Secrets of Patanjali Yog Sutra to Reprogram Your Subconscious Mind | Dr. Shikha Podcast 100
Author Name:Dr. Shikha Sharma Rishi
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Title: Secrets of Patanjali Yog Sutra to Reprogram Your Subconscious Mind | Dr. Shikha Podcast 100
Author Name: Dr. Shikha Sharma Rishi
Description: How can you reprogram your subconscious mind and move closer to the life you desire? In Dr. Shikha Podcast 100, explore the power of the subconscious mind, manifestation, and the beliefs that shape your everyday choices with Dr. Jitendra Adhia. Discover fresh perspectives on limiting beliefs, mind power, positive thinking, and self-belief. Join Dr. Shikha Sharma Rishi for a thought-provoking conversation about aligning your mindset and actions with your goals. Watch the full episode, share your biggest takeaway in the comments, and subscribe for more conversations on personal growth and mindful living.
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Time Stamps :
(00:00) Introduction
(01:32) Journey from MBBS to Mind Power
(03:09) Difference between Brain & Mind
(05:11) Power of Mind
(09:35) Conscious vs SubConscious Mind
(11:55) Negative Programming of Subconscious Mind
(13:31) 5 Programming Languages of Conscious Mind
(17:39) Memories of Past Life
(24:35) Acres of Diamond Book Lesson
(26:38) Patanjali Yog Sutra
(36:52) Positive vs Negative Thoughts
(50:43) 5 Vrittiyan according to Patanjali Yog sutra
(53:57) Past Painful Memories & Subconscious Reprogramming
(1:08:35) Guided Meditation to Reprogram Subconscious Mind
Disclaimer: This video is intended solely for educational purposes and opinions shared by the guest are his/her personal views. We do not seek to defame or harm any person/brand/product mentioned in the video. Our goal is to provide information to help audience make informed choices.
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Transcript:
(00:00) हमारे सबकॉन्शियस माइंड में बहुत पावर होती है जिससे कि हम अपनी लाइफ में जो चाहे वो मैनिफेस्ट कर सकते हैं। लेकिन हमारे कॉन्शियस माइंड में भी उतनी ही ज्यादा पावर होती है क्योंकि वो हमारे सबकॉन्शियस माइंड को चलाता है। इतना सारा कंफ्यूजन है। योग मतलब हम यही समझते हैं कि वो गार्डन में जो होता है सुबह-सुबह में और जो टीवी पर रामदेव बाबा दिखाते हैं वो योग है। वो योग नहीं है। वो कौन सी एक प्रॉब्लम है जिसकी वजह से हमारी लाइफ में बाकी सारी प्रॉब्लम्स होती है। उनका रूट कॉज क्या होता है? आपका मन अच्छा नहीं है, शांत नहीं है, अशांत मन है
(00:32) तो कैंसर, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन सब बीमारियां शुरू कर। कौन सा एक वो तरीका है जिससे कि हम अपनी लाइफ की हर एक प्रॉब्लम को सॉल्व कर सकते हैं। फिल्म आई थी ओम शांति ओम जिसमें शाहरुख खान हाथ में दारू का बोतल लेके विजुअलाइज कर रहा है। फिल्मफेयर अवार्ड मगर वो अगले जन्म में मिलता है उसको। विजुअलाइज ये जन्म में किया मिलता है अगले जन्म में। तब समझ में आया कि ये मेमोरी के हार्ड डिस्क आपका प्रोग्रामिंग लेके ही आगे जाते हैं। यंग दिखना चाहते हो या फिर करियर में आगे बढ़ना चाहते हो। अपनी लाइफ के हर एक एरिया को हम कैसे इंप्रूव कर सकते हैं?
(01:00) सुसाइड कौन करता है? कोई नॉर्मल इंसान करेगा? डिस्टर्ब माइंड वाला ही करेगा। अगर पहले से उनको ट्रेनिंग दी जाती होती है कि मन को कैसे शांत रखना है तो क्यों सुसाइड करेगा? इन सब चीजों के बारे में आज जानने के लिए हमारे साथ हैं डॉक्टर जितेंद्र अडिया जिन्होंने कि 135 बुक्स ऐसी लिखी हैं जो कि लोगों की लाइफ में मेजर ट्रांसफॉर्मेशन लेकर आ रही हैं। [संगीत] तो आज हम आपसे सबकॉन्शियस माइंड की पावर के बारे में जानने वाले हैं। जिसके बारे में आजकल बहुत बात होती है कि सबकॉन्शियस माइंड से ही हम उसको रीप्रोग्राम करके अपनी लाइफ में जो चाहे वह लेकर आ सकते
(01:32) हैं। पर उसके बारे में जानने से पहले मैं आपसे यह जानना चाहती हूं कि आप एक डॉक्टर हैं। आपका इंटरेस्ट इस फील्ड में कैसे आया? वेरी गुड क्वेश्चन। सब लोग यही पूछते हैं कि मैं एलोपैथी डॉक्टर होते हुए 30 साल मेडिकल फील्ड में काम करके मैं कैसे ये फील्ड बदल दिया? तो पहला सवाल यह है कि कोई भी बड़ा डिसीजन हो या शिफ्ट होता है ना तो उसमें दो फैक्टर होते हैं। पुश फैक्टर एंड पुल फैक्टर। पुश फैक्टर मेरे लिए क्या था? बिकॉज़ आई वाज़ नॉट हैप्पी विद माय जॉब। मैं मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर था। वहां इतना पॉलिटिक्स थी, गंदी पॉलिटिक्स थी कि बात
(02:03) भी नहीं कर सकते। इतनी गंदी पॉलिटिक्स थी। तो मुझे लगता था यहां मेरा ग्रोथ नहीं है। आई वास नॉट हैप्पी। मेरे बॉस के साथ मेरी बहुत टक्कर होती थी। झगड़े होते थे। तो मैं कुछ बाहर निकालने का रास्ता ढूंढ रहा था। मगर जब तक बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिले तब तक तो वहां टिके रहना चाहिए। इतने में मुझे किसी ने बुलाया कुछ एक्स्ट्रा सब्जेक्ट के ऊपर बोलने के लिए और मैंने सब्जेक्ट सिलेलेक्ट किया पावर ऑफ सबकॉन्शियस माइंड। तब मैं जोसेफ मर्फी को पढ़ रहा था। तो मैंने बोला मैं पावर ऑफ माइंड के बारे में बोलूंगा और उसने मुझे बुला लिया और मैं पहला लेक्चर दिया वह
(02:35) जमाना 30 35 साल पहले तो बोर्ड में लिख के तब टेक्नोलॉजी थी ही नहीं कॉन्शियस माइंड सबकॉन्शियस माइंड ऐसा मैंने समझाया 300 बच्चे थे इंटरनेशनल कैंप था उसमें आए थे जैसे ही मैंने खत्म किया और बाहर निकला सब बच्चे मेरे पीछे पीछे ऑटोग्राफ फोटोग्राफ के लिए मैं कभी ऐसा सोचा भी नहीं था मैं तो हैरान हो गया मैंने क्या कर दिया ये सब लोग मेरे पीछे इतना क्यों पड़े हैं फिर मैंने रियलाइज़ किया दो चीज कि यह टॉपिक सबको पसंद आएगा। सबके काम के लिए है और यह मैं अच्छा सिखा सकता हूं क्योंकि इतना अच्छा रिस्पांस देगा। उसके बाद मैंने सोच
(03:06) लिया कि मुझे रास्ता मिल गया अब इसे निकालने का मेडिकल कॉलेज से। तो सबकॉन्शियस माइंड पे आप कहते हैं कि काम करके लोगों का मतलब जिंदगी में ट्रांसफॉर्मेशन आ जाती है। पूरा जिंदगी उनकी बदल जाती है। बिल्कुल अगर सही समझे और इस्तेमाल करें तो आ जाती है। बिल्कुल बिल्कुल। तो जो हम सबकॉन्शियस माइंड हमारा है तो हम अगर स्टार्टिंग से इसको समझें कि अगर कोई पहली बार ही सुन रहा है सबकॉन्शियस माइंड के बारे में तो ये सबकॉन्शियस माइंड होता क्या है? मतलब माइंड ही हमने आज तक सुना है कि माइंड पहली बात तो ये है कि माइंड क्या होता है? लोगों को ये नहीं पता। हमारे मेडिकल
(03:34) डॉक्टर को भी पता नहीं है। अब कोई मेडिकल एलोपैथी डॉक्टर को पूछो कि माइंड क्या है? तो नहीं बताएंगे क्योंकि हमें मेडिकल कॉलेज में माइंड के बारे में कुछ सिखाते ही नहीं है। सिर्फ ब्रेन के बारे में सिखाते हैं और लोगों को यह भी कंफ्यूजन है कि दोनों सेम है या डिफरेंट है। इट इज डिफरेंट। दोनों सेम नहीं है। कंप्यूटर की भाषा में बात करें तो आसान है। ब्रेन इज द हार्डवेयर एंड माइंड इज द सॉफ्टवेयर। ब्रेन एक पदार्थ है। बॉडी का एक पार्ट है जिसको देख सकते हैं, छू सकते हैं, काट सकते हैं। उसका नाश कर सकते हैं। फोटो निकाल सकते हैं। ऑपरेशन कर सकते हैं। जो
(04:04) हमारी खोपड़ी में रहता है। मन है वह एक अदृश्य शक्ति है। बिजली जैसी शक्ति है। वैसे एक अदृश्य शक्ति है। जिसको नहीं देख सकते हैं। नहीं छू सकते, नहीं काट सकते, नहीं फोटो निकाल सकते हैं। नहीं उसका नाश कर सकते हैं। उसमें तो तीन चॉइस है। या यूज करो अच्छी तरह फायदा होगा। नहीं यूज करो कुछ भी नहीं होगा और मिसयूज करो तो नुकसान होगा क्योंकि यह शक्ति है। तो मैं जो सिखाता हूं माइंड के बारे में सिखाता हूं। थोड़ा सा ब्रेन के बारे में सिखाता हूं क्योंकि हार्डवेयर और मैं हमेशा कहता हूं हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर ब्रेन हमारा हार्डवेयर है। माइंड सॉफ्टवेयर है। दोनों
(04:37) की जरूरत होती है तब काम होता है। तो मैं अभी तक मैं सॉफ्टवेयर के बारे में सिखाता था। और यह मैंने पतली युग सूत्र में सुना कि हार्डवेयर को भी आप अपग्रेड कर सकते हैं। न्यूरोप्लास्टिसिटी में सुना कॉन्शियस माइंड को अपग्रेड कर सकते हैं। तो अब मेरा और दायरा बढ़ गया कि अब मैं दोनों के बारे में ज्यादा सिखाता हूं। कॉन्शियस माइंड एंड सबकॉन्शियस माइंड दोनों के बारे में एंड ब्रेन के बारे में। तो धीरे-धीरे इसके अंदर आ गया। तो हमारा जो मन है वह एक हमारे शरीर का शक्ति का केंद्र है यानी कि सॉफ्टवेयर है और यह सॉफ्टवेयर को जितना ज्यादा समझेंगे उतना
(05:11) फायदा होगा। हार्व यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विलियम जेम्स ने कहा था कि दुनिया के सफल से सफल इंसान ने भी अपनी मन की शक्तियों का कभी 10% से ज्यादा इस्तेमाल नहीं किया। तो मैंने यह सुना तो मेरे मन में सवाल उठा कि ऐसा क्यों होता है कि 10% से ज्यादा कोई इस्तेमाल ही नहीं करता। फिर मेरी रिसर्च यह कहती है कि इसका सिर्फ और सिर्फ कारण इग्नोरेंस है। किसी को इसके बारे में पता नहीं है। जब मैंने स्टार्ट किया तो लाखों में एक आदमी जानता था। अभी भी 100 में से एक आदमी जानता है। वो भी थोड़ा बहुत जानता है। तो मैं अज्ञानता की बात करता हूं। हम
(05:41) तो देखिए मैंने मेनटन में प्रोग्राम किया था। जहां रिटायर्ड डॉक्टर आते हैं। जिसकी पूरी जिंदगी न्यूयॉर्क के मेनटन में बीती हुई है। 200 लोग थे। मैंने उनको सबसे पहले सवाल पूछा। हाउ मेनी ऑफ यू नो अबाउट द पावर ऑफ़ सबकॉन्शियस माइंड? रे योर हैंड? कितने हाथ ऊपर वो होंगे सब मेडिकल डॉक्टर थे। कितने हुए होंगे? एक भी नहीं। एक भी नहीं। मैंने लॉस एंजेलिस के डॉक्टर के लिए किया था। सेम क्वेश्चन नो रिसोंड। मैं जर्मनी गया था। जर्मनी में स्टूडगार्ड यूनिवर्सिटी है जहां BMW बनती है। तो वहां के प्रोफेसरों को मैं ट्रेनिंग दे रहा था।
(06:14) ऐसी जगह पे मैं खास पूछता हूं कि हाउ मेनी ऑफ यू नो अबाउट द पावर ऑफ़ सबक? वहां भी कोई नहीं जानता था। देखो इतना एडवांस शेयर में तो कितनी सारी अज्ञानता है। तो हमारे लिए कितना स्कोप है कि अगर यही सिखाते सिखाते हमारी जिंदगी पूरी हो जाए फिर भी डिमांड [गला साफ़ करने की आवाज़] पूरी नहीं होगी। इतनी डिमांड है। सिर्फ लोगों को पता नहीं है कि माइंड पावर सीखने से हमारे जीवन में क्या परिवर्तन आ सकता है। क्या रिजल्ट मिल सकता है। वैसे तो आजकल बहुत सारे ट्रेनर बोलते हैं मैनिफेस्टेशन, लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन। तो आजकल तो बहुत है। मैं तो 30 साल पहले शुरू किया ना तब तो
(06:45) बिल्कुल खाली था सब कुछ और मेरा तो एक बार ऐसा ही हुआ था कि एक ऑडिटोरियम में प्रोग्राम था जो हाउसफुल हो गया था। बाद में ₹100 की मेरी एंट्री टिकट 500 में ब्लैक में बिकी थी। तो मुझे लगा यार क्या हो गया ये तो एक जमाने में अमिताभ की फिल्मों की टिकट ब्लैक में मैं लिया करता था। आज लोग मेरी टिकट खरीद रहे सुनने के लिए पावर ऑफ सबकॉन्शियस माइंड। तो जमाना था मगर अब तो बहुत कुछ बदल गया। मेरा नॉलेज बदल गया। स्टाइल बदल गई। टेक्नोलॉजी आ गई। कंपिटिट आ गए तो और इंप्रूव करना पड़ा। यह सोशल मीडिया आ गया। पूरा जमाना चेंज हो गया। बट बेसिकली यह नॉलेज सबके
(07:20) पास जाना चाहिए कि सबकॉन्शियस माइंड को हम कैसे इस्तेमाल करें और जीवन को कैसे बदले और यूजुअली क्या होता है? सबके बड़े-बड़े सपने होते हैं। सपने देखता है हमारा कॉन्शियस माइंड। जबकि पूरा करने में हमें हेल्प की जरूरत होती है सबकॉन्शियस माइंड की। जो लोग जानते नहीं है तो सपने अधूरे रह जाते हैं तो डिप्रेशन में जाते हैं या क्रिमिनल बन जाते हैं या फ्रस्टेटेड होके रहते हैं तो यही हमारा प्रयास होना चाहिए कि लोग अपने पावर को समझे वैसे सीक्रेट आने से और हमारा काम आसान हो गया सीक्रेट तो पिछले 10 12 साल में आया मगर फिर भी बहुत आसान हो गया क्योंकि इतने लोगों ने
(07:53) देखा कि अब लोग समझने लगे कि कुछ नया सीखने से जीवन में बदलाव आ सकता है तो लोगों को सीखना चाहिए सपने देखना और सपने पूरे करने का जो विज्ञान है जो मैं सिखाता हूं वह करना चाहिए। बिलकुल तो जैसे मैंने कहा कि माइंड इज अ सॉफ्टवेयर। ब्रेन इज अ हार्डवेयर। दो माइंड होते हैं। कॉन्शियस माइंड एंड सबकॉन्शियस माइंड। कॉन्शियस माइंड इ हैज़ ओनली 10% पावर 90 पावर 90% पावर इज़ वि सबकॉन्शियस माइंड। तो दोनों का ज्ञान हुआ और उसका कैसे कॉम्बिनेशन करके हमें सफलता पानी है। सीख लिया तो जीवन में उजाला ही उजाला आया। हमारे जीवन में संघर्ष है ही नहीं। संघर्ष
(08:30) हमने पैदा किया। अज्ञानता की वजह से एक बार यह ज्ञान आ गया और उसके रास्ते पर चले मेरा जीवन पूरा बदल गया। जो लोग मुझे पहले से जानते हैं उसको पता है कि मैं क्या था और कहां पहुंच गया। जस्ट बिकॉज़ ऑफ़ दिस नॉलेज पावर ऑफ़ सबकॉन्शियस माइंड। तो लोगों को हमें यही सिखाना है कि इसके बारे में सीखो। बिल्कुल सही बात है। जो तो जो अज्ञानता है इस समय पे वो आज के पॉडकास्ट से हम काफी हद तक अपनी तरफ से कोशिश करेंगे कि जरूर करें और वो अपने अंदर से ही वो बदलाव लेकर आए जिससे कि उनके जो भी सपने हैं वो उसको पूरे कर सकें। तो जैसे कि आपने बात करी
(09:00) क्योंकि जो मोस्टली लोग बात करते हैं वो यही कहते हैं कि कॉन्शियस माइंड से ज्यादा सबकॉन्शियस माइंड के ऊपर फोकस करना है। हमें सबकॉन्शियस माइंड की पावर है। आपने कहा कॉन्शियस और सबकॉन्शियस दोनों को हम साथ में लेकर चलेंगे। दोनों में वो पावर है कि वो हमारी उस जिंदगी को लेकर आ तो हमारी जो जिंदगी जो हम चाहते हैं हम वो जी सकते हैं दोनों माइंड को अपने उसकी नॉलेज उसको कैसे यूज करना है एक्सैक्टली जानकर। सिखाएंगे आज। जी बिल्कुल सही बात है। तो हम शुरुआत करते हैं पहले सबकॉन्शियस माइंड से जो कि 90% हमारी लाइफ को कॉन्शियस माइंड काम करता
(09:29) है। कॉन्शियस माइंड से करा तो अच्छा रहेगा। ठीक है। तो फिर हम सब हम शुरुआत करते हैं पहले कॉन्शियस माइंड से जो कि आपने बोला कि जिसको कि हम मोस्टली यूज़ कर रहे होते हैं जो सामने हम देख रहे होते हैं जो कॉन्शियस है हमारा तो उसमें हमें क्या बदलाव लेकर आना चाहिए कि हमारी जिंदगी में बदलाव आ सके। पहली बात तो जैसे मैंने बताया कॉन्शियस माइंड के पास सिर्फ 10% पावर है। मगर कौन से कौन से पावर्स हैं? थिंकिंग सोचना लॉजिक तर्क लड़काना एनालिसिस इंटरप्रिटेशन जजमेंट डिसीजन सिलेक्शन कैलकुलेशन विल पावर और एक्शन लेना इतने पावर्स है जो हम
(10:07) कॉन्शियसली यूज़ करते हैं। लोगों को पता है कि ये पावर हम यूज़ करते हैं। तो ये आपने कॉन्शियस माइंड के बारे में बताया। ऐसे ही हमारे सबकॉन्शियस माइंड की क्या पावर्स होती हैं? तो जैसे मैंने बताया यह पावर कॉन्शियस माइंड के हैं। अब सबकॉन्शियस माइंड का पावर देखें तो उसके तो 90% है तो बहुत होंगे। तो उसमें से मेन पावर मैं आपको बता दूं। जैसे मैंने कहा कि कोई भी हमारी इच्छा को हकीकत में बदलना है। गोल को अचीव करना है तो सबकॉन्शियस माइंड करेगा। तो मेन उसका क्या पावर है कि एक बार आपने उसको फीड कर दिया तो आपके गोल को हकीकत में बदलने में वह काम करेगा। तो
(10:39) उसके पास मेमोरी पावर होता है। यानी आपने जो भी उनको कमांड दे दिया। हां, एक बात खास बताना है कि दोनों के रिलेशनशिप क्या है? कॉन्शियस माइंड बॉस है, सबकॉन्शियस माइंड सर्वेंट है। यानी बॉस जो चाहेगा वो सबकॉन्शियस माइंड को देना पड़ेगा। अलादीन के जादुई चिराग की कहानी है। उसमें जो अलादीन था वो कॉन्शियस माइंड था। जीनी था वो सबकॉन्शियस माइंड था। और जो चिराग था वो हमारा ब्रेन है। तो अगर अलादीन को यह ट्रेनिंग दी जाए कि जीनी को कैसे जगाना है और कैसे ऑर्डर देना है तो उनके हर सपने पूरे होंगे। और एक भाषा में बात करें तो कॉन्शियस माइंड इज द प्रोग्रामर एंड
(11:13) सबकॉन्शियस माइंड इज द प्रोग्रामेबल कंप्यूटर। हमारे जीवन में हम जो भी डिसीजन एक्शन लेते हैं उससे हमें रिजल्ट मिलता है और यह डिसीजन और एक्शन हमारे पुराने प्रोग्राम से आता है। बचपन से ले अभी तक हमने जो भी अनुभव किए हैं उससे हमारा एक प्रोग्रामिंग हो चुका है। जैसे कंप्यूटर प्रोग्रामिंग होता है और वह हमारे जीवन को डिक्टेट करता है। अगर हमारे जीवन में हमें चाहिए वैसा रिजल्ट नहीं है तो इसका मतलब यहां कहीं प्रोग्रामिंग में गड़बड़ है। तो यह प्रोग्रामिंग हमें चेंज करना पड़ेगा और यह प्रोग्रामिंग चेंज करने का काम हमारा प्रोग्रामर यानी कि कॉन्शियस माइंड करेगा।
(11:45) तो मैं यह सिखाता हूं कि आप सबकॉन्शियस माइंड के अंदर जो प्रोग्राम पड़ा है जो गलत है जिसकी वजह से आपको चाहिए वो रिजल्ट नहीं मिलता उसको कैसे बदलना है। तो यह बेसिक ज्ञान रहता है। तो जैसे आपने बताया कि हमारे कॉन्शियस माइंड के पास ये ये सारी पावर होती है थिंकिंग की उसकी और मेन तो क्या हम मेन जो आपने कहा कि जो गड़बड़ होती है जिसकी वजह से हमारी जिंदगी में नहीं हम वो चीजें कर पा रहे होते। आपने कहा कि वो गड़बड़ हुई होती है अंदर प्रोग्रामिंग में तो क्या वो कॉन्शियस माइंड में गड़बड़ हुई होती है और अगर है तो दोनों में हुई होती है।
(12:12) मेनली सबकॉन्शियस माइंड में गड़बड़ होती है। और वो किस तरीके से गड़बड़ होती है कि हम कॉन्शियसली करते हैं उन गड़बड़ों वो आगे जाके बताऊंगा मैं आपको। देखिए मैंने कहा कि हमारा जो जीवन है वो हमारा सबकॉन्शियस माइंड में जो प्रोग्राम पड़ा है उसका रिजल्ट है। तो अगर जीवन में जो हमें चाहिए वो नहीं है या बहुत ज्यादा नेगेटिव है तो हमारा बचपन से लेके नेगेटिव प्रोग्रामिंग हुआ है। वो कैसे हुआ है? हमने बचपन से लेकर अभी तक जो भी अनुभव किए फैमिली में, स्कूल में, कॉलेज में, समाज में यह अनुभव हमारा प्रोग्रामिंग बनाता जाता है। तो जिनके
(12:43) जीवन में ऐसी नेगेटिविटी बहुत थी फैमिली के अंदर थी जैसे फादर एंड मदर का झगड़ा चल रहा था, डवोर्स का केस चल रहा था तो नेगेटिव प्रोग्रामिंग होता है। फैमिली में और दो चार लोग नेगेटिव थे। वो इनको टोकते रहते हैं तो नेगेटिव प्रोग्रामिंग हो जाता है। तो ये सब अनुभव से हमारा नेगेटिव प्रोग्रामिंग हो जाता है जो हमें जीवन में दुख की तरफ ले जाता है। तो ऐसे हमारा प्रोग्रामिंग बनता है। तो अभी हमें वो प्रोग्रामिंग को लेके भगवान को दोष देके या थैंक यू कह के जीना नहीं है। क्योंकि अभी का साइंस यह कहता है कि यू कैन चेंज योर प्रोग्राम एनी टाइम। इसके लिए आपको
(13:15) सीखना पड़ेगा। कॉन्शियस माइंड को अलर्ट बनना पड़ेगा। ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी कि यह प्रोग्रामिंग कैसे चेंज करें। और जैसे कंप्यूटर में प्रोग्रामिंग की लैंग्वेज होती है ऐसे यहां भी प्रोग्रामिंग की लैंग्वेज होती है। पांच लैंग्वेज है उसकी। पांच में से कोई भी एक लैंग्वेज यूज करो। पांचों के पांचों भी यूज़ कर सकते हैं। तो पहली लैंग्वेज है इंटेंशन संकल्प शक्ति। व एंड डार ने किताब लिखी है पावर ऑफ इंटेंशन। जब आप कोई भी चीज का संकल्प कर लेते हो तो ऑटोमेटिकली सबकॉन्शियस माइंड को कमांड चल चला जाता है कि बॉस को यह चाहिए। दूसरा है आइडेंटिफिकेशन। आप किसी
(13:49) को रोल मॉडल बना दो। जैसे मैं यह फील्ड में आया तो मैं टोनी रोबिनस के बारे में सुनता था। इंडिया में तो कोई ट्रेनर था ही नहीं। तो मेरे रोल मॉडल वही थे टोनी रोबिनंस। तो उसके बारे में सोचा करता था। उनके मैंने दो प्रोग्राम भी अटेंड किए। एक बार लॉस एंडलेस में यूपीw अनलिस्ट दी पावर विद इन एक बार बाली जाके मैंने डेट वि डेस्टिनी दो प्रोग्राम किए। उसको देखना चाहता था वो कैसे ऑपरेट करते हैं? कैसे सोचते हैं? बॉडी लैंग्वेज क्या है? तो मेरे रोल मॉडल थे। तो जब आप किसी को रोल मॉडल बना लेते हो, उसके बारे में सोचते हो, उसकी स्टडी करते हो, उसको फॉलो करते
(14:18) हो, तो आपके अंदर वह क्वालिटी आने लगती है। तो इट इज आल्सो अ प्रोग्रामिंग लैंग्वेज। तीसरा है विजुअलाइजेशन जिसके बारे में आज दुनिया जानती है। विजुअलाइजेशन है वो चित्र की भाषा है। चौथी है एफमेशन या ऑटो सजेशन जो कहते हैं, सेल्फ टॉक कहते हैं जो भी है और पांचवी है फीलिंग। उसमें सबसे पावरफुल भाषा फीलिंग है। बहुत सारे लोग मुझे बोलते हैं सर मेरे से विजुअलाइज नहीं हो रहा है। मगर फील तो हुआ ना कि तू Mercedes चला रहे हो। बस चित्रण नहीं दिखा तो चलता है। विजुअलाइन के बारे में बहुत ही गलतफहमी है कि विजुअलाइजिंग यानी क्लियर दिखना चाहिए। जैसे सिनेमा हॉल पे
(14:52) दिखता है। विजुअलाइजेशन इज नॉट ऑब्जेक्टिव सीइंग। इट इज़ सब्जेक्टिव फीलिंग। जैसे भूत किसी को नजर से दिखता नहीं है। मगर कुछ लोग बोलते हैं ना कि मुझे भूत [नाक से की जाने वाली आवाज़] दिख गया। भूत का आभास होता है। उनको फील होता है कि मैंने यहां भूत देखा है। विजुला हैं भी ऐसा ही है कि आपको फील होता है। क्लियरली दिखता नहीं है। ओ सब इसलिए लोग ऐसा मानते हैं कि मेरे से विजुला हिंड नहीं होता। कई लोग कहते हैं कि मुझे कुछ नहीं दिखाई दे। नहीं दिखाई दे। मैं कोशिश कर रहा हूं नहीं दिखा रहा है। डोंट वरी नहीं दिखाई दे। तुम फील करो कि तुम Mercedes चला रहे हो। तुम
(15:18) फील करो कि तुम धनवान बन गए हो। देखो फीलिंग का पावर सबसे ज्यादा है। तो ये पांच लैंग्वेज है। पांच में से कोई भी एक लैंग्वेज यूज़ करो रिजल्ट मिलता है। पांचों के पांचों यूज़ करो ना क्या प्रॉब्लम है? फ्री में है। सीख लो बस क्या करना है? सिस्टम से सीख लो के क्या करना है? बस हो जाता है। बिल्कुल सही। तो यह प्रोग्रामिंग लैंग्वेज है। तो मैं यह कहता हूं कि पहले कॉन्शियस माइंड के पावर को समझो। फिर इसकी प्रोग्रामिंग लैंग्वेज को समझो। फिर सबकॉन्शियस माइंड के पावर को समझो और वो आपको कैसे हेल्प कर सकता है अपने मैनिफेस्टेशन के लिए। सपनों
(15:49) को हकीकत में बदलने के लिए यह सीखो। और सब कुछ हो जाएगा। एनीथिंग एंड एवरीथिंग इज पॉसिबल। अब विचार की बात करें तो विचार हमारे कहां से आता है? तो उसका एपिसेंटर हमारे सबकॉन्शियस माइंड में बिलीफ है। जैसे हमारी बिलीफ रहेगी वैसे ही विचार आएंगे। अगर हमारी नेगेटिव बिलीफ रही तो नेगेटिव विचार आएंगे। तो बेसिकली आपको विचार चेंज करना है। देखिए थिंकिंग इज अ हैबिट। हैबिट एंड बिलीफ हमारे सबकॉन्शियस माइंड की पकड़ में रहता है। कंट्रोल में रहता है। और आपने देखा होगा कि थिंकिंग इज अ हैबिट। कुछ लोग हैबचुअली पॉजिटिव थिंकर रहते हैं। कुछ लोग हैबचुअली नेगेटिव थिंकर
(16:23) रहते हैं। यानी हैबिट वहां काम कर रही है। सबकॉन्शियस माइंड डिक्टेट करता है कि तुम्हें कौन से विचार करने हैं। पॉजिटिव थिंकिंग या नेगेटिव थिंकिंग। तो जो हमें रिपेयर करना है वो तो सबकॉन्शियस माइंड के अंदर जाके ही करना है। तो थिंकिंग इज अ हैबिट। दूसरी बात है कि पावरफुल थॉट करना वो भी हमारे प्रोग्रामिंग के ऊपर है। बचपन से ही हमें सिखाया गया है कि बैठ जा तू मत कर तेरे से कुछ नहीं होगा। ये वो तो हमारी बिलीफ बन जाती है कि मैं बड़ा काम कुछ नहीं कर सकता हूं। तो हम बड़ी सोच भी नहीं सकते। 1 लाख, दो लाख की इनकम से ज्यादा
(16:52) कोई सोच ही नहीं सकता है। बहुत कम लोग रहते हैं वो जो लिमिट को तोड़ के सोचते हैं मुझे 1000 करोड़ कमाना है, 2000 करोड़ कमाना है। तो ये सब कुछ जो रिपेयरिंग करना है वो हमें सबकॉन्शियस माइंड में करना है। तो ऑटोमेटिकली सब कुछ हो जाएगा। दूसरी बात यह है कि मैं अभी तक यही सिखा रहा था कि सबकॉन्शियस माइंड को कैसे इस्तेमाल करें? तो बहुत लोग मुझे पूछते हैं कि क्या आप माइंड को कैसे स्ट्रांग करना सिखाते हो? बोला नहीं स्ट्रांग करना नहीं। माइंड तो स्ट्रांग ही होता है। सबकॉन्शियस माइंड को कैसे इस्तेमाल करना सिखाता हूं। मगर मैं
(17:18) अभी जो सब्जेक्ट के ऊपर काम किया पतंजलि योग सूत्र वह तो पूरा विज्ञान वही है कि कॉन्शियस माइंड को कैसे स्ट्रांग करें। पूरा विज्ञान है उसके ऊपर। बहुत बियों्ड माइंड पावर है। मैं सोचा वहां जो मेरे पार्ट में मिसिंग था वो तो मुझे मिल गया। तो अब मैं ज्यादा उसके ऊपर कहता हूं कि पहले कॉन्शियस माइंड बॉस को स्ट्रांग बनाओ ताकि वो सबकॉन्शियस माइंड का ज्यादा इस्तेमाल कर सके। तो यह हुआ कॉन्शियस माइंड। अब सबकॉन्शियस माइंड क्या करता है? सबसे पहले तो उसके पास मेमोरी की हार्ड डिस्क होती है। जो भी हम सपने देखते हैं, विजुलाइज़ करते हैं, बोलते हैं, सब
(17:47) सबकॉन्शियस माइंड में रिकॉर्डिंग में चला जाता है। और यह रिकॉर्डिंग परमानेंट होता है। जन्मोजन्म तक चलता है। वो प्लेन में ब्लैक बॉक्स रहता है ना ऐसा ब्लैक बॉक्स ऐसा रहता है। हम मर जाते हैं तो हमारा शरीर नाश हो जाता है। ब्रेन का नाश हो जाता है। और कॉन्शियस माइंड उसके साथ डिस्ट्रॉय हो जाता है। मगर हमारा जो आत्मा है, जो सबकॉन्शियस माइंड है, उसको मैं आत्मा कहता हूं। वह नई बॉडी में जाकर नया जन्म लेता है तो मेमोरी की हार्ड डिस्क वहां ट्रांसफर होती है। इसलिए लोगों को पिछला जन्म याद आ जाता है और पिछले जन्म का विजुलान का यह जन्म में भी इफेक्ट
(18:20) आएगा। मुझे बहुत लोग पहले पूछते थे हम ऐसा देखते हैं कुछ बच्चे बचपन से पैदा हुए और उनको बीमारियां स्टार्ट हो गई। तो क्या उसने कब बीमारी विजुअलाइज किया था? फिर मुझे जवाब मिला कि यह पिछले जन्म का हो सकता है क्योंकि एक फिल्म आई थी ओम शांति ओम जिसमें शाहरुख खान हाथ में दारू का बोतल लेकर विजुअलाइज कर रहा है फिल्मफेयर अवार्ड मगर वो अगले जन्म में मिलता है उसको विजुअलाइज ये जन्म में क्या मिलता है अगले जन्म में तब समझ में आया कि ये मेमोरी की हार्ड डिस्क आपका प्रोग्रामिंग लेके ही आगे जाती है और वैसे देखो तो हमारा सबकॉन्शियस माइंड वो आत्मा है और
(18:50) बेसिकली हमारी आत्मा की जर्नी है एक बॉडी से दूसरी दूसरी से तीसरी इवोल्यूशन प्रोसेस है और यह इवोल्यूशन करने के लिए ऊपर ऊपर वाले ने हमें यह शरीर और यह माइंड दिया है। कॉन्शियस माइंड दिया है ताकि हमारी ये इवोल्यूशन जर्नी चलती रहे। मगर कुछ लोगों को यह पता नहीं है तो ये जन्म में ही नेगेटिव काम करके अपना और नुकसान कर लेते हैं। इसलिए हमें अच्छे-अच्छे काम करते-करते इवोल्यूशन में जाना चाहिए जो हमारा सबकॉन्शियस माइंड होता है। हजारों साल का प्रोग्रामिंग वहां पड़ा रहता है। एनर्जी की लैंग्वेज में पड़ा रहता है। यह सब मुझे यह पता नहीं। एक सूत्र का तब पता
(19:24) चला। आप पिछले 50 जन्मों तक पहुंच सकते हैं। 100 जन्म तक देख सकते हैं कि आपके साथ क्या हुआ था और आप क्या थे। यह भी टेक्नोलॉजी है। यह जो आज के लोगों को पता नहीं है और यह 2000 साल पहले पतंजलि ऋषि ने सिखाया है और हमारे पास अभी तक पहुंची नहीं। कमाल की बात है। तो कहने का मतलब यह है कि एक बार मेमोरी में आ गया तो सबकॉन्शियस माइंड सबसे पहले क्या करता है? उसके ऊपर प्लानिंग करता है कि इसको कैसे यह गोल तक पहुंचाना है। उसके बाद वह ओपोरर्चुनिटी क्रिएट करता है। ओपॉर्चुनिटी क्रिएट करने के बाद कॉन्शियस माइंड को सिग्नल देता है। सिग्नल देने के उसके
(19:57) तरीके हैं। तो कॉन्शियस माइंड को अलर्ट रहना चाहिए कि मैंने जो सबकॉन्शियस माइंड को ऑर्डर दिया था उसके लिए उसने मेरे लिए क्या ओपोरर्चुनिटी क्रिएट की तो कॉन्शियस माइंड वो ओपोरर्चुनिटी को पहचान के जब डिसीजन और एक्शन लेगा तब रिजल्ट मिलता है। बहुत आपने ये अच्छे से बताया कि जैसे कॉन्शियस जो है वो बॉस है और वो सबकॉन्शियस में इकट्ठी होती चली जाती है चीजें। फिर जो सबकॉन्शियस में है वो हमारी लाइफ में उस तरह की मैनिफेस्टेशंस होती हैं। तो जो सबकॉन्शियस है आपने कहा कि उसमें कई हमारे एक्सपीरियंसेस पुराने पास्ट लाइफ के और वो सब पड़े होते हैं। एक मेरे माइंड
(20:26) में आया था कि तो मतलब एक तरीके से जो भी सबकॉन्शियस में मेमोरी है वही हमारे पैटर्न्स बन रहे हैं आगे लाइफ में। हमारे बिहेवियर के हमारे प्रोग्रामिंग पैटर्न प्रोग्रामिंग हो रही है। तो ये क्या जैसे कि कहते हैं कि हमारे जींस जो होते हैं उनमें भी मेमोरी स्टोर होती हैं। तो क्या ये जो हमारे पूर्वज हैं उनके भी जो एक्सपीरियंसेस रहे वहां से भी क्योंकि कई लोग कई लोग ऐसा कहते हैं कि उनका तो बचपन भी बहुत अच्छा चला गया। सब कुछ बहुत अच्छा रहा। लाइफ में बहुत अच्छा है। फिर भी अंदर से पैटर्न एक फियर का है। डर लगता रहता है। कई अगले जन्म का भी हो सकता है। हो सकता है
(20:55) अगले जन्म में आपने कोई फियरफुल एक्सपीरियंस किया हो। कोई एक्सीडेंट हो कोई भी हो सकता है अभी भी आ सकता है बहुत सारे होता है और यूनिवर्सल एनर्जी कैसे काम करती है उसका मैंने एक देखा था कहीं कि दो अलग-अलग आइलैंड थे जहां पहुंचने का जमीन का रास्ता नहीं था और बड़ा जंगल था दोनों जगह पे तो एक आइलैंड के ऊपर बंदरों को कुछ खास टाइप की ट्रेनिंग दी गई बिहेव करने की और वो ट्रेनिंग उन्होंने एक्सेप्ट कर ली दूसरे जो आइलैंड थे जिसका यह बंदरों के साथ कोई कनेक्शन नहीं था। उनमें वह चेंज देखा गया जो यहां ट्रेनिंग दी गई थी। तो यह यूनिवर्सल एनर्जी कैसे काम करती है?
