों को तय करती हुई और गंगा सागर में जाकर के समाई। लेकिन गंगाजल सीधा है महाराज। गंगाजल टेढ़ा नहीं है। महाराज मेरी हड्डियां, मांसपेशियां और मेरा मेरी चमड़ी टेढ़ी है महाराज। जनक को लगा बात तो सही है। बात तो बिल्कुल सही कह रहा है। महाराज जनक को लगा कि हमारे प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है। हमारे प्रश्नों का
(38:48) उत्तर इस छोटे से बालक से मिल सकता है। महाराज जनक ने पूछा महाराज मुझसे क्षमा करिएगा। कोई अपराध हो गया हो तो लेकिन हमारे तीन सवाल है। क्या है महाराज? बोले कथम ज्ञानमपनोति अष्टावक्र का पहला अष्टावक्र गीता का पहला श्लोक कथम ज्ञानमपनोति मुक्ति भविष्यति वैराग्यम च कथ प्राप्त मैं तही मम प्रभु हे प्रभु राजा जनक एक छोटे से आठ वर्ष के बच्चे को प्रभु कह रहे हैं क्या कह रहे हैं प्रभु प्रभु मम प्रभु हे मेरे प्रभु मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर मुझे चाहिए आपसे और मुझे विश्वास हो गया है कि आपसे से संभव है।
(39:31) आप इन तीन प्रश्नों का उत्तर मुझे प्रदान कर सकते हैं। मुझे दे सकते हैं। राजा जनक की अच्छी बात को राष्ट्रहित, धर्म हित, परंपरा हित और नीति हित बात को सुनकर के स्वजन हित, स्वजन हित और स्वहित प्रसंग को सुनकर के प्रश्न को सुनकर के अष्टावक्र जी को बड़ा आनंद आया। अष्टावक्र ने कहा मुक्ति मिच्छ चेतात। दूसरा श्लोक कि मुक्ति मिच्छ चेतात विषयान विषतज क्षमज दया तो सम सत्यम पियूष भज हे राजन यदि मुक्ति चाहते हो मुक्ति चाहते हो तो विषय को विष के समान
(40:20) त्याग दो हम विष को विषय को विष के समान त्याग दो विषय को विष के समान समझ करके त्याग दो। अब आप इतने भावुक ना हो जाओ फिर तो आप प्रश्न भूल जाओगे। फिर क्या मैं नहीं भूलूंगी? हां आप प्रश्न भूल जाओगी। अगर भावुक हो गई इसको रुमाल दो एक। नहीं नहीं मैं ठीक हूं। अच्छा तुम ये मेरा स्वर ले लो। नहीं मैं ठीक हूं। अच्छा तो मुक्ति मिच्छ देखो यही सवाल है। राजा जनक ऐसा समझ लो कि हमने कहा ना आपको इस कलयुग में कुछ भी संभव है। कलयुग में परमात्मा बहुत करीब है। हम अंदर ही है। अंदर ही है। बस यहां से और यहां से उसको भजने की इच्छा है। आवश्यकता है।
(41:01) बिल्कुल ठीक। ठीक है। जो यहां से भजता है उसको कभी वो मिलता नहीं। जो यहां से बचता है उसके करीब रहता है। वो उसके करीब रहता है। तो अष्टावक्र ने कहा कि मुक्ति मिच्छ चेतात विषयान विषवतज क्षमार जबदयात तोसम सत्यम पीयूष हे राजन आपके लिए संभव नहीं है। आपके लिए संभव नहीं है कि आप मुक्ति पा सको। बोले क्यों? बोले राजा हो आप। हम तो राजा को हर विषय विष के समान लगता ही नहीं क्योंकि वह तो विषयसक्त होता है। राजा तो विषय आसक्त होता है। उसको विषय वासना उसको काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्कर, दंभ, अहंकार
(41:44) हर समय रहता है। और रखना पड़ता है राजा को। आपके लिए संभव नहीं है महाराज। तो राजा को जनक राजा जनक को जब अष्टावक्र ने कहा मुक्ति मिक्षस चेताम सचेत हो जाओ। क्या हो जाओ? सचेत हो जाओ मुक्तिस चेता विषया विषजा और क्षमार्जव क्षमाशील बनो राजा के लिए संभव नहीं है राजा के लिए संभव नहीं है क्षमार्जव आरजव संस्कृत का शब्द है दया राजा दयावान भी नहीं होता राजा कठोर होता है निर्दयी होता है हम राजा के अपने निर्णय होते हैं उनके अपने रूल अपने नियम होते हैं तो क्षमार जव दया तोसम और संतोषी भी राजा नहीं नहीं उसको तो हर दिन दूसरा राज्य चाहिए
