Powerful Aghori On TRS - 400 Year Sadhna, Bhairav, Shiva, Tantra & Sach - Avdhoot Alakhram
Author Name:Ranveer Allahbadia
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Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=abDCaOEI3mc
Transcript:
(00:00) अघोरी की जिंदगी में शव का क्या रोल रहता है? शवसा कि हम अपने आप को शवगत कर दे। अब मुर्दे की तो कोई इच्छा नहीं मुझे पानी पिलाओ, मुझे खाना खिलाओ। यही अवस्था अगर जीवित रहते मनुष्य प्राप्त कर ले तब तो वो परमात्मा तक पहुंच जाएगा। वाह! चिता से मांस खाने का लॉजिक रहता ही है। वो ऐसे व्यक्तियों के ये लोग इंटरव्यू लेते हैं जिनको हीरोइन पीने के आदि हैं। वो तो गड़दुल्ला है। ये अोर परंपरा की बुराई करने के लिए बहुत से लोग शिवजी को ही सब गरियाते हैं। शिवजी को दिखाया क्या गया कि उन्होंने जहर को अपने गले में रख लिया। तो उनकी हम नकल करें और फिर वही हम
(00:35) करने लगे तो हमारा तो सत्यानाश हो जाएगा। ये सब ना हर किसी के बस की बात नहीं होती। इसी डर की वजह से लोगों के दिलों में जिज्ञासा है। ऐसे डर हमारे अंदर समाए रहते हैं बच्चेपन में। तो जैसे बाबा जी हमको लोगों को बोलते जाओ श्मशान पे लकड़ी लेके आना पीछे मत घूम के देखना। क्यों? जो पीछे मुड़ के लोग देखते थे वो आज नहीं। क्या हुआ था उनके साथ? ये भैरव जी की लीला थी। हां बिल्कुल। ये जो लीला होती है कर्ण की भैरव जी की। दुनिया को लगता है ये देखो क्या हुआ है इनको भैरव जी की साधना करने। किसी की आराध्य की हम साधना करते हैं उससे हमारे
(01:07) ऊपर मुश्किलें नहीं आती है। जीतने का तरीका हमको जानना है इसलिए वो मुश्किलें पैदा की जाती है। जो साधना ही नहीं किए हैं वो तो किसी ना किसी पर आरोप लगाते हैं। अघोरीस के इष्टदेव शिवजी भगवान शिव के पांच मुख थे। उसमें से एक मुख का नाम ही अघोर है। ओम नमः शिवाय। ये तो संस्कृत में बोलते हैं लोग। ओम नमः शिवाय का और शिव का मतलब होता है मृत्यु। तो कौन से मृत्यु को बुला रहे हैं जैसे मैंने पहले बताया। मन की मन की क्योंकि जब तक मन चुप नहीं होगा तब तक जो परमात्मा बोल रहे हैं वो हमको सुनाई नहीं पड़ेगी। हर हर महादेव। हर हर महादेव।
(02:06) हर हर महादेव स्वामी हर हर महादेव बहुत सुकून महसूस हो रहा है आपके सामने बैठकर अब मैं खुलकर आपसे बात कर सकता हूं आपको कैसा लग रहा है बहुत अच्छा लग रहा है सही इंसान के सामने आए अच्छा अ क्या मैं डायरेक्टली शुरुआत कर दूं। हां हम अोर के बारे में बहुत सारी बातें करेंगे आज। भारतीय इंटरनेट की वजह से बहुत लोगों के बहुत सारी गलतफहमियां है अोर पंथ को लेकर। हम अोर पंथ क्या है? अोर एक बहुत पुरातन व्यवस्था है अध्यात्म की और कहते हैं भगवान शिव के पांच मुख थे। उसमें से एक मुख का नाम ही अोर है। तो इसलिए अघोर तो एक विधान है, एक तरीका
(02:54) है, एक पथ है। तो हम लोग अघोर को पथ मानते हैं। एक रास्ता मानते हैं। जी और अोर को मानते हैं अघोर जो घोर ना हो। अति सरल हो। जी। सरलता है इस पथ में। सरलता। सरलता के साथ मुश्किलें भी है। मुश्किलें तो हर जीवन में होती है लेकिन अध्यात्म में कोई मुश्किल नहीं होती है। अगर अध्यात्म में भी मुश्किल है तो फिर अध्यात्म किस काम का? अघोरीज के इष्ट देव शिवजी हैं। शिव जी तो महाकाली महाशिव दोनों सेम है। सेम दोनों सेम काल माने समय काली माने समय हम और शिव ही एक ऐसे चाहे बोले परमात्मा मान लीजिए ईश्वर मान लीजिए हमारे
(03:42) वेद शास्त्र पुराणों में शिव जी के पिता का कोई नाम नहीं। माता का कोई नाम नहीं। बाकी सबके पिता का, माता का, घर का, परिवार का नाम है। शिव जी की दो पत्नियां हैं। उनके भी पिता का नाम है। उनके भी घर का नाम है। जी। पहले सती है तो वो दक्ष प्रजापति की बेटी है। दूसरी पार्वती है तो वो हिमालय राजा की बेटी है। लेकिन शिव का कोई बाप नहीं। शिव की कोई मां नहीं। तो हम लोग यही मानते हैं कि इस दुनिया में शिवजी महादेव इस दुनिया में आए। जब ये दुनिया मनुष्य के रहने के काबिल बन गई। आप उनको पहला संत भी मान लीजिए, पहला गुरु भी मान लीजिए। हम
(04:20) लोग अघोर परंपरा के लोग उनको अपना परम गुरु बोलते हैं कि हमारे वो परम गुरु श्री गुरु चरण पादुकाभ्यो नमः आदि गुरु चरण पादुकाभ्य नमः परम गुरु चरण पादुक श्री गुरु मतलब मेरे बाबा मेरे गुरु जी आदि गुरु मतलब बाबा किनाराम जी और परम गुरु मतलब महादेव को हम महादेव को परम गुरु मानते हैं कि हम गुरु परंपरा उनसे शुरुआत हुई हमारी सीखने की परंपरा गुरु का मतलब सिखाने वाला तो सीखने की परंपरा उनसे शुरुआत हुई यही सवाल मैंने बहुत सारे लोगों से पूछा है और हर कोई मुझे थोड़ा सा अलग जवाब देता है तो आपका जवाब जानना चाहूंगा अगर हमें काली मां की साधना
(04:57) स्टार्ट करनी है घर पे ओ अ ये गुरु के बिना कर सकते हैं कुछ हद तक बिना गुरु के शिव जी के लिए ये सच नहीं है शिवजी लाइक जैसे ओम नमः शिवाय कोई भी कर सकता है हां और कोई भी कर सकता है ओके भैरव जी सेम सेम भैरव की अनुष्ठान करते हैं। भैरव की पूजा करते हैं। जब भी नवरात्रि का अनुष्ठान करते हैं माता के मंत्र के बाद भैरवों की मंत्र लेते हैं। हम नहीं तो आप किसी भी शक्ति को प्राप्त नहीं कर सकते हैं जब तक भैरवों को आपने पूजा नहीं की। नहीं तो कहीं भी आप देवी की शक्ति पीठों में जाएंगे आपको भैरवों का मंदिर मिलेगा। हम मतलब इंटरनेट को क्या लगता है कि अगर कोई
(05:35) कहता है कि ये इंसान अधोरी है या वो इंसान अधोरी है मतलब उनकी साधना बहुत ज्यादा एडवांस्ड है और शायद उनकी साधना में अ डेड बॉडीज का कुछ एलिमेंट रहता है। अभी मुझे ये पता भी नहीं कि ये सही है या गलत है। इसी चीज को मैं भी जानने की कोशिश कर रहा हूं कि शव का क्या रोल रहता है। अधोरी की बहुत अच्छा प्रश्न पूछे हैं आप शवसाधना कि हम अपने आप को शवगत कर दें यदि मनुष्य अपने जिंदा रहते मरना नहीं जान पाया तो अध्यात्म को बिल्कुल नहीं जान सकता है पहला मरण कबूल जीवन की क्षण आस होए सबन की रैन का तो आओ हमारे पास मन मरे धात मर जाए
(06:22) बिन मन मरे कैसे हरि पाए मन को मरने के लिए कहा जा रहा। तन को नहीं मरने के लिए कहा है कि आत्महत्या कर लो। मन को मरने के लिए कहा जा रहा। कबीर भी कह रहे हैं जा मरने से जग डरे मेरे मन आनंद मरने से ही पाइए पूर्ण परमानंद। तो ये शरीर के मरने के लिए कबीर भी नहीं बोल रहे हैं। मन को मरने के लिए बोल रहे हैं। अगर मन मर जाए तो मुर्दा का क्या हो जाता है? अब मुर्दे की तो कोई इच्छा नहीं। तुम मुझे शमशान घाट ले चलो। मुझे पानी पिलाओ, मुझे खाना खिलाओ। मेरी बात सुनो वो तो कुछ भी नहीं हो गया। यही अवस्था अगर जीवित रहते मनुष्य प्राप्त कर ले मुर्दे
