How Big Brands Fool Indian Consumers!!
Author Name:Food Pharmer
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Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=gytz_ZVdnkg
Transcript:
(00:00) हमारा भारत बीमार हो रहा है। आज भारत के सारे खाने में मिलावट है। मिल्क में डिटर्जेंट, पनीर में पाम ऑयल, शहद में चीनी का सिरप, चाय में लोहे का डस्ट, चिल्ली पाउडर में ईंट का पाउडर, हल्दी में कलर और चावल में प्लास्टिक। मैं हमेशा बोलता हूं पैकेज फूड नहीं फ्रूट्स और वेजिटेबल्स खाओ। लेकिन आजकल तो फ्रूट्स और वेजिटेबल्स तक में बैंड पेस्टिसाइड्स है। आजकल तो पानी भी चैन से नहीं पी सकते। पानी में भी मिलावट है। अगर खाने में मिलावट है और पानी में भी मिलावट है तो इंसान खाए क्या? हवा, हवा में भी इतना पोलशन है कि यह भी किसी ने खाने लायक
(00:35) छोड़ा नहीं है। भारत में आधा से ज्यादा लोग फार्मर्स हैं। इतने [संगीत] लोग खेती कर रहे हैं। तो कैसे पॉसिबल है कि पूरे देश में साफ खाना किसी के पास नहीं है। और पैकेज फूड की हम जितना कम बात करें उतना बेहतर। सेम प्रोडक्ट, सेम कंपनी। लेकिन दोनों अलग कलर। ऐसा क्यों? क्योंकि इंडिया में वो आर्टिफिशियल कलर्स यूज करते हैं। लेकिन यूरोप में कोई आर्टिफिशियल कलर्स यूज़ नहीं करते। इनफैक्ट इंडिया का फैंटा में पर 300 ml 10 टीस्पून चीनी है। लेकिन यूरोप का फैंटा में तीन चम्मच चीनी है। और ये सिर्फ फैंटा में नहीं Kitcat में भी यही हो रहा है। इंडिया के किटकैट में वो
(01:11) सिर्फ 4.5% कोको डालते हैं। लेकिन ऑस्ट्रेलिया में ऑलमोस्ट 22% और साथ में ऑस्ट्रेलिया में मिल्क भी ज्यादा डालते हैं और चीनी भी कम। यही कहानी नॉर की भी है और नॉर के इंडिया के टोमेटो सोप में 6.9% टोमेटोज़ है जबकि यूके में 28% टोमेटोज़। ऐसा क्यों है कि इतने सारे एमएनसीज़ जो 100 प्लस कंट्री से ज्यादा में है लेकिन इंडिया में ही वो क्यों इतना खराब खाना बेच रहे हैं? पहला रीजन है प्राइस सेंसिटिविटी। इंडिया दुनिया का वन ऑफ द मोस्ट प्राइस सेंसिटिव मार्केट्स में से एक है। मतलब अगर किसी प्रोडक्ट का प्राइस ₹10 से ₹15 भी हो जाए
(01:50) तो लाखों लोग उसे खाना बंद कर देंगे। इसीलिए कंपनी सस्ते इंग्रेडिएंट्स यूज करते हैं और क्वालिटी पर कॉम्प्रोमाइज करते हैं ताकि लोगों को उनका प्रोडक्ट महंगा ना लगे। और रीजन टू तो शायद सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट रीजन है कि हमारा रेगुलेशन सिस्टम बहुत वीक है। दुनिया के बहुत सारे कंट्रीज में फूड लॉस काफी स्ट्रिक्ट होते हैं। अगर कोई कंपनी मिसलीडिंग क्लेम्स करे या अपने इंग्रेडिएंट्स को छुपाए तो उन्हें करोड़ों रुपए का पेनल्टी देना पड़ता है। इंडिया को अगर हेल्दी बनाना है तो सबसे इंपॉर्टेंट है स्ट्रांग रेगुलेशंस रखना। आइए देखते हैं दूसरे कंट्रीज के फ़ूड
