How Fashion Industry is DESTROYING the World? | Microplastics in Your Clothes | Dhruv Rathee
Author Name:Dhruv Rathee
Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@dhruvrathee
Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=kPxtIB5z-mI
Transcript:
(00:00) एक टीशर्ट की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू और मैं पैसों वाली कीमत की बात नहीं कर रहा। गौर से देखना आज का यह वीडियो। साउथ अमेरिका का चिली देश इसके नॉर्थ में है दुनिया का सबसे सूखा हुआ रेगिस्तान। एट अकामा डेजर्ट। यहां सालों तक बारिश नहीं होती। एक बार तो यहां 400 साल तक बारिश नहीं हुई थी। इस रेगिस्तान के कुछ हिस्से तो इतने सूखे हुए हैं कि ऐसा लगता है कि मानो यह धरती पर नहीं बल्कि किसी और प्लेनेट पर हो। [संगीत] नासा खुद अपने मार्स रोवर की यही टेस्टिंग करता है। लेकिन अगर आप इस रेगिस्तान को सेटेलाइट इमेजेस से देखोगे तो आपको कुछ
(00:41) अजीब दिखाई देगा। रेत के बीच में कपड़ों के पहाड़ नजर आएंगे। हजारों टन कपड़े ऐसे ही रेगिस्तान में पड़े हुए हैं। एक बिल्कुल सुनसान सा ऑलमोस्ट लाइफलेस डेजर्ट और यहां करोड़ों कपड़े कर क्या रहे हैं? इसका जवाब है दोस्तों फ़ास्ट फैशन। [संगीत] एक ऐसी इंडस्ट्री जो बनाती है सस्ते मास प्रोड्यूस्ड चालू क्वालिटी के कपड़े। एक ऐसी इंडस्ट्री जो ब्रेन वाश कर रही है जनता का हर महीने नए कपड़े खरीदने पर [संगीत] जिसकी वजह से हमारी धरती खत्म होती जा रही है। सिर्फ इसलिए ताकि कुछ अरबपति लोग और [संगीत] प्रॉफिट कमा सकें। यह कहानी शुरू होती है स्पेन के एक छोटे
(01:30) से शहर आग कोरोनिया में। यहां 1975 में अमांसी औरतेगा नाम के एक आदमी ने ज़ारा नाम का अपना पहला स्टोर खोला। इसका आईडिया बड़ा सिंपल था। फैशन को फास्ट बनाओ। उस समय में फैशन इंडस्ट्री में साल में दो सीज़ंस होते थे। गर्मियों के कपड़े या सर्दियों के कपड़े। जब भी एक नया डिजाइन आता था कपड़ों का स्टोर तक पहुंचने में 6 महीने लगते थे। लेकिन ज़ारा ने यह पूरा सिस्टम बदल दिया। अमांसियों ने एक ऐसा मॉडल बनाया जहां एक नया डिज़ाइन सिर्फ 15 दिनों में स्टोर तक पहुंच सकता था। अब साल में 52 माइक्रो सीजंस इंट्रोड्यूस किए गए। जिसका मतलब कि हर हफ्ते कपड़ों की नई
(02:08) कलेक्शन आएगी। कस्टमर्स जब भी स्टोर में आए उन्हें कुछ ना कुछ नया मिले जिससे कि एक अर्जेंसी बनती थी कि अगर अभी नहीं खरीदा तो अगले हफ्ते तक कपड़ों का यह डिज़ाइन गायब हो जाएगा। जाहिर सी बात है ऐसा करने से सेल्स बढ़ी। लोग और कपड़े खरीदने लगे और इस मॉडल के चलते ज़ारा दुनिया का सबसे बड़ा फैशन ब्रांड बन गया। [संगीत] बाद में ऐसी [गला साफ़ करने की आवाज़] कई कपड़ों की कंपनीज़ आई। HN Parkar fएवर 21 सब ने इस मॉडल को कॉपी किया और इसे नाम दिया गया फास्ट फैशन। कांसेप्ट बड़ा सिंपल था। करंट ट्रेंड्स के हिसाब से जल्दी से जल्दी बल्क में सस्ते
(02:43) कपड़े बनाना। लेकिन ये तो बस शुरुआत थी। असली गेम चेंजर बनी चाइना की शीन कंपनी। शीन श आई से शन इट्स श शन एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करती है जो रोजाना लाखों इमेजेस वीडियोस और सर्चेस के आधार पर ऑलमोस्ट रियल टाइम में बताता है कि कौन सा डिज़ हिट या फ्लॉप होगा और उसी के हिसाब से ऑर्डर्स दिए जाते हैं। टेक्नोलॉजी के इस इस्तेमाल से शीन ने फास्ट फैशन को अल्ट्रास्ट फैशन बना दिया। इस कंपनी में कपड़ों को डिज़ से लेकर रेडी टू सेल तक पहुंचने में सिर्फ 3 दिन का समय लगता है। और हर दिन यहां 2000 से लेकर 10,000 नए स्टाइल्स ऐड किए जाते हैं।