(21:34) सोच लो जं्स का चक्कर नहीं कुछ नहीं। कोई फिजिकल कांटेक्ट ही नहीं। दोनों जंगल के बंदरों को दोनों आइलैंड के ऊपर थे। तो ऐसा यूनिवर्सल एनर्जी काम करती है। तो कैसे मतलब ये फिर इसमें क्या चीज ने काम किया? नहीं उन्होंने एक्सपेरिमेंट बताया तो अभी वो रिसर्च कर रहे हैं कि ऐसा कैसे हुआ? तो एक यूनिवर्सल सिस्टम रहती है। जैसे हम कॉपी फाइल कॉपी करके दूसरी जगह पेस्ट करते हैं ना यहां से उठा के कॉपी पेस्ट शायद ऐसा होगा भगवान का इंटरनेट है। जो ये बंदरों का जो बिहेवियर था उसको कॉपी किया और वो बाकी के आइलैंड पे जाके वहां के बंदरों को भी उसको पेस्ट कर दिया। उसके
(22:09) अंदर तो उनका बिहेवियर में सेम चेंज आ गया जो ये बंदरों में था। ऐसे भी एक्सपेरिमेंट हुआ है। तो देखिए यह यूनिवर्स कैसे चलता रहता है। दिस इज़ अमेजिंग। तो सबकॉन्शियस माइंड आपको सिग्नल देता है और फिर आपको एक्शन लेना होता है और आपको अलर्ट रहना होता है। सबकॉन्शियस माइंड हमारा एक जीपीएस है। जीपीएस में हम जैसे डेस्टिनेशन डालते हैं तो जीपीएस देख लेता है आपका करंट सिचुएशन क्या है? कहां पे हो आप लोकेशन और कहां पहुंचना है। फिर वह आपको मैप बना के देता है। लेफ्ट राइट लेफ्ट राइट करके आपको पहुंचा देता है। तो सबकॉन्शियस माइंड हमारा जीवन का जीपीएस
(22:42) है। एक बार आपने डेस्टिनेशन डाल दिया कि मुझे यहां तक पहुंचना है। मेरा यह गोल है। फिर वो काम पे लग जाएगा। वो आपको बताना शुरू कर देगा कि गोल लेफ्ट राइट या नहीं। तुम्हें आगे जाके क्या-क्या करना है ताकि अपने गोल तक पहुंचोगे। मेरे जीवन में इतना फास्ट हो गया है कि मैं एक एग्जांपल दूं। सौजी भाई धोड़किया करके एक डायमंड किंग है जो सूरत में जो आजकल बहुत फेमस है। उन्होंने मेरा 2002 में अच्छा एक्सजेक्टली 25 साल पहले सेकंड अक्टूबर इंसिडेंटली कल ही ऐसा आज है कल [हंसी] आज एक्सजेक्टली 25 साल पहले उन्होंने मेरा मुंबई में ताज होटल में डायमंड वालों के
(23:15) लिए प्रोग्राम रखा था और शाम को 6 से 9 था फिर डिनर था और फिर ये होना था 50 500 डायमंड के बड़े-बड़े व्यापारी आए थे मैं अहमदाबाद रहता हूं तो मैं मुंबई पहुंचा था। दोपहर को मैं एक रेस्टोरेंट में लंच ले रहा था और मेरे साथ मेरा एक दोस्त था आशुतोष और वहां एक चाइनीस फैमिली आके खाना खाने को बैठे तो मुझे हांगकांग की याद आ गई क्योंकि उसके कुछ साल पहले मैं सिंगापुर गया था और हांगकांग हमारा बाकी रह गया था। मैं आशुतोष को बोला यार मैं सिंगापुर गया मेरा हांगकांग रह गया। बस इतना याद किया और कुछ नहीं। फिर खाना खाया। फिर थोड़ा रेस्ट किया। फिर तैयार हो
(23:51) के हम ताज होटल गए। वहां मेरा प्रोग्राम चालू हुआ। 1 1/2 घंटे के बाद मैंने ब्रेक दिया। एक आदमी मेरे पास आता है डॉक्टर हट जा मेरा नाम भूपेंद्र सुरानी है। मेरा हांगकांग में डायमंड का बिजनेस है। मुझे आपका प्रोग्राम बहुत अच्छा लगा। मुझे वहां आपका प्रोग्राम करना है। मुझे अभी डेट दे दो। तो मैंने एक महीने के बाद की डेट दी। दूसरे दिन मेरे पास दो हांगकांग की टिकट भेज दी। विद इन 24 आवर सबकॉन्शियस माइंड ने रिजल्ट दिया। मैं बोला वाओ ये तो अमेजिंग है। तो देखिए सबकॉन्शियस माइंड को एक बार ये तो स्ट्रांग कमांड भी नहीं था। मन में विश थी कि हांगकांग देख के आता तो
(24:21) अच्छा रहता था और अचानक यह सब कुछ हो गया। इतने मेरे लाइफ में इंसिडेंट होते हैं कि सोच भी नहीं सकते। तो कहने का मतलब है कि सबकॉन्शियस माइंड को समझ लो। उससे दोस्ती कर लो तो यह सब कुछ पॉसिबल होता है। बस फिर आपको अलर्ट रहना है। और मैंने एक किताब पढ़ी थी जो दुनिया की सबसे ज्यादा मोटिवेशनल किताब है एक फ्रॉफ डायमंड करके। आपने सुना है नाम उसका? नहीं सुना है। वो रसेल कोवेल ने लिखी थी आज से 100 साल पहले जो अमेरिका में फिलाडेफिया में टेंपल यूनिवर्सिटी के स्थापक थे। आज वहां 500 स्टूडेंट पढ़ते हैं टेंपल यूनिवर्सिटी में। उन्होंने एक
(24:54) किताब लिखी थी और स्पीच दी थी जिसका नाम है एक्सफ ऑफ डायमंड। अभी तक का वर्ल्ड रिकॉर्ड है कि एक ही आदमी ने एक ही टॉपिक पे 6ाउ डिफरेंट लोकेशन पे स्पीच दिया हो जिसका नाम है एक्स ऑफ डायमंड। आज इंटरनेट पे अवेलेबल है। 100 साल पुरानी स्पीच। तो उन्होंने यह बात कही है कि हमारे आजू-बाजू एक्स ऑफ डायमंड पड़े हैं। सिर्फ हमारी नजर होनी चाहिए और डायमंड पहचानने के लिए। डायमंड मींस ओपॉर्चुनिटी पड़ी है। टेस्ला वाले को इंडिया में क्यों आना है? क्योंकि उसको यहां ओपॉर्चुनिटी दिखती है। और हम ओपॉर्चुनिटी के लिए अमेरिका या फॉरेन कंट्री जाते हैं। जबकि फॉरेन हमारे यहां
(25:29) आते हैं। तो ये ओपॉर्चुनिटी देखने का काम करता है हमारा कॉन्शियस माइंड। और आपने अगर शिवखरा की वो किताब पढ़ी है यू कैन विन। उसमें पहला चैप्टर में पहली स्टोरी वो एक्सर्स ऑफ डायमंड की स्टोरी है। उसने जो स्टोरी बताई वो इन्होंने यहां लिया है। तो कहने का मतलब है कि हमारे आजू-बाजू ओपोरर्चुनिटी बहुत होती है। हमारा कॉन्शियस माइंड को ऐसे ट्रेनिंग करो कि ओपोरर्चुनिटी को पहचाने और आगे बढ़े। मेरी बात करूं तो जब कोरोना के बाद का समय आया तो मैं बैठा रहता था क्योंकि मुझे ऑफलाइन की आदत थी। मैं ऑनलाइन जाने की कोशिश ही नहीं की। जबकि बाकी मेरे स्टूडेंट कितने
(26:02) ऑनलाइन चले गए। आज उनके लाखों फॉलोअ बन गए। मैं बैठा रहा। मैंने ओपोरर्चुनिटी को पहचाने नहीं या मेरे में आलस आ गई। अब मुझे पता चला कि इसके बिना चलेगा नहीं। तो अब देखो मैं इतने पडकास्ट कर रहा हूं। ऑनलाइन गया फॉलोअ बढ़ाने लगा। तो वो कॉन्शियस माइंड से होता है। अपोर्चुनिटी को पहचानना और उसको ग्रेप करना। समव मैं लेजी हो गया था कि मैं सोचा ऑफलाइन का जब जमाना आएगा फिर करूंगा तब तक आराम कर रहा हूं। ऐसा होता था। तो हमें दोनों माइंड को समझना है और यह करना है। और हाउ फास्ट सबकॉन्शियस माइंड कैन रिसोंड डिपेंड ऑन हाउ क्लोज यू आर टू योर सबकॉन्शियस माइंड।
(26:35) उससे कितनी अच्छी दोस्ती की है आपने उसके ऊपर डिपेंड करता है। तो ये आप तो अभी आपने जैसे कहा कि पतंजलि योग सूत्र पे आपने किताब लिखी और आपने कहा कि उसमें 2000 साल पहले ही इसमें बताया था। तो अब हम सब अपने कॉन्शियस माइंड की वो ट्रेनिंग कैसे करें पतंजलि योगसूत्र को भी उसमें रखते हुए और जो आपने साइंटिफिक स्टडी की उसको भी ध्यान में रखते हुए ताकि वो उन ओपोरर्चुनिटीज को आइडेंटिफाई कर सके। एक्सक्टली जी तो मेरा जो लाइफ में जो मिसिंग ज्ञान था ना वो मुझे पता नहीं योग से मिला। फॉर एग्जांपल कॉन्शियस माइंड का काम है थिंकिंग करना, लॉजिक यूज़ करना, डिसीजन
(27:09) लेना और एक्शन लेना। अब आप ये बताइए कि कॉन्शियस माइंड यह अच्छा कब कर सकता है? जब बहुत डिस्टर्ब और एक्साइटेड रहता है तब या बहुत शांत रहता है तब? यह काम अच्छा कब होता है? शांत। डिसीजन कब अच्छा होता है? शांत मन से होता है। विचार अच्छा कब आता है? जब मन शांत होता है तब? हैं? और आप लॉजिक भी तब काम करेगा जब आपका मन शांत है। डिस्टर्ब माइंड से कैसे होगा और डिसीजन भी आप शांत मन से अच्छा ले सकते हैं। एक्शन भी शांत मन से ले सकते हैं। तो कॉन्शियस माइंड को शांत करने की टेक्नोलॉजी कहां थी जो पता नहीं योग सूत्र के अंदर है कि पहले तो बॉस को
(27:44) शांत करो। उसको अच्छा बना दो, तगड़ा बना दो ताकि वह सबकॉन्शियस माइंड से ज्यादा काम करें। तो अशांत मन ही हमारे हर दुख का कारण है। हर दुख का कारण पतंजलि योगसूत्र में अट्रैक्ट हुआ। उसके भी बहुत सारे कारण है। मैं माइंड पावर सिखाते सिखाते मेरे मन में कुछ सवाल उठते थे जिसका मुझे जवाब नहीं मिल रहा था। माइंड पावर रिलेटेड ही थे। सबसे पहला यह था कि यह भगवान क्या है? और ईश्वर क्या है? दोनों में क्या फर्क है? और वह कौन से रूप में है? एनर्जी के रूप में है, शरीर के रूप में है और मैं कहां मिलूं इसको? और इतने सारे भगवान क्यों है? एक भगवान क्यों नहीं है? मेरे
(28:19) मन में सवाल था जो जवाब कोई नहीं दे पा रहा था मुझे मैं बहुत गुरुओं को पूछा सब गोलगोल घुमाते रहे मुझे जवाब मिला पता नहीं योग क्षेत्र में दूसरा यह था कि महावीर स्वामी को बुद्ध भगवान को दादा लेखराज को जो अंदर से ज्ञान आया आत्मबोध कहते हैं हम तो कैसे हुआ उसकी टेक्नोलॉजी क्या है क्योंकि मैं अभी तक सिखा रहा था बाहर से पढ़ा लिखा था वही सिखा रहा था मेरा खुद का तो कोई ज्ञान नहीं है इंपोर्ट होता है एक्सपोर्ट होता है यहां से इंपोर्ट होता है यहां से यहां से एक्सपोर्ट होता है और कुछ नहीं तो मेरा खुद का कोई ज्ञान ऐसा नहीं निकाल सकता हूं
(28:51) जो दुनिया में नहीं और मैं दूं तो उसकी कोई ना कोई टेक्नोलॉजी होगी। तभी तो उनके पास हुआ यह टेक्नोलॉजी मैं ढूंढ रहा था। मुझे मिली पतंजलि योग सूत्र में कि यह रास्ते से यह आत्मबोध निकल सकता है। दूसरा तीसरा मैं बहुत सालों से सुन रहा था कर्म का सिद्धांत अच्छे कर्म करो अच्छा होगा। बुरा कर्म करो बुरा होगा। तो यह मेंटेन कौन करता है? रिकॉर्ड कौन मेंटेन करता है? अभी हिंदू धर्म तो में कहते हैं कि वह चित्रगुप्त करते हैं तो चित्रगुप्त कितने साल से जिंदा है और कहां रहते हैं? उनके ऑफिस कहां पे है और कौन से फॉर्मेट में ये सब करते हैं? ये भी मेरे मन में सवाल आता
(29:26) था। और अगर वो फिजिकल फॉर्म में हो ही नहीं सकता। दूसरी बात थी कि सिर्फ हिंदू का रिकॉर्ड रखते हैं। मुस्लिम और क्रिश्चियन का भी रखते हैं। सभी लाइन धर्मों का रखते हैं। तो यह भी तो नहीं हो सकता है। उसके ऊपर उसका कंट्रोल कैसे होगा? तो यह चित्रगुप्त कौन है? मुझे मिलना है। उसका कौन से फॉर्मेट में वो रिकॉर्ड रखता है? रिकॉर्ड होगा तभी तो यह इंप्लीमेंट होता है ना। तो और अगर कंप्यूटर फॉर्मेट में है तो लॉग इन करके मैं क्या उसको हैक कर सकता हूं? मेरा कर्मा का जो रिकॉर्ड है उसको मैं डिलीट कर सकता हूं। ऐसे मेरे मन में सवाल उठते थे और कहीं जवाब नहीं मिलता था। पतान
(30:02) योग सूत्र में मिला। यू कैन रीच टू योर कार्मिक रिकॉर्ड। यू कैन डिलीट योर कार्मिक रिकॉर्ड। उसको डिलीट भी कर सकते हैं। पिछले 50- 100 जन्म के रिकॉर्ड आप डिलीट कर सकते हैं। यह टेक्नोलॉजी इसने 2000 साल पहले बताई। वाओ यह तो जबरदस्त आ गया। फिर ये बागेश्वर बाबा जो चमत्कार दिखाते चिट्ठी निकालते हैं। ऑटोबायोग्राफी ऑफ योगी की किताब में लिखा है। बहुत चमत्कार की बातें लिखी है। आपने पढ़ी होगी तो उसमें चमत्कार की बहुत बातें हैं। एक दो किताब मैंने चमत्कार की पढ़ी। एक आदमी था जिसने चमत्कार के लिए पूरा जीवन दे दिया। गुर्जर करके रशियन था। उसकी किताब
(30:33) है मेन इन सर्च ऑफ मिरेकल्स करके तो उसने के चमत्कार कैसे होते हैं उसकी सर्च कर रहा था अभी जैसे अभी यहां का नीम करौली बाबा की बात आई जिसके ऊपर फिल्म बनी तो ये कैसे चमत्कार होता है उसकी मुझे टेक्नोलॉजी चाहिए थी वो टेक्नोलॉजी मिली मुझे पता नहीं है सूत्र में कि आप इससे भी ज्यादा चमत्कार कर सकते हो ये भी टेक्नोलॉजी उसके अंदर है फिर मेरे प्रोग्राम में आके लोग बोलते थे मोक्ष क्या है मुझे तो मोक्ष चाहिए आप कैसे मुझे मोक्ष दिलवा सकते हैं अब मुझे ही पता नहीं था कि मोक्ष क्या है मैं उनको क्या दिलवा दूं? फिर मुझे इसकी डेफिनेशन और उसका
(31:06) रास्ता मिला कि आपको मोक्ष भी मिल सकता है। तो ऐसा बहुत सारे सवाल थे मेरे मन में। दूसरी बात ये है कि मैं 50 52 ईयर से तो मैं पब्लिक लाइफ में हूं। मैं 74 में पब्लिक लाइफ में आया। डॉक्टर बना मैं 74 में तो बहुत लोगों के बहुत प्रॉब्लम थे। तो हर प्रॉब्लम का अलग-अलग सॉल्यूशन देते थे हम। फिर मेरे मन में एक नोवेल आईडिया आया कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर प्रॉब्लम का एक ही कारण हो और एक ही कारण है तो सॉल्यूशन भी एक ही हो जाए। कहीं जवाब नहीं मिल रहा था। मिल गया पता नहीं सूत्र से। एक ही कारण होता है हर प्रॉब्लम का। चाहे हेल्थ का इशू हो,
(31:39) रिलेशनशिप का इशू हो, मनी का इशू हो, कोई भी इशू हो। कारण एक ही है। यानी कि सॉल्यूशन भी एक ही है। वाह! मैं बोला ये तो जबरदस्त मेरे हाथ में आ गया। मैं बोला छोड़ो माइंड पावर अब बहुत सिखा दिया। बाकी लोगों के लिए छोड़ दो। अब बियों्ड माइंड पावर की बात करो। तो इतना सारा ज्ञान पतली रूसी ने हमें दिया और किसी को पता नहीं है और हम विश्वगुरु बनने को निकले तो किस चीज सिखाएंगे हम दो गोरे लोगों को प्लेन बनाना रॉकेट बनाना कार बनाना एटम बनाना वो तो हमें सिखा रहे हैं तो अगर हमें विश्वगुरु बनना है तो हम यह पाताल ऋषि का ज्ञान हम
(32:12) फैला सकते हैं क्योंकि 2000 साल पहले उसने देख लिया था कि आगे जाके क्या होने वाला है। उन्होंने जो लिखा है वो आज भी इतना ही उपयोगी है जितना वोट जमाने में था और ज्यादा उपयोगी है। अब मेरे दिमाग में इतने सारे क्वेश्चंस आ रहे हैं तो मुझे आपने बहुत सारी चीजें बोली तो मैं चाहूंगी कि हम उन सब चीजों के बारे में जान पाएं क्योंकि हमने कहा था कि जो भी चीज अज्ञानता है हम उनको दूर करने वाले हैं। तो पहला तो आपने कहा कि एक चीज मुझे पता चली कि सारी प्रॉब्लम्स का एक ही कारण होता है और एक ही सॉल्यूशन होता है। तो वो क्या कारण होता है हमारी सारी सॉलशंस का?