(02:27) रेगुलेशंस कैसे होते हैं और इंडिया उनसे क्या सीख सकता है। शुरू करते हैं जापान से। जापान के फूड पैकेट्स पर जो स्नैक्स का साइज होता है वही साइज आपको पैकेट के अंदर भी मिलेगा। तो अगर आप कोई पैकेट में कुकीज़ देखोगे तो वही साइज का कुकीज़ भी रहेगा अंदर में। फोटो में अगर पांच टॉपिंग्स है तो प्रोडक्ट में भी पांच टॉपिंग्स होंगे। आप कोई भी प्रोडक्ट देखो जो पैक में खाने का साइज है वही साइज अंदर मिलेगा। है ना अमेजिंग रोल अनफॉर्चूनेटली लेकिन इंडिया में जो लीडिंग ब्रांड्स हैं सबसे ज्यादा मिसलीडिंग भी हैं। जैसे ये जूस फ्रंट ऑफ पैकेट पर इतने सारे फ्रेश
(03:04) फूड्स दिखाते हैं लेकिन पैक के पीछे में एक छोटा डिस्क्लेमर डाल देंगे क्रिएटिव विजुअलाइजेशन। ये क्रिएटिव डिपिक्शन नहीं ये क्रिएटिव डिसेप्शन है और ये सिर्फ पैकेजिंग पर नहीं हो रहा है। ये इंडिया के टीवी एडवरटाइजमेंट्स में भी हो रहा है। अब देखते हैं इंडिया यूरोप और सिंगापुर से क्या सीख सकता है। यूरोप और सिंगापुर के पैकेज्ड फूड में ओपनली ए बी सी डी रेटिंग होता है बेस्ड ऑन देयर हेल्थ रेटिंग। और अगर कोई फूड प्रोडक्ट का सी या डी रेटिंग है तो उन्हें यह रेटिंग को फ्रंट ऑफ पैक पे लगाना मैंडेटरी है। डी से नीचे वाले प्रोडक्ट्स का एडवर्टाइजमेंट भी बैंड है।
(03:38) टीवी पे भी नहीं दिखा सकते, सोशल मीडिया में भी बैंड है और स्टोर में भी प्रमोट नहीं कर सकते। सोचिए अगर यह इंडिया में सिस्टम होता तो ये सब शुगरी ड्रिंक्स जो क्रिकेट मैच के बीच में देखते हो जहां बॉलीवुड स्टार्स और क्रिकेटर्स कोल्ड ड्रिंक्स प्रमोट कर रहे होते। अलाउड ही नहीं होता इंडिया में। इमेजिन करिए अगर इंडिया में भी ऐसे ही ए बी सी डी प्रोडक्ट्स रेट हो तो पूरे इंडिया के पैकेज फूड का सिस्टम बदल सकता है। स्टिंग एनर्जी तो शायद जेड रेट होता क्योंकि इंडिया में यह ए बी सी डी रेटिंग नहीं है। इसीलिए मैं ट्रुथ इन ऐप के साथ पार्टनर
(04:11) किया हूं जो इंडिया में भी ये रेटिंग्स करते हैं और आप भी कोई भी प्रोडक्ट को स्कैन करके उनका रेटिंग जान सकते हो और ये रेटिंग्स डॉक्टर्स और न्यूट्रिशनिस्ट ने साथ मिलकर बनाया है। ये ट्रुथ इन ऐप को आप डाउनलोड कर सकते हो। iPhone और Android दोनों में। अब देखते हैं कि इंडिया यूके के फूड लॉस से क्या सीख सकता है। यूके ने रिसेंटली अपने जंक फूड एड्स को सोशल मीडिया में पूरी तरीके से बैन किया है और टीवी पे भी ये जंक फूड एड्स सिर्फ 9:00 बजे के बाद अलाउड है क्योंकि बच्चे यूजुअली तब तक सो जाते हैं। लेकिन इंडिया में ये जंक फूड एड्स सुबह शाम दिन रात