(03:20) जितने कपड़ों के नए डिज़ ज़ारा एक साल में ल्च करता है, शीन उतने एक हफ्ते में कर देता है। इसका नतीजा यह कि आज ग्लोबली हर साल 100 अरब से लेकर 150 अरब कपड़े बनते हैं। यह नंबर इतना बड़ा है कि साल में दुनिया के हर इंसान के लिए लगभग 14 कपड़े बनते हैं। व्हाट? इसका मतलब समझ रहे हो? मैंने पिछले 10 सालों में 14 टीशर्ट्स नहीं पहनी होंगी। लेकिन दुनिया में सप्लाई इतनी ज्यादा है कपड़ों की कि हर एक इंसान दुनिया का साल में 14 नए कपड़े पहन सकता है। वी आर सोसाइटी दैट लाइक्स टू शॉप। आई हैव ए प्रॉब्लम। ओ माय गणेश सो मच। आज टोटल दुनिया में इतने कपड़े हैं कि
(04:00) अगली छह पीढ़ियों तक के लिए ये काफी हैं। लेकिन जानते हो कितनी बार ये कपड़े पहने जाते हैं। ऑन एवरेज एक कपड़ा सिर्फ 7 से 10 बार पहना जाता है और फिर फेंक दिया जाता है। यहां सिर्फ अमेरिका जैसे देशों की बात नहीं हो रही है। इंडिया में भी 41% कपड़े सिर्फ एक से दो बार इस्तेमाल करने के [संगीत] बाद फेंक दिए जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यहां पर यह है कि क्या लोग अपनी मर्जी से ये कर रहे हैं या फिर उनसे ये करवाया जा रहा है। फास्ट फैशन कंपनीज़ ने साइकोलॉजी का इस्तेमाल करके शॉपिंग करने को एक एडिक्शन बना दिया है। सबसे पहले है फोमो यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट।
(04:35) लोगों के मन में परसेप्शन पैदा किया जाता है कि अगर वो हर माइक्रो सीजन कुछ नया खरीदेंगे नहीं [संगीत] तो वो ट्रेंड का हिस्सा नहीं बनेंगे और मिस आउट कर देंगे। एंड माय बॉक्स। फिर आता है डोपामिन फैक्टर। जब [संगीत] आप ऑनलाइन कुछ ऐसा देखते हो जो आपको पसंद आए तो ब्रेन में डोपामिन रिलीज होता है। यह एक्सजेक्टली वही मैकेनिज्म है जो गैंबलिंग, सोशल [संगीत] मीडिया और ड्रग्स एडिक्शन में काम करता है। अकॉर्डिंग टू एनालिसिस प्रोवाइडेड बाय द फेशियल ट्रैंकिंग [हंसी] कंपनी इनो शी इज ऑन अ शॉपिंग हाई। जब हमें कोई चीज सस्ते में मिल जाती है तो इससे और भी ज्यादा
(05:08) प्लेजर मिलता है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की साइकेट्रिस्ट एनल एमकी के मुताबिक इंटरनेट ने शॉपिंग जैसी सिंपल चीज को एक ड्रग की तरह बना दिया है। जो ड्रग्स और अल्कोहल जैसे ही रिवॉर्ड पाथवेज [संगीत] एक्टिवेट करती है हमारे दिमाग में। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और एड्स पर पैसा फेंक कर एक ऐसा कल्चर बना दिया जाता है जो ओवर कंसम्पशन को सेलिब्रेट करता है। TikTok पर #शटैग शीन के 25 बिलियन व्यूज हैं। हॉल वीडियोस करके एक नई कैटेगरी बना दी गई है जिनमें इन्फ्लुएंसर्स कैमरे के सामने बैठकर 10-15 कपड़े अनबॉक्स करते हैं और पहन कर दिखाते हैं। और इस स्टाइल के
(05:41) वीडियोस ऑर्गेनिक नहीं है। शीन जैसी कंपनीज़ छोटे-छोटे इन्फ्लुएंसर्स को फ्री कपड़े भेजती हैं और कहती [संगीत] है बदले में हॉल कंटेंट बनाओ। इन्फ्लुएंसर्स को लगता है क्या फर्क पड़ रहा है? इतना आसान वीडियो बस कपड़े पहनते हुए वीडियो बनाना है। बदले में फ्री कपड़े मिल रहे हैं। इससे अच्छी ओपोरर्चुनिटी क्या होगी? लेकिन ऐसे हजारों लाखों वीडियोस के थ्रू ओवर कंजमशन को ग्लैमराइज किया जाता है। आज के दिन अकेले इंडिया में 72% जेंजी शॉपर्स क्रिएटर से शॉपिंग इंस्पिरेशन लेते हैं। और इस कल्चर की सबसे टॉक्सिक चीज यह है कि दोबारा सेम कपड़े पहनने को शेम की नजर से
