Monday, September 7, 2026

Does Living With Parents Make You Less Independent? I Vijender Chauhan

Does Living With Parents Make You Less Independent? I Vijender Chauhan

Author Name:Vijender Masijeevi

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@PleaseSitDown

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=VmNdjuJwBhc



Transcript:
(00:00) जिस इंस्टिट्यूशन ने आपको बचाया वही आपको कंट्रोल भी कर सकता है। एक वाक्य सोचिए। हमारे घर में ऐसा नहीं होता। पेरेंट्स की एडवाइस और पेरेंट्स की परमिशन दोनों एक ही चीज नहीं है। 30 साल की उम्र में भी अपने पिता से करियर एडवाइस आप ले सकते हैं। अपनी मां से रिलेशनशिप पर बात कर सकते हैं। इससे आप कम इंडिपेंडेंट नहीं हो जाते। प्रॉब्लम तब आती है जब एडवाइस धीरे-धीरे वीटो पावर बन जाए और केयर ओबिडियंस की डिमांड में बदल जाए। इंडिपेंडेंट कौन है? मेरे ख्याल से पोस्टल एड्रेस से आंसर मिलना थोड़ा सा मुश्किल है। ज्यादा इंपॉर्टेंट टेस्ट यह है कि
(00:36) आपकी जिंदगी का फाइनल डिसीजन मेकर कौन है? पेरेंट्स से फ्रीडम नहीं मांग रही थी। वह रिलेशनशिप के बीच रहते हुए ऑटोनोमी मांग रही थी? तब शायद सवाल यह नहीं रहेगा व्हाई डू इंडियंस लिव विद देयर फैमिली? सवाल होगा हाउ कैन वी स्टे क्लोज टू आवर फैमिली विदाउट लूजिंग आवरसेल्व्स? एडल्टहुड शायद वहीं शुरू होता है जहां रुकना चॉइस हो। जाना बिट्रियल ना हो और प्यार के लिए परमिशन की जरूरत ना पड़े। नमस्ते दोस्तों प्लीज सट डाउन में आपका स्वागत है। जून 2024 पुणे इंडिया 27 इयर्स की स्नेहल नौकरी करती थी। फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट थी और अपनी जिंदगी के फैसले लेने की उम्र
(01:21) में भी थी। उसके अंदर ऐसी कैपेसिटी भी थी। लेकिन एक फैसला ऐसा था जिस के लिए उसने बाकायदा अपने पेरेंट्स से लड़ाई की, लड़ना पड़ा। क्या फैसला? कोई फॉरेन यूनिवर्सिटी नहीं जा रही थी। किसी दूसरे शहर में जॉब करने नहीं जा रही थी। ना फैमिली से कोई रिश्ता तोड़ना था। वह पुणे में ही अपने पेरेंट के घर से अलग रहना चाहती थी। इंडियन एक्सप्रेस से उन्होंने कहा कि आई एम एन एडल्ट, अ वर्किंग प्रोफेशनल। क्योंकि घर में उनके रूटीन, आने जाने और शेड्यूल को लेकर लगातार सवाल होते थे। अब जरा इस सिचुएशन की अजीब सी बात को समझिए। शहर वही था, पेरेंट्स वही थे, रिलेशनशिप
