Saturday, October 31, 2026

Biggest experiment in History! Do Yogis really have hidden Powers?

Biggest experiment in History! Do Yogis really have hidden Powers?

Author Name:Arvind Kalia

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@ArvindKaliaOfficial

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=Th9ykYkPPjs





Title: Biggest experiment in History! Do Yogis really have hidden Powers?

Author Name: Arvind Kalia

Description: In this video, we explore the hidden powers of Indian yogis and the fascinating stories of Swami Rama and Sadhu Haridas. Discover how ancient yoga, meditation, pranayama, and deep concentration may influence the human mind and body.

We also explore Ashtanga Yoga, Samadhi, brain waves, and modern neuroscience to understand the science behind meditation and extraordinary mental focus. Can ancient yogic practices reveal the untapped potential of the human brain?

Discover the connection between ancient Indian wisdom, modern science, and the hidden capabilities of the human mind.

#indianyogis #yoga #meditation
------------------
#ArvindKalia

Transcript:
(00:00) साल 1970 अमेरिका का मेनिंगर फाउंडेशन जहां कुछ ऐसा हो रहा था कि किसी की भी समझ से परे था। इस रिसर्च फैसिलिटी के एक कमरे में लगभग 45 साल के इंडियन सन्यासी स्वामी राम लेटे हुए थे। स्वामी राम के पास कुछ ऐसी अनयुअल एबिलिटीज थी जिनके बारे में बहुत ही कम लोगों को पता था। फिर जब उनकी एबिलिटीज की बात फैलने लगी तो रिस्चरर्स ने उनकी एबिलिटीज को टेस्ट करने का सोचा। डॉक्टर्स ने उनके दिल, दिमाग और हाथों पर कई सारे वायर्स और सेंसर्स लगाए थे ताकि वो स्वामी राम के सुपर ह्यूमन होने की एबिलिटीज को जान सके। सामने खड़े थे अपने फील्ड के टॉप रिस्चर डॉक्टर एलमर ग्रीन।
(00:42) डॉक्टर ग्रीन ने अपने मेडिकल करियर में ढेरों पेशेंट्स देखे थे। लेकिन आज जो उनके सामने इंसान था उसका कहना था कि वो अपनी मर्जी से अपने दिल की धड़कन यानी कि हार्ट रेट को पूरी तरह से रोक सकता है। जो किसी के लिए भी कर पाना नामुमकिन है। वो इसलिए क्योंकि हमारा हार्ट ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम से चलता है। यानी आप [नाक से की जाने वाली आवाज़] चाहकर भी अपने दिल को धड़कने से नहीं रोक सकते। ठीक वैसे ही जैसे आप अपने डाइजेशन को कंट्रोल नहीं कर सकते। एंड इस सब के साथ डॉक्टर ग्रीन स्वामी जी को टेस्ट करना चाहते थे। स्वामी राम अपनी आंखें बंद करते हैं और
