Friday, October 16, 2026

Dr. Ajai Sonkar Podcast: लोगों में बात-बात पर गुस्सा और बेचैनी की असल वजह | Archana Kharkwal Tiwari

Dr. Ajai Sonkar Podcast: लोगों में बात-बात पर गुस्सा और बेचैनी की असल वजह | Archana Kharkwal Tiwari

Author Name:Web Darshan

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@WebDarshann

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=T1A3nsLKRko





Title: Dr. Ajai Sonkar Podcast: लोगों में बात-बात पर गुस्सा और बेचैनी की असल वजह | Archana Kharkwal Tiwari

Author Name: Web Darshan

Description: #DrAjaiSonkar #SocialMediaAddiction #ArchanaKharkwalTiwari

Can constantly watching Reels weaken our focus and concentration? Is the increasing dependence on social media and smartphones affecting our behavior, emotions, and thinking?

In this special conversation with Web Darshan, host Archana Kharkwal Tiwari discussed important topics like Reels, social media, AI dependency, the brain, stress, anger, emotions, and our relationship with nature.

Dr. Ajay Sonkar explains that constantly changing short-form content can cause our brains to rapidly switch from one topic to another. The conversation also discussed issues like focus, cognitive ability, emotional loneliness, digital dependency, and living in the present moment.

The conversation also explores how stress and a negative environment can affect our behavior and biological activity, and how connecting with nature can be important in our lives.

This conversation attempts to understand the relationship between science, lifestyle, and modern digital life.

Guest: Padma Shri Scientist Dr. Ajai Sonkar
Host: Archana Kharkwal Tiwari
Channel: Web Darshan

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Can watching too many Reels affect our focus, concentration, and way of thinking? Is the increasing dependence on smartphones, social media, and AI changing the way we process information, emotions, and everyday life?

In this special Web Darshan conversation, Padma Shri Scientist Dr. Ajai Sonkar speaks with host Archana Kharkwal Tiwari about the impact of Reels, social media, smartphone dependency, AI, stress, emotions, anger, and our connection with nature.

The discussion explores how rapidly changing short-form content may affect our ability to stay focused on one subject for a longer period. Dr. Ajai Sonkar also discusses emotional loneliness, digital dependency, negative information, stress and the importance of staying connected with the present moment.

The conversation further explores the relationship between mind, emotions, biological activity and nature, offering viewers a thought-provoking perspective on modern digital life.

