9 Dark Secrets Private Hospitals Hide From You (Must Watch) 🤫🚨
Author Name:Fit Tuber
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Transcript:
(00:00) और इन फ्रॉड्स का इजी टारगेट बनते हैं वह लोग जिनके पास इस वीडियो में मैं आपसे शेयर करना चाहता हूं कुछ ऐसे स्कैम्स जो खुलेआम हॉस्पिटल्स में हो रहे हैं और हमें इनका बिल्कुल पता नहीं चलता। एविडेंस के बेसिस पर बात करेंगे और यह भी डिस्कस करेंगे कि कैसे हम इन स्कैम्स से बचें। बहुत ही काम की होने वाली है यह वीडियो। आइए तो फिर बिना किसी देरी के शुरू करते हैं। हेलो फ्रेंड्स, वेलकम टू फिट Tuber। दोस्तों, नीति आयोग, सीसीआई और पार्लियामेंट्री कमिटी रिपोर्ट्स के हिसाब से बड़े से लेकर छोटे प्राइवेट हॉस्पिटल्स में प्रॉफिट्स को मैक्सिमाइज करने के लिए
(00:38) अनएथिकल प्रैक्टिससेस की जाती हैं। और इन फ्रॉड्स का इजी टारगेट बनते हैं वो लोग जिनके पास हेल्थ इंश्योरेंस होती है। क्योंकि जैसे ही आप हॉस्पिटल के रिसेप्शन पर बताते हो कि आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस है तो आप एक पेशेंट से एक वॉकिंग एटीएम बन जाते हो। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि बिल तो इंश्योरेंस कंपनी ने ही भरना है तो क्या दिक्कत है? लेकिन 2020 में हिमांशु सिंघल के इस रियल इंसिडेंट को सुनकर आप ऐसा नहीं कहेंगे। 5 फरवरी 2020 को हिमांशु अपने ढाई साल के बेटे सिद्धार्थ को शालीमार बाग के एक बड़े कॉर्पोरेट हॉस्पिटल में लेकर गए। बच्चे को हल्की लूज
(01:16) मोशंस की शिकायत थी। रूटीन कंडीशन में एडमिट हुआ। कोई इमरजेंसी सिचुएशन नहीं थी। जैसे ही हॉस्पिटल स्टाफ को पता चला कि हिमांशु की इंश्योरेंस पॉलिसी के थ्रू कैशलेस फैसिलिटी अवेलेबल है। उन्होंने हिमांशु के बच्चे को ऐसी मामूली सी प्रॉब्लम के लिए हॉस्पिटल में एडमिट करने के लिए प्रेशराइज किया। हिमांशु ने अपने बच्चे को एडमिट करने के लिए हां कर दिया और उसके बाद प्रोटोकॉल के नाम पे बच्चे को ज्यादा से ज्यादा टाइम कैसे हॉस्पिटल में रखा जाए इस पर प्लानिंग की गई। प्लानिंग करी कि किस तरह से बच्चे के स्टे को ज्यादा से ज्यादा प्रोलोंग किया जा
(01:50) सके। बच्चे को नेगिजेंटली दूर से देख के ही एक्यूट एनल फिशर है। ऐसा डायग्नोस कर दिया गया और उसे मूवी कोल जैसी कॉन्ट्रा इंडिकेटेड दवाई दे दी जो बच्चे को उस वक्त बिल्कुल भी नहीं देनी चाहिए थी। इन्होंने एक कॉन्ट्रा इंडिकेटेड दवाई जिसका नाम मूवी कोल है जो कि लूज मोशंस को बढ़ाने के लिए यूज करी जाती है वो प्रिस्राइब कर। मूवी कोल कब्ज को तोड़ने की स्ट्रांग मेडिसिन है और बच्चे को तो पहले से ही लूज मोशन थे। मेरे बच्चे को ओरल की जगह इंट्रावेनसली चढ़ा दिया डायरेक्टली ब्लड स्ट्रीम में। अब यह दवाई लेते ही बच्चा अनकंट्रोलेबबली