(02:00) भी वही था। सिर्फ एड्रेस बदलना था। फिर उसे एड्रेस को बदलना उसके लिए इतना बड़ा इमोशनल डिसीजन क्यों बन गया? और यहीं से एक बहुत इंटरेस्टिंग सवाल पैदा होता है। हम भारतीय अपने परिवारों के साथ क्यों रहते हैं? व्हाई डू इंडियंस लिव विद देयर फैमिलीज? क्या इसलिए कि हम अपने पेरेंट्स से पश्चिमी देशों की तुलना में ज्यादा प्यार करते हैं? क्या इसलिए कि हम ज्यादा पारंपरिक ट्रेडिशनल हैं या कहानी कुछ और है? क्या ऐसा इसलिए भी है कि भारत में फैमिली वह बहुत सारे काम करती है जो दूसरी सोसाइटीज में स्टेट करता है, मार्केट करती है, फॉर्मल इंस्टीटशंस करते हैं। और अगर
(02:41) फैमिली आपका इमोशनल सपोर्ट भी है, फाइनेंशियल सपोर्ट भी है, चाइल्ड केयर भी है, ओल्ड एज केयर भी है, तो एक और मुश्किल सवाल पैदा होता है। जो इंस्टीटशंस आपको सबसे ज्यादा सिक्योरिटी देता है, कहीं ऐसा तो नहीं कि वही इंस्टीटशंस आपकी ऑटोनोमी भी कम कर सकता है। आज बात इसी कंट्राडिक्शन इसी विरोधाभास की क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि इंडियंस अपने पेरेंट्स के साथ क्यों रहते हैं? शायद असली सवाल यह है कि क्या फैमिली के साथ रहते हुए भी हम इंडियंस पूरी तरह एडल्ट हो सकते हैं? घर छोड़ना एडल्टहुड का सवाल है या नहीं? हमने एडल्टहुड की एक बहुत
(03:22) फैमिलियर कहानी बना ली है। स्कूल, कॉलेज, जॉब, फिर पेरेंट्स का घर छोड़िए। अपना अपार्टमेंट लीजिए और अब आप इंडिपेंडेंट एडल्ट हैं। लेकिन प्रॉब्लम यह है कि दुनिया इस एक टाइमलाइन पर चलती ही नहीं। लोकनीति सीएसडीएस के एक सर्वे के अनुसार 2021 में 18 राज्यों के 6000 से ज्यादा यंग इंडियंस से बात की गई। उनमें से 60% से ज्यादा अपने पेरेंट्स के साथ रह रहे थे और अलग से एक बड़ी संख्या पेरेंट्स और स्पाउस दोनों के साथ रह रही थी। यानी क्या ये छोटी-मोटी ट्रेडिशनल माइनॉरिटी की बात हम नहीं कर रहे हैं। करोड़ों लोग। करोड़ों इंडियंस के लिए एडल्टहुड का मतलब पेरेंट्स
(04:07) का घर छोड़ना नहीं है। दुनिया भर में ऐसा होता है। भारत में ऐसा नहीं है। और इसे केवल इंडिया वर्सेस वेस्ट से समझेंगे तब भी प्रॉब्लम आएगी। 2021 में स्वीडन में यंग पीपल एंड पेरेंटल होम का औसतन यानी कि वे युवा वयस्क जो अपने पेरेंट्स के घर में रह रहे थे। उनके हिसाब से अगर उम्र देख तो एवरेज था कि 19 ईयर की उम्र में वो अपने पेरेंट्स का घर छोड़ दे रहे थे। पुर्तगाल में यही औसत आयु 33.