(32:41) अब पहले थोड़ा सा ये योग सूत्र के बारे में जी हां जी। के हमारे जमाने में योग बहुत 5000 सालों से चल रहा था। मगर एक गुड विद्या थी। एक रहस्यमय विद्या थी। सीक्रेट साइंस जैसा था। महर्षि ऋषि ने 2000 साल पहले इसको एक सिस्टमाइज करके एक सिस्टम में बना दिया। एक साइंस का रूप दे दिया। अब वो रहस्य नहीं रहा। अब एक साइंस बन गया। पहली बात तो यह है। दूसरी बात है कि योग का लोगों को पता ही नहीं है कि योग का मतलब क्या होता है? और लोग बोलते हैं मैं योग करता हूं। योग करता हूं। योगा टीचर बोलते हैं मैं योगा टीचर हूं। नहीं पहले पूछता हूं
(33:16) कि अच्छा योग का क्या मतलब होता है? बताओ। तो चप्प हो जाते हैं। फिर बोलता हूं पतंजलि सूत्र बोले हां हमको सिखाया है। बोला बताओ क्या है पतंजलि सूत्र? बोले अभी याद नहीं है। तो इतना सारा कंफ्यूजन है। योग मतलब हम यही समझते हैं कि वो गार्डन में जो होता है सुबह-सुबह में वो जो टीवी पर रामदेव बाबा दिखाते हैं वो योग है। वो योग नहीं है। योग का एक पार्ट है। रियल योग का मीनिंग वो नहीं है। योग का डिक्शनरी मीनिंग ऑक्सफोर्ड में जाकर देखो। योग का डिक्शनरी मीनिंग है यूनियन। जुड़ाव। यूनियन का मतलब होता है किसका जुड़ाव? आत्मा का परमात्मा के साथ जीव का शिव के
(33:49) साथ जुड़ाव पर्सनल कॉन्शियसनेस का यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस के साथ यूनिफिकेशन इसको योग कहते हैं। तो योग की परिभाषा किसी को पता नहीं थी जो आज से 2000 साल पहले पतंजलि ऋषि ने कही है। दूसरी बात यह है कि इसका जो मेन थीम है उसके 196 सूत्र है। उसमें पहला सूत्र है अथ योग अनुशासनम। यानी योग सीखने के लिए अपने आप में कुछ तैयारी करनी चाहिए। तभी योग का फायदा होगा। तो तैयारी क्या होती है वह उन्होंने समझाया है और दूसरा जो मेन पूरे योग सूत्र का थीम है वह है योग चित्तवृत्ति निरोध योग क्या है चित्त की वृत्ति का निरोध यानी रोकना चित्त क्या है
(34:30) तो सिंपल लैंग्वेज में मन माइंड एंड वृत्ति यानी विचार तो योग का रियल मीनिंग है हमारे मन में से जो विचार उठते हैं उसको शांत करना इसको योग कहते हैं या आसन करते हैं वह अलग चीज होती है गलत कहते ऐसा नहीं है वो अलग है और यह पतली ऋषि का अलग है। अब आप देखो कि चित को उसने एक्चुअली चार का कॉम्बो है चित मन बुद्धि अहंकार एंड संस्कार। संस्कार मींस प्रोग्रामिंग जो अभी हम बात कर रहे थे जो हमारे पूर्व जन्म के भी होता है। मन सोचता है। बुद्धि डिसाइड करता है यह करो। और अहंकार कहता है यह मैं कर रहा हूं। यह मेरी वजह से हो रहा है और संस्कार कहता है जो हमें पहले सुन
(35:14) लो हमने क्या-क्या अनुभव किए और फिर डिसीजन लो और एक्शन लो। तो दिस इज हावर आवर माइंड ऑपरेट्स। तो योग का मतलब होता है चित की वृत्ति को शांत करना यानी मन के विचारों को शांत करना। अब हमारी हेल्थ की बात करें। हेल्थ का प्रॉब्लम घर-घर में है। तो हेल्थ के जो प्रॉब्लम है उसका एक ही कारण है हमारा स्ट्रेस। स्ट्रेस है। हमारे नेगेटिव थिंकिंग है। मैं जब मेडिकल कॉलेज में सीखता था तब हमको सिखाया कि 10% डिजीज आर साइकोसोमेटिक। यानी मन के वजह से शरीर में होते हैं। अब विग्नयान कहता है कि 100% डिजीज आर साइकोसोमेटिक। शुरुआत यहां से
(35:54) होती है और फिर इफेक्ट यहां पर होती है। तो आपका मन अच्छा नहीं है, शांत नहीं है। अशांत मन है तो कैंसर, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, थायराइड, ओसीडी, डिप्रेशन सब बीमारियां शुरू कर देगा। मन अशांत सभी बीमारी का कारण है। एक ही कारण है। अगर सब बीमारी का अशांत मन तो सॉलशन तो सिंपल है। मन को शांत कर दो बीमारियां ठीक हो जाएगी। तो यह मन जो आप कह रहे हो यह माइंड है। तो ये कॉन्शियस माइंड ये कॉन्शियस माइंड है। ये कॉन्शियस माइंड है। कॉन्शियस माइंड सोचता रहता है ना पूरा दिन। कहते हैं कि हम दिन में 60000 थॉट प्रोड्यूस करते हैं। और अभी आपने ऑब्जर्व
(36:34) किया कि ये विचार तीन में से कौन से काल के होते हैं? भविष्य काल के, भूतकाल के या वर्तमान के? कौन से होते हैं आप? सोच के बताइए। ज्यादातर हम कौन से विचार करते हैं? पास्ट या फ्यूचर में से ही। पास्ट या फ्यूचर का करते हैं। प्रेजेंट का नहीं करते हैं। और पास्ट और फ्यूचर में रहने की हमको आदत हो गई। यह हमारा प्रोग्रामिंग हो चुका है। अब विचार भी दो टाइप के होते हैं। दुख देने वाले विचार और सुख देने वाले विचार। सुख देने वाले विचार हमें सुखी करते हैं। दुख देने वाले हमें दुखी करते हैं। तीनों में ऐसा हो सकता है कि फ्यूचर का भी मैं
(37:06) दुख देने वाला विचार करूं। सुख देने वाला विचार करूं। मैं आज प्लान करने को बैठा हूं कि मुझे मेरे करियर को आगे ले जाना है। तो सुख देने वाले विचार हैं। मैं चिंता करूं कि इतनी कंपटीशन में मैं कैसे सर्वाइव करूंगा आगे जाके। मुझे तो इंग्लिश बोलना नहीं आता है। ऐसे मजाक में कह रहा हूं। तो इंग्लिश नहीं आता है। मुझे तो यह नहीं होता है। मेरी हेल्थ मुझे सपोर्ट नहीं कर रही है। तो नेगेटिव विचार है। दो टाइप के विचार हुए। ज्यादातर लोग कौन सा करते हैं? नेगेटिव वाला करते हैं। चिंता करते हैं। हर घर में एक चिंतामणि रहता है जो पूरा
(37:36) दिन एक ही काम करता है। चिंता करते रहते हैं। ठीक है? चिंता क्या होती है? फ्यूचर हमारा खराब होगा इसकी सोच रखता है। वो चिंता होती है। पास्ट की बात करें तो हमारे पास्ट में हमारे जो भी अनुभव हुए हैं उसके दो टाइप की मेमोरी है। अच्छी और बुरी। दोनों मेमोरी है। बुरी मेमोरी हम याद करेंगे पुराने रिग्रेट गिल्ट ये सब तो अभी हमारी हेल्थ के ऊपर इफेक्ट होगी। और अगर हमारी अच्छी मेमोरी याद करेंगे तो हेल्थ अच्छी रहेगी। मगर ज्यादातर आदत देखो लोग पास्ट के बुरी आदत बुरे अनुभव याद करते हैं। पास्ट पेनफुल मेमोरी को ज्यादा याद करते हैं। अच्छी चीजों को याद नहीं करते हैं।
(38:12) जो हमारी हेल्थ को नेगेटिव बना देते हैं। नुकसान करते हैं। क्योंकि हमारी सोच होती है। वो हमारी इमोशन क्रिएट करती है और यह इमोशन हमारे हॉर्मोनल बैलेंस बिगाड़ती है। हमारी हमारे शरीर की रासायनिक क्रिया को बिगाड़ देती है और हमारे शरीर में बीमारियां पैदा होती है। तो शुरुआत कहां से हुई? सोच से हुई। और सोच हम या पास्ट की या फ्यूचर की करते हैं। वर्तमान में करते ही नहीं है। अगर हम यह सीख ले कि हमें वर्तमान की सोच कैसे करनी है तो हम पास्ट और फ्यूचर से हम छुटकारा मिल जाएगा। वो जो नेगेटिव इफेक्ट दोनों चली जाएगी। जहां से हमारे जीवन की समस्या हुई है।
(38:50) प्रेजेंट में रहना जिसको आजकल इंग्लिश में माइंडफुलनेस कहते हैं। तो हमारे मन को प्रेजेंट में लाना यही विज्ञान पतनली रूसी ने 2000 साल पहले पहुंच सिखाया है कि आप प्रेजेंट में रहने की कोशिश करो। हमारा मन है इसको मंकी माइंड कहते हैं। बंदर जैसा है। खुदा-कूद करता रहता है। कभी यह सोचता है, कभी वो सोचता है। एक जगह पे बैठता नहीं। इसलिए तो 60 थाउजेंड टाइप्स ऑफ विचार हम एक दिन में कर लेते हैं। कूदता रहता है। तो यह कूदने वाला जो हमारा मन है ना वही हमारी समस्या का कारण है। पतानी एक सूत्र का साइंस है वो सभी विचारों को शांत करना है। शांत करना उसके
(39:28) बाद जो बुरे विचार है उसको अच्छे विचार से रिप्लेस करना। उसने नाम दिया है क्लेश वृत्ति एंड अक्लेश वृत्ति। क्लेश वृत्ति यानी जो हमें नुकसान करती है जो हमें दुख देने वाली वृत्ति है उसको अक्लेश कहते हैं। यानी कि नेगेटिव थिंकिंग एंड अक्लेशति यानी पॉजिटिव थिंकिंग यानी सुख देने वाले विचार करना है। तो पता नहीं एक सूत्र का साइंस हमें सिखाता है कि नेगेटिव लाइफ में से पॉजिटिव लाइफ कैसे बनानी है और आगे जाके यह अकलेश्रति को भी डिलीट करना है। वृत्ति नहीं रहनी चाहिए क्योंकि वृत्ति हमारे सबसे बड़ी दुश्मन है। अब हमारा मोटापा क्यों होता है बताओ? बहुत
(40:03) खाते हैं। क्या खाते हैं? हमें पसंद है। वह खाते हैं। गुलाब जामुन खाते हैं। यह खाते हैं। यह किसको सेटिस्फाई करते हैं? हमारी टंग को सेटिस्फाई करते हैं। हमारी इंद्रियों को देखिए पूरी हमारी प्रवृत्ति हमारी पांच इंद्रियों को सेटिस्फाई करने के लिए रहती है। और इंद्रियों की आदत है। जितना उसको सेटिस्फाई करोगे दिल मांगे और मोर दिल मांगे मोर। सोच लो दारू से आपने सेटिस्फाई किया और दारू पियो और दारू पियो। मिठाई की आदत हो गई। मिठाई दो और मिठाई दो और मिठाई दो। तो हमारे हेल्थ केयर प्रॉब्लम तो यह हमारी इंद्रियों से ही होता है। खास करके पहली तो हमारी टेस्ट
(40:36) बढ़ की वजह से होता है। तो पत्थली योग सूत्र में जो आठ स्टेप बताए अष्टांग योग उसमें पांचवा स्टेप है प्रत्याहार यानी कंट्रोल योर सेंसेस। कंट्रोल यानी ऐसा नहीं कि बिल्कुल बंद कर दो। मगर उसके साथ ऐसा लालच नहीं हो कि आप अपने आपको रोक नहीं सके। आपके सामने मिठाई है। आपको पता है मेरी हेल्थ को नुकसान करता है। थोड़ा सा टुकड़ा ले लो खा लो। मगर सब खा लो। यह कंट्रोल रोकना है आपको। यह सब यहां सिखाते हैं। तो हेल्थ के प्रॉब्लम इसी से आते हैं। रिलेशनशिप के प्रॉब्लम भी वहीं से आते हैं। बिजनेस प्रॉब्लम भी वहीं से आते हैं। हमारा जो चंचल मन है वही हमारा सबसे
(41:14) बड़ा विलेन बनता है। तो जैसे ही आप चंचल मन को शांत कर दोगे तो हर प्रॉब्लम धीरे-धीरे अपने आप सेटल हो जाएगा। ना कई चीजें जैसे आप बात कर रहे हो ना तो मेरे दिमाग में आ रहा था कई चीजें रिलेट हो रही अभी आपने जो अभी न्यूज़ सुनी होगी कल जो वो पायलट की आई है जिन्होंने दुबई में किया है तो मैं यह सोच रही थी जो माइंडफुलनेस को हम आज तक ये सोचते हैं कि माइंडफुल का मतलब है प्रेजेंट रह जाओ तो वो जो सिचुएशनल अवेयरनेस होती है अवेयरनेस होती है कि अभी जो लाइफ में चैलेंज चल रहा है उसको कैसे आपको डिसीजन लेना है उसका एक क्लियर माइंड हुआ तब उसने डिसीजन
(41:44) लिया देखो वो अंदर ही ममारी चलती रहती है और दरवाजा नहीं खोलता तो प्लेन क्रश डिसाइडेड था उसका माइंड कितना कॉन्श ये सब तो कॉन्शियस माइंड से हुआ ना उसने कितना अलर्टनेस दिखा उसका का माइंड कॉन्शियस माइंड कितना अलर्ट होगा कि उसने समझ लिया कि अगर यह सिचुएशन कंट्रोल में नहीं आई मेरे से तो प्लेन क्रेश होगा सब मर जाएंगे तो उसने इमीडिएटली डिसीजन लिया अपना कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया पब्लिक को पता चला एक आदमी जाके उनको हेल्प करने लगा और पूरी सिचुएशन बदल गई ये तो उसका कॉन्शियस माइंड का कमाल था उसमें तो सबकॉन्शियस माइंड की जरूरत ही नहीं थी
(42:15) और इतनी जिंदगी बचा दी हीरो बन गया क्या-क्या बन गया उसका तो ये भी तभी होगा जब हमारे कॉन्शियस माइंड इतना स्ट्रांग होगा कि कैसे इधर-उधर से निकल के अभी क्या सिचुएशन है उसके एक्सैक्टली इमीडिएटली रिसोंड देना अगर अगर आपका डिस्टर्ब माइंड रहता है तो यह नहीं होता था और वो आदमी जो करने वाला था वो डिस्टर्ब माइंड वाला था पेनेटिक था जो सबको मारना चाहता था इजराइलियों ने उसका क्या खराब किया मुझे पता नहीं है मगर किसी ने कहा कि इजराइली इस्लाम का दुश्मन है तो उसने वो हिसाब से अपनी दुश्मनी मन के अंदर पा ली और उसको अंजाम देने के लिए उसने यह सब एक्शन लेना
(42:48) शुरू किया तो कहने का मतलब यह सब मन का तो खेल है हर प्रॉब्लम का कारण वहीं पे तो है अगर दोनों के मन शांत रहते थे तो यह होता ही नहीं था। तो यह वही था कि कॉन्शियस माइंड इतना मतलब ट्रेंड है सुपर कि उसी टाइम क्या अपॉर्चुनिटी है। उसको बहुत क्लियरली पकड़ा कि अभी सबसे पहले सिचुएशन को इमीडिएटली उसने समझा और सिचुएशन में इमीडिएटली डिसीजन और एक्शन लिया। ये कॉन्शियस माइंड करता है। अलर्टनेस रहना। तो ऐसी ट्रेनिंग हम कैसे दे सकते हैं अपने माइंड को? सिचुएशन योग सूत्र सिंपल है। तो उसमें क्या इससे रिलेटेड क्या? इसमें अच्छा उसने बताया है कि इसका ट्रेनिंग
(43:23) देने का उसने क्रिया योग करके बताया है। अच्छा स्वाध्याय तप एंड ईश्वर प्राणिदान और दूसरी दो चीज पहले ही कही है उसने प्रैक्टिस एंड वैराग्य ये दो चीज है। प्रैक्टिस क्या करना है? मन को प्रेजेंट में लाने की कोशिश करना है। मन भागता रहता है। पकड़ो इधर लाओ। जैसे आपने बंदर का बच्चा पाला है। डोरी से बांधा है। वो इधर भागेगा खींच के यहां लाओगे बिठाओगे। फिर इधर भागेगा फिर बिठाओगे। हमारा मन बिल्कुल ऐसा काम करता है। तो हमें प्रैक्टिस क्या करनी है कि हमारा कूदा कूद करने वाला मन है उसको शांत करना है। तो उसके उसने बहुत सारी टेक्नोलॉजी बताई कि यह तरीके से कर
(43:56) सकते हैं। यह तरीके से कर सकते हैं। बेसिकली मेडिटेशन तो मेडिटेशन के उसने बहुत सारे रास्ते बताए। एक ही टाइप का नहीं है मेडिटेशन। आप अपने मनपसंद किताब में खो जाओ। वह भी मेडिटेशन है। आप अपने सब्जेक्ट के बारे में सोचते रहो वो भी मेडिटेशन है। यानी मेडिटेशन के बहुत सारे उन्होंने रास्ते बताए। अपनी पर्सनालिटी के हिसाब से वह रास्ते पर जाओ। ऐसा नहीं कि मेडिटेशन या सब करो वैसा करने का। आपको कोई सीरियल पसंद है सीरियल में खो जाओ। वो भी मेडिटेशन है। क्योंकि सीरियल में खो जाते हैं तब पास्ट के विचार भी नहीं आते हैं और फ्यूचर के भी नहीं आते। अब वहां जो
(44:28) चल रहा है वही विचार आएंगे। तो आपने मन को एक जगह पे लगा दिया ना फोकस कर दिया। मतलब मेडिटेशन का मतलब प्रॉपर ये है कि आपको अपना जो प्रेजेंट है एग्जैक्ट जो लाइफ में चल रहा है आप वहां पर पूरी तरह से प्रेजेंट हो गए। एक्सैक्टली प्रेजेंट में फोकस करो। देखिए अब अह इसके थोड़ी और आगे बात करें कि जैसे भगवत गीता है ना उसका जितनाेंस है उतना हीेंस हमारे पतली युग सूत्र का मुझे लग रहा है उससे ज्यादा या सेम अब भगवत गीता सबको पता है सबके घर में है मगर दुख की बात यह है कि उसमें से 90% लोगों ने पढ़ी नहीं है पढ़ी है उसमें से 90% को समझी
(45:05) नहीं है जो 10% को समझी है उसमें से 90% ने उसका यूज़ नहीं किया कुछ तो सोच लो कि भगवत गीता इतना अच्छा हमारा पुस्तक होने के बावजूद भी लोगों के जीवन में कोई बदलाव क्यों नहीं दिखता? बिकॉज़ ऑफ ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि उसके लैंग्वेज बहुत डिफिकल्ट है। मैंने खुद ने भगवत गीता समझने की कोशिश की। अभी तक मुझे समझ में नहीं आया उसका। मैंने प्रभुपाद जी का पढ़ने की कोशिश की। विनोबा की, गांधी जी की, कितने लोगों की अभी तक मुझे समझा नहीं। यह भी इतना ही डिफिकल्ट था। मगर मैंने बहुत मेहनत करके उसे समझा क्योंकि मुझे पता चला कि ये बियों्ड माइंड पावर है। यह धर्म की
(45:38) बातें नहीं है। इसमें पूरी साइंस की बात है। यह धर्म है ही नहीं। यह पूरी साइंस है। अब यह पता नहीं योग सूत्र है वो किसी को पता ही नहीं है। किसी को नहीं पता है। मैं बड़े-बड़े कितने लोगों को पूछता हूं। आपको पता ही है क्या है? किसी को पता नहीं है। तो मैं सोचा कि अगर देश का भला करना है तो पता नहीं युद्ध का ज्ञान लोगों तक पहुंचाओ। मैं एक बात में निमित बना सबकॉन्शियस माइंड का नॉलेज इंडिया में इंपोर्ट किया और अभी लोग दुनिया भर वाले कर रहे हैं। सब कुछ ऐसा ही मैंने सोचा कि मैं एपी सेंटर बनूं बतानी योग सूत्र का। इसमें तो मैं 100 ट्रेनर अभी दिसंबर के
(46:10) पहले बनाने जा रहा हूं कि जो मेरे ट्रेनर बनेंगे जो क्वालिटी ट्रेनिंग देंगे लोगों को पतली एक सूत्र की तो बेसिकली इसमें ट्रेनिंग क्या होती है प्रैक्टिस प्रैक्टिस क्या करना है अपने मन को यानी कॉन्शियस माइंड को कोई एक जगह पे एंगेज करना है फोकस करना है और सूरज है वह एनर्जी है उसके किरण हम मैग्नीिफाइंग ग्लास से पास करते हैं तो उसकी एनर्जी 100 टाइम बढ़ जाती है आग लग जाती है झटका लगता है हम स्कूल में किया करते थे तो माइंड इज आल्सो एनर्जी। विचार करते हैं वह भी एनर्जी। अगर कॉन्शियस माइंड को यानी विचारों को एक जगह फोकस करोगे ना तो
(46:45) मैग्नीिफाई हो जाएगा। उसकी एनर्जी बढ़ जाएगी। समझे ना? चाहे नेगेटिव पे करो चाहे पॉजिटिव पे कर रहे हैं। हां दोनों में हो गया। हम सीक्रेट में कहते हैं ना योर एनर्जी फ्लोस वेयर योर अटेंशन गोज़। जहां आपका अटेंशन जाएगा वो टाइप की एनर्जी वहां फ्लो करेगी और मैग्नीिफाई होगी। तो इसमें क्या करना है कि मन को हमें शांत करके एक जगह पर फोकस करना है। ज्यादातर मेडिटेशन सांस के ऊपर करके करते हैं। कोई ओम के ऊपर करते हैं, कोई यहां पे करते हैं, कोई दीप के ऊपर करते हैं। त्राटक जिसको कहते हैं वो भी फोकस करने की कोशिश है। तो, यह सब चीजें करके हम हमारे कॉन्शियस माइंड को
(47:22) फोकस करने की ट्रेनिंग देते हैं। और जो ट्रेनिंग है वह फोकस वाला कॉन्शियस माइंड आपको मिरेकल करके दिखाएगा। बॉस है वह तो सबकॉन्शियस माइंड तो ऑलरेडी रेडी है ही मगर बॉस आड़ा टेढ़ा कमंड देगा तो सबकॉन्शियस माइंड बेचारा क्या करेगा वह तो बॉस के हर बात मानेगा तो कॉन्शियस माइंड को पहले ट्रेनिंग देने की जरूरत है कि वो पूरा फोकस करके अपना काम करवाना शुरू करें और मेडिटेशन क्या है मेडिटेशन विचारों को दृष्टा भाव से देखना है जो लोगों को पता नहीं है बहुत लोगों को पूछता हूं तुम मेडिटेशन करते हो बोले हां मैंने किया मगर मजा नहीं आया मेरे से नहीं हो रहा है
(47:58) मेडिटेशन कैसे पता पता तुम्हारे ऐसा नहीं हो रहा। बोले मैं आंख बंद का करता हूं और मुझे विचार आने लगते हैं। बोला तुमको किसने बताया कि मेडिटेशन में विचार नहीं आते? बोले वही तो है। मैं बोला नहीं ऐसी बात नहीं है। मेडिटेशन में विचार आते हैं। मेडिटेशन विचारों को रोकने का नाम नहीं है। विचारों को दृष्टा भाव से देखने का नाम है। हम बालकनी में खड़े-खड़े नीचे रोड पर देख रहे हैं तो ट्रैफिक आता जाता रहता है। ऐसे हम दृष्टा भाव से देखते रहते हैं। बिल्कुल हमें दृष्टा भाव करना है। जैसे ही आप आंख बंद करेंगे। आपको हजार टाइप के विचार आएंगे। आपको एज अ थर्ड पर्सन देखना
(48:32) है। यह विचार आया अच्छा गया और अच्छा यह दूसरा आ गया। यह भी गया तो दृष्टा भाव से देखते जाओगे ना तो अपने आप धीरे-धीरे शांत होगा। धीरे-धीरे यानी एक दिन भी लग सकता है, एक महीना भी लग सकता है, एक साल भी लग सकता है, 10 साल भी लग सकता है। दो-चार दिन में आपका मेडिटेशन मेडिटेशन और विचार बंद होना होता ही नहीं है। मैं कितने सालों से कर रहा हूं, फिर भी मेरे विचार चालू रहते हैं। मैं दृष्टा भाव से देखता रहता। सिर्फ में अवेयरनेस क्रिएट किया है कि मुझे कौन से कौन से विचार आते रहते हैं। कितने सालों के बाद यह है। लोगों को लगता
(49:06) है बस शुरू किया और 8 दिन में तो हमारा ध्यान लग जाना चाहिए। वो गलतफहमी है। समझे ना? ये महावीर स्वामी को बुद्ध भगवान को कितने साल मेडिटेशन में बैठे तब यह ज्ञान खुला था। उनका दादा लेखराज वो भी 18 साल 20 साल मेडिटेशन में बैठे थे। तब यह ब्रह्मा कुमारी का ज्ञान उनको मिला है। ऐसा एक जीवन विद्या है। जहां वहां अह नागराज जी है। उन्होंने भी 16 18 साल मेडिटेशन में बैठ के अपना अंदर का ज्ञान निकाला जो आज जीवन विद्या के नाम पर प्रचलित है। तो कहने का मतलब है शांत मन ही हमारी सुख की चाबी है और कोई करना नहीं चाहता है। और आपको क्या लगता है 100 में
(49:42) से कितने लोगों का मन अशांत होगा? कितने लोगों का? मैक्सिमम। 100% बच्चे का, बाप का, बेटे का, दादी मां का, टीचर का, बॉस का, एंप्लई का, ड्राइवर का, पैसेंजर का सबका स्ट्रेस स्ट्रेस रहता है। क्योंकि हमने एडवांस होकर डेवलपमेंट करके सुविधा बढ़ा दी मगर मन को अशांत कर दिया। यह सुविधा नहीं हमको हमारे मन को अशांत कर दिया। हमारे पास कोई प्रोडक्टिव काम ही नहीं रहा। हर चीज में रिमोट कंट्रोल रिमोट कंट्रोल हमारे पास कुछ टाइम ही नहीं बचा। अच्छा काम ही नहीं बचा जहां हम अपने को एंगेज करें। फिर आंख बंद करके हम विचार करते हैं। वह भी नेगेटिव विचार
(50:21) लेस विचार। तो लाइफ में प्रॉब्लम आते हैं। जिसकी वजह से डिप्रेशन, डवोर्स, सुसाइड ये सब बढ़ रहा है। सुसाइड कौन करता है? कोई नॉर्मल इंसान करेगा। डिस्टर्ब माइंड वाला ही करेगा। अगर पहले से उनको ट्रेनिंग दी जाती होती कि मन को कैसे शांत रखना है तो क्यों सुसाइड करेगा? झगड़े हस्बैंड वाइफ में क्यों होते हैं? और सन मन की वजह से होते हैं। क्लेश विचार आते हैं। उसमें से तो झगड़े होते हैं। दूसरी बात उसने कहा कि वृत्ति पांच टाइप की होती है। प्रमाण, विपय, विकल्प, निद्रा एंड श्रुति। तो प्रमाण क्या है? जो हमने खुद ने पांच इंद्रियों से जो अनुभव किया है वह प्रमाण
(50:56) यानी सही नॉलेज है। बाकी सही नॉलेज नहीं है। विपय यानी क्या है? जो है उससे उल्टा समझना उसको विपय कहते हैं। अंधेरे में रस्सी को आपने सांप समझ लिया और डर गए वो विप्राय है क्योंकि वह सांप नहीं है। रस्सी है। विपय तो हमारे जीवन में सबसे ज्यादा दुख विप्राई से मिलता है क्योंकि जो सुख देने वाली चीजें हैं उसको हम दुख देने वाली समझते हैं और दुख देने वाली चीजों को हम सुख देने वाली समझते हैं और उसके पीछे भागते हैं और जिंदगी भर उसके पीछे भागते हैं। पैसा है उसको हम सुख देने वाली चीज समझते हैं और कंटीन्यूअसली उसके पीछे भागते हैं। यह सबसे बड़ा अभिप्राय है। यह
(51:33) नाम है हमारा यह भी दुख देने वाली चीज है। नाम एक कभी भी गिर सकता है। आसाराम बापू का एक दिन में गिर गया ना तब हो सकता है ऐसा कुछ भी हो सकता है। तो जो सुख देने वाली चीज है उसको हम दुख देने सुख देने वाली क्या चीज क्या है? हमारा शांत मन यह हमारी सुख देने वाली चीज है। उसके पीछे तो हम भागते नहीं है। और दुख देने वाली चीज है। पोजीशन पावर मनी प्लेजर यह सब जो टेंपरेरी है। पतंगी ऋषि कहता है कि जो परमानेंट है उसके पीछे काम करो। जो टेंपरेरी है उसके पीछे भाग के अपने दुख पैदा कर रहे हो। तो यही सॉल्यूशन है। शांत मन सभी चीज का सॉल्यूशन है। और
(52:11) उससे जो हैप्पीनेस मिलता है ना वो लास्ट वेगास में नहीं मिलता है। मैं तो लास्ट वेगास चार पांच बार गया हूं। मुझे पहली बार थोड़ा एक्साइटमेंट आया। बाद में तो मुझे नॉर्मली जैसे अहमदाबाद के रोड पे घूम रहा हूं ऐसा लग रहा था। और चौथी पांचवी बार तो मैं 9:00 बजे सो गया था होटल में। मेरी 9:00 बजे सोने की आदत है। तो मेरे साथ आया तो बोल रहे थे साहब आप लास्ट घास में आके न 9 ओ क्लॉक क्यों सोते हैं? बोला मुझे कोई एक्साइटमेंट लगता ही नहीं है। मैं तो घर मैं तो बैठ के मेडिटेशन करूंगा। उसमें ज्यादा हैप्पीनेस मिलता है ये लाइटिंग देखने से या कैसीिनो में जाने से
(52:38) तो कहने का मतलब है कि सुख के व्याख्या ही लोगों को पता नहीं है ये दारू पार्टी ये घूमना ये सब चीजें ये और पांच इंद्रियों को ही हम सेटिस्फाई करने के लिए भागते रहते हैं। अच्छा खाना, अच्छा देखना, अच्छा स्पर्ध, अच्छी सुगंध, सब कुछ अच्छा सुनना, अच्छी कॉन्सर्ट में जाके किसी का गाना सुनो, यह सुनो। पांचों इंद्रियों को बस सेटिस्फाई करो। ये कभी नहीं सेटिस्फाई करने वाली भगवान ने पांच इंद्री दी है। जितना सेटिस्फाई करोगे उतना दे। वो मांगता ही रहेगा। तो यह समझते ही नहीं लोग। बस भागते रहते हैं उसके पीछे। और फिर दुख आता है डॉक्टर
(53:16) के पास शारीरिक दुख है तो मानसिक दुख है तो साइकेट्रिस्ट के पास और कुछ दुख है तो हमारे जैसे साइकोलॉजिस्ट के पास आओ कि वो बताएंगे काउंसिलिंग करके यही सिलसिला चल रहा है। तो जैसे आपने कॉन्शियस माइंड का तो कहा कि उसको ट्रेनिंग देने के लिए एक तो विचार हमें देखने हैं कि जहां हम एनर्जी अपनी लेकर जा रहे हैं वैसे आएंगे और मेडिटेशन आपने कहा प्रेजेंट मोमेंट में आने के लिए। तो जैसे अब आपने कहा प्रेजेंट जो हमारा कॉन्शियस माइंड है वो बॉस है और सबकॉन्शियस माइंड वैसे ही काम करता है। तो जहां-जहां हमारी एनर्जी जा रही होगी वो वो
(53:43) मेमोरी स्टोर होती जाएगी और सबकॉन्शियस हमारी वैसे ही लाइफ में मैनिफेस्ट करता रहेगा। पहले प्लानिंग करेगा फिर अपोरर्चुनिटी क्रिएट करेगा। आपको रिंट देगा कि ये अपॉर्चुनिटी है। तुम पहचानो और तुम इसको करो। करेगा। तो ये पूरी सीक्वेंस समझने जैसी है। तो जो सबकॉन्शियस में पुरानी मेमोरीज़ पढ़ी होंगी। क्या वो हर्डल बनती हैं? फिर उस समय पे जब हम कॉन्शियसली तो अब हम एक्शन लेना शुरू हो गए कि नहीं अब हमें बदलना है। लेकिन जो पुराने पैटर्न पुरानी मेमोरी आपको डिसीजन लेने में डिस्टर्ब करती है। तो उसको कैसे हम फिर से रिवायर करेंगे? हां वही कह देखो मान लीजिए आपके कोई एक
(54:14) पर्टिकुलरली कम्युनिटी के लोगों के साथ दो-तीन बार आपका खराब एक्सपीरियंस हुआ। हम आप उसके उसका कोई भी प्रपोजल आएगा कि चलो हम एक साथ में मिलके काम करते हैं। तो आपको पहले उसके ऊपर सोचना पड़ेगा। फिर डिसीजन लेना पड़ेगा फिर एक्शन। मगर वह सोच को प्रभावित करेंगे। आपके पास्ट एक्सपीरियंस जो आपकी मेमोरी में पड़े हुए हैं। ऐसे ही कम्युनिटी के लोगों के साथ मैंने पहले बिजनेस किया था तो मुझे क्या हुआ था? हो सकता है ये आदमी भी मेरे साथ ऐसा करे तो आप थोड़ा डर के डिसीजन लोगे या अवॉइड करोगे। है ना? तो हम जो भी डिसीजन लेते हैं उसमें पास्ट के हमारे
(54:48) एक्सपीरियंस हमारा प्रोग्रामिंग डेफिनेटली इफेक्ट करता है। ये ऐसा ये होता है। तो क्या हम उनको बदल सकते हैं? जैसे कई चीजें हैं कि हमें हम प्रेजेंट में हम आना चाह रहे हैं कि हमें इस चीज के ऊपर एनर्जी फोकस करनी है। लेकिन हमारा पैटर्न है कि हम डरते रहते हैं एक्शन लेने से, डरते रहते हैं स्टेप लेने से और वो मतलब पुराने पैटर्न्स हैं कि नहीं ये काम नहीं करना कुछ हो गया तो नेगेटिव थिंकिंग का पैटर्न है वो बार-बार सामने आ रहा है कि हम उस पैटर्न को भी बदल सकते हैं। कुछ बदल सकते हैं। तो वो हम कैसे बदलेंगे ताकि वो नए स्टेप्स
(55:14) जो हमें लाइफ में लेने हैं उसमें ना रोके। एक्सक्टली। इसके पहले बात है कि इसका पूरा ज्ञान होना चाहिए कि हमारे पास जो मन है वह कैसे काम करता है। दूसरा हमारा पैटर्न को हमें आइडेंटिफाई करना है। हमारे लाइफ में कौन से ऐसे पैटर्न है जो हमारी लाइफ में हमें ऑब्स्ट्रक्ट करता है। सुख के लिए सफलता के लिए करता है। और वो कहां पड़ा है और कहां से आया है। उसको ट्रैकिंग करना पड़ेगा कि मेरे पास यह पैटर्न कहां से आया। एक कहानी मैंने कहीं भी सुनी थी और बहुत बार मैं बताता हूं कि एक लेडी थी वह शादी करके आई और बंगाली फैमिली थे फिश बनाते थे तो फिश
(55:49) का हेड और टेल काट के वो पकाती थी तो किसी ने पूछा तुमने ये क्यों काटा है ये भी तो लोग खाते हैं बोले नहीं वो तो ऐसा ही रहता है बोले ऐसा क्यों रहता है बोले पता नहीं मगर हमारे घर में तो ऐसा ही चलता है बोले तुमको किसने सिखाया बोले मेरी मां ने सिखाया मेरी मां भी ऐसा करती जी बोले तुम्हारी मां जिंदा है। बोले हां जिंदा है। बोले उसको जाके पूछा कि तुम ये हेड और टेल क्यों काटते हो? तो बोले ये तो चलता रहता है। हमारे खानदान में चलता रहता है। बोले तुमने कहां से देखा? बोले मेरी मां करती थी तुम्हारी मां जिंदा है। बोले हां तो उसको पूछा। तो बोले हम पहले बहुत गरीब
(56:22) थे। हमारे घर में एक छोटा सा बर्तन था। बड़ा बर्तन नहीं था। तो पूरी मछली उसके अंदर आती नहीं थी। तो हम उसका पूछ और हेड काट लिया तो मेन पार्ट आ जाता था और पकाते थे। तो इसलिए ऐसा हुआ। तो देखो किसी ने क्वेश्चन ही नहीं किया। पैटर्न चलता रहा इसके आगे जाके। किसी ने इसको चैलेंज ही नहीं किया कि ऐसा क्यों होता है। तो हमारी लाइफ में ऐसे बहुत सारे पैटर्न होते हैं। मेरे जीवन में ऐसा पैटर्न बन गया था। मेरे फादर ने नौकरी भी किया और बिजनेस भी किया और मेरे सामने उन्होंने कितने सारे बिजनेस में फेलर किया। नुकसान किया उन्होंने और
(56:54) फिर नौकरी किया उन्होंने। तो मेरे माइंड में यह प्रोग्रामिंग हो चुका था कि ने नौकरी इज द बेस्ट थिंग। मैंने डॉक्टर बनने के बाद 30 साल तक नौकरी की और मेरा भाई ने जिंदगी भर नौकरी की। मेरा छोटा भाई है ऐसे उसने जिंदगी भर नौकरी की। उसने अभी तक कोई बिजनेस का सोचा नहीं। क्योंकि घर में वो पैटर्न बना था। वही पैटर्न चला हमारा और बाद में जब ये माइंड पावर के बारे में मैंने सीखा तब समझा कि ये मेरा पैटर्न है। ये मेरा पुराना प्रोग्रामिंग है जो मैंने पेरेंट से देखा है कि वो नौकरी में ही थोड़ा सा सुखी हुए। बाकी हर धंधे में उन्होंने नुकसान किया था। लोगों ने उनके
(57:27) साथ चीटिंग किया था और मेरे फादर का आखिरी बिजनेस था जमीन का धंधा तो जमीन के धंधे में वो फंस गए थे। किसी ने दो जगह जमीन बेच दी थी और उसकी वजह से बहुत लफड़े हुए थे लास्ट लास्ट में। तो मैंने वो बहुत इमोशनली देखा था। तो मैं सोचा ये जमीन के धंधे में तो जाना ही नहीं चाहिए। ऐसा अगर आता है कोई हमारे साथ चीटिंग करेगा तो। तो आज तक मैंने जमीन में अभी तक पैसा नहीं रोका। इतना जानने के बाद भी है ना और जबकि मुझे पता है कि सबसे ज्यादा धनवान बनते हैं जमीन के धंधे से बनते हैं। मैंने बहुत धनवान लोगों की स्टोरी देखी है। सबसे ज्यादा वो रियलस्टेट में से धनवान बनते
(58:01) हैं। वो पैटर्न इतना मेरे अंदर झकड़ गया कि आज तक मैंने कभी जमीन में पैसा नहीं रोका है। सोच लो। तो ये हमारे पुराने जो पैटर्न होते हैं ना वह हमें बहुत इफेक्ट करते हैं। तो उसके लिए बहुत ज्यादा अवेयरनेस चाहिए। बहुत ज्यादा इंट्रोस्पेक्शन चाहिए। स्वाध्याय जो इसने पतली ऋषि ने कहा स्वाध्याय यानी खुद को एनालाइज करना कि कौन से पैटर्न हमारे यहां रिपीट हो रहे हैं। ये सब कुछ चीजें और फिर उसको बदलना है। मतलब जो भी चीजें हम जीवन में चाहते हैं जैसे कि कोई पैसा कमाना चाहता है तो पहले वो आइडेंटिफाई करें कि पैसे से रिलेटेड मेरे अंदर क्या है? क्या चीज है?