(01:17) तभी उसी समय कुछ ऐसा हुआ जो वहां बैठे सभी बड़े-बड़े रिसर्चरर्स के पसीने छुड़ा [संगीत] देता है। मॉनिटर की स्क्रीन पर हार्ट रेट स्पाइक होने लगती है। यानी जहां बीट्स पहले 70 पर मिनट थी अब वो सीधा बढ़कर 300 बीट्स पर मिनट हो चुकी थी। मेडिकल टर्म्स में इसे एट्रियल फ्लटर कहते हैं। होता यह है दोस्तों कि स्वामी राम जी का दिल इतनी तेजी से बीट कर रहा था कि उसने ब्लड पंप करना ही बंद कर दिया। अब इस सिचुएशन में किसी भी नॉर्मल इंसान की एक झटके में मौत हो सकती थी। लेकिन वहीं स्वामी राम जी ने 17 सेकंड तक पूरी तरह से अपने दिल को रोक दिया था। उनके दिमाग से
(01:55) कोई ऐसी वेव निकली जिसने हार्ट के पेसमेकर को ओवराइड कर दिया। और ठीक 17 सेकंड बाद उन्होंने उस धड़कन को वापस नॉर्मल कर दिया। जब डॉक्टर ग्रीन ने यह देखा तो वो दंग रह गए। ही मेड हिज हार्ट अ पंप दैट डिडंट पंप। यह सब होना एकदम इंपॉसिबल था क्योंकि उस वक्त उनकी बॉडी अपनी जगह से बिल्कुल भी हिल नहीं रही थी। अब यहां सबसे बड़ा सवाल यह आता है कि आखिर कैसे [संगीत] कैसे स्वामी जी अपने ब्रेन पर काबू पाकर अपने शरीर को इतना कंट्रोल कर पाने में कैपेबल होंगे। आज की इस वीडियो में हम इसी टॉपिक यानी कि द हिडन पावर्स ऑफ योगिस को अच्छे से समझेंगे। वि द हेल्प ऑफ साइंस
(02:34) आल्सो। जी हां, आज मॉडर्न वर्ल्ड में हमारे इंडियन योगीस के ऊपर काफी रिसर्चेस चल रही हैं। एंड आज की डेट में विद द हेल्प ऑफ मॉडर्न साइंस यह भी सामने आ गया है कि यह योगीस कैसे मेंटली एक नॉर्मल इंसान के कंपैरिजन में इतने सुपीरियर होते हैं कि जहां एक नॉर्मल इंसान सामने वाले के माइंड में क्या चल रहा है यह तक नहीं पहचान पाता। वहीं ये योगीस उनका पास्ट, प्रेजेंट और फ्यूचर तीनों बता देंगे वो भी बड़ी आसानी से। तो आज हम यही जानने की कोशिश करेंगे। हेलो एवरीवन, आई एम योर भाई अरविंद कालिया एंड चलिए वीडियो को सीधा शुरू करते हैं।
(03:11) आज दुनिया में करीब 300 मिलियन यानी कि 30 करोड़ लोग डेली योगा प्रैक्टिस करते हैं। अमेरिका से लेकर इंडिया तक हर जगह योगा स्टूडियोज है। लेकिन हम में से 99% लोग योगा को सिर्फ स्ट्रेचिंग, वेट लॉस या मेंटल पीस का जरिया मानते हैं। पर दोस्तों, शायद यह बात आपको पता नहीं होगी कि यह योगा प्राइमरीली इन सब चीजों के लिए बनाया ही नहीं गया था। कि बड़े-बड़े योगीस के लिए योगा एक ध्यान में उतरने का मीडियम हुआ करता था। एंड इसी डीप फोकस से वह अपने शरीर के उन हिस्सों तक पहुंच पाते थे जहां एक नॉर्मल इंसान का सोच पाना भी नामुमकिन है। आज की वीडियो में हम ऐसे ही रियल