(02:29) यूरिन और स्टूल पास करने लगा। शाम को 6:00 बजे तक बच्चे की डिहाइड्रेशन से इतनी बुरी हालत हो गई कि उसका लिवर फेल होने लगा। उसके बाद हॉस्पिटल वालों ने हिमांशु को बच्चे का लिवर ट्रांसप्लांट करने के लिए प्रेशराइज किया। इस बीच ही 9 फरवरी को सुबह 9:30 बजे के आसपास बच्चे की और हद तो यह थी कि इसके बाद भी हॉस्पिटल का फोकस बिलिंग क्लीयरेंस पर था। इस इंसिडेंट के बाद हिमांशु ने रोते हुए एक ही बात कही थी कि अगर मेरे पास इंश्योरेंस ना होता तो शायद यह मेरे बच्चे को एडमिट ही नहीं करते और शायद मेरा बच्चा मेरे पास होता। दोस्तों, हेल्थ इंश्योरेंस के नाम पर पैसे
(03:05) एंठने का यह कोई इकलौता केस नहीं। डिसेंडिंग डायग्नोसिस बुक में 78 डॉक्टर्स ने इंटरव्यूज में एडमिट किया कि उन पर ऊपर से प्रेशर डाला जाता है कि वह इंश्योरेंस लिमिट देखकर ही टेस्ट्स लिखें ताकि हॉस्पिटल का टारगेट पूरा हो। सीसीआई ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा है कि बड़े हॉस्पिटल्स रूम रेंट और डायग्नोस्टिक टेस्ट्स की प्राइसेस इंश्योरेंस वाले पेशेंट्स के लिए बढ़ा देते हैं। इस स्कैम की वजह से कई बार हॉस्पिटल्स को ब्लैक लिस्ट भी किया जा चुका है। लेकिन फिर भी यह प्रैक्टिस आज भी कॉमनली हो रही है। इसलिए हॉस्पिटल में एंटर करते ही कभी मत
(03:37) बताएं कि आपके पास इंश्योरेंस है। पहले डॉक्टर से मिलें। डायग्नोसिस होने दें और ट्रीटमेंट का कैश एस्टीमेट मांगे। जब एस्टीिमेशन हाथ में आ जाए तभी अपनी इंश्योरेंस पॉलिसी डिस्क्लोज़ करें। इसी तरह का एक और स्कैम होता है जिसे कहते हैं एडमिशन स्कैम। यह डॉक्टर की क्लिप देखो जिन्होंने कॉर्पोरेट हॉस्पिटल्स के इस स्कैम की वजह से अपनी जॉब से पहले दिन ही रिजाइन करने का फैसला कर लिया। जो हॉस्पिटल की ओनर डॉक्टर थी जो कि फिजिशियन नहीं थी, गायनेकोलॉजिस्ट थी वो सारे पेशेंट्स खुद मैनेज करती थी। यानी कि वो डिसाइड करेंगी कि हर पेशेंट एडमिट होना
(04:11) है और वह डिसाइड करेंगी कि हर पेशेंट जो एडमिट हो रहा है उसको जितना हो सके आईसीयू में रखो और जितने दिन हो सके उतने दिन आईसीयू में रखो। इसी से रिलेटेड है वीकेंड ऑक्यूपेंसी स्कैम। इमेजिन करो एक पेशेंट थर्सडे को हॉस्पिटल में एडमिट हुआ। उसे कहा गया कि वो एक-दो दिन में मैक्सिमम सैटरडे तक डिस्चार्ज हो जाएगा। लेकिन फिर हॉस्पिटल वाले सैटरडे को कोई ना कोई बहाना बनाकर उस पेशेंट को मंडे तक लॉक करने की कोशिश करते हैं। तीन कॉमन बहाने हैं। पहला सीनियर डॉक्टर मंडे को आएंगे। पर सच यह है कि आरएमओ भी साइन कर सकता है अगर डॉक्टर