(06:13) देखा जाता है। बेइज्जती की नजर से देखा जाता है। ब्रिटेन में तीन में से एक यंग महिला कपड़ों को एक या दो बार पहनने के बाद पुराना मान लेती है और हर सात में से एक लड़की का मानना है कि सेम आउटफिट में दोबारा फोटो खिंचवाना एक शर्म की बात है। यह मेंटालिटी सोशल मीडिया पर पूरी तरीके से नॉर्मलाइज हो चुकी है कि मैंने इस आउटफिट में एक पोस्ट कर दिया। अब दोबारा [संगीत] से रिपीट नहीं किया जाना चाहिए। और यह कल्चर अपने आप नहीं बना है। बार-बार पैसे फेंक-फेंक कर बनाया गया है। सन 1932 की किताब कंज्यूमर इंजीनियरिंग जो कि अमेरिका के काफी जानेमाने एडवरटाइजर्स ने
(06:46) लिखी थी। इसमें आर्टिफिशियल ऑब्सोलेंस की बात करी गई है कि कैसे चीजों के पुराना होने से पहले ही नई चीजें कंज्यूमर्स को बेची जा सके। आप पिछले साल का हैंडबैग क्यों इस्तेमाल करना चाहोगे? जब इस साल [संगीत] का हैंडबैग दिखने में ज्यादा आकर्षित है। लोगों को आकर्षित करने के लिए पूरी की पूरी फैशन मैगजीनंस बनाई गई जिसमें सेलिब्रिटीज हर महीने नए कपड़े पहनते हुए दिखे। लोगों के मन में धीरे-धीरे ये परसेप्शन बनाया गया कि सेम कपड़े पहनना बुरी चीज है। नए ट्रेंड्स आ रहे हैं। ट्रेंड से कीप अप करो। जो कपड़े पहनने का स्टाइल ट्रेंड में है सिर्फ वही
(07:19) कपड़े पहनो। इस चीज को लेकर पूरी की पूरी इंडस्ट्रीज खड़ी हो गई है। आज के दिन लोग एडवाइस देते फिरते हैं कि आज 2026 में गर्मियों का यह ट्रेंड चल रहा है। 2026 की सर्दियों का यह ट्रेंड होगा। एक इन्फ्लुएंसरर ने तो लिटरली अपने इस आर्टिकल में सच बताया कि कैसे मुझे हर पोस्ट के लिए नए कपड़े पहनने के लिए पैसे मिलते हैं तो मैं क्यों सेम कपड़े पहनूं। इस पूरे कल्चर को बनाया और बढ़ावा दिया गया इन कंपनीज़ के द्वारा। ठीक वैसे ही जैसे डायमंड्स के साथ किया गया था। अगर आपको मेरा डायमंड्स वाला वीडियो याद हो तो ये जो डायमंड्स आर फॉर एवर की लाइन है
(07:50) अक्सर कही जाती है ना कि डायमंड्स तो हमेशा के लिए होते हैं। डायमंड्स [संगीत] आर फॉर एवर ये पूरी की पूरी चीज एक मार्केटिंग कैंपेन थी डायमंड कंपनीज के द्वारा। लोगों को ऐसा दिखाया गया कि देखो अगर आपकी एंगेजमेंट हो रही है तो आप एक डायमंड रिंग गिफ्ट करो। सेलिब्रिटीज को पैसे देकर, मैगजीनंस में छाप कर, न्यूज़ के थ्रू यह मैसेज पहुंचा कर। अगर उस वाले चीज के बारे में डिटेल में जानना चाहते हो तो डायमंड वाला वीडियो देखना। लेकिन बात यह है दोस्तों कि फास्ट फैशन इंडस्ट्री में भी यही चीज हुई और इसी की वजह से आज लोग अपनी जरूरत से ज्यादा
(08:20) कपड़े खरीद रहे हैं। लेकिन इसका नुकसान सिर्फ आपकी जेब पर नहीं बल्कि आपकी हेल्थ पर भी हो रहा है। आज के दिन 60% कपड़े प्लास्टिक से बने होते हैं। [संगीत] पॉलीएस्टर, नायलॉन, एक्रेलिक यह सारी चीजें प्लास्टिक हैं। और जब आप ऐसे कपड़ों को वाशिंग मशीन में धोते हो तो एक सिंगल वॉश में 70 लाख से लेकर 60 लाख तक माइक्रो फाइबर्स निकलते हैं इन प्लास्टिक के जिन्हें माइक्रो प्लास्टिक कहा जाता है। ये प्लास्टिक के बहुत छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं। 5 मिलीमीटर से भी छोटे। तो एक चीज तो पक्की है कि आपको इन प्लास्टिक वाले मटेरियल से दूर रहना
