Thursday, April 9, 2026

The Vibration of Om | Ancient Wisdom for Modern Life with Nityananda Misra | TJW 135

The Vibration of Om | Ancient Wisdom for Modern Life with Nityananda Misra | TJW 135

Author Name:Shobha Rana

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@iamshobharana

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=9NyRMJRQ8PE



Transcript:
(00:01) भारत की भूमि से जितने धर्म निकले हैं उनमें ओम तो समान है ही। ओम जिस प्रकार कहते हैं जो तीनों कालों का भी रूप है और तीनों कालों से परे भी है। ईश्वर का वाचक क्या है? प्रणव है अर्थात ओम है। इसलिए ओम की उत्पत्ति कहीं से नहीं। ओम ब्रह्म है। इस ब्रह्मांड में जितनी भी ध्वनियां हैं वो सभी ध्वनियों में ओम जो है वो सर्वश्रेष्ठ है और सबसे पहली ध्वनि वही है। जिन्होंने वेदों को नहीं माना पर ओम को माना। आप जैन धर्म की ओर जाएं तो णमोकार मंत्र है। उसके प्रारंभ में ओम आता है। आप बौद्ध धर्म की ओर जाएं तो ओम मणिपद हुम यह मंत्र आता है। आप सिख धर्म की ओर
(00:37) जाएं तो एक ओंकार है। जब एक ही मंत्र पे आप बार-बार ध्यान करते हैं। अर्थ भावना करते हैं। माला जपते हैं। कोई संप्रदाय का मंत्र होता है। कोई राम मंत्र जप रहा है। कोई कृष्ण मंत्र जप रहा है। कोई शिव मंत्र जप रहा है। उसको बार-बार जपते-जपते जो एक जब एक तादाद में होता है, एक तल्लीनता होती है। और उस तल्लीनता में जब आप खो जाते हैं, तब आप सब कुछ भूल जाते हैं। ओम का सबसे पहला उल्लेख किस शास्त्र से या वेद से आता है? जो मिश्रण करते हैं कि ओम में सब साइंस है, बिग बैंग है। ये सब मैं इस पर बहुत अधिक महत्व इसको नहीं देता। हम अपनी संस्कृति को ऐसे क्यों महान बनाना
(01:09) चाहते हैं कि इसमें वह सब ज्ञान है जो विदेशों में था। ओम की उत्पत्ति हुई कैसे? साउंड ऑफ यूनिवर्स कहते हैं। पहला अक्षर। हमारा विश्वास है कि ओम सृष्टि का पहला स्वर है। सृष्टि की पहली ध्वनि है। प्रथमा अक्षर है। ध्रुवाक्षर है। अनादि है। अनंत है। तो अगर किसी को संस्कृत में नाम रखना है अपना या अपने बच्चों का तो कौन से राइट सोर्सेस होंगे? अध्यात्म का अर्थ है जो अपने अंदर हम देखते हैं वह अध्यात्म। अपने अंदर झांकने के लिए कोई ना कोई हमें साधन चाहिए। वह साधन क्या है? वो साधन ओम है। अभी आप जिक्र कर रहे थे मांडुक्य उपनिषद
(01:40) का जिसमें ओम के अलग-अलग चेतना के जो प्रकार हैं या स्टेजेस हैं, स्टेट्स ऑफ कॉन्शियसनेस है उसके बारे में बात की गई है। तो कौन से डिफरेंट स्टेजेस ऑफ कॉन्शियसनेस हैं। ओम और ध्यान के बीच में क्या कनेक्शन है? ओम सबका स्रोत है पर ओम का स्रोत नहीं है। नमस्ते द जर्नी विद इन पडकास्ट में आपका स्वागत है मेरे यानी शोभा राणा के साथ। मैं एक इमोशनल इंटेलिजेंस और माइंडसेट कोच हूं और साथ ही इस पॉडकास्ट की होस्ट और क्रिएटर भी हूं। द जर्नी विद इन पॉडकास्ट का ऐ है कि आपको आपकी बेस्ट लाइफ, आपकी ड्रीम लाइफ डिजाइन करने में मदद कर सकें।
(02:26) और यह हम करते हैं बाय टेकिंग द जर्नी विद इन अपने खुद की तरफ वापस लौट आने से, अपने आप को, अपने अंतर्मन को, अपने इनर वर्ल्ड को बेटर समझने से। जब हम अपने थॉट्स, फीलिंग्स, इमोशंस, लाइफ इवेंट्स जो हमारे साथ चीजें हो रही हैं उनको गहराई से समझते हैं तो हम खुद को बेहतर समझ पाते हैं और हम जिस ड्रीम लाइफ को जीना चाहते हैं उस तक जाने का एक रास्ता तय हो पाता है। आज के इस एपिसोड में हम द जर्नी विदिन करने वाले हैं थ्रू द लेंस ऑफ अंडरस्टैंडिंग ओम ओमकार जिसे हम कहते हैं। ओम और ओमकार की हमारे जीवन में आज क्या सिग्निफिकेंस है?
(03:01) इसकी उत्पत्ति कहां से हुई? शुरुआत कहां से हुई? हमारे एंशिएंट टेक्स्ट में शास्त्रों में इसका क्या वर्णन मिलता है? ओमकार जो है एक एक कॉमन ध्वनि है। एक कॉमन साउंड है। एक कॉमन मंत्र है। बहुत सारे अलग-अलग धर्मों में जैसे कि बौद्ध धर्म, जैन धर्म, अह हिंदूज़्म, अह सिखिज्म इस सब में ओम का एक बहुत ही अह गहरा स्थान है। तो, ओम का हमारी आज की लाइफ़ में क्या महत्व है? ओम का स्पिरिचुअलिटी और आध्यात्म में क्या महत्व है? ओम का नाट्यशास्त्र में क्या उल्लेख मिलता है? जब हम ओम की एक बहुत गहरी समझ पैदा करेंगे, अपने श्वासों से ओम को कनेक्ट कर
(03:38) पाएंगे। कहीं ना कहीं हमारे इस पॉडकास्ट का यह भी उद्देश्य है कि आप खुद से डीपली कनेक्ट करें। अपनी सांस, अपने माइंडसेट से डीपली कनेक्ट करें। तो ओम कैसे हमें हेल्प कर सकता है? यह मंत्र हमें क्या हमारा मार्गदर्शन कर सकता है आज के समाज में? आज इस संवाद के लिए हमारे साथ हैं नित्यानंद मिश्र जी जो कि एक बहुत ही प्रचलित लेखक हैं। इन्होंने शास्त्रों का बहुत गहरा और गहन अध्ययन किया है और वहां से ये आज बहुत ही डिटेल में हमें डिफरेंट-डिफरेंट लेंसेस और शास्त्रों के थ्रू समझाने वाले हैं ओमकार के महत्व। इनकी एक पुस्तक भी है ओम
(04:13) माला। ओमकार का अर्थ। मैं आपको इनकरेज करूंगी कि उसे भी जरूर देखिएगा। जरूर पढ़िएगा। और आज के इस एपिसोड को शुरू करने से पहले आपसे अनुरोध है कि चैनल को सब्सक्राइब करें। बेल आइकन को जरूर प्रेस करें ताकि आपके पास हर वीक हमारे पॉडकास्ट की अपडेट आती रहे। आप में से कई लोग कमेंट सेक्शन में ऐसे टॉपिक्स या ऐसे गेस्ट के साथ पॉडकास्ट रिक्वेस्ट करते हैं जिनके साथ हम ऑलरेडी एक या दो एपिसोड कर चुके हैं या जिस थीम या टॉपिक पर हम पांच छह सात एपिसोड्स पहले ही कर चुके हैं। तो हमारी प्लेलिस्ट को जरूर चेक आउट कीजिएगा। हमारे तकरीबन 130 140 एपिसोड्स अभी मौजूद
(04:48) हैं और हम हफ्ते दर हफ्ते नए एपिसोड्स रिलीज़ करते रहते हैं आपके लिए। अह तो चलिए आपका सपोर्ट हमारे साथ बनाए रखिए और अब मिलते हैं नित्यानंद मिश्र जी से ऑन द जर्नी विद इन पॉडकास्ट। [संगीत] नमस्कार नित्यानंद जी। नमस्कार। बहुत ही खुशी हो रही है आपसे मिलके। काफी समय से हम चर्चा कर रहे थे कि हम इस पॉडकास्ट का आयोजन करें और टॉपिक जो है ओम जिस पर आपने पुस्तक भी लिखी है ओम माला जो मैं थोड़ा अपने व्यूअर्स को यहां दिखाना भी चाहूंगी। इसके बारे में तो हम आज चर्चा करेंगे ही। लेकिन सबसे पहले मैं जानना चाहती हूं कि
(05:34) बहुत सारे आई एम बैंगलोर, आई एम अहमदाबाद, आई एम आईआईटी, ग्रेजुएट्स ये सब हमारे शास्त्रों की तरफ क्यों जा रहे हैं? मेरे पॉडकास्ट पे आप हैं। अमीनात्रा के साथ भी हमने कुछ दिन पहले बात की थी। वो भी आई एम अहमदाबाद की स्टूडेंट रही हैं। हमारे साथ स्वामी मुकुदानंदा थे जो कि आईआईटी आईएम ग्रेजुएट हैं। तो आप सभी लोगों का शास्त्रों में अपनी एंशिएंट विज़डम की तरफ संस्कृत को पढ़ने में रुचि कैसे? क्योंकि मैं भी एक इंजीनियर रही हूं। मुझे पता है कि आप बहुत लॉजिकल बेंट ऑफ माइंड से चलते हैं। जब आप इंजीनियरिंग और एमबीए मैनेजमेंट को पढ़ते हैं तो कहीं ये
(06:09) शास्त्र और ये हमारी डेली अपब्रिंगिंग का पार्ट भी नहीं होते हैं। एंड रूटीन लाइफ का पार्ट नहीं होते हैं। और जब आप इतने प्रीमियम इंस्टट्यूट के एंट्रेंस एग्जाम्स के लिए तैयारी करते हैं तो एक बहुत अलग माइंडसेट में आप होते हैं। देन व्हाई संस्कृत? जी। अ लोग आ रहे हैं। मुझे लगता है पहले भी लोग आ रहे थे। आज अधिक आ रहे हैं। उसके कई कारण हैं। एक तो भारत में भारत की आर्थिक स्थिति पिछले कुछ दशकों से बहुत परिवर्तित हुई है। यह हमें अपने बाल्यकाल में जो हमारे अनुभव हैं उन्हीं से ज्ञात होता है। मैं बचपन में बहुत अधिक मैं ट्रेन में यात्रा करता था। मेरे बालक
(06:46) नहीं करते। जब हमारे माता-पिता थे, मेरे मेरे पिताजी प्रशासनिक सेवा में थे। भारत शासन में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परिषद में वैज्ञानिक थे। तो जिस परिवेश में हम लोग बड़े हुए तब जो मध्यम वर्ग था तब जो घर की स्थिति थी और आज जो आईआईटीआईएम से पढ़कर लोग हैं जो उच्च मध्यम वर्ग है भारत में उसमें बहुत परिवर्तन हो चुका है। बहुत कायाकल्प एक प्रकार से हो चुका है। तो जब व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं। एक समय था जब केवल ऐसा कहा जाता था पढ़ लिख लो नहीं तो कुछ नहीं कर पाओगे। कुछ नहीं कर पाओगे। घर नहीं ले पाओगे, पैसा नहीं कमा पाओगे, फिर क्या क्या
(07:31) कमाओगे, क्या खाओगे, क्या खिलाओगे? आज यह प्रश्न बालकों से नहीं पूछा जाता। विशेषतः जो मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के परिवार से आते हैं। क्योंकि आज बहुत से लोग खेल कूद में जा रहे हैं। पहले भारत ओलंपिक में कभी पदक लाएगा यह भी सपना हुआ करता था। आज हम पदक ला रहे हैं। तो आज लोग देख रहे हैं पढ़ाई लिखाई के अतिरिक्त भी बहुत सारे अ पैसा कमाने के भी नाम कमाने के भी हमारे पास मार्ग हैं। उन पर लोग चल रहे हैं। तो भारत में जैसे-जैसे समृद्धि बढ़ेगी आगे भी बढ़ेगी। वैसे-वैसे लोग जो पहले की स्थिति थी केवल काम पर ध्यान दो, पैसा जुटाओ और पढ़ाई लिखाई करो, काम करो।
(08:13) बस यही 9 टू फाइव जॉब करो। उससे बाहर निकलने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ेगी। जब आप आर्थिक रूप से सशक्त हो जाते हैं तब आप जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हैं। तब आप कोई साहित्य की ओर जाता है। कोई संगीत की ओर जाता है। कोई कला की ओर जाता है। कोई विश्व भ्रमण करता है। कोई समाज सेवा में आता है। तो इसी प्रकार जो आईआईटीआईएम के लोग हैं वह विभिन्न क्षेत्रों में जा रहे हैं। तो आईआईटीआईएम में प्रतिभा का तो एक संचय होता ही है। वे देश से देश के अलग-अलग कोनों से प्रतिभावान लोग जाते हैं और यही प्रतिभावान लोग फिर अलग-अलग मार्गों में
(08:54) जा रहे हैं। कोई स्टार्टअप कर रहा है, कोई कहीं जा रहा है। तो ये केवल ऐसा नहीं है केवल शास्त्र की दिशा में जा रहे हैं। ऐसा नहीं है। लोग अपनी संस्कृति को समझने के लिए कुछ मेरे मैं जब आईएम में पढ़ता था तो मेरे साथ ही एक मानसी प्रसाद नामक एक छात्रा थी। उन्होंने उनको इन्वेस्टमेंट बैंकिंग में उनको अवसर मिला था काम करने का। उन्होंने उसको छोड़कर अब उन्होंने एक संगीत का संग्रहालय बनाया बोर में। कुछ लोग मेरे जो साथ थे वो आईएएस बन गए हैं। कुछ लोग आईपीएस में गए हैं। तो अलग-अलग क्षेत्रों में गए हैं। और अब लोग अधिक जागरूक हो गए हैं। अपनी संस्कृति के
(09:32) प्रति भारत जब समृद्ध था तभी भारत की संस्कृति भी समृद्ध थी। जब आर्थिक रूप से समृद्ध था। यही बात अर्थशास्त्र में चाणक्य ने कही है। उन्होंने अपना मत दिया है कि धर्म और काम भी अर्थ से सिद्ध होते हैं। इसलिए मैं अर्थ का प्राधान्य स्वीकारता हूं। धर्म, अर्थ और काम में। जब हम आर्थिक रूप से सशक्त होंगे तब धर्म और काम दोनों को और शक्ति शक्तिशाली बनाएंगे। यह चाणक्य का मत है। उनका मत है। कुछ लोग अनेक लोग तो धर्म को ही प्रधान मानते हैं। पर चाणक्य ने प्रायोगिक बात की है। प्रैक्टिकल बात की है कि अर्थ प्रधान है। तो आर्थिक समृद्धि के कारण लोग अब अलग-अलग