(58:31) यूजली ब्लॉक होता है। मेरे अंदर भी था। जैसे मैं नौकरी करना वो मेरा ब्लॉक था। मुझे धनवान बनना था। अब नौकरी में कितना पैसा इंडिया में कमाएगा? और बाद में मुझे एक रास्ता मिला। मैं मुंबई में जॉब कर रहा था और मुझे सऊदी अरेबिया की जॉब मिली। तो एक ही दिन में कितना बदलाव आया? मेरी लास्ट सैलरी जो मुंबई की थी वो ₹2500 ₹500 थी और नेक्स्ट डे सऊदी अरेबिया में 25000 हो गई। 10 टाइम्स हो गई सीधी मगर वो भी नौकरी चलती रही। धनवान बनने का थोड़ा रास्ता खुला। मगर कभी मैं बिजनेस नहीं कर पाया। बाद में समझा तो मैंने यह तोड़ा। आज मैं यही
(59:05) बिजनेस ही है मेरा एंटरप्रेन्योर बनके। मैंने स्टार्टअप चालू किया। अब मेरे पास करोड़ों रुपए आ गए। मगर नौकरी करता तो यह नहीं होता था। मैं पेंशन से जीता था अभी तो ये पैटर्न मैंने तोड़ा तो ये बहुत चीज ऐसे पैटर्न बन जाती है। मुझे एक ज्योतिष ने डाल दिया था। बोले अडिया साहब आपके हाथ के बीच में उंगली के बीच में बहुत जगह है ना तो पैसा आएगा नीचे से निकल जाएगा। मेरा पैटर्न बन गया था। मैं सऊदी अरेबिया में लाखों की सैलरी ले जाता था। निकलता जाता था। पैसा बचता ही नहीं था। वो पैटर्न मेरे अंदर काम कर रहा था। फिर मैंने तोड़ा तो
(59:35) आज मेरे पास निकलना बंद हो गया। सब यहीं पड़ा है। जमा हो गया। तो ऐसे बहुत पैटर्न होते हैं जो हमारे सबकॉन्शियस माइंड में पड़े होते हैं। पैटर्न यानी बिलीफ एंड हैबिट्स। देखिए हमारी 90% ऑफ हमारी एक्टिविटी होती है ना दो चीज कंट्रोल करती है। हमारी बिलीफ एंड हमारी हैबिट। हैबिट होती है वो ऑटोमेटिक कंट्रोल करती है। सुबह ब्रश करने से लेकर रात को सोने तक 90% ऑफ आवर बिहेवियर इज कंट्रोल बाय आवर हैबिट। और यह हैबिट हमारी बचपन से धीरे-धीरे बन जाती है। हम उसके बारे में सोचते भी नहीं है। और उसका एक साइंटिफिक रीजन भी है। कि हमारा ब्रेन 1.5 किलो का होता है।
(1:00:11) हमारी बॉडी का नियरली 2% पार्ट बनता है। और हमारे जो खाते हैं उसका 20% एनर्जी यूज़ कर लेता है वो। उसको बहुत एनर्जी की जरूरत होती है। और सबसे ज्यादा एनर्जी वो सोचने में लगाता है। तो अगर पूरा दिन आप सोचते रहोगे तो आपकी कितनी एनर्जी वहां चली जाएगी। शरीर को मिलेगी ही नहीं। तो जो ज्यादा ओवरथिंकर होते हैं ना रात को सोते सोचते रहते हैं। सुबह उठ के बोलते हैं मैं थक गया। अरे तुमने कुछ काम नहीं किया और कैसे थक गया? क्योंकि पूरी एनर्जी आपकी ड्रेन हो गई। ब्रेन ने यूज़ कर दिया सोचने के अंदर। ऐसा है। तो नेचर ने ऐसे मैकेनिज्म बनाई कि कुछ
(1:00:47) काम ऐसे बना दिए जो बिना सोचे आप कर सकते हैं। और उसने हैबिट बना दी। ऑटो पायलट बना दिया कि इसमें सोचना नहीं पड़ता है। सुबह उठ के सोचते नहीं कि ब्रश करूं या नहीं करूं। ऑटोमेटिक हो जाता है। तो 90% एक्टिविटी हैबिट से बनती है। बट यह हैबिट अच्छी भी हो सकती है, बुरी भी हो सकती है। हमें उसको ट्रैक करना है कि हमारी कौन सी हैबिट अच्छी है जो हमें लाइफ प्रमोटिंग है, कौन सी लाइफ डैमेजिंग है उसके ऊपर काम करो। एटॉमिक हैबिट करके किताबें बहुत फेमस हुई है। और दूसरा है बिलीफ। हम जो सोच समझ के काम करते हैं जो ऑटोमेटिक नहीं है वह
(1:01:21) सोच समझ के काम करने के ऊपर हमारी बिलीफ सिस्टम काम करती है क्योंकि बिलीफ जो है वही हिसाब से हम डिसीजन लेंगे और एक्शन लेंगे तो अगर हमें इंटरनल चेंज करना है हमारे प्रोग्रामिंग में तो ये दो चीजों के ऊपर ज्यादा चेंज करना है कि हमारी बिलीफ सिस्टम के ऊपर काम करो और हैबिट के ऊपर काम करो और जैसे-जैसे इसको ट्रैक करते जाओगे समझते जाओगे उसको तोड़ते जाओगे वैसे-वैसे आपका जीवन अच्छा होता जाएगा बैड हैबिट गुड हैबिट में कन्वर्ट हो जाएगी जो बिलीफ जो आप ब्लॉक बन के बैठी है मेरे अंदर जो मनी का ब्लॉक था वह मैंने दूर किया ऐसे बहुत सारे ब्लॉक होते हैं
(1:01:54) रिलेशनशिप में ब्लॉक होते हैं एक दो बार ब्रेकअप हो जाता है तो ऑल मेन आर नॉट ट्रस्टेड और ऑल वी वुमेन आर नॉट ट्रस्टेड ब्लॉक बन गया फिर वो किसी से जुड़ने में डर जाता है ब्लॉक बन जाता है तो ऐसा बहुत जगह पे होता है तो वही लाइफ में जो भी चीज अगर कोई चाह रहा है जो हमारी ऑडियंस है अपनी किसी भी लाइफ के एरिया में इंप्रूवमेंट चाहता है चाहे वो हेल्थ में चाहे वो रिलेशनशिप में चाहे फाइनेंस से रिलेटेड चाहता है या अपने आप को करना चाहते हैं तो सबसे पहले क्योंकि आपने कहा कि हम आइडेंटिफाई कर सकते हैं हमारे कई जन्मों के भी जो पैटर्न्स हमारी मेमोरी में पड़े हैं तो
(1:02:21) कोई एक ऐसी टेक्निक है जिससे कि वो इसकी शुरुआत कर सके अपने पैटर्न्स को आइडेंटिफाई करने की? इंट्रास्ट्रक्चर इंट्रास्ट्रक्शन अगर आप नहीं कर सकते तो लोगों को पूछो। लोगों को पूछो कि भ मेरी क्या-क्या हैबिट है? तुम्हें लगता है गलत है। लोग बताएंगे। अब होता क्या है? हमें कोई गलत हैबिट बताए तो हम तो गुस्सा हो जाते हैं। तेरा काम कर। मुझे क्यों? [हंसी] हम उसको टोकना समझते हैं। हम समझे ना? राइट? तो पहली बात तो यह कि यू बी ओपन कि मुझे अभी मेरी जीवन को खुली किताब बना देना है। मैं पहले सोचूंगा कि मेरी कौन सी हैबिट है जो मुझे नुकसान करती है। अभी पता
(1:02:57) चल जाएगा अभी तक आपको किस चीज के ऊपर लोगों ने एडवाइस दी है। सोच लो। वो सब आपका पैटर्न है। अरे ऐसा मत कर ये अच्छा नहीं है। ऐसा मत कर और हमने उसको नेगलेक्ट किया है। माइंड योर ओन बिजनेस करके उसको हकाल दिया है। अभी तक बहुत सारे हमारे नजदीक के लोगों ने आपको बताई होगी कि आपकी यह पैटर्न अच्छी है और यह गलत है। ऐसा है। जैसे इर्रेगुलर खाना हेल्थ के लिए अच्छा नहीं है। कभी भी मूड आया कुछ खा लिया, कुछ खा लिया, जंक फूड खा लिया। 10 बार लोगों ने बोला होगा कि अच्छा नहीं है। रेगुलर खाने को बैठिए कर हेल्दी फूड खा। मगर हमने उसको सुना नहीं अनसुनी कर दी है। तो आज तक
(1:03:30) लोगों ने हमें बहुत जगाने की कोशिश की है कि हमारी कौन सी कौन सी गलत हैबिट है और हमने कभी उसके बारे में सोचा ही नहीं। ठीक है? अभी आंख बंद करके सोचो। अभी तक आपको किस चीज के ऊपर लोगों ने एडवाइस की है या टोका है वो सब आपकी हैबिट है जो आपको नुकसान कर रही है। उसके ऊपर एक-एक को पकड़ो और काम करो उसको। और वहां न्यूरोप्लास्टिसिटी काम आती है। क्योंकि न्यूरोलॉजिकल ट्रैक बन जाती है। हैबिट मींस नथिंग बट न्यूरोलॉजिकल ट्रैक। आपको पता है कि न्यूरोप्लास्टिसिटी करके एक साइंस है। हमारे ब्रेन में न्यूरॉन्स होते हैं। वह एक दूसरे के साथ बातें करते रहते
(1:04:02) हैं। कम्युनिकेट करते हैं। जिसको टेक्निकल भाषा में फायरिंग कहते हैं। यानी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल भेजते रहते हैं। तो जितना ज्यादा फायरिंग होगा उतना वायरिंग स्ट्रांग होगा। न्यूरॉन्स वि फायर टूगेदर बाय टूगेदर ऐसा एक रूल है। तो हमारे ब्रेन में एक ही एक्टिविटी बार-बार करने से वो ट्रैक बन जाते हैं। फिर वो एक्टिविटी हमारे कंट्रोल के बाहर हो जाती है। वो एक्टिविटी हमें कंट्रोल करने लगती है जिसको हम हैबिट कहते हैं। तो हमें वो न्यूरोलॉजिकल ट्रैक को चेंज करना पड़ेगा। तभी यह सब कुछ होगा। तो पहले तो अपनी हैबिट को पहचानो। अवेयर हो जाओ कि
(1:04:36) मेरी ये गलत हैबिट है। जैसे अभी फॉर एग्जांपल मेरी चाय की पहले बहुत पीता था। अभी मैं एटलीस्ट मॉर्निंग में मुझे उठ के चाय चाहिए और चाय के कुछ साथ कुछ खाना चाहिए। मुझे पता है कि मुझे अगर और 100 साल जीना है लंबा तो चाय बंद कर दूं मैं। बहुत लोगों ने मुझे एडवाइस की मेरे घर में ग्रीन टी होती है, ब्लैक कॉफी भी होती है। सब कुछ होता है। मगर मैंने कभी उसके ऊपर ध्यान नहीं दिया। मगर अब मैं यहां से डिसाइड करके जाने वाला हूं कि मुझे चाय जल्दी से जल्दी बंद करनी है। जो मॉर्निंग टी है। ऐसे दो-तीन बार पीता था मैं पहले। तो ऐसे बहुत चीजें होती है कि जो मैं पहले
(1:05:08) करता था एक-एक को आइडेंटिफाई करके मैंने मेरी हैबिट चेंज की है। हैबिट ऑटो पायलट पर पड़ी है। अगेन वह प्रोग्रामिंग है। तो हमें वह प्रोग्रामिंग को चेंज करना है। तो जैसे-जैसे हमारे सबकॉन्शियस माइंड में प्रोग्राम पड़ा है, उसको आइडेंटिफाई करो और उसको धीरे-धीरे एक-एक को पकड़ के डील करो। यह काम करेगा आपका कॉन्शियस माइंड। मगर कॉन्शियस माइंड पहले स्ट्रांग एंड हेल्दी होना चाहिए। वही बेचारा इधर-उधर कूदा कूद कर रहा है। ओवरथिंकिंग में पड़ा है। नेगेटिव थिंकिंग में पड़ा है। तो क्या अपनी हैबिट को देखेगा वो? तो पहले बॉस को ठीक करो। फिर बॉस अपने सर्वेंट से अच्छा
(1:05:44) काम ले पाएगा। तो जैसे आपने इतनी सारी बातें बोली कि हम लाइफ में कोई भी एरिया है जहां पर चैलेंज फेस कर रहे हैं। पहले हम उनके पैटर्न्स को आइडेंटिफाई करेंगे। फिर उससे रिलेटेड जो हैबिट्स हैं उनको चेंज करेंगे। तो धीरे-धीरे वो हमारा कॉन्शियस माइंड उस तरफ फोकस करना शुरू करेगा। वो काम करना शुरू करेगा और फिर सबकॉन्शियस उन चीजों को हमारी लाइफ में उन अपॉर्चुनिटीज़ को हमारी लाइफ में लेकर आना शुरू कर देगा। मैनिफेस्ट करना शुरू कर देगा। तो क्या ये बाकी जो एनर्जी लेवल पर चीजें हो रही हैं क्या वो फिजिकल लेवल पर भी हो जाती हैं कि
(1:06:11) अगर कोई अपनी बॉडी के ऊपर चाहता है फिजिकली चाहता है क्योंकि आपने कहा कि सारी बीमारियां साइकोसोमेटिक हो रही हैं तो क्या वो जो एजिंग को लेकर होता है या फिर जो हमारी बॉडी होती है कि हम लोग कई चीजें एक्सेप्ट करके ही बैठे होते हैं। एज के साथ घुटने खराब हो जाएंगे। कमर में दर्द शुरू हो जाएगा। हमारे बाल झड़ जाएंगे। स्किन जो है हमारी लूज़ हो जाएगी। कई बीमारियां लगनी ऑटोमेटिकली शुरू हो जाएंगी। तो क्या उन बिलीफ सिस्टम्स को भी बदला जा सकता है? और उससे हमारी जो बॉडी है वो भी लंबे समय तक रह सकती है। बिल्कुल पहली बात तो यह है कि मुझे अभी तक
(1:06:37) बहुत सारे कॉम्प्लीमेंट मिले कि आप 70 सीख के लगते नहीं हो। उसका क्या सीक्रेट है? तो सबसे पहला सीक्रेट है मेरा शांत मन। मुझे गुस्सा नहीं आता है। मैं ज्यादा एक्साइटेड नहीं रहता हूं। मैं इंस्टेंट रिस्पांस नहीं देता हूं। 99% ऑफ द टाइम। तो जितना मन को शांत रखोगे तो नेचुरली हमारी बॉडीज हीलिंग मोड में रहेगी और हम ये होता है कि हमारी एक ऑटोनॉर्मिक नर्वस सिस्टम होती है जिसमें सिंपैथेटिक पैरासिंैथेटिक दो मोड रहते हैं। जब आप एक्साइटेड रहते हैं, चिंता में रहते हैं, गुस्से में रहते हो तो सिंपैथेटिक मोड है वो एक्टिव रहता है जहां फाइट एंड फ्लाइट
(1:07:14) रिस्पांस होता है जहां कॉर्टिसोल का सिकक्रेशन होता है जो हमारी बॉडी को डैमेज करता है। जब आप मेडिटेशन करते हो तो पैरासिंैथेटिक सिस्टम में वह एक्टिवेट होती है जो आपके बॉडी को हीलिंग करती है। आपको यंग बनाती है और सब कुछ करती है। तो सभी को यही सिखाना है कि आप पैरासिंैथेटिक को ज्यादा एक्टिवेटेड रखो। सिंपैथेटिक को जरूरत पड़े तब जब हमारे सामने कोई डेंजर आ जाए तभी मगर हमारा माइंड है ना वो रियल और इमेजिनेशन में नहीं समझता है। रियल सामने शेयर है तो वही रिस्पांस होगा और हमारे मन में भी शेयर है तो भी वही बॉडी रिसोंड करेगी। फाइट एंड फ्लाइट रिसोंड। तो हमें
(1:07:49) क्या करना है? मेडिटेशन के जरिए हमारे मन को शांत करना है। तो हमारा बॉडी में रिपेयरिंग होगा। आप पेडलेस हो गए। बीमारियों से छुटकारा होगा और मन की शांति का जबरदस्त अनुभव होगा और मैं हमेशा मुझे यही खुशी होती है। मैं हमेशा शांत और हैप्पी रहता हूं। कितना भी उथल-पाथल हो जीवन में प्रॉब्लम तो आते हैं। तो हम अब जो हमारी ऑडियंस है उनको आपने बताया कि शांत मन हमारा सब कुछ कर सकता है जिससे कि वो दरवाजे भी खुलते हैं जो हमें हमारी अपर्चुनिटी का दरवाजा तब बिल्कुल बिल्कुल और फिर हम उनको अपॉर्चुनिटी के दरवाजे खुले हुए हैं। उनको पहचानना भी सीख पाते हैं।
(1:08:22) शांत मन से होता है। शांत मन होता है। नहीं तो सामने अपॉर्चुनिटी होगी और आपको पता भी नहीं चलेगा कि करना क्या है हमको। तो क्या हम कुछ एक्सपीरियंस करवा सकते हैं इस समय पे कि जो ऑडियंस है आप कुछ ऐसा गाइडेड मेडिटेशन टाइप हो ताकि उनका जो मन है वो शांत हो सके। बिल्कुल क्योंकि मैंने कहा ना लोग यही सोचते हैं कि मेडिटेशन मेरे से नहीं होता है क्योंकि मेडिटेशन का उनका जो बिलीफ है वही गलत है। मेडिटेशन यानी कोई एक शांत जगह पर बैठो। कंफर्टेबल पोजीशन में आंख बंद करो और जो भी विचार आते हैं उसको रोको मत, कंट्रोल मत करो। साक्षी भाव
(1:08:53) से देखते जाओ। आज ही आज कम नहीं हो जाएंगे। मगर आपको एक दृष्टा बनने की आदत हो जाएगी। तो दर्शक मित्रों चलिए एक अच्छी जगह पे बैठ जाइए। शांत जगह पे बैठ जाइए। सीधा बैठ जाइए। रीड की हड्डी आपकी सीधी हो तो अच्छा मेडिटेशन होता है। हाथ अपनी गोद में रखिए। चेयर पे बैठे तो यहां रख सकते हैं। यहां रख सकते हैं। चश्मा पहना तो उसको उतार के साइड में रख दीजिए। तो धीरे से अपनी आंख बंद करें और एक दृष्टा भाव से जैसे रोड के ऊपर ट्रैफिक देख रहे हैं। ऐसे अपने विचारों के ट्रैफिक को देखते रहिए। सिर्फ अपने विचारों के ट्रैफिक को देखते रहिए।
(1:09:31) कौन सा विचार आ रहा है? क्या विचार आ रहा है? यह विचार आपके भविष्य के लिए है या भूतकाल के हैं या वर्तमान के हैं? यह अच्छे हैं या बुरे हैं? यानी आपको सुख देने वाले विचार है या दुख देने वाले विचार है। जो भी विचार आते हैं उसको एक ऑब्जर्वर करके ऑब्जर्व करिए। साक्षी भाव से देखते रहिए। आपको और कुछ नहीं करना है। विचारों को सिर्फ साक्षी भाव से देखते ही जाना है। बस विचारों को देखते रहिए। देखिए अभी आपके मन में कौन सा विचार आया। सोचिए देखिए। हो सके तो उसको जज नहीं करना है। सिर्फ
(1:10:18) उसको देखना है। आता है जाता है। उसको रोकना नहीं है। जाने देना है। अवेयरनेस क्रिएट करनी है कि मेरे मन में कितने विचार आते हैं। कौन से विचार आते हैं? कैसे आते हैं? कैसे जाते हैं। सिर्फ विचारों को देखते जाइए। देखो अभी कौन सा विचार आया। ऑब्जर्व करिए। रोकिए मत। जाने दीजिए। अब दूसरा विचार आया होगा या पहला विचार को पकड़ लिया होगा जाने दीजिए किसी को पकड़िए मत कुछ मत करिए जस्ट ऑब्जर्व जस्ट ऑब्जर्व योर थॉट्स जितना थॉट्स को ऑब्जर्व करोगे उतना आप महसूस करोगे कि उसकी स्पीड कम हो गई है। उसकी संख्या कम हो गई है। बहुत लंबी
(1:11:06) प्रैक्टिस के बाद यह इतनी संख्या कम हो जाएगी कि आपको सुख का अनुभव होना शुरू हो जाएगा। इतने सालों से आप बहुत ज्यादा सोचते थे। अब धीरे-धीरे आपका पांव एक्सीलरेटर के ऊपर था। अब आप धीरे-धीरे ब्रेक के ऊपर पांव लगा रहे हैं। अपनी मन की गति को स्लो करने की कोशिश कर रहे हैं। सिर्फ ऑब्जर्व करके अवेयरनेस क्रिएट करके। अवेयरनेस क्रिएट करिए। कि आपके मन में अभी कौन से विचार चल रहे हैं। अवेयरनेस क्रिएट करिए कि आपके मन में कौन से विचार चल रहे हैं। और यह विचार आपके मन में कोई इमोशनल छेड़छाड़ कर रहा है कि नहीं यह भी ऑब्जर्व
(1:11:51) करिए। रोकिए मत। अगर नेगेटिव विचार है तो शायद आपके अंदर दुख की भावना फील होगी या अच्छे विचार है तो शायद सुख की भावना होगी। होने दीजिए। फील करिए। देखते रहिए। उसको रोकने की कोशिश मत करिए। जस्ट फील इट। जस्ट फील इट। आंखें खोलिए। कैसा अनुभव रहा? ऑब्जर्व किया कौन से कौन से विचार आए। कौन सी स्पीड से जा रहे थे। आपके इमोशन को क्या चेंज करवा रहे थे। यही होता रहता है हमारे उसमें। जितना ज्यादा इसको ऑब्जर्व करोगे इतना उसकी संख्या कम हो जाएगी, स्पीड कम
(1:12:35) हो जाएगा और एक दिन आपको इतना सुख मिलेगा आप सोच भी नहीं सकते। मैं तो नया-नया इस लाइन में आया हूं। जो पुराने लोग होंगे जो बचपन से करते होंगे उनको कितना फायदा होता होगा। ऐसा है। तो यही है हमारा जीवन। सुखी होने का सही चाबी है। हमारी संस्कृति में पढ़िए सब। हम तो अभी तक वेस्टर्न किताबें पढ़ के यह सीखते थे। अब जमाना आया कि हमारी किताबों को भी खोलें और इसको सीखें। तो दिस इज व्हाट और जैसे एजलेस बनना है तो भी मेडिटेशन का बहुत रोल है। क्योंकि हमारी एज को डैमेज करने वाला सबसे बड़ा जो चीज है ना वो स्ट्रेस है। और स्ट्रेस की एक ही
(1:13:14) दवाई है मेडिटेशन और कोई दवाई नहीं है। तो स्ट्रेस अपनी लाइफ से कंट्रोल कर लिया तो आपका 80% काम हो गया। सोच लो एंटी एजिंग थेरेपी में। फिर कोई क्रीम लगाने की जरूरत नहीं है। बोट की जरूरत नहीं है। फिलर की जरूरत नहीं है। अंदर से तेज निकलेगा जिससे लोग आकर्षित होंगे। यह होगा। तो यह है एंटी एजिंग फार्मूला। यही है हमारे कॉन्शियस माइंड के पावर को शांत करने की टेक्निक। मैं चाहता हूं कि लोग इसको बराबर समझे। इस्तेमाल करें और खास करके हमें कमेंट करें। इसमें कौन सी चीज अच्छी लगी? क्या आप रिपीट करना चाहते हो? क्या डिटेल में जानना चाहते हो? आप हेडलेस बॉडी के
(1:13:49) बारे में डिटेल में जानना चाहते हो? यह मन को शांत करने का जो विज्ञान है पतना ऋषि का वह करना चाहते हो या सबकॉन्शियस माइंड से कैसे और ज्यादा काम लिया जाए वो जानना चाहते हो आप बताइए हो सकता है कि आपकी डिमांड अच्छी रही ज्यादा लोगों की रही तो हम फिर से आपके सामने आएंगे हमारा तो काम ही है आपको जो चाहिए वो देने का ठीक है मजा आ गया आपके क्वेश्चन सुन के आपसे बातें करके ये हमारा सब सीक्वेंस में तीसरा पडकास्ट है अगर ये पसंद आया तो चौथी बार मिलेंगे और पहले भी हमें बहुत अच्छे अच्छे व्यूज मिले हम तो मजा आ गया। थैंक यू वेरी मच।
(1:14:23) हां नहीं पहले अभी जो हमने किया था ट्रांजैक्शनल एनालिसिस पे किया था हमने और दूसरा हमने एजलेस बॉडी पे किया था। वो भी बहुत पसंद आया था सबको। एंड डेफिनेटली जो आज का पडकास्ट है ये कहीं ना कहीं हमारी लाइफ की जैसे कि आपने बात कही थी कि जितनी भी प्रॉब्लम्स होती हैं कहीं ना वो कहीं ना कहीं हमारे अशांत मन की वजह से ही निकल कर आती है और वो स्ट्रेस में कन्वर्ट होता है। अशांत मन जो होता है और उसी को ही हम शांत कर लेंगे तो सारी जो दरवाजे हैं वो खुल जाएंगे। एक ही कारण है। आसान मनी हमारे हर दुख का कारण है। बस और कुछ नहीं है।
(1:14:52) बिल्कुल सही बात है। तो थैंक यू सो मच अपना कीमती समय हमें देने के लिए। थैंक यू। थैंक यू। थैंक यू।
Author Name:Dr. Shikha Sharma Rishi
Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@drshikha
Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=g2mEjxovLXM
Title: Secrets of Patanjali Yog Sutra to Reprogram Your Subconscious Mind | Dr. Shikha Podcast 100
Author Name: Dr. Shikha Sharma Rishi
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(00:00) Introduction
(01:32) Journey from MBBS to Mind Power
(03:09) Difference between Brain & Mind
(05:11) Power of Mind
(09:35) Conscious vs SubConscious Mind
(11:55) Negative Programming of Subconscious Mind
(13:31) 5 Programming Languages of Conscious Mind
(17:39) Memories of Past Life
(24:35) Acres of Diamond Book Lesson
(26:38) Patanjali Yog Sutra
(36:52) Positive vs Negative Thoughts
(50:43) 5 Vrittiyan according to Patanjali Yog sutra
(53:57) Past Painful Memories & Subconscious Reprogramming
(1:08:35) Guided Meditation to Reprogram Subconscious Mind
Disclaimer: This video is intended solely for educational purposes and opinions shared by the guest are his/her personal views. We do not seek to defame or harm any person/brand/product mentioned in the video. Our goal is to provide information to help audience make informed choices.