(04:44) ने फिट लिख दिया है तो। दूसरा सैटरडे को इंश्योरेंस क्लीयरेंस नहीं मिलेगी। यह सबसे बड़ा झूठ है। इंश्योरेंस टीपीएस 247 काम करते हैं। और तीसरा बिलिंग डिपार्टमेंट का हाफ डे है। सीसीआई ने 2018 के अपने पॉलिसी नोट में साफ लिखा है कि हॉस्पिटल्स प्रॉफिट मैक्सिमाइज करने के लिए अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिससेस का सहारा लेते हैं और पेशेंट की एग्जिट को जानबूझकर डिले करते हैं। एक और स्कैम है जो बहुत ही कॉमनली प्रेग्नेंट वुमेन के साथ हो रहा है। इस बात में तो कोई डाउट नहीं कि हर महिला चाहती है कि उसकी नॉर्मल डिलीवरी हो और बच्चे की हेल्थ के लिए भी नॉर्मल
(05:19) डिलीवरी ही बेटर होती है। लेकिन कई बार कॉम्प्लिकेशंस के चलते सी सेक्शन डिलीवरी भी करनी पड़ती है। लेकिन सिर्फ लूटने के पर्पस से ही अगर जबरदस्ती सी सेक्शन डिलीवरी की जाए तो देखो नॉर्मल डिलीवरी जो कि बॉडी का नेचुरल प्रोसेस है उसे होने में 6 से 18 घंटे का टाइम लगता है। और इसमें प्रॉफिट मार्जिन भी कम होता है। जबकि सी सेक्शन डिलीवरी में 45 मिनट लगते हैं और इसमें प्रॉफिट मार्जिन भी ज्यादा होता है और इसीलिए बहुत से प्राइवेट हॉस्पिटल सी सेक्शन डिलीवरी कराने के लिए ही मजबूर करते हैं। ऐसा ही हुआ अभिलाश और उनकी प्रेग्नेंट वाइफ साक्षी के साथ जब वो
(05:54) नोएडा के एक बड़े प्राइवेट हॉस्पिटल में चेकअप के लिए गए। लेके गए दिखाया सब नॉर्मल था। फिर टाइमली जो भी चेकअप इन्होंने बोला हमने कराया। दोस्तों, एक हेल्दी प्रेगनेंसी 40 वीक्स तक जा सकती है। लेकिन हॉस्पिटल ने पानी कम हो गया है का डर दिखाकर साक्षी को 38 वीक में ही एडमिट कर लिया। बिना नेचुरल लेबर का वेट किए साक्षी की सी सेक्शन डिलीवरी कर दी। बच्चा क्योंकि टाइम से पहले ही निकाल लिया गया था तो उसे स्पेशल यूनिट में रखना पड़ा। इनके कहने के अनुसार बच्चा बहुत कमजोर था। इन्होंने एनआईसीयू में तुरंत बच्चे को ले गए। लेकिन असली ड्रामा इसके बाद शुरू हुआ।
(06:29) सर्जरी के दौरान हॉस्पिटल स्टाफ से एक गलती हुई। साक्षी को इतनी ज्यादा इंटरनल ब्लीडिंग शुरू हुई कि उनका चेहरा पहले लाल और फिर काला पड़ने लगा। परिवार को अंधेरे में रखकर और अभिलाश से ब्लैंक पेपर्स पर साइन करवाकर हॉस्पिटल ने बिना कंसेंट साक्षी का यूट्रस निकाल दिया। जब हालत काबू से बाहर हो गई तो हॉस्पिटल ने अपने हाथ खड़े कर दिए और उन्हें अपोलो रेफर कर दिया। अपोलो के डॉक्टर्स ने देखा कि साक्षी का ऑर्गन सिस्टम फेल हो चुका था। उनके शरीर में खून की जगह सिर्फ पानी बचा था। कुछ ही घंटों में साक्षी ने तोड़ दिया। दोस्तों, यह स्टोरी यहां नहीं खत्म
(07:04) होती। इसके बाद क्या हुआ वो आप अभिलाश के मुंह से ही सुनिए। तो इन्होंने प्रीमेच्योर डिलीवरी करा दिया था। तो बाबू का जो लीवर और हार्ट का कोई स्किन है जो चिपका हुआ था और प्रीमेच्योर डिलीवरी की वजह से बेटा भी मेरा जो है 29 नवंबर को प्यार कर गया। वो भी नहीं रहा। सी सेक्शन स्कैम इतना कॉमन है कि यह छवि मित्तल जैसे टीवी सेलिब्रिटीज के साथ भी हो चुका है। उन्होंने सीएनए इंसाइडर को दिए इंटरव्यू में बताया कि कैसे उनकी परमिशन के बिना उन्हें जबरदस्ती ऑक्सीटॉसिन का इंजेक्शन दे दिया गया था ताकि लेबर पेन इंड्यूस हो और सी सेक्शन