(07:01) की अवस्था तब तो वो परमात्मा की तक पहुंच जाएगा। वाह यही 100 साधना है जिसको हम लोग समझते हैं। हम ये समझे हम मुर्दे हैं। हमें मुर्दे की तो कोई इच्छा नहीं होनी चाहिए। कोई वासना नहीं, कोई उपासना भी नहीं, कोई प्रार्थना भी कोई नहीं। मुर्दा उसी को बहुत से संतों ने रामकृष्ण परमहंस जी ने या अलग-अलग उन्होंने कहा शून्य में चले जाओ हम अपने आप को जीरो करो किसी संत ने अलग ढंग से कह दिया कबीर ने अलग ढंग से कह दिया चाहे गई चिंता गई मनवा बेपरवाह जाको कछु ना चाहिए सोई शहंशाह जिसकी कोई इच्छा नहीं ये मुझे मिल जाए ये मिल जाए ये मिल जाए
(07:43) उसकी इच्छा नहीं वो शहंशाह वो राजा महाराजा अधिराज मांगन गया सो मर गया। मांगने वाला व्यक्ति तो मर मुर्दे के समान है। उसका कोई पहलू नहीं है। लालच की वजह से बहुत कुछ हां ओके लालच ही उसको हमारे गुरु जी बोलते थे पाप के बाप का नाम लोभ है। पाप के बाप का नाम हां जो पाप का बाप है वो लोभ है। लोभ के कारण ही हमसे पाप होते हैं। जो भी बुराइयां आती है वो लोभ के कारण आ जाती हैं। अगर लोभ से मुक्त हो जाए तो लोभ से मुक्त जब साधु महात्मा नहीं हो पा रहे हैं तो आम पब्लिक कैसे हो जाएगी? जो प्रेरणा देने वाले लोग हैं, प्रेरणा का स्रोत है,
(08:22) जब श्रोत ही गंदे हो गए। अभी इलाहाबाद जाएंगे, माग मिला जाएंगे। आप भी आइए, देखिए वहां पर मैं तो खोजते रहता हूं, विनती करता हूं परमात्मा से कोई संत मिल जाए, कोई महात्मा मिल जाए जिनके चरणों की धूल मैं अपने मस्तक पर लगा लूं। लेकिन नहीं मिलते हैं। वही कथाकार लोग, कहानीकार लोग बिना मतलब की कथा सुनाते हैं। कुछ बोल दो तो गुस्सा उनको इतना आता है कि कह नहीं सकते हैं। तो क्रोध से भी भरे हुए हैं। दो मिनट में उनके अंदर क्रोध आता है। दूसरों को बहुत शिक्षा देते हैं। बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। ये भी ईगो ही है। हां ना स्पिरिचुअल ईगो कि मेरा अध्यात्म सबसे
(09:02) ज्यादा हम बहुत बड़े कुल में पैदा हुए। बहुत बड़े पंडित हैं। बहुत बड़े ज्ञानी हैं। हम बहुत बड़े संत हैं। ये जो हम हम है ना ये मनुष्य को नर्क तक ले जाता है। जैसे बुद्ध आए या जो भी महापुरुष आए उन्होंने कहा मोक्ष मैं अब बार-बार जन्म नहीं लूंगा। तो मोक्ष तो का मतलब ही होता है इच्छाओं की मृत्यु। मोक्ष मोमत इच्छा। कोई इंसान अघोर पंथ में रहकर भी एक गृहस्थ का जीवन जी सकता है। गृहस्थ का मतलब होता है पहाड़ को हाथ पे ले चलने वाला। गृहस्थ जो पहाड़ को हाथ पे रख ले अपने इतना वजन उठा ले। जी। तो गृहस्थ तो संत से भी बहुत ऊंचा होता
(09:47) है। अगर सद गृहस्थ है वह गृहस्थों के घर में भगवानों ने जन्म लिया है। राम कौन है? गृहस्थ है। कृष्ण कौन है? गृहस्थ है। बुद्ध कौन है? गृहस्थ है। महावीर कौन है? गृहस्थ हैं। सब गृहस्थों में जन्म लिए हैं। सब गृहस्थों के घर में बच्चे जन्म लेंगे कि सन्यासियों के घर में बच्चे जन्म लेंगे? जी जी। तो गृहस्थ तो पूरे इस दुनिया को भविष्य देता है। एक शक्ति देता है गृहस्थ। गृहस्थ नहीं होंगे तो फिर जन्मेगा कौन? धरती पर सब संते हो जाएंगे तो अच्छे मनुष्य महान मनुष्य कहां से आएंगे दुनिया में? जी आप एक गलतफहमी दूर कीजिए। हम ये जो चिता से मांस खाने का जो आईडिया है
(10:33) जो इंटरनेट जानती है अघोरी के बारे में। दुनिया भर की इंटरनेट ना यही जानती है जब हम किसी फॉरेनर से अघोरी शब्द कहें उनकी रिस्पांस ये रहती है कि अच्छा वो ना जो इंसानों का मांस खा फिर हमें उन्हें समझाना होता है कि नहीं नहीं ऐसा नहीं है। जिन लोगों ने उन्हें खाते हुए देखा है जिस व्यक्ति को खाते हुए देखा गया मीडिया ने देखा है अगर तो मैं पूरी मीडिया को चैलेंज देता हूं क्या उस व्यक्ति ने जीवन में कोई काम दूसरा कर पाया है कुछ कर पाया इस संसार में तो उसने क्या किया है कोई हॉस्पिटल खोला है कुछ मनुष्य के लिए किया है क्या उसने 10 20 50 शिष्य बनाए हैं
(11:13) वो ऐसे व्यक्तियों के ये लोग मीडिया वाले इंटरव्यू लेते जिनको हीरोइन पीने के आदि हैं, ड्रग्स के आदि है, उनको ₹1000 दे दो को मुर्दा का मांस खा के दिखा देगा। उसको कौन सा है? वो तो गड़दुल्ला है। वो आप उसे अवघड़ साधु और अवगढ़ क्या-क्या बता दे रहे हैं। ये अोर परंपरा की बुराई करने के लिए बहुत से लोग जो हम लोगों के पीछे पड़े हुए हैं आदिकाल से शिवजी को ही सब गरियाते हैं। शिवजी का ससुर शिवजी का अपमान कर रहा है। जब सती गई घर पे तो कितनी गालियां उनके पिता ने दी। ऐसी कहानी में रामायण में लिखा हुआ कि तुम उस अघोरी को नहीं लाई अपने साथ में खोपड़ी की माला पहनने वाले
(11:51) को चिता की भस्म लगाने वाले को तो अोर परंपरा का आदिकाल से अपमान किया जा रहा है। ओके मदिरा से भी रिलेटेड एक साधना होती है। मैंने सुना है कि अगर आप भैरव जी की पूजा असल में करना चाहते हो। ओ और मदिरा के साथ ही होती है। सच है या गलत है? एक प्रकार की साधना देखिए मदिरा मतलब कोई ऐसी चीज नहीं आप ऋग्वेद पढ़ेंगे अगर तो ऋग्वेद के एक खंड को छोड़ के दो खंडों में यानी ऋग्वेद तीन हिस्सों में आज हमारे पास है तो उसमें से एक खंड छोड़ के दो खंडों में जब भी उसकी कोई भी पूजा की शुरुआत होती है तो सबसे पहले सुरा का ही प्रयोग किया जाता है और
(12:36) सुरा यानी शराब ही हम परमात्मा को चढ़ाने के लिए वो करते हैं, पूजा करते हैं। तो आज वेद कोई नहीं जानता। जी। वेदों को नकारा कर दिया गया क्योंकि वेदों में बाकायदे मांस खाने की विधा लिखी हुई तो वो भी तो भोजन है। जी। तो फिर क्यों कहा जाता है कि अगर साधना में आगे बढ़ना है तो शाकाहारी होना जरूरी है। नहीं नहीं शाकाहारी नहीं चोरी का खाना नहीं खाना चाहिए। आप किसी का खून करके, किसी की चोरी करके, किसी का लूट के भोजन करते हैं। ये कहा जाता है अशुद्ध भोजन। मतलब उसूल ज्यादा जरूरी होता है। हां आप सत्यता से, ईमानदारी से, सच्चाई से
(13:14) जी रहे हैं और आप कुछ भी खा रहे हैं तो वो तो कोई भोजन अशुद्ध नहीं हुआ। आप दूसरे का हक नहीं खा रहे हैं। दूसरे का छीन के नहीं खा रहे। दूसरे का लूट के नहीं खा रहे। अपनी मेहनत से खा रहे हैं और कुछ भी खाएं तो सब भोजन ही है। जी। मतलब आज जैसे आपने कहा कि ये ऋग्वेद में लिखा गया है। मांस के बारे में, मदिरा के बारे में। मदिरा के बारे में। भांग या सबके बारे में लिखा हुआ। फिर क्यों तो शिव जी को चढ़ाते हैं भांग धतूरा धतूरा हां बताएंगे कुछ इसके बारे में हां तो वो तो एक प्रतीक दिखाया गया कि शिवजी को हम ऐसी चीजें चढ़ाते हैं कि जो
