Sunday, October 11, 2026

The Struggles of Working Women in India

The Struggles of Working Women in India

Author Name:Aanchal Raj Kumar

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@AanchalRajkumar

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=f3chOwYN8IE





Title: The Struggles of Working Women in India

Author Name: Aanchal Raj Kumar

Description: They call her a Superwoman because she manages everything. But what if she isn't balancing it all - what if she's simply exhausted?

In this Hindi documentary, Aanchal Rajkumar explores Superwoman Syndrome in India, the invisible burden of working women, unpaid care work, emotional labour, and the mental load women carry every single day.

From managing office deadlines to cooking, childcare, household responsibilities, and family expectations, many Indian working women face a second shift after their paid work ends. This documentary examines how that invisible labour can affect women's mental health, career growth, personal freedom, and work-life balance.

The Struggles of Working Women in India

This documentary explores:

• Superwoman Syndrome and working women in India
• Unpaid domestic work and the mental load of women
• Emotional labour, burnout, and invisible household responsibilities
• Gender inequality at home and in the workplace
• Career breaks, financial independence, and women's choices
• Why sharing household responsibilities matters

00:00 - Intro
02:06 - Part 1 : The Double Shift
04:38 - Part 2 : The Data
06:22 - Part 3 : The System
08:12 - Part 4 : The Money Trap
10:32 - Part 5 : The Sacrifice
12:10 - Part 6 : Superwoman Mat Kaho - Yeh Kaho
15:03 - Outro

A woman should not have to lose herself to keep everything running. The answer isn't asking her to manage her time better - it's sharing the load more fairly.

A question for you: Is household responsibility shared equally in your home, or does it automatically fall on one person?

