The Hidden Meaning of Erotic Art in Temples | The Real Story Behind Kama Shilp with Nityananda Misra
Author Name:Shobha Rana
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Transcript:
(00:00) काम का प्रयोग कैसे करना चाहिए? कब करना चाहिए? धर्म के सीमा में रहकर करना चाहिए? यह बात सन स्पष्ट कहते हैं। और आप कह रहे हो कि काम का मतलब सिर्फ संभोग नहीं है। लेकिन कामसूत्र और जो ये मंदिरों में जो शिल्पकारी है इसमें तो जो जो पिक्चराइजेशन है जो चित्रकण है वो तो संभोग जैसा ही दिखता है। सुंदर स्त्री का चित्रण है। विवस्त्रा स्त्री का चित्रण होता है। अप्सरा का चित्रण होता है। ये सब हमारे मंदिरों में थे। तो इसका अर्थ जब ऐसे स्थानों पर बनाए जाते थे तो निसंदेह लोग उसमें कुछ बुरा नहीं देखते थे। कि काम शिल्प क्या है? यह
(00:35) उपहास की वस्तु नहीं है। यह घृणा की वस्तु नहीं है। यह गुपचुप बतियाने की वस्तु नहीं है। यह वस्तुतः कला का उत्कृष्ट रूप है जो गौरव का आसपा है। तो हम धीरे-धीरे क्या हमें लगता है हम ब्रॉड माइंडेड होते जा रहे हैं। क्या हम नैरो माइंडेड होते जा रहे हैं धीरे-धीरे? जो खजुराहो में काम शिल्प है, जो कोणार्क में काम शिल्प है, जो हम्पी में अथवा पट्टदकल में काम शिल्प है, वह भारत की एक ऐसी कला है जिसका कोई तुलना नहीं है पूरी जगह कि जो महालिंग है, वह शिव का स्वरूप है। और जो भग है, जो योनि है वह शक्ति का स्वरूप है। और शिव और शक्ति के सम्मेलन से
(01:12) ही सृष्टि होती है। और इसमें यदि किसी को बुराई दिखती हो तो अपने माता-पिता को जाकर कहे कि आपने जो काम किया वह बहुत बुरा है। दो टर्म्स हैं जो लोग बोलते हैं और अमूमन तौर पर प्रश्न भी उठाते हैं कि अश्लीलता से आध्यात्म तक का उन्हें क्या कोई मार्ग पता था? मनुष्य धर्म का साधन करे, दिन में फिर अर्थ का साधन करे और रात्रि काल में काम का साधन करें। पुराण में भगवान विष्णु का एक नपुंसक अवतार भी है। काम का इतना आउट एंड आउट डिस्प्ले मंदिर जो कि एक आस्था का स्थल है, पूजा का स्थल है, वहां पर ही क्यों? [संगीत] नमस्ते द जर्नी विद इन पडकास्ट में आपका
(01:56) स्वागत है मेरे यानी शोभा राणा के साथ। मैं एक इमोशनल इंटेलिजेंस और माइंडसेट कोच हूं और साथ ही इस पॉडकास्ट की होस्ट और क्रिएटर भी हूं। द जर्नी विद इन पॉडकास्ट का उद्देश्य है कि आपको आपकी द जर्नी विद इन करने में मदद कर सके। और यह हम इसलिए करते हैं ताकि आप अपनी बेस्ट लाइफ, अपनी ड्रीम लाइफ को डिजाइन कर पाए। अपने अंतर्मन की तरफ लौट आना, अपने इनर वर्ल्ड को समझने से आप यह समझ पाते हैं कि आप अपने थॉट्स, फीलिंग्स, इमोशंस, लाइफ इवेंट्स, घटनाओं को कैसे प्रोसेस करते हैं और अपना पर्सपेक्टिव या नजरिया कैसे बिल्ड करते हैं। जो हमारी जिंदगियां हैं वो
(02:31) हमारे नजरिए में चलती है। तो इस नजरिए को एंपावरिंग बनाना, पावरफुल बनाने की कोशिश है द जर्नी विद इन पॉडकास्ट। आज हम द जर्नी विद इन करने वाले हैं थ्रू द लेंस ऑफ काम शिल्प। काम शिल्प जो हमें देखने को मिलता है खजुराहो के मंदिरों में, कोनार्ड के मंदिर में और भी बहुत सारे ऐसे मंदिर हैं अलग-अलग धर्मों के जिसमें हमें काम शिल्प को देखने को मिलता है। आज हम इस शिल्पकारी के बारे में डिटेल में समझेंगे कि यह अगर हमारे इतिहास का एक बहुत ही अभिन्न अंग है। अगर हमारे एनसेेस्टर्स को काम की स्वीकृति करते थे तो आज हम नैतिकता के लेंस से इसको कहां देखते हैं? हम खुद
(03:08) को कहां देखते हैं? हम अपने आप को और काम भावना जिसको बहुत अलग-अलग तरीकों से अलग-अलग संदर्भों में समझा जाता है उसको कैसे बेहतर समझ सकते हैं? क्योंकि हमारी लाइफ का एक बहुत इंपॉर्टेंट आस्पेक्ट है काम की भावना भी। तो ये काम रस जो है कामसूत्र में भी जिसका काफी उल्लेख है। आज हम उसके बारे में भी कुछ चर्चा करेंगे। तो इस एपिसोड को एंड तक देखिएगा ताकि आप अपनी संस्कृति से जो कि इतनी एनरच्ड है उससे कनेक्ट कर पाएं और अपने आज को उन इतिहास के पन्नों में कहीं टटोल पाएं। आज इस चर्चा के लिए हमारे साथ हैं नित्यानंद मिश्र जी जो कि एक बहुत ही प्रख्यात लेखक
(03:45) हैं। इन्होंने कई किताबें लिखी हैं जो भारतीय शास्त्रों को पढ़कर उनका उल्लेख है। उनसे इंस्पायर्ड हैं। उनका एक सिंपलीफाइड ट्रांसलेशन है। जरूर पढ़िएगा इनकी किताबों को और आज इस विषय पर इन डेप्थ हम इनसे चर्चा करेंगे। इससे पहले आपसे अनुरोध है कि आप चैनल को सब्सक्राइब कीजिए। आप बेल आइकन प्रेस कर सकते हैं ताकि हफ्ते दर हफ्ते आपके पास हमारे अपडेट्स जाते। अगर आपको हमारी यह कोशिश, हमारा ये पडकास्ट अच्छा लगता है तो लाइक, कमेंट और शेयर कीजिए ताकि इस तरह की जो चर्चाएं हैं जो अब विलुप्त होती जा रही हैं, कम होती जा रही हैं। मीनिंगफुल
(04:17) कन्वर्सेशंस हैं वो लोगों तक पहुंचे और और लोग भी हमारे साथ जुड़ पाएं। धन्यवाद फॉर सपोर्टिंग अस। एंड नाउ लेट्स मीट नित्यानंद मिश्र जी ऑन द जर्नी विद इन पॉडकास्ट। [संगीत] नमस्ते नित्यानंद जी। नमस्कार। आपसे मिलकर बहुत खुशी हो रही है। यह हम दूसरा एपिसोड शूट कर रहे हैं साथ में। पिछली बार हमने बहुत ही डिटेल में कन्वर्सेशन किया था ओम पर। ओमकार का क्या अर्थ है? अन्य धर्मों में इसका क्या उल्लेख है? कहां से शुरू हुआ? आज कहां पर है? बहुत ही खूबसूरत पडकास्ट है। तो मैं
(05:02) यहां पर अपनी ऑडियंस को रिमाइंडर भी देना चाहूंगी कि अगर वो एपिसोड देखना चाहें तो उसका लिंक हम डिस्क्रिप्शन बॉक्स और कमेंट सेक्शन में लगा देंगे। लेकिन फिलहाल आज की जो चर्चा का विषय है वो है काम शिल्प जो कि एक बहुत ही फैसिनेटिंग एक बहुत ही खूबसूरत लेकिन एक मिसअंडरस्टुड तरह का की आर्ट फॉर्म है। तो सबसे पहले तो काम शिल्प ये जो दो वर्ड है। काम और शिल्प इनका मतलब क्या है? जी काम शिल्प जैसा आपने कहा इसको लोग समझते नहीं है। जिस प्रकार कामसूत्र को लोगों ने नहीं समझा है वैसा काम शिल्प को भी नहीं समझा। काम शिल्प में दो शब्द हैं काम और
(05:39) शिल्प। काम का अर्थ है जिसकी इच्छा की जाए अथवा जिसके द्वारा इच्छा की जाए। काम्यतः इतिका काम यद्वा काम्यते अनेन इतिका काम। जैसे हम कहते हैं मेरे मन में एक कामना है। हम कहते हैं मन कामना। मन की कामना। कोई व्यक्ति जिसको संतान चाहिए उसको कहते हैं पुत्र कामा। उसको पुत्र की कामना है। किसी को यश की कामना। किसी को यश चाहिए होता है। तो उसे कहते हैं यशस का काम। वह अपना यश चाहता है। दिगद दिगंत फैले। उसकी कीर्ति जगभर में लोग उसे जाने। तो काम का सामान्य अर्थ है अभिलाषा अथवा इच्छा। यह एक व्यापक अर्थ है काम का। जब हम काम
(06:28) शिल्प अथवा कामसूत्र अथवा धर्म अर्थ, काम मोक्ष इनकी बात करते हैं तो काम का एक विशेष अर्थ है। वह विशेष अर्थ क्या है? काम हमारे यहां बहुत लोगों को यह भ्रांति है। काम का अर्थ है संभोग और काम सूत्र का अर्थ है केवल संभोग के आसन। दोनों ही भ्रांतियां निराधार है। जिसने भी कामसूत्र का अध्ययन किया हो, समग्रता में देखा हो, वह यह बात नहीं कह सकता। जिसने भी काम शिल्प को कुछ समझा हो, कामसूत्र पर तो फिर भी बहुत सारी पुस्तकें हैं। अनुवाद हैं। इनकी टीकाएं हैं। काम शिल्प पर इतनी पुस्तकें नहीं। कामशिल्प पर कुछ गिनेचुने लेखक हैं। रेखा राव हैं
(07:14) जिन्होंने लिखा है। सुरेश देश पांडे हैं जिन्होंने मराठी और अंग्रेजी में लिखा है और देवांगना देसाई ने लिखा है। इनकी कुछ गिनी चुनी पुस्तकें हैं। काम शिल्प पर इतना लिखा नहीं गया है और बोला भी नहीं जाता। बहुत से लोग इसके विषय में लज्जा की अनुभूति करते हैं। कोई तिरस्कार की दृष्टि से देखता है। कोई उपहास की दृष्टि से देखता है। कोई जुगुप्सा की दृष्टि से देखता है। पर लोग गहराई में नहीं उतरते। धर्म अर्थ, काम और मोक्ष के संदर्भ में जो काम शब्द है, जो कामसूत्र में जो काम शब्द है और जो काम शिल्प में जो काम शब्द है, उसका क्या अर्थ है? उसका अर्थ है बहुत सी
(07:47) व्याख्याएं हैं। एक तो तीन पुरुषार्थों में से एक है। धर्म, अर्थ और काम। आपको जानकर आश्चर्य होगा। हो सकता है हमारे श्रोताओं को भी जानकर आश्चर्य होगा। महाभारत अपने आप को कामशास्त्र कहता है। महाभारत के प्रारंभ में ही श्लोक आता है कि यह धर्मशास्त्र भी है, यह अर्थशास्त्र भी है और यह काम शास्त्र भी है। तो जब महाभारत जैसा ग्रंथ कह रहा है कि यह ग्रंथ, यह शास्त्र, यह महाभारत कामशास्त्र है तो काम शास्त्र कोई बुरी वस्तु तो नहीं हो सकती? महाभारत में तो हम बहुत आस्था रखते हैं। भगवत गीता को हम आध्यात्म की सबसे अल्टीमेट किताब मानते हैं। सबसे अल्टीमेट
(08:24) लेसंस जो मिलते हैं लाइफ के वो मिलते हैं। और आप कह रहे हो कि काम का मतलब सिर्फ संभोग नहीं है। लेकिन कामसूत्र और जो ये मंदिरों में जो शिल्पकारी है इसमें तो जो जो पिक्चराइजेशन है जो चित्रकण है वो तो संभोग जैसा ही दिखता है। संभोग मात्र नहीं है। और भी बहुत कुछ है। उससे पहले हम आते हैं आपने भगवत गीता की बात की तो बहुत रोचक एक मैं बात बोलता हूं। भगवत गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं मैं काम हूं। धर्मा विरुद्ध भूतेशु कामोस्म भरतशभ भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है हे भरतभ हे भरतों में श्रेष्ठ अर्जुन मैं सभी प्राणियों में धर्म से अविरुद्ध काम हूं।