(13:49) आपको नशा करती हैं जो आपकी मति दिमाग फेर देती है अभी आप शराब पी लीजिए पता नहीं क्या करने लगे भांग खा लीजिए क्या करने लगे तो ये देखिए कि शिवजी को दिखाया क्या गया कि उन्होंने जहर को अपने गले में रख लिया तो ऐसे ही आदमी को ग्रहण करना करना चाहिए कोई चीज तो उनकी हम नकल करें किसी महादेव जैसे महापुरुष की नकल करें कि वो क्या खाते हैं वो क्या पीते हैं और फिर वही हम करने लगे तो हमारा तो सत्यानाश हो जाएगा हम तो हम महादेव की केवल जो उन्होंने आज्ञा दिए जीने के लिए जो हमको तरीके बताए महादेव कभी नहीं कहे कि तुम भांग खाओ हम कहां किस किताब में लिखा है कि तुम भांग
(14:28) खाओ हम पर मान लो जो लोग भांग खाते हैं या फूंकते हैं जो भी अध्यात्म त्मा के पाथ पर चल सकता है। आपके इंटरनेट में ही बता रहे हैं लोग कि इसमें कुछ ऐसा होता है गांजा में भांग में कि मनुष्य की छठी इंद्री सक्रिय कर देता है। थर्ड तीसरी आंख खुल जाती है। जिसको जिसको आप तीसरी नेत्र भी बोलते हैं। बट भांग को क्यों लेना चाहिए? नहीं क्यों हमने नहीं कहते हैं कि लेना चाहिए। नहीं लेना चाहिए। बिल्कुल नहीं लेना चाहिए। कोई नशा नहीं लेना चाहिए। नशे की वजह से साधना में बाधा। बिल्कुल बिल्कुल। जैसे जहां पर इन चीजों का उपयोग किया जाता है यानी ज्यादातर शराब
(15:07) जहां पी जाती है बार में यहां पे ऐसी जगहों पर तो हम लोगों को एक ये चीज का ज्ञान है छोटा सा कि जो भी मृत्यु होती है मनुष्य की उसका मोक्ष तो होता नहीं है जल्दी से बहुत करोड़ों में से किसी का एक का मोक्ष हो पाता है और जब तक हमारा पुनर्जन्म नहीं होता तब तक हम भूत प्रेत इत्यादि की योनि में रहते हैं। तो जिस तरीके का मेरा यह जीवन होता है शरीर छूटने के बाद भी हम उसी तरीके के जीवन को पसंद करते हैं। यानी अगर हम शराबी हैं, रात दिन शराब पीते हैं, रात दिन गंदगी में रहते हैं। तो हम मृत्यु के बाद भी ऐसी जगहों पर निवास करते हैं। तो
(15:53) शराब खाने में कहो ऐसी आत्माएं रहती हो कि हम कहो एक क्वार्टर पी लें। उसके बाद हमारे ऊपर कोई हावी हो जाए। हम किसी को एक मुंह से झगड़ा होने वाला था तब तक पता लगा उसका मर्डर ये हो गया क्योंकि किसी और आदमी ने कर दिया। ज्यादातर ऐसे इंटरव्यू लिए गए हैं। हम लोगों ने भी जाके बहुत से जेलों में लोगों से बात की है कि हमको तो मालूम ही नहीं था कि मेरे से ये घटना हो जाएगी। पता नहीं क्या हुआ मुझको कि ये आदमी मर गया। मैं 20 साल से सजा भोग रहा हूं। तो यानी वो एक क्षण वो क्या हुआ उसकी बुद्धि लुप्त हो गई। जब उसे इतना बड़ा अपराध हो गया। तो ऐसी जगहों पर ऐसी तरीके
(16:27) की आत्माएं होती हैं जो हमारे मन मस्तिष्क पर बस कर लेती हैं और आश्रमों में गुरुद्वारों में अच्छी जगहों पर भी आत्माएं होती है जो दिव्य आत्माएं होती हैं तो आपको वो तरंगे महसूस होने लगती हैं जहां दिव्य आत्माएं रहती हैं वहां वो दिव्य तरंगे एहसास कराती मन को शांति मिलने लगेगी अद्भुत आनंद अंदर ही अंदर महसूस होने लगे उस आनंद को कहा तो नहीं जा सकता है वाणी से लेकिन महसूस किया जा सकता है। कुछ ऐसी साधनाएं होती है जहां 500 दिन अकेले बिताने होते हैं। ओ वही सबसे मुश्किल अघोरपथ की साधना होती है। मुश्किल तो कुछ नहीं मुश्किल अघोर का मतलब
(17:08) होता है सरल सहज है सब मुश्किल कुछ नहीं। एक पढ़ाई है कि यदि गुरु कहते हैं कि आपको इस समय ऐसे समय कुछ एकांत में या बिना भिक्षा के बिना भोजन के आपको उतना जीना है उतना उस चीज को वहां तक पहुंचना है मस्तिष्क की उस अवस्था तक पहुंच जाना है जहां विचार शून्य हो जाए तपस्या करते हां विचार शून्य हो हम मंत्र पढ़ रहे हैं मंत्र ही सुन रहे हैं मंत्र ही बोल रहे हैं मंत्र पे ही पूरा ध्यान है मंत्र का जो उच्चारण है जो हम कह रहे हैं मंत्र मंत्र भी एक शब्द है ना जी जी जी जैसे ओम नमः शिवाय तो इसको हिंदी में ना कोई बोलेगा ये तो संस्कृत में बोलते हैं लोग ओम नमः शिवाय
(17:53) हिंदी में बोलो तो क्या निकलेगा इसका मतलब आओ मृत्यु मैं तुम्हें नमन करता हूं ये हिंदी हुआ बोलेगा कोई आओ मृत्यु मैं तुम्हें नमन करता हूं आओ मृत्यु तो सब मृत्यु से डर रहे हैं सारे हॉस्पिटल भरे हुए हैं बंबई बेचारे पूरे देश भर में पूरी दुनिया भर में तो आदमी तो मरने से डर रहा है और कौन कौन मौत बुलाएगा अपनी और जबकि ओम नमः शिवाय का शिव का मतलब होता है मृत्यु शिवाय का मतलब होता है आ मृत्यु तो कौन से मृत्यु को बुला रहे हैं जैसे मैंने पहले बताया मन की मृत्यु मन की मृत्यु मन मरे धात मर जाए मन को मारना है क्योंकि जब तक मन मरेगा
(18:30) नहीं मन चुप नहीं होगा तब तक जो परमात्मा बोल रहे हैं वो हमको सुनाई नहीं पड़ेगा अभी हम लोग दो लोग बात कर रहे हैं एक आ हम दोनों बोल बोलने लगे एक साथ तो हम किसी को समझ में नहीं आएगा आप क्या बोल रहे हैं मैं क्या बोल रहा हूं एक चुप होता है तो एक की बात सुनाई पड़ती है ऐसे मेरा मन चुप हो जाए तो ईश्वर क्या बोल रहा है परमात्मा क्या हमको बोल कहना चाह रहा है वो हमको सुनाई पड़े जिस दिन वो सुनाई पड़ने लगता है उसी दिन कहते हैं अब मेरे अंदर जागरण हुआ अब मेरी भी ज्योति जली मेरा भी दीपक जल गया भीतर से आप कह रहे हो कि शव साधना इसी बात में
(19:07) आपको मदद करती है तो आपने कब शुरुआत करी शव साधना की? 19 साल। 19 साल हम तो उसके पहले क्या होता है? तैयारी होती है शव साधना के लिए? देखिए ये कोई ऐसा तो है मैनेजमेंट तो नहीं है। ये मन की व्यवस्था है। जैसे अभी मैं आपको पहले बोल चुका मन ही ईश्वर तक जा सकता है। शरीर नहीं। तन ईश्वर की यात्रा नहीं करता। यहीं रह जाता है। चाहे आप जमीन में गाड़ दो या जला दो। जी। लेकिन मन ईश्वर तक की यात्रा करता है। जिसको हम लोग बोलते हैं सूक्ष्म शरीर। जैसे बाबा जी के बारे में भी हम लोगों ने देखा कि वो बिस्तर पर आराम करते रहते थे।
(19:51) तब तक 10 जगह से फोन आ जाता था हम लोगों को कि बाबा आए थे। हमको दवा देके गए हैं। अरे मेरे साथ शरीर आए थे बाबा। मतलब लोग झगड़ा जैसा करने लगते थे। अगर कोई बलदे बाबा यहां सो रहे हैं। क्या बात कर रहे हैं? बाबा तो अभी आके हमारे पास से गए हैं। तो सूक्ष्म शरीर यानी जिस मनुष्य को अपने मन पर बस हो जाएगा वो अपने सूक्ष्म शरीर को जान लेगा। दो शरीर है स्थूल है सूक्ष्म। स्थूल यानी कि ये ये जो दिखाई पड़ रहा है। सूक्ष्म मन नहीं दिखाई पड़ रहा है। शरीर कुछ भी करेगा जी। गलत काम करेगा तो अपराध में आ जाता है। मन कुछ गलत करता है तो पाप में आ जाता