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Yours
AANCHAL RAJ KUMAR

Transcript:
(00:00) इंडिया में पता है कितना मुश्किल है लड़की होना। सांस नहीं ले पाओगे एक भी दो दिन। और फिर जो चाहा उनके साथ किया। व्हाटएवर यू वांट। ओके। और फिर ब्लेम भी हम पे ही डालती हूं। तो क्या वक्त नहीं आ गया है औरतों को आत्मविश्लेषण करने का? सुपर वूमन हो तुम। सब कुछ अकेले संभाल लेती हो। अच्छा लगता है ना ये सुनकर। जब कोई तुम्हें ऐसा बोलता है, ऐसा लगता है कोई देख रहा है, कोई नोटिस कर रहा है। ये तुम्हारे लिए कोई कॉम्प्लीमेंट नहीं है। ये तुम्हारी थकान को एक खिताब देकर छुपा दिया गया है। सुपर वूमेन। एक ऐसा लेबल है जो सोसाइटी ने बनाया ताकि वो तुमसे सात
(00:33) लोगों का काम करवा सके बिना कंप्लेंट के। सिर्फ एक ही इंसान से। [संगीत] सुबह 5:00 बजे उठना, टिफिन बनाना, घर संभालना, ऑफिस जाना, मीटिंग को लीड करना, डेडलाइंस मीट करना। कम्यूट में नेक्स्ट टास्क क्या है वो प्लान करना। घर आना और फिर से काम शुरू। डिनर बनाना है, बच्चों का होमवर्क देखना है, इनलॉज़ की मेडिसिंस देखनी है, रिलेटिव्स को कॉल भी तो करना है। कहीं विश करना ना रह जाए। अगले दिन की टिफिन बनाने की फिर से तैयारी करनी है। [संगीत] रात को जब सब सो जाए तो बर्तन मांझ के किचन सेट करके फिर जाकर सोना है। अपने लिए कोई टाइम नहीं। [संगीत] और ये एक
(01:10) दिन नहीं है हर रोज है। हर दिन है। बिना किसी पब्लिक हॉलिडे के, बिना किसी ओवरटाइम पे के, बिना किसी हाउ वास योर डे के। और फिर लोग पूछते हैं कि बैलेंस कैसे कर लेती हो यह सब? मैडम बैलेंस नहीं करती। सर्वाइव करती हो तुम। और आज मैं तुमसे वो सच शेयर करूंगी जो तुम जानती हो जो डाटा भी प्रूफ करता है जो कोर्ट भी मानता है और जो साइकोलॉजिस्ट रोज अपनी फीमेल पेशेंट्स में ऑब्जर्व करती हैं। तुम अंदर से जानती हो लेकिन कह नहीं पाती हो। तो यह वीडियो हर उस औरत के लिए है जिसे सुपर वुमन बोलकर चुप करा दिया गया है। इस वीडियो को एंड तक
(01:48) जरूर देखना। दिल से अनुरोध है मेरा और उन सबको भेजना जिन्हें भेजने की जरूरत है जो समझना चाहते तो हैं मगर समझ नहीं पाते। [संगीत] जब एक वर्किंग वूमन ऑफिस से निकलती है ना तो उसके दिमाग में चल रहा होता है घर जाना है, खाना बनाना है, बच्चों का होमवर्क कराना है, अगले दिन के अरेंजमेंट करने हैं। सुबह टिफिन बनाना है, बिल भरा है या नहीं? भूल तो नहीं गई? किसी का बर्थडे तो नहीं आ रहा। अरे घर में कोई अपसेट तो नहीं चल रहा है। उसके मूड के हिसाब से बात करनी है। ऑफिस के बाद काम बंद नहीं होता। सिर्फ जगह बदल जाती है। जब वो घर जाती है तो वो
(02:33) लॉग आउट तो करती है मगर क्योंकि एक लड़की ऑफिस से लॉग आउट करती है का मतलब यह नहीं होता है कि उसकी रिस्पांसिबिलिटी से लॉग आउट कर देती है। तुम्हें पता है रिसर्च कहती है इंडियन वर्किंग वुमेन अपने पूरे दिन का 25% यानी 6 घंटे अनपेड घर का काम रोज करती है और इंडियन वर्किंग मैन 40 [संगीत] मिनट मतलब सिर्फ 3% मतलब सेम घर सेम फैमिली मगर आठ गुना ज्यादा फर्क। WHO की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया भर के अनपेड केयर वर्क 76% ऑफ वर्क महिलाएं करती हैं। यूएन वुमेन की रिपोर्ट कहती है कि महिलाएं पुरुषों से ढाई गुना ज्यादा अनपेड काम करती हैं। अब ना ये दो शिफ्ट्स है। एक