(42:29) आज इस राज्य को चाहिए कल उस राज्य को चाहिए कल उसका अपना कोई होता नहीं कोई राजा उसके अपने नहीं होते हैं तो क्षमार जब दया तोषम और सत्यम पीयूष भज राजा सत्यवादी नहीं होता उसको साम दंड भेद चारों चीजों को अपनाना पड़ता है तो राजा सत्यवादी भी नहीं हो सकता है तो सत्यम पीयूष भज यहां महाराज अष्टावक्र कह रहे हैं कि इन चारों चीजों को स्वीकार कर लो तुम्हें ज्ञान मुक्ति और वैराग्य तीनों प्राप्त हो जाएंगे। राजा को लगा कि मेरा गुरु के योग्य तो यह है। मुझे इससे गुरुता स्वीकार कर लेनी चाहिए। हम महाराज जनक ने अष्टावक्र को गुरु वरण किया
(43:10) और राजा जनक सामने बैठ गए। महाराज जनक ने अपने दिव्य सिंहासन पर जहां सिंहासन की बात आई तो इसलिए सिंहासन का महत्व है। यह सिंहासन अभिमंत्रित है। ये सिंहासन अभिमंत्रित है। मैं इस पे 10 घंटे बैठूं, 15 घंटे बैठूं, 20 घंटे बैठूं, 24 घंटे बैठूं, हम कभी थकेंगे नहीं। मुझे तो लगता है वैसे ही कभी नहीं थकते। आपका आसन भी सिद्ध है। जिस तरह से आप बैठते हैं। आपने आते ही अपने राइट पैर को मोड़ा। आप बहुत सालों से यूं ही बैठ रहे हैं। आप कभी नहीं थकते हैं। आसन हो या आसन ना हो। हां जमीन पे हो कि गंगा तट पर हो पत्थर में हो कि कहां पर हो आप यूं ही बैठते हैं और आप
(43:44) नहीं थकते हैं हां तो यह भी माई की कृपा है यह भी माई की कृपा उनकी कृपा के बिना कैसे संभव है क्योंकि कई जन्मों से साधना चली आ रही है एक जन्म की साधना तो नहीं है पॉसिबल ही नहीं एक जन्म की नहीं है कई जन्मों से चली आ रही है कई जन्मों तक अभी ये साधना चलने वाली है कई जन्मों तक चलने वाली है माई की और महादेव की क्योंकि मां मेरी मां है महादेव मेरे पिता है तो उस कारण हमारी साधना और कठोर साधना इसलिए करते क्योंकि मैं स्वयं करता। मैं किसी यजमान को नहीं रखता। मैं किसी यजमान से साधना नहीं कराता। इस बात से मुझे बताइए हिंदुस्तान में आप
(44:16) देखते ही हैं कि लोग बोलते हैं कि अरे मेरी पूजा है आप करवा दीजिए। अनुष्ठान लीजिए करवा दीजिए। क्या यह संभव है? जिस चीज में आपकी कोई भी एक सेंस ऑर्गन नहीं जुड़ी हुई। आपका मन नहीं जुड़ा, आपकी आंख नहीं जुड़ी, आपके कान नहीं जुड़े। कोई दूसरा इंसान किस विचार में है और आप अनुष्ठान देकर सोच रहे हैं मेरी पूजा हो गई। यह कैसे संभवता पॉसिबल है? शास्त्र कहते हैं कि जब तक आप राजा ना हो या आप रोगी ना हो कि आप इस स्थिति में ही नहीं है कि आप नहीं बैठ सकते पूजा में क्या लोगों को अपनी पूजा के लिए खुद नहीं आना चाहिए बिल्कुल आना चाहिए बिल्कुल सही आपने सवाल
(44:47) किया और इसका उत्तर समाज को प्राप्त करना चाहिए जी क्योंकि राजा रोगी बच्चे और वृद्ध हम चार को छूट है छूट है चार को नहीं बच्चे तो जा ही सकते हैं जब डिज्नीलैंड जा सकते हैं तो पूजा में क्या बच्चे मतलब छोटे छोटे बच्चे 5 वर्ष से नीचे जो बाल्यकाल में हैं उससे ऊपर के जो लोग हैं उनको तो पूजन में रहना ही चाहिए। उन 5 वर्ष से ऊपर के अगर बच्चे पूजन में रहेंगे तभी उनको अच्छे संस्कार की प्राप्ति हो पाएगी। पर शास्त्र जब लिखे तो उन्हें पता नहीं था ना कि एक दिन बच्चे तीन साल का बच्चा Instagram देख के खाना खाएगा। तो अब जब आप बच्चे को 3 घंटा टीवी दिखा
(45:24) सकते हो तो 3 मिनट पूजा में क्यों नहीं बैठा सकते? तो इसलिए माता-पिता और गुरु माता-पिता और गुरु गुरु इन तीनों को बच्चों के लिए प्रेरणा का आश्रय कहा गया है। ये तीनों के तीनों प्रेरणा के स्रोत हैं। और तीनों के द्वारा प्रेरणा मिलती रहनी चाहिए। तो धीरे धीरे धीरे-धीरे हम पूजन में आकर के अपने जीवन को उत्तम बना सकते हैं। और संसार के लोग कितने भी हमारा साथ दें लेकिन यदि भगवान साथ नहीं देते तो निसंदेह सफलता की कुंजी हमारे हाथ में नहीं लगेगी। खूबसूरत शेर है। पूरी धरा भी अगर साथ दे तो क्या बात है। तू अगर जरा भी साथ दे तो क्या बात है। क्यों तो चलने को एक पांव से