#drshikhasharmarishi #manifestation #podcast
Transcript:
(00:00) हमारे सबकॉन्शियस माइंड में बहुत पावर होती है जिससे कि हम अपनी लाइफ में जो चाहे वो मैनिफेस्ट कर सकते हैं। लेकिन हमारे कॉन्शियस माइंड में भी उतनी ही ज्यादा पावर होती है क्योंकि वो हमारे सबकॉन्शियस माइंड को चलाता है। इतना सारा कंफ्यूजन है। योग मतलब हम यही समझते हैं कि वो गार्डन में जो होता है सुबह-सुबह में और जो टीवी पर रामदेव बाबा दिखाते हैं वो योग है। वो योग नहीं है। वो कौन सी एक प्रॉब्लम है जिसकी वजह से हमारी लाइफ में बाकी सारी प्रॉब्लम्स होती है। उनका रूट कॉज क्या होता है? आपका मन अच्छा नहीं है, शांत नहीं है, अशांत मन है
(00:32) तो कैंसर, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन सब बीमारियां शुरू कर। कौन सा एक वो तरीका है जिससे कि हम अपनी लाइफ की हर एक प्रॉब्लम को सॉल्व कर सकते हैं। फिल्म आई थी ओम शांति ओम जिसमें शाहरुख खान हाथ में दारू का बोतल लेके विजुअलाइज कर रहा है। फिल्मफेयर अवार्ड मगर वो अगले जन्म में मिलता है उसको। विजुअलाइज ये जन्म में किया मिलता है अगले जन्म में। तब समझ में आया कि ये मेमोरी के हार्ड डिस्क आपका प्रोग्रामिंग लेके ही आगे जाते हैं। यंग दिखना चाहते हो या फिर करियर में आगे बढ़ना चाहते हो। अपनी लाइफ के हर एक एरिया को हम कैसे इंप्रूव कर सकते हैं?
(01:00) सुसाइड कौन करता है? कोई नॉर्मल इंसान करेगा? डिस्टर्ब माइंड वाला ही करेगा। अगर पहले से उनको ट्रेनिंग दी जाती होती है कि मन को कैसे शांत रखना है तो क्यों सुसाइड करेगा? इन सब चीजों के बारे में आज जानने के लिए हमारे साथ हैं डॉक्टर जितेंद्र अडिया जिन्होंने कि 135 बुक्स ऐसी लिखी हैं जो कि लोगों की लाइफ में मेजर ट्रांसफॉर्मेशन लेकर आ रही हैं। [संगीत] तो आज हम आपसे सबकॉन्शियस माइंड की पावर के बारे में जानने वाले हैं। जिसके बारे में आजकल बहुत बात होती है कि सबकॉन्शियस माइंड से ही हम उसको रीप्रोग्राम करके अपनी लाइफ में जो चाहे वह लेकर आ सकते
(01:32) हैं। पर उसके बारे में जानने से पहले मैं आपसे यह जानना चाहती हूं कि आप एक डॉक्टर हैं। आपका इंटरेस्ट इस फील्ड में कैसे आया? वेरी गुड क्वेश्चन। सब लोग यही पूछते हैं कि मैं एलोपैथी डॉक्टर होते हुए 30 साल मेडिकल फील्ड में काम करके मैं कैसे ये फील्ड बदल दिया? तो पहला सवाल यह है कि कोई भी बड़ा डिसीजन हो या शिफ्ट होता है ना तो उसमें दो फैक्टर होते हैं। पुश फैक्टर एंड पुल फैक्टर। पुश फैक्टर मेरे लिए क्या था? बिकॉज़ आई वाज़ नॉट हैप्पी विद माय जॉब। मैं मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर था। वहां इतना पॉलिटिक्स थी, गंदी पॉलिटिक्स थी कि बात
(02:03) भी नहीं कर सकते। इतनी गंदी पॉलिटिक्स थी। तो मुझे लगता था यहां मेरा ग्रोथ नहीं है। आई वास नॉट हैप्पी। मेरे बॉस के साथ मेरी बहुत टक्कर होती थी। झगड़े होते थे। तो मैं कुछ बाहर निकालने का रास्ता ढूंढ रहा था। मगर जब तक बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिले तब तक तो वहां टिके रहना चाहिए। इतने में मुझे किसी ने बुलाया कुछ एक्स्ट्रा सब्जेक्ट के ऊपर बोलने के लिए और मैंने सब्जेक्ट सिलेलेक्ट किया पावर ऑफ सबकॉन्शियस माइंड। तब मैं जोसेफ मर्फी को पढ़ रहा था। तो मैंने बोला मैं पावर ऑफ माइंड के बारे में बोलूंगा और उसने मुझे बुला लिया और मैं पहला लेक्चर दिया वह
(02:35) जमाना 30 35 साल पहले तो बोर्ड में लिख के तब टेक्नोलॉजी थी ही नहीं कॉन्शियस माइंड सबकॉन्शियस माइंड ऐसा मैंने समझाया 300 बच्चे थे इंटरनेशनल कैंप था उसमें आए थे जैसे ही मैंने खत्म किया और बाहर निकला सब बच्चे मेरे पीछे पीछे ऑटोग्राफ फोटोग्राफ के लिए मैं कभी ऐसा सोचा भी नहीं था मैं तो हैरान हो गया मैंने क्या कर दिया ये सब लोग मेरे पीछे इतना क्यों पड़े हैं फिर मैंने रियलाइज़ किया दो चीज कि यह टॉपिक सबको पसंद आएगा। सबके काम के लिए है और यह मैं अच्छा सिखा सकता हूं क्योंकि इतना अच्छा रिस्पांस देगा। उसके बाद मैंने सोच
(03:06) लिया कि मुझे रास्ता मिल गया अब इसे निकालने का मेडिकल कॉलेज से। तो सबकॉन्शियस माइंड पे आप कहते हैं कि काम करके लोगों का मतलब जिंदगी में ट्रांसफॉर्मेशन आ जाती है। पूरा जिंदगी उनकी बदल जाती है। बिल्कुल अगर सही समझे और इस्तेमाल करें तो आ जाती है। बिल्कुल बिल्कुल। तो जो हम सबकॉन्शियस माइंड हमारा है तो हम अगर स्टार्टिंग से इसको समझें कि अगर कोई पहली बार ही सुन रहा है सबकॉन्शियस माइंड के बारे में तो ये सबकॉन्शियस माइंड होता क्या है? मतलब माइंड ही हमने आज तक सुना है कि माइंड पहली बात तो ये है कि माइंड क्या होता है? लोगों को ये नहीं पता। हमारे मेडिकल
(03:34) डॉक्टर को भी पता नहीं है। अब कोई मेडिकल एलोपैथी डॉक्टर को पूछो कि माइंड क्या है? तो नहीं बताएंगे क्योंकि हमें मेडिकल कॉलेज में माइंड के बारे में कुछ सिखाते ही नहीं है। सिर्फ ब्रेन के बारे में सिखाते हैं और लोगों को यह भी कंफ्यूजन है कि दोनों सेम है या डिफरेंट है। इट इज डिफरेंट। दोनों सेम नहीं है। कंप्यूटर की भाषा में बात करें तो आसान है। ब्रेन इज द हार्डवेयर एंड माइंड इज द सॉफ्टवेयर। ब्रेन एक पदार्थ है। बॉडी का एक पार्ट है जिसको देख सकते हैं, छू सकते हैं, काट सकते हैं। उसका नाश कर सकते हैं। फोटो निकाल सकते हैं। ऑपरेशन कर सकते हैं। जो
(04:04) हमारी खोपड़ी में रहता है। मन है वह एक अदृश्य शक्ति है। बिजली जैसी शक्ति है। वैसे एक अदृश्य शक्ति है। जिसको नहीं देख सकते हैं। नहीं छू सकते, नहीं काट सकते, नहीं फोटो निकाल सकते हैं। नहीं उसका नाश कर सकते हैं। उसमें तो तीन चॉइस है। या यूज करो अच्छी तरह फायदा होगा। नहीं यूज करो कुछ भी नहीं होगा और मिसयूज करो तो नुकसान होगा क्योंकि यह शक्ति है। तो मैं जो सिखाता हूं माइंड के बारे में सिखाता हूं। थोड़ा सा ब्रेन के बारे में सिखाता हूं क्योंकि हार्डवेयर और मैं हमेशा कहता हूं हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर ब्रेन हमारा हार्डवेयर है। माइंड सॉफ्टवेयर है। दोनों
(04:37) की जरूरत होती है तब काम होता है। तो मैं अभी तक मैं सॉफ्टवेयर के बारे में सिखाता था। और यह मैंने पतली युग सूत्र में सुना कि हार्डवेयर को भी आप अपग्रेड कर सकते हैं। न्यूरोप्लास्टिसिटी में सुना कॉन्शियस माइंड को अपग्रेड कर सकते हैं। तो अब मेरा और दायरा बढ़ गया कि अब मैं दोनों के बारे में ज्यादा सिखाता हूं। कॉन्शियस माइंड एंड सबकॉन्शियस माइंड दोनों के बारे में एंड ब्रेन के बारे में। तो धीरे-धीरे इसके अंदर आ गया। तो हमारा जो मन है वह एक हमारे शरीर का शक्ति का केंद्र है यानी कि सॉफ्टवेयर है और यह सॉफ्टवेयर को जितना ज्यादा समझेंगे उतना
(05:11) फायदा होगा। हार्व यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विलियम जेम्स ने कहा था कि दुनिया के सफल से सफल इंसान ने भी अपनी मन की शक्तियों का कभी 10% से ज्यादा इस्तेमाल नहीं किया। तो मैंने यह सुना तो मेरे मन में सवाल उठा कि ऐसा क्यों होता है कि 10% से ज्यादा कोई इस्तेमाल ही नहीं करता। फिर मेरी रिसर्च यह कहती है कि इसका सिर्फ और सिर्फ कारण इग्नोरेंस है। किसी को इसके बारे में पता नहीं है। जब मैंने स्टार्ट किया तो लाखों में एक आदमी जानता था। अभी भी 100 में से एक आदमी जानता है। वो भी थोड़ा बहुत जानता है। तो मैं अज्ञानता की बात करता हूं। हम
(05:41) तो देखिए मैंने मेनटन में प्रोग्राम किया था। जहां रिटायर्ड डॉक्टर आते हैं। जिसकी पूरी जिंदगी न्यूयॉर्क के मेनटन में बीती हुई है। 200 लोग थे। मैंने उनको सबसे पहले सवाल पूछा। हाउ मेनी ऑफ यू नो अबाउट द पावर ऑफ़ सबकॉन्शियस माइंड? रे योर हैंड? कितने हाथ ऊपर वो होंगे सब मेडिकल डॉक्टर थे। कितने हुए होंगे? एक भी नहीं। एक भी नहीं। मैंने लॉस एंजेलिस के डॉक्टर के लिए किया था। सेम क्वेश्चन नो रिसोंड। मैं जर्मनी गया था। जर्मनी में स्टूडगार्ड यूनिवर्सिटी है जहां BMW बनती है। तो वहां के प्रोफेसरों को मैं ट्रेनिंग दे रहा था।
(06:14) ऐसी जगह पे मैं खास पूछता हूं कि हाउ मेनी ऑफ यू नो अबाउट द पावर ऑफ़ सबक? वहां भी कोई नहीं जानता था। देखो इतना एडवांस शेयर में तो कितनी सारी अज्ञानता है। तो हमारे लिए कितना स्कोप है कि अगर यही सिखाते सिखाते हमारी जिंदगी पूरी हो जाए फिर भी डिमांड [गला साफ़ करने की आवाज़] पूरी नहीं होगी। इतनी डिमांड है। सिर्फ लोगों को पता नहीं है कि माइंड पावर सीखने से हमारे जीवन में क्या परिवर्तन आ सकता है। क्या रिजल्ट मिल सकता है। वैसे तो आजकल बहुत सारे ट्रेनर बोलते हैं मैनिफेस्टेशन, लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन। तो आजकल तो बहुत है। मैं तो 30 साल पहले शुरू किया ना तब तो
(06:45) बिल्कुल खाली था सब कुछ और मेरा तो एक बार ऐसा ही हुआ था कि एक ऑडिटोरियम में प्रोग्राम था जो हाउसफुल हो गया था। बाद में ₹100 की मेरी एंट्री टिकट 500 में ब्लैक में बिकी थी। तो मुझे लगा यार क्या हो गया ये तो एक जमाने में अमिताभ की फिल्मों की टिकट ब्लैक में मैं लिया करता था। आज लोग मेरी टिकट खरीद रहे सुनने के लिए पावर ऑफ सबकॉन्शियस माइंड। तो जमाना था मगर अब तो बहुत कुछ बदल गया। मेरा नॉलेज बदल गया। स्टाइल बदल गई। टेक्नोलॉजी आ गई। कंपिटिट आ गए तो और इंप्रूव करना पड़ा। यह सोशल मीडिया आ गया। पूरा जमाना चेंज हो गया। बट बेसिकली यह नॉलेज सबके
(07:20) पास जाना चाहिए कि सबकॉन्शियस माइंड को हम कैसे इस्तेमाल करें और जीवन को कैसे बदले और यूजुअली क्या होता है? सबके बड़े-बड़े सपने होते हैं। सपने देखता है हमारा कॉन्शियस माइंड। जबकि पूरा करने में हमें हेल्प की जरूरत होती है सबकॉन्शियस माइंड की। जो लोग जानते नहीं है तो सपने अधूरे रह जाते हैं तो डिप्रेशन में जाते हैं या क्रिमिनल बन जाते हैं या फ्रस्टेटेड होके रहते हैं तो यही हमारा प्रयास होना चाहिए कि लोग अपने पावर को समझे वैसे सीक्रेट आने से और हमारा काम आसान हो गया सीक्रेट तो पिछले 10 12 साल में आया मगर फिर भी बहुत आसान हो गया क्योंकि इतने लोगों ने
(07:53) देखा कि अब लोग समझने लगे कि कुछ नया सीखने से जीवन में बदलाव आ सकता है तो लोगों को सीखना चाहिए सपने देखना और सपने पूरे करने का जो विज्ञान है जो मैं सिखाता हूं वह करना चाहिए। बिलकुल तो जैसे मैंने कहा कि माइंड इज अ सॉफ्टवेयर। ब्रेन इज अ हार्डवेयर। दो माइंड होते हैं। कॉन्शियस माइंड एंड सबकॉन्शियस माइंड। कॉन्शियस माइंड इ हैज़ ओनली 10% पावर 90 पावर 90% पावर इज़ वि सबकॉन्शियस माइंड। तो दोनों का ज्ञान हुआ और उसका कैसे कॉम्बिनेशन करके हमें सफलता पानी है। सीख लिया तो जीवन में उजाला ही उजाला आया। हमारे जीवन में संघर्ष है ही नहीं। संघर्ष
(08:30) हमने पैदा किया। अज्ञानता की वजह से एक बार यह ज्ञान आ गया और उसके रास्ते पर चले मेरा जीवन पूरा बदल गया। जो लोग मुझे पहले से जानते हैं उसको पता है कि मैं क्या था और कहां पहुंच गया। जस्ट बिकॉज़ ऑफ़ दिस नॉलेज पावर ऑफ़ सबकॉन्शियस माइंड। तो लोगों को हमें यही सिखाना है कि इसके बारे में सीखो। बिल्कुल सही बात है। जो तो जो अज्ञानता है इस समय पे वो आज के पॉडकास्ट से हम काफी हद तक अपनी तरफ से कोशिश करेंगे कि जरूर करें और वो अपने अंदर से ही वो बदलाव लेकर आए जिससे कि उनके जो भी सपने हैं वो उसको पूरे कर सकें। तो जैसे कि आपने बात करी
(09:00) क्योंकि जो मोस्टली लोग बात करते हैं वो यही कहते हैं कि कॉन्शियस माइंड से ज्यादा सबकॉन्शियस माइंड के ऊपर फोकस करना है। हमें सबकॉन्शियस माइंड की पावर है। आपने कहा कॉन्शियस और सबकॉन्शियस दोनों को हम साथ में लेकर चलेंगे। दोनों में वो पावर है कि वो हमारी उस जिंदगी को लेकर आ तो हमारी जो जिंदगी जो हम चाहते हैं हम वो जी सकते हैं दोनों माइंड को अपने उसकी नॉलेज उसको कैसे यूज करना है एक्सैक्टली जानकर। सिखाएंगे आज। जी बिल्कुल सही बात है। तो हम शुरुआत करते हैं पहले सबकॉन्शियस माइंड से जो कि 90% हमारी लाइफ को कॉन्शियस माइंड काम करता
(09:29) है। कॉन्शियस माइंड से करा तो अच्छा रहेगा। ठीक है। तो फिर हम सब हम शुरुआत करते हैं पहले कॉन्शियस माइंड से जो कि आपने बोला कि जिसको कि हम मोस्टली यूज़ कर रहे होते हैं जो सामने हम देख रहे होते हैं जो कॉन्शियस है हमारा तो उसमें हमें क्या बदलाव लेकर आना चाहिए कि हमारी जिंदगी में बदलाव आ सके। पहली बात तो जैसे मैंने बताया कॉन्शियस माइंड के पास सिर्फ 10% पावर है। मगर कौन से कौन से पावर्स हैं? थिंकिंग सोचना लॉजिक तर्क लड़काना एनालिसिस इंटरप्रिटेशन जजमेंट डिसीजन सिलेक्शन कैलकुलेशन विल पावर और एक्शन लेना इतने पावर्स है जो हम
(10:07) कॉन्शियसली यूज़ करते हैं। लोगों को पता है कि ये पावर हम यूज़ करते हैं। तो ये आपने कॉन्शियस माइंड के बारे में बताया। ऐसे ही हमारे सबकॉन्शियस माइंड की क्या पावर्स होती हैं? तो जैसे मैंने बताया यह पावर कॉन्शियस माइंड के हैं। अब सबकॉन्शियस माइंड का पावर देखें तो उसके तो 90% है तो बहुत होंगे। तो उसमें से मेन पावर मैं आपको बता दूं। जैसे मैंने कहा कि कोई भी हमारी इच्छा को हकीकत में बदलना है। गोल को अचीव करना है तो सबकॉन्शियस माइंड करेगा। तो मेन उसका क्या पावर है कि एक बार आपने उसको फीड कर दिया तो आपके गोल को हकीकत में बदलने में वह काम करेगा। तो
(10:39) उसके पास मेमोरी पावर होता है। यानी आपने जो भी उनको कमांड दे दिया। हां, एक बात खास बताना है कि दोनों के रिलेशनशिप क्या है? कॉन्शियस माइंड बॉस है, सबकॉन्शियस माइंड सर्वेंट है। यानी बॉस जो चाहेगा वो सबकॉन्शियस माइंड को देना पड़ेगा। अलादीन के जादुई चिराग की कहानी है। उसमें जो अलादीन था वो कॉन्शियस माइंड था। जीनी था वो सबकॉन्शियस माइंड था। और जो चिराग था वो हमारा ब्रेन है। तो अगर अलादीन को यह ट्रेनिंग दी जाए कि जीनी को कैसे जगाना है और कैसे ऑर्डर देना है तो उनके हर सपने पूरे होंगे। और एक भाषा में बात करें तो कॉन्शियस माइंड इज द प्रोग्रामर एंड
(11:13) सबकॉन्शियस माइंड इज द प्रोग्रामेबल कंप्यूटर। हमारे जीवन में हम जो भी डिसीजन एक्शन लेते हैं उससे हमें रिजल्ट मिलता है और यह डिसीजन और एक्शन हमारे पुराने प्रोग्राम से आता है। बचपन से ले अभी तक हमने जो भी अनुभव किए हैं उससे हमारा एक प्रोग्रामिंग हो चुका है। जैसे कंप्यूटर प्रोग्रामिंग होता है और वह हमारे जीवन को डिक्टेट करता है। अगर हमारे जीवन में हमें चाहिए वैसा रिजल्ट नहीं है तो इसका मतलब यहां कहीं प्रोग्रामिंग में गड़बड़ है। तो यह प्रोग्रामिंग हमें चेंज करना पड़ेगा और यह प्रोग्रामिंग चेंज करने का काम हमारा प्रोग्रामर यानी कि कॉन्शियस माइंड करेगा।
(11:45) तो मैं यह सिखाता हूं कि आप सबकॉन्शियस माइंड के अंदर जो प्रोग्राम पड़ा है जो गलत है जिसकी वजह से आपको चाहिए वो रिजल्ट नहीं मिलता उसको कैसे बदलना है। तो यह बेसिक ज्ञान रहता है। तो जैसे आपने बताया कि हमारे कॉन्शियस माइंड के पास ये ये सारी पावर होती है थिंकिंग की उसकी और मेन तो क्या हम मेन जो आपने कहा कि जो गड़बड़ होती है जिसकी वजह से हमारी जिंदगी में नहीं हम वो चीजें कर पा रहे होते। आपने कहा कि वो गड़बड़ हुई होती है अंदर प्रोग्रामिंग में तो क्या वो कॉन्शियस माइंड में गड़बड़ हुई होती है और अगर है तो दोनों में हुई होती है।
(12:12) मेनली सबकॉन्शियस माइंड में गड़बड़ होती है। और वो किस तरीके से गड़बड़ होती है कि हम कॉन्शियसली करते हैं उन गड़बड़ों वो आगे जाके बताऊंगा मैं आपको। देखिए मैंने कहा कि हमारा जो जीवन है वो हमारा सबकॉन्शियस माइंड में जो प्रोग्राम पड़ा है उसका रिजल्ट है। तो अगर जीवन में जो हमें चाहिए वो नहीं है या बहुत ज्यादा नेगेटिव है तो हमारा बचपन से लेके नेगेटिव प्रोग्रामिंग हुआ है। वो कैसे हुआ है? हमने बचपन से लेकर अभी तक जो भी अनुभव किए फैमिली में, स्कूल में, कॉलेज में, समाज में यह अनुभव हमारा प्रोग्रामिंग बनाता जाता है। तो जिनके
(12:43) जीवन में ऐसी नेगेटिविटी बहुत थी फैमिली के अंदर थी जैसे फादर एंड मदर का झगड़ा चल रहा था, डवोर्स का केस चल रहा था तो नेगेटिव प्रोग्रामिंग होता है। फैमिली में और दो चार लोग नेगेटिव थे। वो इनको टोकते रहते हैं तो नेगेटिव प्रोग्रामिंग हो जाता है। तो ये सब अनुभव से हमारा नेगेटिव प्रोग्रामिंग हो जाता है जो हमें जीवन में दुख की तरफ ले जाता है। तो ऐसे हमारा प्रोग्रामिंग बनता है। तो अभी हमें वो प्रोग्रामिंग को लेके भगवान को दोष देके या थैंक यू कह के जीना नहीं है। क्योंकि अभी का साइंस यह कहता है कि यू कैन चेंज योर प्रोग्राम एनी टाइम। इसके लिए आपको
(13:15) सीखना पड़ेगा। कॉन्शियस माइंड को अलर्ट बनना पड़ेगा। ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी कि यह प्रोग्रामिंग कैसे चेंज करें। और जैसे कंप्यूटर में प्रोग्रामिंग की लैंग्वेज होती है ऐसे यहां भी प्रोग्रामिंग की लैंग्वेज होती है। पांच लैंग्वेज है उसकी। पांच में से कोई भी एक लैंग्वेज यूज करो। पांचों के पांचों भी यूज़ कर सकते हैं। तो पहली लैंग्वेज है इंटेंशन संकल्प शक्ति। व एंड डार ने किताब लिखी है पावर ऑफ इंटेंशन। जब आप कोई भी चीज का संकल्प कर लेते हो तो ऑटोमेटिकली सबकॉन्शियस माइंड को कमांड चल चला जाता है कि बॉस को यह चाहिए। दूसरा है आइडेंटिफिकेशन। आप किसी
(13:49) को रोल मॉडल बना दो। जैसे मैं यह फील्ड में आया तो मैं टोनी रोबिनस के बारे में सुनता था। इंडिया में तो कोई ट्रेनर था ही नहीं। तो मेरे रोल मॉडल वही थे टोनी रोबिनंस। तो उसके बारे में सोचा करता था। उनके मैंने दो प्रोग्राम भी अटेंड किए। एक बार लॉस एंडलेस में यूपीw अनलिस्ट दी पावर विद इन एक बार बाली जाके मैंने डेट वि डेस्टिनी दो प्रोग्राम किए। उसको देखना चाहता था वो कैसे ऑपरेट करते हैं? कैसे सोचते हैं? बॉडी लैंग्वेज क्या है? तो मेरे रोल मॉडल थे। तो जब आप किसी को रोल मॉडल बना लेते हो, उसके बारे में सोचते हो, उसकी स्टडी करते हो, उसको फॉलो करते
(14:18) हो, तो आपके अंदर वह क्वालिटी आने लगती है। तो इट इज आल्सो अ प्रोग्रामिंग लैंग्वेज। तीसरा है विजुअलाइजेशन जिसके बारे में आज दुनिया जानती है। विजुअलाइजेशन है वो चित्र की भाषा है। चौथी है एफमेशन या ऑटो सजेशन जो कहते हैं, सेल्फ टॉक कहते हैं जो भी है और पांचवी है फीलिंग। उसमें सबसे पावरफुल भाषा फीलिंग है। बहुत सारे लोग मुझे बोलते हैं सर मेरे से विजुअलाइज नहीं हो रहा है। मगर फील तो हुआ ना कि तू Mercedes चला रहे हो। बस चित्रण नहीं दिखा तो चलता है। विजुअलाइन के बारे में बहुत ही गलतफहमी है कि विजुअलाइजिंग यानी क्लियर दिखना चाहिए। जैसे सिनेमा हॉल पे
(14:52) दिखता है। विजुअलाइजेशन इज नॉट ऑब्जेक्टिव सीइंग। इट इज़ सब्जेक्टिव फीलिंग। जैसे भूत किसी को नजर से दिखता नहीं है। मगर कुछ लोग बोलते हैं ना कि मुझे भूत [नाक से की जाने वाली आवाज़] दिख गया। भूत का आभास होता है। उनको फील होता है कि मैंने यहां भूत देखा है। विजुला हैं भी ऐसा ही है कि आपको फील होता है। क्लियरली दिखता नहीं है। ओ सब इसलिए लोग ऐसा मानते हैं कि मेरे से विजुला हिंड नहीं होता। कई लोग कहते हैं कि मुझे कुछ नहीं दिखाई दे। नहीं दिखाई दे। मैं कोशिश कर रहा हूं नहीं दिखा रहा है। डोंट वरी नहीं दिखाई दे। तुम फील करो कि तुम Mercedes चला रहे हो। तुम
(15:18) फील करो कि तुम धनवान बन गए हो। देखो फीलिंग का पावर सबसे ज्यादा है। तो ये पांच लैंग्वेज है। पांच में से कोई भी एक लैंग्वेज यूज़ करो रिजल्ट मिलता है। पांचों के पांचों यूज़ करो ना क्या प्रॉब्लम है? फ्री में है। सीख लो बस क्या करना है? सिस्टम से सीख लो के क्या करना है? बस हो जाता है। बिल्कुल सही। तो यह प्रोग्रामिंग लैंग्वेज है। तो मैं यह कहता हूं कि पहले कॉन्शियस माइंड के पावर को समझो। फिर इसकी प्रोग्रामिंग लैंग्वेज को समझो। फिर सबकॉन्शियस माइंड के पावर को समझो और वो आपको कैसे हेल्प कर सकता है अपने मैनिफेस्टेशन के लिए। सपनों
(15:49) को हकीकत में बदलने के लिए यह सीखो। और सब कुछ हो जाएगा। एनीथिंग एंड एवरीथिंग इज पॉसिबल। अब विचार की बात करें तो विचार हमारे कहां से आता है? तो उसका एपिसेंटर हमारे सबकॉन्शियस माइंड में बिलीफ है। जैसे हमारी बिलीफ रहेगी वैसे ही विचार आएंगे। अगर हमारी नेगेटिव बिलीफ रही तो नेगेटिव विचार आएंगे। तो बेसिकली आपको विचार चेंज करना है। देखिए थिंकिंग इज अ हैबिट। हैबिट एंड बिलीफ हमारे सबकॉन्शियस माइंड की पकड़ में रहता है। कंट्रोल में रहता है। और आपने देखा होगा कि थिंकिंग इज अ हैबिट। कुछ लोग हैबचुअली पॉजिटिव थिंकर रहते हैं। कुछ लोग हैबचुअली नेगेटिव थिंकर
(16:23) रहते हैं। यानी हैबिट वहां काम कर रही है। सबकॉन्शियस माइंड डिक्टेट करता है कि तुम्हें कौन से विचार करने हैं। पॉजिटिव थिंकिंग या नेगेटिव थिंकिंग। तो जो हमें रिपेयर करना है वो तो सबकॉन्शियस माइंड के अंदर जाके ही करना है। तो थिंकिंग इज अ हैबिट। दूसरी बात है कि पावरफुल थॉट करना वो भी हमारे प्रोग्रामिंग के ऊपर है। बचपन से ही हमें सिखाया गया है कि बैठ जा तू मत कर तेरे से कुछ नहीं होगा। ये वो तो हमारी बिलीफ बन जाती है कि मैं बड़ा काम कुछ नहीं कर सकता हूं। तो हम बड़ी सोच भी नहीं सकते। 1 लाख, दो लाख की इनकम से ज्यादा
(16:52) कोई सोच ही नहीं सकता है। बहुत कम लोग रहते हैं वो जो लिमिट को तोड़ के सोचते हैं मुझे 1000 करोड़ कमाना है, 2000 करोड़ कमाना है। तो ये सब कुछ जो रिपेयरिंग करना है वो हमें सबकॉन्शियस माइंड में करना है। तो ऑटोमेटिकली सब कुछ हो जाएगा। दूसरी बात यह है कि मैं अभी तक यही सिखा रहा था कि सबकॉन्शियस माइंड को कैसे इस्तेमाल करें? तो बहुत लोग मुझे पूछते हैं कि क्या आप माइंड को कैसे स्ट्रांग करना सिखाते हो? बोला नहीं स्ट्रांग करना नहीं। माइंड तो स्ट्रांग ही होता है। सबकॉन्शियस माइंड को कैसे इस्तेमाल करना सिखाता हूं। मगर मैं
(17:18) अभी जो सब्जेक्ट के ऊपर काम किया पतंजलि योग सूत्र वह तो पूरा विज्ञान वही है कि कॉन्शियस माइंड को कैसे स्ट्रांग करें। पूरा विज्ञान है उसके ऊपर। बहुत बियों्ड माइंड पावर है। मैं सोचा वहां जो मेरे पार्ट में मिसिंग था वो तो मुझे मिल गया। तो अब मैं ज्यादा उसके ऊपर कहता हूं कि पहले कॉन्शियस माइंड बॉस को स्ट्रांग बनाओ ताकि वो सबकॉन्शियस माइंड का ज्यादा इस्तेमाल कर सके। तो यह हुआ कॉन्शियस माइंड। अब सबकॉन्शियस माइंड क्या करता है? सबसे पहले तो उसके पास मेमोरी की हार्ड डिस्क होती है। जो भी हम सपने देखते हैं, विजुलाइज़ करते हैं, बोलते हैं, सब
(17:47) सबकॉन्शियस माइंड में रिकॉर्डिंग में चला जाता है। और यह रिकॉर्डिंग परमानेंट होता है। जन्मोजन्म तक चलता है। वो प्लेन में ब्लैक बॉक्स रहता है ना ऐसा ब्लैक बॉक्स ऐसा रहता है। हम मर जाते हैं तो हमारा शरीर नाश हो जाता है। ब्रेन का नाश हो जाता है। और कॉन्शियस माइंड उसके साथ डिस्ट्रॉय हो जाता है। मगर हमारा जो आत्मा है, जो सबकॉन्शियस माइंड है, उसको मैं आत्मा कहता हूं। वह नई बॉडी में जाकर नया जन्म लेता है तो मेमोरी की हार्ड डिस्क वहां ट्रांसफर होती है। इसलिए लोगों को पिछला जन्म याद आ जाता है और पिछले जन्म का विजुलान का यह जन्म में भी इफेक्ट
(18:20) आएगा। मुझे बहुत लोग पहले पूछते थे हम ऐसा देखते हैं कुछ बच्चे बचपन से पैदा हुए और उनको बीमारियां स्टार्ट हो गई। तो क्या उसने कब बीमारी विजुअलाइज किया था? फिर मुझे जवाब मिला कि यह पिछले जन्म का हो सकता है क्योंकि एक फिल्म आई थी ओम शांति ओम जिसमें शाहरुख खान हाथ में दारू का बोतल लेकर विजुअलाइज कर रहा है फिल्मफेयर अवार्ड मगर वो अगले जन्म में मिलता है उसको विजुअलाइज ये जन्म में क्या मिलता है अगले जन्म में तब समझ में आया कि ये मेमोरी की हार्ड डिस्क आपका प्रोग्रामिंग लेके ही आगे जाती है और वैसे देखो तो हमारा सबकॉन्शियस माइंड वो आत्मा है और
(18:50) बेसिकली हमारी आत्मा की जर्नी है एक बॉडी से दूसरी दूसरी से तीसरी इवोल्यूशन प्रोसेस है और यह इवोल्यूशन करने के लिए ऊपर ऊपर वाले ने हमें यह शरीर और यह माइंड दिया है। कॉन्शियस माइंड दिया है ताकि हमारी ये इवोल्यूशन जर्नी चलती रहे। मगर कुछ लोगों को यह पता नहीं है तो ये जन्म में ही नेगेटिव काम करके अपना और नुकसान कर लेते हैं। इसलिए हमें अच्छे-अच्छे काम करते-करते इवोल्यूशन में जाना चाहिए जो हमारा सबकॉन्शियस माइंड होता है। हजारों साल का प्रोग्रामिंग वहां पड़ा रहता है। एनर्जी की लैंग्वेज में पड़ा रहता है। यह सब मुझे यह पता नहीं। एक सूत्र का तब पता
(19:24) चला। आप पिछले 50 जन्मों तक पहुंच सकते हैं। 100 जन्म तक देख सकते हैं कि आपके साथ क्या हुआ था और आप क्या थे। यह भी टेक्नोलॉजी है। यह जो आज के लोगों को पता नहीं है और यह 2000 साल पहले पतंजलि ऋषि ने सिखाया है और हमारे पास अभी तक पहुंची नहीं। कमाल की बात है। तो कहने का मतलब यह है कि एक बार मेमोरी में आ गया तो सबकॉन्शियस माइंड सबसे पहले क्या करता है? उसके ऊपर प्लानिंग करता है कि इसको कैसे यह गोल तक पहुंचाना है। उसके बाद वह ओपोरर्चुनिटी क्रिएट करता है। ओपॉर्चुनिटी क्रिएट करने के बाद कॉन्शियस माइंड को सिग्नल देता है। सिग्नल देने के उसके
(19:57) तरीके हैं। तो कॉन्शियस माइंड को अलर्ट रहना चाहिए कि मैंने जो सबकॉन्शियस माइंड को ऑर्डर दिया था उसके लिए उसने मेरे लिए क्या ओपोरर्चुनिटी क्रिएट की तो कॉन्शियस माइंड वो ओपोरर्चुनिटी को पहचान के जब डिसीजन और एक्शन लेगा तब रिजल्ट मिलता है। बहुत आपने ये अच्छे से बताया कि जैसे कॉन्शियस जो है वो बॉस है और वो सबकॉन्शियस में इकट्ठी होती चली जाती है चीजें। फिर जो सबकॉन्शियस में है वो हमारी लाइफ में उस तरह की मैनिफेस्टेशंस होती हैं। तो जो सबकॉन्शियस है आपने कहा कि उसमें कई हमारे एक्सपीरियंसेस पुराने पास्ट लाइफ के और वो सब पड़े होते हैं। एक मेरे माइंड
(20:26) में आया था कि तो मतलब एक तरीके से जो भी सबकॉन्शियस में मेमोरी है वही हमारे पैटर्न्स बन रहे हैं आगे लाइफ में। हमारे बिहेवियर के हमारे प्रोग्रामिंग पैटर्न प्रोग्रामिंग हो रही है। तो ये क्या जैसे कि कहते हैं कि हमारे जींस जो होते हैं उनमें भी मेमोरी स्टोर होती हैं। तो क्या ये जो हमारे पूर्वज हैं उनके भी जो एक्सपीरियंसेस रहे वहां से भी क्योंकि कई लोग कई लोग ऐसा कहते हैं कि उनका तो बचपन भी बहुत अच्छा चला गया। सब कुछ बहुत अच्छा रहा। लाइफ में बहुत अच्छा है। फिर भी अंदर से पैटर्न एक फियर का है। डर लगता रहता है। कई अगले जन्म का भी हो सकता है। हो सकता है
(20:55) अगले जन्म में आपने कोई फियरफुल एक्सपीरियंस किया हो। कोई एक्सीडेंट हो कोई भी हो सकता है अभी भी आ सकता है बहुत सारे होता है और यूनिवर्सल एनर्जी कैसे काम करती है उसका मैंने एक देखा था कहीं कि दो अलग-अलग आइलैंड थे जहां पहुंचने का जमीन का रास्ता नहीं था और बड़ा जंगल था दोनों जगह पे तो एक आइलैंड के ऊपर बंदरों को कुछ खास टाइप की ट्रेनिंग दी गई बिहेव करने की और वो ट्रेनिंग उन्होंने एक्सेप्ट कर ली दूसरे जो आइलैंड थे जिसका यह बंदरों के साथ कोई कनेक्शन नहीं था। उनमें वह चेंज देखा गया जो यहां ट्रेनिंग दी गई थी। तो यह यूनिवर्सल एनर्जी कैसे काम करती है?