(08:57) चाहिए। इनके कपड़े नहीं खरीदने चाहिए। लेकिन सवाल फिर यह है कि कौन सा मटेरियल बेस्ट होता है कपड़ों का। एग्जैक्टली इसी सवाल का जवाब देने के लिए मैंने यह फ्री पीडीएफ गाइड बनाई है आप सभी लोगों के लिए दोस्तों जिसमें 28 कपड़ों के मटेरियल को रैंक किया गया है। इन सबको एनवायरमेंट और हेल्थ के पर्सपेक्टिव से स्कोर किया गया है ताकि आप आसानी से जान पाओ कि कौन से मटेरियल के क्या फायदे और क्या नुकसान है। प्लस इसी फैब्रिक स्कोर कार्ड की गाइड में मैंने बताया है कि कौन से सिंबल्स का आपको ध्यान रखना है कपड़े खरीदते वक्त। कौन से
(09:24) मार्क्स एक्चुअली में क्वालिटी दिखाते हैं और कौन सी बस मार्केटिंग टर्म्स है। तो ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं। 100% फ्री टू डाउनलोड है। इंग्लिश हिंदी दोनों में अवेलेबल है। इसका लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन में और पिंड कमेंट में आपको मिल जाएगा। अब आइए थोड़ा माइक्रोप्लास्टिक्स के बारे में और गहराई से जानते हैं। यह इतने छोटे होते हैं कि वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स भी इन्हें फिल्टर नहीं कर पाते और यह सीधे हमारी नदियों में और समुद्र में चले जाते हैं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर की एक स्टडी के मुताबिक ये प्लास्टिक के
(09:51) बने कपड़े [संगीत] माइक्रोप्लास्टिक पोल्यूशन का सबसे बड़ा सोर्स है। लगभग 35% पोलशन के लिए यही जिम्मेदार है। और केवल ल्ड्री से लगभग 5 लाख टन माइक्रोप्लास्टिक फाइबर्स हर साल ओशन में जाते हैं। यह नंबर जानते हो कितना बड़ा है? यह 3 अरब [संगीत] पॉलीएस्टर शर्ट्स या 50 अरब प्लास्टिक बॉटल्स के बराबर है। यह माइक्रोप्लास्टिक सिर्फ समुद्र में नहीं रहते। साइंटिस्ट ने इन्हें ह्यूमन लंग टिश्यू, खून, लिवर, किडनी, [संगीत] पेट, ह्यूमन ब्रेस्ट मिल्क और अनबर्न बेबीज की प्लेसेंटा तक में पाया है। यानी इस फास्ट फैशन इंडस्ट्री की वजह
(10:26) से आपके खून तक में प्लास्टिक पहुंच गया है। आपके अंदर जाकर यह माइक्रोप्लास्टिक्स, ऑक्सीडेटिव डैमेज, डीएनए डैमेज और जींस में बदलाव ला सकते हैं। और हालांकि इस पर ज्यादा रिसर्च नहीं करी गई है, लेकिन इनका कैंसर से भी लिंक पाया गया है। और ऐसा नहीं है कि सिर्फ पॉलीएस्टर या प्लास्टिक के बने कपड़ों से एनवायरमेंटल डैमेज होता है। सेंट्रल एशिया में उज़्बेकिस्तान और कजाकिस्तान के देशों के बीच मौजूद है एररल सी जो कभी दुनिया की चौथी सबसे बड़ी लेक हुआ करती थी। यहां मछलियों की 24 स्पीशीज थी। थ्राइविंग फिशिंग कम्युनिटीज थी। हरेभरे जंगल थे।
(11:00) लेकिन आज ये जगह एक रेगिस्तान है। यहां से कार्सिनोजेनिक डस्ट उड़कर गांव में पहुंचती है। थ्रोट कैंसर और ट्यूबरक्लोसिस फैलाती है। और इस सब के पीछे कारण है कॉटन। एररल सी का सारा पानी उज़्बेकिस्तान की कॉटन फार्मिंग के लिए डायवर्ट कर दिया गया। जिसके कारण आज ये जगह रेगिस्तान बन चुकी है। आप सोचोगे लेकिन इतना पानी क्या सही में इतने पानी की जरूरत है कॉटन फार्मिंग के लिए? दोस्तों एक सिंगल कॉटन टीशर्ट बनाने में 2700 लीटर पानी खर्च होता है जो एक इंसान की ढाई साल की ड्रिंकिंग वाटर की जरूरत पूरी कर सकता है। एक पेअर ऑफ जींस बनाने में लगभग 7500 लीटर