(07:41) डिलीवरी ही करानी पड़े। व्हेन दिस इंजेक्शन वाज एडमिनिस्टर्ड आई सडनली गॉट अ पैनिकिक अटैक। माई थ्रोट बिकम अब्सोलुटली ड्राई। माय हार्ट स्टार्टेड रेसिंग एंड आई स्टार्टेड शेकिंग। इट हपेंड इंस्टेंटली लाइक शी वास स्टिल एडमिनिस्ट्रिंग द ड्रग व्हेन आई स्टार्टेड फीडिंग लाइक दैट। आई सेड व्हाट डीड यू जस्ट गिव मी? व्हाई डीड यू डू दैट? जनरली हॉस्पिटल वाले सी सेक्शन डिलीवरी करवाने के लिए अलग-अलग ट्रिक्स का इस्तेमाल करते हैं। जैसे आपके बच्चे ने पॉटी कर दी है। अभी ऑपरेशन करना पड़ेगा। बच्चे के गले में अंबेलिकल कॉर्ड लिपट गई है। बच्चा दम तोड़ देगा। एमिनोटिक फ्लूइड
(08:16) का लेवल कम हो गया है। बच्चा अंदर सूख जाएगा। 12 घंटे हो गए हैं। सर्विक्स ओपन नहीं हो रहा। हम रिस्क नहीं ले सकते। बच्चे का सर बड़ा है। वह नॉर्मल डिलीवरी से बाहर नहीं आ पाएगा। अपने बच्चे को रिस्क में देखकर पेरेंट्स झट से सी सेक्शन के लिए रेडी हो जाते हैं। हां, ऐसा भी नहीं है कि हर बार ऐसी झूठी बातें कही जाती हो। कई बार जेनुइनली ऐसा होता भी है। लेकिन आपको यह बात सुनकर हैरानी होगी कि WHO कहती है कि सिर्फ 10 से 15% केसेस में ही सी सेक्शन डिलीवरी की जरूरत पड़नी चाहिए। इंडिया के गवर्नमेंट हॉस्पिटल्स में तो यह रेट 15% के अंदर ही है। लेकिन
(08:50) शॉकिंगली प्राइवेट हॉस्पिटल्स में तो यह रेट 49% तक जा चुका है। मींस प्राइवेट हॉस्पिटल्स में हर दूसरी डिलीवरी सी सेक्शन से हो रही है। तेलंगाना, जेएनके और वेस्ट बंगाल के प्राइवेट हॉस्पिटल्स में तो यह रेट 80% के आसपास पहुंच गया है। मतलब नॉर्मल डिलीवरी होना रेयर ही है। दोस्तों, यह स्कैम सिर्फ सी सेक्शन सर्जरीज तक ही सीमित नहीं। एक रिपोर्ट के हिसाब से भारत में 55% हार्ट सर्जरीज, 48% यूट्रस सर्जरीज, 48% नी रिप्लेसमेंट सर्जरीज और 45% सी सेक्शन सर्जरीज कंप्लीटली अननेसेसरी होती हैं और सिर्फ ज्यादा पैसे एंटने के मकसद से की जाती
(09:27) हैं। इस कैंप से बचने के लिए आप पहले ही डॉक्टर को रिटन बर्थ प्लान दे दें कि आप बिना कंसेंट के इंडक्शन इंजेक्शन नहीं चाहते। अगर इमरजेंसी बोलकर सर्जरी सजेस्ट की जाए तो तुरंत किसी दूसरे इंडिपेंडेंट या गवर्नमेंट हॉस्पिटल के डॉक्टर से राय लें। बाकी हमेशा हेरार्की ऑफ डॉक्टर्स को फॉलो करना चाहिए। यानी डायरेक्टली सर्जन के पास ना जाकर पहले जनरल फिजिशियन को दिखाना स्मार्ट कदम है। अगला जो स्कैम है उसके बारे में फेमस कार्डियोलॉजिस्ट और पद्म विभूषण डॉ.