(21:34) सोच लो जं्स का चक्कर नहीं कुछ नहीं। कोई फिजिकल कांटेक्ट ही नहीं। दोनों जंगल के बंदरों को दोनों आइलैंड के ऊपर थे। तो ऐसा यूनिवर्सल एनर्जी काम करती है। तो कैसे मतलब ये फिर इसमें क्या चीज ने काम किया? नहीं उन्होंने एक्सपेरिमेंट बताया तो अभी वो रिसर्च कर रहे हैं कि ऐसा कैसे हुआ? तो एक यूनिवर्सल सिस्टम रहती है। जैसे हम कॉपी फाइल कॉपी करके दूसरी जगह पेस्ट करते हैं ना यहां से उठा के कॉपी पेस्ट शायद ऐसा होगा भगवान का इंटरनेट है। जो ये बंदरों का जो बिहेवियर था उसको कॉपी किया और वो बाकी के आइलैंड पे जाके वहां के बंदरों को भी उसको पेस्ट कर दिया। उसके
(22:09) अंदर तो उनका बिहेवियर में सेम चेंज आ गया जो ये बंदरों में था। ऐसे भी एक्सपेरिमेंट हुआ है। तो देखिए यह यूनिवर्स कैसे चलता रहता है। दिस इज़ अमेजिंग। तो सबकॉन्शियस माइंड आपको सिग्नल देता है और फिर आपको एक्शन लेना होता है और आपको अलर्ट रहना होता है। सबकॉन्शियस माइंड हमारा एक जीपीएस है। जीपीएस में हम जैसे डेस्टिनेशन डालते हैं तो जीपीएस देख लेता है आपका करंट सिचुएशन क्या है? कहां पे हो आप लोकेशन और कहां पहुंचना है। फिर वह आपको मैप बना के देता है। लेफ्ट राइट लेफ्ट राइट करके आपको पहुंचा देता है। तो सबकॉन्शियस माइंड हमारा जीवन का जीपीएस
(22:42) है। एक बार आपने डेस्टिनेशन डाल दिया कि मुझे यहां तक पहुंचना है। मेरा यह गोल है। फिर वो काम पे लग जाएगा। वो आपको बताना शुरू कर देगा कि गोल लेफ्ट राइट या नहीं। तुम्हें आगे जाके क्या-क्या करना है ताकि अपने गोल तक पहुंचोगे। मेरे जीवन में इतना फास्ट हो गया है कि मैं एक एग्जांपल दूं। सौजी भाई धोड़किया करके एक डायमंड किंग है जो सूरत में जो आजकल बहुत फेमस है। उन्होंने मेरा 2002 में अच्छा एक्सजेक्टली 25 साल पहले सेकंड अक्टूबर इंसिडेंटली कल ही ऐसा आज है कल [हंसी] आज एक्सजेक्टली 25 साल पहले उन्होंने मेरा मुंबई में ताज होटल में डायमंड वालों के
(23:15) लिए प्रोग्राम रखा था और शाम को 6 से 9 था फिर डिनर था और फिर ये होना था 50 500 डायमंड के बड़े-बड़े व्यापारी आए थे मैं अहमदाबाद रहता हूं तो मैं मुंबई पहुंचा था। दोपहर को मैं एक रेस्टोरेंट में लंच ले रहा था और मेरे साथ मेरा एक दोस्त था आशुतोष और वहां एक चाइनीस फैमिली आके खाना खाने को बैठे तो मुझे हांगकांग की याद आ गई क्योंकि उसके कुछ साल पहले मैं सिंगापुर गया था और हांगकांग हमारा बाकी रह गया था। मैं आशुतोष को बोला यार मैं सिंगापुर गया मेरा हांगकांग रह गया। बस इतना याद किया और कुछ नहीं। फिर खाना खाया। फिर थोड़ा रेस्ट किया। फिर तैयार हो
(23:51) के हम ताज होटल गए। वहां मेरा प्रोग्राम चालू हुआ। 1 1/2 घंटे के बाद मैंने ब्रेक दिया। एक आदमी मेरे पास आता है डॉक्टर हट जा मेरा नाम भूपेंद्र सुरानी है। मेरा हांगकांग में डायमंड का बिजनेस है। मुझे आपका प्रोग्राम बहुत अच्छा लगा। मुझे वहां आपका प्रोग्राम करना है। मुझे अभी डेट दे दो। तो मैंने एक महीने के बाद की डेट दी। दूसरे दिन मेरे पास दो हांगकांग की टिकट भेज दी। विद इन 24 आवर सबकॉन्शियस माइंड ने रिजल्ट दिया। मैं बोला वाओ ये तो अमेजिंग है। तो देखिए सबकॉन्शियस माइंड को एक बार ये तो स्ट्रांग कमांड भी नहीं था। मन में विश थी कि हांगकांग देख के आता तो
(24:21) अच्छा रहता था और अचानक यह सब कुछ हो गया। इतने मेरे लाइफ में इंसिडेंट होते हैं कि सोच भी नहीं सकते। तो कहने का मतलब है कि सबकॉन्शियस माइंड को समझ लो। उससे दोस्ती कर लो तो यह सब कुछ पॉसिबल होता है। बस फिर आपको अलर्ट रहना है। और मैंने एक किताब पढ़ी थी जो दुनिया की सबसे ज्यादा मोटिवेशनल किताब है एक फ्रॉफ डायमंड करके। आपने सुना है नाम उसका? नहीं सुना है। वो रसेल कोवेल ने लिखी थी आज से 100 साल पहले जो अमेरिका में फिलाडेफिया में टेंपल यूनिवर्सिटी के स्थापक थे। आज वहां 500 स्टूडेंट पढ़ते हैं टेंपल यूनिवर्सिटी में। उन्होंने एक
(24:54) किताब लिखी थी और स्पीच दी थी जिसका नाम है एक्सफ ऑफ डायमंड। अभी तक का वर्ल्ड रिकॉर्ड है कि एक ही आदमी ने एक ही टॉपिक पे 6ाउ डिफरेंट लोकेशन पे स्पीच दिया हो जिसका नाम है एक्स ऑफ डायमंड। आज इंटरनेट पे अवेलेबल है। 100 साल पुरानी स्पीच। तो उन्होंने यह बात कही है कि हमारे आजू-बाजू एक्स ऑफ डायमंड पड़े हैं। सिर्फ हमारी नजर होनी चाहिए और डायमंड पहचानने के लिए। डायमंड मींस ओपॉर्चुनिटी पड़ी है। टेस्ला वाले को इंडिया में क्यों आना है? क्योंकि उसको यहां ओपॉर्चुनिटी दिखती है। और हम ओपॉर्चुनिटी के लिए अमेरिका या फॉरेन कंट्री जाते हैं। जबकि फॉरेन हमारे यहां
(25:29) आते हैं। तो ये ओपॉर्चुनिटी देखने का काम करता है हमारा कॉन्शियस माइंड। और आपने अगर शिवखरा की वो किताब पढ़ी है यू कैन विन। उसमें पहला चैप्टर में पहली स्टोरी वो एक्सर्स ऑफ डायमंड की स्टोरी है। उसने जो स्टोरी बताई वो इन्होंने यहां लिया है। तो कहने का मतलब है कि हमारे आजू-बाजू ओपोरर्चुनिटी बहुत होती है। हमारा कॉन्शियस माइंड को ऐसे ट्रेनिंग करो कि ओपोरर्चुनिटी को पहचाने और आगे बढ़े। मेरी बात करूं तो जब कोरोना के बाद का समय आया तो मैं बैठा रहता था क्योंकि मुझे ऑफलाइन की आदत थी। मैं ऑनलाइन जाने की कोशिश ही नहीं की। जबकि बाकी मेरे स्टूडेंट कितने
(26:02) ऑनलाइन चले गए। आज उनके लाखों फॉलोअ बन गए। मैं बैठा रहा। मैंने ओपोरर्चुनिटी को पहचाने नहीं या मेरे में आलस आ गई। अब मुझे पता चला कि इसके बिना चलेगा नहीं। तो अब देखो मैं इतने पडकास्ट कर रहा हूं। ऑनलाइन गया फॉलोअ बढ़ाने लगा। तो वो कॉन्शियस माइंड से होता है। अपोर्चुनिटी को पहचानना और उसको ग्रेप करना। समव मैं लेजी हो गया था कि मैं सोचा ऑफलाइन का जब जमाना आएगा फिर करूंगा तब तक आराम कर रहा हूं। ऐसा होता था। तो हमें दोनों माइंड को समझना है और यह करना है। और हाउ फास्ट सबकॉन्शियस माइंड कैन रिसोंड डिपेंड ऑन हाउ क्लोज यू आर टू योर सबकॉन्शियस माइंड।
(26:35) उससे कितनी अच्छी दोस्ती की है आपने उसके ऊपर डिपेंड करता है। तो ये आप तो अभी आपने जैसे कहा कि पतंजलि योग सूत्र पे आपने किताब लिखी और आपने कहा कि उसमें 2000 साल पहले ही इसमें बताया था। तो अब हम सब अपने कॉन्शियस माइंड की वो ट्रेनिंग कैसे करें पतंजलि योगसूत्र को भी उसमें रखते हुए और जो आपने साइंटिफिक स्टडी की उसको भी ध्यान में रखते हुए ताकि वो उन ओपोरर्चुनिटीज को आइडेंटिफाई कर सके। एक्सक्टली जी तो मेरा जो लाइफ में जो मिसिंग ज्ञान था ना वो मुझे पता नहीं योग से मिला। फॉर एग्जांपल कॉन्शियस माइंड का काम है थिंकिंग करना, लॉजिक यूज़ करना, डिसीजन
(27:09) लेना और एक्शन लेना। अब आप ये बताइए कि कॉन्शियस माइंड यह अच्छा कब कर सकता है? जब बहुत डिस्टर्ब और एक्साइटेड रहता है तब या बहुत शांत रहता है तब? यह काम अच्छा कब होता है? शांत। डिसीजन कब अच्छा होता है? शांत मन से होता है। विचार अच्छा कब आता है? जब मन शांत होता है तब? हैं? और आप लॉजिक भी तब काम करेगा जब आपका मन शांत है। डिस्टर्ब माइंड से कैसे होगा और डिसीजन भी आप शांत मन से अच्छा ले सकते हैं। एक्शन भी शांत मन से ले सकते हैं। तो कॉन्शियस माइंड को शांत करने की टेक्नोलॉजी कहां थी जो पता नहीं योग सूत्र के अंदर है कि पहले तो बॉस को
(27:44) शांत करो। उसको अच्छा बना दो, तगड़ा बना दो ताकि वह सबकॉन्शियस माइंड से ज्यादा काम करें। तो अशांत मन ही हमारे हर दुख का कारण है। हर दुख का कारण पतंजलि योगसूत्र में अट्रैक्ट हुआ। उसके भी बहुत सारे कारण है। मैं माइंड पावर सिखाते सिखाते मेरे मन में कुछ सवाल उठते थे जिसका मुझे जवाब नहीं मिल रहा था। माइंड पावर रिलेटेड ही थे। सबसे पहला यह था कि यह भगवान क्या है? और ईश्वर क्या है? दोनों में क्या फर्क है? और वह कौन से रूप में है? एनर्जी के रूप में है, शरीर के रूप में है और मैं कहां मिलूं इसको? और इतने सारे भगवान क्यों है? एक भगवान क्यों नहीं है? मेरे
(28:19) मन में सवाल था जो जवाब कोई नहीं दे पा रहा था मुझे मैं बहुत गुरुओं को पूछा सब गोलगोल घुमाते रहे मुझे जवाब मिला पता नहीं योग क्षेत्र में दूसरा यह था कि महावीर स्वामी को बुद्ध भगवान को दादा लेखराज को जो अंदर से ज्ञान आया आत्मबोध कहते हैं हम तो कैसे हुआ उसकी टेक्नोलॉजी क्या है क्योंकि मैं अभी तक सिखा रहा था बाहर से पढ़ा लिखा था वही सिखा रहा था मेरा खुद का तो कोई ज्ञान नहीं है इंपोर्ट होता है एक्सपोर्ट होता है यहां से इंपोर्ट होता है यहां से यहां से एक्सपोर्ट होता है और कुछ नहीं तो मेरा खुद का कोई ज्ञान ऐसा नहीं निकाल सकता हूं
(28:51) जो दुनिया में नहीं और मैं दूं तो उसकी कोई ना कोई टेक्नोलॉजी होगी। तभी तो उनके पास हुआ यह टेक्नोलॉजी मैं ढूंढ रहा था। मुझे मिली पतंजलि योग सूत्र में कि यह रास्ते से यह आत्मबोध निकल सकता है। दूसरा तीसरा मैं बहुत सालों से सुन रहा था कर्म का सिद्धांत अच्छे कर्म करो अच्छा होगा। बुरा कर्म करो बुरा होगा। तो यह मेंटेन कौन करता है? रिकॉर्ड कौन मेंटेन करता है? अभी हिंदू धर्म तो में कहते हैं कि वह चित्रगुप्त करते हैं तो चित्रगुप्त कितने साल से जिंदा है और कहां रहते हैं? उनके ऑफिस कहां पे है और कौन से फॉर्मेट में ये सब करते हैं? ये भी मेरे मन में सवाल आता
(29:26) था। और अगर वो फिजिकल फॉर्म में हो ही नहीं सकता। दूसरी बात थी कि सिर्फ हिंदू का रिकॉर्ड रखते हैं। मुस्लिम और क्रिश्चियन का भी रखते हैं। सभी लाइन धर्मों का रखते हैं। तो यह भी तो नहीं हो सकता है। उसके ऊपर उसका कंट्रोल कैसे होगा? तो यह चित्रगुप्त कौन है? मुझे मिलना है। उसका कौन से फॉर्मेट में वो रिकॉर्ड रखता है? रिकॉर्ड होगा तभी तो यह इंप्लीमेंट होता है ना। तो और अगर कंप्यूटर फॉर्मेट में है तो लॉग इन करके मैं क्या उसको हैक कर सकता हूं? मेरा कर्मा का जो रिकॉर्ड है उसको मैं डिलीट कर सकता हूं। ऐसे मेरे मन में सवाल उठते थे और कहीं जवाब नहीं मिलता था। पतान
(30:02) योग सूत्र में मिला। यू कैन रीच टू योर कार्मिक रिकॉर्ड। यू कैन डिलीट योर कार्मिक रिकॉर्ड। उसको डिलीट भी कर सकते हैं। पिछले 50- 100 जन्म के रिकॉर्ड आप डिलीट कर सकते हैं। यह टेक्नोलॉजी इसने 2000 साल पहले बताई। वाओ यह तो जबरदस्त आ गया। फिर ये बागेश्वर बाबा जो चमत्कार दिखाते चिट्ठी निकालते हैं। ऑटोबायोग्राफी ऑफ योगी की किताब में लिखा है। बहुत चमत्कार की बातें लिखी है। आपने पढ़ी होगी तो उसमें चमत्कार की बहुत बातें हैं। एक दो किताब मैंने चमत्कार की पढ़ी। एक आदमी था जिसने चमत्कार के लिए पूरा जीवन दे दिया। गुर्जर करके रशियन था। उसकी किताब
(30:33) है मेन इन सर्च ऑफ मिरेकल्स करके तो उसने के चमत्कार कैसे होते हैं उसकी सर्च कर रहा था अभी जैसे अभी यहां का नीम करौली बाबा की बात आई जिसके ऊपर फिल्म बनी तो ये कैसे चमत्कार होता है उसकी मुझे टेक्नोलॉजी चाहिए थी वो टेक्नोलॉजी मिली मुझे पता नहीं है सूत्र में कि आप इससे भी ज्यादा चमत्कार कर सकते हो ये भी टेक्नोलॉजी उसके अंदर है फिर मेरे प्रोग्राम में आके लोग बोलते थे मोक्ष क्या है मुझे तो मोक्ष चाहिए आप कैसे मुझे मोक्ष दिलवा सकते हैं अब मुझे ही पता नहीं था कि मोक्ष क्या है मैं उनको क्या दिलवा दूं? फिर मुझे इसकी डेफिनेशन और उसका
(31:06) रास्ता मिला कि आपको मोक्ष भी मिल सकता है। तो ऐसा बहुत सारे सवाल थे मेरे मन में। दूसरी बात ये है कि मैं 50 52 ईयर से तो मैं पब्लिक लाइफ में हूं। मैं 74 में पब्लिक लाइफ में आया। डॉक्टर बना मैं 74 में तो बहुत लोगों के बहुत प्रॉब्लम थे। तो हर प्रॉब्लम का अलग-अलग सॉल्यूशन देते थे हम। फिर मेरे मन में एक नोवेल आईडिया आया कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर प्रॉब्लम का एक ही कारण हो और एक ही कारण है तो सॉल्यूशन भी एक ही हो जाए। कहीं जवाब नहीं मिल रहा था। मिल गया पता नहीं सूत्र से। एक ही कारण होता है हर प्रॉब्लम का। चाहे हेल्थ का इशू हो,
(31:39) रिलेशनशिप का इशू हो, मनी का इशू हो, कोई भी इशू हो। कारण एक ही है। यानी कि सॉल्यूशन भी एक ही है। वाह! मैं बोला ये तो जबरदस्त मेरे हाथ में आ गया। मैं बोला छोड़ो माइंड पावर अब बहुत सिखा दिया। बाकी लोगों के लिए छोड़ दो। अब बियों्ड माइंड पावर की बात करो। तो इतना सारा ज्ञान पतली रूसी ने हमें दिया और किसी को पता नहीं है और हम विश्वगुरु बनने को निकले तो किस चीज सिखाएंगे हम दो गोरे लोगों को प्लेन बनाना रॉकेट बनाना कार बनाना एटम बनाना वो तो हमें सिखा रहे हैं तो अगर हमें विश्वगुरु बनना है तो हम यह पाताल ऋषि का ज्ञान हम
(32:12) फैला सकते हैं क्योंकि 2000 साल पहले उसने देख लिया था कि आगे जाके क्या होने वाला है। उन्होंने जो लिखा है वो आज भी इतना ही उपयोगी है जितना वोट जमाने में था और ज्यादा उपयोगी है। अब मेरे दिमाग में इतने सारे क्वेश्चंस आ रहे हैं तो मुझे आपने बहुत सारी चीजें बोली तो मैं चाहूंगी कि हम उन सब चीजों के बारे में जान पाएं क्योंकि हमने कहा था कि जो भी चीज अज्ञानता है हम उनको दूर करने वाले हैं। तो पहला तो आपने कहा कि एक चीज मुझे पता चली कि सारी प्रॉब्लम्स का एक ही कारण होता है और एक ही सॉल्यूशन होता है। तो वो क्या कारण होता है हमारी सारी सॉलशंस का?