(03:50) एग्जांपल्स को देखेंगे एंड उन्हें साइंस के पीओपी से समझने की कोशिश भी करेंगे। एंड ये भी जानेंगे कि आज के टाइम हमें ऐसे ही महान योगीस देखने को क्यों नहीं मिलते। शुरू करते हैं साधु हरिदास जी के किस्से से। बात है 1837 की जब पंजाब एंपायर अपने पीठ पर था। उस वक्त लाहौर पंजाब एंपायर का एक इंपॉर्टेंट हिस्सा था। लेकिन आज 1947 के पार्टीशन के बाद वही लाहौर पाकिस्तान का हिस्सा है जो कभी पंजाब का मेजर शहर हुआ करता था। तो उस वक्त वहां के रूलर थे महाराजा रंजीत सिंह जिन्हें शेर पंजाब भी कहा जाता था। अब महाराजा रंजीत सिंह एक
(04:29) बहुत ही प्रैक्टिकल और शार्प दिमाग वाले इंसान थे। उनका मानना था कि मेहनत और स्ट्रेटजी से सब कुछ पॉसिबल है। लेकिन जादू टोना, चमत्कार या किसी तरह के अंधविश्वास पर उनका 0% भरोसा था। तो एक दिन उनके दरबार में एक बहुत अजीब सा वाक्य होता है। एक साधु जिनका नाम हरिदास था। वो महाराजा के दरबार में आते हैं और कुछ ऐसा कहते हैं जिसे सुनकर वहां के बैठे सभी लोग एकदम शॉक हो गए। साधु हरिदास जी का कहना था कि वह अपने हठ योगा की पावर से मौत को हरा सकते हैं। उन्होंने कहा कि वह लगातार 40 दिन तक जमीन के अंदर बिना खाना, बिना पानी और यहां तक कि बिना हवा के जिंदा रह
(05:11) सकते हैं। यह सुनकर महाराजा रंजीत सिंह को लगा कि यह कोई सस्ता जादू दिखाने वाला या कोई पागल है। उन्होंने सोचा कि इसको एक्सपोज करना बहुत जरूरी है। तो उन्होंने साधु हरिदास जी की बात को एग्री कर लिया लेकिन अपनी एक शर्त पर महाराजा ने क्लियर बोला कि हरिदास अगर तुम्हारा दावा सच्चा है तो मैं खुद तुम्हें अपनी आंखों के सामने जिंदा दफन करवाऊंगा और अगर इसमें आगे चलकर कोई धोखा मिला तो इसकी सजा बहुत भयानक होगी। साधु हरिदास जी बिना किसी डर के इस बात के लिए राजी हो गए और यहां से शुरू होता है हिस्ट्री का सबसे मिस्टीरियस और खतरनाक एक्सपेरिमेंट। जमीन के अंदर 40
(05:54) दिन बिताना कोई मजाक नहीं था। मेडिकल साइंस कहती है कि 3 मिनट बिना ऑक्सीजन के इंसान का ब्रेन डेड होने लगता है। लेकिन साधु हरिदास जी को पता था कि उन्हें अपनी बॉडी को एक नॉर्मल ह्यूमन बॉडी से एक डेड स्टेट में स्विच करना होगा। तो उन्होंने दफन होने से कुछ दिन पहले ही अपनी तैयारी शुरू कर दी। सबसे पहले उन्होंने सॉलिड खाना पूरी तरह से छोड़ दिया। वो कई दिनों तक सिर्फ और सिर्फ दूध पर जिंदा रहे। इसका रीजन यह था कि वो अपने डाइजेस्टिव सिस्टम को पूरी तरह से खाली करना चाहते थे। अगर पेट में खाना बचा रहेगा तो 40 दिन में बॉडी के अंदर बैक्टीरिया उस खाने को
(06:31) सड़ाने लगेंगे और बॉडी डीकंपोज होने लगेगी। तो पेट को फ्लश आउट करना पहला स्टेप था हरिदास जी के लिए। उसके बाद दफन होने वाले दिन साधु हरिदास जी ने अपनी बॉडी के हर उस रास्ते को सील करना शुरू किया जहां से हवा या मॉइस्चर अंदर आ सकता था। उन्होंने अपने दोनों कानों और दोनों नाक को बिल्कुल टाइट वैक्स से ब्लॉक कर लिया। लेकिन सबसे खतरनाक और पेनफुल प्रोसेस अभी भी बाकी था। उन्होंने एक एंशिएंट और एक्सट्रीमिक योगिक टेक्निक का यूज किया जिसे खिचारी मुद्रा कहते हैं। इसमें हरिदास जी ने अपनी जीभ को अंदर की तरफ पीछे की ओर रोल किया और उसे अपने ही