(04:47) चलते रहते हैं। और इन्फ्लुएंसर्स, क्रिकेटर्स और बॉलीवुड सेलिब्रिटीज पूरे टाइम ये जंक फूड को प्रमोट करते हैं। नूडल्स इट्स बेटर। सोचिए कि बच्चों पे क्या प्रभाव पड़ता होगा। कभी-कभी आप क्रिकेट मैच देखो तो लगता है कि वो क्रिकेट कम पान की दुकान ज्यादा है और इंडिया के टीवी चैनल्स में कोलास, नूडल्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स के एड्स आते रहते हैं। मुझे लगता है कि इंडिया को भी यूके की तरह सोशल मीडिया में जंक फूड एड्स बैन करना चाहिए और टीवी में भी रिस्ट्रिक्ट करना चाहिए। अब देखते हैं कि इंडिया फ्रांस के फूड लॉस से क्या सीख सकता है। फ्रांस ने अपने स्कूल्स में
(05:23) केचअप को बैन किया है टू प्रमोट हेल्दी ईटिंग। लेकिन इंडिया के स्कूल्स में केचप ओपनली रहता है। लेकिन इंडिया फ्रांस से कुछ नहीं सीखा है। इनफैक्ट इंडिया में तो आजकल केचप सब कुछ में मिलाते हैं। रोटी, सब्जी, समोसा, पकोड़ा सब कुछ। और क्या आपको पता है कि केचप में कितना चीनी होता है? यह हैं केचप के लीडिंग ब्रांड्स और इनमें इतना चीनी होता है पर 15 ml। इमेजिन करिए सिर्फ 15 ml जो बहुत छोटा होता है उसमें ही आधा से एक चम्मच चीनी डालते हैं ये ब्रांड्स। बहुत लोग एक सिंग में ही 7 8 10 चम्मच चीनी खा लेते हैं थ्रू केचप और वो रियलाइज भी नहीं करते क्योंकि ये
(06:01) इनविज़िबल शुगर है। मेरे डैड मेरे वीडियोस देख के अब फ्राइड समोसा खाना छोड़ दिए हैं। और अब वो बेक समोसा खाते हैं। लेकिन वो हर एक बाइट ऑफ समोसा के साथ इतना केचप खाते हैं कि मैं तो उनको बोलता हूं आप प्लीज फ्राइड समोसा ही खा लो। लेकिन इतना चीनी वाला केचप मत खाओ। केचप से बेटर है घर पे बना हुआ कोरिएंडर चटनी या मस्टर्ड। अब देखते हैं कि इंडिया चिल्ले और मेक्सिको से क्या सीख सकता है। ये कंट्रीज अपने सॉफ्ट ड्रिंक्स में बड़े-बड़े वार्निंग लेबल्स डालते हैं। हाई शुगर, हाई कैलोरी, हाई सॉल्ट और हाई फैट की। और यह वार्निंग लेबल्स बहुत बड़ा सक्सेस था। और
(06:36) मेक्सिको में तो ओबेसिटी रेट और सोबरिंग कंसमशन भी कम हो गया। यूरोप और मेक्सिको छोड़ो श्रीलंका का भी फूड लॉस काफी स्ट्रांग है। और श्रीलंका और साउथ कोरिया भी ये ट्रैफिक लाइट सिस्टम फॉलो करते हैं लोगों को बेटर गाइड करने के लिए। ये सारे कंट्रीज फूड मार्केटिंग और पब्लिक हेल्थ को इतना सीरियसली ले रहे हैं और इंडिया को भी उनसे कुछ सीखना चाहिए। लेकिन इंडिया अनफॉर्चूनेटली हेल्थ केयर को सीरियसली नहीं ले रहा है। जब हम हेल्थ केयर शब्द की बात करते हैं तो आपके दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? लोग यूजुअली बात करते हैं हॉस्पिटल्स और मेडिसिंस की। लेकिन वो