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Contact:
Dr. Ajai Kumar Sonkar
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Transcript:
(00:00) हर अगला रील एक डिफरेंट सब्जेक्ट पे होता है। तो जब आप स्क्रोल करते जाते हैं तो ब्रेन इतनी जल्दी स्विच नहीं कर सकता। एक सब्जेक्ट से दूसरे सब्जेक्ट तक। ब्रेन मल्टीटास्किंग के लिए बना ही नहीं। आजकल तो वो भावनात्मक जो है एआई भी आ गई। लोग अपनी गर्लफ्रेंड से बात करते हैं। तो एआई से पूछते हैं कि अब क्या कहूं? उसने ये कहा है। आज लोगों के अंदर कॉन्फिडेंस नहीं है कि एक जो है पैराग्राफ ड्राफ्ट करना है तो अपने आप ड्राफ्ट कर लें। को पता लगा चैट जीपीटी और ये एआई का और डिपेंड है। उनको कॉन्फिडेंस ही नहीं है कि हमने जो लिखा है वो सही है।
(00:32) क्या आपको लगता है कि फ्यूचर हमारा कैसा होगा? फिर अगर हम ऐसे डिपेंडेंट होते जा रहे हैं हम इतना डेवलप करने के बाद भी हम इतने अशांत क्यों हैं? छोटी-छोटी बात पे इतनी हत्याएं क्यों हो जा रही? गंभीर वैज्ञानिक कारण है जो कि हमें डराता है। हर चीज हमें घबराहट बेचैनी की ओर ले जा रही है। आज जो है जो खोज हो रही है उसमें कोई सेंस है? जो खोजे वो तो उल्टा पड़ा। मोबाइल खोजे वो उल्टा पड़ा। पता नहीं कितने देशों में बैन करना पड़ रहा है कि बच्चों को मोबाइल मत दो। सोशल मीडिया से दूर रखो। ये जो भी इन्वेंशनंस हो रही है सब देखो आप।
(01:04) तो हमारे इमोशंस ही हमारी बीमारियों का कारण होते हैं। जो हमारा मन है वो हमारे शरीर का ड्राइवर है कि जब आपने यह कहा सबका भला हो तो आपके नमस्कार आप देख रहे हैं वेब दर्शन। आपके साथ मैं हूं अर्चना खरकवाल तिवारी। रील देखने वाले युवा क्या भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं? स्मार्टफोन ने एक डिजिटल क्रांति तो लाई है लेकिन इसने कहीं ना कहीं हमें मानसिक तौर पर कमजोर भी किया है। तो ये आने वाली समस्या की तरफ इशारा कर रहा है और इसका सलूशन क्या हो सकता है? तो आज इसके वैज्ञानिक पक्ष को हम समझेंगे। हमारे साथ पद्मश्री वैज्ञानिक हैं डॉक्टर
(01:45) अजय सोनकर जी। सर बहुत-बहुत स्वागत है आपका। सर थोड़ा सा बताइए कि हम स्क्रोल करते जाते हैं, रील देखते जाते हैं। खासतौर से युवा तो बहुत ज्यादा रील देखते हैं। तो क्या कहीं ये उनके ब्रेन को डैमेज कर रहा है? क्या हम इस तरीके के कंटेंट को देखने के लिए बने हैं? एक्चुअली क्या होता है जो रील है अगर आप ध्यान दें तो हर अगला रील एक डिफरेंट सब्जेक्ट पे होता है। तो जब आप स्क्रोल करते जाते हैं तो ब्रेन इतनी जल्दी स्विच नहीं कर सकता एक सब्जेक्ट से दूसरे सब्जेक्ट तक जितनी तेजों में सब्जेक्ट बदल जाता है। हम तो क्या होता है कि जो अगर आपने रील देखना
(02:29) शुरू किया शुरू में तो ब्रेन उसको जो है रजिस्टर्ड कर रहा होता है। लेकिन जैसे-जैसे आप स्क्रोल करते जाते हैं वो सब्जेक्ट बदलता है। अब ब्रेन तुरंत वो दूसरे सब्जेक्ट पे स्विच करे। फिर तीसरे सब्जेक्ट पे स्विच करे। चौथे सब्जेक्ट पे स्विच करे। थोड़ी देर बाद ब्रेन क्विट कर जाता है। काम ही करना बंद कर देता है ब्रेन कि जो है वो ब्रेन मल्टीटास्किंग के लिए बना ही नहीं है। और इतनी जल्दी हम इवोल्यूशन में जिस तरह से हम हमारा विकास हुआ है विकास क्रम में हम इतनी जल्दी जो है तुरंत एक सब्जेक्ट से दूसरे सब्जेक्ट पे पहुंचने की एबिलिटी
(03:06) नहीं होती और उस तरह से ब्रेन डिजाइन भी नहीं है। हर बड़ा काम हर बड़ा टास्क एक लंबे स्पैन की सोच पर जो है डिपेंड करता है। हम आपका जो रील है वो आपको शॉर्ट टर्म सोचने की तरफ जो है धकेल देता है। कि आप किसी चीज को 30 सेकंड से ज्यादा आप नहीं सोच रहे हैं। क्योंकि 30 सेकंड के बाद फिर दूसरा सब्जेक्ट आ गया। तो जब आप कोई बड़ा काम करने लगेंगे तो लंबे समय तक एक ही सब्जेक्ट पर एकाग्र नहीं हो पाएंगे क्योंकि आपने ब्रेन को ट्रेंड कर दिया है कि हर कुछ सेकंड के बाद वो दूसरी चीज करने लगे। दूसरी चीज देखने लगे। ठीक है? तो ऐसा ब्रेन की एक एबिलिटी जो है जो फोकस हो के
(03:51) एक लंबे समय तक लगातार उसी को अब जैसे एक किताब लिख रहे हैं तो आप क्या इसको 30 सेकंड में लिखा फिर बंद कर दिया। कितना लंबे समय तक एक ही स्टेट में आप रहते हैं। एक एक ही स्टेट ऑफ माइंड में रहते हैं। तब जाकर के एक पूरे सब्जेक्ट को कंप्लीट करते हैं। एक बड़े टास्क की ओर जब एक बच्चा जाता है तो उसको एक लंबे समय तक कितना फोकस्ड रहना पड़ता है। तो अपने फोकस को कमजोर करते हैं आप। तो ये ब्रेन की जो एबिलिटी है वो एकदम कमजोर हो जाती है। आपने जो बताया यह बहुत खतरनाक बात है बच्चों के लिए। ऐसे बच्चे जो लगातार रील देखते रहते हैं या बड़े भी उनकी जो
(04:28) कॉग्निटिव एबिलिटी है वो कंप्रोमाइज्ड हो जाती है। वो कोई बहुत बड़ा काम और बहुत जो है जो जिसमें बहुत लंबे स्पैन तक फोकस करने की जरूरत होती है उस करने के लायक नहीं रह जाते कुछ समय के बाद। यह इसका बहुत बड़ा नुकसान है। तो अब पहले ही जो है जो सोशल मीडिया है और जो और कुछ दिनों में उसका इंटॉक्स एक तरह के का जो है एक इंटॉक्सिकेशन भी हो जाता है। पता लगा उसी को देखने की आदत पड़ गई। आप आप देखिए कि हर आदमी डिजिटली कनेक्टेड है। लेकिन भावनात्मक रूप से अगर आप देखेंगे तो हर आदमी बेहद अकेला है। घर में जितने लोग बैठे हैं सब अपनेप मोबाइल में बिजी हैं।
(05:13) कोई किसी को एक दूसरे हर अलग-अलग सब्जेक्ट पर लगे हुए हैं। किसी को किसी से कोई मतलब ही नहीं है। कोई फिल्म शूटिंग हो रही थी तो उसके कुछ एक्टर्स वगैरह थे। वो अपने एक्सपीरियंस बता रहे थे कि हम पहले जूनियर कलाकार होते थे। किसी फिल्म में हम काम कर रहे होते थे। तो हम जूनियर होते थे। जो सीनियर कलाकार बड़े कलाकार होते थे। जो स्टार होते थे वो हमसे बात नहीं करते थे। बस अलग बैठे हुए लेकिन दो-तीन दिन शूटिंग के बाद हम सब फैमिली बन जाते थे क्योंकि सभी अकेले हैं। तो कोई साथ में बैठ के अंताक्षरी खेल रहे हैं। फिर हम खाना खा रहे हैं साथ में मजाक
(05:54) कर रहे हैं। तो एक फैमिली जैसा माहौल हो जाता था। लेकिन आज क्या होता है? फिल्म की शूटिंग हो रही है। कट हुआ। सब अपने-अपने मोबाइल में बिजी हो गए। कोई किसी से बात नहीं करता। हर कोई आप कहीं पर भी चले जाइए, किसी भी ऑफिस में चले जाइए। हर किसी के हाथ में मोबाइल है। आप मेट्रो में चले जाइए। मेट्रो में ट्रेवल कर रहा है। वो जो है मोबाइल देख रहा है। हर समय सब खोए हुए। कोई किसी से कनेक्टेड नहीं है। लोग भावनात्मक रूप से बेहद अकेले हो गए हैं जो उनके लिए बहुत खतरनाक है। तो सोशल मीडिया ने हमें बहुत भावनात्मक रूप से और मेंटल एबिलिटी हमारी कॉग्निटिव
(06:31) एबिलिटी के लेवल पर हर जगह बहुत डैमेज किया है। और दूसरा लोगों के अंदर डिपेंडेंसी भी बहुत हो गई। आज कुछ याद नहीं रहता। रास्ता याद नहीं रहता। मैप पे डिपेंड कर रहे हैं। आपकी नंबर नहीं याद रहते क्योंकि आप सब कुछ जो है आप डिपेंड कर रहे हैं कि अपना नंबर नहीं याद रहता तो पहले तो पता नहीं 50ों लोगों का नंबर याद रहता था। तो आप जो है अपनी जो एबिलिटीज है जो नेचर ने हमें दी उसको रिप्लेस कर रहे हैं इन सब चीजों से मशीन से। आपकी जगह मशीन जो है याद रखता है। आपकी जगह मशीन जो है किसी चीज को अब आप सोचिए वो आजकल तो वो भावनात्मक एआई भी