(11:41) पानी लगता है जो एक इंसान की 7 साल तक की जरूरत के लिए काफी है और जो पानी इस्तेमाल होता है वो वापस नदियों में जहर बनके लौटता है पेस्टिसाइड्स और इंडस्ट्रियल पोल्यूशन की वजह से। क्या आप जानते हो दुनिया का 20% ग्लोबल इंडस्ट्रियल वाटर पोल्यूशन सिर्फ फैशन इंडस्ट्री से आता है। तमिलनाडु का तिरुपुर शहर इंडिया का सबसे बड़ा रेडीमेड गारमेंट एक्सपोर्ट सेंटर है। लेकिन इसकी कीमत यहां इस शहर में पानी का लेवल हर साल 15 मीटर गिर रहा है। नोयल नदी है जो कभी साफ पानी का सोर्स हुआ करती थी। आज टॉक्सिक सीवर बन गई है क्योंकि कपड़ों की फैक्ट्री सालों से करोड़ों लीटर्स
(12:16) वेस्ट वाटर सीधे इस नदी में रिलीज़ कर रही है। इस टॉक्सिक वेस्ट वाटर की वजह से नदी के 2 कि.मी. के दायरे में जमीन बंजर हो गई है और ग्राउंड वाटर भी कंटैमिनेट हो चुका है। साल 2011 में मद्रास हाईकोर्ट ने इन फैक्ट्रीज को बंद करने का आदेश दिया था। लेकिन लोकल लोगों का कहना है कि यह फैक्ट्रीज [संगीत] अभी भी रात में या बारिश के दौरान केमिकल वेस्ट नदी में बहाती हैं। और तिरुपुर अकेला नहीं है। दिल्ली के पास यमुना नदी में जो पिंक केमिकल फॉर्म दिखता है वो टेक्सटाइल वेस्ट वाटर के फास्फेट्स की वजह से है। मुंबई के पास वाल धुनी नदी टेक्सटाइल डाइस की वेस्ट
(12:48) की वजह से लाल रंग की हो जाती है। और फास्ट फैशन का असर केवल वाटर पोल्यूशन तक सीमित नहीं है। फैशन इंडस्ट्री ग्लोबल कार्बन एमिशंस का 8 से 10% प्रोड्यूस करती है। अमाउंट ऑफ़ वेस्टर्न एंड द प्रोपोशन [संगीत] ऑफ़ कार्बन पोलशन दैट कम्स फ्रॉम द फैशन इंडस्ट्री इट्स अबाउट 10%। नंबर इंटरनेशनल फ्लाइट्स और मैरिटाइम शिपिंग से भी बड़ा है। एनवायरमेंटल ऑर्गेनाइजेशन स्टैंड अर्थ के मुताबिक आज के दिन अकेली ये शीन कंपनी हर साल लगभग लेबनॉन देश जितना कार्बन पोल्यूशन एमिट कर रही है। सोच कर देखो एक अकेली कंपनी की वजह से उतना ही कार्बन एमिशन हो रहा है
(13:22) जितना एक पूरे [संगीत] देश की वजह से हो रहा है। और अभी तक तो मैंने सिर्फ कपड़े बनाने की वजह से हो रहे नुकसान की बात करी है। उसके बाद क्या? उन कपड़ों का क्या जिन्हें वेस्ट में डंप कर दिया जाता है। आइए वापस आते हैं अपने एटकामा रेगिस्तान पर जिसकी मैंने वीडियो के शुरू में बात करी थी। जहां वेस्ट कपड़ों के पहाड़ मिलते हैं। दुनिया में यूज़्ड और ना बिकने वाले कपड़ों से हर साल 9.
(13:44) 2 करोड़ टन टेक्सटाइल वेस्ट पैदा होता है। यह हर सेकंड एक ट्रक भरे वेस्ट के बराबर है। इमेजिन करो आपकी सड़क के सामने हर सेकंड एक ट्रक आ रहा है और ट्रक भरा वेस्ट वहां डंप करके जा रहा है। हर सेकंड। इस सारे वेस्ट का 87% या तो लैंडफिल में जाता है या जला दिया जाता है। सिर्फ 12% रिसाइकल होता है और वो भी ज्यादातर इंसुलेशन या रैक्स जैसे लो ग्रेड यूजज़ के लिए। 1% से भी कम पुराने कपड़ों के वेस्ट से नए कपड़े एक्चुअली में बनाए जाते हैं। बहुत से कपड़े सेकंड हैंड यूज़ के नाम पर गरीब देशों में भेज दिए जाते हैं। जैसे चिली के एटकामा डेजर्ट में लेकिन वहां भी कोई पहनने वाला नहीं होता।