(46:07) भी चलता है आदमी मगर दूसरा भी साथ दे तो क्या बात है? तो दूसरा पांव है मतलब लंगड़ा होकर आदमी कितना चल लेगा। गोस्वामी जी लिखते हैं गोस्वामी जी तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं कि पंगु चढ़े गिरिवर गहन जासु कृपा सो दयाल। लंगड़ा हिमालय पर चढ़ सकता है। अगर परमात्मा कृपा करते हैं। और यदि परमात्मा नहीं कृपा करता है तो एवरेस्ट पर चढ़ने वाला भी एवरेस्ट पर नहीं चढ़ सकता है। छोटे पहाड़ पे तक जाएगा। छोटे पहाड़ पे तो पंग चढ़े गिरिवर गहन गिरिवर [गला साफ़ करने की आवाज़] अर्थात जो गिरियों के गिरि मतलब पर्वतों पर्वतों के जो राजा हैं
(46:44) तो उस पर्वत पर भी पंगू लंगड़ा चढ़ सकता है। कब? जब ईश्वर ईश्वर कृपा करते महादेव कृपा करते हैं तो पंग चढ़े गिरिवर जा सु कृपासु दया कहते हैं कि पूत के पांव तो पालने में ही दिख जाते हैं तो आप इतनी छोटी अवस्था से 36 साल से आप महादेव की पूजा कर रहे हैं रुद्रा अभिषेक कर रहे हैं तो किस उम्र से आपको लगा कि आपका यह जीवन साधारण नहीं है मतलब गृहस्थ की तरफ नहीं है एक बड़ा पर्पस है या आपको किस उम्र में इस बात का आभास हुआ मुझे लगता है कि मेरा आज पहली बार ऐसा भाव आया कि तुम्हारे साथ अगर हमारा पडकास्ट हो रहा है और हम रिकॉर्ड कर रहे हैं या इंटरव्यू ले
(47:30) रही हो तुम या कुछ जानना चाहती हो संस्कृति के बारे में तो मुझे अपने बचपन काल से लेकर अब तक बात बतानी चाहिए हम जिससे लोगों को पता लगे कि इस कलयुग में भी क्या चमत्कार होगा चमत्कार हो सकता है और सब कुछ संभव है सब कुछ नियति है संभव है संभव बचपन काल से ही हमें जन्म से पता लग जाता है व्यक्ति के भविष्य का और मेरा जब जन्म हुआ हमारे घर के पड़ोस में हमारे चाचा जी का घर था और चाचा जी के घर के बगल में अग्निकोण में एक वृद्ध माता रहती थी। वृद्ध माता रहती थी। विधवा थी। हमने कभी उसको अ श्रृंगार युक्त नहीं देखा। मेरा जब जन्म
(48:14) हुआ मुझे जब होश हुआ तो हमने उसको वैधव्य अवस्था में देखा लेकिन वह दुनिया के सबसे सुंदर महिला थी। इतना सुंदर महिला हमने आज तक जीवन में नहीं देखा। क्या उम्र रही होगी उनकी तब? उनकी उम्र रही होगी लगभग 78 के आसपास। क्या बात है। 78 के आसपास। मेरी उम्र रही होगी 3 और चार वर्ष। हम पर वो दुनिया की सबसे सुंदर महिला थी। हम देखने में भी स्वभाव में भी ज्ञान में भी गांव के कुछ परिवेश में ऐसा होता है कि गांव के लोग थोड़े ऐसे लोगों से परहेज करते हैं। कि हम नहीं मिलेंगे। मेरे बच्चे इनसे नहीं मिलेंगे। अभाग हो जाएंगे। हां अभाग हो जाएंगे और इन बच्चों पर इनका
(48:57) प्रभाव पड़ जाएगा। तो मेरे पिताजी थोड़े राजनीतिक स्वभाव के थे। तो उस कारण पिताजी का उस महिला से बहुत अच्छा संबंध नहीं बन पाता था। मेरी मां बहुत भक्त थी नारायण की। तो मेरी मां की संधि उस महिला से बनी रहती थी अंदरूनी लेकिन घर में किसी को पता नहीं चलता था। कोई बात नहीं मुझे तो पता नहीं था। मैं तो बहुत छोटा था। एक दिन मेरी मां से वो आकर बोली जो मां मुझे बताई 5 साल की उम्र के बाद जब मां मुझको बताई कि मां से आकर के बोली कि इस बालक को मुझे दे दो। हम इस बालक को मुझे मुझे दे दो। तो मां बोली कि मेरा तो नहीं है यह क्योंकि घर में और भी बड़े-बड़े लोग
(49:37) हैं। दादाजी हैं, इनके, पिताजी हैं। बड़े-बड़े गार्डियन हैं और दादाजी इत्यादि सब बड़े कठोर टाइप के लोग थे। पुराने जमाने के लोग थे। सिद्धांतवादी थे। तो उन्होंने कहा नहीं मैं तो नहीं दे सकती। लेकिन मैं बात जरूर करूंगी। बात की तो मां को डांट पड़ा। पिताजी से, दादी से, दादाजी से, चाचा से, चाची से कहीं ना कहीं माताजी को कुछ सुनने को मिला। माताजी डर गई। माताजी बताती मुझे जब पिताजी गांव के छोटे से राजनीति में भी रहते थे तो जब उनका कहीं जाना हुआ तो वह आकर के मां से मिली। क्या हुआ? तुमने दिया नहीं। मां बोली कि ऐसीऐसी बात है। कोई बात नहीं। आप शांति