(04:35) 6 इयर्स थी दोनों यूरोप में। लेकिन हम देख रहे हैं कि यूरोप भी एक जैसे तरीके से नहीं सोचता। लेकिन एडल्टहुड की दो बिल्कुल अलग टाइमलाइन हमें इसी यूरोप में दिखाई दे रही थी। तो इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है कि घर छोड़ना प्यूबर्टी की तरह कोई बायोलॉजिकल स्टेज नहीं है कि 18 के हुए, 18 के हुए और शरीर ने कोई सिग्नल देना शुरू कर दिया कि आप सूटकेस पैक कीजिए। ऐसा कोई नेचुरल लॉ नहीं है। अलग-अलग सोसाइटीज में एडल्टहुड को अलग-अलग तरीके से ऑर्गेनाइज और डिफाइन किया जाता है। हिस्टोरियन जॉन हज़नेल ने वेस्टर्न यूरोप के कुछ हिस्सों में एक पैटर्न आइडेंटिफाई किया था। जहां
(05:11) कंपैरेटिवली लेट मैरिजेस और मैरिजेस के बाद सेपरेट हाउसहोल्ड बनाना कॉमन हुआ। एंथ्रोपोलॉजी में अलग हाउसहोल्ड एस्टैब्लिश करने को न्यू लोकल रेजिडेंस कहा जाता है। न्यू लोकल रेजिडेंस। लेकिन इसे यूनिवर्सल ह्यूमन डेस्टिनेशन मान लेना प्रॉब्लमेटिक है। इंडिया में फैमिली का हिस्टोरिकल लॉजिक कई जगह पर बिल्कुल अलग है। यहां एडल्टहुड का प्रूफ अक्सर यह नहीं था कि मैं घर से निकल गया या निकल गई। बल्कि मैं इसे घर की जिम्मेदारी लेने लगा हूं कि फॉर्म में देखा जाता था। और यह डिफरेंस बहुत इंपॉर्टेंट है। जॉइंट फैमिली जिसकी हम बात अक्सर करते हैं। यह कोई
(05:51) संस्कार नहीं थी। हम जॉइंट फैमिली की बात आते ही एक बहुत बड़ा फैमिलियर वोकैबलरी इस्तेमाल करते हैं कि ये संस्कार है। ये परंपरा है। ये हमारी संस्कृति है। ये हमारी वैल्यूस हैं। इन कॉइनेज में कोई गलत गलत नहीं है। ऐसा नहीं है कि कुछ गलत बात बोली जा रही है। लेकिन जॉइंट फैमिली को केवल कल्चर मानना, कल्चर से एक्सप्लेन करना यह आधी कहानी सुनाता है। जॉइंट फैमिली एक इकोनॉमिक अरेंजमेंट भी थी। एक एग्रीकल्चरल हाउसहोल्ड इमेजिन कीजिए लैंड कॉमन है। एक इंसान खेती कर रहा है। दूसरा मंडी का काम देख रहा है। बुजुर्ग बच्चे संभाल रहे हैं। कोई खाना बना रहा है। कोई
(06:30) पशुओं की देखभाल कर रहा है। लेबर जो है वो शेयरर्ड है। श्रम जो है उसका विभाजन हो रखा है लेकिन साझा है। रिसोर्सेज शेयर्ड है। रिस्क भी शेयरर्ड है। फसल खराब हो गई पूरा परिवार संभाल लेगा। किसी एक की इनकम चली गई कोई नहीं। घर मौजूद है। कोई बीमार हो गया तो केयर नेटवर्क पहले से मौजूद है। थोड़ा मजाक में कहें तो फॉर्मल इंश्योरेंस से पहले फैमिली इंश्योरेंस चलता था। डे केयर सेंटर से पहले ग्रैंड पेरेंट्स होते थे। अनइंप्लॉयमेंट अलाउंस से पहले एक सेंटेंस एक वाक्य आता था। कोई बात नहीं बेटा घर वापस आ जाओ। और इस इंस्टिट्यूशन की ताकत केवल हिस्ट्री में नहीं है। आज भी
(07:06) देखिए दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहरों में रेंट दीजिए, डिपॉजिट दीजिए, फूड, ट्रांसपोर्ट, डोमेस्टिक वर्क सब इंडिपेंडेंटली मैनेज कीजिए और फिर पूछिए कि 24-25 साल के यंग प्रोफेशनल के लिए पेरेंट्स के साथ रहना केवल ट्रेडिशनल वैल्यू है या कोई परफेक्ट सेंसिबल इकोनॉमिक चॉइस भी है। और यहां क्लास बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। वर्क। हम मूव आउट को फ्रीडम की लैंग्वेज में डिस्कस करते हैं। लेकिन फ्रीडम एक्सरसाइज करने के लिए रिसोर्सेज चाहिए, स्टेबल इनकम चाहिए, अफोर्डेबल हाउसिंग चाहिए और खासकर यंग वुमेन के लिए तो सेफ हाउसिंग चाहिए। इसलिए