(14:20) सप्लाई इतनी ज्यादा है वेस्ट की कि उसे डंप कर दिया जाता है रेगिस्तान में। हर साल लगभग 39,000 टन कपड़े इस रेगिस्तान में डंप किए जाते हैं। इन कपड़ों के सिंथेटिक मटेरियल्स 200 साल तक डीकंपोज नहीं होंगे और जब इन पर आग लगाई जाएगी तो यहां से टॉक्सिक धुआं निकलेगा जो लोगों को बेहद बीमार कर सकता है। ऐसी ही एक लोकेशन है अफ्रीका में घाना का देश जहां सेकंड हैंड कपड़ों को ओबरोनी बाबू कहा जाता है। इसका मतलब है डेड वाइट मैनस क्लोथ्स यानी मरे हुए गोरे आदमियों के कपड़े। इनाम इसलिए पड़ा क्योंकि घाना के लोगों को समझ नहीं आता कि कोई इतने सारे कपड़े आखिर
(14:56) क्यों फेंकेगा जब तक वह मर ना गया हो। घाना की राजधानी अकरा में एक मार्केट है कांटामांडो जो सेकंड हैंड कपड़ों के दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है। इस मार्केट में हर हफ्ते डेढ़ करोड़ कपड़े आते हैं। लेकिन लगभग 40% कपड़े इतनी पुअर क्वालिटी के होते हैं कि पहनने लायक ही नहीं होते और वह सीधे पहुंचते हैं अकरा के चोरकोर बीच पर। यहां पर इन कपड़ों की एक 6 फीट ऊंची लेयर बन गई है जो इतनी सॉलिड है कि इस पर झोपड़ियां बनी है जिनमें हजारों लोग रहते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि इस वेस्ट में 89% मटेरियल सिंथेटिक फाइबर से बना है यानी प्लास्टिक
(15:33) से। इसका मतलब यह सैकड़ों सालों तक डीकंपोज नहीं होने वाला। घाना की ही तरह कंबोडिया में तो नाइकी, Ralfa, Nex जैसे लीडिंग ब्रांड्स का इतना वेस्ट है कि इसे जलाकर इससे ईंट के भट्टे चलाए जाते हैं। इंडिया में भी वेस्टर्न कंट्रीज से शिपिंग कंटेनर्स में सेकंड हैंड कपड़े आते हैं। जिनमें से कुछ इस्तेमाल होते हैं और बाकी डंप कर दिए जाते हैं। तो सोच कर देखना, अगली बार आप किसी दुकान में जाओ और ₹300 की टीशर्ट खरीदने चलो। ध्यान रखना कि उसकी असली कीमत क्या [संगीत] है? उस टीशर्ट के लिए कितनी नदियों को सीवर में बदल दिया गया है। रेगिस्तानों में कपड़ों के पहाड़
(16:06) बन गए हैं और एनवायरमेंट को इतना नुकसान पहुंचाया गया है कि यूनाइटेड नेशंस तक ने फास्ट फैशन को एनवायरमेंटल और सोशल इमरजेंसी बता दिया है। अच्छी खबर यहां पर यह है कि दुनिया के कुछ देशों ने इस प्रॉब्लम को सीरियसली लेना शुरू कर दिया है। फ्रांस ने पिछले साल दुनिया का पहला एंटीस्ट फैशन लॉ पास किया। इस लॉ में इकोलॉजिकल स्कोर के हिसाब से फास्ट फैशन प्रोडक्ट्स पर 5 पर आइटम का सरचार्ज लगता है। यूरोपियन यूनियन ने भी अनसोल्ड कपड़े डिस्ट्रॉय करने पर बैन लगा दिया है। क्योंकि कई सारी ये कपड़ों की कंपनीज़ क्या करती हैं? जानबूझकर अपने अनसोल्ड कपड़ों
(16:40) को डिस्ट्रॉय कर देती हैं। ताकि लोगों के मन में फोमो बना रहे कि अभी नहीं खरीदे तो ये कपड़े दोबारा नहीं मिलेंगे और दोबारा क्यों नहीं मिलेंगे? इसलिए नहीं कि बाकी लोगों ने खरीद लेंगे बल्कि इसलिए कि यह कंपनीज़ खुद ही अपने अनसोल्ड कपड़ों को डिस्ट्रॉय कर देंगी। इसके साथ ही दोस्तों यूरोपियन यूनियन में आने वाले सालों में डिजिटल प्रोडक्ट पासपोर्ट लाने [संगीत] की तैयारी की जा रही है। जिसमें हर कपड़े के साथ उसकी कंप्लीट एनवायरमेंटल हिस्ट्री होगी कि ये कपड़ा कहां बना है? उसमें कैसे मटेरियल का इस्तेमाल किया गया है। एनवायरमेंट पर उसका क्या इंपैक्ट होगा? ये