(50:22) बनाए रखना। आप कुछ मत कहना। कल पिताजी आए प्रातः काल उनका नियम था 4 सवा5 बजे उठते थे वो और स्नान करके थोड़े से सांकेतिक रूप से पूजा करते थे। बहुत पूजा नहीं करते थे वो सांकेतिक रूप से पूजा करते थे और सामाजिक जीवन में वो गांव के लिए निकल जाते थे। बूढ़ी मां हम उनको बूढ़ी मां कहते थे। पूरी गांव के लोगों ने बूढ़ी मां कहते थे। बूढ़ी मां उनको गेट पे मिल गई। बूढ़ी मां उनको गेट पे गेट पे मिली और बूढ़ी मां ने मेरे पिताजी का हाथ पकड़ा। हम बस मेरे पिताजी का हाथ पकड़ा। पिताजी चले गए। शाम को आए तो पिताजी ने प्रस्ताव रखा कि इस बालक को बूढ़ी मां को दे दो।
(51:01) हम दादाजी ने विरोध कर दिया। हम दादाजी बड़े बड़े पहलवान थे देश के। उन्होंने विरोध कर दिया। उन्होंने कहा नहीं मेरा बालक नहीं जाएगा। कोई बात नहीं। अब जो बात मां को उस बूढ़ी मां से करनी चाहिए थी वो बात पिताजी उस बूढ़ी मां से कर रहे हैं हम कि मेरे पिताजी अर्थात इसके दादाजी तैयार नहीं हो रहे हैं कोई बात नहीं बोले आप शांति बनाए रखिएगा प्रातः काल दादा जी का नियम था ठाकुर जी की सेवा में ठाकुर वाड़ी में बैठते थे वो बहुत सुंदर मंदिर था मेरे घर में ठाकुर जी का बहुत प्रतिष्ठित मंदिर था और स्थापित थे भगवान राधा कृष्ण बहुत धूमधाम से उनकी पूजा होती थी दादा जी
(51:42) नित्य अलग लगभग दो सवा दो ढाई घंटे उनकी सेवा में बैठते थे। हम वो आकर के हम मंदिर में चुपचाप पीछे बैठ गई। हम दादा जी की जब दृष्टि पीछे गई तो उन्होंने बूढ़ी मां को देखा। जब बूढ़ी मां को देखा तो दादा जी ने कहा कि आप यहां कैसे आई? तो बोले मेरा मन हो गया। बोले तुम्हारी प्रवेश नहीं हो सकता है। आप अंदर नहीं आ सकती हो। हम दादा जी ने जो ही ऐसा कुछ कहा उसने कुछ किया जो भी कुछ उसका भाव रहा हो या क्या चमत्कार हुआ वो वो जाने और दादा जी जाने दादा जी उसके चरण स्पर्श करते हैं उसके पैर छूते हैं क्या बात है क्या करते हैं उसके पैर छूते हैं
(52:21) और दादा जी ने अब शाम को यह प्रस्ताव सार्वजनिक रूप से रखा कि इस बालक को बूढ़ी मां को दे दो सबकी सहमति से मैं बूढ़ी मां की गोद में चला गया लगभग मेरी उम्र रही होगी सवा तीन और तीन वर्ष की। मैं 7 वर्ष तक बूढ़ी मां के साथ रहा। मेरी अवस्था जब 7 वर्ष की हुई आठवें वर्ष मुझे काशी आना हुआ। हम और किसी कारणवश मेरा काशी आना हुआ। बूढ़ी मां को यह बात पसंद नहीं आई कि ये कहीं जाए। हम पर मुझे जाना था। उस काल में एक छोटी सी घटना यह हुई थी कि एक दिन बूढ़ी मां क्योंकि छोटी सी फूस की कुटिया में रहती थी। फूस की कुटिया जानती
(53:06) हैं आप? घास की घास की घास की कुटिया में रहती थी। तो वो कुटिया मुझे लगता है अधिकतम 6/6 का होगा। 6/ छह का होगा। और उसमें एक बांस की छोटे से गेट बहुत छोटा सा गेट था। तो मिट्टी का दीवार था। ऊपर बांस था। बांस के ऊपर फूस था। बूढ़ी मां को लघु शंका वाशरूम के लिए बाहर जाना पड़ता था। वो रात को एक दिन बाहर गई और मैं उसके साथ चारपाई पे सो रहा था। चारपाई खटिया नहीं खटिया खटिया पे मुझे डर लगा। मुझे अपनी मां की याद आई। हम लगभग 2 वर्ष बाद जो कि घर से मेरे घर से और बूढ़ी मां का जो बूढ़ी मां की कुटिया थी उस कुटिया की
(53:51) दूरी 10 मीटर होगी। हम कितने मीटर? 10 मीटर। 10 मीटर। हम लेकिन हम कभी अपनी मां के पास नहीं गए। दो वर्ष हम मुझे डर लगा रात को कि मुझे मां के पास जाना है। मैं जोर से ऐसा रोया कि मुझे अपनी मां के पास जाना है। इतनी देर में बूढ़ी मां इस दरवाजे से ना आकर के दीवार से अंदर आ गई। कहां से आई? दीवार से। दीवार से। मिट्टी का दीवार था। उस दीवार से अंदर आ गई। मुझे और डर लगा। मैंने कहा कि आप दीवार से कैसे आ सकती हो? तो उसका पहला शब्द था कि हम तुम्हारे लिए कहीं से भी आ सकते हैं। हम तुम्हारे लिए कहीं से भी कहीं से खैर मुझे डर लगा। मैंने कहा मैं