(09:56) बी एम हेगड़े ने अपने इस आर्टिकल में हाईलाइट किया था। इसे कहते हैं सिंक टेस्ट। इमेजिन करो आपको हल्का बुखार होता है और आप किसी कॉर्पोरेट हॉस्पिटल में दिखाने जाते हो। जबकि आपकी कंडीशन के हिसाब से सिर्फ एक टेस्ट करवाना ही काफी था। लेकिन वहां चेकअप के बाद आपको पांच अलग-अलग टेस्ट करवाने के लिए कह दिया जाता है। आप सीधा लैबोरेटरी जाते हैं और अपने ब्लड सैंपल्स दे देते हैं। अब जो टेस्ट जरूरी था उसकी तो रियल रिपोर्ट बना देते हैं। लेकिन आपके बाकी के चार ब्लड सैंपल्स को सिंक में गिरा देते हैं और फेक रिपोर्ट्स जनरेट करते हैं। इसे ही कहते हैं सिंक टेस्ट स्कैम। और ऐसा क्यों होता
(10:30) है? उसके पीछे एक और स्कैम है जिसे कहते हैं द रेफरल स्कैम। दिसंबर 2017 में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने बोर के कुछ लैब्स को रेड किया तो वहां उन्हें 1.5 करोड़ कैश और 3.5 किलो सोना बरामद हुआ। इन्वेस्टिगेशन में पता चला कि यह डायग्नोस्टिक लैब्स ने रेफरल कट्स को अपना ऑफिशियल बिजनेस मॉडल बना लिया है। इनफैक्ट सिर्फ एक लैब चेन की बुक्स में ₹200 करोड़ सिर्फ रेफरल कमीशन के नाम पर चैनल किए गए थे। देखो वैसे कमीशन या रेफरल में कोई दिक्कत नहीं। यह हर इंडस्ट्री में होता है। लेकिन दिक्कत तब है जब यह अननेसेसरीली किया जाए। जैसे अगर आपकी हल्की तबीयत खराब हो और फिर भी
(11:08) आपको बड़े कॉर्पोरेट हॉस्पिटल में रेफर कर दिया जाए तो वह तो गलत है ना। अपोलो हॉस्पिटल चेन्नई के चीफ नेफ्रोलॉजिस्ट डॉक्टर एम के मनी ने खुद इस रेफरल स्कैम को ओपन सीक्रेट कहा। उन्होंने बताया कि 1995 में ही उन्होंने पूरे प्रूफ्स के साथ मेडिकल काउंसिल को कंप्लेंट की थी। बट उस पर कोई एक्शन नहीं लिया गया। इनफैक्ट 2014 में मुंबई के फेमस कोकिलाबेन हॉस्पिटल का एक एलाइट फोरम फॉर्म लीक हुआ। जिसमें 40 पेशेंट्स रेफर करने के लिए ₹1 लाख, 50 पेशेंट्स के ₹1.
(11:40) 5 लाख और 75 पेशेंट्स के लिए ₹.5 लाख प्रोफेशनल चार्जेस के नाम पर क्रेडिट करने की बात थी। मेडिकल काउंसिल के नोटिस आने पर मजबूरन उन्हें इस स्कीम को बंद करना पड़ा। अक्सर डॉक्टर्स कॉर्पोरेट मैनेजमेंट के प्रेशर में आकर भी ऐसा करते हैं। यह डॉक्टर से आप खुद सुनो। मैनेजमेंट कहता है इस महीने आईसीयू में इतने बेड भरने चाहिए। ओटी खाली नहीं रहनी चाहिए। जो मरीज ओपीडी में है उसे भर्ती कराओ। चाहे जरूरत हो या ना हो। क्या हम डॉक्टर है या किसी इंश्योरेंस एजेंट की तरह कोटा पूरा करने वाले सेल्समैन? इस स्कैम से बचने के लिए आपको थोड़ा स्मार्ट और अवेयर बनना पड़ेगा। डॉक्टर से
(12:10) रिस्पेक्टफुली पूछें कि इन टेस्ट का मेरी हेल्थ कंडीशन से कैसे रिलेशन है? अगर हॉस्पिटल फोर्स ना करें तो रूटीन ब्लड टेस्ट बाहर की ही किसी रेप्यूटेड एनएबीएल एक्रेडिटेड लैब से ही करवाएं। अगर एक लोकल डॉक्टर आपको तुरंत किसी बड़े हॉस्पिटल में रेफर करे तो जल्दबाजी ना करें। सेकंड ओपिनियन ले लें। दोस्तों, एक और बड़ा स्कैम है जो हमारे मेडिकल सिस्टम के ग्रास रूट लेवल पर चल रहा है। यह है मेडिसिन स्कैम। इसके लिए Sun Farma, Ab और Glenmark फार्मा जैसी बड़ी फार्मासटिकल कंपनीज़ का हॉस्पिटल के साथ एक Nexus 2017 में एक्सपोज हुआ। हॉस्पिटल्स इन