(17:10) सारी चीजें एक जगह पर मिल जाएंगी। ईयू में अगले साल से 2027 से यह कानून लागू हो जाएगा। लेकिन इंडिविजुअल लेवल पर हमें सरकार के एक्शन लेने की वेट करने की जरूरत नहीं है। कई सारी चीजें हैं जो हम खुद से कर सकते हैं अभी से। सबसे पहली और सबसे सिंपल चीज कपड़े सिर्फ तब खरीदो जब आपको जरूरत हो। यह सुनने में ऑब्वियस लगता है लेकिन अगर आप ऑनेस्टली सोचोगे तो आपकी पिछली 10 परचेजेस में से कितनी एक्चुअल चीजें आपने ऐसी खरीदी हैं जिसकी आपको जरूरत सही में थी और कितनी ऐसी चीजें आपने खरीदी जो इंपल्स बाय थी। इसके लिए एक सिंपल 30 वेयर्स टेस्ट रूल होता है,
(17:44) [संगीत] जो आप फॉलो कर सकते हो कि कोई भी कपड़ा खरीदने से पहले आप अपने आप से पूछो कि क्या मैं इस कपड़े को कम से कम 30 बार पहनूंगा। अगर आपके मन में फीलिंग आए कि नहीं यार मैं इसे इतना नहीं पहनूंगा तो खरीदने की कोई जरूरत नहीं है। दूसरा आउटफिट रिपीटिंग को नॉर्मलाइज़ करो। यह आईडिया कि सेम कपड़े दोबारा नहीं पहन सकते। यह पूरी तरीके से मैन्युफैक्चरर्ड आईडिया है। इसे Instagram और TikTok ने बनाया है और फास्ट फैशन कंपनीज़ ने इन्फ्लुएंसर्स और सेलिब्रिटीज के जरिए फंड किया है। असल जिंदगी में किसी को फर्क नहीं पड़ता कि आप सेम कपड़े दोबारा पहन
(18:15) रहे हो या नहीं। हां, यह बात सच है कि कुछ लोग इंटरनेट पर मेरा मजाक बनाते हैं कि देखो मैं बार-बार सेम टीशर्ट्स पहनते रहता हूं। लेकिन इससे फर्क नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि मुझे पता है कि मैं सही चीज कर रहा हूं। आप मेरे 5 छ साल पुराने वॉग्स उठाकर देखोगे। कोई भी पुराने वीडियोस उठा के देखोगे आपको दिखेगा कि मैं हमेशा सेम टीशर्ट्स पहन रहा हूं। क्योंकि मैं यह टीशर्ट्स तब तक इस्तेमाल करते रहता हूं जब तक यह पूरी तरीके से फट नहीं जाती। इसलिए मेरे वार्ड्रोब में अभी भी कई सारे ऐसे कपड़े हैं जो 12 से 15 साल पुराने हैं और मैं अभी भी उन्हें पहनता हूं। तीसरा जो
(18:45) कपड़े खरीद रहे हो उन्हें अच्छे से खरीदो। उनकी केयर करो। अच्छे से धो रिपेयर करो और लंबे समय तक चलाओ। कोई फटा हुआ बटन, छोटी स्टिचिंग या लूज फिटिंग किसी कपड़े का अंत नहीं होता। लोकल टेलर के पास जाकर उसे रिपेयर करवाओ। और एक और बहुत बड़ा मिसकंसेप्शन लोगों का रहता है कि एक बार कपड़े पहन लिए तो उन्हें धोना ही पड़ेगा। जींस, शर्ट्स और जैकेट्स को हर यूज़ के बाद धोने की जरूरत नहीं होती। साफ मौसम में ज्यादा धूल मिट्टी नहीं है तो एक जींस को आराम से पूरे एक हफ्ते तक पहना जा सकता है बिना धोए। जरूरत के अनुसार कपड़ों को धोना चाहिए। अब बेस्ट मटेरियल कौन सा होता
(19:19) है यहां पर कपड़ों का जिसके कपड़े आपको खरीदने चाहिए। इसको लेकर मैं थोड़ा एडवाइस देना चाहूंगा क्योंकि एक तरफ है यह सारे फॉसिल फ्यूज से बने कपड़े, प्लास्टिक से बने कपड़े। इसमें पॉलीएस्टर आता है, एक्रेलिक आता है, नायलॉन आता है। इन सब से माइक्रोप्लास्टिक्स [संगीत] रिलीज होते हैं। और माइक्रोप्लास्टिक्स कितने हानिकारक हैं, कितना पोल्यूशन फैला रहे हैं एनवायरमेंट में उसके बारे में मैंने आपको बताया ही है। लेकिन दूसरी तरफ है कॉटन और कॉटन भी जैसा आपने देखा बहुत ज्यादा पानी कंज्यूम करता है और टॉक्सिक वेस्ट उसका भी नदियों को पोल्यूट कर रहा
(19:49) है। तो सवाल यह है कौन सा मटेरियल बेस्ट है यहां पर। मैं अलग-अलग टियर्स में रैंक करता हूं। सबसे पहले है टिएर सी जो सबसे बेकार है। इसमें आपके सारे प्लास्टिक मटेरियल्स आ गए हैं। फिर आता है टिएर बी जिसमें मैं कॉटन को प्लेस करूंगा। टियर बी में आप रिसाइकल्ड पॉलीएस्टर को भी डाल सकते हो क्योंकि रिसाइकल्ड पॉलीस्टर के कपड़े थोड़े से बेहतर हैं यूज करने क्योंकि उनको बनाने में उतना फॉसिल फ्यूल डायरेक्टली यूज़ नहीं हो रहा है जो ओरिजिनल प्लास्टिक को बनाने में हो रहा है। इसके अलावा ट्रेडिशनल विस्कोस का मटेरियल भी इसी कैटेगरी में आएगा क्योंकि