(54:28) मुझे अपनी मां के पास जाना है। उसने मुझे थप्पड़ मारी। मैं सो गए। विषय भूल गया और सो गया। हम मैं उठा मैं विषय भूल गया। मुझे याद ही नहीं था कुछ भी। मैं बनारस आ गया। काशी में मैं पढ़ने लगा। उसके बाद 99 99 में बूढ़ी मां बीमार होती हैं। मां बूढ़ी मां बीमार होती हैं। मुझे याद किया जाता है घर से एक लोग आते हैं और मुझे बताते हैं कि बूढ़ी मां बीमार है और तुम्हें याद कर रही हैं। लगभग 23 वर्ष के थे। 23 वर्ष के बूढ़ी मां। मैं जाता हूं घर और घर जाकर के मैं एक दिन बूढ़ी मां के साथ रहा। जो भी सेवा बन पात बन सकता था उसको
(55:14) मैंने किया और बूढ़ी मां का शरीर पूरा हो जाता है। कोई बात नहीं मैंने अग्नि संस्कार किया। हमारे यहां जो नियम है 13 दिन के हमने उनके सारे नियम किए। 13 दिन बाद फिर मैं काशी आ गया। काल बीतता गया। काल बीतता गया। मेरा एक जगह मेरे पास हनुमान जी की एक प्रतिमा रहती थी। उस समय एक भगवती की प्रतिमा रहती थी। महादेव रहते थे और मैं पद यात्रा में जहां भी यात्रा का काल हो जब स्कूल विद्यालय गुरुकुल का छुट्टी होता था तो मैं उस दौरान निकलता था। मेरे एक बार हमारे सारे भगवान की चोरी हो गई जबलपुर में मध्य प्रदेश में। क्या धातु के थे?
(55:53) सिल्वर नहीं हनुमान जी तो सोने के हैं। हनुमान जी तो सोने के हैं। किसी ने हमें प्रसाद में दिया था वो तो सोने के हैं और लगभग 500 साल पुराने हैं सोमनाथ जी का दर्शन करके तो रास्ते में कहीं चोरी हो गई। मुझे पता नहीं चला। खैर स्टेशन आया तो मुझे टीटी ने उठाया कि आपके आप टिकट दिखाओ। तो टिकट सहयोग से नहीं था। हम तो क्योंकि पैसे के अभाव के कारण टिकट तो था नहीं। हम तो मैंने उसको बताया कि भैया मेरे पास पैसे नहीं है और टिकट नहीं है। जो भी आपको जैसा लगता है वह आप कर सकते हो। कोई बात नहीं। उसको लगा कि नहीं ये सच इन्होंने बता दिया तो अच्छा था वो और
(56:33) हमें कुछ नहीं बोला। इतनी देर में मैंने देखा कि हमारे तो भगवान है नहीं। हनुमान जी तो चले गए। मैं नीचे स्टेशन पर उतरा तो मेरे पास मेरे पास तो कुछ था नहीं। तो मैं एक ऐसे बेंच पर बैठकर के हनुमान बाू का पाठ कर रहा था। मुंह धुल करके मैंने हनुमान बाबू का पाठ किया तो मेरी आंखें अचानक बंद हुई तो मेरी आंख बंद होने के बाद मेरी बूढ़ी मां पहली बार हमारे आंखों के सामने आई तो मैं रो पड़ा तो मैंने कहा मेरे पास तो हनुमान जी और दुर्गा जी और महादेव नहीं है तो हम पूजन कैसे करेंगे तो हनुमान जी किसी को पता नहीं था कि सोने के हैं क्योंकि उनमें सिंदूर लगाता था मैं
(57:09) सिंदूर लगाता था चांदी की छोटी सी प्रतिमा थी दुर्गा जी की आज भी मेरे पास है तो ध्यान में वो बोले कि आप चिंता ना करो मैं अभी की मूर्ति ले आऊंगी। और पांच मिनट में एक बुजुर्ग सारे भगवान को लेकर के मेरे पास आ गया। हम तो बोला कि अरे ओ महात्मा जी मैं सफेद कपड़ा पहनता था। उसमें ब्रह्मचारी था। नष्टिक ब्रह्मचारी था। ये भगवान आपके तो नहीं है। तो मैंने कहा भगवान तो मेरे हैं। आप आपको कहां मिला? तो बोले वो एक बूढ़ी उधर जा रही थी तो बूढ़ी के हाथ में था। और वह बूढ़ी मुझे बोली कि वह बेंच पर बैठा है उसको देता हुआ जाना और मैं अभी आ रही हूं।
(57:48) दे गई कोई बात नहीं बात बीत गई। चलता रहा चलता रहा चलता रहा चलता रहा। पिछले सावन में पिछले मतलब इस सावन में अभी जो सावन बीता है अभी तो आया नहीं है सावन दूसरा सावन में मेरा ध्यान महादेव के कारण दो चार पांच 10 बार 20 घंटे में लग जाता है तो कहीं ना कहीं हम चले जाते हैं कभी हिमालय कभी कहीं कभी-कहीं ऐसे महादेव के कारण कहीं ना कहीं हम भ्रमण कर आते हैं सावन अभिषेक के दौरान जो उस समय मिलता है अभिषेक में पांच महीना 2 मिनट 4 मिनट 3 मिनट 10 मिनट जो समय मिलता है उस समय हम ध्यान में चले जाते हैं। इस बार ध्यान में बूढ़ी मां आई उसको हम बूढ़ी मां कहते हैं।