(07:44) किसी के पेरेंट्स के साथ रहने को देखकर यह निष्कर्ष मत निकालिए कि यह व्यक्ति इंडिपेंडेंट नहीं है। हो सकता है वह कल्चरली नहीं लेकिन इकोनॉमिकली रैशन डिसीजन ले रहा हो। अब अपने आप को 70 साल का इमेजिन कीजिए। डॉक्टर के पास जाना है, मेडिसिन लेनी है, ऑनलाइन अपॉइंटमेंट समझ नहीं आ रही। बैंक का काम है रात 2:00 बजे अचानक तबीयत खराब हो गई। आप किसे फोन करेंगे? बहुत सारे इंडियंस के लिए आंसर होगा फैमिली। इंडियन एजिंग रिपोर्ट जैसी स्टडीज हमें लगातार याद दिलाती है कि ओल्डर इंडियंस की केयर और सपोर्ट में फैमिली की भूमिका अभी भी सेंट्रल है।
(08:19) केंद्रीय भूमिका है। इसलिए जब कोई पेरेंट कहता है बुढ़ापे में हमारा कौन है? तो हर बार तुरंत यह कहना ठीक नहीं होगा कि यह इमोशनल ब्लैकमेल है। कई बार उस सेंटेंस के पीछे जेन्युइन इनसिक्योरिटी भी होती है। क्योंकि फॉर्मल एल्डर केयर सोशल सिक्योरिटी यासिबल सपोर्ट सिस्टम यह हमारे देश में हर नागरिक को आसानी से मजबूती से उपलब्ध नहीं है। इतने तो तौर पे तो बिल्कुल उपलब्ध नहीं है कि फैमिली की जरूरत ही खत्म हो जाए। इसलिए फैमिली केवल इमोशनल रिलेशनशिप नहीं रहती। वह एक इंफ्रास्ट्रक्चर बन जाती है और जिस इंफ्रास्ट्रक्चर पर आपका जीवन डिपेंड करता
(08:56) है, उससे बाहर निकलना नेचुरली मुश्किल होगा। [गला साफ़ करने की आवाज़] लेकिन कहानी में ट्विस्ट आता है। सिक्योरिटी के साथ पावर भी आती है। यही इंडियन फैमिली का सबसे फैसनेटिंग कंट्राडिक्शन है। एकदम रोचक विरोधाभास है। जिस इंस्टिट्यूशन ने आपको बचाया वही आपको कंट्रोल भी कर सकता है। एक वाक्य सोचिए। हमारे घर में ऐसा नहीं होता। सुना है ना? बहुत इनोसेंट सेंटेंस लगाता है। कैसा प्यारा सा वाक्य है। लेकिन थोड़ा सोक्रेटिक होकर सोचिए। ऐसा कैसा ऐसा क्या है? कौन डिसाइड करता है? करियर कौन चुनेगा? आप किससे शादी करेंगे? शादी करेंगे भी या नहीं करेंगे? बच्चे कब
(09:40) होंगे? होंगे भी या नहीं होंगे? किस शहर में रहेंगे? रात कितने बजे वापस आएंगे? कपड़े कैसे पहनेंगे? यहां एक बहुत बहुत ही फाइन लाइन है जिसे हमें समझना चाहिए। पेरेंट की एडवाइस और पेरेंट्स की परमिशन दोनों एक ही चीज नहीं है। 30 साल की उम्र में भी अपने पिता से करियर एडवाइस आप ले सकते हैं। अपनी मां से रिलेशनशिप पर बात कर सकते हैं। इससे आप कम इंडिपेंडेंट नहीं हो जाते। प्रॉब्लम तब आती है जब एडवाइस धीरे-धीरे वीटो पावर बन जाए और केयर ओबिडियंस की डिमांड में बदल जाए। हमने तुम्हारे लिए इतना किया है। सुना होगा ना यह वाक्य? यह फैक्ट हो सकता है। सच में