(03:14) ऑफिस में जो फेयरली विज़िबल है, अनफेयरली पेड है। और दूसरी घर में जो इनविज़िबल है और बिल्कुल भी पेड नहीं है। इस इनविज़िबल शिफ्ट की एक कॉस्ट होती है जो कोई बोलता नहीं है। यही 6 घंटे वो वक्त अपने करियर पे लगा सकती थी। नए स्किल सीख सकती थी। अपने ड्रीम्स पर काम कर सकती थी। अपने लिए जी सकती थी। और कई बार मेड होने के बावजूद भी वो ये नहीं पर्स्यू कर पाती। क्योंकि मेड को सुपरवाइज करने का काम, मैनेज करने का काम भी बाय डिफॉल्ट एक औरत का ही है। और यह एग्जॉशन दिखती पता है कैसे है? सिर्फ थकान के रूप में नहीं दिखती। साइकोलॉजिस्ट कहते हैं कि हर रोज
(03:53) फंक्शनिंग वुमेन में दिखती है यह थकान एंगर के रूप में, इरिटेशन के रूप में, रेज की तरह। और जब मर्द पूछते हैं कि मेरी वाइफ ऐसी क्यों बन गई है? तुम तो पहले ऐसे नहीं थी। तो नाइन आउट ऑफ 10 का जवाब होता है इनविज़िबल इमोशनल लोड। क्योंकि वो ट्रैक करती है हर किसी की जरूरत। हिसाब रखती है डेट्स का, बर्थडेज़ का, एनिवर्सरीज का, ग्रोसरीज का, फीस का, मेडिसिंस का, स्कूल के मैसेजेस का। लेकिन अगर वह एक दिन भी यह काम बंद कर दे ना, तो पूरा का पूरा घर बंद हो जाएगा। यह सिस्टम क्रैश हो जाएगा। ब्रेकफास्ट कौन बनाएगा? होमवर्क कौन कराएगा?
(04:31) मेरे घुटने कौन दबाएगा? सुबह चाय कौन पिलाएगा? और सबसे ताज्जुब की बात यह है कि ये सारा काम ना अननोटिस चला जाता है। बात करते हैं नंबर्स की जो सब कुछ एक्चुअली में प्रूफ कर देंगे। वर्क प्लेस में पीडब्ल्यूई की रिसर्च कहती है कि यूएस में सेम रोल के लिए वुमेन को 15% कम सैलरी मिलती है। और ये यूएस की बात कर रही हूं मैं। अब सोचो इंडिया का क्या ही हाल होता होगा। कॉर्पोरेट इंडिया में 10% कंपनीज ऐसी हैं जहां पर एक भी वुमेन लीडर नहीं है। 46% कंपनीज़ ऐसी हैं जहां 30% से कम पोजीशंस पे वुमेन लीडर्स हैं। एंड सिर्फ 20% कंपनीज़ में जेंडर बैलेंस के करीब
(05:12) दिखता है। जब वुमेन अपना करियर पीक पर छोड़ती है ना तो सब कहते हैं ये तो उसकी पर्सनल चॉइस होगी। नहीं। उसकी पर्सनल चॉइस नहीं है। सिस्टम ने उन्हें पुश आउट किया है क्योंकि वो एक ऑफिस एक ऐसी सोच पर डिजाइन हुआ था कि घर में कोई है जो उसकी पूरी जिंदगी ही संभाल रहा होगा। चाहे वो खाना हो, बच्चे हो, घर हो, रिस्पांसिबिलिटीज हो उसमें हाथ बटा रहा होगा ताकि वो सिर्फ काम पे फोकस कर सके। एक औरत के पास कोई नहीं होता है। उसका वो कोई वो खुद होती है क्योंकि नाइन टू फाइव स्ट्रक्चर [संगीत] जीरो इंट्रपशंस की एक्सपेक्टेशंस के साथ बनाया गया है। 30ज
(05:48) में मैक्सिमम करियर आउटपुट निकालना होता है। एक्सपेक्टेशंस इतनी ज्यादा होती है। ये सब अजमशंस पे बना था कि घर में कोई ना कोई तो उसका साथ दे रहा है। उसका हाथ पटा रहा है। एक मर्द सीधा लैडर चढ़ता है क्योंकि उसके लिए कोई लैडर पकड़ कर खड़ा होता है। एक औरत लैडर चढ़ती है मगर काफी केसेस में उसकी लैडर भी वो खुद ही पकड़ रही होती है अकेले। इसलिए अक्सर या तो वो गिर जाती है या वो स्लो हो जाती है। और फिर हम पूछते हैं वुमन से कि तुम आगे क्यों नहीं बढ़ पाई? पता है इंडियन फैमिलीज़ को पढ़ी लिखी लड़की पसंद तो आती है जब तक उसकी पढ़ाई उसकी
