How Social Media is ruining our lives!
Author Name:Rashmi Sawarn
Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@rashmisawarn
Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=h14M0s1ivK0
Transcript:
(00:00) इंडिया में हमारे यूथ को ही नहीं छोटे बच्चों से लेकर हमारे पेरेंट्स तक को भी एक नशे की लत लग चुकी है। और वो नशा और कुछ नहीं शॉर्ट फॉर्म कंटेंट यानी रील्स या शॉट्स देखने का हो गया है। टू सर्वे द एवरेज स्मार्टफोन यूजर स्क्रोल्स द इक्विवेलेंट ऑफ 78 माइल्स ए ईयर? शुड दोज हु स्पेंड एन इनऑर्डिनेटली लॉन्ग अमाउंट ऑफ टाइम ऑन सोशल मीडिया बी सीन एस द सेम इन द सेम वे एस दोज हु अब्यूज सब्सटेंसेस लाइक अल्कोहल एंड ड्रग्स। लेकिन प्रॉब्लम ये है कि कोई भी यह समझने को तैयार नहीं है कि उनका यह लक उनके सिर्फ ब्रेन को ही नहीं उनकी पूरी
(00:39) लाइफ को भी इंपैक्ट कर रहा है। दिस टू स्मार्टफोन। आर एमआरआई इमेज रीसेंट रेड इंडिकेट एक्टिविटी द अगर आप 90ज के हो तो आपको याद होगा 2006 2007 के आसपास Facebook जब नए-नए लोगों के बीच पॉपुलर हो रहा था तो हम बस एक दूसरे को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजकर या फोटो लाइक करके खुश हो जाते थे। कोई एल्गोरििदम या डोपामिन रश नहीं था। बस सिंपल सोशल इंटरेक्शन थी। 2008, 2010 के टाइम पर 1GB डाटा का प्राइस 250 से 300 तक होता था और
(01:26) उसमें भी हम सोच समझकर इंटरनेट यूज करते थे। तब एसएमएस पैक्स चलते थे। YouTube देखना एक लग्जरी लगता था और Facebook पर एक दिन में 5 से 10 पोस्ट देखना भी बहुत होता था। बेशक लाइफ स्लो थी मगर कंट्रोल हमारे हाथ में था। फिर 2014-15 के बाद धीरे-धीरे सब बदलने लगा। Jio आया, डाटा फ्री हो गया। Facebook और Twitter के साथ Instagram, Snapchaat और YouTube सबके लाइफ का एक हिस्सा बन गया। फिर 2020 में जब पेंडेमिक आया और दुनिया अपने घरों में बंद हो गई तब तक हम एक नए दौर में एंटर कर चुके थे। और वो दौर था रील्स और शॉट्स देखने का। आज इंडिया का एवरेज स्क्रीन
(02:07) टाइम 6 घंटे से भी ज्यादा है और एक रिसर्च कहती है कि ह्यूमन अटेंशन स्पैन सिर्फ 8 सेकंड्स का रह गया है। पता नहीं आप में से कितने लोग इस वीडियो को लास्ट तक देखेंगे क्योंकि आजकल एक लॉन्ग फॉर्म वीडियो कंटेंट के केस में नॉर्मल व्यूअर का अटेंशन स्पैन सिर्फ 47 सेकंड्स का रह गया है। और इसीलिए आज के जमाने में एक 3 मिनट का भी वीडियो पूरा देखना लोगों के लिए स्ट्रगल बन चुका है। तो अगर आप अभी भी इस वीडियो को देख रहे हो तो या तो आप लकी हो या फिर आपका ब्रेन अभी तक पूरी तरह से सड़ा नहीं है या फिर शायद आप समझना चाहते हो कि असल में हो क्या रहा है हमारे साथ