(07:11) गले के अंदर इतना डीप फंसा लिया कि उनकी विंड पाइप यानी कि सांस लेने वाली नली अंदर से पूरी तरह ब्लॉक हो गई। अब ऑक्सीजन के अंदर जाने का कोई रास्ता नहीं था। इस एक मूव के साथ ही साधु हरिदास जी की सांसे रुक गई। उनकी धड़कन स्लो होते-होते लगभग बंद हो गई और वो एक सस्पेंडेड एनिमेशन की स्टेट में चले गए। एक ऐसी कंडीशन जहां टेक्निकली उनकी बॉडी अब मर चुकी थी। अब इसके बाद वहां खड़े गार्ड्स और असिस्टेंट्स ने साधु की डेड लगने वाली बॉडी को एक बहुत ही भारी कफन में टाइटली [संगीत] सिल दिया। फिर उस बॉडी को एक लकड़ी के मजबूत बॉक्स में रखा गया और उस
(07:52) बॉक्स को लॉक करके पूरी तरह सील कर दिया गया। लाहौर में इस एक्सपेरिमेंट के लिए एक स्पेशल अंडरग्राउंड विक्ट यानी ईंटों का तहखाना बनाया गया। उस बॉक्स को उस तहखाने में काफी नीचे उतार दिया गया। लेकिन महाराजा रंजीत सिंह कोई आम इंसान नहीं थे। वो एक ब्रिलियंट स्ट्रेटजिस्ट थे। उन्हें लगता था कि साधु के फॉलोअर्स रात के अंधेरे में आकर अपने गुरु को बचा सकते हैं या खाना पानी दे सकते हैं। तो कोई फ्रॉड ना हो जाए इसीलिए महाराजा ने एक मास्टर प्लान बनाया। उन्होंने उस तहखाने के ऊपर बहुत सारी मिट्टी डलवा दी और जमीन को बिल्कुल लेवल कर दिया। और सिर्फ इतना ही
(08:29) नहीं उन्होंने उस मिट्टी के ऊपर जौ यानी कि बारle के बीज बो दिए। उनका लॉजिक यह था कि अगर किसी ने रात में मिट्टी खोदकर बॉक्स तक पहुंचने की कोशिश की तो वहां की फसल और बीज डिस्टर्ब हो जाएंगे और चोरी तुरंत पकड़ी जाएगी। इसके बाद उस दबी हुई जगह के चारों तरफ एक ऊंची दीवार चिनवा दी गई और एक हैवी गेट लगाकर उस पर ताला मार दिया गया। अब फाइनली महाराजा ने अपनी इलीट सेना की एक पूरी रेजीमेंट को आर्डर दिया कि वहां 24 घंटे हर दिन और हर रात का कड़ा पहरा लगा दिया जाए। अब एक तरफ तो साधु हरिदास जी जमीन के अंदर एक बॉक्स में बंद थे। जहां सिर्फ अंधेरा
(09:10) था, ना हवा थी, ना पानी और दूसरी तरफ बाहर की दुनिया में वक्त आगे बढ़ रहा था। दिन महीनों की तरह गुजर रहे थे। लाहौर के आम लोगों से लेकर महाराजा के दरबार तक सब जगह सिर्फ एक ही डिस्कशन चल रहा था कि 40 दिन बाद उस ईंटों के तखाने से क्या निकलेगा? एक जिंदा योगी या एक सड़ती हुई बॉडी। एक-एक करके दिन गुजरते गए। 10 दिन, 20 दिन, 30 दिन और आखिरकार 40वां दिन आ गया। वो दिन जब इस चैलेंज का रिजल्ट सबके सामने आना था। दोस्तों, उस दिन उस दीवार के पास लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। महाराजा रणजीत सिंह खुद वहां मौजूद थे। उनके प्राइम मिनिस्टर राजा ध्यान सिंह भी थे।