(20:25) है। और जब मन सही करने लगता है तो वो पाप मुक्त हो जाता है। और फिर ये पाप ही प्रपंच है। जितने प्रपंच है ना वो पाप ही है। गाली तभी देंगे हम जब हमारे पास नासमझी होगी। नादानी होगी। मूर्खता होएगी दुनिया भर की। जब यह समझ में आएगा कि बोलत चलत सदा है संग मैं मूर्ख जाने अधूरी रे भगवान तो हमारे साथ में है हमेशा बोल रहे हैं चल रहे हैं जितने भी संत महात्मा राम कृष्ण जो भी है हम सूक्ष्म शरीर से वो विराजमान है या स्थूल में तो नहीं है वो तो जाने कब किस शरीर छूट के गया उनका तो सूक्ष्म शरीर को जागृत कर लेना यही मनुष्य की साधना
(21:09) उपासना प्रार्थना का मुख्य उद्देश्य है कि अपने सूक्ष्म को जान लेना और परमात्मा सूक्ष्म है। सूक्ष्म का मतलब जो दिखाई नहीं पड़ता है। जैसे बहुत छोटा और सूक्ष्म को जब तुम जान जाओगे तो ईश्वर को जान जाओगे। हल्के से मैं रिककैप करता हूं। तीन शरीर होते हैं। अ स्थूल शरीर यानी कि फिजिकल बॉडी, सूक्ष्म शरीर यानी कि एस्ट्रल बॉडी जो अंदर ही अंदर होता है और कारण शरीर जो उसके भीतर है। तो यहां हम सूक्ष्म शरीर की बात कर रहे हैं। और आप कह रहे हो कि अगर शव साधना के लिए खुद को तैयार करना है तो पहले सूक्ष्म शरीर को जागृत करना जरूरी है। यानी कि
(21:50) एस्ट्रल बॉडी को एक्टिवेट करो। और वो सूक्ष्म शरीर तब जागृत होता है जब आपके अंदर दिव्य भाव पैदा होता है। पहले दिव्य भाव तो मतलब 5 साल की उम्र में से 18 साल की उम्र तक आप उस भाव को जागृत करने की कोशिश कर रहे थे। अलग-अलग साधनाओं में ओके। तो मान लो जैसे कि मैंने 25 साल की उम्र में साधना स्टार्ट करी। मैं आपसे 20 साल पीछे हूं। तो क्या मुझे भी कुछ 15 साल ऐसे लगेंगे दिव्य भाव परमात्मा को जानने का जो तरीका है जो आज तक जितने भी महापुरुषों ने बताया है वेदों से लेके बुद्ध से लेके महावीर से ले सबसे कम टाइम अगर दुनिया में कोई चीज प्राप्त
(22:36) हो सकती है तो वो ईश्वर हो सकता है कि आपके पलक झपकाने से भी कम समय में वो मिल जाता है सबसे नजदीक अगर कोई है तो वो ईश्वर है आपके अबकि आपसे और आपके मन से और उसकी दूरी बहुत लंबी हो गई है तब तो वह मालूम पड़ेगा बहुत दूर है। जी जैसे मैंने अभी बोला बोलत चलत सदा है संग मैं मूर्ख जाने अधूरी मूर्ख शब्द मूर्छ से लिया गया यानी संस्कृत में बोलते हैं मूर्छ बेहोश को कि हम लोग बेहोश हैं तो ये जागृत करना है अपने आप को अगर आप 100% जागृत कर लेते हैं अपने मन को तो कहते हैं कि ईश्वर को प्राप्त कर लिया आपने शरीर में रहते रहते हैं ये साधना मार्ग से ही होता है
(23:18) हां बिल्कुल साधना करने से साधना से तो बनते हैं वो तो मतलब जो इंसान ये पडकास्ट सुन रहा है उनके लिए यह जानना जरूरी है कि दिव्य भाव लाना जरूरी है खुद के बॉडी में और सूक्ष्म शरीर को जागृत करना ये एक पहला गोल है हमारा यही आप कह रहे हो अ सूक्ष्म शरीर की बात है सूक्ष्म शरीर का मतलब है मन की उस अवस्था का नाम है जहां मन पांच विकारों से अपने आप को दूर कर लेता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार ये पांच चीजें बाधाएं होती है। बाधाएं होती है। अहंकार यदि है तो निरंकार का दर्शन नहीं हो सकता।
(24:04) जी। इसके जागृत होने के बाद क्या होता है? जागृत होने के बाद तो जैसे तीन हाथ आगे दिखाई पड़ता है। इससे 300 मील, 300 अरब मील दूर भी दिखाई पड़ता है। दिव्य दृष्टि खुलती है। दिव्य दृष्टि खुलती है। क्या यह भी पॉसिबल है कि कुछ-कुछ लोगों का सूक्ष्म शरीर जागृत हो चुका है। पर वह जानते नहीं? कि यह जागृत हुआ है। ज्यादातर तो ऐसे ही लोगों का जागृत होता है। जैसा आप कह रहे हैं कि उनको मालूम भी नहीं होता है कि उनके पास वो विद्याएं हैं वो ज्ञान है। तो इतने भोले होते हैं। उनको खुद को जानकारी नहीं होती है कि ये मेरा अगला काम क्या करेगा।
(24:46) जान के भी अनजान हम उन्हें खुद नहीं मालूम रहता कि मेरे अंदर यह शक्तियां इसीलिए तो इस अवस्था में जो आदमी पहुंचता है उसको नाम दिया गया है भोलेनाथ का। आपने देखे ना शिव जी के नाम सुने भोले बाबा भोले भंडारी अवघड़ दानी ये सब शिव जी के साथ जोड़ा जाता है। किसी दूसरे देवताओं के साथ नहीं जोड़े जाते हैं शब्द। जी केवल शिव के साथ जोड़े जाते हैं। यानी शिव में जो सारी शक्तियों का स्वामी है। इस संसार में जो भी आध्यात्मिक शक्तियां अगर कहीं से पैदा हुई है तो वो शिव से पैदा हुए। राम ने भी शिव की आराधना की। रावण ने भी शिव की आराधना की। सब शिव के ही आराध्य हुए।
(25:32) महादेव एक है। महादेव अनेक भी नहीं है। अलग-अलग नहीं है। तो अब उन्हें तो खुद नहीं मालूम है कि मेरा शिष्य है। मुझसे ही वरदान लेके मुझको ही दौड़ा लेगा भस्मासुर को। वरदान दे दिए जिस पे हाथ रखे वो भस्म हो जाए। इनको ही भस्म कर देता हूं बाबा जी को। तो ऐसी अवस्था वालों को ही यह प्राप्ति होती है। जो बहुत भोले होते हैं उन्हें ही सूक्ष्म शरीर का ज्ञान होता है। तो अोर के पथ पर चलकर नियम क्या होता है? नियम तो जरूर रखना चाहिए। नियम संयम तो नियम तो यही होने चाहिए कि जैसे हम सुबह उठते हैं तो धरती को प्रणाम करते हैं तो ये सब
(26:19) नियमों में आता है। भोजन करते हैं तो जल का छींटा मारते हैं आपको। तो ये सब नियम है। नियम सिर्फ सहल सरलता के हैं। सहजता के हैं। तो ये बस फिर से मतलब मैं शव साधना के बारे में जानना चाहूंगा। हम यह साधना हर किसी के बस की बात नहीं होती। और जहां तक मैंने अोर पंत को समझा है, कुछ साधनाएं मुश्किल होती हैं। इसी डर की वजह से लोगों के दिलों में जिज्ञासा है अघोर पंत को लेकर। डर क्या करते हैं? मुझे तो नहीं मालूम। शायद हम लोग डर खत्म करने के लिए बचपन में रात में 12:00 बजे के बाद जलती हुई चिता से एक लकड़ी निकाल करके उसको आग में गंगा
(27:01) जी में बुझा करके अपने कंधे पर रख के और अपने मंत्र का जाप करते हुए किनाराम स्थल तक जाते थे और वही लकड़ी वहां रखी जाती है जो लगभग 425 सालों से ये परंपरा चल रही है तो वो लकड़ी इसीलिए ली जाती थी कि एक एक भ्रांति होती है भूत है प्रेत है फलाना है ठिकाना है ये है वो है ऐसे डर हमारे अंदर समाए रहते हैं बच्चेपन में तो जैसे बाबा जी हम लोगों को बोलते जाओ श्मशान पे लकड़ी लेके आना पीछे मत घूम के देखना कोई कितना भी आवाज दे पीछे मत घूमना क्यों रात में 12:00 बजे कौन इंसान आएगा वहां पर यानी कि इस पथ पर चलकर ऐसी चीजों का सामना