(02:46) क्योंकि आजकल कोई भी 30 मिनट की वीडियो देखना ही नहीं चाहता लेकिन 1 मिनट की 30 वीडियोस देखने में उसे बिल्कुल भी प्रॉब्लम नहीं है। एक और शॉकिंग फैक्ट सुनो। 2016 की एक रिसर्च ने बताया था कि एक इंसान दिन भर में अपने फोन को ऑन एन एवरेज 2600 बार से भी ज्यादा टच करता है। सोचो आज के टाइम पर यह रिसर्च किया जाए तो यह ग्राफ कितना ऊपर जाएगा और जब भी हम किसी काम में फोकस करते हैं और बीच में डिस्ट्रैक्ट होकर फोन उठाते हैं तो एक स्टडी के मुताबिक हमारा ब्रेन उसी फोकस लेवल पर वापस आने में 23 मिनट से भी ज्यादा टाइम ले लेता है। मतलब एक बार आपने
(03:24) फोन उठाया तो आपके पूरे दिन की एफिशिएंसी बर्बाद होने वाली है। आज हम सब स्क्रोलिंग ज़ॉम्बीज बन गए हैं। बिना सोचे समझे बस स्वाइप कर रहे हैं। डोपामिन का नशा ले रहे हैं। और यह सब रैंडम नहीं है। यह डिजाइन किया गया है आपको एडिक्टेड बनाने के लिए। आपको लगता है कि सारी चीजें आपको फ्री में मिल रही हैं आपके एंटरटेनमेंट के लिए। बट असल में यह सोशल मीडिया का इकोसिस्टम डिजाइन ही ऐसे किया गया है कि आपके ब्रेन का कंट्रोल उनके हाथ में है। आज इस वीडियो में मैं बताने वाली हूं कि कैसे आपके फोन और सोशल मीडिया ने आपके दिमाग को कंट्रोल
(04:00) किया हुआ है और एंड में मैं अपनी स्टोरी भी शेयर करूंगी कि मैंने कैसे इस एडिक्शन को कंट्रोल किया। अगर आपको लगता है कि आप सिर्फ एंटरटेनमेंट के पर्पस से फोन यूज कर रहे हो तो एक बार यह वीडियो एंड तक जरूर देखना क्योंकि असल में जो रियलिटी है वो आप सोच भी नहीं सकते। वो मेरे को ऐसा लगता है मेरे बॉडी की पूरी मेंटल एनर्जी खींच लेता है कभी कबभार सोशल मीडिया। सोशल मीडिया यूज इज ऑफन एसोसिएटेड विथ हार्म्स टू आवर किड्स। एंड माई ग्रोइंग कंसर्न इज सोशल मीडिया हैज़ बिकम एन इम्पोर्टेन्ट कंट्रीब्यूटर टू दैट यूथ क्राइसिस। पीपल यू थिंक आर सुपर हैप्पी एक्चुअली हैप्पी।
(04:42) सोचो जब आप एक चॉकलेट खाते हो या कोई सरप्राइज गिफ्ट मिलता है या फिर आपके किसी चाहने वाले का मैसेज आता है तो उस वक्त आपके दिमाग में एक केमिकल रिलीज होता है। डोपामिन डोपामिन बेसिकली आपके दिमाग को एक फील गुड सिग्नल देता है। इसलिए हम बार-बार वही चीज ढूंढने लगते हैं जो हमें तुरंत अच्छा फील कराए और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने इसी डोपामिन के सिस्टम को हैक कर लिया है। रील्स, शॉट्स, मीम्स, नोटिफिकेशंस सब कुछ इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि आपको बार-बार छोटी-छोटी डोपामिन हिट्स मिलती रहें और वो भी बिना किसी मेहनत के। 2023 में पब्लिश हुई एक स्टडी