(32:41) अब पहले थोड़ा सा ये योग सूत्र के बारे में जी हां जी। के हमारे जमाने में योग बहुत 5000 सालों से चल रहा था। मगर एक गुड विद्या थी। एक रहस्यमय विद्या थी। सीक्रेट साइंस जैसा था। महर्षि ऋषि ने 2000 साल पहले इसको एक सिस्टमाइज करके एक सिस्टम में बना दिया। एक साइंस का रूप दे दिया। अब वो रहस्य नहीं रहा। अब एक साइंस बन गया। पहली बात तो यह है। दूसरी बात है कि योग का लोगों को पता ही नहीं है कि योग का मतलब क्या होता है? और लोग बोलते हैं मैं योग करता हूं। योग करता हूं। योगा टीचर बोलते हैं मैं योगा टीचर हूं। नहीं पहले पूछता हूं
(33:16) कि अच्छा योग का क्या मतलब होता है? बताओ। तो चप्प हो जाते हैं। फिर बोलता हूं पतंजलि सूत्र बोले हां हमको सिखाया है। बोला बताओ क्या है पतंजलि सूत्र? बोले अभी याद नहीं है। तो इतना सारा कंफ्यूजन है। योग मतलब हम यही समझते हैं कि वो गार्डन में जो होता है सुबह-सुबह में वो जो टीवी पर रामदेव बाबा दिखाते हैं वो योग है। वो योग नहीं है। योग का एक पार्ट है। रियल योग का मीनिंग वो नहीं है। योग का डिक्शनरी मीनिंग ऑक्सफोर्ड में जाकर देखो। योग का डिक्शनरी मीनिंग है यूनियन। जुड़ाव। यूनियन का मतलब होता है किसका जुड़ाव? आत्मा का परमात्मा के साथ जीव का शिव के
(33:49) साथ जुड़ाव पर्सनल कॉन्शियसनेस का यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस के साथ यूनिफिकेशन इसको योग कहते हैं। तो योग की परिभाषा किसी को पता नहीं थी जो आज से 2000 साल पहले पतंजलि ऋषि ने कही है। दूसरी बात यह है कि इसका जो मेन थीम है उसके 196 सूत्र है। उसमें पहला सूत्र है अथ योग अनुशासनम। यानी योग सीखने के लिए अपने आप में कुछ तैयारी करनी चाहिए। तभी योग का फायदा होगा। तो तैयारी क्या होती है वह उन्होंने समझाया है और दूसरा जो मेन पूरे योग सूत्र का थीम है वह है योग चित्तवृत्ति निरोध योग क्या है चित्त की वृत्ति का निरोध यानी रोकना चित्त क्या है
(34:30) तो सिंपल लैंग्वेज में मन माइंड एंड वृत्ति यानी विचार तो योग का रियल मीनिंग है हमारे मन में से जो विचार उठते हैं उसको शांत करना इसको योग कहते हैं या आसन करते हैं वह अलग चीज होती है गलत कहते ऐसा नहीं है वो अलग है और यह पतली ऋषि का अलग है। अब आप देखो कि चित को उसने एक्चुअली चार का कॉम्बो है चित मन बुद्धि अहंकार एंड संस्कार। संस्कार मींस प्रोग्रामिंग जो अभी हम बात कर रहे थे जो हमारे पूर्व जन्म के भी होता है। मन सोचता है। बुद्धि डिसाइड करता है यह करो। और अहंकार कहता है यह मैं कर रहा हूं। यह मेरी वजह से हो रहा है और संस्कार कहता है जो हमें पहले सुन
(35:14) लो हमने क्या-क्या अनुभव किए और फिर डिसीजन लो और एक्शन लो। तो दिस इज हावर आवर माइंड ऑपरेट्स। तो योग का मतलब होता है चित की वृत्ति को शांत करना यानी मन के विचारों को शांत करना। अब हमारी हेल्थ की बात करें। हेल्थ का प्रॉब्लम घर-घर में है। तो हेल्थ के जो प्रॉब्लम है उसका एक ही कारण है हमारा स्ट्रेस। स्ट्रेस है। हमारे नेगेटिव थिंकिंग है। मैं जब मेडिकल कॉलेज में सीखता था तब हमको सिखाया कि 10% डिजीज आर साइकोसोमेटिक। यानी मन के वजह से शरीर में होते हैं। अब विग्नयान कहता है कि 100% डिजीज आर साइकोसोमेटिक। शुरुआत यहां से
(35:54) होती है और फिर इफेक्ट यहां पर होती है। तो आपका मन अच्छा नहीं है, शांत नहीं है। अशांत मन है तो कैंसर, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, थायराइड, ओसीडी, डिप्रेशन सब बीमारियां शुरू कर देगा। मन अशांत सभी बीमारी का कारण है। एक ही कारण है। अगर सब बीमारी का अशांत मन तो सॉलशन तो सिंपल है। मन को शांत कर दो बीमारियां ठीक हो जाएगी। तो यह मन जो आप कह रहे हो यह माइंड है। तो ये कॉन्शियस माइंड ये कॉन्शियस माइंड है। ये कॉन्शियस माइंड है। कॉन्शियस माइंड सोचता रहता है ना पूरा दिन। कहते हैं कि हम दिन में 60000 थॉट प्रोड्यूस करते हैं। और अभी आपने ऑब्जर्व
(36:34) किया कि ये विचार तीन में से कौन से काल के होते हैं? भविष्य काल के, भूतकाल के या वर्तमान के? कौन से होते हैं आप? सोच के बताइए। ज्यादातर हम कौन से विचार करते हैं? पास्ट या फ्यूचर में से ही। पास्ट या फ्यूचर का करते हैं। प्रेजेंट का नहीं करते हैं। और पास्ट और फ्यूचर में रहने की हमको आदत हो गई। यह हमारा प्रोग्रामिंग हो चुका है। अब विचार भी दो टाइप के होते हैं। दुख देने वाले विचार और सुख देने वाले विचार। सुख देने वाले विचार हमें सुखी करते हैं। दुख देने वाले हमें दुखी करते हैं। तीनों में ऐसा हो सकता है कि फ्यूचर का भी मैं
(37:06) दुख देने वाला विचार करूं। सुख देने वाला विचार करूं। मैं आज प्लान करने को बैठा हूं कि मुझे मेरे करियर को आगे ले जाना है। तो सुख देने वाले विचार हैं। मैं चिंता करूं कि इतनी कंपटीशन में मैं कैसे सर्वाइव करूंगा आगे जाके। मुझे तो इंग्लिश बोलना नहीं आता है। ऐसे मजाक में कह रहा हूं। तो इंग्लिश नहीं आता है। मुझे तो यह नहीं होता है। मेरी हेल्थ मुझे सपोर्ट नहीं कर रही है। तो नेगेटिव विचार है। दो टाइप के विचार हुए। ज्यादातर लोग कौन सा करते हैं? नेगेटिव वाला करते हैं। चिंता करते हैं। हर घर में एक चिंतामणि रहता है जो पूरा
(37:36) दिन एक ही काम करता है। चिंता करते रहते हैं। ठीक है? चिंता क्या होती है? फ्यूचर हमारा खराब होगा इसकी सोच रखता है। वो चिंता होती है। पास्ट की बात करें तो हमारे पास्ट में हमारे जो भी अनुभव हुए हैं उसके दो टाइप की मेमोरी है। अच्छी और बुरी। दोनों मेमोरी है। बुरी मेमोरी हम याद करेंगे पुराने रिग्रेट गिल्ट ये सब तो अभी हमारी हेल्थ के ऊपर इफेक्ट होगी। और अगर हमारी अच्छी मेमोरी याद करेंगे तो हेल्थ अच्छी रहेगी। मगर ज्यादातर आदत देखो लोग पास्ट के बुरी आदत बुरे अनुभव याद करते हैं। पास्ट पेनफुल मेमोरी को ज्यादा याद करते हैं। अच्छी चीजों को याद नहीं करते हैं।
(38:12) जो हमारी हेल्थ को नेगेटिव बना देते हैं। नुकसान करते हैं। क्योंकि हमारी सोच होती है। वो हमारी इमोशन क्रिएट करती है और यह इमोशन हमारे हॉर्मोनल बैलेंस बिगाड़ती है। हमारी हमारे शरीर की रासायनिक क्रिया को बिगाड़ देती है और हमारे शरीर में बीमारियां पैदा होती है। तो शुरुआत कहां से हुई? सोच से हुई। और सोच हम या पास्ट की या फ्यूचर की करते हैं। वर्तमान में करते ही नहीं है। अगर हम यह सीख ले कि हमें वर्तमान की सोच कैसे करनी है तो हम पास्ट और फ्यूचर से हम छुटकारा मिल जाएगा। वो जो नेगेटिव इफेक्ट दोनों चली जाएगी। जहां से हमारे जीवन की समस्या हुई है।
(38:50) प्रेजेंट में रहना जिसको आजकल इंग्लिश में माइंडफुलनेस कहते हैं। तो हमारे मन को प्रेजेंट में लाना यही विज्ञान पतनली रूसी ने 2000 साल पहले पहुंच सिखाया है कि आप प्रेजेंट में रहने की कोशिश करो। हमारा मन है इसको मंकी माइंड कहते हैं। बंदर जैसा है। खुदा-कूद करता रहता है। कभी यह सोचता है, कभी वो सोचता है। एक जगह पे बैठता नहीं। इसलिए तो 60 थाउजेंड टाइप्स ऑफ विचार हम एक दिन में कर लेते हैं। कूदता रहता है। तो यह कूदने वाला जो हमारा मन है ना वही हमारी समस्या का कारण है। पतानी एक सूत्र का साइंस है वो सभी विचारों को शांत करना है। शांत करना उसके
(39:28) बाद जो बुरे विचार है उसको अच्छे विचार से रिप्लेस करना। उसने नाम दिया है क्लेश वृत्ति एंड अक्लेश वृत्ति। क्लेश वृत्ति यानी जो हमें नुकसान करती है जो हमें दुख देने वाली वृत्ति है उसको अक्लेश कहते हैं। यानी कि नेगेटिव थिंकिंग एंड अक्लेशति यानी पॉजिटिव थिंकिंग यानी सुख देने वाले विचार करना है। तो पता नहीं एक सूत्र का साइंस हमें सिखाता है कि नेगेटिव लाइफ में से पॉजिटिव लाइफ कैसे बनानी है और आगे जाके यह अकलेश्रति को भी डिलीट करना है। वृत्ति नहीं रहनी चाहिए क्योंकि वृत्ति हमारे सबसे बड़ी दुश्मन है। अब हमारा मोटापा क्यों होता है बताओ? बहुत
(40:03) खाते हैं। क्या खाते हैं? हमें पसंद है। वह खाते हैं। गुलाब जामुन खाते हैं। यह खाते हैं। यह किसको सेटिस्फाई करते हैं? हमारी टंग को सेटिस्फाई करते हैं। हमारी इंद्रियों को देखिए पूरी हमारी प्रवृत्ति हमारी पांच इंद्रियों को सेटिस्फाई करने के लिए रहती है। और इंद्रियों की आदत है। जितना उसको सेटिस्फाई करोगे दिल मांगे और मोर दिल मांगे मोर। सोच लो दारू से आपने सेटिस्फाई किया और दारू पियो और दारू पियो। मिठाई की आदत हो गई। मिठाई दो और मिठाई दो और मिठाई दो। तो हमारे हेल्थ केयर प्रॉब्लम तो यह हमारी इंद्रियों से ही होता है। खास करके पहली तो हमारी टेस्ट
(40:36) बढ़ की वजह से होता है। तो पत्थली योग सूत्र में जो आठ स्टेप बताए अष्टांग योग उसमें पांचवा स्टेप है प्रत्याहार यानी कंट्रोल योर सेंसेस। कंट्रोल यानी ऐसा नहीं कि बिल्कुल बंद कर दो। मगर उसके साथ ऐसा लालच नहीं हो कि आप अपने आपको रोक नहीं सके। आपके सामने मिठाई है। आपको पता है मेरी हेल्थ को नुकसान करता है। थोड़ा सा टुकड़ा ले लो खा लो। मगर सब खा लो। यह कंट्रोल रोकना है आपको। यह सब यहां सिखाते हैं। तो हेल्थ के प्रॉब्लम इसी से आते हैं। रिलेशनशिप के प्रॉब्लम भी वहीं से आते हैं। बिजनेस प्रॉब्लम भी वहीं से आते हैं। हमारा जो चंचल मन है वही हमारा सबसे
(41:14) बड़ा विलेन बनता है। तो जैसे ही आप चंचल मन को शांत कर दोगे तो हर प्रॉब्लम धीरे-धीरे अपने आप सेटल हो जाएगा। ना कई चीजें जैसे आप बात कर रहे हो ना तो मेरे दिमाग में आ रहा था कई चीजें रिलेट हो रही अभी आपने जो अभी न्यूज़ सुनी होगी कल जो वो पायलट की आई है जिन्होंने दुबई में किया है तो मैं यह सोच रही थी जो माइंडफुलनेस को हम आज तक ये सोचते हैं कि माइंडफुल का मतलब है प्रेजेंट रह जाओ तो वो जो सिचुएशनल अवेयरनेस होती है अवेयरनेस होती है कि अभी जो लाइफ में चैलेंज चल रहा है उसको कैसे आपको डिसीजन लेना है उसका एक क्लियर माइंड हुआ तब उसने डिसीजन
(41:44) लिया देखो वो अंदर ही ममारी चलती रहती है और दरवाजा नहीं खोलता तो प्लेन क्रश डिसाइडेड था उसका माइंड कितना कॉन्श ये सब तो कॉन्शियस माइंड से हुआ ना उसने कितना अलर्टनेस दिखा उसका का माइंड कॉन्शियस माइंड कितना अलर्ट होगा कि उसने समझ लिया कि अगर यह सिचुएशन कंट्रोल में नहीं आई मेरे से तो प्लेन क्रेश होगा सब मर जाएंगे तो उसने इमीडिएटली डिसीजन लिया अपना कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया पब्लिक को पता चला एक आदमी जाके उनको हेल्प करने लगा और पूरी सिचुएशन बदल गई ये तो उसका कॉन्शियस माइंड का कमाल था उसमें तो सबकॉन्शियस माइंड की जरूरत ही नहीं थी
(42:15) और इतनी जिंदगी बचा दी हीरो बन गया क्या-क्या बन गया उसका तो ये भी तभी होगा जब हमारे कॉन्शियस माइंड इतना स्ट्रांग होगा कि कैसे इधर-उधर से निकल के अभी क्या सिचुएशन है उसके एक्सैक्टली इमीडिएटली रिसोंड देना अगर अगर आपका डिस्टर्ब माइंड रहता है तो यह नहीं होता था और वो आदमी जो करने वाला था वो डिस्टर्ब माइंड वाला था पेनेटिक था जो सबको मारना चाहता था इजराइलियों ने उसका क्या खराब किया मुझे पता नहीं है मगर किसी ने कहा कि इजराइली इस्लाम का दुश्मन है तो उसने वो हिसाब से अपनी दुश्मनी मन के अंदर पा ली और उसको अंजाम देने के लिए उसने यह सब एक्शन लेना
(42:48) शुरू किया तो कहने का मतलब यह सब मन का तो खेल है हर प्रॉब्लम का कारण वहीं पे तो है अगर दोनों के मन शांत रहते थे तो यह होता ही नहीं था। तो यह वही था कि कॉन्शियस माइंड इतना मतलब ट्रेंड है सुपर कि उसी टाइम क्या अपॉर्चुनिटी है। उसको बहुत क्लियरली पकड़ा कि अभी सबसे पहले सिचुएशन को इमीडिएटली उसने समझा और सिचुएशन में इमीडिएटली डिसीजन और एक्शन लिया। ये कॉन्शियस माइंड करता है। अलर्टनेस रहना। तो ऐसी ट्रेनिंग हम कैसे दे सकते हैं अपने माइंड को? सिचुएशन योग सूत्र सिंपल है। तो उसमें क्या इससे रिलेटेड क्या? इसमें अच्छा उसने बताया है कि इसका ट्रेनिंग
(43:23) देने का उसने क्रिया योग करके बताया है। अच्छा स्वाध्याय तप एंड ईश्वर प्राणिदान और दूसरी दो चीज पहले ही कही है उसने प्रैक्टिस एंड वैराग्य ये दो चीज है। प्रैक्टिस क्या करना है? मन को प्रेजेंट में लाने की कोशिश करना है। मन भागता रहता है। पकड़ो इधर लाओ। जैसे आपने बंदर का बच्चा पाला है। डोरी से बांधा है। वो इधर भागेगा खींच के यहां लाओगे बिठाओगे। फिर इधर भागेगा फिर बिठाओगे। हमारा मन बिल्कुल ऐसा काम करता है। तो हमें प्रैक्टिस क्या करनी है कि हमारा कूदा कूद करने वाला मन है उसको शांत करना है। तो उसके उसने बहुत सारी टेक्नोलॉजी बताई कि यह तरीके से कर
(43:56) सकते हैं। यह तरीके से कर सकते हैं। बेसिकली मेडिटेशन तो मेडिटेशन के उसने बहुत सारे रास्ते बताए। एक ही टाइप का नहीं है मेडिटेशन। आप अपने मनपसंद किताब में खो जाओ। वह भी मेडिटेशन है। आप अपने सब्जेक्ट के बारे में सोचते रहो वो भी मेडिटेशन है। यानी मेडिटेशन के बहुत सारे उन्होंने रास्ते बताए। अपनी पर्सनालिटी के हिसाब से वह रास्ते पर जाओ। ऐसा नहीं कि मेडिटेशन या सब करो वैसा करने का। आपको कोई सीरियल पसंद है सीरियल में खो जाओ। वो भी मेडिटेशन है। क्योंकि सीरियल में खो जाते हैं तब पास्ट के विचार भी नहीं आते हैं और फ्यूचर के भी नहीं आते। अब वहां जो
(44:28) चल रहा है वही विचार आएंगे। तो आपने मन को एक जगह पे लगा दिया ना फोकस कर दिया। मतलब मेडिटेशन का मतलब प्रॉपर ये है कि आपको अपना जो प्रेजेंट है एग्जैक्ट जो लाइफ में चल रहा है आप वहां पर पूरी तरह से प्रेजेंट हो गए। एक्सैक्टली प्रेजेंट में फोकस करो। देखिए अब अह इसके थोड़ी और आगे बात करें कि जैसे भगवत गीता है ना उसका जितनाेंस है उतना हीेंस हमारे पतली युग सूत्र का मुझे लग रहा है उससे ज्यादा या सेम अब भगवत गीता सबको पता है सबके घर में है मगर दुख की बात यह है कि उसमें से 90% लोगों ने पढ़ी नहीं है पढ़ी है उसमें से 90% को समझी
(45:05) नहीं है जो 10% को समझी है उसमें से 90% ने उसका यूज़ नहीं किया कुछ तो सोच लो कि भगवत गीता इतना अच्छा हमारा पुस्तक होने के बावजूद भी लोगों के जीवन में कोई बदलाव क्यों नहीं दिखता? बिकॉज़ ऑफ ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि उसके लैंग्वेज बहुत डिफिकल्ट है। मैंने खुद ने भगवत गीता समझने की कोशिश की। अभी तक मुझे समझ में नहीं आया उसका। मैंने प्रभुपाद जी का पढ़ने की कोशिश की। विनोबा की, गांधी जी की, कितने लोगों की अभी तक मुझे समझा नहीं। यह भी इतना ही डिफिकल्ट था। मगर मैंने बहुत मेहनत करके उसे समझा क्योंकि मुझे पता चला कि ये बियों्ड माइंड पावर है। यह धर्म की
(45:38) बातें नहीं है। इसमें पूरी साइंस की बात है। यह धर्म है ही नहीं। यह पूरी साइंस है। अब यह पता नहीं योग सूत्र है वो किसी को पता ही नहीं है। किसी को नहीं पता है। मैं बड़े-बड़े कितने लोगों को पूछता हूं। आपको पता ही है क्या है? किसी को पता नहीं है। तो मैं सोचा कि अगर देश का भला करना है तो पता नहीं युद्ध का ज्ञान लोगों तक पहुंचाओ। मैं एक बात में निमित बना सबकॉन्शियस माइंड का नॉलेज इंडिया में इंपोर्ट किया और अभी लोग दुनिया भर वाले कर रहे हैं। सब कुछ ऐसा ही मैंने सोचा कि मैं एपी सेंटर बनूं बतानी योग सूत्र का। इसमें तो मैं 100 ट्रेनर अभी दिसंबर के
(46:10) पहले बनाने जा रहा हूं कि जो मेरे ट्रेनर बनेंगे जो क्वालिटी ट्रेनिंग देंगे लोगों को पतली एक सूत्र की तो बेसिकली इसमें ट्रेनिंग क्या होती है प्रैक्टिस प्रैक्टिस क्या करना है अपने मन को यानी कॉन्शियस माइंड को कोई एक जगह पे एंगेज करना है फोकस करना है और सूरज है वह एनर्जी है उसके किरण हम मैग्नीिफाइंग ग्लास से पास करते हैं तो उसकी एनर्जी 100 टाइम बढ़ जाती है आग लग जाती है झटका लगता है हम स्कूल में किया करते थे तो माइंड इज आल्सो एनर्जी। विचार करते हैं वह भी एनर्जी। अगर कॉन्शियस माइंड को यानी विचारों को एक जगह फोकस करोगे ना तो
(46:45) मैग्नीिफाई हो जाएगा। उसकी एनर्जी बढ़ जाएगी। समझे ना? चाहे नेगेटिव पे करो चाहे पॉजिटिव पे कर रहे हैं। हां दोनों में हो गया। हम सीक्रेट में कहते हैं ना योर एनर्जी फ्लोस वेयर योर अटेंशन गोज़। जहां आपका अटेंशन जाएगा वो टाइप की एनर्जी वहां फ्लो करेगी और मैग्नीिफाई होगी। तो इसमें क्या करना है कि मन को हमें शांत करके एक जगह पर फोकस करना है। ज्यादातर मेडिटेशन सांस के ऊपर करके करते हैं। कोई ओम के ऊपर करते हैं, कोई यहां पे करते हैं, कोई दीप के ऊपर करते हैं। त्राटक जिसको कहते हैं वो भी फोकस करने की कोशिश है। तो, यह सब चीजें करके हम हमारे कॉन्शियस माइंड को
(47:22) फोकस करने की ट्रेनिंग देते हैं। और जो ट्रेनिंग है वह फोकस वाला कॉन्शियस माइंड आपको मिरेकल करके दिखाएगा। बॉस है वह तो सबकॉन्शियस माइंड तो ऑलरेडी रेडी है ही मगर बॉस आड़ा टेढ़ा कमंड देगा तो सबकॉन्शियस माइंड बेचारा क्या करेगा वह तो बॉस के हर बात मानेगा तो कॉन्शियस माइंड को पहले ट्रेनिंग देने की जरूरत है कि वो पूरा फोकस करके अपना काम करवाना शुरू करें और मेडिटेशन क्या है मेडिटेशन विचारों को दृष्टा भाव से देखना है जो लोगों को पता नहीं है बहुत लोगों को पूछता हूं तुम मेडिटेशन करते हो बोले हां मैंने किया मगर मजा नहीं आया मेरे से नहीं हो रहा है
(47:58) मेडिटेशन कैसे पता पता तुम्हारे ऐसा नहीं हो रहा। बोले मैं आंख बंद का करता हूं और मुझे विचार आने लगते हैं। बोला तुमको किसने बताया कि मेडिटेशन में विचार नहीं आते? बोले वही तो है। मैं बोला नहीं ऐसी बात नहीं है। मेडिटेशन में विचार आते हैं। मेडिटेशन विचारों को रोकने का नाम नहीं है। विचारों को दृष्टा भाव से देखने का नाम है। हम बालकनी में खड़े-खड़े नीचे रोड पर देख रहे हैं तो ट्रैफिक आता जाता रहता है। ऐसे हम दृष्टा भाव से देखते रहते हैं। बिल्कुल हमें दृष्टा भाव करना है। जैसे ही आप आंख बंद करेंगे। आपको हजार टाइप के विचार आएंगे। आपको एज अ थर्ड पर्सन देखना
(48:32) है। यह विचार आया अच्छा गया और अच्छा यह दूसरा आ गया। यह भी गया तो दृष्टा भाव से देखते जाओगे ना तो अपने आप धीरे-धीरे शांत होगा। धीरे-धीरे यानी एक दिन भी लग सकता है, एक महीना भी लग सकता है, एक साल भी लग सकता है, 10 साल भी लग सकता है। दो-चार दिन में आपका मेडिटेशन मेडिटेशन और विचार बंद होना होता ही नहीं है। मैं कितने सालों से कर रहा हूं, फिर भी मेरे विचार चालू रहते हैं। मैं दृष्टा भाव से देखता रहता। सिर्फ में अवेयरनेस क्रिएट किया है कि मुझे कौन से कौन से विचार आते रहते हैं। कितने सालों के बाद यह है। लोगों को लगता
(49:06) है बस शुरू किया और 8 दिन में तो हमारा ध्यान लग जाना चाहिए। वो गलतफहमी है। समझे ना? ये महावीर स्वामी को बुद्ध भगवान को कितने साल मेडिटेशन में बैठे तब यह ज्ञान खुला था। उनका दादा लेखराज वो भी 18 साल 20 साल मेडिटेशन में बैठे थे। तब यह ब्रह्मा कुमारी का ज्ञान उनको मिला है। ऐसा एक जीवन विद्या है। जहां वहां अह नागराज जी है। उन्होंने भी 16 18 साल मेडिटेशन में बैठ के अपना अंदर का ज्ञान निकाला जो आज जीवन विद्या के नाम पर प्रचलित है। तो कहने का मतलब है शांत मन ही हमारी सुख की चाबी है और कोई करना नहीं चाहता है। और आपको क्या लगता है 100 में
(49:42) से कितने लोगों का मन अशांत होगा? कितने लोगों का? मैक्सिमम। 100% बच्चे का, बाप का, बेटे का, दादी मां का, टीचर का, बॉस का, एंप्लई का, ड्राइवर का, पैसेंजर का सबका स्ट्रेस स्ट्रेस रहता है। क्योंकि हमने एडवांस होकर डेवलपमेंट करके सुविधा बढ़ा दी मगर मन को अशांत कर दिया। यह सुविधा नहीं हमको हमारे मन को अशांत कर दिया। हमारे पास कोई प्रोडक्टिव काम ही नहीं रहा। हर चीज में रिमोट कंट्रोल रिमोट कंट्रोल हमारे पास कुछ टाइम ही नहीं बचा। अच्छा काम ही नहीं बचा जहां हम अपने को एंगेज करें। फिर आंख बंद करके हम विचार करते हैं। वह भी नेगेटिव विचार
(50:21) लेस विचार। तो लाइफ में प्रॉब्लम आते हैं। जिसकी वजह से डिप्रेशन, डवोर्स, सुसाइड ये सब बढ़ रहा है। सुसाइड कौन करता है? कोई नॉर्मल इंसान करेगा। डिस्टर्ब माइंड वाला ही करेगा। अगर पहले से उनको ट्रेनिंग दी जाती होती कि मन को कैसे शांत रखना है तो क्यों सुसाइड करेगा? झगड़े हस्बैंड वाइफ में क्यों होते हैं? और सन मन की वजह से होते हैं। क्लेश विचार आते हैं। उसमें से तो झगड़े होते हैं। दूसरी बात उसने कहा कि वृत्ति पांच टाइप की होती है। प्रमाण, विपय, विकल्प, निद्रा एंड श्रुति। तो प्रमाण क्या है? जो हमने खुद ने पांच इंद्रियों से जो अनुभव किया है वह प्रमाण
(50:56) यानी सही नॉलेज है। बाकी सही नॉलेज नहीं है। विपय यानी क्या है? जो है उससे उल्टा समझना उसको विपय कहते हैं। अंधेरे में रस्सी को आपने सांप समझ लिया और डर गए वो विप्राय है क्योंकि वह सांप नहीं है। रस्सी है। विपय तो हमारे जीवन में सबसे ज्यादा दुख विप्राई से मिलता है क्योंकि जो सुख देने वाली चीजें हैं उसको हम दुख देने वाली समझते हैं और दुख देने वाली चीजों को हम सुख देने वाली समझते हैं और उसके पीछे भागते हैं और जिंदगी भर उसके पीछे भागते हैं। पैसा है उसको हम सुख देने वाली चीज समझते हैं और कंटीन्यूअसली उसके पीछे भागते हैं। यह सबसे बड़ा अभिप्राय है। यह
(51:33) नाम है हमारा यह भी दुख देने वाली चीज है। नाम एक कभी भी गिर सकता है। आसाराम बापू का एक दिन में गिर गया ना तब हो सकता है ऐसा कुछ भी हो सकता है। तो जो सुख देने वाली चीज है उसको हम दुख देने सुख देने वाली क्या चीज क्या है? हमारा शांत मन यह हमारी सुख देने वाली चीज है। उसके पीछे तो हम भागते नहीं है। और दुख देने वाली चीज है। पोजीशन पावर मनी प्लेजर यह सब जो टेंपरेरी है। पतंगी ऋषि कहता है कि जो परमानेंट है उसके पीछे काम करो। जो टेंपरेरी है उसके पीछे भाग के अपने दुख पैदा कर रहे हो। तो यही सॉल्यूशन है। शांत मन सभी चीज का सॉल्यूशन है। और
(52:11) उससे जो हैप्पीनेस मिलता है ना वो लास्ट वेगास में नहीं मिलता है। मैं तो लास्ट वेगास चार पांच बार गया हूं। मुझे पहली बार थोड़ा एक्साइटमेंट आया। बाद में तो मुझे नॉर्मली जैसे अहमदाबाद के रोड पे घूम रहा हूं ऐसा लग रहा था। और चौथी पांचवी बार तो मैं 9:00 बजे सो गया था होटल में। मेरी 9:00 बजे सोने की आदत है। तो मेरे साथ आया तो बोल रहे थे साहब आप लास्ट घास में आके न 9 ओ क्लॉक क्यों सोते हैं? बोला मुझे कोई एक्साइटमेंट लगता ही नहीं है। मैं तो घर मैं तो बैठ के मेडिटेशन करूंगा। उसमें ज्यादा हैप्पीनेस मिलता है ये लाइटिंग देखने से या कैसीिनो में जाने से
(52:38) तो कहने का मतलब है कि सुख के व्याख्या ही लोगों को पता नहीं है ये दारू पार्टी ये घूमना ये सब चीजें ये और पांच इंद्रियों को ही हम सेटिस्फाई करने के लिए भागते रहते हैं। अच्छा खाना, अच्छा देखना, अच्छा स्पर्ध, अच्छी सुगंध, सब कुछ अच्छा सुनना, अच्छी कॉन्सर्ट में जाके किसी का गाना सुनो, यह सुनो। पांचों इंद्रियों को बस सेटिस्फाई करो। ये कभी नहीं सेटिस्फाई करने वाली भगवान ने पांच इंद्री दी है। जितना सेटिस्फाई करोगे उतना दे। वो मांगता ही रहेगा। तो यह समझते ही नहीं लोग। बस भागते रहते हैं उसके पीछे। और फिर दुख आता है डॉक्टर
(53:16) के पास शारीरिक दुख है तो मानसिक दुख है तो साइकेट्रिस्ट के पास और कुछ दुख है तो हमारे जैसे साइकोलॉजिस्ट के पास आओ कि वो बताएंगे काउंसिलिंग करके यही सिलसिला चल रहा है। तो जैसे आपने कॉन्शियस माइंड का तो कहा कि उसको ट्रेनिंग देने के लिए एक तो विचार हमें देखने हैं कि जहां हम एनर्जी अपनी लेकर जा रहे हैं वैसे आएंगे और मेडिटेशन आपने कहा प्रेजेंट मोमेंट में आने के लिए। तो जैसे अब आपने कहा प्रेजेंट जो हमारा कॉन्शियस माइंड है वो बॉस है और सबकॉन्शियस माइंड वैसे ही काम करता है। तो जहां-जहां हमारी एनर्जी जा रही होगी वो वो
(53:43) मेमोरी स्टोर होती जाएगी और सबकॉन्शियस हमारी वैसे ही लाइफ में मैनिफेस्ट करता रहेगा। पहले प्लानिंग करेगा फिर अपोरर्चुनिटी क्रिएट करेगा। आपको रिंट देगा कि ये अपॉर्चुनिटी है। तुम पहचानो और तुम इसको करो। करेगा। तो ये पूरी सीक्वेंस समझने जैसी है। तो जो सबकॉन्शियस में पुरानी मेमोरीज़ पढ़ी होंगी। क्या वो हर्डल बनती हैं? फिर उस समय पे जब हम कॉन्शियसली तो अब हम एक्शन लेना शुरू हो गए कि नहीं अब हमें बदलना है। लेकिन जो पुराने पैटर्न पुरानी मेमोरी आपको डिसीजन लेने में डिस्टर्ब करती है। तो उसको कैसे हम फिर से रिवायर करेंगे? हां वही कह देखो मान लीजिए आपके कोई एक
(54:14) पर्टिकुलरली कम्युनिटी के लोगों के साथ दो-तीन बार आपका खराब एक्सपीरियंस हुआ। हम आप उसके उसका कोई भी प्रपोजल आएगा कि चलो हम एक साथ में मिलके काम करते हैं। तो आपको पहले उसके ऊपर सोचना पड़ेगा। फिर डिसीजन लेना पड़ेगा फिर एक्शन। मगर वह सोच को प्रभावित करेंगे। आपके पास्ट एक्सपीरियंस जो आपकी मेमोरी में पड़े हुए हैं। ऐसे ही कम्युनिटी के लोगों के साथ मैंने पहले बिजनेस किया था तो मुझे क्या हुआ था? हो सकता है ये आदमी भी मेरे साथ ऐसा करे तो आप थोड़ा डर के डिसीजन लोगे या अवॉइड करोगे। है ना? तो हम जो भी डिसीजन लेते हैं उसमें पास्ट के हमारे
(54:48) एक्सपीरियंस हमारा प्रोग्रामिंग डेफिनेटली इफेक्ट करता है। ये ऐसा ये होता है। तो क्या हम उनको बदल सकते हैं? जैसे कई चीजें हैं कि हमें हम प्रेजेंट में हम आना चाह रहे हैं कि हमें इस चीज के ऊपर एनर्जी फोकस करनी है। लेकिन हमारा पैटर्न है कि हम डरते रहते हैं एक्शन लेने से, डरते रहते हैं स्टेप लेने से और वो मतलब पुराने पैटर्न्स हैं कि नहीं ये काम नहीं करना कुछ हो गया तो नेगेटिव थिंकिंग का पैटर्न है वो बार-बार सामने आ रहा है कि हम उस पैटर्न को भी बदल सकते हैं। कुछ बदल सकते हैं। तो वो हम कैसे बदलेंगे ताकि वो नए स्टेप्स
(55:14) जो हमें लाइफ में लेने हैं उसमें ना रोके। एक्सक्टली। इसके पहले बात है कि इसका पूरा ज्ञान होना चाहिए कि हमारे पास जो मन है वह कैसे काम करता है। दूसरा हमारा पैटर्न को हमें आइडेंटिफाई करना है। हमारे लाइफ में कौन से ऐसे पैटर्न है जो हमारी लाइफ में हमें ऑब्स्ट्रक्ट करता है। सुख के लिए सफलता के लिए करता है। और वो कहां पड़ा है और कहां से आया है। उसको ट्रैकिंग करना पड़ेगा कि मेरे पास यह पैटर्न कहां से आया। एक कहानी मैंने कहीं भी सुनी थी और बहुत बार मैं बताता हूं कि एक लेडी थी वह शादी करके आई और बंगाली फैमिली थे फिश बनाते थे तो फिश
(55:49) का हेड और टेल काट के वो पकाती थी तो किसी ने पूछा तुमने ये क्यों काटा है ये भी तो लोग खाते हैं बोले नहीं वो तो ऐसा ही रहता है बोले ऐसा क्यों रहता है बोले पता नहीं मगर हमारे घर में तो ऐसा ही चलता है बोले तुमको किसने सिखाया बोले मेरी मां ने सिखाया मेरी मां भी ऐसा करती जी बोले तुम्हारी मां जिंदा है। बोले हां जिंदा है। बोले उसको जाके पूछा कि तुम ये हेड और टेल क्यों काटते हो? तो बोले ये तो चलता रहता है। हमारे खानदान में चलता रहता है। बोले तुमने कहां से देखा? बोले मेरी मां करती थी तुम्हारी मां जिंदा है। बोले हां तो उसको पूछा। तो बोले हम पहले बहुत गरीब
(56:22) थे। हमारे घर में एक छोटा सा बर्तन था। बड़ा बर्तन नहीं था। तो पूरी मछली उसके अंदर आती नहीं थी। तो हम उसका पूछ और हेड काट लिया तो मेन पार्ट आ जाता था और पकाते थे। तो इसलिए ऐसा हुआ। तो देखो किसी ने क्वेश्चन ही नहीं किया। पैटर्न चलता रहा इसके आगे जाके। किसी ने इसको चैलेंज ही नहीं किया कि ऐसा क्यों होता है। तो हमारी लाइफ में ऐसे बहुत सारे पैटर्न होते हैं। मेरे जीवन में ऐसा पैटर्न बन गया था। मेरे फादर ने नौकरी भी किया और बिजनेस भी किया और मेरे सामने उन्होंने कितने सारे बिजनेस में फेलर किया। नुकसान किया उन्होंने और
(56:54) फिर नौकरी किया उन्होंने। तो मेरे माइंड में यह प्रोग्रामिंग हो चुका था कि ने नौकरी इज द बेस्ट थिंग। मैंने डॉक्टर बनने के बाद 30 साल तक नौकरी की और मेरा भाई ने जिंदगी भर नौकरी की। मेरा छोटा भाई है ऐसे उसने जिंदगी भर नौकरी की। उसने अभी तक कोई बिजनेस का सोचा नहीं। क्योंकि घर में वो पैटर्न बना था। वही पैटर्न चला हमारा और बाद में जब ये माइंड पावर के बारे में मैंने सीखा तब समझा कि ये मेरा पैटर्न है। ये मेरा पुराना प्रोग्रामिंग है जो मैंने पेरेंट से देखा है कि वो नौकरी में ही थोड़ा सा सुखी हुए। बाकी हर धंधे में उन्होंने नुकसान किया था। लोगों ने उनके
(57:27) साथ चीटिंग किया था और मेरे फादर का आखिरी बिजनेस था जमीन का धंधा तो जमीन के धंधे में वो फंस गए थे। किसी ने दो जगह जमीन बेच दी थी और उसकी वजह से बहुत लफड़े हुए थे लास्ट लास्ट में। तो मैंने वो बहुत इमोशनली देखा था। तो मैं सोचा ये जमीन के धंधे में तो जाना ही नहीं चाहिए। ऐसा अगर आता है कोई हमारे साथ चीटिंग करेगा तो। तो आज तक मैंने जमीन में अभी तक पैसा नहीं रोका। इतना जानने के बाद भी है ना और जबकि मुझे पता है कि सबसे ज्यादा धनवान बनते हैं जमीन के धंधे से बनते हैं। मैंने बहुत धनवान लोगों की स्टोरी देखी है। सबसे ज्यादा वो रियलस्टेट में से धनवान बनते
(58:01) हैं। वो पैटर्न इतना मेरे अंदर झकड़ गया कि आज तक मैंने कभी जमीन में पैसा नहीं रोका है। सोच लो। तो ये हमारे पुराने जो पैटर्न होते हैं ना वह हमें बहुत इफेक्ट करते हैं। तो उसके लिए बहुत ज्यादा अवेयरनेस चाहिए। बहुत ज्यादा इंट्रोस्पेक्शन चाहिए। स्वाध्याय जो इसने पतली ऋषि ने कहा स्वाध्याय यानी खुद को एनालाइज करना कि कौन से पैटर्न हमारे यहां रिपीट हो रहे हैं। ये सब कुछ चीजें और फिर उसको बदलना है। मतलब जो भी चीजें हम जीवन में चाहते हैं जैसे कि कोई पैसा कमाना चाहता है तो पहले वो आइडेंटिफाई करें कि पैसे से रिलेटेड मेरे अंदर क्या है? क्या चीज है?