(09:52) और सबसे इंपॉर्टेंट बात वहां पर कुछ ऐसी फॉरेन अथॉरिटीज मौजूद थी जिनके होने से इस इवेंट के अंदर किसी तरह का मैनिपुलेशन लगभग इंपॉसिबल था। ब्रिटिश पॉलिटिकल रेजिडेंट क्लाउडवेट वहीं खड़े थे और उनके साथ कुछ टॉप फ्रेंच मिलिट्री डॉक्टर्स भी थे जो प्योरली मेडिकल और साइंटिफिक नजरिए से इस सबको ऑब्जर्व कर रहे थे। गेट का ताला खोला गया। जमीन की मिट्टी जहां फसल बिल्कुल परफेक्ट कंडीशन में थी और किसी ने कोई छेड़छाड़ नहीं की थी उसे हटाया गया। गार्ड्स ने काफी मेहनत करके उस लकड़ी के बॉक्स को बाहर निकाला। वहां खड़े हर एक इंसान की सांसे अटकी हुई थी। जैसे ही
(10:32) बॉक्स का लॉक तोड़कर उस भारी कफन को खोला गया। अंदर का मंजर देखकर फ्रेंच डॉक्टर्स के होश उड़ गए। साधु हरिदास जी की बॉडी बिल्कुल पत्थर की तरह ठंडी और अकड़ चुकी थी। 40 दिन तक बिना न्यूट्रिशन के होने की वजह से उनकी स्किन पूरी तरह से सिकुड़ कर हड्डियों से चिपक गई थी। उनका सर एक बहुत ही अजीब और अननेचुरल एंगल पर उनके कंधे की तरफ झुका हुआ था। फ्रेंच डॉक्टर्स ने उन्हें चेक किया। उन्हें ना तो कोई पल्स मिली, ना ही दिल की धड़कन सुनाई दी और ना ही बॉडी में कोई हीट मौजूद थी। साइंस की नजर में वो इंसान पूरी तरह से डेड था। सब
(11:14) लोग उन्हें मरा हुआ मान ही रहे थे कि इतने में वहां साधु हरिदास जी के कुछ क्लोज असिस्टेंट्स आ गए। उन्हें पता था कि अभी आगे क्या करना है। उन्होंने सबसे पहले गर्म पानी की पट्टियां ली और साधु के ठंडे पड़ चुके सर और चेस्ट पर रखनी शुरू की। फिर उन्होंने उनकी सिक्योरिटी हुई बॉडी को बड़ी तेजी से और जोर-जोर से रगड़ना शुरू किया ताकि ब्लड सर्कुलेशन वापस लाया जा सके। उनके कान और नाक को ब्लॉक करने वाले वैक्स को खुरच खुरच कर निकाला गया। फिर असिस्टेंट्स ने उनके मुंह में जोर से हवा फूंकनी शुरू की और उनकी जीभ को जो गले में फंसी थी उसको खोलकर वापस नॉर्मल पोजीशन
(11:54) में लाया गया और यह प्रोसेस लगातार एक घंटे तक चलता रहा। वहां खड़े लोग बिना पलके झपके यह सब देख रहे थे और तभी एक बहुत ही चमत्कारी चीज होती है। साधु हरिदास जी की बॉडी में एक हल्की सी मूवमेंट होती है। उनकी धड़कनें अचानक चलने लगती हैं। उनकी नाक से एक गहरी सांस अंदर खींची जाती है और अगले ही पल साधु हरिदास जी अपनी आंखें खोलते हैं। आंखें खोलते ही उनकी नजर सीधे सामने खड़े महाराजा रंजीत सिंह पर पड़ती है और वो उन्हें पहचान लेते हैं। वहां खड़े फ्रेंच डॉक्टर्स और ब्रिटिश ऑफिशियल समझ ही नहीं पा रहे थे कि यह चमत्कार कैसे हुआ। उनके पास इस