(09:03) मैं ऐसा काम हूं जो धर्म के अविरुद्ध है। काम जो है काम के बिना जो शिल्प प्रकाश में भी वर्णन आता है। काम के बिना संभोग के बिना किसी मनुष्य की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती। किसी का शरीर उत्पन्न हो ही नहीं सकता। हमारा जन्म ही नहीं हो सकता। तो क्या हम अपने जन्म को बुरा मानते हैं? नहीं मानते। क्या हम अपने जन्म को जो हम हमारे माता-पिता को कोई बुरा मानता है? नहीं मानता। तो धर्म से अविरुद्ध काम जो है वह भगवान कृष्ण की मूर्ति है। तो यही उन्होंने कहा बलम बलवताम चाहम काम राग विवर्जितम धर्मा विरुद्धो भूतेशु कामोस्म भरतश और इसी प्रकार जो काम सूत्र है वात्सयन का
(09:48) जो कामसूत्र है उसके प्रारंभ में ही वह कहते हैं धर्मार्थ कामे नमः धर्म को नमन है अर्थ को नमन है और काम को नमन है और फिर आगे कहते हैं तेषा समवाय पूर्वो गरियान जो धर्म अर्थ और काम जिनको को बहुत बार त्रिवर्ग कहा जाता है। चत चतुर्व हो जाता है जब हम मोक्ष भी ले लेते हैं। तो धर्म अर्थ और काम का जो त्रिवर्ग है इसमें वात्सयन कामसूत्र के लेखक कह रहे हैं सबसे महान धर्म है। फिर अर्थ है और फिर काम है। तो जब काम को हम धर्म से अविरुद्ध देखते हैं। धर्म के विरोध में नहीं। पर धर्म से सम्मत काम है तो वह तो पुरुषार्थ है। उसकी तो साधना करने को कहा
(10:32) गया है। धर्म, अर्थ और काम जब तीनों साध ले तभी मोक्ष साधना है। जब हम चार पुरुषार्थों की बात कर रहे हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। मोक्ष तो चलिए जिसको मिलेगा, जब मिलेगा जब देखेंगे वो वाली बात है। लेकिन धर्म, अर्थ और काम ये तीनों हमारी जिंदगी का एक अभिन्न अंग है। है ना? हम हमारी एवरीडे लिविंग का एक पार्ट है। सोसाइटी के फ्लरिश होने का एक पार्ट है। धर्म भी चाहिए, अर्थ भी चाहिए, काम भी चाहिए। तो हमारे जो एनसेेस्टर्स थे या जो पूर्वज थे उनको अगर काम की ये समझ थी और वो इस दृष्टिकोण से काम को देखते थे तो फिर आज के संदर्भ में हम नैतिकता में
(11:08) इतना क्यों तोलते हैं काम को और कामसूत्र को जी हमारा हमारे देश में बहुत परिवर्तन हुए हैं समय के साथ-साथ जो काम के प्रति हमारे पूर्वजों की दृष्टि थी बहुत व्यापक दृष्टि थी। हमारे पूर्वजों ने इसको संकीर्ण दृष्टि से नहीं देखा। देखा होता तो ना ग्रंथों में हमें ऐसा वर्णन मिलता। देखा होता तो ना हमें महाकाव्यों में ऐसे वर्णन मिलते। देखा होता तो ना हमें कामशिल्प देखने को मिलता। आज जो हमारी काम को पुरुषार्थ को लेकर जो दृष्टि है बहुत संकुचित हो गई और यह समाज में परिवर्तन किसी भी समाज में परिवर्तन आते हैं। मेरा निजी मत है जो काम को लेकर दृष्टि हमारी
(11:47) संकुचित होती गई। वह विदेशी आक्रांताओं और शासन के कारण भारत में अनेक वर्षों तक आक्रांताओं का शासन रहा। अ जिनकी दृष्टि में बहुत हेय था तो वो तो जहां दिखे शिल्प दिखे उसे ही तोड़ देना तो काम शिल्प तो दूर की बात है। और फिर जब अंग्रेजों का शासन आया तब हमने जो विक्टोरिया काल की नैतिकता को हमने भी अपना लिया। जिस तरह से वह महिलाओं को देखते थे। जी। जो जो विक्टोरिया काल की नैतिकता में बुरा समझा जाने लगा, वह हम बस स्वाभाविक है मनुष्य अह और समाज एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। समाज से अलग होके मनुष्य देखता नहीं है। जो भी हम कोई भी
(12:32) विचारक हो महान व्यक्ति हो वह भी किसी विशेष काल में, किसी विशेष परिस्थिति में जन्मता है। उसी में पनपता है। उसी में बढ़ता है और उसी में वह पंचत्व को प्राप्त होता है। तो उससे हटकर हम बहुत देख नहीं सकते। जिस प्रकार शासन आया, अह तुर्कों का शासन आया, फिर दिल्ली सल्तनत हो और मुगलों का शासन हो, फिर अंग्रेजों का शासन हो, तो समाज में नैतिकता में भी परिवर्तन आए। जो हमें दिखते हैं। उसके कारण आज हमारी विचारधारा ऐसी हो गई है कि हम उस व्यापक दृष्टि से काम को नहीं देखते। उस तटस्थ दृष्टि से नहीं देखते। उस सात्विक दृष्टि से नहीं देखते जिसमें दूध का दूध, पानी का
(13:12) पानी हमें दिख जाए। हम उसमें केवल कीचड़ देखेंगे। हम उसमें उससे घृणा करेंगे। हम उस पर हम उसकी हंसी उड़ाएंगे। लेकिन क्या आज उस दृष्टि से काम को देखना पॉसिबल भी है? आज के समावेश में जिस तरह का हमारा एनवायरमेंट है, जिस तरह के सेफ्टी कंडीशंस हैं, जिस तरह के हमारे कामकाज करने का तरीका है, जो भी हमारे समाज में आज चल रहा है, इस समावेश में आपको लगता है कि हम काम को उस अगर आप सात्विक दृष्टि कहें या उस बड़े दृष्टिकोण से कहें क्या देख सकते हैं आज? आज मुझे लगता नहीं हम हम जनसामान्य देख सकता है ऐसा मुझे नहीं लगता। पर विद्वान
(13:52) लोग देख सकते हैं। जानकार लोग देख सकते हैं। जो क्षीर नीर विवेक जानते हैं वो देख सकते हैं। और इसीलिए यह बात उन लोगों तक है जो जानना चाहते हैं कि ये काम शिल्प क्यों बनाए गए। खजुराहो पे जो मंदिरों में जो काम शिल्प है भांतिभांति के काम शिल्प हैं। अनेक मंदिरों पे हैं, शैव मंदिरों पे हैं। वैष्णव मंदिरों पे हैं। शाक्त मंदिरों पे हैं और बौद्ध हमें विहारों में मिल जाते हैं। मैंने स्वयं अपने नेत्रों से देखा है। अजंता की गुफाओं में मिल जाते हैं। चित्र मिल जाते हैं और जैन मंदिरों में है। तो हमारे पूर्वज ने क्यों मनाए? एक उत्सुकता होती है, एक रुचि होती है। जो
(14:27) व्यक्ति देख रहा है वह तो केवल वो जो आप खजुराहो जाएं अथवा कोणार्क मंदिर जाएं अथवा आप चले जाएं आप हम्पी चले जाएं। वहां जो पर्यटकों को जो घुमाता है वो चुपके से बुलाता है किसी को। एक व्यक्ति को अलग ले जाता है। कुछ दिखाता है फिर हंसता है। इस दृष्टि से तो नहीं देख सकते। यह तो बहुत तुच्छ दृष्टि है। उपहास की दृष्टि कोई जुगुप्सा की दृष्टि से देखता है। कोई किससे घृणा ये क्या बना दिया? ये तो मंदिरों में होना ही नहीं है। मंदिर हैं। मंदिरों में ऐसा कैसे बना दिया? आप देखें आज विश्व भर में हमारे मंदिर बनाए जा रहे हैं। बड़े मंदिर बना रहा है। मुझे लगता है
(15:04) सर्वाधिक सुंदर मंदिर और बड़े मंदिर स्वामी नारायण संप्रदाय के लोग बना रहे हैं। बना रहे हैं और इस संस्था के लोग मंदिर बना रहे हैं। अलग-अलग संस्थाओं के लोग मंदिर बना रहे हैं। पर काम शिल्प हम नहीं बना रहे हैं। हमारे पूर्वज बनाते थे। हम वही कह रहे हैं कि हम नागर शैली का अनुसरण कर रहे हैं। हम द्रविड़ शैली का अनुसरण कर रहे हैं। भारत में मंदिर निर्माण की कई शैयां थी। नागर शैली, द्राविड़ शैली, वेसर शैली और उत्कल शैली, मरु गुर्जर शैली इन सब में हमें काम शिल्प मिलता है। प्राचीन मंदिरों में। वो एक समय था जिसमें एक विकास है धीरे-धीरे। 10वीं,
(15:39) 12वीं शताब्दी तक। अह उसका शिखर पर यह कला पहुंची खजुराहो में। खजुराहो जैसा कामशिल्प भारत में कहीं नहीं मिलता। और ये विश्व में अनोखा है। और फिर धीरे-धीरे 14वीं 15वीं शताब्दी तक भी हमें देखे जाते हैं। हम मंदिरों में देखते हैं। कुछ इक्कादुक्का फिर हमें 17वीं 18वीं शताब्दी में मिलते हैं। पर उसके पीछे हमें नहीं दिखता कहीं। तो ये काम शिल्प जो है ये विलुप्त क्यों हो गया? अगर इसको हमने इतनी सात्विक दृष्टि से देखा बनाया तो फिर समाज में परिवर्तन हुए ना कोई भी कला विलुप्त तब हो जाती है जब ना बनाने वाले जब उसके कला का प्रदर्शन करने
(16:15) वाले बचते नहीं। कला की सराहना करने वाले बचते नहीं। कोई भी कला हो। लेकिन आज की डेट में भी टूरिज्म देखें तो खजुराहो में बहुत लोग जाते हैं। मंदिर देखने जाते हैं। हम भी काम शिल्प भी देखते हैं लोग और देखते हैं। पर बनाते नहीं है आजकल। मैं वही आपसे कह रही हूं। जैसे अगर इसके प्रचलन की बात करें या लोगों के रुझान की बात करें तो अगर मैं टूरिज्म का डाटा भी देखूं तो पिछले कुछ वर्षों में हम्पी जो कि एक बहुत छोटा सा शहर या गांव कह लीजिए कस्बा कह लीजिए वो आज की डेट में इतनी पॉपुलर टूरिस्ट डेस्टिनेशन बन गया है। खजुराहो बहुत लोग जाते हैं। कुणाक बहुत
(16:46) लोग जाते हैं। अजंता अलोरा तो बहुत पहले से ही एक टूरिस्ट ही डेस्टिनेशन है। तो फिर जब इसको सराहने वाले लोग हैं। तो आज की डेट आज की डेट में जो मंदिर की जो शिल्प शैली है उसमें हमें देखने को क्यों नहीं मिलता? अभी जैसे अ राम मंदिर का निर्माण हुआ और भी कई सारे मंदिर बनते रहते हैं। लेकिन हम उसमें कहीं भी काम का रिप्रेजेंटेशन नहीं देखते हैं। जी वही कारण है जो नैतिकता हम लोगों की है वो आज भी अंग्रेजी समाज की अंग्रेजी राज की अथवा मुगल राज की तुर्कों के राज की नैतिकता है। प्रभावित है? स्वाभाविक है कोई? आपको लगता है नैतिकता के अलावा मोरालिटी
(17:23) के अलावा और भी कोई कारण हो सकता है? मुझे तो नहीं लगता। मुझे लगता है जो समाज देखिए आपने बात की क्या ऐसा ऐसी बात आज कर सकते हैं यह भी है जो जिस प्रकार का समाज आज हमारा है जिस प्रकार भारत पहले व्यापक दृष्टि भी थी हमें काव्य में दिखता है हमें शिल्प में दिखता है तो मुझे लगता है इतना अपराध नहीं होता होगा इतना अपराध यदि होता हुआ होता जितना आज हो रहा है तो ऐसे शिल्प बनाए नहीं जाते ऐसे शिल्प बनाए थे अर्थात लोग उसको देखते थे मंदिरों में बावलियों में जो आपको काम शिल्प में केवल संभोग ही नहीं आता। काम शिल्प में शाल भंजिका होती है। उसका चित्रण होता है। शाल