(12:44) फार्मासटिकल कंपनीज़ से बल्क में दवाइयां खरीदती हैं और उन्हें पेशेंट्स को 300% से 900% तक के प्रॉफिट पर बेचती हैं। सोचिए एक ऐसा पेशेंट जो पहले ही से लड़ रहा है उसे टेमीक्योर 250 एमg ₹18647 में बेची जा रही है जो हॉस्पिटल को सिर्फ ₹1950 की मिली थी। ऐसे ही पेमोर 500 एमg हॉस्पिटल को तो ₹3190 की पड़ती है। जबकि वह पेशेंट्स के लिए ₹16,500 की है। एबॉट की हार्ड ड्रग रेटेलक्स 18 एमg हॉस्पिटल को ₹18,000 की मिलती है। पर पेशेंट के बिल में लगता है ₹32,700। लगभग हर मेडिसिन के साथ ऐसा ही है। तो जो ₹30 की चीज है वो ₹500 में मिलती
(13:25) है। तो अगर मैं डायबिटीज की दवा ले रहा हूं और अगर मैं ब्रांडेड दवा लेता हूं, तो मुझे कितने की पड़ेगी? जैसे एक ₹117 में भी है। ₹17 में मिलती है। और अगर वही चीज हम उसके जेनेरिक मेडिसिन के नाम से लें तो वो कितने की मिलती है? वो मात्र ₹1.95 पैसे में 10 गोली मिलती है। अब शायद आप समझ रहे हो कि क्यों हॉस्पिटल की इनह हाउस फार्मेसी में मेडिसिंस इतनी महंगी होती हैं। हॉस्पिटल मैनेजमेंट की पूरी कोशिश होती है कि पेशेंट उन्हीं की फार्मेसी से यह ब्रांडेड मेडिसिंस ही खरीदें। लेकिन गाइडलाइन साफ कहती है कि आप बेझिझक बाहर से जेरिक मेडिसिंस खरीद सकते
(14:06) हैं। जिनमें साल्ट बिल्कुल वही होता है लेकिन बस वह ब्रांडेड नहीं होती जिस वजह से वह 5 से छह गुना सस्ती मिल जाती हैं। जैसे बुखार के लिए आप मार्केट से क्रोसिन खरीदें तो उसकी एक स्ट्रिप ₹30 की पड़ती है। वही सेम साल्ट यानी पैरासिटामॉल 650 एमg की जेनेरिक दवाई आपको किसी भी जन औषधि केंद्र से ₹10 की मिल जाएगी। अक्सर यह अफवाह भी फैलाई जाती है कि जेनेरिक गोलियां सस्ती हैं, वह काम नहीं करती। जबकि साल्ट 100% सेम होता है। वह उतनी ही इफेक्टिवली वर्क करती हैं। इनफैक्ट मेडिकल बोर्ड भी डॉक्टर्स को यही एडवाइस करता है कि जेनेरिक मेडिसिंस ही पेशेंट्स को
(14:41) प्रिस्राइब करें। दे हैव टोल्ड डॉक्टर्स टू स्टॉप प्रिस्क्राइबिंग ब्रांडेड ड्रग्स। इंस्टेड दे शुड प्रिस्क्राइब जेनेरिक ड्रग। तो बेसिकली इट्स द सेम ड्रग। लेकिन बड़ी फार्मा कंपनीज कॉर्पोरेट हॉस्पिटल मैनेजमेंट को ऐसे फ्री बीज देती हैं कि ब्रांडेड मेडिसिंस ही। लेकिन दोस्तों, जेनेरिक मेडिसिंस खरीदना ना सिर्फ आपके लिए फायदेमंद है बल्कि यह आपका हक भी है। Google पर सर्च करो जन औषधि केंद्र नियर मी। अगली बार वहीं से मेडिसिंस लेना बिल में डिफरेंस देख के आप खुद हैरान रह जाओगे। ओवरप्राइिंग की हद तो 2017 में हो गई जब आद्या सिंह का केस सामने आया। 7 साल