(27:42) करना जो अज्ञात और डर है भय है हमारे अंदर पहले तो उनका दूर हो उसी को हम लोग बोलते हैं भरो र माने मृत्यु। जहां भय की मृत्यु हो जाए तो हम भैरवों की उपाधि प्राप्त कर लेते हैं कि हमें कोई भय नहीं किसी बात का। क्योंकि भय उसको होता है जो अपराधी होता है। तो वही भाव हमारे अंदर भी रहता है कि मैंने तो कोई अपराध किया नहीं है। मेरा तो कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। और फिर गुरु जी ने मुझे बोला है कि पीछे घूम के नहीं देखने का। बाकी मेरा कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। तो वो गुरु की जो आज्ञा होती थी जो गुरु का वो प्रेम भरे शब्द होते थे वही
(28:17) शक्ति होते हैं हम लोगों के साधना में कि गुरु की आज्ञा माननी है। जैसे जो पीछे मुड़ के लोग देखते थे वो आज नहीं हम लोगों के साथ। क्या हुआ था उनके साथ? एक बंगाली दादा था वो पीछे पड़ गया महाराज जी के। भैररो मंत्र बताइए। तो उन्होंने कहा अगर तू पात्र अभी नहीं हो पाया है लेकिन जििद कर रहा है तो जा जहां कोई वीरान श्मशान हो भैरव की पूजा आंख खोलकर की जाती है आंख बंद करके नहीं की जाती है तो जाकर के आंख इतने मंत्र का जाप कर भैरवों की सिद्धि हो जाएगी तेरे को तो मंत्र जपने लगा अबकि आंख खोल के सिद्धि की जाती है
(29:01) तो उससे 200 मीटर की 150 मीटर की दूरी पर एक भैंसा एक भैंसे के ऊपर सब सामान लादा हुआ एक नट और लटिन शायद आप लोग समझते होंगे जिसे जो घुमंतु लोग होते हैं अपना सारा सामान भैंसों पर लाद के और अपने बच्चे भी उसी में बिठा लिए सब सामान राशन सामान बांध के चल देते हैं जहां भी वहां एक छोटा सा टेंट लगा लिए वहीं रह गए कुछ औजार बनाते हैं लोहे के बेच लिए कुछ काम कर लिए उसी से अपनी जीविका का जलाते तो बंगाली दादा ने देखा कि एक नट नटीन आ गए सामने फिर धीरे से उन्होंने भगौना उतारा आग जलाई दो मुर्गे रखे थे उसमें से तो उन्होंने उसने मुर्गे
(29:48) काट के उसमें डाल दिए भगौने में उसने जोर से आवाज दी कि भगौना तो नहीं भरो पेट कैसे भरो बोले चलो भैंसा भी काट लेते हैं बाद में खरीद लेंगे तो भैंसे को भी काट के उसी में डाल दिए अबकि आंख खोल के वो देख रहा था बार-बार वो और विभत्र दृश्य भैंसा काट के भगोने में डाला जा रहा है। बोले अभी भी नहीं भरो। बोले लड़का बाद में पैदा कर लेंगे। इसको भी काट के इसी में डाल दो। तो उसको बच्चे को भी काट के उसी में डाल दिया उसने। बोले अभी भी नहीं भरो। बोले देखता हूं अगल-बगल कोई होता है तो लाता हूं। तो बंगाली दादा अकेले थे। माला छोड़ के भाग
(30:24) लिए। जबकि भैरव आ रहा था उन्हें सिद्धि देने के लिए लेकिन उससे पहले वो भाग गए। और बाद में पागल हो के बनारस में चीथड़े बिनते बिनते मर गए। तो पात्रता भी ना हो और जबरदस्ती भी कोई करे तो साधना में भी शायद उसका भी मन मस्तिष्क खराब हो जाएगा। फिर ये भैरव जी की लीला थी। हां बिल्कुल। कोई महापुरुष आपसे मिलने आ रहा है। आपको बहुत कुछ मनचाहा फल देने वाला है। तो आपकी परीक्षा तो लेगा। आप कोई भी परीक्षा जब तक पास नहीं करेंगे तब तक आप किसी पद पर सुशोभित नहीं हो सकते। पर पता कैसे रहता है कि पता हो जाएगा तो फिर तुमको भैरव की सिद्धि
(31:02) कैसे प्राप्त होगी जब पहले से पता हो जाएगा तब स्वामी जी मैं कुछ प्रश्न आपसे पूछना चाहता हूं पर उससे पहले कुछ चीजें कहूंगा मैं क्योंकि अगर मेरे दिमाग में सोच विचार मुझे दिख गए मुझे उन्हें निकाल कर ही आगे बढ़ना है पहले तो मैं ये जानता हूं कि जभी भी कोई असली आघोरी से मेरी मुलाकात हुई है मुझे ये पता चला है कि इस विद्या को अक्सर हम गुप्त विद्या ही मानते हैं। ओ तो बहुत आभार महसूस हो रहा है दिल में कि आप हमारे सामने हमारे प्लेटफार्म पर आए हो। मुझे दुनिया तक अघोरियों का और अोरपंथ का सच पहुंचाना है अ खुद के जिज्ञासा के माध्यम के थ्रू।
(31:38) पर मुझे लगता है कि इस पॉडकास्ट में आगे बढ़ने से पहले हम आपको थोड़ा बहुत जाने अगर आपको सही लगे तो। हां हां बिल्कुल। तो आपकी कहानी क्या है? मतलब आप कहां से हो और अघोर पंथ में आपका आना कैसे हुआ? बनारस में हमारा अवधूत भगवान राम कुष्ट सेवा आश्रम है। जहां पर मैं बच्चेपन से बाल्यपन से पढ़ा लिखा। जी। फिर बड़ा होने के बाद मेरी कोई इच्छा नहीं रह गई। गुरु जी के ही पद चिन्हों पर चलने की इच्छा हुई और चलते रहा। उन्होंने जब देखा मेरा 19 साल की उम्र तक मेरा तरीका रहने का गुरु की आज्ञा का पालन करने का तो उन्होंने मुझे अपना एक नाम दिया अलखराम
(32:20) करके। तो अलग काम पर यह अोर पंथ के ही गुरु जी थे। हां अघोर पंत तो बचपन से आपको इसकी विद्या प्राप्त हुई है। तो क्या-क्या सिखाया जाता था? वेदों की शिक्षा होती थी। क्या सिखाया जाता था? नहीं हम लोग धर्म पढ़ाई पढ़ते थे। जैसे आप लोग पढ़े मैथ्स, साइंस, साइंस, हिस्ट्री, फिर उसके साथ-साथ साधना। साधना। मुझे बार-बार ना किनाराम बाबा जी का नाम लिख। हां, मैं उन्हीं किनाराम बाबा का ही 11वीं पीढ़ी का ओके। किनाराम जी ही हमारे मेन गुरु किनाराम जी हैं। किनाराम जी के बाद हम लोग 11 हैं इस समय। यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि अक्सर जब मैं बनारस जाता हूं हम उस आश्रम में चले
(32:58) जाते हैं और बस वहां की ऊर्जा को महसूस करता हूं। हां सही है। मेरे जो गुरु जी थे उनको हम लोग बाबा किनाराम का ही अवतार मानते थे। कहते थे कि बाबा किनाराम जी का ये दवा दसवीं पीढ़ी के बाद उनका अवतार हुआ और बाबा किनाराम ने ऐसा लिखा भी था कि दसवीं पीढ़ी में मैं स्वयं आऊंगा। तो स्वयं वही बाबा भगवान राम जी के नाम से मेरे गुरु जी आए। उन्हें अवघड़ भगवान राम भी कहा जाता है। उन्हें अवधूत भगवान राम भी कहा जाता है। उन्हें अगोरेश्वर भगवान नाम भी कहा जाता है। एक ही नाम है। अलग-अलग ढंग से लोगों ने पुकारा और बहुत सी ऐसी आंखों से
(33:35) ऐसी घटनाओं को देखा हो कि जिसको हम यही कह सकते हैं कि सिर्फ परमात्मा ही ईश्वर ही ऐसा कर सकते हैं। कोई ऐसी घटना है जो आप दुनिया के सामने शेयर कर सके? तो हमारे यहां एक सिंह साहब थे हृदय प्रकाश सिंह जी उनका नाम था और अचानक उनकी बहन की शादी थी उसी दिन और उनकी डेथ हो गई और बड़े चक्कर में पड़ गए कि आज बेटी की शादी है तो हम लोग कैसे शादी करेंगे और अगर शादी कैंसिल होती है लड़की की शादी और उस समय आज से 40-50 साल पहले क्षत्रिय लोगों में यह था कि मतलब अगर ऐसी कोई घटना हो जाए तो लोग बड़ा वो मानते थे कि लड़की को ही अपशगुन मानते थे कि इसकी