(07:13) आ गया है। लोग अपनी गर्लफ्रेंड से बात करते हैं तो एआई से पूछते हैं कि अब क्या कहूं उसने ये कहा है। मतलब जो भावना है वो तक खत्म हो गई। आपके अंदर ये कॉन्फिडेंस भी नहीं है कि आप जो है भावनात्म भावना व्यक्त कर सके दूसरे उसमें भी मशीन बीच में आ गई। तो जीना जीने का जो दायरा है वह कितना छोटा हो गया है। हर चीज मशीन का इंटरफेरेंस हो गया है। आज लोगों को इतना कॉन्फिडेंस नहीं है कि एक जो है पैराग्राफ ड्राफ्ट करना है तो अपने आप ड्राफ्ट कर ले उसको। वो पता लगा चाहे जीपीटी और ये एआई का पर डिपेंड है। उनको कॉन्फिडेंस ही नहीं है कि हमने जो लिखा है वो सही है।
(07:51) अब सोचिए कल जो है क्या होगा? आज लोग हर जगह पर एक हम सोचते हैं पैराग्राफ लिखने में जब उसको कॉन्फिडेंस नहीं रहा वो जो है सहारा ले रहा है अगर वो कोई बुक लिखे कोई किताब लिखे तो उसी से लिखेगा तो क्या वो क्रिएटिविटी होगी हम यहां तक क्यों कैसे आए क्यों आए सुविधा के नाम पे आए तो सुविधा के लिए कन्वीनियंस के लिए हमने अपनी क्रिएटिविटी को जो है सैक्रिफाइस कर दिया सर लेकिन क्या आपको लगता है कि फ्यूचर हमारा कैसा होगा फिर अगर हम ऐसे डिपेंडेंट होते जा रहे हैं नहीं जिस तरह से चल रहा है हम इवोल्यूशन के अब आप सोच के देखिए कि हम क्या थे जब समुद्र से निकले एक कुछ
(08:43) हफ्ते की जिंदगी वाले एक जीव छोटे से थे जो स्क्रोल करते हुए समुद्र से बाहर निकले जब हमने इवॉल्व किया जब हमने ग्रो किया जब जब हम हम बड़े जीव बन बनते चले गए विकास क्रम में तो क्या था हमारे पास सपोर्ट करने के लिए जो हमारे ब्रेन को हमारे शरीर को विकसित कर रहा था एआई था फार्मास्यूटिकल कंपनी थी क्या था हम इसी रॉ नेचर की गोद में इसी मिट्टी इस हवा इस सूर्य का प्रकाश इसी जल में रह के हमने 100 साल की जिंदगी पाई कुछ हफ्तों से दिमाग की हमने ऐसी योग्यता पाई।
(09:28) आज जब हम बहुत विकसित हो गए। हमारे पास फैसिलिटीज की कोई कमी नहीं। आज आप जब भी पिछली पीढ़ी को देखते हैं उससे कहीं ज्यादा सुविधाएं हैं। उससे कहीं ज्यादा आप डेवलप्ड हैं। क्या आप पिछली पीढ़ी से ज्यादा खुश हैं? पीढ़ी पिछली पीढ़ी आपसे ज्यादा खुश थी। ज्यादा शांत थी। आप कभी सोचती होंगी कि हम इतना डेवलप करने के बाद भी हम इतने अशांत क्यों हैं? पूरी दुनिया में इतनी घबराहट बेचैनी क्यों है? लोगों के अंदर पेशेंस क्यों नहीं है? लोग इतना घबराए हुए क्यों हैं?
(10:13) अग्रेशन क्यों है? लोग इतने क्रूल क्यों हो गए हैं? इतने निर्दयी क्यों हो गए हैं? छोटी-छोटी बात पे इतनी हत्याएं क्यों हो जा रही है? बाप बेटे को मार दे रहा है। बेटा बाप को मार दे रहा है। छोटी सी बात पे एक छोटी सी लेनदेन के लिए जो है सड़क पर आप देखिए ट्रैफिक में जैसे हर आदमी तैयार बैठा है लड़ने के लिए। उसके पास इतना समय है। उसी बात पे भी वही झगड़ा करने लगा है। हम क्यों है ऐसा? अगर आप सोचें तो इसके पीछे मुझसे अगर पूछे कि वैज्ञानिक कारण क्या है? तो इसका बहुत ही जो है गंभीर वैज्ञानिक कारण है जो कि हमें डराता है। होता क्या था कि
(10:58) हमारे ब्रेन का के बहुत सारे हिस्से हैं जो अलग-अलग एक्टिविटीज को गवर्न करते हैं। जैसे हमारा जो ब्रेन का एक हिस्सा है प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स जो हमें लॉजिक से सोचने, समझने, शांत होने, पॉजिटिव सोचने और किसी भी चीज के लिए रिस्पांस करने के लिए जिम्मेदार है। रिस्पांस करने में समय लगता है। जैसे मैंने आपसे कोई सवाल पूछा तो पहले आपने सवाल को समझा कि क्या पूछा है इन्होंने? फिर आपने रिस्पांस किया। फिर एक दूसरा हिस्सा है एमडेला जो हमारे आसपास के खतरे को भांपने के लिए है
(11:44) और उसके लिए आपकी रक्षा करने के लिए है कि खतरा आ गया टेक एक्शन समय नहीं है सामने कोई खतरा आ गया जान का खतरा आ गया तो एशियस हो गया एकदम अलर्ट हो गया घबरा गया आदमी तुरंत एक्शन लेना है तो उन सारी बातों को गवर्न करने के एमकडेला आज हम जिस लाइफ स्टाइल में जी रहे हैं, जिस एपिजेनेटिक में जी रहे हैं, हर चीज हमें घबराहट बेचैनी की ओर ले जा रही है। आप न्यूज़ खोलिए, टीवी देखिए, सिर्फ नेगेटिव है। लोग आपस में बातचीत कर रहे हैं। तो उनका सब्जेक्ट होस्टैलिटी और नकारात्मक चीजों से भरा हुआ है। एक फीचर न्यूज़ के लिए गुड न्यूज़ आती है।
(12:27) बाकी सब नेगेटिव कौन कैसे मर गया, क्या हो गया, क्या हो गया, कहां पर क्या सिर्फ बुरी खबरें वही टीआरपी को कॉज करती है। तो आप अगर देखना शुरू करें कि आज के पास कितने फैक्टर्स हैं जो आपको कितना खुश रखते हैं, कितना आपको डराते हैं। तो डराने वाले फैक्टर्स हर तरफ मौजूद है। तो उससे क्या होता है कि धीरे-धीरे इतनी नेगेटिविटी में रहने के कारण आपके ब्रेन को एक मैसेज मिलता है कि आप खतरे में है। तो जो आपका प्री फ्रंटल कॉेक्स है जो काम रखता है आपको लॉजिकल तरीके से सोचने के लिए जो है आप प्रेरित करता है वो बैक सीट पे चला जाता है और एमगडेला फ्रंट पे आ
(13:13) गया। आपको हमलावर बना देता है क्योंकि खतरा है। हमेशा खतरे का अंदेशा रहता है। हरदम आपको खतरा खतरा लगेगा। खतरे का एहसास होगा तो आप हर समय जो है अपने बचाव या हमला के करने के जो है मोड में रहेंगे। इसीलिए किसी ने भी आपको कुछ कहा तो आप रिस्पांस नहीं करते। या लोग जो लड़ झगड़ रहे होते हैं वो रिस्पांस नहीं कर रहे होते। वो रिएक्ट कर रहे होते। किसी ने कह दिया कि तुम बेवकूफ हो। तो वो ये नहीं सोच रहा है कि मैंने ऐसी कौन सी बेवकूफी का काम किया जिसकी वजह से मुझे ऐसा कह रहे हैं जो मैं पॉइंट आउट किया है मुझे तो मैं उसको सुधार लूं और जो है मैं समझ जाऊं कि
(13:56) क्या गलती की है मैंने। वो तुम उस सबसे बड़े बेवकूफ हो। तुम बेवकूफ हो। तुम्हारा पूरा खानदान बेवकूफ है। वो रिएक्ट कर रहा है कि उससे 10 गुना ज्यादा मैं उसको अब्यूज कर दूं। क्योंकि रिएक्ट कर रहा है। हम जैसे आपने बात शुरू करते हुए बहुत इंपॉर्टेंट बात कही रील के बारे में। वास्तव में आप यह समझिए कि हमारी जितनी भी प्रॉब्लम है वो इसलिए है क्योंकि हम घबराए हुए हैं। हम इनसिक्यर्ड हैं। और यह घबराहट और इनसिक्योरिटी की ही सिर्फ बात करें अगर तो यह सोर्स कहां से कर रही है?
(14:41) यह सोर्स कर रही है या तो पास्ट से या फ्यूचर से। पास्ट में जो भी बुरे एक्सपीरियंस आपको हुए हैं या जो किसी के साथ भी हुआ है देखा है आपने वही आपको डरा रहा है कि कहीं फ्यूचर में यह ना हो जाए और वास्तव में प्रेजेंट में कुछ भी नहीं है प्रेजेंट में सब कुछ ठीक है तो जो रील है वो आपको प्रेजेंट में रहने नहीं देती। प्रेजेंट में रहने का सबसे बड़ा मंत्र है कि वन थिंग एट ए टाइम अगर आप इस चीज को सीख जाए कि एक समय में