(18:03) भंजिका जो आपने देखा होगा जो सांची के स्तूप में भी शाल भंजिका है। जिसमें एक अप्सरा सदृश्य किसी महिला को एक साल वृक्ष की डाली तोड़ते हुए दिखाया जाता है। और बहुत सौंदर्य का चित्रण है वो। एक सुंदर स्त्री का चित्रण है। विवस्त्रा स्त्री का चित्रण होता है। अप्सरा का चित्रण होता है। यह सब हमारे मंदिरों में थे। तो इसका अर्थ जब ऐसे स्थानों पर बनाए जाते थे तो निसंदेह लोग उसमें कुछ बुरा नहीं देखते थे। मंदिर तो देखिए हमेशा से पूजा का ही स्थल रहे होंगे। आस्था का स्थल रहे होंगे। वो परिभाषा आज नहीं बदली है। अगर आप कह रहे हैं 10वीं शताब्दी 12वीं शताब्दी का
(18:43) उल्लेख कर रहे हैं। अगर वहां पर यह सब होता था। लेकिन मंदिर तब भी आस्था का ही स्थल थे। तो लोग उसी भावना से जाते होंगे। जीवन का भाव अब उस काम को उस दृष्टि से देखा नहीं जाता। हमारे तब जीवन के प्रत्येक भाग का चित्रण हमारे मंदिरों में है। जैसे हमारे मंदिरों में आप देखें तो आखेट खेलते हुए राजा का चित्रण है। कहीं आप चले जाएं दत का चित्रण है। एलोरा की गुफा में दत का चित्रण है। भगवान महादेव और पार्वती का दत खेलते हुए चित्रण है। एक गंगा लहरी में एक श्लोक भी आता है। दत में जब भगवान शिव हार गए थे। उसको लेकर तो दत का चित्रण है, आखेट का चित्रण है और
(19:22) भिन्न-भिन्न अलग-अलग देशों से जो अतिथि आए हैं, जो व्यापारी आए हैं, उनका चित्रण शिल्प में रहता है। तो संपूर्ण जीवन के सभी गतिविधियों का चित्रण हमारे मंदिरों में रहता था और काम को एक अभिन्न अंग माना जाता था। त्रिवर्ग का एक भाग माना जाता था। काम की वस्तुतः व्याख्या क्या है? काम का शाब्दिक अर्थ यही है कि जो इच्छा है जो अभिलाषा है उसको काम कहते हैं। पर धर्म अर्थ और काम के संदर्भ में काम को नीति वाक्यामृत है। एक सोमदेव सूरी जैन विद्वान है। उन्होंने इस पुरुषार्थ की बहुत अच्छी व्याख्या की। बहुत सनातनियों ने भी इसको स्वीकार किया है। वह है
(20:04) आभिमानिक रसानुविद्धा यत सर्वेंद्रिय प्रीति सकाम जब पूरा तल पूरी तल्लीनता से जब आप सब कुछ भूल जाएं इस भाव के साथ रस से ओतप्रोत सभी इंद्रियों की प्रसन्नता हो रही हो जहां उसे काम कहते हैं। तो आभिमानिक अर्थात तल्लीनता के साथ रस से अनुविद्ध रस से पूरी प्रकार से ओतप्रोत जिसमें रस ही रस हो आनंद ही आनंद हो और सभी इंद्रियों को आनंद मिले उसे काम कहते हैं। तो यह काम का जो जो व्यापक दृष्टि थी पहले और काम के विषय में कामसूत्र में भी देखा जाए कामसूत्र में केवल संभोग की बात नहीं है।
(20:50) कामसूत्र में तो बहुत कुछ है। देखो एक नागर के जीवन की बात है। उत्सवों की बात है। कलाओं की बात है और केवल संभोग ही नहीं चुंबन आदि की बात है और सब कैसे आप तृतीय प्रकृति के लोग हैं उनकी बात है जो पुरुष नहीं है जो स्त्री नहीं है उनको किस-किस व्यवसाय में उनको लगाना चाहिए यह बात है काम का प्रयोग कैसे करना चाहिए कब करना चाहिए धर्म के सीमा में रहकर करना चाहिए ये बात से स्पष्ट कहते हैं। तो ऐसी दृष्टि में यदि देखा जाए तो धर्म से अरुद्ध काम है जो भगवान कृष्ण की मूर्ति है। भगवत गीता पढ़ने वालों को पता है। तो यह जानकार लोग तो आज जानते हैं पर
(21:31) धीरे-धीरे जैसे समाज हमारा भारत का समाज और समृद्ध होगा। हम अपने अतीत की ओर और जागृत होंगे। हम अपने अतीत में और गर्व का अनुभव करेंगे। हम अपनी दृष्टि से चलेंगे। हम विदेशियों की दृष्टि से नहीं चलेंगे। हम अपनी नैतिकता से चलेंगे। हम अंग्रेजी काल की विक्टोरिया कालीन नैतिकता अथवा मुगल काल की नैतिकता से हम अपने शिल्प को अपनी कला को नहीं देखेंगे। ये धीरे-धीरे परिवर्तन होगा और तब मुझे लगता है एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब हम कह सकेंगे गर्व से कि जो खजुराहो में काम शिल्प है जो कोणार्क में काम शिल्प है। जो हम्पी में अठा पट्टदकल में काम शिल्प है। वह भारत की
(22:06) एक ऐसी कला है जिसका कोई जिसका कोई किसी कोई तुलना नहीं है पूरे जगत में। कोई उसके सामने टिक नहीं सकता। जो उत्कृष्ट शिल्प बने हैं खजुराहो में यदि किसी ने देखे कोई उसको देखे उस उसको कला की ही दृष्टि से देख ले जिस जैसे मैं कहता हूं सुरेश देश पांडे जो एक लेखक हैं जिन्होंने दो पुस्तकें लिखी हैं। एक लिखी है भारतीय काम शिल्प मराठी में और एक उनकी इंग्लिश की पुस्तक है। उसका शीर्षक ही बहुत अच्छा है। उन्होंने लिखा है लव इन स्टोन। दिस इज़ लव इन स्टोन। ये लस्ट इन स्टोन नहीं है। लव इन स्टोन है। उसमें कोणार्क में एक चित्रण है प्रेमी युगल का जिनको मिथुन कहते हैं
(22:43) हम। और उन दोनों के मुखंडल पर जो आभा है जो एक प्रेमी और प्रेमिका के मुखंडल पर जो आभा होती है जो उनके स्मित में जो उनकी मुस्कान में जो झलकती है उसका शिला में चित्रण आप सोचिए कितना कठिन कार्य होगा। आप यदि चित्र बनाते हैं तो केवल वह टू डायमेंशनल है। पर यदि आप इसको पत्थर पर अंकित करें। पत्थर पर आप प्रसन्नता अंकित करें वह कितना कठिन और पत्थर पर आप यदि प्रेमी युगल की प्रसन्नता अंकित करें। जो भाव प्रत्येक प्रेमी युगल जिनका अनुभव करता है उसको पत्थर में उकेरना और जब आप जब व्यक्ति उकेर रहा है तब वो कर्म योग साध रहा है। जब कोई शिल्पकार
(23:29) शिल्प बना रहा है तब उसके मन में काम की भावना आ गई उसका ध्यान भटक जाए वो शिल्प नहीं बना पाएगा। उसको तो पूरा ध्यान से पूरा ध्यान देकर वहां शिल्प बनाना है। तो हम यदि उस दृष्टि से देखें तो हमें लगता है वह तो गौरवमय इतिहास है। हम अपने ₹10 के नोट पर कोणार्क का चक्र दिखाते हैं। कोणार्क के चक्र के अरों में काम है तो हम कोणार्क के चक्र को हम कहते हैं कि यह तो गौरव का आस्पद है। गौरव का स्थान है। हमारा राष्ट्रीय गौरव है। हम कहते हैं खजुराहो के मंदिर हमारे हेरिटेज है। हम्पी पूरा यूनेस्को हेरिटेज साइट है। तो यदि हेरिटेज साइट है तो उसमें काम है
(24:02) शिल्प हेरिटेज साइट नहीं। तो उसमें हम गर्व क्यों नहीं लेते? तो धीरे-धीरे समाज में परिवर्तन आता है। पर मैं जैसे मैंने कहा कुछ लोगों ने पुस्तकें लिखी हैं। पर जैसे-जैसे समाज और आगे बढ़ेगा मुझे लगता है एक प्रयास तो होना चाहिए लोगों को और जागरूक करने का कि ये काम शिल्प क्या है? ये उपहास की वस्तु नहीं है। ये घृणा की वस्तु नहीं है। यह गुपचुप बतियाने की वस्तु नहीं है। यह वस्तुतः कला का उत्कृष्ट रूप है जो गौरव का आस्पद है। हम कोशिश कर रहे हैं इस पॉडकास्ट के थ्रू। आज काम शिल्प को और ज्यादा एक्सप्लोर करने का आपने कहा यह विक्टोरियन
(24:35) संप्रदाय की नजरिए से ना देखें मुगलों के नजरिए से ना देखें तो काम शिल्प बहुत ही एक पावन एंड आर्ट इन प्योरेस्ट फॉर्म है जी राइट लेकिन आज हम हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं हम वैसे ही तिरस्कार करते हैं विक्टोरियन सभ्यता की जो भी मानसिकताएं थी उनका हम मुगलों की सभ्यता की जो भी मानसिकताएं थी चाहे वो महिलाओं को लेकर थी चाहे वो अमूमन जीवन शैली को लेकर थी सबका हम तिरस्कार बहुत अच्छे से करते हैं क्योंकि हम हिंदू राष्ट्र हैं। लेकिन जब बात आती है अपने हिंदू राष्ट्र और अपने हिंदू धर्म या सनातन धर्म के जो यह एंशिएंट आर्ट फॉर्म का पार्ट है उसको
(25:09) अपनाने की तो वहां पे एक बहुत ज्यादा हिचक है। वहां पे स्पेशली जो लोग हिंदू राष्ट्र के बारे में जितना ज्यादा बोलते हैं वो उतना ही चुप रहते हैं। चुप्पी साधते हैं जब काम शिल्प की बात आती है। लस्ट ही लस्ट देखते हैं उस क्या कहना चाहोगे? इस पर लज्जा का आप आप बताइए। मैं एक प्रयोग की बात करता हूं। आप यदि कहीं भी चले जाएं भारत में मुंबई हो, दिल्ली हो, कहीं भी चले जाएं और जो मार्ग पर चलते फिरते लोग हैं उनसे जैसे जो लोग प्रश्न करते हैं वैसा एक एक प्रयोग करना चाहिए। आप उनसे केवल यह प्रश्न पूछ रहे हैं कामसूत्र में क्या है? मुझे लगता है
(25:46) 10 में से नौ लोग तो हसेंगे, उत्तर नहीं देंगे। कुछ उल्टा सीधा बोलेंगे। जानकारी ही नहीं है इन लोगों को। जब हम जानेंगे नहीं किसी को तब हम उसको सराहेंगे कैसे? जानकारी मतलब लिमिटेड जानकारी तो है। एक एक ऐसा सच्ची जानकारी नहीं है। एक विकृत जानकारी कि कामसूत्र अर्थात सेक्स मैनुअल बस यही लोगों की जानकारी है। तंत्र अर्थात तांत्रिक सेक्स ऐसा विकृत रूप तंत्र के साथ भी यही हुआ है। तंत्र के साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है। तंत्र शब्द जो है हमारे यहां जो तंत्र शब्द है और पश्चिमी जगत में जो तंत्र शब्द है ऐसी विकृत उसकी समझ है कि आप पश्चिम जगत में
(26:20) बोले तंत्र तंत्र अर्थात तांत्रिक सेक्स बस और कुछ नहीं। हमारे यहां तो तंत्र तो एक शास्त्र है पूरा। तो तंत्र तो हमारे यहां एक एक विधा है। तंत्र का अथर्ववेद से संबंध बताया जाता है। तंत्र को हमने कभी हमारे पूर्वजों ने कभी उस दृष्टि से नहीं देखा। पर जब तंत्र जाके तांत्रिक सेक्स का ही पर्याय बन गया तो अब हम भी उसी दृष्टि से देख रहे हैं। वही वही बात है। मुझे लगता है कभी-कभी मैं विनोद में कहता हूं कि जब हमारे यहां योग था तब पूछ नहीं थी इसकी। जब विदेशों में जाकर गोरे लोगों ने योग करना प्रारंभ कर दिया तब हमें गौरव का अनुभव हुआ। तो हम