(05:20) ने यह बताया कि बार-बार शॉर्ट फॉर्म कंटेंट देखना आपके प्रीफ्रंटल कॉटेक्स को इंपैक्ट करता है। जो दिमाग का वो पार्ट है जो आपकी सेल्फ कंट्रोल, डिसीजन मेकिंग और लॉन्ग टर्म थिंकिंग के लिए रिस्पांसिबल होता है। सिंपल शब्दों में बोलो तो जितना ज्यादा आप स्क्रॉल करते हो उतना ही कम कंट्रोल होता है आपका खुद के ऊपर। और जैसे-जैसे यह डोपामिन का लूप बनता जाता है, रियल लाइफ की सिंपल चीजें भी बोरिंग लगने लगती है। एक चैप्टर पढ़ना, आपस में बैठकर एक ऑनेस्ट बातचीत करना या कोई नॉर्मल मीटिंग अटेंड करना यह सब बोरिंग और एग्जॉस्टिंग लगने लगता है। स्मार्टफोन
(05:58) वाइड रीचिंग चेंज ऑल ओवर द स्पेसिफिकली देर कनेक्टेड टू बिहेवियरल चेंजेस ऑप्रेशन एंग्जायटी द डेंजर्स आर आर हाइडिंग इन देयर एक रिसर्च के अकॉर्डिंग यह बताया गया कि ज्यादा मोबाइल कंटेंट कंज्यूम करने से दिमाग के वो पार्ट्स श्रिंक होने लगते हैं जो इमोशनल कंट्रोल और सस्टेंड अटेंशन के लिए रिस्पांसिबल होते हैं। यानी पेशेंस, क्लेरिटी और फोकस सब धीरे-धीरे आपसे छीन लिया जाता है। इसलिए जब आप बोलते हो यार मन नहीं लगता किसी काम में हर वक्त डिस्ट्रैक्शन होती है तो यह कोई नॉर्मल हैबिट नहीं है। यह आपका ब्रेन है जो उसी तरह से रिवायर्ड हो चुका है। आज के एवरेज
(06:42) शॉर्ट फॉर्म कंटेंट क्रिएटर्स क्या बना रहे हैं? एक रील में कोई डांस के नाम पर पूरी बॉडी एक्सपोज कर रहा है। दूसरे में बंदा कीचड़ में लूट रहा है। तो कभी छोले भटूरे की जगह कीचड़ भटूरा खा रहा है। कोई किसी को बेइज्जत कर रहा है। कोई गंदी गालियां दे रहा है। कोई कंटेंट के नाम पर व्गैरिटी फैला रहा है। और छोटे-छोटे बच्चे यह सब देख रहे हैं और इन सो कॉल्ड इन्फ्लुएंसर्स को कॉपी कर रहे हैं क्योंकि आजकल बहुत छोटी उम्र से ही उनके हाथ में फोन पकड़ा दिया जाता है। उन्हें थैंक यू और सॉरी बोलना आए ना आए लाइक, शेयर, सब्सक्राइब बोलना वो जरूर सीख गए हैं। एक
(07:16) रिसर्च के आधार पर डिजिटल स्क्रीन के ओवर यूज करने की वजह से लोगों में पुअर स्लीप क्वालिटी, शॉर्टर स्लीप ड्यूरेशन, ओबेसिटी यानी वेट बढ़ने जैसे काफी सारी फिजिकल एंड इमोशनल डिसऑर्डर्स देखने को मिली। साइंस टैरेट की जर्नल में यह पब्लिश किया गया था कि चिल्ड्रन एक्सपोज्ड टू फास्ट कट ओवरस्टिमुलेटिंग वीडियोस फॉर प्रोलोंग पीरियड शोड डिक्रीज्ड कॉग्निटिव फ्लेक्सिबिलिटी एंड इमोशनल रेगुलेशन। मतलब जब बच्चा नॉनस्टॉप शॉट्स और रील्स देख रहा होता है तो वह सोचने और समझने की अपनी नेचुरल एबिलिटी खो रहा होता है। उसके अंदर पेशेंस की कमी होने लगती है। उसे सब कुछ
(07:55) तुरंत चाहिए होता है और जब नहीं मिलता तो टैंट्रम्स, अग्रेशन और इमोशनल इनस्टेबिलिटी देखने को मिलती है। व्हाट्स बीइंग कॉल्ड इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर। आई रियली वन आई [संगीत] अब देखो हमेशा ब्लेम सोशल मीडिया को ही मिलता है। लेकिन एक बिटर ट्रुथ यह भी है कि पेरेंट्स भी इस एडिक्शन को कहीं ना कहीं स्पॉन्सर कर रहे हैं। किसी पेरेंट को अर्जेंट काम होता है तो बच्चे को फोन पकड़ा दिया। लेकिन यह 5 मिनट का जुगाड़ उनके लिए हमेशा के लिए एक लत बन जाता है। इंडियन एक्सप्रेस में एक मदर के किए गए कंफेशन को ध्यान से सुनिए। हमने सोचा कि