(15:27) सिर्फ एक चीज तो आप प्रेजेंट में रहना सीख जाएंगे तो जब प्रेजेंट में आप रहना सीख जाएंगी तो आप घबराहट और डर से मुक्त हो जाएंगे क्योंकि घबराहट और डर का दुश्मन है प्रेजेंट प्रेजेंट में वो रहते ही नहीं। वो आता ही पास्ट से है और फ्यूचर से है। जैसा कि आप जानते हैं कि फ्यूचर तो एक्सिस्ट ही नहीं करता। वो तो वह बच्चा है जो अभी पैदा ही नहीं हुआ। आप वहां से जाकर के घबराहट बेचैनी ले आ रहे हैं। कल ये हो गया तो कभी भी फ्यूचर एकिस्ट ही नहीं करता। जब भी फ्यूचर आपसे मिलेगा तो प्रेजेंट में ही मिलेगा। वो प्रेजेंट बन चुका होगा। तो है ही नहीं।
(16:10) बहुत अच्छी बात कही सर आपने। जब भी फ्यूचर आपसे मिलेगा तो कहां मिलेगा? प्रेजेंट। प्रेजेंट में ही तो मिलेगा। तो आपको क्या जरूरत है फ्यूचर में जाने की? वो आएगा ना आपके पास। आप ही उसके पीछे जा रहे हो और मिल ही नहीं सकते आप उससे फ्यूचर में। फ्यूचर में कैसे जाओगे आप? वो मिलेगा आपसे और कहां मिलेगा? प्रेजेंट मिलेगा। आपसे मिलने के लिए फ्यूचर को प्रेजेंट में ट्रांसफॉर्म होना पड़ेगा। तभी वो मिलेगा आपसे। तो आप अपनी जगह पे रहो। शांत रहो। वो आने दो उसको। आप कल्पना करते हो सिर्फ कि कल ऐसा हो गया तो उसके पीछे आधार क्या है? क्यों होगा ऐसा? ऐसा ही होगा क्या? क्या
(16:53) नियम है? ऐसे ही होगा। तो ये एबिलिटी प्रीफ्रंटल कॉेक्स के पास है जो कि बैक सीट पे बैठ गया। आज के हमारे एशियस वातावरण के कारण। तो हमको यह समझना होगा कि हम जो है आप यह समझिए कि जो हमारे शरीर में बहुत सारे जीन होते हैं। हमारा डीएनए ये क्या है? जिस तरह की एक्टिविटी होती है वो क्यों होती है? क्योंकि उसी तरह के जीन एक्सप्रेस हुए हैं हमारे शरीर में। तो उसको एक्सप्रेस कौन करवा रहा है? वो हमारी भावनाएं करवा रहे हैं कि हम क्या देख रहे हैं? क्या सुन रहे हैं? क्या बोल रहे हैं? उन सब को हमारी बायोलॉजी सुन रही
(17:38) है। तो क्या आपको यह नहीं लगता कि फिर हमें कोई बुरी बात नहीं बोलनी चाहिए और बुरी बात नहीं सुननी चाहिए और बुरी बात नहीं देखनी चाहिए। क्योंकि हमारी बायोलॉजी सुन रही है। उसी के हिसाब से जीन एक्सप्रेस करा देगी वो और हमारे शरीर में बुरा होने लगेगा। लेकिन आप वातावरण देखिए। आप तो मीडिया जगत से हैं। आप समाज में हो रही सारी बुराइयों की तरफ मुंह करके खड़ी हुई है। सब आपको देखना पड़ता है। उसको पढ़ना पड़ता है, सुनना पड़ता है, बताना पड़ता है। जब आप किसी को कुछ बता रही होती है तो आप सुन भी रही होती है। तो वो आपकी बायोलॉजी भी सुन रही
(18:12) होती है। आप इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझ लीजिए कि हमारी जो बायोलॉजी है वो ये सच और झूठ में फर्क नहीं कर पाती जैसे आपकी मैंने तारीफ की कि आप बहुत खूबसूरत लग रही हैं। बाय गॉड मैंने ऐसा माथा इतना सुंदर माथा मैंने कहीं नहीं देखा। अब यह सच है या झूठ है ये आपकी बायोलॉजी नहीं जानती लेकिन वो खुश हो गई। स्माइल किया उसने कि इतने सच्चे दिल से मेरी तारीफ कर रहे हैं। मेरे लुक की तारीफ कर रहे हैं। मेरी आंखों की तारीफ कर रहे हैं। इतनी सुंदर आंखें हैं आपकी। मैं बता नहीं सकता। बहुत सुंदर आंखें हैं। उसको इस
(18:56) बात से मतलब ही नहीं है कि ये सच बोल रहा है कि झूठ बोल रहा है। पता चला आपके ब्रेन में केमिस्ट्री शुरू हो गई। तुरंत डोपामिन सेक्रेट हुआ। सेरोटनिन सेक्रेट हुआ और हाइपोथैलेमस में एंडोर्फिन सेक्रेट हो गया। एंडफिन एक नेचुरल पेन किलर है। आपके एंटी इनफ्लेममेटरी तो शरीर में कहीं भी क्रैंपिंग हो रही है, कुछ दर्द हो रहा है, कहीं कुछ हो रहा है, स्टिफनेस है, वो सब रिलैक्स हो गया। एक झूठी बात से उसको इस बात से मतलब ही नहीं कि सच है कि झूठ है। वो साउंड का मतलब सिर्फ देख रहा है कि व्हाट ही साउंडेड ही साउंडेड कि यू आर सो ब्यूटीफुल।
(19:35) और वो खुश हो गया और उससे बायोलॉजी में फर्क आ गया। आप जितनी भी बातों से डरे हुए हो 99% बातें झूठ है। क्यों? क्योंकि आपका जो ब्रेन है वो एक रिलेंटलेसली थॉट प्रोड्यूस कर रहा है। बिना रुके जैसे हम हमारा हार्ट बीट कर रहा है। जब तक हम जीवित हैं वो बीट करता ही रहेगा। उसको रोक नहीं सकते आप। इसी तरह आप अपने ब्रेन को थॉट प्रोड्यूस करने से रोक नहीं सकते। इट्स अ थॉट प्रोड्यूसर। अब वो थॉट कैसे प्रोड्यूस कर रहा है? जो देख रहे हो आप, जो बोल रहे हो आप, जो सुन रहे हो आप, उसी से संबंधित आपको थॉट प्रोड्यूस हो रहे हैं। वो वैसे ही सपने आ रहे हैं कि
(20:20) बड़े बुरे-बुरे सपने आते हैं। अब सपना आया कुछ भी तो सुबह उठे तो क्या वो सच हुआ? सुबह बात खत्म हो गई। यार बहुत बुरा सपना आया हुआ था। हम तो इसी तरीके से जो थॉट्स हैं वो उसका सच्चाई से कोई लेना देना नहीं है। पता नहीं कौन सी चीज आपने न्यूज़ में देखी। पता नहीं किससे क्या बातें की उसी से संबंधित थॉट अब मान लीजिए आप कुछ ऐसा कर पाए जिसे ना इस तरह के लोगों से दूरी बनाए जो सिर्फ नेगेटिव बात करते हैं दुख की भरी बातें करते हैं बुराई की बातें करते हैं और आप स्वयं सच हो या झूठ हो सिर्फ अच्छी बात करेंगे पॉजिटिव बात करेंगे तो आपकी बायोलॉजी कैसी होगी
(21:07) आप सोच के देखिए कि कितना अच्छी अच्छी अच्छी हेल्थ हो जाएगी आपकी। मैं कई लोगों को बताता हूं कि जब आप कोई मुझसे पूछता है कि हेल्दी रहने का सबसे बड़ा सीक्रेट क्या है? मतलब सब कि कोई एक ऐसा एक काम कर ले जिससे हम हेल्दी रहे। ऐसा भी सवाल पूछते हैं मुझसे लोग। तो मैं उनसे कहता हूं कि अगर तुम कर पाओ तो सिर्फ इतना कर लो कि यह सोचो कि सबका बहुत अच्छा हो। सबका ध्यान रखो। सुनने में बहुत आसान सा सब लग रहा है। इसमें क्या बड़ी बात है? ठीक है। आज से हम ये बोलेंगे सबका अच्छा हो। सबका में एक बहुत बड़ा सीक्रेट है। सब में
(21:54) वह भी है जो आपके दुश्मन है। जिनसे आप नफरत करती हैं। जिन्होंने आपका पूरा किया है। अब आपको अपने मन को उस लेवल पर लाना है कि उनका भी भला हो। और अगर आप उस लेवल पर आ गई तो आप फिर बुलेट प्रूफ जैकेट पहन लिया आपने। आपकी बीमारियों के प्रति जो वलनेरेबिलिटी है वह खत्म हो गई। अब आप सोच के देखिए अब आप किस चीज के लिए परेशान हो गई। ना आपके अंदर जलन की भावना है, ना नफरत की भावना है, ना लालच है, ना कोई घबराहट है, ना बेचैनी है। सब खत्म हो गया। स्टरलाइज हो गया आपका मन।
(22:39) और आप बीमारी मुक्त हो गए। तो हमारे इमोशंस ही हमारी बीमारियों का कारण होते हैं। बिल्कुल। जैसे जिस तरह की भावनाएं आपके मन में आती हैं उसी तरीके की बायोलॉजिकल एक्टिविटीज होती है हमारे शरीर में। जो हमारा मन है वो हमारे शरीर का ड्राइवर है। अब वो मान लीजिए शराब पी रखी है उसने। रात भर सोया नहीं। झगड़ा करके आया है। आंखों से ठीक से दिखता नहीं। तो चाहे कितनी भी महंगी गाड़ी हो, कितनी भी अच्छी गाड़ी हो। उस गाड़ी का क्या होगा जब वो उसको चला रहा होगा तो इसी तरीके से अगर हमारे मन में द्वेष है, घृणा है, बदले की भावना है,