(58:31) यूजली ब्लॉक होता है। मेरे अंदर भी था। जैसे मैं नौकरी करना वो मेरा ब्लॉक था। मुझे धनवान बनना था। अब नौकरी में कितना पैसा इंडिया में कमाएगा? और बाद में मुझे एक रास्ता मिला। मैं मुंबई में जॉब कर रहा था और मुझे सऊदी अरेबिया की जॉब मिली। तो एक ही दिन में कितना बदलाव आया? मेरी लास्ट सैलरी जो मुंबई की थी वो ₹2500 ₹500 थी और नेक्स्ट डे सऊदी अरेबिया में 25000 हो गई। 10 टाइम्स हो गई सीधी मगर वो भी नौकरी चलती रही। धनवान बनने का थोड़ा रास्ता खुला। मगर कभी मैं बिजनेस नहीं कर पाया। बाद में समझा तो मैंने यह तोड़ा। आज मैं यही
(59:05) बिजनेस ही है मेरा एंटरप्रेन्योर बनके। मैंने स्टार्टअप चालू किया। अब मेरे पास करोड़ों रुपए आ गए। मगर नौकरी करता तो यह नहीं होता था। मैं पेंशन से जीता था अभी तो ये पैटर्न मैंने तोड़ा तो ये बहुत चीज ऐसे पैटर्न बन जाती है। मुझे एक ज्योतिष ने डाल दिया था। बोले अडिया साहब आपके हाथ के बीच में उंगली के बीच में बहुत जगह है ना तो पैसा आएगा नीचे से निकल जाएगा। मेरा पैटर्न बन गया था। मैं सऊदी अरेबिया में लाखों की सैलरी ले जाता था। निकलता जाता था। पैसा बचता ही नहीं था। वो पैटर्न मेरे अंदर काम कर रहा था। फिर मैंने तोड़ा तो
(59:35) आज मेरे पास निकलना बंद हो गया। सब यहीं पड़ा है। जमा हो गया। तो ऐसे बहुत पैटर्न होते हैं जो हमारे सबकॉन्शियस माइंड में पड़े होते हैं। पैटर्न यानी बिलीफ एंड हैबिट्स। देखिए हमारी 90% ऑफ हमारी एक्टिविटी होती है ना दो चीज कंट्रोल करती है। हमारी बिलीफ एंड हमारी हैबिट। हैबिट होती है वो ऑटोमेटिक कंट्रोल करती है। सुबह ब्रश करने से लेकर रात को सोने तक 90% ऑफ आवर बिहेवियर इज कंट्रोल बाय आवर हैबिट। और यह हैबिट हमारी बचपन से धीरे-धीरे बन जाती है। हम उसके बारे में सोचते भी नहीं है। और उसका एक साइंटिफिक रीजन भी है। कि हमारा ब्रेन 1.5 किलो का होता है।
(1:00:11) हमारी बॉडी का नियरली 2% पार्ट बनता है। और हमारे जो खाते हैं उसका 20% एनर्जी यूज़ कर लेता है वो। उसको बहुत एनर्जी की जरूरत होती है। और सबसे ज्यादा एनर्जी वो सोचने में लगाता है। तो अगर पूरा दिन आप सोचते रहोगे तो आपकी कितनी एनर्जी वहां चली जाएगी। शरीर को मिलेगी ही नहीं। तो जो ज्यादा ओवरथिंकर होते हैं ना रात को सोते सोचते रहते हैं। सुबह उठ के बोलते हैं मैं थक गया। अरे तुमने कुछ काम नहीं किया और कैसे थक गया? क्योंकि पूरी एनर्जी आपकी ड्रेन हो गई। ब्रेन ने यूज़ कर दिया सोचने के अंदर। ऐसा है। तो नेचर ने ऐसे मैकेनिज्म बनाई कि कुछ
(1:00:47) काम ऐसे बना दिए जो बिना सोचे आप कर सकते हैं। और उसने हैबिट बना दी। ऑटो पायलट बना दिया कि इसमें सोचना नहीं पड़ता है। सुबह उठ के सोचते नहीं कि ब्रश करूं या नहीं करूं। ऑटोमेटिक हो जाता है। तो 90% एक्टिविटी हैबिट से बनती है। बट यह हैबिट अच्छी भी हो सकती है, बुरी भी हो सकती है। हमें उसको ट्रैक करना है कि हमारी कौन सी हैबिट अच्छी है जो हमें लाइफ प्रमोटिंग है, कौन सी लाइफ डैमेजिंग है उसके ऊपर काम करो। एटॉमिक हैबिट करके किताबें बहुत फेमस हुई है। और दूसरा है बिलीफ। हम जो सोच समझ के काम करते हैं जो ऑटोमेटिक नहीं है वह
(1:01:21) सोच समझ के काम करने के ऊपर हमारी बिलीफ सिस्टम काम करती है क्योंकि बिलीफ जो है वही हिसाब से हम डिसीजन लेंगे और एक्शन लेंगे तो अगर हमें इंटरनल चेंज करना है हमारे प्रोग्रामिंग में तो ये दो चीजों के ऊपर ज्यादा चेंज करना है कि हमारी बिलीफ सिस्टम के ऊपर काम करो और हैबिट के ऊपर काम करो और जैसे-जैसे इसको ट्रैक करते जाओगे समझते जाओगे उसको तोड़ते जाओगे वैसे-वैसे आपका जीवन अच्छा होता जाएगा बैड हैबिट गुड हैबिट में कन्वर्ट हो जाएगी जो बिलीफ जो आप ब्लॉक बन के बैठी है मेरे अंदर जो मनी का ब्लॉक था वह मैंने दूर किया ऐसे बहुत सारे ब्लॉक होते हैं
(1:01:54) रिलेशनशिप में ब्लॉक होते हैं एक दो बार ब्रेकअप हो जाता है तो ऑल मेन आर नॉट ट्रस्टेड और ऑल वी वुमेन आर नॉट ट्रस्टेड ब्लॉक बन गया फिर वो किसी से जुड़ने में डर जाता है ब्लॉक बन जाता है तो ऐसा बहुत जगह पे होता है तो वही लाइफ में जो भी चीज अगर कोई चाह रहा है जो हमारी ऑडियंस है अपनी किसी भी लाइफ के एरिया में इंप्रूवमेंट चाहता है चाहे वो हेल्थ में चाहे वो रिलेशनशिप में चाहे फाइनेंस से रिलेटेड चाहता है या अपने आप को करना चाहते हैं तो सबसे पहले क्योंकि आपने कहा कि हम आइडेंटिफाई कर सकते हैं हमारे कई जन्मों के भी जो पैटर्न्स हमारी मेमोरी में पड़े हैं तो
(1:02:21) कोई एक ऐसी टेक्निक है जिससे कि वो इसकी शुरुआत कर सके अपने पैटर्न्स को आइडेंटिफाई करने की? इंट्रास्ट्रक्चर इंट्रास्ट्रक्शन अगर आप नहीं कर सकते तो लोगों को पूछो। लोगों को पूछो कि भ मेरी क्या-क्या हैबिट है? तुम्हें लगता है गलत है। लोग बताएंगे। अब होता क्या है? हमें कोई गलत हैबिट बताए तो हम तो गुस्सा हो जाते हैं। तेरा काम कर। मुझे क्यों? [हंसी] हम उसको टोकना समझते हैं। हम समझे ना? राइट? तो पहली बात तो यह कि यू बी ओपन कि मुझे अभी मेरी जीवन को खुली किताब बना देना है। मैं पहले सोचूंगा कि मेरी कौन सी हैबिट है जो मुझे नुकसान करती है। अभी पता
(1:02:57) चल जाएगा अभी तक आपको किस चीज के ऊपर लोगों ने एडवाइस दी है। सोच लो। वो सब आपका पैटर्न है। अरे ऐसा मत कर ये अच्छा नहीं है। ऐसा मत कर और हमने उसको नेगलेक्ट किया है। माइंड योर ओन बिजनेस करके उसको हकाल दिया है। अभी तक बहुत सारे हमारे नजदीक के लोगों ने आपको बताई होगी कि आपकी यह पैटर्न अच्छी है और यह गलत है। ऐसा है। जैसे इर्रेगुलर खाना हेल्थ के लिए अच्छा नहीं है। कभी भी मूड आया कुछ खा लिया, कुछ खा लिया, जंक फूड खा लिया। 10 बार लोगों ने बोला होगा कि अच्छा नहीं है। रेगुलर खाने को बैठिए कर हेल्दी फूड खा। मगर हमने उसको सुना नहीं अनसुनी कर दी है। तो आज तक
(1:03:30) लोगों ने हमें बहुत जगाने की कोशिश की है कि हमारी कौन सी कौन सी गलत हैबिट है और हमने कभी उसके बारे में सोचा ही नहीं। ठीक है? अभी आंख बंद करके सोचो। अभी तक आपको किस चीज के ऊपर लोगों ने एडवाइस की है या टोका है वो सब आपकी हैबिट है जो आपको नुकसान कर रही है। उसके ऊपर एक-एक को पकड़ो और काम करो उसको। और वहां न्यूरोप्लास्टिसिटी काम आती है। क्योंकि न्यूरोलॉजिकल ट्रैक बन जाती है। हैबिट मींस नथिंग बट न्यूरोलॉजिकल ट्रैक। आपको पता है कि न्यूरोप्लास्टिसिटी करके एक साइंस है। हमारे ब्रेन में न्यूरॉन्स होते हैं। वह एक दूसरे के साथ बातें करते रहते
(1:04:02) हैं। कम्युनिकेट करते हैं। जिसको टेक्निकल भाषा में फायरिंग कहते हैं। यानी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल भेजते रहते हैं। तो जितना ज्यादा फायरिंग होगा उतना वायरिंग स्ट्रांग होगा। न्यूरॉन्स वि फायर टूगेदर बाय टूगेदर ऐसा एक रूल है। तो हमारे ब्रेन में एक ही एक्टिविटी बार-बार करने से वो ट्रैक बन जाते हैं। फिर वो एक्टिविटी हमारे कंट्रोल के बाहर हो जाती है। वो एक्टिविटी हमें कंट्रोल करने लगती है जिसको हम हैबिट कहते हैं। तो हमें वो न्यूरोलॉजिकल ट्रैक को चेंज करना पड़ेगा। तभी यह सब कुछ होगा। तो पहले तो अपनी हैबिट को पहचानो। अवेयर हो जाओ कि
(1:04:36) मेरी ये गलत हैबिट है। जैसे अभी फॉर एग्जांपल मेरी चाय की पहले बहुत पीता था। अभी मैं एटलीस्ट मॉर्निंग में मुझे उठ के चाय चाहिए और चाय के कुछ साथ कुछ खाना चाहिए। मुझे पता है कि मुझे अगर और 100 साल जीना है लंबा तो चाय बंद कर दूं मैं। बहुत लोगों ने मुझे एडवाइस की मेरे घर में ग्रीन टी होती है, ब्लैक कॉफी भी होती है। सब कुछ होता है। मगर मैंने कभी उसके ऊपर ध्यान नहीं दिया। मगर अब मैं यहां से डिसाइड करके जाने वाला हूं कि मुझे चाय जल्दी से जल्दी बंद करनी है। जो मॉर्निंग टी है। ऐसे दो-तीन बार पीता था मैं पहले। तो ऐसे बहुत चीजें होती है कि जो मैं पहले
(1:05:08) करता था एक-एक को आइडेंटिफाई करके मैंने मेरी हैबिट चेंज की है। हैबिट ऑटो पायलट पर पड़ी है। अगेन वह प्रोग्रामिंग है। तो हमें वह प्रोग्रामिंग को चेंज करना है। तो जैसे-जैसे हमारे सबकॉन्शियस माइंड में प्रोग्राम पड़ा है, उसको आइडेंटिफाई करो और उसको धीरे-धीरे एक-एक को पकड़ के डील करो। यह काम करेगा आपका कॉन्शियस माइंड। मगर कॉन्शियस माइंड पहले स्ट्रांग एंड हेल्दी होना चाहिए। वही बेचारा इधर-उधर कूदा कूद कर रहा है। ओवरथिंकिंग में पड़ा है। नेगेटिव थिंकिंग में पड़ा है। तो क्या अपनी हैबिट को देखेगा वो? तो पहले बॉस को ठीक करो। फिर बॉस अपने सर्वेंट से अच्छा
(1:05:44) काम ले पाएगा। तो जैसे आपने इतनी सारी बातें बोली कि हम लाइफ में कोई भी एरिया है जहां पर चैलेंज फेस कर रहे हैं। पहले हम उनके पैटर्न्स को आइडेंटिफाई करेंगे। फिर उससे रिलेटेड जो हैबिट्स हैं उनको चेंज करेंगे। तो धीरे-धीरे वो हमारा कॉन्शियस माइंड उस तरफ फोकस करना शुरू करेगा। वो काम करना शुरू करेगा और फिर सबकॉन्शियस उन चीजों को हमारी लाइफ में उन अपॉर्चुनिटीज़ को हमारी लाइफ में लेकर आना शुरू कर देगा। मैनिफेस्ट करना शुरू कर देगा। तो क्या ये बाकी जो एनर्जी लेवल पर चीजें हो रही हैं क्या वो फिजिकल लेवल पर भी हो जाती हैं कि
(1:06:11) अगर कोई अपनी बॉडी के ऊपर चाहता है फिजिकली चाहता है क्योंकि आपने कहा कि सारी बीमारियां साइकोसोमेटिक हो रही हैं तो क्या वो जो एजिंग को लेकर होता है या फिर जो हमारी बॉडी होती है कि हम लोग कई चीजें एक्सेप्ट करके ही बैठे होते हैं। एज के साथ घुटने खराब हो जाएंगे। कमर में दर्द शुरू हो जाएगा। हमारे बाल झड़ जाएंगे। स्किन जो है हमारी लूज़ हो जाएगी। कई बीमारियां लगनी ऑटोमेटिकली शुरू हो जाएंगी। तो क्या उन बिलीफ सिस्टम्स को भी बदला जा सकता है? और उससे हमारी जो बॉडी है वो भी लंबे समय तक रह सकती है। बिल्कुल पहली बात तो यह है कि मुझे अभी तक
(1:06:37) बहुत सारे कॉम्प्लीमेंट मिले कि आप 70 सीख के लगते नहीं हो। उसका क्या सीक्रेट है? तो सबसे पहला सीक्रेट है मेरा शांत मन। मुझे गुस्सा नहीं आता है। मैं ज्यादा एक्साइटेड नहीं रहता हूं। मैं इंस्टेंट रिस्पांस नहीं देता हूं। 99% ऑफ द टाइम। तो जितना मन को शांत रखोगे तो नेचुरली हमारी बॉडीज हीलिंग मोड में रहेगी और हम ये होता है कि हमारी एक ऑटोनॉर्मिक नर्वस सिस्टम होती है जिसमें सिंपैथेटिक पैरासिंैथेटिक दो मोड रहते हैं। जब आप एक्साइटेड रहते हैं, चिंता में रहते हैं, गुस्से में रहते हो तो सिंपैथेटिक मोड है वो एक्टिव रहता है जहां फाइट एंड फ्लाइट
(1:07:14) रिस्पांस होता है जहां कॉर्टिसोल का सिकक्रेशन होता है जो हमारी बॉडी को डैमेज करता है। जब आप मेडिटेशन करते हो तो पैरासिंैथेटिक सिस्टम में वह एक्टिवेट होती है जो आपके बॉडी को हीलिंग करती है। आपको यंग बनाती है और सब कुछ करती है। तो सभी को यही सिखाना है कि आप पैरासिंैथेटिक को ज्यादा एक्टिवेटेड रखो। सिंपैथेटिक को जरूरत पड़े तब जब हमारे सामने कोई डेंजर आ जाए तभी मगर हमारा माइंड है ना वो रियल और इमेजिनेशन में नहीं समझता है। रियल सामने शेयर है तो वही रिस्पांस होगा और हमारे मन में भी शेयर है तो भी वही बॉडी रिसोंड करेगी। फाइट एंड फ्लाइट रिसोंड। तो हमें
(1:07:49) क्या करना है? मेडिटेशन के जरिए हमारे मन को शांत करना है। तो हमारा बॉडी में रिपेयरिंग होगा। आप पेडलेस हो गए। बीमारियों से छुटकारा होगा और मन की शांति का जबरदस्त अनुभव होगा और मैं हमेशा मुझे यही खुशी होती है। मैं हमेशा शांत और हैप्पी रहता हूं। कितना भी उथल-पाथल हो जीवन में प्रॉब्लम तो आते हैं। तो हम अब जो हमारी ऑडियंस है उनको आपने बताया कि शांत मन हमारा सब कुछ कर सकता है जिससे कि वो दरवाजे भी खुलते हैं जो हमें हमारी अपर्चुनिटी का दरवाजा तब बिल्कुल बिल्कुल और फिर हम उनको अपॉर्चुनिटी के दरवाजे खुले हुए हैं। उनको पहचानना भी सीख पाते हैं।
(1:08:22) शांत मन से होता है। शांत मन होता है। नहीं तो सामने अपॉर्चुनिटी होगी और आपको पता भी नहीं चलेगा कि करना क्या है हमको। तो क्या हम कुछ एक्सपीरियंस करवा सकते हैं इस समय पे कि जो ऑडियंस है आप कुछ ऐसा गाइडेड मेडिटेशन टाइप हो ताकि उनका जो मन है वो शांत हो सके। बिल्कुल क्योंकि मैंने कहा ना लोग यही सोचते हैं कि मेडिटेशन मेरे से नहीं होता है क्योंकि मेडिटेशन का उनका जो बिलीफ है वही गलत है। मेडिटेशन यानी कोई एक शांत जगह पर बैठो। कंफर्टेबल पोजीशन में आंख बंद करो और जो भी विचार आते हैं उसको रोको मत, कंट्रोल मत करो। साक्षी भाव
(1:08:53) से देखते जाओ। आज ही आज कम नहीं हो जाएंगे। मगर आपको एक दृष्टा बनने की आदत हो जाएगी। तो दर्शक मित्रों चलिए एक अच्छी जगह पे बैठ जाइए। शांत जगह पे बैठ जाइए। सीधा बैठ जाइए। रीड की हड्डी आपकी सीधी हो तो अच्छा मेडिटेशन होता है। हाथ अपनी गोद में रखिए। चेयर पे बैठे तो यहां रख सकते हैं। यहां रख सकते हैं। चश्मा पहना तो उसको उतार के साइड में रख दीजिए। तो धीरे से अपनी आंख बंद करें और एक दृष्टा भाव से जैसे रोड के ऊपर ट्रैफिक देख रहे हैं। ऐसे अपने विचारों के ट्रैफिक को देखते रहिए। सिर्फ अपने विचारों के ट्रैफिक को देखते रहिए।
(1:09:31) कौन सा विचार आ रहा है? क्या विचार आ रहा है? यह विचार आपके भविष्य के लिए है या भूतकाल के हैं या वर्तमान के हैं? यह अच्छे हैं या बुरे हैं? यानी आपको सुख देने वाले विचार है या दुख देने वाले विचार है। जो भी विचार आते हैं उसको एक ऑब्जर्वर करके ऑब्जर्व करिए। साक्षी भाव से देखते रहिए। आपको और कुछ नहीं करना है। विचारों को सिर्फ साक्षी भाव से देखते ही जाना है। बस विचारों को देखते रहिए। देखिए अभी आपके मन में कौन सा विचार आया। सोचिए देखिए। हो सके तो उसको जज नहीं करना है। सिर्फ
(1:10:18) उसको देखना है। आता है जाता है। उसको रोकना नहीं है। जाने देना है। अवेयरनेस क्रिएट करनी है कि मेरे मन में कितने विचार आते हैं। कौन से विचार आते हैं? कैसे आते हैं? कैसे जाते हैं। सिर्फ विचारों को देखते जाइए। देखो अभी कौन सा विचार आया। ऑब्जर्व करिए। रोकिए मत। जाने दीजिए। अब दूसरा विचार आया होगा या पहला विचार को पकड़ लिया होगा जाने दीजिए किसी को पकड़िए मत कुछ मत करिए जस्ट ऑब्जर्व जस्ट ऑब्जर्व योर थॉट्स जितना थॉट्स को ऑब्जर्व करोगे उतना आप महसूस करोगे कि उसकी स्पीड कम हो गई है। उसकी संख्या कम हो गई है। बहुत लंबी
(1:11:06) प्रैक्टिस के बाद यह इतनी संख्या कम हो जाएगी कि आपको सुख का अनुभव होना शुरू हो जाएगा। इतने सालों से आप बहुत ज्यादा सोचते थे। अब धीरे-धीरे आपका पांव एक्सीलरेटर के ऊपर था। अब आप धीरे-धीरे ब्रेक के ऊपर पांव लगा रहे हैं। अपनी मन की गति को स्लो करने की कोशिश कर रहे हैं। सिर्फ ऑब्जर्व करके अवेयरनेस क्रिएट करके। अवेयरनेस क्रिएट करिए। कि आपके मन में अभी कौन से विचार चल रहे हैं। अवेयरनेस क्रिएट करिए कि आपके मन में कौन से विचार चल रहे हैं। और यह विचार आपके मन में कोई इमोशनल छेड़छाड़ कर रहा है कि नहीं यह भी ऑब्जर्व
(1:11:51) करिए। रोकिए मत। अगर नेगेटिव विचार है तो शायद आपके अंदर दुख की भावना फील होगी या अच्छे विचार है तो शायद सुख की भावना होगी। होने दीजिए। फील करिए। देखते रहिए। उसको रोकने की कोशिश मत करिए। जस्ट फील इट। जस्ट फील इट। आंखें खोलिए। कैसा अनुभव रहा? ऑब्जर्व किया कौन से कौन से विचार आए। कौन सी स्पीड से जा रहे थे। आपके इमोशन को क्या चेंज करवा रहे थे। यही होता रहता है हमारे उसमें। जितना ज्यादा इसको ऑब्जर्व करोगे इतना उसकी संख्या कम हो जाएगी, स्पीड कम
(1:12:35) हो जाएगा और एक दिन आपको इतना सुख मिलेगा आप सोच भी नहीं सकते। मैं तो नया-नया इस लाइन में आया हूं। जो पुराने लोग होंगे जो बचपन से करते होंगे उनको कितना फायदा होता होगा। ऐसा है। तो यही है हमारा जीवन। सुखी होने का सही चाबी है। हमारी संस्कृति में पढ़िए सब। हम तो अभी तक वेस्टर्न किताबें पढ़ के यह सीखते थे। अब जमाना आया कि हमारी किताबों को भी खोलें और इसको सीखें। तो दिस इज व्हाट और जैसे एजलेस बनना है तो भी मेडिटेशन का बहुत रोल है। क्योंकि हमारी एज को डैमेज करने वाला सबसे बड़ा जो चीज है ना वो स्ट्रेस है। और स्ट्रेस की एक ही
(1:13:14) दवाई है मेडिटेशन और कोई दवाई नहीं है। तो स्ट्रेस अपनी लाइफ से कंट्रोल कर लिया तो आपका 80% काम हो गया। सोच लो एंटी एजिंग थेरेपी में। फिर कोई क्रीम लगाने की जरूरत नहीं है। बोट की जरूरत नहीं है। फिलर की जरूरत नहीं है। अंदर से तेज निकलेगा जिससे लोग आकर्षित होंगे। यह होगा। तो यह है एंटी एजिंग फार्मूला। यही है हमारे कॉन्शियस माइंड के पावर को शांत करने की टेक्निक। मैं चाहता हूं कि लोग इसको बराबर समझे। इस्तेमाल करें और खास करके हमें कमेंट करें। इसमें कौन सी चीज अच्छी लगी? क्या आप रिपीट करना चाहते हो? क्या डिटेल में जानना चाहते हो? आप हेडलेस बॉडी के
(1:13:49) बारे में डिटेल में जानना चाहते हो? यह मन को शांत करने का जो विज्ञान है पतना ऋषि का वह करना चाहते हो या सबकॉन्शियस माइंड से कैसे और ज्यादा काम लिया जाए वो जानना चाहते हो आप बताइए हो सकता है कि आपकी डिमांड अच्छी रही ज्यादा लोगों की रही तो हम फिर से आपके सामने आएंगे हमारा तो काम ही है आपको जो चाहिए वो देने का ठीक है मजा आ गया आपके क्वेश्चन सुन के आपसे बातें करके ये हमारा सब सीक्वेंस में तीसरा पडकास्ट है अगर ये पसंद आया तो चौथी बार मिलेंगे और पहले भी हमें बहुत अच्छे अच्छे व्यूज मिले हम तो मजा आ गया। थैंक यू वेरी मच।
(1:14:23) हां नहीं पहले अभी जो हमने किया था ट्रांजैक्शनल एनालिसिस पे किया था हमने और दूसरा हमने एजलेस बॉडी पे किया था। वो भी बहुत पसंद आया था सबको। एंड डेफिनेटली जो आज का पडकास्ट है ये कहीं ना कहीं हमारी लाइफ की जैसे कि आपने बात कही थी कि जितनी भी प्रॉब्लम्स होती हैं कहीं ना वो कहीं ना कहीं हमारे अशांत मन की वजह से ही निकल कर आती है और वो स्ट्रेस में कन्वर्ट होता है। अशांत मन जो होता है और उसी को ही हम शांत कर लेंगे तो सारी जो दरवाजे हैं वो खुल जाएंगे। एक ही कारण है। आसान मनी हमारे हर दुख का कारण है। बस और कुछ नहीं है।
(1:14:52) बिल्कुल सही बात है। तो थैंक यू सो मच अपना कीमती समय हमें देने के लिए। थैंक यू। थैंक यू। थैंक यू।
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