(10:10) क्षेत्रों में जा रहे हैं और इनमें से कुछ लोग जिन आपने नाम गिना है वो संस्कृत के अध्ययन में हमारे प्राचीन साहित्य के अध्ययन में, कला के अध्ययन में, संगीत के अध्ययन में जा रहे हैं तो उनमें से मैं कुछ हूं। मतलब बहुत दिलचस्प लगती है यह बात कि इतने वर्षों की पढ़ाई के बाद, इतने वर्षों के कार्यकाल के बाद संस्कृत की तरफ चले जाना और उसको लेवल जीरो से उठाना, पढ़ना, सीखना, समझना उसके बाद शास्त्रों की तरफ देखना, उन्हें पढ़ना, उनका अध्ययन करना, फिर वहां से कुछ निकाल के लाना और आज की जो यूथ है, जो युवा वर्ग है या फिर जो लोग हैं उनके लिए उस तरह से परोसना कि
(10:46) उनको उसमें रुचि पैदा हो। उसमें से आपका एक बहुत ही इंपॉर्टेंट रोल है। नित्यानंद जी आपने पुस्तक लिखी है ओम के बारे में। ओम माला मीनिंग ऑफ द मिस्टिक साउंड या फिर हिंदी में ओम माला ओमकार का अर्थ आपने ओम के लिए लगभग 250 के करीब जो है पन्ने इस पुस्तक में भर दिए हैं ओम के बारे में। तो ओम का इतना सिग्निफिकेंस क्यों है? और आपने ओम पर ही पुस्तक लिखने का क्यों सोचा? जी। ओम हमारे सारे वांग्मय का बीज है। यह केवल सनातन धर्म में ही नहीं अपितु बौद्ध धर्म में, जैन धर्म में और सिख धर्म में भी ओम का बहुत महत्व है। हमारे यहां ऐसा विश्वास है सनातन धर्म में ओम वैदिक
(11:32) मंत्रों में सबसे ऊपर है। हम मानते हैं वेदों को सर्वोपरि मानते हैं और वेदों में वैदिक मंत्रों में ओम सर्वश्रेष्ठ है। कालिदास का एक बहुत सुंदर महाकाव्य है रघुवंश। उसमें वे तुलना देते हैं। कालिदास को उपमा का सम्राट माना जाता है। कालिदास से बढ़िया उपमा कोई नहीं दे सकता। तो कहते हैं उपमा कालिदास्य उपमा जो अलंकार है वह कालिदास का ही है। बहुत अच्छी उपमा देते हैं। वे कहते हैं जब मनु वैवस्वत के विषय में बात करते हैं तो कहते हैं माननीय मनीषणाम मनु को और फिर कहते हैं आसीन महिता माध्य प्रणव छंद सामव वैवस्वतो मनुर नाम माननीयो मनीषणा
(12:20) आसीन महिक्षिता माध्य प्रणव छंद सामव जो वैवस्वत मनु थे जो महर्षियों के लिए और मनीषियों के लिए माननीय थे। वे राजाओं में ऐसे प्रथम थे जैसे वैदिक मंत्रों में प्रणव प्रथम है। जैसे वैदिक मंत्रों जो वैदिक मंत्रों में प्रणव का स्थान है। एक तो वेदों का स्थान हमारे सनातन धर्म में सबसे ऊपर है। और वैदिक मंत्रों में सबसे ऊपर किसका स्थान है? प्रणव का। अर्थात ओम का। वैसे मनोवैवस्वत राजाओं के बीच थे। तो यह कालिदास ने कहा है जो भारत के संस्कृत भाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि यदि हम उनको कहें तो अतिशयोक्ति नहीं है। तो सब लोग मानते ही हैं उनको सर्वश्रेष्ठ कवि। तो ओम पर
(13:05) इतना कुछ हमारे वांगमय में मिलता है। मांडूक्य उपनिषद तो पूरा ओम पर ही है। उपनिषदों में ओम की इतनी महिमा गाई गई है। ओम को सनातन से जो अलग-अलग धाराएं निकली जिन्होंने वेदों को नहीं माना पर ओम को माना। आप जैन धर्म की ओर जाए तो णमोकार मंत्र है। उसके प्रारंभ में ओम आता है। बौद्ध धर्म की तरफ जाए। आप बौद्ध धर्म की ओर जाएं तो ओम मणिपद में हूं। यह मंत्र आता है। आप सिख धर्म की ओर जाए तो एक ओंकार है। तो जिन्होंने वेदों को नहीं स्वीकारा उन्होंने भी ओम को तो स्वीकारा है। तो ओम में कुछ ऐसी शक्ति है जो इतने ऋषियों ने इस मंत्र को इस बीज को इतनी बार इसका जाप
(13:51) करके इसका इस पर मंथन करके इस पर विचार करके इसके अर्थ की भावना करके कुछ पाया। कुछ उनमें शांति हुई, कुछ उनमें योगिक दृष्टि हुई, कुछ उन्हें अती्द्रिय ज्ञान प्राप्त हुआ। कुछ उन्हें ऐसा तत्व मिला जो संसार में नहीं था। और इसी ओम को लेकर फिर उपनिषद हैं। इसी ओम को संगीत में सर्वश्रेष्ठ माना गया। इसी ओम को फिर हमने अलग-अलग संप्रदायों में भारत में जितने भी संप्रदाय आप कह लें अधिकांश संप्रदायों में ओम को उस उस संप्रदाय के परम देवता के रूप में देखा गया है। हम यहां महाराष्ट्र में बैठे हैं तो
(14:35) महाराष्ट्र में गणपत संप्रदाय जो गणपति उपासना भी बहुत प्रसिद्ध है। यहां पे प्रचलित है। तो गणपत संप्रदाय ओमकार को गणपति का रूप कहा गया है। ज्ञानेश्वरी है संत ज्ञानेश्वर। उसके प्रारंभ में आता है जो अकार है वह गणपति का के चरण है जो उकार है वह गणपति का उदर है जो पेट है जो मकार है वह गणपति का मस्तक महामंडल है इस प्रकार सारी गणेश मूर्ति ही ओम का स्वरूप है तीनों ध्वनि जो ओम की है अ उ अ उ म वो गणपति का स्वरूप है ऐसा ज्ञानेश्वरी के प्रारंभ में कहते हैं संत ज्ञानेश्वर और इसी प्रकार यदि आप वैष्णव संप्रदाय में चले जाए तो कहते
(15:15) हैं अकार उकार और मकार जो वे विष्णु, लक्ष्मी और जीव हैं। अब इसी में कुछ लोग ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहते हैं। पुराणों में वचन आता है। इसी में यदि हम राम तापनीय उपनिषद में चले जाएं तो शत्रुघ्न, भरत, लक्ष्मण और राम है। अकार, उकार, मकार और जो अर्ध मात्रा और इसी को हम अवस्थाएं चेतना की चार अवस्थाएं मानते हैं। इसी को श्री कृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध मानते हैं। तो, सभी संप्रदाय जो भी वैदिक पौराणिक मार्ग में है, शाक्त हो, शैव हो, वैष्णव हो, वो अपने-अपने इष्ट को अपने-अपने परम देव देवता को ओम का ही स्वरूप मानते
(16:01) हैं। तो, ओम हमारे इस प्रकार ओतप्रोत है। हमारी संस्कृति से, हमारे सनातन धर्म से जितनी भी धाराएं हैं, प्राचीन हो और वाचीन हो। उत्तर में हो, दक्षिण में हो, पूर्व में हो, पश्चिम में हो, मध्य में हो। ओम जिस प्रकार कहते हैं जो तीनों कालों का भी रूप है और तीनों कालों से परे भी है। तो अतीत में, वर्तमान में, भविष्य में भी जो होंगी। ओम तो सर्वत्र है ही। हमारी संस्कृति का केंद्र है। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं भारत की भूमि से जितने धर्म निकले हैं उनमें ओम तो समान है ही। जितने मार्ग निकले हैं, संप्रदाय निकले, उनमें ओम तो समा समान रूप से है ही। और यह बात
(16:41) मुझे लगता है सत्य ही है। तो ओम हमारे जीवन में हमारे धार्मिक जीवन में हमारे आध्यात्मिक जीवन में योगिक जीवन में योग की जो परंपरा है जो पतंजलि योग की परंपरा है। आप भी योग का अभ्यास करती हैं। योग सारे विश्व में आज फैल चुका है। योग दिवस मनाया जाता है। योग की परंपरा में सबसे प्रामाणिक जो ग्रंथ है, वह है पतंजलि का योगसूत्र। और पतंजलि ने योगसूत्र में क्या कहा है? तस्य वाचक प्रणव। ईश्वर का वाचक क्या है? प्रणव है अर्थात ओम है। तो वाच्य है ईश्वर। अर्थात जिसको जिसका नाम है वह ईश्वर है। नाम ही ईश्वर
(17:26) है। और नाम क्या है? ओम। और फिर कहते हैं तद जपस तदर्थ भावनम। उस ओम का जप होना चाहिए और उस ओम के अर्थ की भावना होनी चाहिए। अर्थात ईश्वर की क्योंकि ओम का अर्थ ईश्वर है तो ईश्वर की भावना हृदय में होनी चाहिए। ओम के अर्थ की भावना होनी चाहिए। यह योग सूत्र में कहा गया है। हम केंद्रीय विद्यालय में मैं पढ़ा हूं। केंद्रीय विद्यालय में लाखों विद्यार्थी पढ़े हैं। मैं भी उनमें से ही एक हूं। अच्छा जी। जानकर बहुत हर्ष हुआ। तो आपको ध्यान हो केंद्रीय विद्यालय में मुझे लगता है आज भी होता होगा। केंद्रीय विद्यालयों में प्रार्थना होती थी। हमारे
(18:04) विद्यालय के प्रारंभ प्रार्थना से होता था। प्रार्थना में सबसे पहला शब्द ओम ही होता था। ओम असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्यमामय और अंत भी ओम से होता था। ओम सहनावतु सहनो भुनक्त सहवीर्यम करवावहे तेजस्वनावधी तमस्तु माशावहे फिर ओम शांति शांति शांति मंत्र के प्रारंभ में ओम है तो ओम तो हमारे जीवन में विद्यार्थी जीवन में लगा ही रहा साथ में हमेशा से ओम हमारे साथ-साथ चलता रहा नित्यानंद जी लेकिन बहुत सारे हम में से ऐसे लोग हैं जिनको ओम का पूर्ण रूप से शाब्दिक अर्थ इसका स्पिरिचुअलिटी का रेफरेंस इसका योगिक
(18:50) दर्शन का अर्थ इसका ईश्वरीय अर्थ ये सब के बारे में नहीं पता लेकिन फिर भी वह लोग ओम से इतना कनेक्ट करते हैं कि जब भी एकांत में बैठना चाहते हैं कोई मंत्र जपना चाहते हैं तो सबसे पहले ओम ही मस्तिष्क में आता है। जब हम मेरे योग की वजह से कुछ ऐसे भी मित्र हैं जो देश विदेशों में हैं जो हिंदी भाषा या संस्कृत भाषा को नहीं समझते हैं। कोई स्पेनिश है, कोई फ्रेंच है, कोई किसी कंट्री से हैं। वो भी ओम का टैटू अपने हाथ में अपनी बॉडी के डिफरेंट पार्ट्स पर गुदवा के रखते हैं कि हम इस मंत्र से बहुत डीपली कनेक्ट करते हैं। तो कुछ ना कुछ ओम की ऐसी वाइब्रेशन है।
(19:28) वाइब्रेशनल एनर्जी के बारे में भी बात करेंगे। लेकिन अभी आप जिक्र कर रहे थे मांडुक्य उपनिषद का जिसमें ओम के अलग-अलग चेतना के जो प्रकार हैं या स्टेजेस हैं स्टेट्स ऑफ कॉन्शसनेस हैं उसके बारे में बात की गई है। तो कौन से डिफरेंट स्टेजेस ऑफ कॉन्शियसनेस हैं उनके बारे में थोड़ा सा आप बताइए कि हम जब जागृत अवस्था में होते हैं जब हम अवेक होते हैं फुल्ली जब हम सोते हैं या फिर जब हम स्वप्न अवस्था में होते हैं। कौन-कौन से डिफरेंट स्टेट्स पे ओम किस तरह से प्ले आउट करता है? मांडू के उपनिषद जैसा आपने कहा ओम की ही महिमा है। सबसे छोटा उपनिषद
(20:07) है। 12 मंत्रों का उपनिषद है। पूरा ओम पर ही है। और सबसे मैं कहूंगा यद्यपि मंत्रों की संख्या की दृष्टि से लघुत्तम उपनिषद है यह मांडूक्य उपनिषद पर अर्थ के गांभीर्य की दृष्टि से बहत्तम है। एक स्थान पर ओम की उपमा आई है बरगद के बीज के रूप में। बरगद के पेड़ का जो बीज होता है, उसमें पूरा वृक्ष समाया हुआ है। तो इसी प्रकार ओम में सारा वांगमय समाया हुआ है। तो ओम की व्याख्या मांडूक्य उपनिषद है। ओम के तीन अवयव हैं। अ, उ म और फिर शांति अथवा जो अर्ध मात्रा अथवा नाद अथवा बिंदु कहीं-कहीं कहा जाता है। तो अ, उ म से मिलकर बना है ओम।
(20:51) हमारी चेतना की सामान्यतः तीन अवस्थाएं सब लोगों के जीवन में जो आती हैं। चौथी अवस्था केवल योगियों की ब्रह्म ज्ञानियों की होती है। चेतना की तीन अवस्थाएं क्या हैं? और इनको आजकल का विज्ञान भी मानता है। चेतना की तीन अवस्थाएं हैं। जागृत स्वप्न और सुशुप्ति जागृत अवस्था जब हम जगे हुए हैं। वेकफुल स्टेट हम आपसे बात कर रहे हैं। वेकफुल स्टेट जिसमें हमारी चेतना बाहर की ओर है। वैश्वानर भी कहा जाता है इसको और इसको ओम का अकार तो ओम में जो अ का स्वर है अ की ध्वनि है वह जागृत अवस्था का प्रतीक है और उसमें आकार का क्या शाब्दिक अर्थ है अकार अर्थात अ की ध्वनि जैसे