(26:56) बहुत बार विदेशियों की ओर देखते हैं कि जब वो कहेंगे हम महान है तब हम महान है। हमें ऐसा नहीं है। हमें कामशिप के प्रति भी एक व्यापक दृष्टि अपनानी चाहिए और इसको इसके विषय में और चर्चाएं होनी चाहिए कि क्यों मनाते थे मंदिरों में? कहां उत्कृष्टता है? क्या दर्शाया गया है? क्या भाव दर्शाया गया? अब जैसे मैं एक बात कहता हूं। खजुराहो की ही बात करते हैं। खजुराहो में आप यदि जाएं तो एक बहुत प्रसिद्ध शिव शिल्प है जो दो मंदिरों पे एक कांदरिया महादेव मंदिर पर एक अन्य मंदिर पे जिसमें चार लोगों को एक साथ रतिकर्म में चित्रित किया गया है। अब कोई कहे ये क्या है? यह
(27:32) तो बहुत बुरा है। पर नहीं जो ध्यान से यदि कोई देखे श्लोक से देखें ये तो और जी तो इसमें क्या यह तो यह तो बहुत अश्लील है। यह तो फूहड़ है। नहीं। आप यदि ध्यान से देखें जो वह चित्र है जिसमें एक पुरुष को तीन स्त्रियों के साथ दिखाया गया है। उसमें पुरुष किस मुद्रा में है? पुरुष उसमें शीर्षासन में है। पुरुष शीर्षासन में है। सिर भूमि पर टिकाया हुआ है और शरीर पूरा ऊपर है। शीर्षासन लगाना कितना कठिन है? ये योग का साधक ही जानता है। सबसे कठिन आसनों में से एक है। अब कोई कहे शीर्षासन में यदि आपका ध्यान एक क्षण के लिए टूटा तो क्या हो
(28:09) सकता है? आप बताएं क्या हो सकता है? अनर्थ हो सकता है। बिल्कुल। अनर्थ हो सकता है। जो आप करना चाह रहे हैं उसका पूरा उल्टा हो सकता है। उस शीर्षासन की मुद्रा में क्या ध्यान की का केंद्रित होना आवश्यक है? नहीं है। बिल्कुल आवश्यक है। तो उस शीर्षासन की मुद्रा में क्या कोई संभोग की क्रिया कर सकता है? कोई साधारण मनुष्य कर सकता है। संभवित सोच भी नहीं सकता। उसका विचार आया शीर्षासन टूटा गिर जाएगा। पर यहां हमने मंदिर में दिखाया कि एक शीर्षासन में राजा ही कह सकते हैं क्योंकि तीन स्त्रियां दिखाई गई हैं तो उनको हम तीन रानियां मांग सकते हैं राजा
(28:47) की अथवा किसी धना व्यक्ति की तीन पत्तियां मांग सकते हैं तो तो उसमें आपत्ति नहीं है। यदि हम कहें कि चलो कुछ और है तो ठीक है। पर हम उसको देखें। वहां एक वस्तुतः योगी दर्शाया इसको जो काम शिल्प पर जो बुक्स हैं इनको सेक्सो योगिक पोस्टर्स कहते हैं। योगासन है और योग के साथ भोगासन है। तो योग और भोग साथ में दिखाया गया। इसको तो हमारे समाज में योगी का चिन्ह बताया गया है। जो भोग के साथ एक हाथ में भोग और एक हाथ में योग लेकर चले वही सच्चा योगी है। राजा जनक इसके उदाहरण है। प्रत्यक्ष उदाहरण है। राजा जनक को कहा जाता है वो राजा भी थे और योगी भी थे।
(29:27) तो कहते हैं जोग भोग मह राखे कोई रामचरितमानस में गोस्वामी जी राजा जनक के विषय में कहते हैं उन्होंने भोग में योग को छिपा रखा है भीतर से योगी हैं बाहर भले सबको दिखे भोगी हैं तो जब बाहर से सबको दिखे भोगी है तो भोग में वह है पर अंदर से योगी है तो जो भुक्ति और युक्ति दोनों साध ले साथ में वह योगी ही कर सकता है और वही चित्रण है योगिक पोश्चर में शीर्षासन में एक व्यक्ति रतिकर्म में तीन स्त्रियों के साथ एक पुरुष को दर्शा है तो वह निश्चित रूप से योगी है। वह निश्चित रूप से योगी है और वैसी साधना तो असंभव ही है वैसा कर्म भी असंभव है साधारण
(30:10) लोगों के लिए। तो वहां मंदिरों पर बनाया गया तो इसका क्या अर्थ दिखाया गया कि जिस प्रकार योग और भोग साथ में लेकर इस शिल्प में दर्शाया गया है वैसा ही आप योग और भोग को साथ में लेकर चलें। मुझे तो लगता है एक गढ़ संदेश भी जाता है। चित्रकारी तो है ही। शिल्प तो उत्कृष्ट है ही। शिल्प तो आज भी कोई देख ले। यदि कोई उस पर हंसे नहीं। यदि कोई उससे घृणा ना करे। यदि उस पर कोई लज्जा का अनुभव ना करे और कला की दृष्टि से देखे तो घंटों देखता रहेगा उसको। घंटों टकटकी दृष्टि से देखता रहेगा। देखा कैसे बनाया होगा इसको। पत्थर में कैसे उकेरा
(30:47) गया होगा। क्योंकि इस इस मुद्रा में तो किसी को देखकर तो नहीं बनाया। पूरी कल्पना है। शिल्पकारों की क्या कल्पना रही होगी? उन्होंने कैसे मुद्राएं बनाई होंगी? उन्होंने कैसे मुख पर भाव उकेरे होंगे? उन्होंने कैसे पुरुष और स्त्री की आकृतियां बनाई होंगी। और कैसे पूरा सौंदर्य शास्त्र हम जो कहते हैं लनदो दाविची का एक चित्र है विट्रोवियन मैन। आपने देखा होगा नग्न है। जो हम कहते हैं मिशल एंजेलो का डेविड है। वह भी नग्न है। नग्न है। क्या इतने लोग देखने जाते हैं। क्या विदेशी क्या वहां के लोग लज्जित होते हैं इस शिल्प पर? वो तो गर्व का अनुभव करते
(31:23) हैं। यह मिशलांजलो का डेविड मास्टर पीस है। अगर हम रोमन आर्किटेक्चर की भी बात करें जो लोग विश्व के उस भाग में घूमे फिरे हैं। उनको पता है कि बहुत सारे वहां पे ऐसे न्यूड स्कल्प्चर्स हैं पेंटिंग्स भी और बहुत बड़े लेवल पर हैं। हम एंड हमारे यहां तो हां 16 चैपल में ही है। हां हमारे यहां तो फिर भी शिल्पकारी का जो जो ग्रैंडोर है वो तो डेफिनेटली है एक अलग तरीके का लेकिन वहां पर आउट एंड आउट ऑन अ वेरी ह्यूज स्केल आप देखते हो सिर्फ एक पुरुष या सिर्फ एक स्त्री को बिल्कुल निर्वस्त्र दिखाया गया है और बिल्कुल स्टैचू बनाया हुआ है और चौक बिल्कुल शहर
(32:01) के बीच में है। तो इस इस तरह से उन लोगों ने मतलब न्यूटिलिटी हैज़ बीन अ पार्ट ऑफ कल्चर एंड कस्टम्स एंड ट्रेडिशंस ओवर द वर्ल्ड। हम उसको शिल्प के रूप में देख रहे हैं। हम उसको कला के रूप में देख रहे हैं। हम वहां जाकर यहां भारत में एक जैसे मैंने कहा समस्या यह है कि भारत में आज की परिस्थिति सामाजिक परिस्थिति भी जो अपराध हैं स्त्रियों के प्रति उस भी हमें हो सकता है ऐसा हम भारत में ना कर पाएं। परंतु जो यदि हम शिल्प की दृष्टि देखें जो अतीत का भारत देखें उसमें ये बात नहीं रही होगी। तो हम धीरे-धीरे क्या हमें लगता है हम ब्रॉड माइंडेड होते जा रहे हैं। क्या हम
(32:32) नैरो माइंडेड होते जा रहे हैं धीरे-धीरे? मुझे लगता है हम नैरो माइंडेड अधिक हो गए हैं। हो गए हैं। आगे का तो मैं कह नहीं सकता। पर बहुत नैरो माइंडेड तो हैं ही हम जो हमारे पुराने ग्रंथों में आप जो गाथा सप्तशति ही देख लें। गाथा सप्तशई है उसमें जिस प्रकार की कविता है वैसी कविता कोई आज रच दे तो लोग तो पत्थर मारे। पर एक हमें जो एक बात है ना कुछ बातें हम कुछ रसिक जनों की बातें हैं। मैं इसको ऐसे देखता हूं एक हिंदी में मुहावरा है बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद। अदरक का स्वाद बंदर नहीं जान सकता। जो साहित्य में रस है उसको जिस जो रसिक नहीं
(33:14) है वो नहीं पहचान सकता। कुमार संभवम का आनंद वह नहीं ले सकता जो रसिक नहीं है। तो रस की जिसमें समझ ना हो वो उस रस की किसी भी विधा का वो साहित्य हो संगीत हो कला हो शिल्प कला में ही शिल्प आ गया। साहित्य संगीत कला तीन विधाएं हैं। साहित्य में नहीं ले सकता। संगीत में रस का आनंद नहीं ले सकता। और वह शिल्प में भी रस का आन नहीं। ये शिल्प तो कला जो शिल्प है चित्र हो अथवा पत्थर के शिल्प हो इनका कि एक समझ दूसरी चाहिए लेकिन दृष्टि दूसरी चाहिए मंदिर ही क्यों अगर इस तरह की कला को आपको निखारना भी है दिखाना भी है तो मंदिर ही क्यों काम का इतना आउट एंड आउट डिस्प्ले
(33:58) मंदिर जो कि एक आस्था का स्थल है पूजा का स्थल है वहां पर ही क्यों इसके लिए इसके विषय में लोगों के कई विचार हैं जो जो मैंने दो तीन लेखों के नाम गिना मतलब यह जो राजा उस उस समय के होते थे या जो लोग होते थे। उनके अपने घरों में बनाते, अपने महलों में बनाते। लेकिन मंदिरों में क्यों? क्योंकि मंदिर उस समय समाज का अभिन्न अंग थे और समाज में पुरुषार्थ तीन पुरुषार्थ दिए गए थे। कहीं-कहीं इनको जैसे बौद्ध गुफाओं के संदर्भ में इनको अंग्रेजी लेखकों ने नाम दिया टेंप्टेशन पैनल्स। टेंप्टेशन पैनल्स जो अजंता में हमें दिख जाते हैं। अजंता में हमें विवस्त्र
(34:30) स्त्रियां दिख जाती हैं। और पृथुलस्तनी विवस्त्र स्त्रियों के चित्र हैं। तो वहां तो बौद्ध भिक्षु जाते थे। वह तो बुद्ध के मार्ग का अनुसरण करने जाते थे तो उनके लिए क्या चित्र क्यों बनाएं? तो वहां लगता है कि जब आप इस स्थिति में पहुंच जाएं जब उस चित्र को देखकर भी आपके मन में विकार नहीं उत्पन्न हो रहा है तब आप योगी बन चुके हैं। तब आपने सच में साध लिया है कुछ। क्योंकि देखिए हिमालय में तो कोई भी व्यक्ति जोगी बन सकता है। वहां तो विकार का हेतु ही नहीं। वहां तो कोई आपको मन में विकार आए। ऐसी कोई स्त्री ही नहीं है। ऐसी कोई सुंदरी ही नहीं है। और यदि स्त्री की
(35:10) बात करें तो ऐसा कोई पुरुष नहीं है। परंतु जो राजा जनक की भांति समाज में रहकर विकारों के कारणों के बीच रहकर जिसका मन विकृत ना हो वही तो सच्चा योगी है। यही तो बात कुमार संभव में कही है कालिदास ने। विकार हेत सति विक्रयतेशा न चेतामित धीरा वास्तविक धीर कौन है? वास्तविक जो त्यागी है वह कौन है? वास्तविक योगी कौन है? जो विकार का हेतु सामने हो। काम शिल्प जैसा विकार का हेतु हो अथवा अजंता की के चित्र हो अथवा कोणार्क के चित्र हो खजुराहो के चित्र हो इनको देखते हुए भी इन पर दृष्टि पड़ते हुए भी जिसके मन में विकार नहीं आया वही तो ईश्वर साक्षात्कार का सच्चा