(10:19) पेरेंट्स ने बहुत कुछ किया होगा। लेकिन उसके बाद अगला सेंटेंस अगर यह हो इसलिए तुम्हें अपनी जिंदगी हमारे हिसाब से जीनी पड़ेगी। तो रिलेशनशिप का कैरेक्टर बदल गया। ग्रेटट्यूड और सरेंडर एक ही चीज नहीं है। लव रिस्पांसिबिलिटी पैदा कर सकता है। लेकिन रिस्पांसिबिलिटी ऑटोमेटिकली ओनरशिप पैदा नहीं करती। और यहां जेंडर का सवाल बहुत जरूरी है। अब इसी फैमिली को एक यंग मैन और एक यंग वुमेन की नजर से देखिए। एक्सपीरियंस नेसेसरीली एक जैसा नहीं होगा। एक अनमैरिड यंग मैन पेरेंट्स के साथ रह रहा है। फूड, हाउसहोल्ड, इंफ्रास्ट्रक्चर, फैमिली सपोर्ट सब अवेलेबल है। सोसाइटी कह
(10:59) सकती है कि देखो कितना फैमिली ओरिएंटेड लड़का है। लेकिन शादी के बाद उसी हाउसहोल्ड में आने वाली लड़की का स्त्री का एक्सपीरियंस क्या होगा। उसके लिए उसका नेटल होम नहीं है यह। कई इंडियन कम्युनिटीज में विवाह हिस्टोरिकली पेट्रिलोकल ही है। आज भी यानी कि स्त्री अपने नहीं पति के परिवार की तरफ आती है। इसलिए जॉइंट फैमिली की पूरी डिबेट में एक सवाल अक्सर मिसिंग रहता है कि केयर कौन दे रहा है? 2024 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया टाइम यूज़ सर्वे को देखिए। अनपेड डोमेस्टिक वर्क करने वाली स्त्रियां उस काम में औसतन 289
(11:44) 289 मिनट प्रतिदिन खर्च कर रही हैं और पुरुष 88 मिनट हाउसहोल्ड केयर गिविंग में भी महिलाओं का पार्टिसिपेशन 137 मिनट था पुरुषों का 75 मिनट्स और इसका मतलब यह नहीं है कि हर इंडियन हाउसहोल्ड ऐसा ही होगा लेकिन एग्रीगेट पैटर्न तो साफ दिखाई दे रहा है ना इसलिए इसलिए जब हम बड़े प्यार से कहते हैं हमारे यहां जॉइंट फैमिली में सब एक दूसरे का ख्याल रखते हैं तो एक छोटा सा सवाल तो पूछ ही लेना चाहिए ना कि ये सब कौन हैं? कौन रखते हैं एक दूसरे का ख्याल? क्योंकि फैमिली रिसोर्सेज कलेक्टिवली शेयर कर सकती है। लेकिन पावर, प्राइवेसी, केयर वर्क यह इक्वली शेयर नहीं
(12:28) होता है। किसका करियर सैक्रिफाइस होगा? बच्चे बीमार होंगे तो ऑफिस से छुट्टी कौन लेगा? बुजुर्ग पेरेंट्स की डेली केयर कौन करेगा? गेस्ट आएंगे तो एक्स्ट्रा वर्क किसका बढ़ेगा? यह सबसे इंटरेस्टिंग सबसे इंटरेस्टिंग इनमें से है। एडजस्ट कौन करेगा? इसलिए जॉइंट वर्सेस न्यूक्लियर फैमिली की डिबेट अकेली काफी नहीं है। ज्यादा इंपॉर्टेंट क्वेश्चन है। घर के भीतर पावर कैसे डिस्ट्रीब्यूटेड है? तो इंडिपेंडेंस का मतलब क्या हुआ? अब हम उस कंफ्यूजन पर आते हैं जो शायद पूरी कन्वर्सेशन के सेंटर में है और फिजिकल सेपरेशन और पर्सनल ऑटोनोमी इनको अलग-अलग
(13:09) मानने की वकालत करता है। आप पेरेंट्स से 1500 कि.मी. दूर रह सकते हैं और फिर भी अपने करियर, मैरिज, पैसा और लाइफ चॉइससेस पर उनकी परमिशन के बिना डिसीजन ना ले पाते हो ऐसा संभव है। और आप अपने पेरेंट्स के अगले कमरे में रह रहे हो सकते हैं। हाउसहोल्ड एक्सपेंसेस में कंट्रीब्यूट करते हो, उनकी केयर करते हो, फिर भी अपनी जिंदगी के डिसीजन खुद लेते हो, यह भी पॉसिबल है। तो, इन दो स्थितियों में इंडिपेंडेंट कौन है? मेरे ख्याल से पोस्टल एड्रेस से आंसर मिलना थोड़ा सा मुश्किल है। ज्यादा इंपॉर्टेंट टेस्ट यह है कि आपकी जिंदगी का फाइनल डिसीजन मेकर कौन है?