(21:36) वर्णात्कार संस्कृत भाषा में किसी भी वर्ण के पश्चात अथवा किसी भी शब्द के पश्चात हमने कार जोड़ दिया अर्थात उस वर्ण का नाम जैसे ओम का नाम क्या है? ओंकार। अब मैं बहुत प्रायोगिक उदाहरण से समझाता हूं। जब हम बहुत अधिक खा लेते हैं तो हमारे मुख से एक ध्वनि निकलती है। उसको हम क्या कहते हैं? डकार। क्यों? क्योंकि ड का ध्वन का स्वर आता है। इसलिए उसको डकार कहते हैं। जो अ कौवा कांव काव करता है उसको क्रोंकार कहते हैं। ठीक है? तो इसी प्रकार शीतकार, भूतकार ये सब कार अर्थात उस ध्वनि का नाम। तो अकार का अर्थ है अ का
(22:24) नाम है अकार। जैसे ओम का नाम है ओंकार। जैसे ह्रीम का नाम है ह्रीकार। क्लीम का नाम है क्लींकार। वैसे ओम का नाम ओंकार और अ का नाम अकार। तो यह बाहर की चेतना है। जिसको बहिष् प्र्रज्य कहा गया है मांडूक्य उपनिषद में। उकार जो है वह अंतः प्रज्ञा है जो अंदर की चेतना है। यह चेतना हमें कब अनुभूत होती है जब हम स्वप्न अवस्था में होते हैं। स्वप्न अवस्था में हमारा अंतर्मन एक अलग ही जगत की सृष्टि कर लेता है। ड्रीम स्टेट जी जब हम सपना देख रहे होते तो हम बाहर का हमें पता नहीं चलता। हां एक अवस्था होती है जब हम जागे से स्वप्न अवस्था में जाते हैं तो
(23:09) आधी नींद आधा जगा हुआ व्यक्ति रहता है पर जब स्वप्न अवस्था में पहुंच जाता है तब उसको बाहर का पता नहीं चलता और अंदर एक अलग ही जगत है इंसेप्शन आपने मूवी देखी है वो एक अलग ही जगत है। आपका माइंड कोई ना कोई सींस बना रहा होता है। कोई पिक्चर्स बना रहा होता है। कुछ उसमें शब्द होते हैं। जी और हमारे हमारी अपूर्ण इच्छाएं होती हैं। हमारे मन के संस्कार बाहर आते हैं। अतीत के लोग आते हैं। डर भी होता है। डर लगता है। कुछ-कुछ ऐसी परिस्थितियां आती हैं जो हम जागृत अवस्था में देखें तो हम कहेंगे ये तो हो नहीं सकता। जैसे हमें कभी-कभी दिखता है कोई अतीत का व्यक्ति
(23:47) किसी वर्तमान स्थिति में आ गया। अथवा वर्तमान व्यक्ति किसी अतीत की स्थिति में आ गया। हमारे युवावस्था के मित्र हमें बाल्यकाल में मिल जाते हैं। बाल्यकाल के विद्यालय में मिल जाते हैं स्वप्नलोक में। तो यह एक अंतर जगत है। अंतः प्रज्ञ उस समय हम रहते हैं। हमारी चेतना अंदर की ओर है। अंदर हमारा मन ही हमें स्वप्न दिखा रहा है। अनुभूति हमें हो रही है। ऐसा मैं नहीं कहता वह झूठा है। क्योंकि उसमें भी कभी-कभी सत्य का बीज रहता है। बेंजीन का जो मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर है। C6H6 उसका फार्मूला है। फार्मूला है। हां। तो उसमें मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर जो
(24:28) केक्यूले ने निकाला था उसकी प्रेरणा उन्हें स्वप्न से मिली थी। स्वप्न उन्होंने देखा था कि एक सांप अपनी ही पूंछ खा रहा है और गोल-गोल घूम रहा है। उससे उन्होंने उसका रिंग स्ट्रक्चर निकाला था। स्वप्न में प्रेरणा मिली थी। ऐसा ऐसा वैज्ञानिक ने कहा है। केकुले ने कहा है स्वप्न में हमें कभी-कभी किसी समस्या मुझे मेरे साथ मेरा अनुभव हुआ है। कभी कुछ मैं सोच रहा हूं और कुछ विचार नहीं मिल रहा है। जैसे किसी पुस्तक के लिखने के समय कभी मन में विचार आते हैं। पर नहीं ऐसा नहीं हो सकता। कुछ और समाधान होगा। इस शंका का कुछ और समाधान हो। वो
(25:00) स्वप्न में हमें समाधान आते हैं। और फिर जब मैं जागता हूं तब स्वर्ण आता है कि हां ऐसा था। कई बार मेरे साथ हुआ है। कई बार प्रेरणा भी आती है स्वप्न में। प्रेरणा मिलती है स्वप्न में। जो काम हम नॉर्मल लाइफ में सोचते हैं कि शायद नहीं पॉसिबल है या नहीं कर पाएंगे स्वप्न से उसकी एक प्रेरणा आ जाती है और फिर आपको अगले दिन लगता है कि शायद हो सकता है और भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ थे रामानुजन श्री निवास रामानुजन उन्हें स्वप्न में उनको देवी ने कुछ सूत्र बताए थे ऐसा भी कहा जाता है। ऐसा भी कहा जाता है। तो स्वप्न में सब झूठ नहीं है। वो एक अलग सत्ता है। अलग सत्य
(25:35) है। वो चेतना का एक अलग स्तर है। अलग स्वरूप है। इसको अंतः प्रज्ञ कहा गया है। इंसेप्शन मूवी का यही तो वही है। खेल तो वही है पूरा कि स्वप्न में एक बीज देना है जिससे जागृत में वो विचार आ जाए। तो यह स्वप्नावस्था है। अब तीसरी अवस्था है जिसमें सुशुप्ति गहरी नींद जिसमें स्वप्न नहीं होता। स्लीपिंग स्टेट जी डीप स्लीप जिसे कह सकते हैं। और इसमें चेतना ना तो बाहर की ओर है ना अंदर की ओर है। इसके लिए मांडूक्य उपनिषद में शब्द आता है प्रज्ञान घन इसको घन प्रज्ञ भी कहा जाता है। इसमें ऐसा नहीं है चेतना नहीं है। चेतना घन हो चुकी है। डेंस हो चुकी है। तो ये जो स्थित
(26:22) प्रज्ञा की स्थिति बोलते हैं। क्या यह वही स्थिति है या इनमें कुछ अंतर है? स्थित प्रज्ञ जो है उसकी जिसकी प्रज्ञा जिसकी बुद्धि स्थिर है। एक जगह पे स्थिर हो। स्थिर रहे हैं। वह तो योगी है। पर यह जो है यह घन प्रज्ञ है। अर्थात चेतना घन रूप में है। लेकिन कहां पर है चेतना अभी? चेतना है। चेतना है। हमारे मन में ही है। लेकिन केंद्रित नहीं कर पा रहे कि कहां पर है। वो इतने घन रूप में है कि हमें उसमें सूक्ष्म भेद पता नहीं चल रहे हैं। इतनी घनी चेतना है। इसको मैं उपमा दे रहा हूं। यह कोई मैं वैज्ञानिक बात नहीं कर रहा हूं। उपमा दे रहा हूं। जैसे बरगद के बीज
(27:00) में पूरा पेड़ है। पर क्या आप बीज में बता सकते हैं? क्या शाखा है? क्या क्या इसका मूल है? क्या इसकी कहां इसकी पत्तियां हैं? कहां लटकती हुई जड़े हैं? कहां तना है? हम नहीं जानते। पर बीज में है। बीज से ही सब निकल के आता है। तो चेतना सारी है वो घन रूप में है। इसलिए प्रज्ञान घन अथवा घन प्रज्ञ कहा जाता है। जिसको आप सोच सकते हैं जो सिंगुलैरिटी है। कंसंट्रेटेड जी। सब कुछ इतना कंसंट्रेटेड है कि हमें पता नहीं चल रहा क्या कहां है। यह घनी चेतना है। चेतना है। इसका क्या प्रमाण है? जब हम उठते हैं तो हमें अनुभव होता है आज तो
(27:35) इतनी गहरी नींद सोया कुछ पता नहीं चला। कभी उठते हैं तो आज तो नींद अच्छी नहीं आई और कभी उठते हैं आज तो बहुत सुख पूर्वक सोया। इस यह जो मूलभूत अनुभूति है इसी को हमारे दर्शन में इस पर बहुत विचार किया गया है। आप अनेक भाष्य पढ़ें जो चेतना शक्ति को पर विचार होता है तो सुखम अहम अस्वाप्सम इस तीन शब्दों के वाक्य पे मैं सुख पूर्वक सोया। सुखम अहम अस्वाप्सम संस्कृत में कहते हैं हिंदी में मैं सुख से सोया। मैं अच्छा सोया। इस पर ही कितना विचार है। यह कौन कह रहा है? मैं सुख से सोया। जब चेतना नहीं है तो कैसे पता चला मैं सुख से
(28:16) सोया? जब चेतना नहीं है तो पता कैसे चला कि मैं आज अच्छा नहीं सोया। जब चेतना नहीं है तो ऐसा कैसे पता चला कि मैं इतनी गहरी नींद सोया कुछ पता ही नहीं चला। इसका अर्थ है चेतना है। घन रूप में है। और उसका अनुभव जागृत रूप में आता है। तभी हम कह सकते हैं आज मैं सुख की नींद सोया। आज मैं गहरी नींद सोया। आज नींद अच्छी नहीं आई। आज कष्ट थी नींद। तो तीन स्तर हैं चेतना के बाहर की चेतना बहिश प्रज अंदर की चेतना अंतः प्रजन जिससे सपने दिखते हैं बाहर की चेतना जो अभी का जगत है और जो प्रज्ञान घनत्व जिसे कहते हैं अथवा जिसे कहते हैं घन प्रज्ञ घनी चेतना और जो चतुर्थ अवस्था
(28:59) है वह तुरी अवस्था वह योगी की है वह ब्रह्म ज्ञानी की है जिसमें मांडू की उपनिषद कहता है ना तो वह बहिष् प्र्रज्ञ है ना बाहर की चेतना है ना अंतः प्रज्ञ है ना अंदर अंदर की चेतना है ना उभयतः प्रज्ञ है ना बाहर और अंदर की साथ में जो जब हम आधी नींद में होते हैं तब कहते हैं आधी नींद में हमें पता चलता है कि क्या हो रहा है जब सपना टूट रहा होता है आधी नींद पता चलता है कोई दरवाजा खुल रहा है कोई चल के गया इसी को इंसेप्शन मूवी में दिखाया था कुछ गिर रहा है कुछ गिर रहा है कुछ गिर रहा है कहीं बाढ़ आ रही है कुछ हो रहा है तब नींद खुल रही है तो न उभयत प्रज्ञ है न
(29:35) प्रज्ञान घने घनी चेतना भी नहीं है न अज्ञ है ऐसा नहीं है चेतना का भाव है ऐसा भी नहीं है और ना प्राज्य है ना बहुत अधिक चेतना है तो इन सबसे परे अर्थात वह एक वर्णनातीत स्थिति है जिसको केवल हम अनुभव से जान सकते हैं उसको हम शब्दों से उसका बखान हम नहीं कर सकते और वही ओम का वही अर्ध मात्रा है जिसको बिंदु कहते हैं जिस अथवा नाद कुछ लोग कहते हैं अथवा जो शांति कहते हैं ओम के पश्चात की जो शांति है अथवा जो अर्ध मात्रा है वह तुरीय अवस्था है तो आ उ म जो है वो पहली तीन अवस्थाएं और तुरी अवस्था जो है अर्ध मात्रा अथवा जो आधी मात्रा कह ले अथवा जो शांति है अथवा
(30:19) जो मांडुक्य उपनिषद में इतना गहन रूप से बताया गया है कि ओम का जो पूरा हमारी चेतना पर जिस तरह से प्रभाव है या जिस तरह से अपनी चेतना के अगर हम अलग-अलग लेवल्स को खोल कर देखें तो ओम किस तरह से उसमें जन्म वही तुरी अवस्था ही जीव का लक्ष्य है वही तुरी अवस्था उपनिषदों ने वहीं तक पहुंचने के लिए हमें प्रेरित किया है कि हम वही जीवन मुक्त की वही अवस्था है। उस अवस्था का जिसने एक बार अनुभव कर लिया उसको अमृत मिल गया। वह अमृत ऐसा नहीं कि हम हमारा शरीर कभी नष्ट नहीं होगा। वह अमृत ऐसा है जब आनंद लिया तब ऐसा आनंद लिया। सब कुछ हम भूल गए। सतचित आनंद में
(31:00) हम विलीन हो गए। तब सारा संसार छूट गया। वही मुक्ति वही है। उस अनुभव में ही मुक्ति है। आप इतने सालों से शास्त्रों को पढ़ रहे हो, गहन अध्ययन कर रहे हो क्या आपको कभी ऐसा आभास हुआ, ऐसा अनुभव हुआ कि आप अपने चेतना के उस डायमेंशन में टैप इन कर पाए हैं जहां पे परम आनंद ब्लिस की जो फीलिंग होती है, उसको आपने टच किया हो? मैं यही कहूंगी कि जो जो आनंद का समुद्र है उसकी एक बूंद के मुझे लगता है एक यदि एक बूंद के भी यदि 1 लाख अथवा एक करोड़ भाग कर दें। उसका लेश मात्र भी अनुभव हो जाए तो भी बहुत है। तो मैं कहूंगा लेश मात्र तो अनुभव हुआ है। पर उस सागर में तो
(31:39) अभी नहीं पहुंचा हूं। लेश मात्र अनुभव तो हुआ है जिसमें सारी चिंताएं आपकी छूट जाती हैं। जिसमें आप इस जगत में जितनी चिंताएं हैं आपकी जितने तनाव हैं, जितने आपके समस्याएं हैं वह सब आप भूल जाते हैं। आप आप जो ध्यान की जब अवस्था होती है, जब एक ही मंत्र पे आप बार-बार ध्यान करते हैं, अर्थ भावना करते हैं, माला जपते हैं। कोई संप्रदाय का मंत्र होता है, कोई राम मंत्र जप रहा है। कोई कृष्ण मंत्र जप रहा है। कोई शिव मंत्र जप रहा है। कोई कोई अन्य मंत्र जप देवी का मंत्र जप रहा है। उसको बार-बार जपते-जपते जो एक जब एक तादाद में होता है, एक तल्लीनता होती है