(35:55) अधिकारी है वही तो योगी बनने के योग्य है तो एक तरह से अगर आप अपना पूरा पाक साफ मन लेकर मंदिर में जा रहे हैं तो एक टेस्ट हो गया आपका बाहर ही अगर आपको उसमें कुछ और दिखता है या आपके मन में कुछ कुछ और भावनाएं आती है तो इसका मतलब शायद आप उस मन से नहीं हैं। अब उस मंदिर के आप योग्य नहीं है योग्य नहीं है अब तक एक एक मतलब एक विचार ऐसा है कुछ लेखकों ने ऐसा विचार व्यक्त किया है और मुझे तो लगता है कहीं-कहीं कुछ भी कारण रहा हो देखिए वास्तविक कारण क्या रहा है ये तो मैं जानता हूं इसका विकास हमें दिखता है हमें शाल भंजिका हो सांची
(36:28) के स्तूप की अथवा भरूत के स्तंभ में जो हमें दिखती हैं यक्षिणी दिखती हैं यक्षिणियां तो बहुत स्थानों पर चित्रित हैं। हमें कर्नाटका में बेलूर हो हड़बीड हो अथवा हम्पी में भी कुछ-कुछ स्थानों पर जो दिखता है। गुजरात में मंदिरों में दिखता है। राजस्थान में जैसा मैंने बताया रणकपुर में एक जैन मंदिर है। उसके साथ एक सुपार्श्वनाथ का मंदिर है। वहां कामशिल्प है। जैन मंदिरों में काम शिल्प है। दक्षिण भारत में अनेक स्थानों पे है। महाराष्ट्र में अनेक स्थानों पर है। तो मतलब ये कोई देवी देवता या कोई इष्ट का वो नहीं है कि इन पर्टिकुलर देवी देवताओं
(37:01) के लिए ही इस तरह के मंदिर बनाए जाते थे। नहीं। यह अक्रॉस स्पेक्ट्रम में जी जी यह बौद्ध मंदिरों में है। बौद्ध ये जो गुफाएं हैं उनमें हैं। जैन मंदिरों में है और सनातन मंदिरों में है। सबसे प्रसिद्ध क्योंकि कोणार्क में है और खजुराहो में है तो ऐसे लोगों की अवधारणा एक रहती है। ऐसे लोगों को एक भ्रांति रहती है। केवल हिंदू अथवा सनातन मंदिरों में है। ऐसा नहीं है। जैन मंदिरों में है, बौद्ध मंदिरों में है। तो वहां कुछ तो सोच रही होगी उन शिल्पकारों की। कहीं-कहीं ऐसा वर्णन आता है कि मिथुनों को उकेरना चाहिए मंदिरों के बाहर जिससे
(37:36) वह स्थान शुभ रहे तो कुछ एज अ गुड लक चाम कह सकते हैं। ऐसे भी कुछ सोच रही होगी पर यदि हम इसका ऐसा तो नहीं हो सकता मंदिरों पे और किसी शास्त्र में वर्णन नहीं है। तो शास्त्र में भी वर्णन है। क्योंकि जो कुछ दिख रहा है मंदिरों में आज तो कहीं ना कहीं तो हमारे पूर्वजों ने उसके विषय में विचार किया होगा लिखा होगा तो इसका वर्णन हमें मिलता है अग्नि पुराण में मिलता है और शिल्पशास्त्र एक ग्रंथ है एक कॉल आचार्य ने लिखा है शिल्पशास्त्र ग्रंथ उसमें वर्णन मिलता है तो अग्नि पुराण में लिखा गया कि मिथुनों को उकेरना चाहिए मंदिर के
(38:10) बाहर तो वहां श्लोक आता है मैं आपको पढ़ के सुना रहा हूं अग्नि पुराण के 100 चौथे अध्याय का 30वां श्लोक है तो वहां लिखा गया अध शाखा चतुर्थश प्रतिहारौ निवेशत मिथुन पाद वर्णाभि शाखा शेषम विभूषे तो शाखा होती है जो मंदिर के अलग-अलग स्तर होते हैं तो उसमें एक शाखा को कहते हैं शाखा विशेष एक पट्टी का नाम है तो शाखा के चतुर चतुर्थांश में प्रतिहारों को लगाना चाहिए द्वारपालों को जो पहरा देते हैं उनको और जो शाखा शेष है उसको मिथुनों से जोड़ों से सजाना चाहिए। मिथुन शब्द अपने आप में मिथुन का अर्थ संभोग भी है। मिथुन का अर्थ जोड़ा भी है। मिथुन राशि भी होती
(38:50) है जिसको जेमिना कहते हैं अंग्रेजी में। तो मिथुन से जुड़ाना चाहिए। ये तो अग्नि पुराण का वचन है। ठीक है? अब शिल्प शास्त्र के जो ग्रंथ है शिल्प प्रकाश एक बहुत प्रसिद्ध ग्रंथ है। तो वहां तो इसके विषय में एक पूरी इसका कि क्यों करना चाहिए? इसका जैसे आप कहें इसके पीछे क्या रहस्य है? उसको भी खोला गया है। तो वहां कहा गया है कि जगत का मूल ही काम है। अब जैसे मैं एक बात कहूंगा हो सकता है कुछ लोगों को सुनने में अटपटी लगे। जब कोई चिकित्सक आपके शरीर का स्पर्श करता है तो क्या आपको लगता है कुछ अनाचार हुआ? नहीं लगता। पर जब कोई अपराधी करता है तो लगता है?
(39:33) जब प्रसव होता है स्त्री का तो जो चिकित्सक हैं जो चिकित्सालय में लोग हैं वो शरीर का स्पर्श करते हैं। वो बालक को बाहर निकालते हैं नवजात शिशु को तब क्या किसी को लगता है कुछ कुछ अपराध हुआ? नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि चिकित्सक की दृष्टि वैसी नहीं। चिकित्सक भी शरीर को छू रहा है। कोई अपराधी अथवा बलात्कारी भी छू रहा है। दोनों की दृष्टि में अंतर है। दोनों के मन के भाव में बहुत अंतर है। मैं एक और उदाहरण देता हूं। जो पुरुष हैं उनमें ग्रंथि होती है जिसको लेकर प्रोस्टेट ग्रंथि होती पुरुषों में और बहुत से लोगों को भारत में भी और विदेशों में भी बहुत से
(40:14) लोगों को प्रोस्टेट से कैंसर भी होता है। कुछ लोगों को कुछ लोगों का एनलार्ज प्रोस्टेट होता है। उसकी शल्य क्रिया होती है। प्रोस्टेट की जांच के लिए एक मेडिकल टर्म है। उसको कहते हैं डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन डीआरई। तो उसमें चिकित्सक पुरुष के गोदा में उंगली घुसाकर जांच करता है। वहां ग्लव्स पहनकर मेडिकल ग्लव्स पहनकर जांच करता है। तो क्या यह बुरा कृत्य है? किस लिए कर रहा है? देखने के लिए कि प्रोस्टेट के उपचार की आवश्यकता है अथवा नहीं है। तो वहां हम तो बुरा नहीं मानते। हम चिकित्सालय में जाते हैं। कितने लोगों
(40:57) का प्रोस्टेट का उपचार है? हमारे हमारे माता-पिता के की पीढ़ी में ही बहुत से लोगों का हुआ है। परिवार में सुना होगा नहीं तो संबंधियों में सुना होगा। तो जब चिकित्सक देख रहा है तब उसके मन में वो भाव बुरा भाव नहीं है। जब काम शिल्प को उकीर्ण किया जा रहा है। जब काम शिल्प को बनाया जा रहा है तो ना बनाने वाले के मन में वैसा भाव है जो बुरा भाव है। जैसा एक चिकित्सक के मन में नहीं है। जब वह डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन कर रहा है अथवा कोई गनेकोलॉजिस्ट जब किसी की जांच कर रहा है महिला की अथवा प्रसव में सहायता कर रहा है। हमें यह दृष्टि देखनी है। तब केवल
(41:34) और केवल वह अपना कार्य कर रहा है कुशलता से। वह चिकित वो शिल्पकार भी अपना कार्य कर रहे थे कुशलता से। सौंदर्य को पत्थरों में उखेर रहे थे। जिसको लव एंड स्टोन कहा सुरेश देशपांडे ने। सौंदर्य को भावों को मन के भावों को जो जिस भाव का अनुभव प्रत्येक पुरुष और प्रत्येक स्त्री प्रत्येक मिथुन करता है उन भावों को चित्रित कर रहे थे कालजई शिल्प बना रहे थे उनकी यह दृष्टि थी तो उसको देखने वालों की भी वही दृष्टि जैसे मैंने कहा रस जब तक जानता नहीं रस की समझ जब तक नहीं है तब तक कवि की रस रसिक ही कवि के रस को समझ सकता है भाव को हम उस भाव को तभी समझ सकते हैं
(42:11) जब हम शिल्पकारों के विषय में उनके स्तर पर पहुंच के समझे तो यही यही बात शिल्प प्रकाश में कही गई है कि जगत का काम जगत का मूल ही काम है। मूलम तू जगत कामात भूताद जाते सारे प्राणी काम से जन्म लेते हैं। मूलभूत तथा भूतः कामन प्रविलयते काम में विलीन होते हैं। तो यह जो चित्रण है ये तो जगत के मूल का चित्रण है। और क्या कहा है? और कहा है जैसे हम कहते हैं जो कालिदास ने भी बात कही है और जो तुलसीदास जी ने भी बात कही है। तुलसीदास जी ने कहा है जगत मात पितु शंभू भवानी। शंभू भवानी जगत के माता-पिता हैं। और कालिदास ने भी कहा है जगत पितरौ वंदे का पार्वती
(42:47) परमेश्वर हम मैं जगत के माता और पिता पार्वती और भगवान शिव की वंदना करता हूं। तो यदि हम काम को एक व्यक्ति विशेष में नहीं परंतु ईश्वर में और जगत की माता के विशेष के संदर्भ में देखें तो वह तो सृष्टि का उद्गम है। उससे तो सारी सृष्टि हो रही है। और वही कहा गया है जो शिव साक्षात महालिंगम शक्ति भगत स्वरूपिण यह शिल्पक प्रकाश में आता है। तद योगेन जगत सर्वम काम क्रिया स उच्चते काम क्रिया को यदि हम उस स्तर पर देखें यदि हमने कहा मंदिर पे कैसे बना दिया तो हमने मंदिर पे उस स्तर पर सोच के बनाया कि जो महालिंग है वह शिव का स्वरूप
(43:31) है और जो भग है जो योनि है वह शक्ति का स्वरूप है और शिव और शक्ति के सम्मेलन से ही सृष्टि होती है और इसमें यदि किसी को बुराई दिखती हो तो अपने माता-पिता को जाकर कहे कि आपने जो काम किया बहुत बुरा किया क्योंकि हम सबका जन्म माता और पिता के के संजोग से ही हुआ है। जैसे शिव और शक्ति के मिलन से सृष्टि हुई है, वैसे माता-पिता के शरीर के मिलन से मनुष्य का शरीर बनता है। नित्यानंद जी जो हमारे पूर्वज थे क्या उनको जो यह काम शास्त्र है जिसकी हम बात कर रहे हैं। कामसूत्र की बात कर रहे हैं। काम शिल्प की बात कर रहे हैं। क्या हमारे
(44:13) पूर्वजों को काम के थ्रू कोई साधना का मार्ग पता था? क्या काम जो है लस्ट है या सेक्स है अगर उसको उस नजर से देखें वहां से कोई साधना का कोई ट्रांसिडेंटल रूट है क्या अश्लीलता और आध्यात्म दो टर्म्स हैं जो लोग बोलते हैं और अमूमन तौर पर प्रश्न भी उठाते हैं कि अश्लीलता से आध्यात्म तक का उन्हें क्या कोई मार्ग पता था वैसे तो हम हम इसको अश्लीलता के तौर पर नहीं देख रहे हैं ना बात कर रहे हैं उस संदर्भ में लेकिन अगर एक ले मैन की लैंग्वेज में बात की जाए तो क्या इन दोनों के बीच में कोई कनेक्शन है साधना की जहां तक बात है वहां