(13:45) और दूसरा टेस्ट अपने डिसीजन के कॉन्सिक्वेंसेस कौन उठाता है? क्योंकि ऑटोनॉमी का मतलब सिर्फ मेरी लाइफ मेरी मर्जी नहीं होता। ऑटोनोमी के साथ अकाउंटेबिलिटी भी आती है। अगर आप एडल्ट हैं तो फ्रीडम भी आपकी और बिल भी आपका। चॉइससेस भी आपकी और कॉन्सिक्वेंसेस भी आपके। यही एडल्टहुड है। फैमिली वर्सेस फ्रीडम शायद गलत बाइनरी है। और अब इसे पूरी डिस्कशन का सबसे यूज़फुल आईडिया। बहुत सी मॉडर्नाइजेशन थ्योरीज में एक एजम्पशन रहा है कि सोसाइटी जैसे-जैसे मॉडर्न होगी जॉइंट फैमिली कमजोर होगी और वेस्टर्न स्टाइल्ड इंडिविजुअल फैमिली की तरफ सोसाइटी मूव करेगी। लेकिन टर्किश
(14:27) साइकोलॉजिस्ट सडन कैगस्तन वासी ने फैमिली चेंज को समझते हुए एक इंटरेस्टिंग पॉसिबिलिटी दी। उन्होंने कहा कि ऑटोनॉमस रिलेटेड सेल्फ नाम की एक चीज होती है। मतलब मतलब आप ऑटोनॉमस हो सकते हैं और रिलेटेड भी कनेक्टेड रह सकते हैं और बिना फैमिली में डिॉल्व हुए भी। मैं इसे आसान लैंग्वेज में कहूं तो ऑटोनॉमस इंटरडिपेंडेंस स्वायत्तता के साथ परस्पर निर्भरता और मुझे लगता है कि इंडिया के लिए यह आईडिया बहुत पावरफुल है। हमें दो एक्सट्रीम में से एक चुनने की जरूरत नहीं है। एक एक्सट्रीम 18 के हो गए घर छोड़ दो तुरंत तभी एडल्ट माने जाओगे। और दूसरा
(15:08) एक्सट्रीम हम जब तक जिंदा हैं तुम्हारी जिंदगी हमारे रूल्स से चलेगी। इन दो एक्सट्रीम्स के बीच में एक तीसरा रास्ता है। आप पेरेंट्स के साथ रह सकते हैं। हाउसहोल्ड में कंट्रीब्यूट कीजिए। पेरेंट्स की केयर कीजिए। लेकिन पूरी केयर एक डॉटर इन लॉ पर आउटसोर्स मत कर दीजिए। पेरेंट्स से सलाह लीजिए। लेकिन एडल्ट चिल्ड्रन के डिसीजन कॉन्फिस मत करिए। घर में साथ रहिए लेकिन प्राइवेसी को विद्रोह मत मानना शुरू कर दीजिए। फैमिली रिसोर्सेज शेयर करती है तो इंडिविजुअल फाइनेंशियल एजेंसी की रिस्पेक्ट भी कीजिए। बच्चों को अपनी फैमिली हिस्ट्री दीजिए। लेकिन उनका