(08:36) फोन देना एजुकेशनल होगा। तो जब मेरा बच्चा सिर्फ डेढ़ साल का था, हमने तभी उसे स्मार्टफोन पकड़ा दिया। शुरुआत में सब नॉर्मल लगा, लेकिन धीरे-धीरे पता चला कि जब भी उससे फोन वापस लेते तो वो टैंट शो करने लगता। बाहर खेलने के बजाय बस वीडियोस देखना पसंद करता था। तब समझ में आया कि कुछ तो सीरियसली गलत हो रहा है। चिल्ड्रन बी थ्री फोर ऑल दे वांट। एंड दे डोंट वांट टू प्ले विथ अदर टॉयज। दे डोंट वांट हैव एनी इंटरेस्ट इन अदर एक्टिविटीज। दे जस्ट वांट टू बी इन फ्रंट ऑफ देर स्क्रीन्स। कुछ पेरेंट्स जानते हैं कि उनके बच्चे एडिक्टेड हो रहे हैं। लेकिन
(09:13) उनके पास ना वक्त है, ना पेशेंस और ना ही अल्टरनेटिव। यह स्क्रीन एडिक्शन सिर्फ एक प्रॉब्लम नहीं है। यह एक क्राइसिस बन चुका है। एक स्टडी की गई जिसमें जनरेशन अल्फा यानी जो बच्चे 2010 के आसपास बोर्न हुए हैं, उनके पेरेंट्स ने अपने बच्चों के मेंटल हेल्थ को वर्स्ट कैटेगरी में बताया। क्योंकि आज की डेट में वह टेक्नोलॉजी के बहुत ज्यादा करीब हो चुके हैं। इसका मतलब एक जनरेशन जिसे ना सामने बैठकर बात करने आता है, ना अपने इमोशन एक्सप्रेस करना, ना ही किसी का दर्द फील करना, एक डिजिटली रिच बट इमोशनली ब्रोकन जनरेशन बनकर सामने आने
(09:49) वाले हैं। दे मेंटालिटी दे आर नॉट द सेम, दे आर नॉट सफर दैट। व्हाट्स द डिफरेंस? देर, आई थिंक दे हैव द थिंग्स मोर इजीली, एवरीथिंग इट्स इजीली, दे डोंट सफर, दे डोंट केयर। ऑल यू टेक्नोलॉजीस डिस्ट्रक्ट देम फॉर अनदर थिंग सो दे आर नॉट द सेम। दे लिसन बट दिस इज व्हाई वी हैव टू इयर्स यू लिसन फ्रॉम वन साइड एंड दे गो अवे फॉर अनदर साइड। आज अगर एक फैमिली डिनर टेबल पर बैठी हो तो चार लोग चार स्क्रीन्स पे होते हैं और सबके बीच में एक वर्चुअल दीवार होती है। एक जमाना था जब हम अपना दुख सुख बांटने के लिए घर आते थे। लेकिन आज हर कोई
(10:25) अपना टाइम मांग रहा है। पेरेंट्स को लगता है बच्चे बात नहीं करते। बच्चों को लगता है पेरेंट्स सुनते नहीं और इस डिजिटल साइलेंस ने हर रिलेशन को एक दूसरे से डिस्कनेक्ट करके रख दिया है। सोशल मीडिया हैज़ एसेंशियली टेकन ह्यूमन कनेक्शन एंड टर्न इट इनू अ ड्रग बाय डिस्टिलिंग इट डाउन टू द एसेंशियल प्रॉपर्टी दैट मेक्स समथिंग एडिक्टिव। अब सवाल यह उठता है कि कोई तो सशन होगा इस डिजिटल एडिक्शन से बचने का? देखो मैं भी इस फेस से गुजरी हूं। कभी YouTube श्स, कभी Instagram रील्स, कभी WhatsApp और हर बार लगता था बस 5 मिनट के लिए देख रही हूं। पर वो 5 मिनट