(58:34) बूढ़ी मां आई और बोली कि मैं कहीं जाती नहीं हूं। मैं कहीं रहती नहीं हूं। मैं तुम्हारे पास रहती हूं। मैं तुम्हारे पास रहती हूं। तुम्हारे पास रहूंगी। मेरा कहने का तात्पर्य कि उस काल बचपन का काल था और धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे क्योंकि संभालना था किसी को हम किसी को संभालना था तो मेरी माई ने किसी माई को वहां भेजा कि जाओ मां धुमावती कह रही हूं बिल्कुल तो अब जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ मुझे साधना का विषय पता लगा तब पता चला वो धुमावती थी क्या थी वो मां धुमावती मां धुमावती थी और फिर उसने मुझे संभाला उसने मुझे पाला जिस कारण मुझे आज अग्नि से
(59:13) प्रेम है। अग्नि से प्रेम है और अग्नि में सब लोग जल जाते हैं। हवन के समय में सब लोग बहुत त्रस्त हो जाते हैं। लेकिन मैं आराम से करता हूं। तो इस कलिकाल में भी वास्तविक चमत्कार संभव है। बिल्कुल है। वास्तविक चमत्कार संभव है। लेकिन चमत्कार दिखावा ना हो। हम उस बूढ़ी मां से कोई काम ना कहें कि नहीं किसी का कुछ कर दो, किसी का ये कर दो, मुझे धन दिला दो, मुझे पद दिला दो, मुझे प्रतिष्ठा दिला दो। नहीं मुझे सत ज्ञान दो। मुझे सत ज्ञान दो। मुझे साधना मार्ग में आगे बढ़ाओ। मुझे साधना मार्ग में आगे बढ़ाओ। मेरी साधना को टूटने ना दो। साधना
(59:51) के समय हमें बाथरूम, हमें भूख, प्यास, नींद, आलस, बीमारी, रोग, बुखार, सर्दी, गर्म, जुकाम ना आए। उसमें हमारी रक्षा करो। उसमें हमारी रक्षा हम पूरे नियम का पालन करेंगे। तो मुझे लगता है कि इस कलिकाल में भी परमात्मा से संधि व्यक्ति का हो सकता है। फिर वहां से हमारी पढ़ाई प्रारंभ होती है। फिर हमने सारे वेद, न्याय दर्शन, पुराण, इतिहास, भागवत, गीता, दर्शन, वेदांत सारे शास्त्रों को हमने आपने एक भी तस्वीर नहीं रखी बूढ़ी मां की खींची भी नहीं। अब मुझे लगता है उस समय फोटोग्राफी, मोबाइल तो बहुत होता नहीं था। लेकिन फिर भी अगर हम ढूंढेंगे तो जरूर मिलेगा। हम
(1:00:35) उसकी रखे हैं। रखे हैं क्योंकि हम तो उनको वैसे तो मेरे दिल में है वो। हमारी पूरी प्रति मैंने कहा ना आपको कि वह सबसे सुंदर महिला थी। हम और उसके पैर से लेकर के शीश तक हमने सारी सेवा की। मेरी मां थी वो। मां थी और मैं तो बहुत छोटा था। तो मैंने उसकी सारी सेवा की। दो वस्त्र थे उसके पास। हमने कभी वस्त्र को मेला नहीं देखा। हम कि उसके वस्त्र कभी गंदे हुए। हम और दूसरे दूसरे घरों से वह कुछ मांग के लाती थी। किसी के यहां से आटा, किसी के यहां से चावल और अपने चूल्हे पे वो बनाती थी और हम और वो दोनों खाते थे। हम तो ये समय हमारे जीवन का स्वर्णिम समय उसके साथ सात वर्षों
(1:01:20) तक बीता। हम आज भी साक्षी हैं गांव के लोग। हम गांव के जो लोग हैं वो साक्षी हैं कि इसको पालने के लिए परमात्मा ने किसी को भेजा था। हम तो मुझे बताइए आज भी जब दतिया जाते हैं तो औरतों को धुआमती मां के दर्शन नहीं करने दिए जाते तो क्या ये सही है? सही नहीं है। लेकिन कुछ मापदंड है। कुछ नियम है। कुछ नियम है कि मां के दर्शन किस-किस परिस्थिति में धूमवती का कौन कर सकता है। उपासना का जो काल है देखो मुझे लगता है कि उपासना का जो काल है और उपासना के जो विधि है, उपासना के जो नियम है उन नियमों का पालन करना अनिवार्य है। अगर नियम का पालन नहीं करेंगे तो