(34:20) शादी अपशगुन हुई कि आज इसके भाई की मृत्यु हो गई। तो इस तरीके से बड़ा उनके अंदर ही अंदर उनको डर हो रहा था। तो उन लोगों ने सोचा चलो बाबा से मिलते हैं। तो बाबा ने एक छड़ी उठाई हाथ में बोला चलो तुम क्या करोगे? मैं ही कुछ करता हूं। जाकर दो चार छड़ी मारे और उनको थोड़ा अपशब्द बोले गाली दिए। उठ जा। तो उठ के खड़े हो गए। तो तेरी बहन की शादी तो सो रहा है। तो ऐसी बहुत सी घटना है कि मुर्दों तक को वो जिंदा कर देते थे। अगर उनके वो सरल भाव में आते थे। भोले भाव में ऐसा नहीं कोई तंत्र कर रहे हैं या कोई मंत्र कर रहे हैं। इस तरीके की
(34:55) कोई विदा नहीं करते थे। जैसे और हमने अपनी आंखों से जो देखा कि एक अंग्रेज आया हमारे आश्रम में। वो 10 साल से पूरे भारतवर्ष को घूम रहा था। बहुत से साधु संतों महात्माओं के पास ही वो जाता था। तो उन्होंने पूछा कि अरे काहे के लिए आया है? इससे पूछिए हमारे पास क्यों आया है आश्रम? तो उसने बताना शुरू किया पूरे देश के साधुओं को गाली दे रहा है। कहता है सब ढोंगी सब पाखंडी है। कुछ भूत की बात बताते हैं सही सही। कुछ भविष्य की बातें बता देते हैं। कुछ मेरी शादी के बारे में बता देते हैं कि मेरी शादी हुई थी। एक और होएगी। ऐसा हो
(35:40) जाएगा, वैसा हो जाएगा। लेकिन मैं अपनी एक डायरी भूल गया हूं अमेरिका में। उसमें एक पता लिखा हुआ है इंडिया का। उसका पहला अक्षर कोई नहीं बता पाता है। पहला अक्षर हां उसका जो अक्षर लिखा वो मैं भूल गया हूं। तो उसमें आगे क्या लिखा हुआ अगर थोड़ा भी कोई बता देता तो मुझे याद आ जाता। तो बाबा ने ऐसे कर दिया तो डायरी देखी। उत्तम सेल बोले लाइट जला दो। तो लाइट जलाया तो उसको डायरी थी। तो उसने खोल के देखा तो वो बेहोश हो के गिर गया अंग्रेज वहां तो उसको पानी का छींटा मारा हम लोगों ने। अब वो उसको होश ही नहीं आ रहा। कहा ऐसा कैसे हो
(36:15) सकता है? ओ माय गॉड वो चक्कर में पड़ गया एकदम और बाबा ने जब उसको हमसे बोला कि इसको उठा के बाहर बिठा दो जाके और इसकी मां की तबीयत खराब थी। मैंने उसको दवा दे दिया ठीक हो जाएगी। तो जब वह अपने घर गया अंग्रेज तो उसने फोटो ले गया बाबा की तो उसकी मां बोली हां ये आए थे तुम्हारी डायरी मांगे हमको थोड़ी दवा खिलाए और लिटाए और चले गए और बाबा तो कहीं नहीं गए थे ना कोई चद्दर ओढ़े ना कोई कंबल ओढ़े या कोई जादू किए तो साधारण ऐसे बैठे हुए थे जैसे डायरी फेंक दिए तो ऐसी चीजें हम लोगों ने देखी आपके गुरु जी भी हमारे साथ हैं वहां बिल्कुल है
(36:52) हमेशा रहते हैं वो मतलब महावीर कि गुरु नानक देव जी बुद्धा जैसे व्यक्तियों का मोक्ष के बाद हुआ क्या आत्मा का उनकी आत्मा का यह हुआ कि आज उनकी आत्मा हम करोड़ों लोगों को आत्मा की तरफ ले जा रही है अब बुद्ध को देख लें मैं कन्याकुमारी से कश्मीर की पद यात्रा किया हूं 94 से 96 दो साल पैदल चला हूं मैं अच्छा उसके अलावा भी मैंने हिमालय में एक साल पूरा पैदल घूमा है 82 में तो मैं एक जगह जंगल में टहल रहा था धर्मशाला की तरफ हिमाचल में तो एक 12 13
(37:40) साल के बच्चे को मैंने 40-50 फुट आसमान में पंथी लगा के बैठे देखा तो मैंने दंग रह गया कि मैं छोटा सा बच्चा 11 12 साल की उम्र में साधना की इतनी पराकाष्ठा कि उसने पृथ्वी के सिद्धांत को जी ग्रेविटी िटी को सिद्धांत को चुनौती दे दी उसी समय तो उस पर भी मैं बहुत रिसर्च किया बहुत शोध किया कि क्या इस ग्रेविटी के सिद्धांत को नकारा जा सकता है तो शायद तो नकारा जा सकता है उन्हें जो पढ़ाई पढ़ी जो समझ में आया कि हां अगर इस साधना में रहते रहते आप इस संसार में हैं और इस संसार की किसी भी चीज से आपका मोह भंग हो गया अब आपको कोई इच्छा नहीं रहेगी
(38:23) कुछ तो मोक्ष हो गया। मोक्ष हो गया तो उस पृथ्वी का सिद्धांत आप नकार देंगे। फिर आप यहां नहीं जन्म लेंगे। हम फिर अगर ऐसी कोई और पृथ्वीियां होंगी तो शायद भले कहीं मालिक ट्रांसफर कर दें। जिसको जो भी मान लो आप स्वर्ग बोल लो। ऐसा ये मानता हूं। और और जगह हैं जहां जन्म हो सकता है। मोक्ष हासिल होने के बाद बहुत जहां सूक्ष्म शरीर हो। जहां सूक्ष्म शरीर वहां शायद हमको पानी खाने की जरूरत नहीं होती। ऐसा भी कोई दुनिया होगी जहां पे नहीं होगा इनका जरूरत जैसे इस दुनिया में जरूरत है। हम किनदाराम बाबा क्यों चाहते थे कि ये पडकास्ट हो जाए। क्या पहुंचना है दुनिया
(39:04) तक? अब मैं जो जानता हूं कि मेरे जो मेरे बच्चे लोग हैं, मेरे साथी हैं जो मित्र मान लो, बच्चे मान लो, कुछ भी मान लो। और मेरे गुरु जी ने सर्वेश्वरी समूह एक संस्था बनाई थी 1961 में। तो उसका मुझे प्रचार मंत्री बनाया था बाबा जी ने पूरे विश्व स्तर का जो संस्था है हमारी तो शायद उन्होंने सोचा होगा ये बच्चा जो है आगे चल के प्रचार करेगा अध्यात्म के अोर के पथ के बारे में क्योंकि जैसा आपने बताया और जैसा मैं भी सुनते रहता हूं मैं माघ मेले में हर साल जाता हूं सन 70 से ही जा रहा हूं
(39:50) तो जो भी लोग आते हैं वह उसी तरीके की बातें करते हैं। अघोरी बाबा है आप मांस खाते हैं क्यों खाते हैं? फलाना क्यों करते हैं? ऐसा क्यों करते हैं? वैसा क्यों करते हैं? आप पक जाते हो उससे। हां। नहीं पक नहीं जाता हूं। लेकिन मैं सोचता हूं कि यह अज्ञानता जो आज इनमें है यह अज्ञानता आज हजारों साल से मनुष्य का पीछा कर रही है। क्योंकि आप जब आपके पास पांच कमरे का घर बना है आपको अन्नमय कोष प्राणमय कोष मनमय कोष ज्ञानमय कोष आनंदमय कोष आप रहते हैं एक कमरे में अन्नमय कोष खाना खाना खाना मकान
(40:38) मकान मकान दुकान दुकान दुकान एक ही कमरे में चक्कर लगा रहे हैं आपने कभी जाने नहीं प्राण क्यों चल रहे हैं हम जब मन मन ही नहीं जान पा रहे, प्राण ही नहीं जान पा रहे तो हम ज्ञान तक कैसे पहुंच पाएंगे? और जब ज्ञान तक पहुंच रहे हैं तो आज ज्ञान तक लोग लोग पहुंचे तो हैं। पहले ज्ञानी इसलिए बनता था हम बहुत से लोगों की सेवा करेंगे। बहुत से लोगों को वो करेंगे। आज ज्ञानी महान इसीलिए बन रहे हैं कि हम अपना घर भर लेंगे। अघोरप में दश महाविद की साधना होती है। 10 महाविद है। सों की 10 महाविद है। आंख, कान, नाक, मुंह, हाथ, पैर जितने भी नौ दरवाजे खुले हैं। एक