(32:18) और उस तल्लीनता में जब आप खो जाते हैं तब आप सब कुछ भूल जाते हैं। और उसी में एक आनंद की अनुभूति होती है। वो किसी को किसी रूप में होती है। किसी को रूप के अभाव में होती है। किसी को एक शीतल अनुभव से होती है। किसी को किसी अन्य अनुभव से होती है। स्वामी मुक्तानंद की एक पुस्तक है चित शक्ति विलास। वह पढ़े तो उन्होंने अपनी यात्रा चेतना यात्रा के अलग-अलग अनुभव बहुत विस्तार से बताएं। विस्तार से बताए हैं। तो ये अनुभव सबके अलग-अलग होते हैं। पर जो उनमें जो सुख का अनुभव है जो आनंद का जो सच में आनंद है जो लौकिक आनंद नहीं है। जो इंद्रियों का आनंद नहीं है। उससे
(32:55) परे जो है वो एक बार जब चख लिया तो फिर उसके सामने सभी इंद्रियों का आनंद कुछ नहीं है। उसकी 16वीं कला भी नहीं। तो यह आनंद की अनुभूति जो सत है, चित है, आनंद है, वह हो जाए तो फिर तो बस हो गया। फिर हमने सब कुछ पा लिया। नित्यानंद जी हम ओम के बारे में आज चर्चा कर रहे हैं। ओम का सबसे पहला उल्लेख किस शास्त्र से या वेद से आता है और उस पहले उल्लेख में ऐसा क्या है कि वो फिर आगे बढ़ता गया। जी। संहिता में वैसे तो सभी वैदिक मंत्र जो हैं उनके उच्चारण के प्रारंभ में ओम आता ही है। तो अ इसीलिए ओम शांति शांति शांति बोलते हैं तो ओम
(33:42) वहां बीज के रूप में है। तो सभी वैदिक मंत्रों के उच्चारण के प्रारंभ में ओम होता है। स्वाध्याय जब वैदिक पटु करते हैं तो स्वाध्याय के प्रारंभ में ओम कहते हैं। अंत में ओम कहते हैं। तो मनुस्मृति में और अन्य शास्त्रों में वचन आता है कि ओम से यदि प्रारंभ नहीं किया और ओम से अंत नहीं किया तो अध्ययन निष्फल हो जाएगा। उसका क्षरण हो जाएगा। वो नहीं रहेगा। वो विद्या रहेगी नहीं। तो यह तो है ही। वैदिक मंत्रों के प्रारंभ में ओम का उच्चारण होता ही है। पर ओम का जहां तक मुझे ध्यान है सर्वप्रथम उल्लेख आता है ईशावास उपनिषद में जो शुक्ल यजुर्वेद का भाग है। जो
(34:23) संहिता का भाग है। अकेली उपनिषद है जो संहिता का भाग है। तो जो 40वां अध्याय है शुक्ल यजुर्वेद का और ईशावास्य उपनिषद ऐसे कई शाखाओं में मिलती है कांड व शाखा में माध्य शाखा में तो उसमें आता है ओम खम ब्रह्म यह उल्लेख आता है तीन शब्द हैं बहुत छोटे हैं ओम खम ब्रह्म खम अर्थात आकाश ख का अर्थ शून्य भी होता है पर यहां खम का अर्थ आकाश लेते हैं और ब्रह्म अर्थात जो नित्य फैलने वाला जो दिव्य तत्व है वह ब्रह्म है ब्रह्म ब्रह्म का अर्थ ही है जिसका विस्तार होता ही जा रहा है। जिसका जो कभी छोटा नहीं होता जो बड़ा ही होता है वह ब्रह्म है। तो इसको हम समझ
(35:05) सकते हैं। ये वैज्ञानिक रूप से मैं नहीं कह रहा हूं पर जो यूनिवर्स एक्सपेंड कर रहा है। लेकिन ओम की तुलना ब्रह्म से की गई है। ओम को कहा गया ओम ब्रह्म है। ओम अनंत आकाश है और ब्रह्म है। ओम आकाश की भांति है और ब्रह्म है। सीधा कह दिया है। तो यह जो है शुक्ल यजुर्वेद में जिसको ईशावास्य उपनिषद कहते हैं। 40वां अध्याय है। यजुर्वेद का माध्यमनी संहिता का। इसमें सर्वप्रथम संिता भाग में ओम को कहा गया। और फिर ओम पर अलग-अलग विचार हैं। गोपथ ब्राह्मण में विचार हैं। ओम की उत्पत्ति कैसे हुई? ओम का अर्थ क्या है? बहुत विचार हैं। उपनिषदों में है। और फिर
(35:42) अलग-अलग शास्त्रों में है। ओम की उत्पत्ति हुई कैसे? जिसको यूनिवर्सल साउंड ऑफ साउंड ऑफ यूनिवर्स कहते हैं या कहते हैं कि अह प्रणव अक्षर पहला अक्षर या इस ब्रह्मांड में जितनी भी ध्वनियां हैं वो सभी ध्वनियों में ओम जो है वो सर्वश्रेष्ठ है और सबसे पहली ध्वनि वही है। वाइब्रेशनल एनर्जी वाइब्रेशनल फ्रीक्वेंसी ओम है। तो इसकी उत्पत्ति कहां से हुई? ओम की उत्पत्ति कहां से हुई? यह अह इसके संबंध में अलग-अलग हमें वर्णन प्राप्त होते हैं। तो नारद पुराण में जैसा वर्णन है कि ओम की उत्पत्ति सबसे पहले सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा के कंठ से हुई। तो वहां
(36:27) ब्रह्मा एक देव है जिनके कंठ से सबसे पहले जो शब्द निकला वह ओम था। अन्य शास्त्रों में वर्णन आता है ओम से ऋग्वेद, सामवे, यजुर्वेद की उत्पत्ति हुई है। ओम की उत्पत्ति कहां से हुई? ओम स्वयंभू है। इसलिए ओम की उत्पत्ति कहीं से नहीं हुई। ओम ब्रह्म है। ब्रह्म से सब कुछ निकला है। ब्रह्म तो ओम परमात्मा का नाम है। तो परमात्मा यदि अनादि है तो ओम भी अनादि है। मतलब एटरर्नली एकिस्टिंग है। जी। ऐसा हमारे शास्त्र कहते हैं। ओम का एक नाम है अनादि। ओम का एक नाम है अनंत। अनंत। तो ओम की उत्पत्ति नहीं हुई। ओम का ओम सब का स्रोत है पर ओम का स्रोत
(37:09) नहीं है। जिस प्रकार ब्रह्म है परमात्मा है जिसे आप कह लें तो उससे सब कुछ है पर वह कहीं से नहीं है। तो यह ओम है अनादि है अनंत है इसलिए इसकी उत्पत्ति नहीं है। हां हम ध्वनि रूप में ब्रह्मा के कंठ से है। शब्द रूप में ब्रह्मा पर शब्द के भी एक तो शब्द का मूल रूप है और एक जो शब्द का व्यक्त रूप है। हम जब शब्द बोलते हैं तब वह व्यक्त होता है। शब्द हमारे कंठ से निकलता है। पर शब्द तो है पहले से है। तभी तो हम बोल रहे हैं। तभी तो हम जानते हैं उसको। तो ओम पहले से है पर उसकी व्यक्ति। ऐसा हमारे शास्त्रों में कहा गया है। अब इतिहासकार मानते हैं कि एक पीएचडी थीसिस
(37:47) भी है ओम पर। साइंटिफिक रीज़ंस भी हैं इसके कुछ कहते हैं। साइंटिफिक तुम्हें ये कहना ठीक नहीं है क्योंकि कुछ लोग साइंस को जोड़ ले। जो आधुनिक साइंस है उसको हमें मेरे विचार से हमें जोड़ना नहीं चाहिए। अलग-अलग क्षेत्र हैं। साइंस अलग है। जो आज की साइंस है वह अलग है और जो हम लोगों का अध्यात्म है वह अलग है। यह अनुभव अधिक है। यहां तो विश्वास भी है, श्रद्धा भी अनुभव है। वो सीधा आपका प्रत्यक्ष प्रमाण है अथवा अनुमान प्रमाण है। दोनों का अपना-अपना महत्व है। और दोनों को मैं जो मिश्रण करते हैं कि ओम में सब साइंस है, बिग बैंग है। ये सब मैं इस पर बहुत अधिक
(38:24) महत्व इसको नहीं देता। कुछ लोग ओम को एमसी्व कह रहे हैं। कुछ लोग कुछ और कह रहे हैं। ओम एनर्जी है। आजकल ये पार्लियामेंट में भी डिबेट चल रही है। ओम इक्व एमसी्व इसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? अ नहीं ये कल्पना है केवल क्योंकि भाई जो एमसी आइंस्टाइन की थ्योरी है वो अलग है। वो फिजिक्स की थ्योरी है। इस इस हमें क्यों दिखाने? हम हम अपनी संस्कृति को ऐसे क्यों महान बनाना चाहते हैं कि इसमें वह सब ज्ञान है जो विदेशों में था। विदेश जो विदेशों में अभी ज्ञान आ रहा है वो हमारे पास था। तो हमारे पास क्यों लुप्त हो गया? हमारे पास सब कुछ था, न्यूक्लियर फ्यूजन
(38:57) था, न्यूक्लियर। ऐसा नहीं है। यह श्रद्धा का अतिरेक है। यह कोई चलिए काव्य में कोई कह दे तो बात अलग है। पर ये कोई वास्तविक बात नहीं है। ओम इक्व mc² इसके मन बहलाने की बात है। इसमें वास्तविकता नहीं है। हमारा जो विश्वास है, हमारा विश्वास है कि ओम सृष्टि का पहला स्वर है। सृष्टि की पहली ध्वनि है। प्रथमा अक्षर है। ध्रुवाक्षर है। अनादि है। अनंत है। लेकिन जब हमारे हम एमसीयर से क्यों जोड़े? हां हां। जब हमारे देश के एमपीज ऐसा कहते हैं, पार्लियामेंट में ऐसा कहते हैं, डिफरेंट चैनल्स पर डिबेट्स पर आकर ऐसा कहते हैं तो लगता है कि मतलब क्यों हम मुझे लगता है वो
(39:35) तो उसको छोटा करने की बात हो गई ना। ओम ओम की जो हम बात कर रहे हैं। आप इतने सारे उपनिषद को वेदों को कोट कर रहे हो और हम उसको इतना रिड्यूस करके बता रहे हैं। कहीं ना कहीं भी एमसी्व कहीं हमारे शास्त्रों में तो नहीं कहा गया। एक्सक्ट्ली। तो यह तो आपकी आज की कल्पना है कि ओम से ही सब कुछ निकले हैं। सारे फार्मूलाज़ निकले हैं। पूरी सृष्टि का यह हुआ है और पहले से पता था। हमारा विश्वास है कि ओम से ब्रह्मांड की सृष्टि हुई। ये विश्वास है सनातन धर्म में है। पर इसको हम साइंस से क्यों जोड़ें? साइंस तो अलग है ना। एक एक विवेक शक्ति भी
(40:08) तो होती है कि जब साइंस की बात करें तब साइंस की बात करें। जब आप दर्शन की बात करें, जब मेटाफिजिक्स की बात करें तो मेटाफिजिक्स की बात करें। आप इनको अलग नहीं कर सकते। क्या अलग कर ही सकते? और ऐसा नहीं है जो एक में विश्वास रखता है वो दूसरे में विश्वास नहीं रखता ऐसा नहीं है। देखिए जो हमारा अध्यात्म है अब ओपन हाइमर गीता पढ़ भी सकते हैं और काम भी कर सकते हैं। आगे कर सकते हैं। किया उन्होंने बहुत खूबसूरत काम किया। तो उसको उस काम के लिए वहां से प्रेरणा भी मिल सकती है। उसको उसको उनको पहला विस्फोट देखकर गीता का वचन भी ध्यान आ सकता है। पर
(40:40) इससे हम यह नहीं कह सकते कि उसमें इसका सूत्र है। नहीं। यह नहीं है। यह नहीं है कि एक व्यक्ति दोनों में रुचि नहीं रख सकता। यह भी नहीं है। पर हम ऐसा कहकर कि सारा जो साइंस आधुनिक साइंस है, आधुनिक मैथमेटिक्स है, वह हमारे वेदों से निकला है। यह केवल अतिशयोक्ति है। ये केवल मन बहलाने की बात है। ऐसी बात नहीं करनी चाहिए। हम इससे जो हमारे भारत की वास्तविक गणित और विज्ञान की उपलब्धियां है। भारत में बहुत गणित था। बोधायन हो, महावीराचार्य हो, आर्यभट्ट हो, केरल जो गणित परंपरा है, उसमें बहुत उपलब्धियां हैं। हमें अपने आप को महान बनाने के लिए
(41:16) पश्चिमी विज्ञान की बैसाखियों की आवश्यकता नहीं है। जो वास्तविकता है उसको कहना चाहिए और पश्चिमी विज्ञान को हमें नीचा दिखाने की क्या आवश्यकता है? कि हमारे पास पहले से था क्यों? तो एक प्रकार से हम नीचा ही तो दिखा रहे हैं उनको। नहीं वह भी उपलब्धि है। जो महान है वो महान है। न्यूटन भी महान है। आइंस्टाइन भी महान है। क्यों मानने में हमें क्या क्या मतलब अपनी उत्तमता दिखाने के लिए हमें किसी और को निम्न थोड़ी देखना चाहिए। अथवा ऐसा नहीं कहना चाहिए कि ये तो हमारे पास पहले से था। इसकी आवश्यकता नहीं है। और वैसे भी प्रमाण तो है नहीं कुछ तो ठीक है। तो अ ओम
(41:47) का आदि नहीं है। हमारे शास्त्रों में ऐसा कहा गया ओम अनादि है और अनंत है। और जो जहां तक वैदिक ग्रंथों में तो पहले सबसे पहले यजुर्वेद में ईशावास्य उपनिषद में फिर उपनिषदों में और फिर अनेक शास्त्रों में योग में संगीत में संगीत में भी ओम का महत्व है। नटराज के नृत्य में भी ओम को देखा गया है। तो रामायण में ओम श्री राम को कहा गया त्वम ओंकार देवता लोग कहते हैं कि आप ओंकार हैं। आप ओंकार स्वरूप हैं। और सभी देवी देवताओं को इस रूप में देखा गया। पतंजलि ने ब्रह्म का नाम कहा है और जितने अरवाचीन प्राचीन सब संप्रदाय हैं पंथ हैं