(06:31) चॉइसेस [संगीत] दिक्कत नहीं देने लगती। शादी से पहले डिग्री प्राइड थी। वो डॉक्टर है, वो डेंटिस्ट है, इंडिपेंडेंट लड़की है, खुद कमाती है। मैरिज मटेरियल है। शादी के बाद वही एंबिशन प्रॉब्लम लगने लगती है। वही डिग्री सेल्फिश [संगीत] होने का निशानी हो जाती है। एक कहानी बताती हूं। एक औरत डेंटिस्ट अहमदाबाद में रहती थी। शादी हुई उसकी एक आर्मी [संगीत] ऑफिसर से। उसकी पोस्टिंग थी कारगिल में। वो गई, कारगिल, एडजस्ट किया, घर बसाया, कोई सवाल नहीं किया, कोई कंप्लेंट नहीं की। फिर प्रेगनेंसी आई। कारगिल में प्रॉपर हॉस्पिटल्स नहीं है। वह एक बहुत रफ एरिया
(07:06) है। वह वापस आ गई है अहमदाबाद अपने बच्चे को सेफ्टी देने [संगीत] के लिए। वहां उसने अपना डेंटल क्लीनिक खोला। अपने आप को इंडिपेंडेंट किया। वो अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी और अपने पांव पर खड़ी हो गई। पता है उसके हस्बैंड [संगीत] ने कुछ सालों बाद उसे डिवोर्स दिया। रीजन पता है क्या था? क्रुलिटी, डिसर्जन। एक औरत जो अपने बच्चे के [संगीत] लिए सेफ शहर में आई, उसने अपना खुद काम शुरू किया और उसे क्रुअल [संगीत] कह दिया गया। तब सुप्रीम कोर्ट को आना पड़ा। वो कहने कि एक औरत को अपने करियर के लिए दूसरे शहर में रहना क्रुलिटी नहीं है।
(07:39) इफ द वाइफ इज अनेबल टू और रिफ्यूज टू डू हाउस होल्ड चोर स्पेशली [संगीत] कुकिंग तो ये क्रुलिटी में कंसीडर नहीं होगा। एंड कैन नॉट बी द बेसिस फॉर डिसोल्यूशन ऑफ़ मैरिज। और ये 2022 की बात है। अभी की बात है हमारे ही [संगीत] देश की। मैरिड मर्द दूसरे शहर में जाकर रहे तो वह ड्यूटी है। मैरिड वुमेन अगर दूसरे शहर में जाकर रहे तो वह एक कैरेक्टर इशू है। सुप्रीम कोर्ट को वो कहना पड़ा जो ऑब्वियस होना चाहिए था। ऑब्वियस है यह बात सबके लिए समझना कि हर डिसीजन टू पर्स्यू हर डेंटल करियर उसको एक क्रुलिटी कहा गया। जस्ट सीट विथ दैट थॉट।
(08:15) तुम्हें पता है इंडिया में 30% से कम जमीन वुमेन के नाम पर है। एक देश में जहां 55% पपुलेशन महिलाएं की है। बहुत सारी वुमेन बहुत सारी शादियों में फंसी रहती हैं क्योंकि उनके पास कोई रास्ता नहीं होता। कोई अकाउंट नहीं होता, कोई बैकअप प्लान नहीं होता। फाइनेंसियल इंडिपेंडेंस इनकम का प्रॉब्लम नहीं है। यह कंट्रोल का प्रॉब्लम है। क्योंकि रियल इंडिपेंडेंस तीन चीजों से आती है। पहला आपका पैसा, दूसरा आपका टाइम और तीसरा आपके फैसले, आपके डिसीजंस। मर्द के लिए उसका टाइम और उसके फैसले पहले से ही उनके हाथ में हैं। इसलिए सिर्फ पैसा कमाने से ही उन्हें
(08:55) इंडिपेंडेंस मिल जाती है। और औरत के लिए तीनों पर किसी और का कंट्रोल होता है। वो पैसा कमाती है लेकिन डिसाइड नहीं कर पाती कि कहां जाएगा। वो काम करती है लेकिन डिसाइड नहीं कर पाती कि कब बाहर जाएगी या कैसे काम करेगी। वो कैपेबल है लेकिन रिस्क लेने की परमिशन मांगनी पड़ती है। बाहर से इंडिपेंडेंट दिखने में और एक्चुअल इंडिपेंडेंट होने में बहुत फर्क है। हां हां मुझे पता है अब कुछ लोग कमेंट में जरूर लिखेंगे कि तुम्हें किसने कहा दोनों काम करने के लिए? तुम्हें किसने कहा दो शिफ्ट करो। बैठो घर में जैसे पहले तुम्हारी माएं बैठा करती थी। क्या जरूरत