(41:17) दरवाजा बंद है। नौ दरवाजों को आप सिद्ध कर लीजिए। आंखें सिद्ध हो जाए मनुष्य की। हमारे यहां बोलते रहते हैं ना निगाहे कर्म एक बार निगाह कर दो तो हमारी जिंदगी बदल जाए। भगवान ऐसा बोलते हैं। आप हमको आशीर्वाद दे दीजिए। एक बार हाथ से छू लिए। बाबा तो ठीक हो गया। ये कोढ़ियों को क्या करते थे? छू लेते तो ठीक हो जाते थे। दवा तो हम लोग देते थे। सब कुछ करते थे। पट्टी करते लेकिन वो जो स्नेह का प्रेम का स्पर्श होता था वो शक्तिशाली बन जाता था। उनके हाथों में इतनी ताकत आ गई थी कि वो छू लेते थे आदमी ठीक हो जाता। कान शुद्ध हो जाए तो बहुत दूर की सुनाई पड़ेगी।
(41:53) नाक शुद्ध हो जाए तो बहुत दूर की सूंघ लेंगे आप। वाणी बहुत दूर तक की बोल लेगी। बहुत दूर तक की बोल लेगी। खैर बॉडी पार्ट के लिए एक दश महाविद्यालय। हां हां जैसे मतलब मातंगी एक के लिए होगी। बंगलामुखी मां बंगलामुखी ओके पर यह भक्ति पर निर्भर है। भक्ति बनने पूरी तरह ये भाव यानी कि किस भाव के साथ आप साधु संगत बिन भाव नहीं उपजे भाव बिन भगति कहो को कैसे बिना साधु के संतों के आपके अंदर भाव नहीं उपज होएगा और भाव के बिना भक्ति नहीं होगी जब तक भाव नहीं है भक्ति नहीं भक्ति बढ़ाएं कैसे धीरे-धीरे भावनाएं बढ़ेंगी तो भक्ति बढ़ेगी जितना भाव निर्मल होता जाएगा तो मन
(42:38) को निर्मल करना है और क्या करना है मन में निर्मल होता जाए बहुत मल मूत्र भरा पड़ा है और हम लोग कपड़े तो साफ कर लेते हैं। बदन साफ कर लेते हैं। बढ़िया-बढ़ साबुन शैंपू है। अब दिमाग साफ करने वाला कोई शैंपू है नहीं। इसको भी साफ कर लिया जाए। शायद दिमाग साफ करने वाला शैंपू दर्द है। हां है। वो तो है पीड़ा। हां। ऐसा हमारे गुरु जी भी बोलते हैं कि हे दुख तू मेरे पास बार-बार आ। तेरे आने से मुझे ईश्वर की याद आती है। दुख पीड़ा तो मनुष्य को ईश्वर से जोड़ता है। यही जीने का कर्तव्य है शायद। पीड़ा का सामना करना। हां। पीड़ा इतनी भी बुरी नहीं है।
(43:17) हां। कहां बुरी है? सफरिंग इज नॉट बैड। यही आप कह रहे हैं। हां सही है। हम मैं जिंदगी में कुछ गलत कर रहा हूं। आपके मुताबिक नहीं आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। ऐसे ही करते जाएं। बिल्कुल करते थे। अब तक गुरु नहीं मिले तो मैं भैरव जी को ही गुरु मानता हूं। हम सही है गलत है। तुम भी तो भैरव हो। मतलब वो हर किसी के अंदर है। पर अभी भय से मुकाबला किए हो थोड़े दिन पहले। जी। मुकाबला करके जीत गए तो भैरव हो गए। हार जाते तो नरक में चले जाते। डर के भाग जाते। कहीं और कुछ काम कर रहे होते हैं। जैसे भय
(44:03) रौ भय का मतलब भय रौ का मतलब मृत्यु जहां भय की मृत्यु हो जाए जिस दिन भय नष्ट हो जाएगा तब हम अध्यात्म में आगे चलते हैं। और जीते तो जीतने वाले की जय जय बोली जाती है इस जगत में जो भी जीतता है। मतलब टिके रहने में ही जीत होती है। बिल्कुल यही है। मैं ये टिके रहना चाहिए और अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते रहना चाहिए। टिके रहने का मतलब ये नहीं कि टिके हुए हैं। लगातार अपने लक्ष्य के जो भी हमारे ऊपर बाण आता है या जो भी कुछ भी आता है वो हमें रोकने के लिए आता है। आपने पहले भी कहानियां सुनी होगी ऋषि फला तपस्या कर रहे हैं तो उन्होंने मेनिका
(44:44) को अप्सरा को भेज दिया तो किसी ने वर्षा करा दी तो किसी ने अग्नि लगा दी। लेकिन किसी से विचलित नहीं हुए तो उन्होंने सिद्धि प्राप्त कर ली। तो ऐसे यह चीजें हमारे आपके जीवन में भी आती हैं। कोई ना कोई रूप बना के आती हैं। किसी ना किसी तरीके का रूप बना के अगर हम उनसे नहीं हारते हैं। जीत जाते हैं तो जीत गए तो फिर जीतू हो गए। फिर तो हमें प्राप्ति हो जाएगी उसकी। पता है ये सब होने के बाद बहुत सारे लोग ना हमारा उदाहरण लेकर यह कह रहे हैं कि भैरव जी की साधना नहीं करनी चाहिए। ये देखो यह हो जाता है। और ऐसे बातें सुनकर मुझे कभी-कभी लगता है
(45:22) कि यह क्यों कह रहे हो आप? मतलब शायद आप भैरव जी को समझे ही नहीं हो। ओ आप कुछ कहना चाहोगे उसके बारे में? किसी की आराध्य की हम साधना करते हैं। उससे हमारे ऊपर मुश्किलें नहीं आती हैं। वो मुश्किलें नहीं आती है। मुश्किलों को जीतने का तरीका हमको जानना है। इसलिए वो मुश्किलें पैदा की जाती है। मतलब स्वामी जी मुझे लगता है कि कर्म ना फास्ट फॉरवर्ड हो जाता है। झट से होने लगता है। और दुनिया के मुताबिक ये जो लीला होती है कर्म की भैरव जी की। दुनिया को लगता है ये देखो ये देखो क्या हुआ इनको भैरव जी की साधना करने से। बट वो साधक को वो इंसान को पता रहता है कि क्या
(46:01) हो रहा है। हां वो आपने खुद ही जवाब दे दिया कि जो लोग साधक होते हैं वो जानते हैं कि उनके साथ क्या हो रहा है और जो साधना ही नहीं किए हैं वो तो फिर किसी ना किसी पर आरोप लगाते हैं। हम मजा आया आज? बहुत ठीक था। हां ठीक है। गुस्सा आता है आपको कभी? नहीं। काहे को गुस्सा आएगा? किस बात के लिए? जैसे लोग मानते हैं कि अघोरी इसको बहुत गुस्सा आता है। नहीं नहीं सब बेकार की बात है। वो अघोरी को नहीं जानते। वो जो तथाकथित अघोरी है गले में हड्डी बांध के भीख मांगने का तरीका शाम को दारू फ्री में मिल जाएगी। खाना फ्री में मिल जाएगा। वो अघोरी है।
(46:41) उनको गुस्सा आता है। हमको गुस्सा किस बात के लिए आएगा? हम शिव जी को गुस्सा आ जाए तो तीसरा नेत्र खोल देंगे। सर्वनाश हो जाएगा। पूरी दुनिया का नाश हो जाएगा। उस दिन जब गुस्सा आएगा तो उस दिन दुनिया ही नहीं रहेगी। नहीं तो फिर गुस्सा नहीं आएगा कभी। तो शिव को गुस्सा नहीं आता। शिव को तो उनके चेले लोग ठग लेते हैं। तभी गुस्सा नहीं आता उनको। सब पर करुणा रखते हैं। इसलिए करुणाकर बोले जाते हैं शिव। अगर आप चाहे आप किसी को श्राप दे सकते हो। क्यों देंगे श्राप? जैसे कहानियों में हमने पढ़ा है कि हनुमान जी की मां और हनुमान जी के पिताजी ऋषि स्नान कर रहे थे
(47:20) तो उनके ऊपर पानी छीट रहे हैं। वह साधना कर रहे हैं बैठे। बार-बार उनके ऊपर पानी छीट रहे हैं। कम उम्र के थे वह लोग। पानी छीट रहे हैं। उन्होंने एक दो मर्तबा इशारा भी किया लेकिन वह माने नहीं। तो उन्होंने गुस्से में बोल दिया साले बंदर हो जाओ। ऐसे दुर्वासा ऋषि के बारे में है कि कृष्ण जी के जितने परिवार के बच्चे थे उन्होंने एक लड़के को लड़की के कपड़े पहना करके और पेट में एक पत्थर बांध के और उस दुर्वासा ऋषि के पास पहुंच गए कि महाराज जी बताइए इसको लड़का होगा कि लड़की? तो उन्होंने कह दिया जो भी होगा तुम्हारे खानदान का