(23:27) लालच है, क्रोध है तो वो हमारे उसी मन से तो आपकी शरीर की बायोलॉजिकल एक्टिविटी भी कंट्रोल हो रही है ना। इतना दूषित मन से जिस हाथ से आप खा रहे हो उसी हाथ से आप पोटेशियम साइनाइड हैंडल कर रहे हो। क्योंकि दो मंथ थोड़ी मिला है आपको। और एक बात सदा याद रखिए कि जब आपने यह कहा कि सबका भला हो तो आपके कहने से किसी का भला नहीं होने वाला। लेकिनकि यह भावना आपने अपने मन में लाई है तो आपका भला होना तय है। जी सर। सर मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं एक साइंटिस्ट से नहीं एक स्पिरिचुअल पर्सन से बात कर रही हूं। आज
(24:11) तो आप एक स्पिरिचुअलिटी से अलग समझते हैं साइंस को। हां, मैं वही समझ पा रही हूं कि एक साइंटिस्ट जो होता है सबसे स्पिरिचुअल पर्सन होता है। देखिए सबसे इंपॉर्टेंट बात क्या है कि जो विज्ञान है उसमें सबसे ज्यादा प्योर स्पिरिचुअलिटी होती है। क्योंकि आपकी स्पिरिट कैसे अफेक्ट हो रही है वो मैं आपको उसका वैज्ञानिक कारण बता रहा हूं कि देखिए जो आप सोचते हैं अभी आप इस तरह सोचिए कि अगर कोई आपको गाली देना शुरू कर दे, लड़ने लगे, शोर मचाने लगे तो आपको कैसा लगेगा? बुरा ही लगेगा। जाहिर है।
(24:54) आपको जब बुरा लगेगा और मान लीजिए धमकी देने लगे और कुछ लगे आपको कि ये हमला कर सकता है तो आप डर जाएंगे। तो जैसे ही डरेंग तो यह सिर्फ भावनात्मक स्तर तक नहीं सीमित है। आपके एड्रिनल ग्लैंड में कॉर्टिसोल पैदा होगा। कॉर्टिसोल आपके बहुत सारे ऑर्गन्स को जाकर स्विच ऑफ कर देगा। जैसे डाइजेशन आपने देखा वो होगा कि जब आप कहीं पर एशियस हैं, तनाव में है, घबराहट में है तो आपका पेट में गैस होने लगी। क्यों? क्योंकि कॉर्टिसोल ने आपके डाइजेशन प्रोसेस को स्विच ऑफ कर दिया। टेंपरेरी रूप से और ढेर सारी ग्लूकोस आपके ब्लड में डाल दिया। अब आप सोचिए कि
(25:39) आपके शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो गई। क्योंकि जितनी ज्यादा ग्लूकोस जाएगी उसको खर्च करने के लिए उतनी ही ऑक्सीजन लगेगी। तो जो रिजर्व ऑक्सीजन था उसको शरीर ने इस्तेमाल कर लिया। अब आप श्रम कर नहीं रहे हो। भागदौड़ नहीं रहे हो तो ऑक्सीजन नई जा नहीं रही है। तो शरीर में नॉनसेल्यूलर कंडीशन पैदा हो गई। तो उसी से अगले को जो है डायबिटीज हो गई। उसी से कोलेस्ट्रॉल हुआ। कार्डियक प्रॉब्लम हो गई। फैटी लीवर हो गया। लीवर सिरोसिस की तरफ बढ़ गया। ठीक है? सेल में कोशिकाओं में जो ग्लूकोज होती है, जो शुगर होती है, उसको ऑक्सीजन के साथ इस्तेमाल करते हुए माइटोकांड्रिया एनर्जी
(26:26) बनाता है, प्रोड्यूस करता है। ऑक्सीजन की कमी है। तो वो जो शुगर है वो फर्मेंट हो गई और सेल का जो बाहरी खोल है वो हार्ड हो गया। अब ना उसके अंदर ऑक्सीजन जा सकती है और ना ही उसमें से वेस्ट बाहर निकल सकता है। इसी को मेलगनेंसी बोलते हैं। मेलग्नेंट सेल यानी कैंसर का सेल। तो आप सोचिए कि कितनी छोटी सी बात है कि आपके आपको बेचैन हुए। आप घबराए और स्ट्रेस में आए। उससे सारी डेडली डिसीज की संभावनाएं हो गई। तो जो मैं बोल रहा हूं यह सब साइंस है। एक्चुअली इट हैप्स फिजिकली होता है। ये सिर्फ भावनात्मक स्तर तक सीमित नहीं है। ये आपके शरीर को नष्ट कर देता है। अब वो
(27:11) झूठा है, बेवकूफ है, पागल है। क्या इस चीज को कंसीडरेशन में लिया आपके जो है बायोलॉजी ने? आपके बायोलॉजी ने इस चीज को कंसीडरेशन में लेकर के उसको अवॉयड नहीं किया। बस सिर्फ सुना, उसका मतलब निकाला और और अकॉर्डिंगली एक्ट कर दिया। हम क्योंकि ब्रेन तो उसको रियल समझेगा। ब्रेन फर्क ही नहीं करता उस चीज को। आप जिस चीज को सुन रहे हो, देख रहे हो, वैसे ही ट्रेनिंग दे रहे हो आप अपने जो है बायोलॉजिकल एक्टिविटीज को। इसलिए आज अगर हमें हार्मोनी चाहिए तो हमें लेक्चर देकर के हम नहीं कर सकते। हमें लोगों को यह समझाना होगा, यह बताना होगा कि झूठ ही हो। लेकिन अच्छा बोलो,
(27:59) अच्छा सुनो। और मैं चाहता हूं मैं मैं प्रार्थना करता हूं कि आपके पडकास्ट के जो लिसनर्स हैं उस चीज को समझे और मेरे कहने पर वो Google में सर्च करें। अब जैसे डॉक्टर्स हैं। अब वो हमारी तकलीफों को दूर करते हैं। हम बीमार पड़े हमें हमारा इलाज करते हैं। तो अब मन में आपकी क्या भावना आती है कि भैया ये तो विघ्न हर्ता हैं। तो ये खुद तो खुद ही बहुत हेल्दी रहते होंगे। आपको सुनने में आश्चर्य होता है डॉक्टर कैसे बीमार पड़ गया। क्या आपको लगता है डॉक्टर तो बीमारी पड़ सकता तो दुनिया भर के लोगों की बीमारी दूर करता है। आप Google में सर्च करिए लाइफ एक्सपेक्टेंसी
(28:44) ऑफ इंडियन डॉक्टर्स। सर्च करके देखिए आम आदमी से आम आदमी से जो ऑर्डिनरी आदमी है उससे 10 से 12 साल उम्र कम होती है उसकी। क्यों? दिन भर बीमारी के बारे में बोलता है, सुनता है, देखता है एक डॉक्टर और उसकी वजह से ही उसको स्ट्रेस में रहता है और बहुत ही नेगेटिव जो है एक्टिविटी रहती है उसके बायोलॉजिकली उसी की वजह से क्योंकि वो पीड़ा दर्द वही उसके जो है रोजीरोटी का भी माध्यम है। तो उसी उसी सिनेरियो में रहता है वो। हम उसका यह असर होता है क्योंकि दिन भर हम जिस चीज से डील करते हैं हमारे चित्त में आके बैठ जाती है वह
(29:28) चीज जो भी आपके चित्त में आके बैठ गई उसी को आपकी बायोलॉजी ने फॉलो किया और धीरे-धीरे आपकी शरीर आपकी जिंदगी में वही चीज आमंत्रित हो गई तो आप जो बोलती हैं जो सुनती हैं जो आप महसूस करती जिस शब्द को बार-बार रिपीट करती हैं, उसी को अपने जीवन में आमंत्रित करती हैं। तो हमें सतर्क नहीं हो जाना चाहिए। कुछ भी बोलते हुए आप जिसको भी गाली दे रही हैं अगर वो नहीं सुना तो उसका नुकसान नहीं हुआ। पीठ पीछे लोग गाली देते हैं। तो अपना ही नुकसान तो कर रहे हो।
(30:12) क्योंकि हु इस द लिसनर। यू आर द लिसनर। योर बायोलॉजी इज द लिसनर। सर कितनी बड़ी बात है यह जिसको हम सिर्फ इग्नोर कर देते हैं यह सोच के कि हम वो तो किसी और के लिए बोल रहे हैं लेकिन वो सुन रहा है कि नहीं सुन रहा है लेकिन हम तो उसे सुन रहे हैं। बिल्कुल आपकी बायोलॉजी सुन रही है। हमारी बायोलॉजी सुन रही है। जी सही सर। तो सशन क्या है इसका? सशन तो दिखाई पड़ रहा है। नहीं पर ये हां हमें किसी भी हालत में बुरा बोलने से बचना चाहिए। हम बुरा रील्स का क्या करें? हां रील्स को देखना ही नहीं चाहिए। रील्स हमें बच्चों को बताना चाहिए। देखिए रील्स
(30:49) का तो सीधा जो जो साइंटिफिक फाइंडिंग है जो हमने स्टडी की तो मैंने जो पाया तो यही पाया कि अगर रील का कोई अगर एडिक्टेड है रील देखने का तो वो कोई बड़े काम नहीं कर सकता अपने जीवन में। हम क्योंकि बड़े काम के लिए आपको लाइफ मतलब लगर स्पैन ऑफ फोकस इज रिक्वायर्ड कि आप लंबे समय तक किसी एक सब्जेक्ट पे फोकस रहे जो आपने ब्रेन को ट्रेन कर रखा है कि हर 30 सेकंड में 15 सेकंड में 40 सेकंड में जो है स्विच ओवर करना है दूसरे सब्जेक्ट की ओर। हम तो वो एक जगह पे टिक ही नहीं सकता ब्रेन क्योंकि आपने ट्रेन कर रखा है। हम तो आप कोई बड़ा काम जीवन में कर ही नहीं