(42:26) सबने ओम को ही परम आराध्य कहा है। ओम और ध्यान मेडिटेशन जिसे कहते हैं आज की यू नो भाषा में ओम और ध्यान के बीच में क्या कनेक्शन है? जो लोग ध्यान करते हैं, मेडिटेशन करना चाहते हैं, ओम पर ही क्यों आकर मन टिकता है? ध्यान अनेक प्रकार से किया जा सकता है। ध्यान रूप पर भी किया जा सकता है और बिना रूप के भी किया जा सकता है। अ जन जिन जिनजिन मार्गों में सगुण ईश्वर की अवधारणा है वहां रूप का ध्यान है। तो रूप का ध्यान होगा। सगुण ईश्वर मतलब फिजिकल फॉर्म ऑफ ईश्वर। जी। मूर्ति पूजन जिसे कह सकते हैं। मूर्ति पूजन तो बाह्य है। पर जब ध्यान की बात कर रहे हैं तो रूप
(43:09) पे ध्यान कर रहे हैं हम। तो श्री राम का ध्यान, कृष्ण का ध्यान, शिव का ध्यान यह एक मार्ग है। दूसरा मार्ग है जब हम रूप पर ध्यान नहीं कर रहे हैं पर केवल तत्व पर ध्यान कर रहे हैं। तब ओम ही है। ईश्वरीय तत्व है। जी जी। तो ओम जो है वह ही ब्रह्म स्वरूप है। तो उसी का ध्यान किया जाता है। उसी का जप है और उसी के अर्थ की भावना है। अब ओम का रूप नहीं है। यद्यपि उनको गणेश के रूप को ओम का रूप बताया गया है। नटराज के रूप को बताया नटराज के रूप का बहुत बढ़िया आपने बात ध्यान दिलाई। नटराज की जो मूर्ति है उसमें ओम का रूप बताया गया है। तमिल शैव
(43:50) सिद्धांत में जो तिरुमूलर वहां के कवि रहे हैं संगम काल के उनका एक ग्रंथ है तिरुमंत्रम इसे हम संस्कृत में कहें तो श्री मंत्र तो मंत्र का मंदिर बना है श्री का तिरु तिरुमंरम में तिरुमुनर कहते हैं जो नटराज का जो नृत्य है नटराज की इतनी भव्य प्रतिमा है जो सन में भी लगी है आपको पता ही होगा और घर-घर में रहती ही है जब मैं छोटा था मेरे घर में एक प्लेट थी जो चक्राकार नटराज की प्रतिमा थी अभी घर में कुछ पड़ी है 2 मीटर ऊंची सन में लगी है। नटराज की मूर्ति हम सब ने देखी है। तो चार हाथ हैं। एक हाथ में डमरू है। एक हाथ में अग्नि है। एक हाथ अभय हस्त मुद्रा में है।
(44:30) एक हाथ गजहस्त मुद्रा में है। और एक पैर नीचे है और एक पैर आकाश में है। अर्थात ऊपर है। तो यहां कहा गया है जो डमरू है वाला हाथ है वह आकार है। तिरुमंदिरम में कहा है तिरुमूलर ने जो अग्नि वाला हाथ है वह विनाश है संहार है मकार है जो अभय हस्त का हाथ है वह उकार है रक्षा है तो एक हो गया सृष्टि डमरू से सृष्टि हो गया रक्षा हो गई अभय हस्त से अग्नि से संहार हुआ जो भूमिगत पद है जो पैर नीचे है वह है तिरोभाव तिरोभाव अर्थात आत्मा के स्वरूप का छिप जाना और
(45:17) जो आकाश में पद है जो ऊपर पद है वह है अनुग्रह। तो इनको पंचकृत कहा जाता है। सृष्टि रक्षा संहार तिरोभाव और अनुग्रह। सृष्टि अर्थात कुछ नया बनाना। रक्षा अर्थात उसकी रक्षा करना। संहार अर्थात उसका संहार करना। तो ये तो सामान्यत ओम को अ उम कहते ही हैं। ब्रह्मा विष्णु महेश सृष्टि रचना और संहार। तो ब्रह्मा विष्णु शिव हो गया। और फिर तिरोभाव तिरोभाव अर्थात आत्मा के स्वरूप का छिप जाना और अनुग्रह जो परम शिव की कृपा से अनुग्रह जीव को अपने स्वरूप का ध्यान होना ज्ञान होना तो यह पंचकृत्य हैं जो शैव सिद्धांत में प्रसिद्ध हैं और जो नटराज की मूर्ति
(45:59) है वह ओम का प्रतीक है और इन पंचकृत्यों का प्रतीक है तो यही जो अकार उकार मकार बिंदु और नाद और यही सृष्टि रक्षा पालन सं सृष्टि रक्षा संहार हार तिरोभाव और अनुग्रह अनुग्रह और जो कश्मीर शैव दर्शन है उसमें तो कहा जाता है जो परम शिव हैं वो सतत पांच कृत्यों में लीन रहते हैं तो जो नमः शिवाय सततम पंचकृत्य विधायने प्रत्यभिज्ञा हृदय के पहले मंत्र में कहा गया है जो शिव है उनको नम जो सब समय पांच कृत्यों में सब समय सृष्टि हो रही है सब समय रक्षा हो हो रही सब समय
(46:44) संहार हो रहा है। सब समय तिरोभाव हो रहा है और सब समय अनुग्रह हो रहा है। तो इसको आप यदि उपमा में ले मैं वैज्ञानिक रूप से नहीं बोल रहा हूं। पर तो मल्टीपल यूनिवर्स कहीं कोई कोई ब्रह्मांड बन रहा है। कहीं कोई टूट रहा है। कहीं किसी का पालन हो रहा है। कहीं किसी पर ति कहीं का तिरोभाव हो रहा है। कहीं अनुग्रह अनुग्रह हो रहा है। तो यह ओम की प्रतिमा नटराज में। तो इस प्रकार जो ध्यान है ध्यान ओम का यदि करता है तो साधक ओम पर ही ध्यान केंद्रित करता है रूप पर नहीं और उसी के अकार उकार मकार तो इसी को योग योगिक परंपरा में कहा गया है जो अकार
(47:22) है वह पूरक है जो उकार है वह कुंभक है और जो मकार है वह रेचक है तो वहीं 16 मात्रा 32 मात्रा 48 मात्रा कहीं 48 मात्रा 32 मात्रा 16 मात्रा इतने का कुंभक कुंभक लगाया जाता है तो इतने का पूरक कुंभक रेचक इस प्रकार से और इसी से फिर इसी के अर्थ की भावना होती है। अर्थात ब्रह्म की भावना होती है। अर्थ भावना जो पतंजलि ने कहा है। और इसी से फिर जो अनुभव होता है परम तत्व का इसी से फिर साधक को ज्ञान प्राप्त होता है। इसी से ही साधक को जिसे कहते हैं जो जो पाना था वो पा लेते हैं। जब हम प्राणायाम भी करते हैं जब
(48:06) आपने बात की अह पूरक रेचक कुंभक की तो उसमें भी इसका उल्लेख आता है कि किस तरह से आप आकार उकार और मकार का जो स्थान है उस पर भी ध्यान लगाते हैं और ध्वनि को भी उस तरह से ध्यान लगाते हुए हमें ध्वनि और उस पर ध्यान लगाते हुए कुंभक करना है। उस पर ध्यान लगाते हुए हमें रेचक करना है। रेचक करना है। तो यह भी वर्णन आता है। तो योग का जो प्राणायाम है उस प्राणायाम में ओंकार निहित है। ओंकार निहित है। जी योग की दृष्टि को अगर थोड़ा सा और एक्सपैंड करें नित्यानंद जी योग में हम चक्रों की भी बात करते हैं। हमारे शरीर में एनर्जी सेंटर्स की बात करते हैं। तो यहां पर आप
(48:41) कैसे ओम का स्थान देखते हैं? यहां पर बीज मंत्र हैं। प्रत्येक जो चक्र के बीज मंत्र हैं। और ओम यहां पर भी सर्वोत्तम है। सबसे ऊपर ही है। मुझे ध्यान तो नहीं है कि इस लम रम जी। मुझे भी पूरी तरह से ध्यान क्रम तो ध्यान नहीं है। मुझे भी क्रम ध्यान नहीं है। सातों चक्रों का पर ओम सर्वोत्तम बीज मंत्र तो है ही। सभी बीज मंत्रों से श्रेष्ठ ओम ही है। इसीलिए इसको बीजाक्षर भी कहा जाता है। और योग की परंपरा में यह जो चक्रों की अवधारणा है ये पतंजलि योगसूत्र में नहीं है। वो योगसूत्र का जो सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है पतंजलि का योगसूत्र है। उसमें तो ओम को ही परमात्मा
(49:21) का नाम ही कहा गया है। अभी दो मास पहले कुंभ मेले का जब आयोजन हुआ था। मुझे वहां जाने का सौभाग्य मिला। कुछ ऋषियों से बात की। कुछ साधुओं से बात की और वहां पर मुझे एक रुद्राक्ष धारी जो साधु थे वह मिले। उन्होंने मुझे एक रुद्राक्ष भी दिया। मैंने उनसे पूछा बीज मंत्रों के बारे में कि आपकी साधना आप किस तरह से करते हैं? अगर कोई एक बीज मंत्र या कोई एक मंत्र देना हो तो आप कौन सा देंगे? तो उन्होंने कहा सिर्फ ओम सिर्फ ओम पे आप ध्यान कीजिए, साधना कीजिए, माला जप कीजिए। जो भी करना है ओम पे कीजिए और उसके अलावा कुछ और करने की जरूरत नहीं है। तो मतलब इतना ज्यादा ओम
(49:56) काेंस, ओम की साधना काेंस एक साधु की लाइफ में भी दिखता है। ओम और आध्यात्म में आप क्या कनेक्शन देखते हो? अध्यात्म का अर्थ है जो अपने अंदर हम देखते हैं वह अध्यात्म है। आत्मनी इति अध्यात्म। आत्मा में जो है वह अध्यात्म है। आत्मा क्या है? हमारा आत्म तत्व है। तो आत्म आत्मावलोकन के लिए अपने अंदर झांकने के लिए कोई ना कोई हमें साधन चाहिए। वह साधन क्या है? वह साधन ओम है। और जब आत्म तत्व का साक्षात्कार हो गया और ब्रह्म तत्व का साक्षात्कार हो गया। क्या आत्म तत्व और ब्रह्म तत्व भी ओम है। ओम
(50:42) ब्रह्म तत्व तो है और ओम का अंश आत्म तत्व है। कई जगहों पे मैंने देखा ओम को आत्मन से भी इक्वेट करते हैं। जी अलग-अलग अवधारणाएं हैं। अलग-अलग अलग-अलग मार्गों में जैसे वेदांत में जो अद्वैत परंपरा है उसमें तो आत्म तत्व ब्रह्मत्व एक ही कहा गया है। जो अद्वैत से इतर परंपराएं हैं। उसमें आत्म तत्व को ब्रह्म तत्व का अंश कहा गया अथवा उससे भिन्न होकर भी जो मित्रवत एक हैं। ऐसा कहा गया है। तो जिस दृष्टि से भी आप देखें जिस दृष्टि से भी आप देखें पर एक संबंध तो है। जैसे जो सागर और बूंद का उदाहरण देते हैं शंकराचार्य। वैसा संबंध मान लें अथवा अभेद संबंध मान
(51:22) लें अथवा भेद संबंध मान लें। संबंध तो है तो ब्रह्म तत्व तो ओम ही कहा गया है और उसका अंश जीव है तो ओम सबके हृदय में सुसित है ही ईश्वर सबके हृदय में है ही ईश्वर सर्वभूतना वृद्धेश अर्जुन तिष्ठति भगवान ने गीता में कहा है तो हम सबके हृदय में ओम का वास है इसीलिए ओम को सर्वव्यापी कहा जाता है ओम का आपने शाब्दिक अर्थ की बात की थी बहुत जानकर आपको अह अच्छा लगेगा ओम जो है ओम का अर्थ क्या है। ओम क्या है? यह तो बहुत स्थानों पर कहा जाता है। ओम यह है। ओम की अर्ध मात्रा यह है। पर ओम शब्द का क्या अर्थ है? क्योंकि संस्कृत में कोई भी शब्द
(52:02) निरर्थक तो होता नहीं है। जैसे हमने कहा राम चलो राम क्या है? अ जो घटघट में रम रहा है वो राम है। ठीक है? ये तो बात हुई। राम जो आनंद सिंधु सुख राशि हैं वो राम है। सी करते त्रैलोक सुपासी वो राम है। सुखधाम है राम। पर राम शब्द का अर्थ क्या है? तो राम का अर्थ है रमंते योगिनो यस्मिन सराम अथवा रमयति सराम। जिसमें योगी रमण करे वह राम है अथवा जो लोगों को रमाए वह राम है। तो जिसमें मन रम जाए वह राम है और जो लोगों को रमाए वो राम है। तो इसी यह राम का अर्थ है और दूसरी बातें जो है वो राम के विषय में उनके उनके उपमाएं हैं या
(52:49) फिर उल्लेख हैं या फिर लोग जिस तरह से समझते हैं वो है। लक्षण कह लीजिए अथवा उनकी जो कुछ अनुभव हैं। कुछ कहानियां हैं। जी उनका स्वरूप का वर्णन कह लीजिए। पर अर्थ शब्द का वह है जो रमाए अथवा जिसमें मन रम जाए। रम जाए। ओम का क्या अर्थ है? ओम का क्या अर्थ है? हां। तो ओम के अ अर्थ के लिए हमें केवल एक ही अष्टाध्यायी और जो उणाद सूत्र जो संस्कृत व्याकरण है जो सबसे प्रामाणिक शास्त्र है। किसी भी शब्द के अर्थ के लिए। तो हमारी व्याकरण की परंपरा में ओम को अव धातु से उत्पन्न माना गया है। सभी शब्द मूलत जैसे राम शब्द है रम धातु से रम धातु से आता है। गुजराती में
(53:31) कहते हैं बालक रमेश छे रम रमवा जाऊं छू मैं खेलने जाता हूं। गुजराती में वह अर्थ है खेलने का। रम का वास्तविक अर्थ क्रीड़ा में है। क्रीड़ा है। रमू क्रीड़ायाम। मैं नामों के बारे में भी आपसे चर्चा करूंगी इस इस चर्चा के बाद क्योंकि आपकी वहां पे भी बहुत एक्सपर्टीज है और आप कई नामों के बारे में बताते हैं किस तरह से हम मिस इंटरप्रेट करते हैं आज के टाइम में। लेकिन फिलहाल हम बात कर रहे हैं ओम के हर ओम की धातु है अव। अवधातु के 19 अर्थ हैं। 19 अर्थ हैं। 19 अर्थ हैं। संस्कृत का जो धातु पाठ है जिसमें दो सहस्त्र धातुएं हैं। उसमें सर्वाधिक अर्थ अवधातु के हैं।