(20:17) इसे बनाने के लिए [संगीत] जंगल काटे जाते हैं। पुराने-पुराने रेनफॉरेस्ट काटे जाते हैं। फिर आता है टियर ए जो कि एक्चुअली में अच्छी कैटेगरी है। इसमें है ऑर्गेनिक कॉटन। अब नॉर्मल कॉटन से तो बहुत पोलशन फैलता है लेकिन ऑर्गेनिक कॉटन में वो पेस्टिसाइड्स नहीं इस्तेमाल किए जाते। वो टॉक्सिक फर्टिलाइज़र्स नहीं इस्तेमाल किए जाते तो ऑर्गेनिक कॉटन काफी बेहतर है। इसी तरीके से इसमें आएगा ऑर्गेनिक वूल और ऑर्गेनिक सिल्क के कपड़े। इवन अलपका जो लामा साउथ अमेरिका में मिलती हैं। इनकी वूल से बने कपड़े भी काफी एनवायरमेंट फ्रेंडली होते हैं। इसी कैटेगरी में एक और
(20:48) पॉपुलर मटेरियल आएगा लाइकोसेल जिसे टेंसिल भी कहा जाता है। टेंसिल वुड पल्प से बनता है और वेस्ट बहुत कम रिलीज करता है। लेकिन इन सारे मटेरियल्स के भी ऊपर है टियर एस की कैटेगरी जिसमें आते हैं रिसाइकल्ड कॉटन या रिसाइक्ड वूल। क्योंकि रिसाइक्लिंग के केस में आपको फार्मिंग करने की जरूरत नहीं। नहीं तो वो जो वाटर कंजमशन था और वेस्ट वाटर था वो इस केस में एलिमिनेट हो जाता है। लेकिन इसके अलावा दो और मटेरियल्स हैं जो इस कैटेगरी में आते हैं। [संगीत] पहला ऑर्गेनिक लिनन। लिनन को बनाने में पूरा प्लांट यूज़ होता है। ज्यादा पानी नहीं लगता। बड़ी ही आसानी से
(21:19) बायोडिग्रेड हो जाता है। और इसके भी ऊपर है ऑर्गेनिक हेम। हेम की खास बात यह है कि इसको बनाने में ऑलमोस्ट नेगिजिबल पानी यूज होता है। ना ही पेस्टिसाइड की जरूरत होती है। यह मिट्टी को भी रीजनरेट करता है। बड़ा ही ड्यूरेबल मटेरियल है और बायोडिग्रेडेबल भी है। ऊपर से इसको उगाते वक्त पर एकड़ इसकी यील्ड बहुत ज्यादा है। तो इससे बनाए हुए कपड़े बहुत कम जमीन [संगीत] को यूज़ करते हैं। ऑलमोस्ट हर क्राइटेरिया से देखा जाए तो यह बेस्ट मटेरियल है कपड़ों के लिए। लेकिन दिक्कत बस यह है कि यह इंडिया में आसानी से मिलता नहीं है। अब आप जानना चाहते हो कौन से
(21:49) मटेरियल्स आसानी से मिलते हैं लेकिन एनवायरमेंट और हेल्थ के लिए भी अच्छे होते हैं तो यह फैब्रिक स्कोर कार्ड की फ्री पीडीएफ गाइड नीचे डाउनलोड कर सकते हो। लिंक नीचे पिंड कमेंट में दिया है और इस गाइड को अपने परिवार वालों के साथ और दोस्तों के साथ भी शेयर करना। इसमें बड़े इन डेप्थ तरीके से समझाया है कि कौन सा मटेरियल कितना अच्छा है, कितना बुरा है। अलग-अलग क्राइटेरिया से यहां पर अगर जज किया जाए तो। मैं बस चाहता हूं कि आप इन सब चीजों को याद रखो अगली बार कपड़े खरीदते वक्त। याद रखो कि हम 3 करोड़ से ज्यादा लोग हैं इस चैनल से जुड़े हुए। अगर
(22:18) हम सब कलेक्टिवली मिलकर इन सारी छोटी-छोटी चीजों को इंप्लीमेंट करने लग गए तो उसका सोच कर देखो कितना बड़ा इंपैक्ट पड़ेगा धरती पर इस एनवायरमेंटल पोल्यूशन पर और पर सभी लोगों पर। हम साथ में मिलकर ये साइकोलॉजी बदल सकते हैं। इन फैशन ट्रेंड्स को खत्म कर सकते हैं और लोगों को सही राह पर ले जा सकते हैं। यह वीडियो पसंद आया तो यह वाला भी जरूर देखना। बहुत-बहुत धन्यवाद। [संगीत]
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