(15:50) फ्यूचर पहले से लिखकर मत दे दीजिए कि यही करना पड़ेगा। और अगर घर में वयस्क पुत्र या पुत्री है, वह अलग रहना चाहता है, तो हर बार उसे रिजेक्शन मत मानिए कि उसने फैमिली को रिजेक्ट कर दिया। लिविंग होम को बिट्रेयल मत बनाइए। जब आपने घर छोड़ा तो घर वाले यह कहें कि आपने घर के साथ विश्वासघात किया है। पेरेंट्स के साथ रहने को इमैच्योरिटी मत बनाइए। चॉइससेस दोनों तरफ से होनी चाहिए। चलिए वापस स्नेहल वाले केस में चलते हैं। वही 27 साल की स्नेहल पुणे वाली जहां से हमने बात शुरू की थी। उन्होंने पेरेंट्स को रिजेक्ट नहीं किया था। उन्होंने फैमिली रिलेशनशिप खत्म नहीं
(16:32) की थी। उन्होंने उस शहर भी पुणे भी नहीं छोड़ा था। उन्होंने बस कहा आई एम एन एडल्ट और शायद वह अपने पेरेंट्स से फ्रीडम नहीं मांग रही थी। वह रिलेशनशिप के बीच रहते हुए ऑटोनोमी मांग रही थी। दोनों में बहुत फर्क है। एडल्ट होने का मतलब शायद यह नहीं है कि अब मुझे अपने पेरेंट्स की जरूरत नहीं है। बल्कि मुझे अपने पेरेंट्स की जरूरत हो सकती है। मैं उनसे प्यार भी कर सकता हूं। उनकी केयर भी कर सकता हूं। लेकिन अपनी जिंदगी जीने के लिए हर बार उनकी परमिशन जरूरी नहीं होनी चाहिए। इंडियन फैमिली की खूबसूरत ताकत है। उसका यह कहना दुनिया में कहीं कुछ गलत हो जाए
(17:11) तुम घर वापस आ जाना। मैं चाहता हूं उस सेंटेंस के साथ हम एक और सेंटेंस जोड़ दें। और जब अपना रास्ता चुनना चाहो तो बेझिझक जाना। घर फिर भी तुम्हारा ही रहेगा। क्योंकि इंडिपेंडेंस का मतलब आइसोलेशन नहीं है और बिलोंगिंग का मतलब ओबिडियंस नहीं है। शायद हेल्दीियस्ट इंडियन फैमिली वह नहीं होगी जो नेसेसरीली जॉइंट फैमिली हो। वह भी नहीं जो नेसेसरीली न्यूक्लियर फैमिली हो। वह फैमिली होगी जो इमोशनली क्लोज हो। प्रैक्टिकली सपोर्टिव हो और साइकोलॉजिकली ऑटोनॉमस हो। तब शायद सवाल यह नहीं रहेगा व्हाई डू इंडियंस लिव विद देयर फैमिली? सवाल होगा हाउ कैन वी
(17:51) स्टे क्लोज टू आवर फैमिली विदाउट लूजिंग आवरसेल्व्स? मेरे ख्याल से एडल्टहुड शायद वहीं शुरू होता है जहां रुकना चॉइस हो। जाना बिट्रेल ना हो और प्यार के लिए परमिशन की जरूरत ना पड़े। आप अपनी फैमिली में बिलोंगिंग और ऑटोनोमी के बीच यह बैलेंस कैसे नेगोशिएट करते हैं? करना तो पड़ता होगा। कमेंट्स में बताइए अपनी कहानी कि आप परिवार के साथ किस रिश्ते में हैं।

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