(54:08) सबसे अधिक दो सहस्त्र धातुओं में से 2000 दो सहस्त्र धातुओं में से सर्वाधिक अर्थ अवधातु के हैं। और इसके 19 अर्थ हैं। तो जो संस्कृत परंपरा का सबसे बड़ा शब्द है। सबसे महत्वपूर्ण शब्द है वह इसकी संपन्नतम धातु से निकला है। तो इसमें आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। तो अवधातु के क्या अर्थ है? अवक्षण गति कांत प्रीति तृप्त अवगम प्रवेश श्रवण स्वाम्यर्थ याचन क्रिय इच्छा दीप्त वाप्य आलिंगन हिंसा दान भाग वृद्धिशु। यह पूरा धातु पाठ का सूत्र है। अवकार अर्थ है रक्षण। रक्षा करना। अवकार है गति। तो रक्षण से अर्थ आया जो रक्षक है। जैसे मंत्र क्या है? तो मंत्र ऐसे तो
(54:55) मन्यते अनेन इति मंत्र जिससे मनन करता है व्यक्ति वह मंत्र है जिससे मनन अर्थात विचार करता है पर मंत्र की एक निरुक्ति है मननानयते जो मनन करने पर जो रक्षा करता है तो तो ओम मंत्र है तो मनन करने पर रक्षा किसकी रक्षा करता है ज्ञान की रक्षा करता है श्रुतम मेघ गोपाया मेरे ज्ञान की रक्षा करो जो मेरे मेरी साधना है उसकी रक्षा तो ओम का अर्थ है जो रक्षा करता है वह ओम है गति अर्थात जाना जाना अर्थात सर्वत्र गामी जो सर्वगामी है वह ओम है जो सर्वत्र पहुंच सकता है वह ओम है कांत अर्थात प्रिय प्रिय होना तो सबको प्रिय है वह ओम है रक्षण गति
(55:38) कांत प्रीति कांत अर्थात सुंदर लगना जो सब जो सर्व सबसे सुंदर वस्तु सत्यम शिवम सुंदरम वह ओम है प्रीति अर्थात प्रेम का जो सबसे प्रेम करे वह ओम हम कहते हैं जो ईश्वर है वह सब जीवों से प्रेम करता है। रक्षण गतिकांत प्रीति तृप्ति जो आप्त काम है तृप्त है पूर्ण तृप्त है जिसको कुछ ना चाहिए वह तत्व ओम है। रक्षण गतिकांत तृप्ति रक्षण गति कांत प्रीति तृप्ति अवगम अवगम अर्थात ज्ञान जो सर्वज्ञ है वह ओम है। ईश्वर सर्वज्ञ है। इसलिए सर्वज्ञ ओम है। प्रवेश प्रवेश अर्थात घुसना प्रवेश अर्थात व्याप्त करना। सर्वव्यापी ओम है। तो ओम का अर्थ है जो
(56:24) सर्वत्र व्याप्त करता है। सब सब कोने-कोने में प्रविष्ट है। जैसे कहते हैं घट घट में जो रम रहा ताहि राम पहचान तो वह ओम है। श्रवण जो सर्व श्रोता है जो सब कुछ सुन ले वह ओम है। तो जो कान के बिना भी सब कुछ सुन ले वह निराकार ईश्वर ओम है। स्वामी स्वाम्य अर्थात जो सबका स्वामी है वह ओम है। याचन जो याचक है किसका याचक है? साधना का याचक है। केवल हम ओम अर्थात ब्रह्म को ईश्वर को केवल साधना चाहिए। केवल हमसे एक निष्ठा चाहिए। बस फिर वही अपना अर्थ स्वयं हमें दिखा देगा। दिखा देगा। तो स्वाम्यर्थ याचन क्रिया क्रिया अर्थात जो कुछ हो रहा
(57:07) है, जो कुछ घटित हो रहा है, जो कुछ कुछ कर रहा है, सब कुछ करने वाला ओम है। जिसे कह देंगे ओमनीपोटेंट अंग्रेजी में। तो सर्वव्यापक था, ओमनी प्रेजेंट, ये हो गया ओमनीपोटेंट। क्रिया इच्छा इच्छा करने वाला सबकी मंगल कामना करने वाला ईश्वर ओम है। दीप्ति जो सब स्थानों पर भासता है जो सब स्थानों पर प्रकाशित होता है। सूर्य हो, चंद्रमा हो, अग्नि हो, कोई भी तारा हो, वह ओम है। अवाप्ति जो सब कुछ प्राप्त कर ले, वह ओम है। आलिंगन जो सबसे प्रेम करे, जो सबको अपना ले, वह ओम है। हिंसा अर्थात नाश करने वाला। किसका नाश करने वाला? अज्ञान का नाश करने वाला। जो दुख
(57:50) का, संताप का, त्रिविध तापों का नाश करता है, वह ओम है। आदान जो सब कुछ स्वीकार सर्वग्राही सर्वग्राही जो सब कुछ स्वीकार कर ले जो अपने में सब कुछ संभाले वह ओम है। और लिंगन हिंसा दान भाग वृद्धि भाग अर्थात जो अपने को विभाजित कर ले वह ओम है। जो एक से अनेक हो जाए। तो कहते हैं ईश्वर पहले एक था और फिर अनेक हो गया। उपनिषदों में भी आता है। और यदि आप विज्ञान को ही माने तो पहले सिंगुलरिटी थी और फिर वह विविध ब्रह्मांड में व्याप्त हुई। उपमा है। मैं इक्विवेलेंस नहीं कह रहा हूं। मैं ये नहीं कह रहा हूं वही है। अ तो जो एक अनेक में
(58:28) विभक्त होता है वह ओम है। और वृद्धि जो सब समय बढ़ता रहे जो एवर एक्सपेंडिंग है वह ओम है वही ब्रह्म है। तो ये 19 ओम के शाब्दिक अर्थ हैं क्योंकि ओम अवधातु से आता है। अवतेष्टि लोपश्य उणादि सूत्र है और उणादेव बहुलपाणि का सूत्र है। तो यह ओम के शाब्दिक अर्थ ये 19 अर्थ हैं जो मैंने अपनी पुस्तक के अंतिम सुमेरु मनके में दिए हैं। तो पुस्तक में 84 नाम है ओम के। अ इन 84 नामों को 108 मनको में समझाया है जो माला के मन के होते हैं इसलिए ओम माला नाम है और जो सुमेरु है उसमें 19 अर्थ जो शाब्दिक अर्थ है ओम के वह बताए गए हैं। और ऐसे तो ओम का एक प्रणव सहस्त्रनाम भी है।
(59:11) ओम के अनेक नाम है जैसे प्रणव है। अह और त्र्यक्षर है, बीजाक्षर है, अनादि अनंत ये सब ओम के सार ओम का नाम है। तो उनके अलग-अलग अर्थ हैं। पर ओम शब्द के ये 19 अर्थ हैं। आपने ओम शब्द के अर्थ भी बताए। अपने नामों का उल्लेख भी किया और आपकी जो एक एक्सपर्टीज है वो संस्कृत के के नामों को जो आजकल अमूमन तौर पर माने जाते हैं कि संस्कृत के नाम है आप उनको डीमस्टिफाई करते हो कि संस्कृत के नाम नहीं है। आजकल लोग बहुत अपने बच्चों के जब नाम रखने आते हैं क्योंकि मुझे लगता है कुछ या तो ट्रेंड ऐसा हो गया है या तो फिर जैसा आपने कहा कि अब हम थोड़े से सक्षम हो गए हैं
(59:51) फाइनेंशियल तौर पर तो एक जो एक जो हमारा रुझान होता है वो इसी तरफ मुड़ता है कि अपने शास्त्रों को समझें अपने रूट को समझे कहां से आए हैं तो आजकल लोग संस्कृत नाम बहुत ढूंढते हैं अपने बच्चों के लिए जब नाम रखने होते हैं तो आप बहुत सारे नामों का उल्लेख करते हैं आजकल कायरा मायरा आयान विहान विवान बहुत इस तरह के नाम कॉमन है। लेकिन आप कहते हैं कि ये सबका ओरिजिन संस्कृत में नहीं है। लेकिन हम इंटरनेट पे Google सर्च करते हैं तो संस्कृत से ओरिजिन दिखाता है। तो थोड़ा सा इस पे भी दृष्टि डालिए। ऐसा है कोई नाम कोई भी रख लें। पर यदि हम इसको यह कहें कि
(1:00:27) यह भगवान कृष्ण का नाम है अथवा यह श्री राम का नाम है अथवा यह राधा देवी का नाम है अथवा यह संस्कृत नाम है तो हम एक असत्य बात कह रहे हैं तब हम झूठ कह रहे हैं। मेरा यही विचार है मेरा यही कथन है कि आप नाम जो भी रखें पर यदि आप ऐसा समझ रहे हैं कि ये संस्कृत नाम है तो आपको चेताना मेरा धर्म बनता है। मेरा कर्तव्य बनता है। और यदि आप अ ये कह रहे हैं सबको बताते फिर रहे हैं कि यह नाम भगवान कृष्ण का है विष्णु का है। सूर्य की पहली किरण इसका अर्थ है और ये संस्कृत नाम है और यदि यदि बस बात सच नहीं है और बहुत से लोग उसको सुन रहे हैं और और उससे भटक रहे हैं तो एक
(1:01:08) आवश्यकता है लोगों को सच बताने की। तो संस्कृत नामों के लिए बहुत सारे स्रोत हैं। पहले नाम हम लोग कैसे रखते थे? पहले तो परिवार के बड़े बूढ़े लोग नाम रखते थे जो संस्कृत जानते थे अथवा भारतीय भाषाएं जानते थे। हिंदी के बड़े कवि हो अथवा तेलुगु तमिल मराठी भाषा के अच्छे विद्वान हो तो उनको शब्दों के विषय में पता रहता है उद्गम क्या है ये कहां से शब्द नामकरण संस्कार भी होता था पहले संस्कार जो आजकल बहुत महत्व हो गया है काफी विलुप्त हो गया है आजकल तो पहले ही सोच लिए जाते हैं जी जिसमें चार नाम दिए जाते थे जन्म नाम जो नक्षत्र नाम जिसे कहते हैं नक्षत्र नाम
(1:01:42) मास नाम देवता नाम और प्रकाश नाम तो नाम हम बहुत सोच समझ के रखते थे पहले तो अगर किसी को संस्कृत में नाम रखना है जी अपना बनाया अपने बच्चों का तो कौन से राइट सोर्सेस तो सहस्त्रनाम देखें शतनाम देखें जो गीता प्रेस की एक सहस्त्रनाम स्तोत्र संग्रह पुस्तक छपी है एक शतनाम स्तोत्र संग्रह पुस्तक छपी है संस्कृत के कोष देखें आपटे का संस्कृत हिंदी शब्दकोश है इनसे नाम लें किसी प्रामाणिक स्रोत से नाम लें ना कि इंटरनल आजकल लोग चैट जीपीटी से ले रहे हैं ग्रक्स से ले रहे हैं Google जनरेटिव एआई से ले रहे हैं क्या वो एक्यूरेट है नहीं नहीं है ना नहीं 100%
(1:02:21) नहीं है कभी कभी है कभी नहीं है। मैं ये नहीं कहूंगा सब समय उनकी जानकारी अशुद्ध रहती है। नहीं ऐसा नहीं है। सब समय वो सच नहीं बोलते। सब समय झूठ भी नहीं बोलते। तो कठिनाई यही आती है। हम ये नहीं जान पाते किससे किस पर भरोसा करें किस पर नहीं। ग्रॉक पे मैंने दो दिन पहले प्रश्न पूछे। दो नामों को लेकर और दोनों पर ही मुझे ठीक उत्तर नहीं मिला। क्योंकि ग्रॉक की भी जो जानकारी है वह भी ऑनलाइन सोर्सेस से है। ऑनलाइन सोर्सेस में बहुत भरमार है झूठी जानकारी की और मैंने सीधा ग्रॉक से पूछा क्या यजुर्मय शिव का नाम है? मैं आश्चर्यचकित यह हुआ ग्रॉक ने उसका
(1:02:59) अर्थ तो बता दिया। यजुर्मय का यजुस और मय से इसका संबंध तो कुछ-कुछ यजुर्वेद से संबंध है पर ये शिव का नाम नहीं है। मैंने फिर ग्रॉक से कहा पर यह महाभारत के शांति पर्व के शिव सहस्त्रनाम में एक नाम है। मैंने नहीं बताया कि श्लोक में है या ना श्लोक बताया। तो ग्रॉक ने तुरंत उत्तर दिया यस इफ यू आर सेइंग इफ इट इज़ इन द शांति पर्व महाभारत देन इट मस्ट बी अ नेम ऑफ़ शिवा। मैंने फिर पूछा क्या आपको पता है कि श्लोक में तो ग्रॉक ने कहा नहीं पता क्योंकि वह ऑनलाइन सोर्सेस में नहीं है। तो एक यह भी बात है जो यह चैट बॉट्स हैं जनरेटिव एआई है वो हमारी इनपुट से भी
(1:03:34) प्रभावित हो रहा है। जब हमारी इनपुट से एक ही संवाद में प्रभावित हो सकता है तो ऑनलाइन हो तो कितनी जानकारी उससे कैसा प्रभावित होगा? मैंने अभी रिसेंटली ऑब्जर्व किया जो आप कह रहे हैं ना मुझे लगता है जो जनरेटिव एआई है चैट जीपीटी या फिर परपक्सिटी या जो भी इस तरह के सॉफ्टवेयर्स हैं उनमें हमारे अगर हम शास्त्रों की और हमारे वेदों की या अर्थशास्त्र की बात करें या फिर हम एस्ट्रोलॉजी की बात करें या फिर हम इस इस तरह की विद्याओं की बात करें तो कोई एक्यूरेसी नहीं है। कुछ दिन पहले मैं और मेरे हस्बैंड भी एक पॉडकास्ट देख रहे थे
(1:04:04) और कुछ एस्ट्रोलॉजी बेस्ड पॉडकास्ट था और हम सिर्फ ऐसे ही मस्ती के लिए देख रहे थे कि चलो देखते हैं। देन मेरे हस्बैंड ने कहा कि जो यह बता रहे हैं, मैं एक बारी डाल के देखता हूं कि मेरा क्या निकल के आता है। कौन सी राशि और वह तो वह सन साइन और मून साइन तक ग्रोक आपका कलेक्ट करेक्ट नहीं ले पा रहा है। जो कि आपको पता है कि हां यह डेट ऑफ़ बर्थ यहां से यहां तक है तो आप इस राशि के होंगे और अगर आपका नाम यह है तो आप इस आपका यह सन साइन होगा। लेकिन वह वहां पहले ही लेवल पर गलत। तो मेरे हस्बैंड उसमें कुछ चार्ट बना रहे थे अपना कि देखते हैं क्या क्या होता है। है ना?