(31:31) पाएंगे जिसको लिए लंबे समय तक आपको फोकस रहना पड़े। कंसंट्रेट करना पड़े। कंसंट्रेशन तो एकदम खत्म हो जाती है। वह आदमी कंसंट्रेट कर ही नहीं सकता किसी चीज पे। बस में ही नहीं है। क्योंकि सर मैंने खुद कई लोगों को सुना है। अपने जानने वाले कई लोग हैं मेरे जो रियल कहते हैं कि हम देखते रहते हैं, स्क्रोल करते रहते हैं। कई बार हमारा मन नहीं होता है कि अब हम चलो बहुत देख लिया, नहीं देखे हैं। लेकिन फिर भी वो स्क्रोल करके देखते हैं। घंटे कहां निकल गए उनको पता भी नहीं चलता। और ये बहुत खतरनाक स्थिति है। मैं आपको बताऊं ये जो रील वगैरह है
(32:04) मैं एक मिनट भी नहीं देखता और यहां लोग बैठ के रील देखते रहते हैं और लोगों को फॉरवर्ड करते रहते हैं। सुबह हुई ना जाने कितनी मेरे पास वीडियोस आती हैं। एक भी नहीं देखता मैं। मैं एक भी नहीं देखता। देखिए आपको नॉलेज इज अ पावर। आपको समझना चाहिए कि क्या हो रहा है। दुर्भाग्य यह है कि हमारी जो एजुकेशन है वह हमें कुछ बताती ही नहीं मेरे शरीर के बारे में हम कैसे जिंदा है कैसे चल रहे हैं किसी बच्चे को पता हर घर में तो प्रॉब्लम है कि बच्चा जो है बहुत ही बैड शेप में है अब वो जंक फूड खाता रहता है
(32:51) उसके सोने का जागने का हर चीज का पैटर्न बिगड़ा हुआ है हर मां-बाप परेशान है नशे की ओर बच्चे जा रहे हैं मां-बाप सोचते हैं बुरी बुरी संगत से हो गया। किसी को सच्ची बात पता ही नहीं है कि ये हो क्यों रहा है। क्यों ये जंक फूड खाता है? क्यों ये जो है नशे की ओर जो है बढ़ रहा है? क्या हुआ है? सर क्या वजह है? जब आप बेचैनी घबराहट में होते हैं मतलब तनाव में होते हैं तो आपके शरीर में एक रिजर्व ग्लूकोस होता है ग्लाइकोजन। उसकी कमी हो जाती है। तो उस कमी को शरीर पूरा करना चाहता है। यह भूख नहीं होती जो
(33:36) रात में 2:00 बजे वो जो है कुछ ना उल्टेपुल्टे जो है चीजें मंगा के जंक फूड खाने की क्रेविंग होती है जो क्रीविंग होती है जंक फूड खाने की वो सिर्फ उस वजह से होती है क्योंकि ब्रेन बहुत ही ज्यादा स्ट्रेस्ड हो जाता है क्योंकि किसी भी तरह से वो प्रोवोक करता है कि जल्दी से कुछ खाओ ताकि मैं अपना रिजर्व ग्लूकोस को पूरा कर लूं। हम उसका लेना देना भूख से है ही नहीं। वो रात में ऐसा कौन सा काम कर लिया कि अचानक उसको एनर्जी लॉस हो गई और भूखा हो गया। हम वह तनाव के कारण उटपटांग खाता है और अपने इतना स्ट्रेस में है कि दिमाग उसका धीरे-धीरे
(34:12) रिवायर हो गया है। उसकी वायरिंग चेंज हो गई है। अब वो क्या होता है कि जब वो नशा करता है तो वायर ऐसा हो गया कि जब वो जब नशा करेगा तभी डोपामिन सेक्रेट करेगा। नहीं तो करेगा ही नहीं। अब वो बेचैन हो जाएगा क्योंकि प्लेजर हार्मोन सेक्रेट नहीं हो रहा है। और जैसे ही नशा लेगा प्लीज हार्मोन सेक्रेट होगा उसे ज्यादा अच्छा महसूस होगा। तो उसकी मजबूरी उस समझाने से कैसे बन जाएगा? आपके समझाने से थोड़ी उसका डोपामिन सेक्रेट होगा। तो आपको ये समझना पड़ेगा कि हमको इसकी दिमाग की वायरिंग को चेंज करना पड़ेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि ब्रेन किसी भी
(34:53) उम्र में कभी भी प्रैक्टिस करके उसको रिवायर किया जा सकता है। बदला जा सकता है। लेकिन यहां शुरुआत तब हो जब उसको पता चले कि कारण क्या है? कह इसकी संगत खराब है। इसकी आदत खराब है। हम इसने बिगाड़ दिया। उसने बिगाड़ दिया। ब्लेम गेम से जो है आदमी जो है अपने आप को पेरेंट्स भी कहीं ना कहीं अपनी जिम्मेदारी से फिर थोड़ा क्योंकि वो समझ नहीं पाते हैं। खुद ही नहीं पता होता है। एक्चुअली वो खुद ही नहीं जानते। अब आप इस तरह सोचिए कि मां-बाप अपने बच्चों को डांटने लगते हैं। हम उनको यही नहीं मालूम कि बच्चों को डांटना डांटना चाहिए ही नहीं।
(35:39) क्यों? क्यों सर? तो बिल्कुल नहीं डाटेंगे तो फिर कहते हैं ना कि बच्चे बात नहीं सुनेंगे। नहीं नहीं सुनिए आप मैं जो कहना चाहता हूं वो ये है कि जो हमारा ब्रेन है वो एक साथ डेवलप नहीं होता। कि पूरा ब्रेन एक साथ डेवलप हो गया। हम जो मैं अभी आपसे चर्चा कर रहा था बचपने में ही बहुत छोटी उम्र में ही एम्डेला डेवलप हो जाता है पूरी तरह जो संवेदना को गवर्न करता है लेकिन जो प्री फ्रंटल कॉेक्स है जो सोचने समझने और समझदारी से काम लेने वाला जो ब्रेन है वो 24 से 25 साल की उम्र में जाकर के डेवलप होता है। तो अब आप अपने
(36:24) बराबर की समझदारी की उम्मीद जो है उस बच्चे से करते हो और वह नहीं करता तो आप उसको डांटते हो तो उसके अंदर संवेदनशीलता और बढ़ती है वो बुरा महसूस मानता है उसको लगता है मुझे प्यार नहीं करते मुझे हर बात पे डांटते रहते हैं क्योंकि सोच समझ लगता ही नहीं कि ब्रेन ही नहीं वाला उसका सोचने समझने वाला लेकिन एक रास्ता है संवेदना आप प्यार से कुछ भी करा लो उससे प्यार एक संवेदना है जैसे जैसे ही आप उसको प्यार से पुचकार करके भावनात्मक रूप से उसको समझाओगे कुछ भी कर सकता है। यही रास्ता है उसके तक पहुंचने का। उसको कन्विंस करने का आप अब उसके अंदर अब
(37:07) ज्यादा आप उसको चीख पुकार करोगे। आप उसको मारोगे, पीटोगे वो दुगनी ताकत से एनसीियस हो के और हमलावर हो जाएगा। क्योंकि उसका हमला करने वाला ब्रेन एक्टिवेटेड है। ठीक है? अब मम्मी पापा है मां के साथ खड़ा मिलेगा। मां गलत भी है तो वो खड़ा मिलेगा अपने मम्मी के साथ क्योंकि प्यार से जुड़ा हुआ मां से ज्यादा प्यार होता है उसका वो ज्यादा करीब होती है। थोड़ी जो संवेदना वाली बात आपने कही ना तो मां थोड़ा ज्यादा समझ भाई मां प्यार मां मां तो की तो कोई तुलना कर ही नहीं सकता। हम मां अपने बच्चे के लिए जो भी करती है और जितना प्यार करती है उसकी रूह तक पहुंचता
(37:42) है उसका प्यार। हम तो अब देखिए जब तक उसका प्रीफ्रंटल कॉेक्स डेवलप नहीं होता वो अपने मां के सपोर्ट पे खड़ा रहता मेरी मम्मी सही है। अगर मम्मी लड़ाई कर रही है किसी से तो जिससे लड़ाई कर रही है वो दुश्मन है। वो विलेन है। मेरी मम्मी सही है। वो उस ब्रेन के हिस्से की वजह से अब वो जहां 242 साल के बाद वो मम्मी ये बात गलत है। तो इसको ऐसा नहीं कहना चाहिए। क्योंकि सोचने समझने आई। फिर वो बाप की तरफ तो बाप लॉजिकल तरीके से बात एक्चुअली फिर समझ में भी आता है कि पिता के सैक्रिफाइसेस किस तरह से होते हैं क्या जिम्मेदारी उन्होंने हमारे लिए उठाई है
(38:16) फिर समझ वो बाप की तरफ जाता है क्योंकि बाप बाप को तब देखता है क्योंकि बाप लॉजिक की तरफ आता है वो अब ये कितने लोगों को ये बात पता है कि ब्रेन को समझना कितने लोग हैं जो अपने ब्रेन को अपने शरीर को समझते हैं। शुरुआत तो तब हो कि जब आपको पता चले पहले कि आप खड़े कहां हो। तब तो आप जो है वहां से निकलोगे तब आपको पता चलेगा कहां जाना है। हम आपको यही नहीं मालूम कि आप कहां खड़े हो तो आपको पिक कहां से किया जाए। सर क्योंकि बाहर की तरफ हम ज्यादा देखते हैं ना अपने आप को जितनी जानकारी हमको गैजेट्स के बारे में है उतनी अपने शरीर के बारे में नहीं है। शरीर के फंक्शनैलिटी के