(12:33) इंसिडेंट को एक्सप्लेन करने के लिए कोई साइंटिफिक शब्द नहीं थे। 1837 की साइंस के हिसाब से यह बायोलॉजी नहीं बल्कि काला जादू या ब्लैक मैजिक समझा जाने लगा। लेकिन सच तो ये था दोस्तों कि ये ना तो कोई जादू था और ना ही कोई चमत्कार। यह थी एक ऐसी मेंटल टेक्नोलॉजी जिसे आज की मॉडर्न साइंस ने 200 साल बाद समझना शुरू किया। सदियों तक जब भी स्वामी राम जी या साधु हरिदास जी जैसे योगियों के किस्से दुनिया के सामने आए तो लोग दो हिस्सों में बट गए। एक तरफ थे बिलीवर्स जिन्होंने इन योगियों को सिद्ध मान लिया था। जैसे वो इंसान जिसके पास कुछ खास शक्तियां हो जो आम आदमी के
(13:14) पास होना नामुमकिन है। एंड कुछ ने तो इन्हें सुपर ह्यूमन मान लिया और उनकी पूजा तक शुरू कर दी। और दूसरी तरफ थे द स्केप्टिक्स यानी कि आलोचक क्रिटिक्स जिनका मानना था कि यह सब हिप्नोसिस, ट्रांस या दिमाग का हेलुसिनेशन। मॉडर्न ऑब्जर्वर्स हमेशा से यह कहते आए कि जब एक योगी हफ्ते भर बिना खाए पिए ध्यान लगाता है तो उसका दिमाग ऑक्सीजन और न्यूट्रिशन की कमी से हेलुसिनेट करने लगता है और उन्हें लगता है कि उन्हें भगवान दिख गए। लेकिन क्या वाकई ऐसा था? क्या यह योगी हेलुसिनेट कर रहे थे? जब आज के टॉप न्यूरोसाइंटिस्ट ने लॉन्ग टर्म मेडिटेटर्स
(13:54) और हिमालयन योगीस को अपने मॉडर्न एफएमआरआई यानी कि फंक्शनल एमआरआई स्कैनर्स और ईईजी मशीनंस के अंदर लिटाकर टेस्ट किया तो जो सच सामने आया उसने स्केप्टिक्स और बिलीवर्स दोनों को ही गलत साबित कर दिया। वो रिजल्ट क्या था? इसको समझने के लिए हमें एंशिएंट इंडिया के सबसे पुराने और साइंटिफिक डॉक्यूमेंट को देखना होगा। महर्षि पतंजलि के योग सूत्रास अगर आप इस टेक्स्ट को ध्यान से पढ़ेंगे तो आपको रियलाइज होगा कि इसमें कहीं भी ब्लाइंड फेथ यानी कि अंधविश्वास या चमत्कार की बात नहीं की गई है। एंशिएंट योगी इस दिमाग को भगवान का आशीर्वाद नहीं बल्कि एक कंप्यूटर
(14:35) मानते थे और पतंजलि ने उस कंप्यूटर को कंट्रोल करने का एक पूरा स्टेप बाय स्टेप एल्गोरििदम लिख दिया था। इस फ्रेमवर्क को उन्होंने अष्टांग योग यानी कि एट लिम्स ऑफ योगा कहा। लोग ही मानते थे कि आप अपने माइंड को सीधे कंट्रोल नहीं कर सकते। इसीलिए वो उसे फिजिकल लेवल से हैक करते थे। उनका सबसे बड़ा टूल था प्राणायाम यानी कि ब्रेथ वर्क। वो जानते थे कि सांस और नर्वस सिस्टम का डायरेक्ट कनेक्शन है। साधु हरिदास जी ने भी जमीन के अंदर हिचारी मुद्रा और अपनी सांसों को स्लो करते हुए एग्जजेक्टली अपने ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम को कमांड दी थी कि बॉडी को शट डाउन कर दो।