(1:04:38) ये भी एक बड़ी मिस्टिकल सी दुनिया है। इसको भी एक्सप्लोर करने की कोशिश करते हैं। और वो अपना पूरा एक घंटे का होमवर्क करके बैठे हैं। मैंने कहा मुझे भी इंटरेस्ट आया कि मैं भी करती हूं। लेट लेट मी सी व्हाट इट इज़। और जब मैंने टाइप किया तो क्योंकि मुझे अपनी सूर्य राशि चंद्र राशि पता थी और क्योंकि हमारा जब नामांकन हुआ था नामकरण संस्कार हुआ था तो एक वो प्रॉपर जो कुंडली बनाई गई थी वहां लिखा गया था कि कन्या राशि है ये है। तो मैंने बोला ये तो गलत है। बोला तुम्हें कैसे पता? मैंने बोला कि मुझे याद है कुछ ऐसा। तो फिर मैंने उनको उसको ग्रॉक को इनपुट
(1:05:05) दिया कि मुझे लगता है कि इस वजह से मेरी ये राशि है और ये राशि है। उसने कहा यू आर करेक्ट। तो मैंने कहा जो पूरा टोटिटी आपने एक घंटे का होमवर्क कर लिया और सारा ही आपको कैसे पता वो सही है? मुझे लगता है यहां ऐसा मैं नहीं कहूंगा इसका कोई उपयोग नहीं है। उपयोग बहुत है। जैसे यदि हम ग्रॉक अथवा जनरेटिव Google जनरेटिव एआई हो अथवा जो भी हो चार्ट जेपीडी हो। यदि हम इनसे यह पूछे कि मुझे आप पुस्तकें बता दें जहां से मैं इसके विषय में और जान सकता हूं। उन पुस्तकों का हम अध्ययन करें और फिर जानकारी लें और फिर उससे मिलान कर लें कि हां जो ग्रॉथ में कहा गया वो ठीक है
(1:05:35) अथवा नहीं है। सोर्स होना चाहिए जब तक जब तक आप पेज नंबर किसी कोष का नहीं बताएंगे तब तक मैं नहीं मानूंगा। जब हम मूल किसी के देखेंगे कि यह नाम है, संस्कृत नाम है अथवा नहीं है। जब मुझे उसका मूल उदाहरण मिलेगा और मैं आश्वस्त हो जाऊंगा कि हां यह मूल है। यह उदाहरण है। यह महाभारत में मैंने देख लिया अथवा रामायण में देख लिया अथवा किसी ऋग्वेद की किसी मंडल में किसी सूक्त किसी सूक्त में किसी मंत्र में मैंने यह नाम देख लिया। स्वनय नाम राजा का देख लिया तब मैं आश्वस्त होऊंगा। यदि ग्रॉक को अब बता रहा है और मैं मिलान कर लूं तो ग्रॉक की बात ठीक है मान लेते
(1:06:10) तो ग्रॉक को केवल अथवा ग्रॉक हो अथवा जो भी जनरेटिव आई है उसको मैं केवल विकपीडिया की भांति देखता हूं विकपीडिया भी ह्यूमन इनपुट से बना है बहुत ऑनलाइन सोर्सेस की जानकारी है ठीक भी होता है और कभी गलत भी होता उल्टा भी बैठता है जो लिखा गया है तो हम उसको देख लें और परख लें फिर विश्वास करें बस यही है जानकारी के रूप में अच्छा है ठीक है चलो जानकारी दे रहे हैं पर आप उसको नाम तो आप किसी का रख रहे हैं तो वो 80 वर्ष 90 वर्ष तक रहेगा तो फिर इतना तो बनता है कि हम उसे एक अच्छे से जांच परख करके रखें। नित्यानंद जी आप इतना गहरा
(1:06:39) अध्ययन करते हो। आप शास्त्रों के बारे में पढ़ते हो। रुचि रखते हो स्पेस में। आपका एक पारिवारिक जीवन भी है। आपके दो बच्चे भी हैं। क्या वो भी संस्कृत की तरफ रुझान रखते हैं? क्या इन्फ्लुएंस कर पाते हैं हम अपने अपने घर को? या वो इन्फ्लुएंस होते हैं आपकी एनर्जी से? मैं उनके साथ गीता का अध्ययन कर रहा हूं। भगवत गीता का और जहां तक प्रयास है मेरा मैं अपनी ओर से कर रहा हूं और आगे उनका मार्ग मैं उनको अपने आप चुन लेने देना चाहता हूं। और इसका कारण यह है कि कुछ कारणों से मैं उनको बाल्यकाल से मैं उनको इसका अभ्यास नहीं करा पाया। पर
(1:07:13) मेरे माता-पिता ने भी मुझे स्वतंत्र छोड़ा था। मुझे संस्कृत का अभ्यास मेरे माता-पिता ने नहीं कराया। मेरे माता मेरी माता विद्यालय में अध्यापिका थी। मेरे पिताजी वैज्ञानिक थे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में। तो उन्होंने अपनी ओर से मुझे जितना थोड़ा बहुत सिखाना सिखाया और शेष मैंने अपने आप ही सिखा है और मुझे लगता है वही जब उसी पथ पर जब आप चलते हैं जिसमें आपकी रुचि हो तभी कुछ अच्छा रहता है। तो मैंने अपने बालकों को भगवत गीता का अभ्यास तो मैं कराता हूं और शेष जो है आगे उनकी यदि रुचि होगी तो अपने आप जब एक भीतरी जिज्ञासा से वो चाह उत्पन्न हो इनर
(1:07:47) क्यूरियोसिटी से जब वो डिजायर आए कि मुझे ये सीखना है मुझे ये समझना है तो आई थिंक उसका रस अलग होता है और फिर उसमें लीनता आपका डेडिकेशन भी एक अलग लेवल पर होता है। ये तो बहुत ही एक उत्तम विचार है। लेकिन मैं इसलिए पूछ रही थी कि आजकल जो पेरेंट्स बहुत कम है पर आपकी तरह जो जो इस तरफ रुझान रखते हैं अपने शास्त्रों को समझने में और मूल को समझने में और चीजों का गहन अध्ययन करने में उन उनकी वास्तविकता जो है उनके जो पारिवारिक जीवन है उसमें क्या-क्या प्रभाव पड़ रहे हैं या क्या बदलाव हो रहे हैं थोड़ा सा मैं वो समझने की कोशिश कर रही थी अह लेकिन अच्छा लगा कि
(1:08:23) आपने एक तरह से फ्रीडम भी दिया है और कुछ आप सिखा पढ़ा भी रहे हैं। बहुत ही बैलेंस्ड एक एक तरीका है। ये करने का क्योंकि हमारे यहां कहा गया देखिए हमारे यहां कहा गया है जो व्यक्ति सीखता है अपने गुरु से केवल अपनी विद्या का एक चौथाई भाग सीखता है आचार्यात पादम आदत्त तो आचार्य से वह एक चौथाई भाग लेता है और फिर अपनी मेधा से एक चौथाई भाग लेता है पादम शिष्य स्वमेधया अपने जो साथ वाले पढ़ने वाले होते हैं उनसे एक चौथाई भाग लेता है पादम सब्रह्म ब्रह्मचार्यभ्य और एक चौथाई विद्या उसको काल क्रम से अपने आप आती है। पाद काल क्रमेनतु तो आचार्यात पादमादत्त
(1:09:09) पादम शिष्य स्वमेधया पादम सब ब्रह्मचारभ्य सब ब्रह्मचार्यभ्य पादम काल क्रमेतु तो हम आचार्यों से जो सीखते हैं उसके पश्चात यही नहीं कि वही सीखना है। फिर कुछ हमें अपनी बुद्धि से उस पर मनन करके सीखना है। कुछ अपने जो हमारे सहपाठी हैं, हमारे मित्र हैं, उनसे सीखना है और फिर कुछ समय से हमें सीखना है। अपने अनुभवों से सीखना है। तो यही इसी में मैं विश्वास करता हूं कि होलिस्टिक मॉडल ऑफ़ लर्निंग है ये। जी कि होलसम लर्निंग कैसे होगी? जी केवल ऐसा नहीं केवल अपने आचार्य से ही सीखना है। केवल गुरु से ही सीखना है। ऐसा नहीं है। अपनी बुद्धि से भी सीखना
(1:09:47) है। अपने अनुभव से भी सीखना है। अपने अपनी बुद्धि विवेक अनुभव बहुत कुछ जीवन में सिखाते हैं और जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं अलग-अलग अनुभवों के साथ बहुत कुछ सीखने को मिलता है। और नित्यानंद जी हमने ओम के बारे में एक बहुत ही गहरी चर्चा की। बहुत सारे आपने यहां पर रेफरेंसेस दिए। कहां-कहां पर किस तरह से उल्लेख है? क्या उसका शाब्दिक अर्थ है? क्या उसका मतलब है? अगर हम आज के प्रवेश में आ जाए। अगर एक ब्रीफ आपको आंसर देना हो कि आज की लाइफ में ओम का रेलेवेंस क्या है? अशांतस्य कुतः सुखम। भगवत गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को कहते हैं दूसरे
(1:10:25) अध्याय में जो अशांत व्यक्ति है उसको सुख नहीं। हमारा जीवन आजकल बहुत अशांत है। आजकल बहुत अधिक अशांत है। ट्रैफिक हो अथवा काम हो अथवा और कुछ चिंता हो, तनाव हो तो हम शांति चाहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति जीवन में सुख चाहता है। सुख के लिए शांति आवश्यक है। और शांति कैसे मिल सकती है? शांति हमें तभी मिल सकती है जब हम अपने मन को शांत करें। और मन को शांत करने के लिए क्या चाहिए हमें? मन को शांत करने के लिए कई हम प्रयास कर सकते हैं। या तो अब हम हिमालय चले जाएं। वहां पर्वतों में बीच में रहे सुरम्य वादियों में और और नदी जहां कल कल बह रही हो जहां
(1:11:10) पक्षियों का कलरव सुनाई दे जहां हम सूर्योदय देखें सूर्यास्त देखें मन शांत हो जाएगा जब हमारे पहले कवि होते थे वो प्रकृति का वर्णन बहुत करते थे और प्रकृति वर्णन में ही एक कवि की उत्कृष्टता मानी जाती है तो इसलिए सारे जो महाकाव्य हैं उनमें एक बात होनी चाहिए महाकाव्य में सूर्योदय सूर्यास्त का वर्णन होना चाहिए सूर्योदय में कैसे उसकी लाली सूरज ढलते हुए कैसी एक लाली उसकी फैली फिर कैसे चला गया कैसे जैसे एक सिंदूर एक वधू के माथे पर फैला हो वैसे लाली फैल गई इस प्रकार के वर्णन हमारे शास्त्र में आते हैं सूर्योदय होने पर क्या होता है सूर्यास्त होने पर
(1:11:49) तो प्रकृति का अनुभव करें तो हम शांत हो सकते हैं मन शांत हो सकता है पर अब हमारे पास जंगल नहीं रहे हमारे पास कोई ऐसे उपवन आराम नहीं है जहां हम चले जाएं भारत में वैसे ही प्रदूषण बहुत है, धूल बहुत है। तो हम शांति कैसे ले सकते हैं? तो शांति का साधन है हमारे यह मंत्र साधना। और मंत्र साधना में मंत्र जो सर्वश्रेष्ठ मंत्र है ओम है। तो ओम हो अथवा शाक्त प्रणव हो जो ह्रीम है अथवा प्रणव हो अथवा कोई और मंत्र हो। इन मंत्रों के माध्यम से हम अपने मन को शांत कर सकते हैं। और मन को जब शांति मिलेगी तभी सुख मिलेगा। यही मेरा कहना है कि आजकल
(1:12:30) के परिवेश में, आजकल के व्यस्त जीवन में, आजकल के तनाव और चिंता से, परिपूर्ण जीवन में यदि हमें शांति पानी है और वह शांति हमें अपने कर्म को और अधिक अच्छे से करने की प्रेरणा देती है। जब मन शांत होगा तब कवि सर्वश्रेष्ठ कविता लिख पाएगा। जब मन शांत होगा तो खिलाड़ी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर पाएगा। जब मन शांत होगा तो वक्ता ऐसा बोल देगा कि जब तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठेगा सभागार। तो मन जब शांत होगा तब हम अपना कर्म योगी की भांति कर्म का संपादन कर सकेंगे और वही हमें जीवन में श्रेष्ठता की ओर ले जाएगा। तो मन को शांत करने मन को