(44:46) मतलब बेसिक ली व्हाट आई एम आस्किंग इज कि जो सेक्सुअल एक्ट्स हैं या फिर जो काम शास्त्र की हम जितनी भी बात कर रहे हैं उसका आध्यात्म से कोई कनेक्शन है क्या? अध्यात्म से जहां तक त्रिवर्ग का साधन है वह तो है। त्रिवर्ग के पश्चात ही मोक्ष की साधना है। त्रिवर्ग यानी धर्म अर्थ धर्म अर्थ और काम। धर्म अर्थ और काम की साधना के पश्चात ही मोक्ष की साधना है। तो वह तो है। जैसे रघुवंश में कहा बहुत सारी अलग-अलग बातें आती हैं। जैसे रघुवंश में क्या कहा गया है? रघुवंश के राजाओं के विषय में शैशवेभस्त विद्या नाम यौवने विषय वार्ध मुनिवृत्ति नाम योगिनते
(45:23) तनुत्तजाम जो रघुवंश के राजा थे वो शैशव में विद्या का अभ्यास करते थे। यौवन में विषयों की इच्छा करते थे। जब वृद्धावस्था थी तब मुनियों के जैसा जीवन जीते थे और योग से अपने शरीर का त्याग करते थे। तो इसमें ब्रह्मचर्य, गारहस्थ्य, वानप्रस्थ, सन्यास आ गया। तो गृहस्थ जीवन का काम से संबंध दिखा दिया गया। कहीं-कहीं बात आती है त्रिवर्ग का साधन प्रतिदिन होना चाहिए। प्रातः काल मनुष्य धर्म का साधन करें। दिन में फिर अर्थ का साधन करें और रात्रि काल में काम का साधन करें। यह बात भी आ गई। काम से क्या सीधा साधना है? काम से क्या सीधा योग? कहीं-कहीं वर्णन आता है।
(46:03) छिटपुट ग्रंथों में कॉल कॉल कॉल मार्ग में कहीं-कहीं वर्णन आता है। कहीं-कहीं अह ये शव साधना आदि और वाम मार्ग में कहीं वर्णन आता है। पर मुख्यधारा में ऐसा वर्णन नहीं है। तो यह भी एक मुझे कारण है कि जब देखिए शिल्प देखना एक बात है और ऐसी साधना करना एक सर्वथा भिन्न बात है। शिल्प बनाना तो आर्ट है। कला है। आपने बना दिया दो लोगों ने देख लिया। पर उस क्रिया को अथवा वैसी उसको साधना करना किसी के साथ वह सर्वथा भिन्न है। उसके लिए बहुत व्यक्ति को वाम मार्गी होना पड़ेगा अथवा कॉल मार्गी होना पड़ेगा जो दक्षिण मार्ग में तो संभव नहीं है। तो
(46:47) हमने मुख्यधारा में ऐसा तो नहीं देखा कि उससे कुछ सिद्ध और साधन कॉल मार्ग कौन से मार्ग हैं? वाम मार्ग जैसे दक्षिण मार्ग और वाम मार्ग है। तो वाम मार्ग में जो मैथुन है वह पंचमकारों में आता है। अह तो उसमें शव साधना भी होती है। उसमें जिसे आप कह सकते हैं जो अघोरी लोग करते हैं। तो अघोरा जो रॉबर्ट सोबडा की पुस्तक है उसमें आप देख सकते हैं। अह उसमें कहीं-कहीं मृत शरीर के साथ संभोग का भी वर्णन है। पर वह वाम मार्गी है। वह वाम मार्ग बहुत सीमित है। वह वाम मार्ग मुख्य धारा में नहीं आ सकता। यह तो है। जिस प्रकार अघोरी मुख्यधारा के नहीं है। अघोरी
(47:24) अपने अलग संप्रदाय में है और उनका अलग है सब कुछ। और उनके लिए उनके जैसा बनने के लिए बहुत अलग ही व्यक्ति को होना पड़ता है। मुख्यधारा में वह नहीं है जिसका कारण भी है क्योंकि सामान्य जन सामान्य व्यक्ति उसको उतार नहीं सकता जीवन में और उससे बहुत अनाचार भी हो सकता है। कॉल मार्ग जो कौल मत है उसमें भी ऐसा कहीं-कहीं दूतियों का वर्णन आता है। पर ऐसा कहीं मुख्यधारा में मुझे ऐसा वर्णन दिखता नहीं। साधना के रूप में नहीं शिल्प के रूप में तो है। शिल्प के रूप में तो मंदिरों में दिखता है। शिल्प प्रकाश आदि ग्रंथों में है। पर साधना के रूप में ऐसा नहीं है। कुछ आधुनिक
(48:00) विचारक हैं जो हां लेकिन सोचते हैं। तंत्र सेक्स जो आजकल बहुत पॉपुलर हो गया। वेस्ट मेक टर्म कामसूत्र इस सबका कनेक्शन जब बोलते हैं अरे ये तो हमारे शास्त्रों में है और कनेक्शन वो स्पिरिचुअलिटी से ही करते हैं। धर्म से अरुद्ध होकर हम उसका यही है। जब तक धर्म से अरुद्ध काम है तब तक वह आपकी उन्नति में सहायक है। वह भगवान कृष्ण का स्वरूप है। मैं अभी मंदिरों के बारे में भी सोच रही हूं। जैसे हम बात कर रहे हैं तो एक चित्रण मेरे सामने हो रहा है। हम अब अगर धर्म, अर्थ और काम तीनों की बात करें तो मंदिर धर्म का स्थान है। एक आपके वहां पे इष्ट
(48:32) देव हैं। धर्म की बात होती है। अर्थ का देखें तो कई मंदिरों में सोने से मूर्तियां बनाई जाती है या धन चढ़ाया जाता है। चढ़ावा होता है। और भी बहुत सारे भिन्न-भिन्न प्रकार के चांदी के वस्त्र और इस तरह की चीजों का होता है। काम जैसा आपने कहा कि इस तरह के शिल्पकारियों में है। तो मतलब जो मंदिर है तीनों का एक तरह से बहुत ही मोक्ष ही मोक्ष वहां प्राप्त कर सकते हैं। प्राप्त कर सकते हैं साधना से। सो एक तरह से जो चारों पुरुषार्थ हैं पुरुषार्थ हैं उनका पूरा एक संगम जो है पुरुषार्थ चतुष्टय का साधन ही तो सनातन धर्म में कहा गया है। तो यहां तो वचन आगे
(49:03) ये भी आता है कि जो व्यक्ति तीन तीन वर्गों का साधना नहीं करता धर्म अर्थ और काम की वो तो जीते हुए भी नहीं जीता है। वो जीते हुए भी नहीं जीता है। वो धोकनी के समान है। जो सांस लेती है पर जीवित नहीं। तो यह हमारे पूर्वजों की दृष्टि थी। इसीलिए काम शिल्प का एक विकास अद्भुत विकास है। बहुत सारे मंदिर हैं जहां पर काम कला है। तो वही काम कला का जो चित्रण है मंदिरों में उसके विषय में शिल्प प्रकाश में कहा गया है कि जो काम कला से जो हीन स्थान है उसको त्यक्त मंडल कहते हैं। त्यक्त मंडल अर्थात उसका त्याग कर देना चाहिए। ऐसा मंदिर जाने यहां यह भी
(49:41) विचार गई उसके बिना मंदिर अधूरा है। अच्छा शिल्प कला में ये कह रहे हैं शिल्प प्रकाश में कहा गया है कि स्थानम काम कलाहीनम त्यक्त मंडल उच्चते त्यक्त मंडल है। वो तो अरण्य के समान है। वो तो मंदिर नहीं है। यह भी विचार हमारे यहां है। तो आप कोणार्क देखें अथवा खजुराहो देखें। बहुत सारे मंदिरों में भारत के प्रत्येक राज्य में मैंने सूची जो मैंने बनाई है। इस पर कभी समय मिला और अनुकूल परिस्थितियां रही तो एक पुस्तक भी लिखने का विचार है। काम कला का इतनी व्यापकता है हमें कुछ दिनों पहले बिहार में कहीं खुदाई में कुछ काम कला की मूर्तियां मिली और
(50:15) मैंने शीर्षक जब पढ़ा समाचारों का कि शॉकिंग स्कल्प्चर फाउंड इन एरोटिक स्कल्प्चर फाउंड इन बिहार। इसमें शॉकिंग क्या है? पूरे जब भारत में था तो यहां शौक क्या है? बिहार में कभी आज तक नहीं मिला तो बिहार में क्या होता नहीं था क्या? हो अरे आप जब आपको ये देवगढ़ में हैं जब खजुराहो में हैं, जब कोणार्क में है, जब गुजरात में है, जब राजस्थान में है, जब पूरे भारत में है, कर्नाटक में है, आंध्र में है, बौद्ध गुफाओं में है, जैन मंदिरों में है। यहां तक कि कुछ-कुछ शील तो मैंने कुतुब मीनार के पास जो खंडित मंदिर है वहां भी देखे। अप्सराओं के यक्षणियों के इस प्रकार के
(50:53) चित्र तो इसमें इसमें आश्चर्य क्या है? पर लोगों के पास समझ ही नहीं जानकारी नहीं तो इसको ऐसा विषय जिसको समझने के लिए भी और जिसको समझाने के लिए भी बहुत गहरे अध्ययन की आवश्यकता है। इसीलिए इस पर जैसा आपने कहा इस पर हम इस रिकॉर्डिंग के पहले बात कर रहे थे। इस पर पॉडकास्ट होते भी नहीं है। इस पर लोग बोलते भी नहीं है। बोलने से लजाते भी हैं। लोग कहते हैं कि कोई क्या कहेगा। पर जैसा आपने कहा धर्म अर्थ काम सब कुछ साथ में लेकर जीवन का चित्रण है मंदिरों में तो मंदिर अर्थ से ही बन रहा है मंदिर धर्म के हेतु ही बन रहा है और मंदिर में काम का चित्रण भी है वह भी है
(51:29) हम इनको ऐसे सोच सकते हैं ये अप्सर अप्सराएं और गंधर्व हैं जिनका चित्रण किया गया तो अप्सराएं गंधर्व तो पति-पत्नी धर्म से अविरुद्ध काम हो गया और कहीं-कहीं अन्य भी चित्रण आते हैं पर मुख्यतः जो चित्रण हैं वो पुरुष और स्त्री के ही हैं और इनमें अह हमने जो दिखाया है, वह संसार में क्या-क्या होता है और जहां-जहां कुछ अनिष्ट दिखाया, वह संसार में क्या नहीं होना चाहिए। हम पहले ब्रॉड माइंड माइंडेडनेस और नैरो माइंडेडनेस की बात कर रहे थे कि आज हमारा जो समाज है क्या नैरो माइंडेड होता जा रहा है। इन चित्रणों में आपने एक उल्लेख भी किया कि एक पुरुष और
(52:06) तीन स्त्रियां साथ में हैं और ऐसा भी है कि पुरुष और पुरुष साथ में हैं। स्त्रियां और स्त्रियां साथ में हैं। सेक्सुअलिटी जो है वो भी हमारे एंशिएंट इतिहास का पार्ट रही है। इसको हमने कभी ऐसी दृष्टि से नहीं देखा कि यह इतना बड़ा अपराध है इसके लिए प्राण दंड दे दो। होमोसेक्सुअलिटी के लिए जगह है। हमारे कामसूत्र में भी है और हमारे कामूत्र में वर्णन है और धर्म शास्त्रों में वर्णन है। इसको अपराध तो माना गया है पर इसको कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं माना गया कि प्राणदंड दे दिया जाए। इसके लिए प्रायश्चित बताए गए हैं। और कामसूत्र में जो वर्णन आता है वहां यह बताया गया है
(52:44) तृतीय प्रकृति का। पुरुष है, स्त्री है और एक तृतीय प्रकृति है जो ना पूर्णतः पुरुष है, ना पूर्णतः स्त्री है। अब कामसूत्र में वात्सयन कहते हैं उनको कहां-कहां काम करना चाहिए क्योंकि देखिए वात्सयन जो हैं वो एक ऋषि के ही समान है। संसार का वह हित चाहते हैं। तो कह रहे हैं तृतीय प्रकृति में है तो यह व्यवसाय करें। जैसे जो चंपी आदि का व्यवसाय करें अथवा कुछ अन्य व्यवसाय करें। तो इन सब का वर्णन आता है। तृतीय प्रकृति को हमने कभी मैं तो कहूंगा हमारे यहां एक पुराण में भगवान विष्णु का एक नपुंसक अवतार भी है। वो कौन सा अवतार है?