(07:08) हेल्थ केयर थोड़ी ना हुआ। वो तो हुआ सिक केयर। केयरिंग अबाउट योरसेल्फ आफ्टर यू आर सिक। अगर इंडिया को हेल्दी बनना है तो हमें रियल हेल्थ केयर में फोकस करना होगा एंड वो होता है क्लीन ईटिंग। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इंडिया में फ्रंट ऑफ पैकेज लेबलिंग मैंडेटरी किया है। और इंडिया में जल्द ही एक वार्निंग सिस्टम आने वाला है जिसमें पैकेज्ड फूड में हाई शुगर, हाई साल्ट और हाई फैट मार्क करना होगा कंपनीज़ को। और मैं सुप्रीम कोर्ट को बिल्कुल सपोर्ट करता हूं। और मेरी गवर्नमेंट से एक और रिक्वेस्ट है। इंडिया में एक बड़ी प्रॉब्लम है कि हर एक
(07:42) न्यूट्रिशन लेबल, हर एक इंग्रेडिएंट लिस्ट इंग्लिश में होती है। लेकिन इंडिया में सिर्फ 10 से 20% लोग इंग्लिश पढ़ पाते हैं। लेकिन जो लोग इंग्लिश नहीं पढ़ सकते उनका क्या? क्या उन्हें हक नहीं जानने का कि उनके खाने में क्या है? और इसीलिए हम ओनली वॉश नीरड के हर एक प्रोडक्ट में एक क्यूआर कोड डालते हैं ताकि आप इसे स्कैन करके इसका न्यूट्रिशन लेबल और इंग्रेडिएंट लिस्ट इंडिया के अलग-अलग लैंग्वेजेस में ट्रांसलेट कर सकते हैं। इसके अलावा मैं बिलीव करता हूं कि जैसे ही हम स्कूल में मैथ्स, ज्योग्राफी और हिस्ट्री पढ़ते हैं, वैसे ही हमें स्कूल्स में हेल्थ भी पढ़ना
(08:16) चाहिए एज अ सब्जेक्ट। अगर हमें भारत को मिलकर डायबिटीज कैपिटल के बदले हेल्थ कैपिटल बनाना है तो हमें बच्चों को सिखाना पड़ेगा। और इसीलिए मैंने बच्चों के लिए एक हेल्थ एजुकेशन चैनल शुरू किया है Kids फार्म। ये एक काम लो स्टिमुलेशन चैनल है जहां हम बच्चों को सही खाने के बारे में सिखाते हैं। मैं मानता हूं कि हेल्दी खाना एक लग्जरी नहीं एक बेसिक राइट होना चाहिए और मेरा एमएसीस के लिए एक मैसेज है। ए्री इंडिविजुअल्स हेल्थ इज इक्वलीेंट इरिस्पेक्टिव ऑफ द कंट्री दे आर बोर्न इन। सो प्लीज इंडिया में इनफीरियर प्रोडक्ट्स देना बंद कीजिए। जैसे यूएस में ब्लैक
(08:52) लाइव्स मैटर मूवमेंट है। हमें एक इंडियास हेल्थ मैटर्स मूवमेंट शुरू करना चाहिए अगेंस्ट ऑल एमएसीस जो इंडिया में इनफीरियर प्रोडक्ट्स बेच रहे हैं। मैं पिछले कई सालों से इंडिया के हेल्थ के लिए अकेला फाइट कर रहा हूं। और इसीलिए ब्रांड्स ने मेरे अगेंस्ट लीगल नोटिस, कोर्ट केस, डेफमेशन सूट्स, सिक्स मंथ इंप्रज़मेंट थ्रेट भी दिया है। लेकिन फिर भी मैं इंडिया के हेल्थ के लिए लड़ रहा हूं और लड़ते रहूंगा। यह वीडियो को अपने WhatsApp ग्रुप्स, Twitter, Facebook सब जगह शेयर कीजिए ताकि यह गवर्नमेंट तक पहुंच जाए। लेबल पड़ेगा इंडिया तो स्वस्थ बनेगा
(09:28) इंडिया। लेट्स मेक इंडिया हेल्दी अगेन।
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