(38:56) बारे में नहीं है। आपके जितना दुख दर्द है वह सब झूठा है। झूठ नहीं आपको कंट्रोल कर रखा है। आप मुझे बताइए लिस्ट करिए। मैं आपको बताऊंगा कि ये झूठी बात है। आप फालतू में परेशान है। ये दुख का कारण हो ही नहीं सकता। ये रोंगली यू आर ट्रैप्ड। आपने ब्रेन को अपसेट कर दिया है। ब्रेन के ऑर्डर को आपने चेंज कर दिया। इस वजह से आप परेशान हैं। सर। तो क्या प्रकृति से जुड़ के हम हील हो सकते हैं? ये बहुत बड़ी बात आपने कही। मैं आपको यह बात सरप्राइ आप अभी कुछ दिन पहले मैंने एक रिसर्च पेपर पढ़ा। अमेरिका में सैकड़ों ऑर्गेनाइजेशंस जो है खुल चुकी हैं। जो
(39:44) समुद्र और जल जो वाटर सोर्स है उसका इस्तेमाल कर रही हैं। लोगों की ए्जायटी, घबराहट, डिप्रेशन को दूर करने के लिए। बहुत से ऐसे लोग थे जो अपनी जान देने वाले थे। उनके सगे संबंधी मर गए थे। वह डिफेंस में थे और वह भी अपने आपको सुसाइड करने वाले थे। उसी से एकदम ठीक हो गए वो। समुद्र ने ठीक कर दिया उनको। जैसे ही वो पानी में फ्लोट किया उन्होंने उनकी मेंटल स्टेट एकदम चेंज हो गई। प्रकृति के किसी भी रूप से आप जुड़ जाइए। वो आप क्योंकि आप भी तो प्रकृति हो। आप इस तरह सोचो कि एक गिलास पानी है उसमें दो चम्मच नमक घोल दिया आपने।
(40:29) ठीक है? अब उस पानी को उस उस गिलास पानी को आप जो है एक बड़ी सी 10,000 लीटर की टंकी में बॉटम पे रख दो धीरे से। क्या होगा? लाभ सेचुरेशन आपको पता ही है तो क्या दो चम्मच की जो कंसंट्रेशन है साल्ट की उसमें वह बनी रहेगी वो पूरे में बराबर से फैल जाएगी ना खत्म हो जाएगी ना उसके तासीर उसके अंदर नमकीन होने की इसी तरह जब जैसे ही आप प्रकृति से जुड़ते हो आप रेिलिएंट हो जाते हो आपके अंदर का सारा दुख दर्द सब फैल जाता है पूरे प्रकृति ने वो उसको अब्सॉर्ब कर लेती है आत्मसात कर लेती है उसको अब इसको उल्टा सोच इस एनालॉजी को उलट
(41:17) दीजिए। समुद्र है। अब आपसे मैं कह रहा हूं कि इसका जो है 28 डिग्री सेल्सियस टेंपरेचर है सरफेस टेंपरेचर पानी का। आप इसकी 1 डिग्री बढ़ाओ तो आप बढ़ा पाओगे। कौन सी कौन सा इमर्स र डालोगे कि पूरे समुद्र का पानी 1 डिग्री बढ़ जाए। नहीं हो सकता। लेकिन एक गिलास पानी निकाल लो तो उसका टेंपरेचर बढ़ाने में आपको कितना सेकंड लगेगा? जैसे ही प्रकृति से कटा अपने सोर्स से कटा अपने मां से अलग हुआ वह वलनेरेबल हो गया वह पानी आप जाकर किचन में गिलास रख दो पता लगा किचन में जो गर्मी है उससे वो पानी गर्म हो जाएगा फिर आप जाके एसी वाले कमरे में रख दो उसके
(41:56) टेंपरेचर से ठंडा हो जाएगा कुछ छुआ ही नहीं आपने वो तो ताला वलनेरेबल हो गया इतना कमजोर हो गया कि जो भी हो रहा है उसका असर सीधा उसके ऊपर पड़ रहा है लेकिन जब वो अब कनेक्टेड था जो वही पानी जब अपने समुद्र में से कनेक्टेड था तो आप कुछ उखाड़ सकते थे। उसका कुछ बिगाड़ सकते थे। इसी तरह हम हैं। जैसे ही हम प्रकृति से डिस्कनेक्ट होते हैं, हम वलनेरेबल हो जाते हैं डिजीज के लिए। हर बात के लिए हम कमजोर हो जाते हैं। और जैसे ही हम प्रकृति से कनेक्ट हो जाते हैं। हम रेिलिएंट हो जाते हैं। वेरी ब्यूटीफुल सर। आप सोच के देखिए कि आप जैसे ही अपने सोर्स
(42:36) से जुड़े आप घबराहट है बेचैनी है आप खुले में आ जाओ कमरे से बाहर निकलो तुरंत आप जाओ पेड़ पौधों को देखो आप जमीन को टच करो नंगे पैर मिट्टी के कांटेक्ट में आओ और जो है पेड़ों के पास से गुजरो उनकी जो विओसीस है आपको ट्रांसफॉर्म कर देंगे इमीडिएटली आपको अच्छा महसूस होने लगेगा आपको याद होगा जब कोविड चल रहा था तो खबर बहुत से कंट्री से आई कि बहुत से लोग पेड़ों को जाकर हग कर रहे हैं और उसकी वजह से कहते हैं हमारा कोविड बहुत ठीक हो गया। ठीक है? आप किसी भी रूप में बस जाकर प्रकृति से कनेक्ट हो जाओ। वही तो हमारे मम्मी पापा है। वही तो है हमारे सब कुछ।
(43:24) वो देख सकते हैं हमको दुखी। हम जैसे ही आप उनसे जुड़ते हो आपकी अंदर की जो धारा है आप किसी जल स्रोत के किनारे चले जाइए बच्चा क्यों पानी की तरफ भागता है आप जाते हो उस बीच के किनारे क्यों घूमना पसंद करते हो बीच क्यों फेमस होता है तैरना नहीं आता आपको लेकिन समुद्र के किनारे क्यों अच्छा लगता है आपको वो हमारा सोर्स है हम भी तो पानी है 70% हमारी बॉडी में पानी है पानी जैसे ही हम पानी के करीब जाते हैं हमारे अंदर शरीर का पानी उससे इंटैक्ट कर लेता है और हम जो है उससे जैसे ही उसके सानिध्य में आते हैं हम जो है एक बहुत वास्ट हो
(44:06) जाते हैं। उसका हिस्सा बन जाते हैं। अब जो होगा मेरे साथ वो होने के लिए पूरे प्रकृति के साथ वो होना होगा। तो कौन सी ऐसी शक्ति है जो इतनी शक्तिशाली है कि पूरे ओशियन का टेंपरेचर उसकी सेलेनिटी उसकी अल्कलिनिटी बदल दे। अगर आप उसका हिस्सा हो तो उस जब समुद्र नहीं बदल पाएगी तो आपका क्या बदलेगी क्योंकि आप भी तो उसी का हिस्सा हो अलग नहीं हुए हो आप तो यह है प्रकृति जिससे जुड़ के हम अमृत्व को प्राप्त हो सकते हैं और हमने क्या किया हम उससे दूरी बना ली हमने हाइपर सैनिटाइज्ड लाइफस्ट जो है अपना लिया हमने अपने घरों में एयर फिल्टर लगा लिया
(44:47) कि जो प्रकृति है एयर जब हम निकले थे समुद्र से उसी ने हमें गोद में लिया था आत्मसात किया था। उसने क्या कहा था हमसे कि अब तुम मैं हो और मैं तुम हूं। अब तुम्हारे अंदर जीवन की तरह मैं जाऊंगी और जीवन की तरह मैं बाहर आऊंगी। तब से हम सांस लेते हैं। जब पानी में थे तो हम ऑक्सीजन कहां से लेते थे? जल से लेते। हर समय वो हवा हमारे शरीर में जाती है। हमारे फेफड़े में जाती है और हम जीवित है। जैसे ही वो रुक जाती है हम मर जाते हैं। वो तो हमारा जीवन है। हम उससे डर गए। हमने एयर फिल्टर लगा लिया। रिवर्स ऑस्मोसिस लगा लिया। पानी फिल्टर
(45:30) बाप रे सैनिटाइजर सोप लगा रख लिया। मिट्टी लग गई। अरे गंदगी लग गई। इन्होंने ही हमें 100 साल की उम्र दी। कौन सी फार्मासटिकल कंपनी थी वहां पे? जब हम जो है इवॉल्व कर रहे थे। हजारों साल लाखों साल लगे होंगे हमें इस रूप में आने में। कौन हमारे इस रूप का ट्रांसफॉर्मेशन कर रहा था? आप मुझे बताइए कभी सोचिए कि हम सदा विकास ही तो करते गए। तो क्या सपोर्ट था? आज की कोई चीज थी वहां पे। हम उसके बगैर हुए और हमने उसी को छोड़ दिया। उसी से डर गए। उसको दुश्मन समझ लिया। भाग गए। उसी को नष्ट करना शुरू कर दिया। क्या हुआ था? याद करिए क्या हुआ था?
(46:12) जब पृथ्वी से बर्फ पिघली और जगह-जगह पर हर जगह पर वोल्केनिक इरप्शन होने लगे। ज्वालामुखी फूटने लगे। पूरे धरती पर मृत्युकारी तत्व था। जीवन का नामोनिशान नहीं था। सिर्फ जहरीली गैसें फहरी हुई थी। लाखों करोड़ों साल लगे। धरती ने उसको धीरे-धीरे जमीन में दफन कर दिया। हर मृत्युकारी चीजों को उसने जमीन में दफन कर दिया और उसके बाद धीरे-धीरे जीवनकारी जो है वातावरण को तैयार किया। आज हम वैज्ञानिक खोज के माध्यम से वैज्ञानिक समझ के माध्यम से जो अक्ल हमें जो है मिली
(46:56) उसी प्रकृति से उसका इस्तेमाल करके कर क्या रहे हैं? उसी मृत्युकारी चीजों को धरती से निकाल रहे हैं। खोदखद के खनन करके छेद करके फसल फ्यूल निकाल रहे हैं। उससे पूरा आपका जो है जहरीली कैसे पूरी चारों तरफ फैलती चली जा रही है। सांस लेना दुबारा हो गया। पानी हमारा दूषित हो गया। मिट्टी हमारी जहरीली हो गई। सब कहां से निकाल रहे हैं? प्रकृति ने आपने बहुत बार कहा होगा, सुना होगा कि प्रकृति ने हमें कितना कुछ दिया। ऐसा नहीं है। प्रकृति ने आपको जितना दिया है उससे कहीं ज्यादा इस चीज पर फोकस किया है कि बहुत सी चीजें आपको ना मिले