(11:03) कब 2 घंटे में बदल जाता था पता ही नहीं चलता था। और आयरनी देखो मेरा काम भी सोशल मीडिया पे ही है। इस वजह से मुझे खुद को कंट्रोल करना और भी ज्यादा इंपॉर्टेंट लगने लगा। मैंने अपने फोन के सारे नोटिफिकेशंस सबसे पहले ऑफ किए क्योंकि मुझे पता है कि एक ना एक बार कॉल उठाने के लिए या अर्जेंट किसी काम के लिए फोन तो उठाना ही पड़ेगा। तब देख लिया जाएगा जो भी मैसेजेस या नोटिफिकेशंस हैं। यह करने से मेरे फोन की स्क्रीन टाइम यूसेज जो पहले 6 से 7 घंटे की होती थी वो कम होती हुई दिखाई दी। YouTube की वॉच हिस्ट्री डिसेबल कर दी ताकि मुझे मेरे फीड में ना कोई
(11:39) वीडियो और ना कोई रील्स की सजेशंस आए। बस जो मुझे इंपॉर्टेंट लगे उसे डायरेक्टली सर्च कर लिया और सब्सक्राइब कर लिया। Instagram अनइंस्टॉल कर दिया और कुछ इंपॉर्टेंट देखना है तो वेब पे लॉग इन कर लिया। और ट्रस्ट मी वेब पे Instagram चलाना सबसे बोरिंग काम लगता है। क्योंकि Instagram पे टाइम वेस्ट करने का सबसे बड़ा रीजन ही यह होता है कि यह हमारे लिए बहुत इजीली एक्सेसिबल होता है। और अगर आप इसे वेब पे चलाते हो तो आपका ब्रेन थोड़ा अनकंफर्टेबल फील करेगा। एंड मोस्ट इंपोर्टेंटली लोगों की फेक लाइफ से खुद की रियल लाइफ को कंपेयर करना ही छोड़ दिया।
(12:14) रात को फोन खुद से दूर रखने लगी ताकि सोने से पहले या उठते ही फोन मेरी प्रायोरिटी ना हो और धीरे-धीरे मैंने अपना डोपामिन डिटॉक्स स्टार्ट किया। आपकी भी अगर कोई हॉबी है तो आप उसे स्टार्ट कर सकते हो। अगर YouTube पे वीडियोस देखना है तो शॉर्ट फॉर्म कंटेंट से ज्यादा लॉन्ग फॉर्म एजुकेशनल एंड इनेटिव वीडियोस देख सकते हो। जिससे कि आपका ब्रेन रिवायर हो सके। आपके पेशेंस और सोचने समझने की कैपेसिटी रिबिल्ड हो सके। देखो मैं आपको कोई परफेक्ट स्यूशन नहीं दे रही हूं क्योंकि हर किसी की जर्नी अलग होती है और यह चीजें आप एक बार में कंट्रोल भी नहीं कर सकते।
(12:49) आपको छोटे-छोटे स्टेप्स लेने होंगे ताकि आप खुद को धीरे-धीरे डिजिटल डिटॉक्स कर सको। यह स्मॉल स्टेप्स ही आपके दिमाग को वापस रियल वर्ल्ड के रिदमम में ला सकती हैं। क्योंकि आने वाली जनरेशन हमें देखेगी, हमसे सीखेगी और शायद रिपीट भी करेगी। तो डिसीजन आपका है कि इस डोपामिन के लूप में उलझे रहना है या अपने दिमाग का कंट्रोल वापस लेना है। अगर इस वीडियो को एंड तक देखा है तो शायद आपने भी अपना डिजिटल डिटॉक्स का मन बना लिया है और इसलिए शेयर जरूर करना शायद किसी और का भी माइंड रिसेट हो जाए और अगर आपको मेरा काम पसंद आया हो तो चैनल को सब्सक्राइब जरूर
(13:27) करना क्योंकि ऐसे ही और भी इंपैक्टफुल और इनेटिव वीडियोस आने वाले हैं जो आपकी लाइफ में किसी ना किसी तरह से इंपॉर्टेंट रोल प्ले करेगा। सो थैंक यू सो मच। ओम
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