(1:13:08) शांत करने के लिए हम मंत्रों को अथवा ध्यान का आश्रय लेते हैं और उसमें ओम का महत्व यही आज के जीवन में मैं कहूंगा ओम का महत्व। इसीलिए जो आजकल योग इतना लोग क्यों सीख रहे हैं? क्योंकि जीवन में उन्हें लगता है कुछ नहीं है तभी तो योग सीख रहे हैं। विदेशों में क्यों अधिक सीख रहे हैं इतना? हम भारतीयों से अधिक विदेशों में योग सीख रहे हैं। क्यों सीख रहे हैं? आजकल मैं जानता हूं कुछ लोग परिवारों में जहां बहुत कलह रहती है। अ जहां विद्यार्थियों को ऐसा शांत वातावरण नहीं मिल पाता। तो लोग आजकल हॉस्टल भेजते हैं, गुरुकुल भेजते हैं। पतंजलि का जो
(1:13:46) आचार्य कुलम है जो स्वामी रामदेव जी चलाते हैं वहां भेजते हैं। क्यों भेजते हैं? कि कहीं मन शांत हो। वो योगासन करें प्रतिदिन सूर्य नमस्कार लगाए समय से उठे समय से बैठे मन शांत हो इसलिए तो यही महत्व है मंत्रों का आज भी और सदा रहेगा मुझे लगता है कुछ बातें हैं जो परिवर्तित होती हैं पर कुछ जो मूलभूत तत्व हैं मानसिक स्वास्थ्य के वो रहते ही हैं और स्वस्थ वही है जो जिसका मन स्वस्थ है। जो चरक संहिता है क्षमा कीजिए। सुश्रुत संहिता है। उसमें स्वस्थ व्यक्ति का लक्षण यह कहा गया है। देखिए जिसका शरीर स्वस्थ है केवल वह स्वस्थ नहीं है। जिसकी
(1:14:28) धातुएं जिसके वात पित्त कफ जिसका संतुलन में है। केवल वही स्वस्थ नहीं है। केवल यह है वह स्वस्थ नहीं है। जो उसको जिसकी क्रियाएं सम हो जिसका मल सम हो जिसकी धातुएं सम हो जिसके जो तीन वात पित्त कफ हैं वह सम हो और इसके साथ ही प्रसन्न आत्म इंद्रिय मना स्वस्थ विधते जिसकी इंद्रियां जिसका मन और जिसका आत्मा प्रसन्न है उसको स्वस्थ कहते हैं। तो यह आत्मा की प्रसन्नता के लिए मन की प्रसन्नता के लिए शान मन की शांति के लिए मंत्रों का महत्व है और मंत्रों में ओम सिरमौर है। मंत्रों में ओम सर्वश्रेष्ठ है। तो इसलिए ओम का मंत्र तो ओम को अगर आज
(1:15:12) हमें अपनी लाइफ में लेकर आना हो तो मंत्र साधना के साथ मंत्र साधना किसी अनुभवी गुरु के साथ किसी आचार्य के साथ जिसने अनुभव किया है और जो आपको आपका मार्गदर्शन कर सकते हैं। उनके साथ ही करनी चाहिए। तो ओम की साधना हो अथवा किसी और मंत्र की साधना हो, शाक्त प्रणव की साधना हो कोई और मंत्र हो अ अर्थ की भावना ओम की करनी है अथवा किसी और मंत्र की करनी है रूप की करनी है तो ये किसी गुरु के लेकिन अगर बिना गुरु के करना चाहे कोई तो तो अर्थ भावना करें अथवा नाम जप करें यह कहा गया है वैसे कुछ संप्रदाय हैं जहां और जो पारंपरिक विचार है उसमें
(1:15:53) तो ओम के लिए केवल यज्ञोपवी जिसने धारण किया उन्हीं को अधिकृत माना जाता है परंतु जो योग की परंपरा है वह और व्यापक है और जो अन्य परंपराओं में तो ऐसा नहीं माना जाता। तो ये जिस भी गुरु परंपरा से जिस भी आचार्य परंपरा से अथवा जिस भी जहां भी श्रद्धा हो वहां से सीखकर व्यक्ति साधना करें और मन को मन की शांति प्राप्त करें। तो ओम के उद्गम से लेकर आज के हमारे जीवन में उसका क्या महत्व हो सकता है? वहां तक हमने इस कन्वर्सेशन को इवॉल्व करने की कोशिश की। आपने बहुत सारे अपने इनसाइट्स हमारे साथ शेयर किए। नित्यानंद जी एक सवाल जो मैं अंततः पूछती हूं अपने सभी मेहमान
(1:16:33) गण से जो इस पॉडकास्ट पर आते हैं वो यह है कि उनकी सफलता की परिभाषा क्यों क्या है? जब आज हमने कन्वर्सेशन इवॉल्व की तो आपके हमने बहुत ही सफल करियर की बात भी की जो आप करते हैं अपने पेशे के तौर पर और फिर आप शास्त्र भी पढ़ रहे हैं और आप खुद से डीपली कनेक्ट भी कर रहे हैं। तो इस इस पूरे परिवेश में आप सफलता को किस तरह से टटोलते हैं? सफल व्यक्ति कब अपने आप को मान सकता है? अ जब उसका मन संतुष्ट हो जाए कि मैं इससे अच्छा नहीं कर सकता। आप संतुष्ट हैं आज? अ कह सकते हैं? मुझे थोड़ा सा शंका वाला जो आपने समय लिया वो आईएम की जो ब्रिंगिंग है वो छोड़ती
(1:17:16) नहीं है पीछा कि नेक्स्ट थिंग और कुछ थोड़ा। कह सकते हैं। देखिए जैसा आप देखें तो बहुत बार ऐसा होता है जैसे सचिन तेंदुलकर कोई शतक लगाकर आए हो फिर भी आप पूछें क्या आप संतुष्ट हैं आज से? तो वो सोचेंगे वो कहेंगे कि हां कुछ और अच्छा मैं कर सकता था। हो सकता है मैं इससे और अच्छा खेल सकता था। लेकिन अभी तो आप बहुत कुछ कर रहे हैं। बहुत एक जो भी है जैसे किसी भी क्षेत्र में यदि आप हो किसी भी व्यक्ति से पूछें आप मैगस काल्सन से पूछ लीजिए कि व यू हैप्पी विद द गेम तो वो कहेगा कि हां हो सकता है मैं इसको और अच्छा खेल सकता था और कर इसमें कोई ऐसा
(1:17:48) नहीं कि बुरा खेला अथवा एवर एक्सपेंडिंग है ये भी ओम की तरह। जी और अच्छा किया जा सकता है और अच्छा सब कुछ हो सकता है। अ देखिए एक अर्थ तो ओम का हमारी खुद की परफॉर्मेंस भी हो गई फिर क्योंकि वहां भी हम उसको एक्सपेंड करना चाहते हैं। पर जब दूसरे लोग कहें जैसे जब जब मैं उसी उदाहरण पे जाता हूं सचिन तेंदुलकर के उदाहरण पे जब डॉनल्ड ब्रडमैन ने उन्हें बुलाकर कहा कि मैंने अपनी पत्नी से कहा कि जब आपने यह मारा तो मैंने कहा मैंने अपने आप को खेलते हुए नहीं देखा पर मैं सोचता हूं यदि मैं खेल रहा होता तो मैं ऐसे ही मारता। तब सचिन मान सकते हैं कि हां मैं
(1:18:27) मैं सफल हूं। तो यदि कोई कोई श्रोता गण अथवा कोई अच्छा वक्ता यदि कहे कि आपने जो कहा बहुत अच्छा बोला तब मुझे कुछ आभास हुआ कि हां चलिए मेरी सफलता है और मैं संतुष्ट हूं आज के इस वार्तालाप से और मुझे लगता है कहीं-कहीं और मैं अच्छा बोल सकता था पर ये तो एक कहने की बात है। हम सदैव पुस्तक भी लिखते हैं तो एक बार जब लिखते हैं तो विचार करते हैं कि जो लिखा क्या इसको और अच्छे शब्दों में लिख सकते हैं तो हो सकता है इसीलिए पुस्तकों में जो जो एक वाक्य संरचना आती है वह अलग होती है क्योंकि हम उसको उस पर कई बार विचार कर सकते हैं। जब हम ऐसे बोल रहे होते हैं तो
(1:19:06) कभी कभी स्मृति हो जाती है। कभी शब्द इधर से उधर हो जाता है। कभी कोई विचार आता है। कभी विचार उस क्रम में नहीं आता जिस क्रम में हम बोल रहे होते हैं। नहीं ये तो आप थोड़ा ज्यादा क्रिटिकल हो रहे हैं। मुझे लगता है कि आपने बहुत संतुष्ट हैं तो मैं प्रसन्न मैं पूर्णत संतुष्ट हूं क्योंकि मुझे अह जो रुचि है वह लाइफ को थोड़ा डीपर एंगल से टटोलने में है और जब मुझे कभी ऐसे स्पीकर मिलते हैं जो डेप्थ में जा सकते हैं तो मेरी कोशिश रहती है कि मैं डेप्थ में जाऊं। हालांकि मेरी जो टीम है वो मुझे इसके लिए थोड़ा मना करती है कि मैडम थोड़ा
(1:19:35) मासी बनाइए। बहुत ज्यादा नीश मत कीजिए क्योंकि फिर ऑडियंस नहीं देखती हैं। फिर वो एक स्पेसिफिक ऑडियंस के लिए हो जाता है। लेकिन मुझे लगता है कि अगर आप हम और आप आज यहां पर एक घंटा निकाल रहे हैं तो इस क्या वृद्धि हो सकती है हम दोनों के ज्ञान में या हम दोनों के इस समय का बेस्ट यूज़ क्या हो सकता है? तो मुझे लगता है जब तक हम निश में डीपली नहीं जाएंगे गहराई में नहीं उतरेंगे तब तक वो बेस्ट नहीं हो सकता है। तो मैंने उस दृष्टिकोण से आज की इस चर्चा को रखने की कोशिश की। जो डूबा सो पार जो प्रेम का दरिया होता है जो डूबा सो जो डूबा सो पार अब जो जो नहीं डूब पाएगा
(1:20:08) नहीं डूब पाएगा कोई बात नहीं उनके लिए कुछ और एपिसोड बनाएंगे लेकिन नित्यानंद जी आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा बहुत-बहुत धन्यवाद हमारे साथ ये चर्चा करने के लिए जी मुझे भी बहुत प्रसन्नता का अनुभव हुआ और आप यहां आमंत्रित करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद नमस्कार आप सभी का इस पडकास्ट को देखने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आपको कौन सी बातें आज के इस पॉडकास्ट में अच्छी लगी किस चीज ने आपके साथ डीपली कनेक्ट किया आपकी आपकी पर्सनल लाइफ में ओम का क्या महत्व है? कमेंट सेक्शन में लिखकर जरूर बताइएगा। मैं हर एक कमेंट को पढ़ती हूं और अगर आपके कुछ सवाल
(1:20:38) अनआंसर्ड रह गए हैं, वह भी आप पूछ सकते हैं। मैं कोशिश करती हूं कि हर कमेंट का जवाब दिया जाए या फिर अगले आने वाले एपिसोड में आपके प्रश्नों को इंक्लूड किया जाए। अगर आपको हमारी यह कोशिश अच्छी लगती है तो चैनल को जरूर सब्सक्राइब कीजिएगा। बेल आइकन प्रेस कीजिए ताकि आपके पास हमारी अपडेट्स आती रहें और आप हमारे पॉडकास्ट एपिसोड्स को मिस ना करें। जब आप चैनल को सपोर्ट करते हैं तो आप हमें सशक्त बनाते हैं कि हम और भी बहुत सारे गेस्ट को यहां आमंत्रित कर सकें और वो हमारे पडकास्ट को ऐसा प्लेटफार्म समझे जहां पर वो आए। इस पडकास्ट को लाइक, कमेंट और शेयर कीजिए और
(1:21:13) लोगों तक भी हमारे सनातन धर्म के बारे में, ओमकार के बारे में जो मीनिंगफुल मार्गदर्शन है वह पहुंचे आपकी इस कोशिश से। तो आपका अनेक-अनेक धन्यवाद। मैं मिलती हूं आपसे अगले पॉडकास्ट में। नमस्कार

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