(15:17) उनका अगला स्टेप था प्रत्याहारा सेंसरी विथड्रॉल यानी कि अपने नाक और कान बंद करके और दिमाग को बाहर की दुनिया से पूरी तरह कट ऑफ कर देना। यह एंशिएंट योगी उन ट्रू साइंटिस्ट की तरह थे जिनका मानना था कि मेडिटेशन और ब्रेथ वर्क कोई धार्मिक रिचुअल नहीं है। यानी अगर स्टेप बाय स्टेप प्रोसीजर को कोई भी इंसान सही से फॉलो कर देगा तो वो अपने दिमाग को इस सुपर कंप्यूटर जैसी स्टेट में स्विच कर सकता है। लेकिन जब एक योगी समाधि की स्टेट में पूरी तरह लॉक हो जाता है तो उसके लिए अपने और दुनिया के बीच का फर्क महसूस करना भी बदल सकता है। वैसे अगर आपको नहीं पता हो
(15:57) समाधि के बारे में तो समाधि एक ऐसी स्टेट है जहां आप और यूनिवर्स एक हो जाते हैं। एंड जब योगीज इसे परफॉर्म कर रहे होते हैं तो उनके दिमाग के अंदर बायोलॉजिकली क्या चल रहा होता है इसका एक्सप्लेनेशन आज की मॉडर्न न्यूरो साइंस बताती है। एफएमआरआई स्कैन्स की हेल्प से पता चलता है कि हमारे ब्रेन में एक नेटवर्क हमेशा बैकग्राउंड में चलता रहता है। जिसे डिफॉल्ट मोड नेटवर्क डीएमए कहते हैं। जब आप शांति से बैठते हैं तो आपका दिमाग बंद नहीं होता। उसमें एक नेटवर्क एक्टिवेट होता है जिसे डिफॉल्ट मोड नेटवर्क कहते हैं। यह नेटवर्क आपके पास्ट के थॉट्स, फ्यूचर की ए्जायटीज
(16:35) और आपकी ईगो यानी कि अहंकार को चलाता है। हमारा ब्रेन बॉडी की 20% एनर्जी सिर्फ इस नेटवर्क को चलाने में खर्च कर देता है। यह हमारे ब्रेन की बहुत सारी एनर्जी खा जाता है और हमें हमेशा एक इल्लुजन में रखता है। जब एक योगी डीप ध्यान में चला जाता है तो उस कैंस में देखा गया है कि उनका डीएमएन काफी हद तक डीएक्टिवेट हो जाता है। जैसे ही डीएमएन बंद होता है इंसान का ईगो यानी कि मैं का एहसास खत्म हो जाता है। उस योगी को फील होता है कि उसके और इस पूरे यूनिवर्स के बीच की बाउंड्री मिट चुकी है। एंशिएंट टेक्स्ट में इस स्टेट को अद्वैत
(17:14) यानी कि नॉन डुअल अवेयरनेस या समाधि कहा गया है। दूसरी चीज होती है प्रत्याहारा। सेंसेस को डिस्कनेक्ट करना जो एम्स के एक्सपेरिमेंट में रामानंद ने किया। हमारे दिमाग में एक गेट कीपर होता है जिसे थैलेमस कहते हैं। जब कोई आवाज आती है तो थैलेमस उसे ऑडिटरी कॉर्टेक्स में भेजता है। लेकिन एक एडवांस्ड योगी का दिमाग इस थैलेमस गेट को स्ट्रिक्टली बंद कर देता है। आवाज कानों में जाती तो है पर दिमाग उसे प्रोसेस ही नहीं करता। सदियों से इंसान मेडिटेशन और कॉन्शियसनेस के इन एक्सपीरियंसेस को समझने की कोशिश कर रहा है। लेकिन आज मॉडर्न न्यूरो साइंस के पास