(15:16) की आद्या को डेंगू हुआ और वह गुड़गांव के हॉर्टेज हॉस्पिटल में 15 दिन एडमिट रही। अनफॉर्चूनेटली आद्या ने दम तोड़ दिया। लेकिन अति तो तब हो गई जब हॉस्पिटल ने उसके पेरेंट्स को ₹16 लाख का बिल थमा दिया। 15 डेज इन फॉर्च लेड टू अ बिल ऑफ मोर देन ₹1 लाख। इन्वेस्टिगेशन में जो निकला उसने सबके होश उड़ा दिए। क्योंकि हॉस्पिटल ने आदि के इलाज में ₹2700 ग्लव्स और 650 सिरिंजेस का पैसा जोड़ा था। ओवर 1500 ग्लव्स एंड 660 सिरिंजेस वर एडेड टू द बिल ऑफ थर्मामीटर एंड इवन द हॉस्पिटल गाउन आध्या वास ड्रेस्ड इन वास चार्ज ऑन द 15 सितंबर आद्या डाइड फ्रॉम डेंगू शॉक सिंड्रोम
(15:58) एनपीपीए की रिपोर्ट के मुताबिक हॉस्पिटल ने कुछ कंज्यूमबल्स पर ₹1700% तक का प्रॉफिट कमाया था। जो थ्री वे स्टॉप कॉक बाहर ₹6 का मिलता है। हॉस्पिटल ने उसके ₹16 चार्ज किए। जो ब्लड टेस्ट बाहर ₹100 का होता है उसके ₹5400 जोड़े थे। इस ओवरप्राइिंग से बचने का सबसे बड़ा हथियार है आइटमाइज्ड बिल। हॉस्पिटल से हर एक चीज का डिटेल्ड ब्रेकडाउन मांगे। जब मैनेजमेंट को दिखता है कि आप एक-एक एंट्री ऑडिट कर रहे हैं तो वह फालतू चार्जेस लगाने से डरते हैं। याद रखिए डिटेल्ड बिल मांगना आपका हक है। आखिरी स्कैम जो है वह तो इतना घिनौना है कि इंसानियत भी शर्मा जाए। इसके
(16:36) बारे में डॉ. बी एम हेगड़े डिसेंटिंग डायग्नोसिस जैसी बुक्स और यहां तक कि गुजरात हाईकोर्ट ने भी वर्न किया है। बात करेंगे उसकी लेकिन पहले मैं आपसे शेयर करना चाहता हूं ट्रू बेसिक्स का क्लीन प्लांट प्रोटीन। मार्केट में वे और प्लांट प्रोटीन के नाम पर माल्टाक्सिन और आर्टिफिशियल स्वीटनर्स भरे होते हैं जो आपकी गट लाइनिंग को बिल्कुल डैमेज कर देते हैं। लेकिन दोस्तों यह कोई नॉर्मल प्रोटीन पाउडर नहीं। इसके एक बार इंग्रेडिएंट्स देखो। मटर से एक्सट्रैक्टेड प्रोटीन, कोको पाउडर, कोकोनट मिल्क, नेचुरल फ्लेवर और पपीते से एक्सट्रैक्ट किया गया यह पपाइन
(17:08) डाइजेस्टिव एंजाइम। कोई आर्टिफिशियल फ्लेवर नहीं, कोई आर्टिफिशियल स्वीटनर नहीं, एक भी खराब इंग्रेडिएंट नहीं है इसमें। इतने ट्रांसपेरेंट तरीके से इंग्रेडिएंट्स मेंशंड है कि मुझे कोई डाउट नहीं कि यह भारतीय मार्केट में टॉप प्रोटीन में से एक है। वर्कआउट के बाद अगर आप प्रोटीन पाउडर लेना चाहते हो तो यह लो। इसके एक स्कूप में 24 ग्राम हाई क्वालिटी प्रोटीन है। कोई स्वीटनर नहीं है। फिर भी इसका नेचुरल चॉकलेट फ्लेवर की वजह से आपको यह काफी पसंद आएगा। साथ में स्टेनलेस स्टील का यह कूल सा स्कूपर भी मिलता है। इस प्रोटीन पाउडर का आप डेली एक स्कूप ले
(17:39) सकते हो। प्लांट बेस्ड है, क्लीन इंग्रेडिएंट्स है और लैब टेस्टेड भी है। 1 केजी की प्राइस 2499 की है। लेकिन फिट ट्यूबर कम्युनिटी के लिए स्पेशल 10% ऑफ है। लिंक डिस्क्रिप्शन बॉक्स में है। वापस आते हैं और बात करते हैं वेंटिलेटर स्कैम की। टाइम्स ऑफ इंडिया और इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट्स के मुताबिक हॉस्पिटल्स कई बार एक डेड पेशेंट को जिंदा बताकर वेंटिलेटर पर रखते हैं ताकि बिल बढ़ाया जा सके। 2014 में भोपाल के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में ऐसा ही हुआ जब एक डेड औरत को 3 दिन के लिए वेंटिलेटर पर रखा गया और बाद में हस्बैंड के हाथ ₹8.5 लाख का बिल पकड़ा दिया। ऐसे