(09:28) है? हमने कहा है तुम्हें दो दिन बाहर का काम करने के लिए अंदर का काम करने के लिए। तो कोई हमने कहा है नौकरी करने को। अपनी मर्जी से करनी है। घर बैठो पैसे मत कमाओ। हस्बैंड पे डिपेंड रहो। वजह से तुम्हारी मां रहती थी और एक दिन वो हस्बैंड पूछ लेगा क्या किया तुमने अपनी जिंदगी में तो क्या जवाब दोगी घर में जब भी कोई बड़ा डिसीजन लिया जाता है और तुमसे तुम्हारा टेक नहीं पूछा जाता क्योंकि तुम कोई फाइनेंसियली कंट्रीब्यूट नहीं करती हो ना इसलिए तो कैसा लगता है सोचा है कभी क्योंकि पैसा नहीं है ना तुम्हारी अकाउंट में पैसा सिर्फ कंफर्ट
(09:58) नहीं है पैसा रिस्पेक्ट है पैसा चॉइस देता है पैसा वॉइस देता है और पैसा कभी-कभी एग्जिट भी होता है जब जरूरत [संगीत] पड़े तो और उन लोगों के लिए जो सोचते हैं कि एंबिश स होना खुद के लिए सोचना औरत और औरतों से एक्सपेक्ट नहीं करना चाहिए क्योंकि वे इनप्रोप्रियट बात [संगीत] है। मुझे एक बात पूछनी थी उनसे कि ये ख्वाब्स, सपने एंबिशंस, सेल्फ एक्चुअलाइजेशन नीड्स, अपनी आइडेंटिटी [संगीत] और अपना पर्पस ये सिर्फ चीजें सिर्फ मर्दों के लिए बनी है। ऐसा तो नहीं है ना कि ये प्रीमियम फीचर्स सिर्फ मेल जेंडर में ही मिले हैं। हमारे को तो ये सब दिया
(10:31) ही नहीं है भगवान ने। इस देश में औरत के लिए सेल्फिश होना किसी गाली से कम नहीं है। यह मैं नहीं कह रही हूं। यह वारिकू साहब कह रहे हैं। सेल्फिश होना एक औरत के लिए तो कम से कम इस देश में गाली है। सेल्फिश नहीं हो सकती तुम। क्योंकि एक औरत ही सबसे ज्यादा कॉम्प्रोमाइज करती है। तो उसके अंदर ही एक फ्रस्ट्रेशन पाइल अप हो जाता है। डायरेक्टली बाहर नहीं आता है वो। मगर बाहर आता है तो बीमारियों की तरह आता है। ब्लड प्रेशर की तरह आता है। ऑटोइ्यून डिजीजेस की तरह आता है। थायरॉइड, टेंशन, स्ट्रेस स्टर्स इन डिफरेंट पार्ट ऑफ बॉडी डिपिक्टेड थ्रू डिफरेंट डिजीजेस। और इस
(11:09) पूरी जर्नी में जब वो खिलखिलाती हुई लड़की कब एक फ्रस्ट्रेटेड चिड़चिड़ी आंटी बन जाती है उसे खुद नहीं पता चलता है और उसकी स्पार्क खत्म हो जाती है वो उसकी बॉडी उसकी हेल्थ वो लूज़ करने लगती है मगर मेजर आईरी पता है क्या है हमारे देश की कि हमारी औरतों से एक्सपेक्टेशंस क्या है दैट दे बिहेव लाइक मदर इंडिया एंड दे शुड लुक लाइक मिस इंडिया पूरी जिंदगी एक अच्छी वाइफ एक अच्छी बहू एक अच्छी पत्नी एक अच्छी मां सोसाइटी के रिपोर्ट कार्ड में 10-10 नंबर लाने के लिए परफॉर्म करती रहती है। मगर एक फज़ आ गया है अब कि वो यह ट्रैप ना आइडेंटिफाई करने लगी है और इसलिए वो
(11:49) कॉम्प्रोमाइज करने से डरने लगी है या सब खिलाफ हो गई है और इसलिए आजकल की सोसाइटी कहने लगी है कि आजकल की लड़कियां तो कॉम्प्रोमाइज ही नहीं करती। आपको पता है सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कह दिया है कि घर का काम ना करना क्रुलिटी नहीं है। यह सिर्फ एक लीगल शिफ्ट नहीं है। एक सोशियोलॉजिकल शिफ्ट है क्योंकि तुम मेड नहीं हो। तुम पार्टनर हो। यार सुनो मैं यह नहीं कह रही हूं कि घर का काम मत संभालो। मैं यह भी नहीं कह रही हूं कि करियर मत बनाओ। मैं यह भी नहीं कह रही हूं कि ये दोनों साथ में मत करो। मैं बस यह कह रही हूं कि अकेले मत करो। किसी