(17:53) एफएमआरआई और ईईजी जैसे टूल्स है जिनकी मदद से साइंटिस्ट्स मेडिटेशन के दौरान हमारे ब्रेन में होने वाले चेंजेस को मेजर कर सकते हैं। यानी जिस एक्सपीरियंस को हम पहले सिर्फ स्पिरिचुअल या मिस्टिकल नजरिए से समझते थे, आज साइंस उसके पीछे होने वाली ब्रेन एक्टिविटी को भी स्टडी करने में सक्षम है। अब आता है सबसे बड़ा पैराडॉक्स। नॉर्मल मेडिकल साइंस कहती है कि जब सेंसरी डेप्रिवेशन होती है यानी ना कोई आवाज ना रोशनी बॉडी एकदम डेड स्टेट में तो दिमाग स्लीप मोड या जिसे कहते हैं कोमा में चला जाता है। पर जब लैब में योगिस के ब्रेन वेव्स को नापा गया तो वहां
(18:35) डेल्टा या थीटा वेव्स जो नींद में आती हैं बहुत कम हो चुकी थी। वहां एक्सप्लोजन हो रहा था सिर्फ गामा वेव्स का। गामा वेव्स हमारे ब्रेन की सबसे हाई फ्रीक्वेंसी वेव्स होती हैं। यह तब प्रोड्यूस होती हैं जब इंसान का दिमाग अपने एब्सोल्यूट पीक प्रोसेसिंग और एक्सट्रीम हाइपरफोकस पर काम कर रहा होता है। यानी बाहर से देखने पर स्वामी राम या साधु हरिदास जी की बॉडी बिल्कुल डेड लग रही थी। उनकी सांसे रुकी हुई थी। हार्ट बीट बंद थी। लेकिन अंदर ही अंदर उनका दिमाग किसी सुपर कंप्यूटर की तरह एक अलग ही डायमेंशन में हाईएस्ट अलर्टनेस के साथ ऑपरेट कर रहा था। यह
(19:13) हेलुसिनेशंस नहीं थे। यह प्योर रियलिटी थी। तो कुल मिलाकर दोस्तों इन सब प्रूफ्स, हिस्टोरिकल टेक्स्ट और मॉडर्न न्यूरो साइंस की रिसर्च से एक बात तो साफ हो जाती है कि इन योगीस के पास कोई मैजिकल इनबिल्ट सुपर पावर्स नहीं थे। इन्होंने बस इस इंसानी शरीर को अच्छे से समझा और इसकी कैपेबिलिटीज को बड़ी बारीकी से महसूस कर लिया था। लेकिन फिर आज के टाइम में जब साइंस इतना आगे बढ़ चुका है तब हमें ऐसे महान योगीस देखने को क्यों नहीं मिलते? वजह है कि एक ट्रेडिशनल योगी अपने दिमाग को फोकस करने के लिए बाहर की हर [संगीत] डिस्ट्रैक्शन को जीरो कर देता था। वहीं आज
(19:51) का इंसान अपने दिमाग को हजारों हिस्सों में तोड़ चुका है। आज हमारा डिफॉल्ट मोड नेटवर्क सोशल मीडिया की एंडलेस स्क्रॉलिंग, कांस्टेंट नोटिफिकेशंस, स्ट्रेस और इजी डोपामिन हिट्स की वजह से 24 घंटे हाइपर एक्टिव रहता है। एंड आज की रियलिटी यह है कि हम नॉर्मल फोकस भी 10 मिनट ठीक से नहीं कर पाते। तो समाधि और नर्वस सिस्टम को ओवराइड करना तो बहुत ही दूर की बात है। साधु हरिदास और स्वामी राम जी की यह कहानियां और यह मॉडर्न रिसर्चेस आज हमें सिर्फ हिस्ट्री या साइंस नहीं सिखाती। यह हमें बताती हैं कि इस इंसानी शरीर और दिमाग की लिमिट्स वहां खत्म नहीं
(20:27) होती जहां बायोलॉजी की टेक्स्ट बुक्स कहती हैं। बल्कि ये वहां से शुरू होती हैं। योगियों की कहानी हमें सुपर पावर्स के बारे में नहीं बताती। वो हमें ह्यूमन कैपेबिलिटीज की पॉसिबिलिटीज के बारे में बताती है और हो सकता है हम अभी तक इंसान की असली लिमिट्स के आसपास भी नहीं पहुंचे। मे बी वी डोंट इवन नो व्हाट अ ह्यूमन बीइंग इज ट्रूली कैपेबल ऑफ ऑलवेज योर भाई अरविंद खानिया।

No comments:

Post a Comment