(53:23) ये एक अवतार है। मुझे अभी संदर्भ तो ध्यान नहीं है। पर एक इस पर मेरा एक चलचित्र है। भगवान विष्णु का एक नपुंसक अवतार है जिसने असुरों का संहार किया है। आप अर्धनारश्वर देख लें। क्या है? अर्धनारश्वर आधा स्त्री है, आधा पुरुष है। और आप इसके चित्रण देख लें। अर्धारेश्वर का शिल्प में देख लें अथवा चित्र में देख लें। आधा स्त्री आधा पुरुष दोनों तत्व एक साथ लेकिन उसकी तो हम पूजा करते हैं। तो फिर होमोसेक्सुअलिटी को हम लोग इतना गलत मानते हैं। वह भी विक्टोरियन दृष्टि है। हमने कभी किसी को ऐसा नहीं कहा। हमारे सनातन धर्म में इसको मुख्यधारा में नहीं देखा गया। यह
(53:59) बात सच है। इसको एक अपराध माना गया। जो कर ले यदि तो उसके लिए प्रायश्चित करें। कहा गया है पर तृतीय प्रकृति भी कहा गया है। जब वात्सयन इसको तृतीय प्रकृति कहते हैं। हम इसको तृतीय प्रकृति कहते हैं। प्रकृति अर्थात नेचर तो इसको हमने प्राणदंड भी नहीं दिया। इसको बढ़ावा नहीं इसको जो जिसकी यदि प्रकृति है तो ठीक है। उसके लिए अलग व्यवसाय है। पर मुख्य धारा में इसको नहीं इसको स्वीकृत किया गया। पर इसका प्राणदंड भी नहीं दिया। तो इसको इसको कहते हैं देखिए तटस्थ दृष्टि से देखा। तटस्थ दृष्टि होती है। उससे देखा गया जिससे हम तथ्यों को देखते हैं। तथ्यों को देखते हैं
(54:36) तो तथ्यों से हम प्रेम नहीं करते। उनसे घृणा नहीं करते। ऑब्जेक्टिव तरीके से देख जिसे कहते हैं इसको उदासीन दृष्टि से आप किसी को उदासीन दृष्टि से देख रहे हैं तो वैसा देखा वैसा देखा गया है यह दृष्टि हमारे यहां रही है तो ये व्यापक दृष्टि हमारे पूर्वजों की थी और आज जो दृष्टि है वो जो भी कातिहासिक कारण रहे हैं उस कारण से बहुत संकुचित हो चुकी है। व्यापक उतनी दृष्टि रही नहीं। साहित्य हो, कला हो, शिल्प हो, संगीत हो इन सब में हम ये सभी कलाओं की बात कर रहे हैं। साहित्य की बात कर रहे हैं। अगर हम अपने पुराने अह साहित्य की रचनाओं को पढ़ें, अह
(55:12) संस्कृत में पढ़ें या हिंदी में पढ़ें, तो बहुत ही ब्रॉड माइंडेडनेस ऑफ़ द ऑथर जिसने लिखी है उसकी माइंडेडनेस भी दिखती है और पढ़ने वाले की और उसकी स्वीकृति अगर की गई और आज भी उनका उल्लेख कर रहे हैं इतने वर्षों के बाद तो एक स्वीकृति भी दिखती है पूरे समाज में उस तरह के लेखन के लिए, उस तरह के आर्ट फॉर्म के लिए। लेकिन हम साहित्य और आर्ट के बारे में भी अगर कुछ देखें हमने पास्ट में ऐसे डिबेट्स देखे हैं जहां पे अगर कोई खजुराहो के बारे में या वहां का कुछ उल्लेख करें तो लोग बहुत उसको अच्छा नहीं मानते हैं और तुरंत ही मतलब लड़ाई झगड़े पर बात बनाती है। तो जो
(55:43) नैरो माइंडेडनेस की तरफ हम जाते जा रहे हैं। अ इसका स्यूशन आप क्या देखते हो? क्या मतलब और क्या हमें इंटीग्रेट भी करना चाहिए? अगर हमारे समाज में बहुत सारे लोगों की दृष्टि ऐसी ही है कि वो ऐसे ही समझेंगे तो उन्हें एजुकेट करना चाहिए या फिर एक्सेप्ट करना चाहिए कि अभी हम उस समय से निकल आए हैं और इस समय में जिन चीजों की मान्यता है उनको ही प्रैक्टिस और उनका ही प्रचलन बढ़ाया जाए और वो कोशिश ना की जाए कि हम अपने मतलब एक हाथ से तो हम अपनी हिस्ट्री अपने इतिहास अपने एंशिएंट विज़डम को इंटीग्रेट करना चाहते हैं। लेकिन दूसरे हाथ पे हम ऐसा समाज बना रहे हैं जो इतना
(56:20) इनटोलरेंट है। अह हर चीज को लेकर और वह इनटॉलरेंस इन इवेंचुअली हमारे हिस्टोरिकल पर्सेक्टिव और हमारे एंशिएंट विज़डम और शास्त्रों की तरफ और काम शास्त्र और जो भी हम बात कर रहे हैं उस सब की तरफ भी आती है। मुझे ऐसा लगता है देखिए समाज में परिवर्तन कभी भी कोई अचानक करना चाहे तो उसके बहुत दुष्परिणाम होते हैं। समाज में परिवर्तन धीरे-धीरे हो तो वह ठीक है। दृष्टिकोणों में परिवर्तन रातोंरात तो होता नहीं है। हमारा जो दृष्टिकोण है अह किसी भी बात के प्रति हो, काम शिल्प के प्रति हो अथवा साहित्यिक जो उल्लेख हैं उनके प्रति हो, किसी और भावना के प्रति हो। धीरे-धीरे
(56:59) परिवर्तन होता है। हमारी ही पीढ़ी में हमने परिवर्तन देखा है। अह जो पक्ष आज सत्तारूढ़ है, वह विपक्ष में था बहुत वर्षों तक। जो पक्ष आज विपक्ष में है, वह सत्तारूढ़ था बहुत वर्षों वर्षों तक। हमारे ही परिवार में हमारे ही परिवार के बड़े बूढ़े माता-पिता जिस पक्ष को आज विपक्ष में बैठना पड़ रहा है, उसके लिए मत देते थे। आज अधिकतर लोग नहीं देते। पर यह परिवर्तन रातोंरात तो नहीं हुआ। ये परिवर्तन धीरे-धीरे हुआ। परिवर्तन धीरे-धीरे ही होता है और उसमें हम सब मुझे लगता है हम माध्यम ही हैं। तो आपको लगता है आज के समाज में कामसूत्र
(57:31) का या काम शिल्प का इंटीग्रेशन पॉसिबल है और होना चाहिए? धीरे-धीरे धीरे-धीरे। तो जैसा भगवान कृष्ण भगवत गीता की ही बात करता हूं। निमित्त मात्रम भवस्य साचित केवल निमित्त बन जाएं। हम उस पर परिणाम की चिंता ना करें। तो हम सब निमित्त हैं। धीरे-धीरे ज्ञान के माध्यम से जब तक हम किसी वस्तु को पूर्णतः जान नहीं लेते तब तक उसको समझ नहीं पाते। उसको स्वीकार यदि उससे पहले कर लें उसको उसका तिरस्कार कर दें तो वो ठीक नहीं है। तो यदि हमें इसको कहना है कि इसकी स्वीकारिता बढ़े अथवा इसमें दृष्टि में परिवर्तन हो तो धीरे-धीरे हो। मुझे
(58:08) प्रसन्नता होगी। यदि कोई सच में चाहता है कि हम ऐसी मंदिर बनाएं। भले नागर शैली हो, दविड़ शैली हो, बेसर शैली हो, मरुग गुर्जर शैली हो, उत्कल शैली हो, कोई एक नया मंदिर बनाएं। कोई एक नया ऐसा मंदिर बनाए जो सच में पुरानी भारतीय प्राचीन वास्तु शिल्प को और मध्यकालीन वास्तु शिल्प को एक उनकी उनका अनुकरण करने वाला अथवा उनको उनकी कला के शिखर का सम्मान करने वाला यदि कोई मंदिर बने जिसमें कुछ काम शिल्प हो तो मुझे प्रसन्नता हो। तो यह मेरा विचार है, निजी विचार है। इसमें यदि हम यही सोचने लगे कि लोग क्या कहेंगे, फिर तो कहना कठिन है। पर ये
(58:52) धीरे-धीरे होता है परिवर्तन। हो सकता है देखिए एक रात में तो कुछ होता नहीं पर हो सकता है। अ जैसे-जैसे समाज बढ़ेगा, कामसूत्र के विषय में लोगों की समझ बढ़ेगी। तो बहुत सी बातें हैं जिनको पहले हम बुरा समझते थे, आज बुरा नहीं समझते। हम काम के बारे में बात कर रहे हैं ना। हम समझने की कोशिश कर रहे हैं कि काम का पौराणिक या वास्तविक अर्थ क्या है जो आपने बहुत अच्छे से एक्सप्लेन भी किया कि काम को हम कैसा समझते थे और आज आज के समावेश में कैसा समझने लगे हैं तो काम के अगर हम वास्तविक अर्थ तक जाएं तो हम खुद को कैसे बेहतर जान सकते हैं काम के
(59:29) रूप में हम अपने आप को और नियंत्रित कर सकते हैं। अपने आप को और संतुलित कर सकते हैं। हम काम वासनाओं को समझ सकते हैं। उनका धर्म सम्मत प्रयोग कर सकते हैं। और कैसे देखिए जैसे मतलब प्रैक्टिकल एप्लीकेशन क्या है इस विज़डम का? अगर कोई कामसूत्र भी पढ़ना चाहे तो आप कह रहे हैं सिर्फ उसमें लस्ट और सेक्स ही नहीं है। वो सेक्सुअल नहीं है और बहुत कुछ है। तो ऐसा क्या और बहुत कुछ है जिससे लोग अपने विचारों को उत्कृष्ट बना सकते हैं। खुद को बेहतर जान सकते हैं और अपनी सोच का विकास कर सकते हैं। एक तो कलाओं का वर्णन है। नगर जीवन का वर्णन है और बहुत कुछ जो कामसूत्र में