(47:50) सर्वनाश कर देगा। तो महात्मा का अपमान करेंगे। उनका तिरस्कार करेंगे। उन्हें जबरदस्ती आप उनके साथ गलत व्यवहार करेंगे तो फिर उनके मुंह से कुछ निकल जाएगा। फिर वो हो भी जाएगा वो। क्योंकि उनके पास वाक सिद्धि भी है। हां बिल्कुल बिल्कुल। जब वो वाणी से किसी को महान कह सकते हैं तो बुरा भी हो सकता है उनके कहने से। आप जैसे लोग जब किसी को आशीर्वाद देते हैं हम उस आशीर्वाद देने से आपसे कुछ चला जाता है। ऐसा कुछ नहीं है। अब जैसे मैंने बच्चेपन से देखा चंद्रशेखर जी शायद आपने जानते होंगे जो हमारे देश के प्रधानमंत्री बने। वो हमारे गुरु भाई थे
(48:31) साथ में रहते। अच्छा हम लोग भी जैसे झाड़ू लगाते थे वैसे वो भी झाड़ू आश्रम में लगाते थे। सफाई रखते थे। बाबा जी को अमेरिका वगैरह कहीं जाते थे तो वो साथ में ही उनके अटैची ले चलते थे। बहुत पहले ही शायद 70-70 में उन्होंने बोला था कि इंदिरा जी हमको बुला रही हैं गृह मंत्री बनने के लिए। बाबा ने मना कर दिया। नहीं आपको प्रधानमंत्री बनना है एक दिन। तो वो प्रधानमंत्री बने देश के और ऐसी घटना हुई कि बाबा की तबीयत खराब थी और चंद्रशेखर जी जब पहुंचे तो बाबा एक कमरा अपने कमरे के अंदर चले गए। तो बाबा बाहर निकले तीन दिन के बाद और एक कुर्सी डाल के बैठ गए तो
(49:10) चंद्रशेखर जी आए तो बाबा खड़े हो गए आइए हजूर बैठिए कुर्सी की तरफ इशारा किए अपनी कुर्सी की तरफ इशारा किए तो बोले बाबा आपका कुर्सी है हम बैठ जाते अरे भाई आपको कुर्सियां नहीं चाहिए बैठिए तो बैठ गए कुर्सी पे जब आदेश कर दिए तो बैठ गए बोले यहां क्या बैठे हैं जाइए दिल्ली में जाके बैठिए तो उस पूरी बात समझ नहीं पाए चंद्रशेखर जी तो जब चंद्रशेखर जी सब तैयारी हो गई उनकी गाड़ी में सामान रख गया चलने वाले बाबा को प्रणाम करने तो गए बाबा को प्रणाम करने तो बाबा खेत में बैठकर कुपी से घास निकाल रहे थे तो जब गए बाबा अच्छा जा रहा हूं बाबा दिल्ली आज्ञा
(49:46) है हां जा रवा बजे हेलीपैड बना नहीं मतलब आपके लिए हेलीपैड बना रहा हूं तो सच में तीन दिन के बाद वहां हेलीपैड बन गए क्योंकि वो प्रधानमंत्री बन गए तीन दिन में तो बहुत कुछ महात्मा दे देते हैं इतने दिन तक शायद संजोग रहे अपने शिष्यों को आगे बढ़ाना चाहेंगे विश्वामित्र वशिष्ठ ने राम को राम बना दिया। तो संत महात्मा को जो आदर प्रेम करता है उसको तो भगवान बना देते हैं संत महात्मा और संत कुछ बनना नहीं चाहता। इसीलिए तो संत का कोई अंत नहीं होता है। हम संत तो कुछ बनना नहीं चाहता। जो संत कुछ बनना चाहता है वो संत भी नहीं होता। जी जी
(50:20) उसकी तो कोई इच्छा नहीं। वो तो लोगों को बना देना चाहता है। जो योग्य व्यक्ति हो उसको गद्दी में बिठा दे। अयोग्य हो उनके लिए भगवान से प्रार्थना करें कि उनको नीचे उतारो। और योग्य है तो उन्हें गद्दी तक पहुंचाओ। तो यह संत कर सकता है। राजा को भिखारी भी बना सकता है। भिखारी को राजा भी बना सकता है। ये कर सकता है संत। मेरे लिए कुछ सलाह है। सलाह यही है। अभी बच्चे हो बहुत जीवन तय करना है। बहुत अच्छा विचार है। अभी आपके जो अध्यात्म के प्रति सोच समझ है। इस उम्र में नहीं आती है। अन्य लोगों में आपके अंदर इतनी विशेषताएं हैं। इस तरीके के प्रश्न उठना
(51:05) कहते हैं जहां 10,000 व्यक्ति ईश्वर की बात कर रहे हो वहां एक जिज्ञासु होता है। तो आप जिज्ञासु तो हैं। आपको जानने की बहुत इच्छा जिज्ञासा मतलब जगता है। थोड़ा-थोड़ा जग रहे हैं आप। तो जागरण हो रहा है आपके अंदर। ये जितने प्रश्न आते हैं आपके भीतर ये जिज्ञासु के प्रश्न है और जिज्ञासु ही बनके रहेंगे आप तो आप बहुत कुछ जानेंगे दुनिया में जिस दिन आपके इस प्रश्नों का कोई हल मिल जाएगा कहीं से आपको मालूम हो जाए गुरु कौन होते हैं गुरु कोई देह नहीं होता है गुरु अपने ही प्राण होते हैं अपनी स्वास में जितना अपनी स्वास पर विश्वास करे तो अपने प्राणमय कोष पर
(51:49) जान ज्ञान जाए फिर हम जब अपने प्राणों को जानेंगे ना फिर अपने गुरु को भी जान लेंगे। ऐसे गुरु नानक जी भी बोले पवन गुरु पानी पिता माता धरत महात दिवस रात्रि दुई दाया खेले सकल जगत पवन ही गुरु है। पहला ही जीव पानी है इस धरती पे पहला पानी जीव है जित हरिया सब कोई इस धरती पे अगर कुछ जन्म हुआ है सबसे पहले जीवन का तो वो पानी के रूप में आप अपने साधना में वरुण देव को पूछ दो और वरुण की तो बातें कर रहा हूं। पानी यही कह रहा हूं क्योंकि मैंने ना हाल ही में थोड़ी-थोड़ी पढ़ाई स्टार्ट करी ऋग्वेद को लेकर। संस्कृत तो मैं नहीं समझता।
(52:29) बट जो लोग वीडियो बनाते हैं ऋग्वेद से रिलेटेड या चीजें लिखते हैं वो पढ़ाई कर रहा हूं मैं। मैं जानता हूं कि वरुण देव का बहुत बड़ा अ रोल है ऋग्वेद में। हम कहते हैं कि जो जो जीव अभी मैंने जिससे बात बोला जीव है वो उसमें भी जीवन है। पानी है। जी जी। पानी से स्नान करते हो क्यों फ्रेश हो जाते हो आप? तो उसमें तो वरुण देवता तो है ही है। सभी देवता इसी रूप में पवन देवता है, वरुण देवता सब देवता हैं। इनका समझ आ जाए कि ये देवता हमारा किस ढंग से हमारा उपचार करते हैं। हमारे अंदर परिवर्तन करते हैं। बदलाव करते हैं। तो फिर करने में
(53:05) लगते हैं वो। तो इसीलिए गंगा जी के किनारे तीर्थों के तीरथ बने। उसको तीर बोला जाता है हम लोगों के हिंदी भाषा में। तीर माने नदी का किनारा। जी। वो तीर बन गए तीरथ। धीरे-धीरे हर हर महादेव। हर हर महादेव। बस यही था व्हाट का। और कुछ कहना आपको? नहीं। ठीक है। आप कुछ पूछना चाहते तो मतलब दुनिया तक आपकी बातें बस पहुंचानी थी। अगर ऐसा दिन आता है मेरी जिंदगी में जहां कोई संत घर आ रहे होते हैं। बहुत अच्छा लगता है। सही है। यही आशीर्वाद है। सही है। तो धन्यवाद। और मैं मैं हजार बार और धन्यवाद कहना चाहता हूं।
(53:50) बट कोई बात नहीं आप बिना बोले सब कुछ भगवान जानता है। अध्यात्म तो आपका कहते हैं बॉडी लैंग्वेज बता देती है कि आप कितना आप किसी के प्रति कितना समर्पित हो रहे हैं। कितना कुछ हो रहा है। आपके अंदर बदलाव हो रहा है। वो शरीर का परिवर्तन बता देता है। मतलब जो जो बातें हमने आज करी ना मैं तीन साल पहले ये दुनिया के सामने पेश करना चाहता था। जब मैं किनाराम बाबा के आश्रम के यहां आ गया। सही है। तो मेरे ख्याल से उस दिन की कंप्लीशन हुई है। वो लूप बंद हुआ है। सही है। इस इस वजह से आभारी हूं। अ और शिवजी और भगवती चाहे तो ये फिर से हम बात
(54:34) करेंगे। बिल्कुल बिल्कुल बात करें। ओके हर हर महादेव। हर हर महादेव। हर हर महादेव। हो ओ
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