(1:02:04) निसंदेह उपासना भी नहीं होगी और उसका उत्तम प्रतिफल भी प्राप्त नहीं होगा। तो इसलिए नियम का पालन करना अनिवार्य है। और राष्ट्रीय स्वामी दतिया जिन्होंने दतिया बगलामुखी मंदिर की स्थापना की और धुमा देवी की स्थापना की वो इस पीठ के अनुयाई थे। वो [गला साफ़ करने की आवाज़] इस पीठ के अनुयाई थे। कामराज गुरु जी से तो नहीं लेकिन कामराज गुरु जी के बाद जब उन्होंने स्थापना किया वो तो बहुत समय लंबा नहीं है वो अदतिया का वो यहां आकर के साधना करते थे। उन्होंने अपने पूरी संपूर्ण पत्रिकाओं में अपने लेख में अपने जीवनी में अपने घटनाक्रम में लिखा
(1:02:41) कि कितना भी बड़ा देश का साधक हो यदि वो दक्षिण मंदिर दक्षिण काली मंदिर नीलधारा गंगा तट चंडी घाट हरिद्वार नहीं जाता है तो उसकी साधना कभी पूरी नहीं होगी। उसकी साधना कभी पूरी पूरी नहीं होगी। यहां भगवती साक्षात बैठी हुई है। क्योंकि यहां कामराज गुरु जी ऐसे महात्मा हैं जो अमर है। भगवान शिव के संधि है। भगवान शिव के साथ उनका प्रेम है। भगवान शिव ने उनको वरदान दिया है कि तुम जिसे चाहो उसे अमर कर सकते हो। तो कामराज गुरु जी यहां एक रूप में विद्यमान रहते हैं और कामराज गुरु जी को महादेव के द्वारा यह वरदान है कि तुम जिसे चाहो उसे अमर कर दो।
(1:03:18) और तंत्र के आचार्य हैं कामराज गुरु जी। और भगवती काली जो है वो तंत्र की पुरोधा है। तंत्र की पुरोधा है। लेकिन भगवान इस बात को कहते हैं कि तंत्र मोक्ष का मार्ग है। तंत्र क्या है? मोक्ष का मोक्ष का मार्ग है। भोग का नहीं। नहीं तंत्र भोग का मार्ग है। भोग से तो विषय है। भोग से तो रोग उत्पन्न हो जाएगा। अगर कोई व्यक्ति तंत्र मार्ग में आकर के भोग को करता है। किसी भी प्रकार का सामाजिक, सांसारिक, व्याहारिक, राजनीतिक, पारिवारिक या व्यवसायिक पांच प्रकार के भोगों में से एक भी भोग यदि वह अपने जीवन में धारण करके भगवती से अपरिचित हो होता है वो तो वो रोगी हो
(1:04:00) जाएगा। रोगी हो जाएगा। अल समय में उसकी मृत्यु हो जाएगी। तो जो कामाख्या जी में जिस तंत्र की व्याख्या करते हैं या जिस तरीके से करते हैं कन्या पूजन के रूप में उसको अलग-अलग तरीके के आकार देते हैं। मुझे सुनने में तो बहुत अच्छा नहीं लगता पर हर तरफ सुनने और दिखाई दोनों में पड़ता है। तो वो तंत्र किस हिस्से जाता है? देखो कामाख्या क्योंकि कामाख्या भर देवी नील पर्वत वासनी तम देवी जगन माता योनि मुद्रे नमोस्तुते मां का गुप्त अंग वहां गिरा है और मां वहां प्रत्यक्ष रूप से निवास करती है निवास करती हैं कामाख्या और काली मंदिर क्योंकि मां कामाख्या ही काली है।
(1:04:39) काली है। काली है। तो भगवान शिव इस बात को स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि धरा पर दो पीठ ऐसा है जहां कन्याओं को मां के रूप में मान करके उनकी प्रत्यक्ष पूजा करके और प्रत्यक्ष अनुभूति का एहसास कर सकता है। वो श्यामा पीठ जहां आप बैठी हो ये और कामाख्या हम दो पीठ ऐसे हैं जहां कन्याओं को मां के रूप में मान करके वहां पूजा की जाती है। हम हम लोग यहां मां के रूप में कन्या को पूजते हैं। मां के रूप में कन्या को पूजते हैं। एक वर्ष से छ महीने से लेकर के 16 वर्ष तक की जो कन्या हमारी है 21 वर्ष का भी प्रमाण है। लेकिन 16 वर्ष तक जो
(1:05:25) कन्याएं हैं हम उनको अलग-अलग मां के रूप में मानकर उनकी पूजा करते हैं। शोडशी के रूप तक के रूप आपके लिए मैं छोटी सी भेंट लाई हूं। वैसे तुम्हें क्या दे सकती हूं? पर खाली हाथ आने का मतलब नहीं बनता। तुम्हारा सबसे अच्छा भेंट यह है कि तुमने आज बहुत सारे सवाल किया और इस सवाल से बहुत लोगों का संदेह भी दूर होगा। साधना के लोग साधना के मार्ग पर प्रशस्त भी होंगे। बढ़ेंगे। आज ही पढ़ रही थी। अनुष्का शर्मा ने कुछ गले में तुलसी की माला पहनी होगी। इन दिनों वृंदावन जा रही होंगी। तो जो साइड तुलसी की माला बेचती है उसके पास शॉर्टेज हो गई तुलसी की माला की। मैं आई तो आपने
