Size Is Not What You Think… 🧠
Author Name:10XT TV
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Transcript:
(00:00) तुमने कभी सोचा है [संगीत] कि नेचर ने आदमी के शरीर में सबसे सेंसिटिव और इंपॉर्टेंट पार्ट बॉडी के [संगीत] बाहर क्यों रखा है? और वह भी एक नहीं। दो है ना थोड़ा अजीब क्योंकि लॉजिकली तो अंदर [संगीत] होना चाहिए था। सेफ भी रहता सिक्योर भी। फिर बाहर क्यों? असल में कहानी यहां से शुरू होती [संगीत] है कि हमारा बॉडी हर जगह परफेक्ट नहीं होता। वो कॉम्प्रोमाइज करता है। जहां जो जरूरी है उसके [संगीत] हिसाब से डिजाइन बनाता है। तुम्हारे बॉडी का नॉर्मल टेंपरेचर लगभग 37 [संगीत] डिग्री सेल्सियस होता है। लेकिन स्पर्म बनने की जो प्रोसेस है [संगीत] उसे
(00:39) इतने टेंपरेचर पर काम करना पसंद नहीं है। उसे चाहिए थोड़ा कम टेंपरेचर लगभग 2 [संगीत] से 3 डिग्री सेल्सियस कम। अब अगर यह प्रोसेस बॉडी के अंदर [संगीत] होती तो हीट ज्यादा होती और स्पर्म की क्वालिटी खराब हो जाती। इसलिए नेचर ने एक अलग [संगीत] सेटअप बनाया टेस्टिकल्स को बॉडी से बाहर रखा। एक पाउच में जिसे स्क्रोटम कहते हैं ताकि टेंपरेचर कंट्रोल हो सके। ठंड में यह सिकुड़ जाता है। बॉडी के पास आ जाता है। गर्मी में ढीला हो जाता है। [संगीत] थोड़ा दूर चला जाता है। मतलब एक नेचुरल टेंपरेचर कंट्रोल सिस्टम। [संगीत] अब यहां एक और सवाल आता है। एक से भी तो
(01:19) काम चल सकता था। फिर दो क्यों? यह वही लॉजिक है जो बॉडी हर जगह यूज करता है। रिडंडेंसी, [संगीत] बैकअप। अगर एक में प्रॉब्लम आ जाए तो दूसरा काम करें, प्रोडक्शन स्टेबल रहे, [संगीत] सर्वाइवल चांस बढ़े क्योंकि नेचर रिस्क नहीं लेता। अब यहां तक बात समझ में आती है लेकिन असली कंफ्यूजन तो दूसरे टॉपिक [संगीत] में आता है जिस पर हर लड़कों के ग्रुप में डिस्कशन होता है साइज बड़ा या छोटा और [संगीत] ऑनेस्टली है ना यह सवाल हर किसी के दिमाग में कभी ना कभी आता है क्योंकि बाहर जो दिखता है वो यही सिखाता है [संगीत] कि बड़ा मतलब बेहतर और
(01:57) यहीं से गलत समझ शुरू होती है। असल में बायोलॉजी क्या कहती है? यह बहुत कम [संगीत] लोग जानते हैं। फीमेल बॉडी में जो सबसे सेंसिटिव हिस्सा होता है, वह ज्यादातर अंदर गहराई में नहीं बल्कि शुरुआत के कुछ सेंटीमीटर [संगीत] में होता है। यानी सेंसेशन का मेन ज़ोन शुरुआत में ही है। पूरा स्ट्रक्चर डीप पेनिट्रेशन [संगीत] के लिए डिज़ नहीं है, बल्कि कंफर्ट और कोऑर्डिनेशन के लिए है। तो फिर यह साइज इतना [संगीत] बड़ा टॉपिक कैसे बन गया? यहां एंट्री होती है परसेप्शन की। तुम जो देखते हो वही मान लेते हो। [संगीत] मूवीस, कंटेंट, कंपैरिजन और धीरे-धीरे एक
(02:33) इल्लुजन [संगीत] बन जाता है कि सेटिस्फेक्शन का सीधा रिलेशन साइज से है। लेकिन रियल लाइफ में इक्वेशन अलग होती है। यह मैटर [संगीत] करता है कंफर्ट, टाइमिंग, अंडरस्टैंडिंग, कनेक्शन, बॉडी का नेचुरल रिस्पांस, [संगीत] कम्युनिकेशन और सबसे इंटरेस्टिंग बात यह चीजें दिखाई नहीं देती। इसलिए लोग इन पर बात नहीं करते लेकिन असर इन्हीं का सबसे ज्यादा होता है। [संगीत] अब जो 70% वुमेन बिग साइज चाहती हैं [संगीत] वाली बात है। यह ज्यादातर डाटा नहीं परसेप्शन है। कुछ प्रेफरेंसेस होती हैं। लेकिन वो यूनिवर्सल रूल नहीं [संगीत] है। हर बॉडी अलग है। हर कंफर्ट
(03:17) लेवल अलग है। तो असली सच क्या है? नेचर ने बॉडी को [संगीत] डिजाइन किया है फंक्शन के लिए। शो के लिए नहीं। रिप्रोडक्शन, सेफ्टी, बैलेंस [संगीत] यह प्रायोरिटी है ना कि कंपैरिजन। और अगर तुम ऑनेस्टली देखो तो इनसिक्योरिटी वहां से आती [संगीत] है जहां अंडरस्टैंडिंग नहीं होती। क्योंकि जितना तुम सरफेस देखते [संगीत] हो उतना ही कंफ्यूज्ड होते हो और जितना डीप समझते हो उतना सिंपल लगने लगता है। तो अगली बार जब यह सवाल दिमाग में आए [संगीत] कि बड़ा या छोटा क्या फर्क पड़ता है? तो खुद से पूछना क्या तुम बॉडी को समझ रहे हो या सिर्फ उसे कंपेयर कर रहे हो?
(03:58) [संगीत]
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