(1:00:07) आश्चर्य होगा लोगों को जानकर कि विवाह किस कन्या से करना चाहिए इस पर विचार इस पर विचार तो विवाह किस कन्या से करना चाहिए काम किस पुरुष से करना चाहिए उसका है नहीं है देखिए ऐसा है कन्याएं वहां भी पीछे रह गई हैं देखिए ऐसा है बहुत बार बात कही जाती है तो किसी को अभिलक्षित करके कही जाती है। किसी यदि आप पुरुष से बात कर रहे हैं तो आप उसको कहेंगे ऐसी कन्या से विवाह करो। अब यदि वही बात किसी स्त्री को कही जाएगी तो हम उसको उसके अनुसार ढाल कर कह देंगे ऐसे पुरुष से विवाह करो। तो जो काम सूत्र लिखा गया नागर पुरुष उसका श्रोता माना गया है
(1:00:40) तो ऐसा लिखा कैसी कन्या से विवाह करना चाहिए। तो अब निसंदेह वहां यह भी लिखा गया हो वहां हम समझ सकते हैं कैसे पुरुष से विवाह करे कन्या ऐसी भी बात समझी जा सकती है उसको केवल किसी एक लैटिन भाषा में फ्रीज़ होता है मटिस मटेंडिंड विद द अप्रोप्रियट चेंजज़ मेड यू कैन अंडर अंडरस्टैंड इट इन द कॉन्टेक्स्ट ऑफ़ अ फीमेल आल्सो तो ये है जैसे वहां जब पुरुषों के जितने भी काम शास्त्र हैं रति मंजरी हो और ये कामसूत्र हो और भी जो अनंग रंग है कल्याणमल का रति मंजरी है। कामसूत्र है। इसमें पुरुषों के प्रकार स्त्रियों के प्रकार बताए गए। इनमें यह भी
(1:01:16) बताया गया किस प्रकार के पुरुष की किस प्रकार की स्त्री से रति हो तो सर्वश्रेष्ठ रहता है। पर यह भी कहा गया यदि ऐसा ना हो पाए तो इस प्रकार से रति कर्म में अधिक आनंद आएगा। तो स्त्रियां पुरुषों दोनों के लिए तो वहां एक विचार आता है कामस सूत्र में किस प्रकार की स्त्री से विवाह किया जाए। तो वहां लिखा कि इसमें ऐसा दोष ना हो, ऐसा दोष ना हो, अमुक दोष ना हो, अमुक गुण हो। फिर वह उसको कहकर वात्सन एक अंत में बात कहते हैं। पर मुख्य बात यह है जिस स्त्री से प्रेम हो उस स्त्री से विवाह करना चाहिए। पुरुष जिस स्त्री में अनुरक्ति हो और प्रीतियों के
(1:01:54) भी प्रकार शास्त्र में बताए गए हैं। एक प्रीति का बहुत अच्छा इतना विश्लेषण है। देखिए जो संभोग है वह तो केवल एक भाग है प्रीति का। प्रीति का एक एक प्रीति का प्रकार है आभ्यासिकी प्रीति। आभ्यासिकी प्रीति है जिसमें जिस वस्तु का आप अभ्यास कर सकते हैं। अभ्यास किसका करते हैं? जैसे आखेट खेलना हो गया। प्राचीन समय में लोग आखेट खेलते थे। पशु पक्षियों को मारते थे। आज तो ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि आज परिस्थिति दूसरी है। पहले इतने पशु लेकिन आज दूसरी प्रक्रियाएं हैं। दूसरी एक्टिविटीज हैं जिनमें चतुरंग खेलना, चेस खेलना अथवा चित्रकारी
(1:02:28) करना, कोई शिल्प करना जिसमें आप अभ्यास करते-करते और अच्छे हो जाए। कहते आभ्यासिकी प्रीति हो तो बहुत अच्छा है। पति और पत्नी में आभ्यासिकी प्रीति हो अर्थात कॉमन इंटरेस्ट जिसे हम आज कहते हैं। तो इस सब को ह्यूमन इमोशंस को समझना हो तो हम इस इससे हमें लाभ अवश्य मिल ही सकता है। कैसे जीवन जीना हो? हां कुछ बातें हैं जो आज प्रासंगिक नहीं है। पर उनको हम छोड़ दें। हम तो समाज में परिवर्तन हो गया है। पर इतिहास से हम सीख तो सकते ही हैं। काम शिल्प अथवा कामसूत्र हो। बहुत कुछ सीख सकते हैं। कुछ को हम जीवन में नहीं उतार सकते। कुछ को जीवन में
(1:03:01) उतार सकते हैं। तो जो वही जो कहते हैं हंस हंस जो होते हैं वह दूध का ग्रहण कर लेते हैं और पानी को छोड़ देते हैं। हंस गुण जो कहते हैं जड़ चेतन गुण दोषमय विश्व की करतार भगवान ने इस इस संसार को जड़ चेतनमय बनाया है और दोष और गुणमय बनाया है। गुण और दोषों से युक्त बनाया है। और जो हंस रूपी जो साधु हैं, हंस संत गुण गह पयत परिहरि वारि विकार जो हंस रूपी साधु हैं वह गुण रूपी दूध को तो ग्रहण कर लेते हैं और विकार रूपी जल को छोड़ देते हैं तो जो गुण है उसको अपना लिया जाए जो दोष है अथवा जो आत्म प्रासंगिक नहीं है उसे छोड़ दिया
(1:03:39) जाए नित्यानंद जी अब इस चर्चा के एंड पर आते-आते आई नो हमने जो दोनों चर्चाएं की हैं दोनों एपिसोड्स किए हैं वो बड़े ही नीश टॉपिक्स हैं और मेरे माइंड में कुछ-कुछ ऐसे सवाल आ रहे थे कि उस मंदिर का रहस्य बता दो इसका यह बता दो जो आमून तौर पर मैंने देखा कई पॉडकास्टर्स करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि उन उन सवालों से ना हमारी लाइफ में कोई वैल्यू ऐड नहीं होता है। तो यहां पे सिर्फ वैल्यू ऐड की मैं बात करना चाहती हूं। गति से पॉडकास्टों में रहस्य खुलते हैं। मुझे लगता है एक दो वर्षों में संसार में कोई ऐसा रहस्य नहीं होगा जो जो अनखला रह
(1:04:10) जाएगा। ज्ञान को परोसना यही सबसे बड़ा रहस्य उद्घाटन है। आप किसी को ज्ञान देख रहे हैं, सच्चा ज्ञान दे रहे हैं। वही रहस्य उद्घाटन रहस्य खोलना। अब कोई कोई पिटारा खोल के कोई कोष निकलेगा अथवा कुछ ऐसी बात निकलेगी। अब जितने मुझे लगता है रहस्य खोलते हैं रीलों में उनमें आधे तो पता नहीं क्या परोसते हैं। झूठ ही परोसते हैं। इसका रहस्य उसका रहस्य। और आजकल पॉडकास्टों के जो थंबनेल बन रहे हैं। आप यदि उनकी कभी सर्वे करें तो मिस्ट्रीज रिवील्ड। मिस्ट्रीज रिवील्ड मिस्ट्री अनलॉक्ड क्लोज़र की तरफ आते हुए मैं आपसे पूछना चाह रही थी कि हमने पिछले पॉडकास्ट में सफलता
(1:04:46) की परिभाषा पर इसको अंत किया था और आज भी अगर आप कोई और दृष्टिकोण से काम के दृष्टिकोण से अगर सफलता की परिभाषा देना चाहे तो क्या होगा? जैसा काम जो है वह सभी तल्लीनता से रस से ओतप्रोत सभी इंद्रियों की प्रीति को काम कहते हैं। जब व्यक्ति काम पुरुषार्थ को समझ ले और जिसके साथ उस पुरुषार्थ का साधन कर रहा है। अर्थात पति-पत्नी काम पुरुषार्थ को समझ लें और फिर काम का साधन करें तो मुझे लगता है भले वो कामसूत्र हो पढ़ें अथवा कामशास्त्र दे के और ग्रंथ देखें अनंग रंग रति मंजरी आदि अथवा कामशिल्प को और समझें तो मुझे लगता है उस
(1:05:32) पुरुषार्थ में उन्हें और प्रीति होगी और आनंद होगा और यही आनंद यही जो धर्म से अरुद्ध काम का साधन यह भगवान कृष्ण की मूर्ति है और धर्म से अविरुद्ध काम का साधन करके वे दूसरे पुरुषार्थों की ओर भी ध्यान दें तो निश्चित रूप से जितना काम को हम समझेंगे हम उन पुरुषार्थों को अधिक जानेंगे और उसको और सफल बनाएंगे। बहुत ही खूबसूरत नित्यानंद जी बहुत-बहुत धन्यवाद आपका कि आज एक बार फिर से हमें चर्चा का आपने मौका दिया इस संवाद में आप आए। बहुत-बहुत धन्यवाद आपका। जी आपके सभी दर्शकों और श्रोताओं को नमस्कार और हमारे लिसनर्स जो इस पॉडकास्ट में अब
(1:06:17) तक बने हुए हैं। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आप हमारे पॉडकास्ट को पसंद करते हैं। अपना सपोर्ट देते हैं। चैनल को सब्सक्राइब कीजिएगा। बेल आइकन को प्रेस कीजिएगा ताकि हर हफ्ते दर हफ्ते आपके पास हमारे अपडेट्स आते रहें। आप में से कई लोग मैं देखती हूं कमेंट सेक्शन में ऐसे एपिसोड या गेस्ट की रिक्वेस्ट करते हैं जिनके साथ हम पहले भी एक या दो या पांच छह एपिसोड्स बना चुके हैं। तो हमारी जो पॉडकास्ट की लिस्ट है वो काफी लंबी है। लगभग 130 140 पॉडकास्ट आई डोंट नो ये कब रिलीज होगा। उस हिसाब से हमारे आ चुके हैं। तो आप पूरी लिस्ट को
(1:06:48) चेक आउट कीजिएगा। आपके इंटरेस्ट के टॉपिक्स आपको वहां पर जरूर मिलेंगे। पॉडकास्ट को लाइक, कमेंट और शेयर कीजिए ताकि और लोगों तक भी पहुंच पाए। YouTube के जो एल्गोरिदम है या जो जिस भी प्लेटफार्म पर आप इसे सुन रहे हैं जो एल्गोरििदम्स हैं वो कुछ इस तरह से डिजाइन होते हैं कि मीनिंगफुल कन्वर्सेशन को अपनी एक ऑडियंस ढूंढनी पड़ती है और उस ऑडियंस को फिर उन्हें स्प्रेड करना पड़ता है। सो थैंक यू फॉर सपोर्टिंग मी सो फार इन दिस जर्नी एंड आई विल सी यू इन द नेक्स्ट एपिसोड। नमस्कार।
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