(12:25) महिला को यह कहकर ग्लोरिफाई मत करो कि वाह इसने तो सब कुछ अकेले कर दिया। शायद हमें उसे यह कहना चाहिए कि इसने मांगा, इसने मदद मांगी, जिम्मेदारी बांटी। कितनी अच्छी बात है। इस सबके बीच में खुद को खोने नहीं दिया। यह कितनी अच्छी बात है क्योंकि मेड रखना, मेड नहीं है तो काम डिवाइड करना बुरी वाइफ होने का साइन नहीं है। यह एक क्लियर वाइफ होने का साइन है कि मुझे अपनी वैल्यू पता है। मुझे अपने लिए भी सोचना है। घर किसी एक का प्रोजेक्ट नहीं होता है। घर एक पार्टनरशिप होती है। और एक और बात कहना चाहती हूं मैं तुमसे कि एक औरत की सबसे बड़ी जीत यह नहीं है कि उसने सब
(13:03) कुछ खुद संभाल दिया। उसकी सबसे बड़ी जीत यह है कि जिंदगी संभालते-सालते उसने खुद को खोने नहीं दिया। वर्क लाइफ बैलेंस आज की वर्किंग वूमेन के लिए एक बहुत बड़ा स्कैम है। क्योंकि तुम जितना चाहो तुम ऑर्गेनाइज नहीं कर सकती एक अनफेयर डिवीजन ऑफ रिस्पांसिबिलिटी को। जो औरत रोज बिना किसी रिकॉग्निशन के, बिना किसी ओवरटाइम पे के, बिना किसी थैंक्यू के उठती है और वही काम रोज करती है वो सबसे ज्यादा अंडररेटेड, सबसे अंडरवैल्यूड और सबसे अंडरएस्टीमेटेड वर्कर ऑफ द वर्ल्ड है। और एक बात हमेशा याद रखना कि अ हैप्पी वुमेन मेक्स अ हैप्पी होम। जब एक थकी हुई
(13:43) एक एग्जॉस्टिंग एक इनविज़िबल फील करने वाली औरत घर संभालती है तो फिर एक एग्जॉस्टेड घर ही बनाती है। उस घर का माहौल चिड़चिड़ा ही होता है। क्या तुम्हारे घर में भी काम शेयर होता है या तुम अकेले सारा काम संभालते हो या यह वीडियो तुम किसी को भेजोगे तो तुम्हारी रियल लाइफ जिंदगी में फर्क आएगा। तो प्लीज इस वीडियो को शेयर करो उन लोगों के साथ जिनको तुम्हें यह बात समझाना चाहते हो मगर तुम्हारे पास शब्द नहीं होते समझाने के लिए। उन बेटों के साथ शेयर करो जो कल किसी के पार्टनर बनेंगे। उन सासों और उन मांओं के साथ शेयर करो जिन्होंने इस पूरी जिंदगी इस चीज को जिया
(14:18) है। और उन महिलाओं के साथ प्लीज शेयर करो जो इस बात को रोज फील करती हैं। सो दैट दे फील वैलिडेटेड एंड दे कैन सीक हेल्प थ्रू दिस वीडियो। बहुत सारे पॉइंट्स हैं जो शायद मैं मिस कर चुकी होंगी। बट ये वीडियो मैंने दिल से बनाई है बिकॉज़ दिस इज व्हाट समथिंग आई हैव ऑब्जर्व्ड ऑल माय लाइफ। आई रियली होप कि आपको इस वीडियो से मदद मिली हो। एंड डू लेट मी नो इन द कमेंट सेक्शन बिलो कि आपके घर में हेल्प है। आप घर का काम कैसे करते हो? क्या इस वीडियो को देखने के बाद आपके अंदर चेंजेस आएंगे? या फिर आपकी मम्मी ही अकेले सारा काम करती रहेगी। आई विल सी यू अगेन ऑन एव्री सैटरडे
(14:57) 8:00 p.m. एंड इफ यू हैव सब्सक्राइब टू आवर चैनल ऑलरेडी प्लीज डू दैट। प्रेस द बेल बटन सो दैट यू गेट नोटिफाइड अबाउट एव्री अपडेट। [संगीत]

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