(1:05:59) मुझे रुद्राक्ष की माला दी। और मैं यह सोच रही थी कि सिर्फ माला पहनने से ही अगर इंसान बदल जाए तो क्या बात होगी? तो सिर्फ माला के पीछे ना पड़कर मुझे बहुत खुशी हुई। आपने बताया कि कोई भी मंत्र तब काम का है जब ईश्वर से यहां से जुड़ा हो। नहीं तो माला जपने से तो क्या होता है? वो तो तोते और इंसान में फर्क क्या है? तो मुझे बहुत खुशी हुई कि आप और मैं इस बात पर साधा विचार करते हैं कि सिर्फ माला पहनने से वेश बदलने से तो नहीं ईश्वर की कृपा हो सकती। नहीं माला क्योंकि दो दो बातें हैं। माला जब हम किसी को दीक्षा देते हैं तो एक रुद्राक्ष की दाना देते
(1:06:33) हैं। उसको हम कंठी कहते हैं अपनी साधु साई भाषा में। तो माला फेरत जुग गया ना मन का फेर कर का मन का डार दे मन का मन का फेर। कबीर जी से किसी साधु ने पूछा तुम कौन हो? तो कबीर ने कहा कबीर कुत्ता में राम का मोती मेरा नाम गले बिच डोरी प्रेम का चित खींचे चित छाव। तो इससे यह पता लगता है मैं महादेव का यह रुद्राक्ष पहन रखा हूं। तो मेरा मालिक महादेव है। मेरा मालिक महादेव है। और अगर हम हमारी अकाल मृत्यु कभी भी होती है ऐसे तो होगी नहीं। अगर कभी होती है तो जिसका गले में होगा वो लेने आ जाएंगे। तो जिसका गले में होगा उसके दूत मुझे लेने
(1:07:07) आ जाएंगे। यमराज का दूत मुझे स्पर्श नहीं करेगा। बहुत खूबसूरत बात। मेरी मेरी मदर मुझे बोला करती हैं कि बिन पट्टे का कुत्ता नहीं होना चाहिए। [हंसी] इसलिए तो दो कुत्ते दो प्रकार होते हैं। एक पालतू एक फालतू। क्या तो हम फालतू कुत्ते हैं। फालतू नहीं है। हम कुत्ते तो हैं राम के हैं। महादेवी के हैं। बिल्कुल। फालतू नहीं है। यमराज यमराज मुझे नहीं छू सकता। [हंसी] नहीं ऐसा ही है। अभी तो बहुत समय है। आपके पैर भी तंदुरुस्त रहेंगे और आप भी तंदुरुस्त रहेंगे। अभी तो बहुत समय है। मेरा है कि इस बार आप सावन में देखो। आप तो बहुत तुम्हारे कारण बहुत सारा आनंद
(1:07:42) मिला सबको और तुम्हारी पूरी टीम सावन में आए और आप नजदीक से देखो। सबको दिखाओ देश को। बहुत अच्छा। ईश्वर की कृपा रहेगी। तो यह तो होगा ही। अभी चल कर आई हूं तब भी आ जाऊंगी। वैसे मैं नहीं निकालती हूं पर क्योंकि आप रुक जाओ तुमसे नहीं निकले। तुम इतने मजबूत क्या बात कर रहे हो? [हंसी] नंदेश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय मंदार पुष्प बहु पुष्प सुपूजिताय तस्मै नकाराय नमः शिवाय शिवाय गौरी बदना वृंद सूर दक्षा ध्वर नाशकाय
(1:08:30) श्री नीलकंठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय बहुत सुंदर आपने नंदी मेरे बहुत प्रिय है क्योंकि मैं तो नंदी का उपासक हूं और महादेव के सबसे प्रिय नंदी है। मुझे मन में सुबह-सुबह भाव आया कि मुझे आपके लिए नंदी ले जानी चाहिए। और मैं नंदी का ही उपासक हूं क्योंकि मैं तो नंदी तक पहुंच सकता हूं। मेरी पहुंच नंदी तक है। [संगीत] नंदी हमारे सिफारिश महादेव से करते हैं। तो उस कारण महादेव की कृपा होती है। [संगीत] तो मैं तो नंदी नंदी नंदी भगवान का उपासक हूं। बहुत सुंदर खूब आशीर्वाद आपको और खूब बधाई और आप आए मंदिर में आपने खूब अच्छा पारंपरिक वार्ता किया और हम तो
(1:09:22) महादेव से इतनी प्रार्थना करेंगे कि आपका खूब यश खूब मान खूब सम्मान और आपकी ख्याति और बढ़े और बढ़े और हमारे आनंद जी बहुत प्रिय है उनके आप बहुत प्रिय हो आज से तो मेरी भी बहुत प्रिय हो गई तो मेरा खूब आशीर्वाद आपको प्राप्त हो और निरंतर कोई भी कठोर साधना हमारे यहां होगी तो मैं जरूर आनंद जी से कहूंगा कि आपको [संगीत] लाएं और आप एक दिन साधना में बैठ के प्रत्यक्ष अनुभूति का आनंद लो। बिल्कुल।

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