(47:38) और उसी की वजह से आप जीवित हैं। उसी की वजह से आप हार्मोनी में हैं। फिल्टर है हमारे लेवल। हमको हमसे जितनी भी मृत्युकारी चीजें थी जो हमारे जीवन को किसी भी लेवल पर डैमेज कर सकती थी। उन सब चीजों को हमारे रीच के बाहर कर दिया। आज विज्ञान का इस्तेमाल करके जिसको वैज्ञानिक उपलब्धि कहा जाता है। ठीक है? हम उन सब चीजों को खोदखोद करके निकाल रहे हैं। और मृत्युकारी चीजों के बीच में हम जीने लगे हैं। दिखाई नहीं पड़ता कि ग्लोबल वार्मिंग हो गई, जहरीली गैसेस हो गई। हर जगह फैल रही हैं। हमें समझ में नहीं आता कि ये कैसे हुआ। हम
(48:24) जीवन को दांव पर लगा रहे हैं। क्या दे रहे हैं उसके बदले में? अपने जीवन को ही तो दे रहे हैं। अब हम बाहर खुल के सांस नहीं ले सकते। अपनी जहरीली अपने जो है उस प्राण वायु को जिसने हमें संभाला, हमें गोद में लिया उसको जहरीला कर दिया। सुविधाओं के लिए हमने ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री डेवलप कर दिया। इतनी जहरीली गैस छोड़ी सबको नष्ट करते चले जा रहे हैं। किसको मार रहे हो आप? आप सोचिए। अभी आप बैठी हैं। आपको एक आवाज उधर से सुनाई दे रही है ना? किस चीज की आवाज है? एसी की आवाज। जी कितनी दूर है आपसे? पास ही है सर।
(49:07) आपसे करीब ढाई 3 मीटर दूर है। आप कभी रात में सोते वक्त फोकस करें तो आपको कहीं दूर हाईवे की पर हॉर्न बजते हुए या गाड़ी की आवाज भी सुनाई देगी। जो पता लगा बहुत दूर है। कैसा कान दिया है आपको कि बहुत दूर से कहीं एक चिड़िया की चहाट भी आपको सुनाई दे जाती है। लेकिन आपको पता है कि आप क्या चीज नहीं सुन पाते। अब उस वैज्ञानिक के बारे में सोचिए जो प्रकृति है उसने कैसे कान की आपकी रचना की। एक लड़की को अचानक कुछ आवाजें सुनाई देने लगी। उसने
(49:52) सोचा कि बगल के कमरे से आवाज आ रही है, फ्रिज से आवाज आ रही है, कहीं किसी जगह से आवाज आ रही है। लेकिन वहां कुछ भी नहीं था। ऑफिस में कलीग्स कहती ऐसी तो कोई आवाज नहीं है। वो एशियस रहती कि यह आवाज कहां से आ रही है? तभी उसने महसूस किया कि जब वो पलक झपकाती है तब उसको आवाज सुनाई देती है। जब वो गर्दन घुमाती है तब उसको एक खास तरह की आवाज सुनाई देती है। तो जब ये आवाज बढ़ने लगी तो फिर वो डॉक्टर के पास गई। जब उसका बहुत ही कंप्रहेंसिव एग्जामिनेशन किया गया तो पाया गया कि कान के अंदर का जो उसके इंटरनल हिस्से में एक छोटा सा होल
(50:30) हो गया था और उसको अपने अंदर के बॉडी की आवाज सुनाई दे रही थी। जब पलक झपका झपकाती तो खड़क से जो उसकी आवाज सुनाई देने लगती गर्दन की आवाज क्रैंक करते हुए सुनाई देती। कहीं चरमराहट की आवाज सुनाई देती। कहीं पर जो है हार्ट की धक धक धक धक की आवाज सुनाई देती है। अब मेडिकलली तो बहुत छोटी सी बात थी। एक छोटी सर्जरी करके तो उसको ठीक कर दिया गया। लेकिन वैज्ञानिक होने के नाते उसमें मैंने क्या देखा? ये अमेरिका की घटना है। मैंने कहा कि देखो प्रकृति ने हमें अपने शरीर की आवाज सुनने की योग्यता नहीं दी। नहीं तो हम एक मिनट भी चैन से बैठ पाते।
(51:19) शांति से बैठ पाते। हार्मोनी रहती है हमारे शरीर में। हम सुख से रह सकते थे। हम सुख से रह सके, मुस्कुरा सके, खुश रह सके, गाना सुन सके, एंजॉय कर सके। इसलिए उसने ये एबिलिटी हमें नहीं दी। कितना मेहनत किया। कितनी गजब की डिज़ है कान की कि दूरदूर की आवाज सुन ले रहा। एक इंच में आंख है वो नहीं सुन पा रहा। प्रकृति का यह इशारा है उन हर वैज्ञानिक के लिए जो अंधों की तरह सिर्फ इन्वेंशन के लिए इन्वेंशन किए जा रहा है। इसी तरह हम खरबों सूक्ष्म जीवों से बने हैं। वो बिल्डिंग ब्लक्स है हमारी। सिर्फ बैक्टीरिया ही करीब 40 खरब से ऊपर है
(52:04) हमारे शरीर में। दिखती नहीं है। हमारी आंखों को ये एबिलिटी नहीं दी प्रकृति ने कि हम देख सके। अगर देख देख सकते तो हम क्या देखते किसी के चेहरे पर अपने शरीर पर हम डर जाते कि हमारे पूरे शरीर में कीड़े रेंग रहे हैं। ओ माय गॉड आप सोच के देखिए कि हम हार्मोनी में रह पाते तो क्यों नहीं दिया उसने? क्योंकि हम खुश रह सके। हम नाच कर सके अपने आप पे। अपने आप को पसंद कर सके। किसी की खूबसूरती को देख के कविता लिख सके। लिख पाते तब हमको इतना बड़ा वैज्ञानिक से हमको सीखना चाहिए जो प्रकृति है कि उसने कितनी गजब की
(52:49) टेक्नोलॉजी इस्तेमाल की देने में जितनी की उससे बड़ी टेक्नोलॉजी ना देने में की ताकि हम खुश रह सके जी सके हार्मोनी में रह सके आज जो है जो खोज हो रही है उसमें कोई सेंस है जो खोजे वो तो उल्टा पड़ा मोबाइल खोजे वो उल्टा पड़ा पता कितने देशों में बैन करना पड़ रहा है कि बच्चों को मोबाइल मत दो। सोशल मीडिया से दूर रखो। ये जो भी इन्वेंशनंस हो रही है सब देखो आप कि सब उल्टी पड़ रही है। जीवन के खिलाफ जा रही है। तो खोज करते वक्त कहीं आपके अंदर कोई वैज्ञानिकता है मैं किसी को वैज्ञानिक नहीं मानता। मैं सबको टेक्नोलॉजिस्ट मानता हूं।
(53:31) जो कि सिर्फ टेक्नोलॉजी डेवलप कर रहे हैं। यह विज्ञान नहीं है। विज्ञान वो है जो प्रकृति के साथ हो और प्रकृति को अनुसरण करता हो और प्रकृति को कहीं से डैमेज ना करता हो। और साला जो बम बना रहा है मिसाइल बना रहा है वो वैज्ञानिक कहते हैं उसको भी। किसका भला करेगा? जहां गिरेगा किसका भला होगा? वो कैसे वैज्ञानिक हो सकता है? जो प्रकृति को पृथ्वी को कहीं से भी नुकसान पहुंचाने वाली वस्तु है वह वैज्ञानिकता कैसे हो सकती है उसकी खोज वैज्ञानिकता की तरफ कैसे हो सकती है तो हमें ये समझना होगा प्रकृति को हमने समझा ही कितना क्योंकि हम खुद को जब नहीं
(54:15) समझे जितना मोबाइल फोन के बारे में जानते हैं उतना हम अपने शरीर के बारे में नहीं जानते तो हम इस कायनात को इस प्रकृति को समझ पाएंगे अगर हम प्रकृति को समझ जाए तो सारी समस्या ही खत्म हो जाए हमको हमको रास्ता दिखने लगे कि कहां जाना है सर बहुत सुंदर आपने रास्ता दिखा भी दिया हमें कि प्रकृति से जुड़ना है क्योंकि प्रकृति हमें देखती है ऑब्जर्व करती है और हमें क्या जरूरी है हमें उतना ही देती है जो चीजें नहीं चाहिए वो नहीं देती है और आज का जो ये पॉडकास्ट है ना यह मुझे लगता है कि बच्चों के लिए उनके माता-पिता के लिए और इस पूरी प्रकृति को समझने वाले
(54:52) आपके जैसे साइंटिस्ट के लिए सबके लिए है। तो मैं जरूर चाहूंगी सर आप जब भी मिलते हैं तो आप मुझे भी इमोशनल कर देते हैं। प्रकृति के बारे में इतने अच्छे तरीके से आपने समझाया कि हम सब उसका हिस्सा हैं। हम कुछ ना करें सिर्फ खुद को समझें। बिल्कुल जी बहुत-बहुत धन्यवाद सर आपका। तो वेब दर्शन का यह एपिसोड आपको कैसा लगा? अपनी राय और प्रतिक्रिया जरूर हम तक पहुंचाइएगा। धन्यवाद।

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