(18:16) ही दिल्ली के एक प्राइवेट हॉस्पिटल ने एक 14 साल के बच्चे को जो टेक्निकली ब्रेन डेड हो चुका था। बिना बताए 1 महीने वेंटिलेटर पर रखा सिर्फ खर्चा बढ़ाने के लिए। बाद में हॉस्पिटल गिल्टी मिला पर सजा क्या? सिर्फ ₹5 लाख का फाइन। उनकी एक हफ्ते की कमाई से भी कम। दोस्तों, डॉक्टर बी एम हेगड़े जी ने अपने उसी आर्टिकल में इस कैंप के बारे में यहां तक कहा था कि अगर किसी प्राइवेट हॉस्पिटल में बहुत तेजी से किसी पेशेंट को आईसीयू से ऑपरेशन थिएटर में शिफ्ट करा जाए। फैमिली मेंबर्स तक को पेशेंट को देखने की परमिशन ना मिले। बल्कि उनका कंसेंट फॉर्म पर सिग्नेचर मांगा जाए
(18:51) तो चांसेस है कि पेशेंट ऑलरेडी चुका है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हॉस्पिटल्स के लिए वेंटिलेटर बेड्स गोल्ड माइन है। डिसेंटिंग डायग्नोसिस जैसी बुक्स और यहां तक कि 2020 में गुजरात हाईकोर्ट ने भी रिमार्क किया था कि प्राइवेट हॉस्पिटल्स वेंटिलेटर्स को सिर्फ एक मॉनिटरी अपॉर्चुनिटी की तरह देखने लगे हैं। दोस्तों ये स्कैम्स क्यों हो रहे हैं? इसके पीछे तीन बड़े कारण हैं। सबसे पहला तो है कॉर्पोरेटाइजेशन ऑफ हॉस्पिटल्स। इस मॉडल में डॉक्टर्स के ऊपर एमबीएस होते हैं जो टारगेट सेट करते हैं। दो-तीन महीने भी अगर टारगेट्स पूरे ना हो तो टाटा बाय-बाय कर दी जाती है। दूसरा
(19:25) मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया जो कि मेन बॉडी है वो अपने काम में बिल्कुल फेल हो रही है। ऐसा स्टेटमेंट पार्लियामेंट की स्टैंडिंग कमेटी ने दिया था। उन्होंने कहा कि यह बॉडी मेडिकल प्रोफेशनल्स के एथिकल कंडक्ट को इग्नोर करके सिर्फ मेडिकल कॉलेजेस को लाइसेंस देने में ही लगी है। और तीसरा मेजर रीजन है लैक ऑफ पब्लिक अवेयरनेस। बड़े हॉस्पिटल्स एमसीआई की एथिकल रेगुलेशंस को खुलेआम वायलेट करते हैं। जैसे क्लॉज़ 1.
(19:52) 5 कहता है कि पेशेंट्स को जेनेरिक मेडिसिंस ही प्रिस्राइब करनी चाहिए। क्लॉज़ 1.8 के हिसाब से डॉक्टर को अपनी फीस ट्रीटमेंट से पहले ही बताना मैंडेटरी है। ऑपरेशन होने के बाद लंबा बिल पकड़ा देना यह सही नहीं। ऐसी कई चीजें हैं इस डॉक्यूमेंट में जिसकी आम जनता को कोई जानकारी नहीं होती। बाकी दोस्तों, मैं एक चीज यहां बिल्कुल क्लियर करना चाहता हूं। हम यहां डॉक्टर्स को ब्लेम नहीं कर रहे। हम भारतीय तो वैसे ही डॉक्टर्स को भगवान का दर्जा देते हैं और देना भी चाहिए। सच तो यह है कि बहुत से डॉक्टर्स खुद इस कॉर्पोरेट टारगेट वाले सिस्टम से अंदर ही अंदर परेशान है। एक्चुअल प्रॉब्लम इस
(20:24) सिस्टम और कॉर्पोरेट मैनेजमेंट में है जिन्होंने हेल्थ को एक धंधा बना दिया है। क्या आपके साथ भी ऐसा कोई स्कैम हुआ है? कमेंट्स में अपना एक्सपीरियंस जरूर शेयर करना ताकि और लोगों की हेल्प हो सके। बाकी ट्रू बेसिक्स का क्लीन प्लांट प्रोटीन भी चेक आउट कर लेना। माय नेम इज विवेक। आई थैंक यू सो मच फॉर वाचिंग। ये
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