Wednesday, June 10, 2026

This Chemical Lowered India's IQ For 50 Years!

This Chemical Lowered India's IQ For 50 Years!

Author Name:Vigyan Recharge

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@VigyanRecharge

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Transcript:
(00:00) हेलो एंड आई वेलकम यू टू विज्ञान रिचार्ज। 1923 में खतरनाक केमिकल बनाया गया अमेरिका में और जानबूझकर उसे हर गाड़ी के पेट्रोल में डाल दिया गया। हर बार जब भी गाड़ी स्टार्ट हुई धुआं हवा में फिर सांस में और फिर खून के रास्ते सीधा दिमाग में और यह लगातार 70 साल तक ऐसे ही होता रहा। इसका नतीजा क्राइम रेट एक्सप्ललोड हो गए। पूरी दुनिया में एक पूरी जनरेशन का आईक्यू खत्म हो गया और भारत में तो यह केमिकल सन 2000 तक चला। यह कहानी है दुनिया के सबसे लंबे चले मास पोइजनिंग की और यह शुरू होती है 1921 से। 1920 में अमेरिका में गाड़ियों
(00:32) का सैलाब फूट पड़ा। अपने हेनरी बाबू यानी कि Ford वाले इन्होंने मॉडल टी नाम की एक सस्ती गाड़ी निकाल दी। अब ये गाड़ी धुआंधार बिकी। इसके जवाब में जनरल मोटर्स ने अपनी गाड़ी को Ford से बेहतर बताकर मार्केट में उतार दिया। अब जनरल मोटर वालों की गाड़ी जितनी तेजी से बिकी उतनी ही तेजी से लोगों ने उसे लाकर सर्विस स्टेशन पर पटक दिया। क्योंकि गाड़ी गढ़-गड़ का कीर्तन कर रही थी। जिसे कहते हैं नॉकिंग। अब यह क्या होता है? देखो कार इंजन के अंदर होता है सिलेंडर जिसके अंदर फ्यूल और एयर के मिक्सचर को स्पार्क प्लग की मदद से जलाया जाता है। अब अगर यह सब
(01:01) कुछ सही टाइमिंग के साथ हो जाए तो इंजन मस्त चलेगा। लेकिन अगर यह मिक्सचर स्पार्क प्लग के स्पार्क पैदा करने से पहले खुद ही जल जाए तो सिलेंडर के अंदर दो धमाके होंगे और इसी को नॉकिंग कहते हैं। जैसे दोनों हाथों के एक साथ सही समय पर टकराने पर ताली बजती है और अगर इनमें से एक भी हाथ आगे पीछे हो जाए तो ताली ठीक से नहीं बज पाएगी। बिल्कुल ठीक इसी तरीके से अगर एयर फ्यूल का मिक्सचर सही टाइम पर ना जले तो इंजन नॉकिंग साउंड को प्रोड्यूस करेगा। अब ये नॉकिंग इंजन की पावर को खा जाएगा और इंजन को भी तोड़ेगा। अब यहां पर आपके दिमाग में एक सवाल आया होगा कि क्या जनरल
(01:32) मोटर्स से गाड़ी बनाने से पहले नॉकिंग नहीं होती थी? देखो भैया फोर्ड ने जो मॉडल टी बनाया था वो कम कंप्रेशन रेश्यो पर चलता था। अब इस बात का क्या मतलब हुआ? तो भैया इस बात का मतलब यह हुआ कि पिस्टन सिलेंडर के अंदर एयर और फ्यूल के मिक्सचर को कम दबाता था। जिसका नतीजा था कम रफ्तार, कम ताकत। लेकिन नॉकिंग भी नहीं होती थी। अब जनरल मोटर सेम गाड़ी बनाकर तो Ford के मॉडल T से कमपीट नहीं कर पाता। तो उसने यह सोचा क्यों ना इंजन की ताकत को बढ़ा दिया जाए। जिसका सबसे आसान तरीका था कि कंप्रेशन रेश्यो को ही बढ़ा दो। अब कंप्रेशन रेशियो बढ़ने का मतलब यह था कि
(02:03) पिस्टन सिलेंडर के अंदर फ्यूल और एयर के मिक्सचर को पहले से ज्यादा कंप्रेस करेगा। लेकिन यहां से एक समस्या भी पैदा हो गई। अगर प्रेशर बढ़ेगा तो टेंपरेचर भी बढ़ेगा। और यही टेंपरेचर स्पार्क प्लग के स्पार्क प्रोड्यूस करने से पहले तेल को जला रहा था। जिसका नतीजा था नॉकिंग और यह जनरल मोटर्स के गले में हड्डी की तरह फंस गया। अब जनरल मोटर्स के बॉस ने अपनी लैब को फरमान जारी कर दिया कि भैया नॉकिंग खत्म करो चाहे कुछ भी करना पड़े। अब इसी लैब में बैठा था एक भाई साहब जिसका नाम था थॉमस मिडग्लेज जूनियर एब्सोल्यूट जीनियस। भाई साहब खानदानी खोजकर्ता थे। इनके
(02:35) पिताजी ने गाड़ियों के लिए टायर डिजाइन किए थे। चीजों की खोज करना तो इनके खून में था। अब भाई साहब ने नोकिंग की समस्या सुनी और पीरियडिक टेबल लेकर लग गए अपने काम पर। एक के बाद एक कंपाउंड टेस्ट कर मारे और फिर बोले दो चीजें काम करती हैं। पहला इथेनॉल और दूसरा लेड मतलब टेट्रा इथाइल लेड। अब नाम लंबा है तो मैं लेड ही बोलूंगा। भाई साहब ये दोनों चीजें ऐसी थी जिसे तेल में डालो और नॉकिंग गायब। मतलब पेट्रोल में डालने पर यह पेट्रोल और एयर के मिक्सचर का सेल्फ इग्निशन टेंपरेचर पहले से ज्यादा बढ़ा देती थी। जिसकी वजह से गाड़ी की नॉकिंग बंद हो गई। अब जनरल
(03:07) मोटर्स के पास दो ऑप्शन थे। लेकिन फिर भी उसने लेड को ही चुना। लेकिन क्यों? भाई साहब यही तो असली खेल है। देखो भैया इथेनॉल है दारू कोई भी बना सकता है। किसान भी भट्टी वाला भी आप भी मैं भी टेक्निकली इथेनॉल को कोई भी बना सकता है। इसी को तो कच्ची शराब कहते हैं। अब क्योंकि इसे कोई भी बना सकता है। तो भैया इसको पेटेंट नहीं किया जा सकता। यानी ना तो किसी की मनमानी चलेगी और ना ही कोई कीमत को कंट्रोल कर पाएगा। लेकिन लेड को पेटेंट किया जा सकता था और कंपनियों ने यही किया। अब जिसे बिना नॉकिंग के गाड़ी चलानी है वो भैया लेड वाला तेल डालो। और इसको बेचेगा कौन? तो
(03:41) इसको बेचेगा स्टैंडर्ड ऑयल जो जनरल मोटर्स की तरह ही रॉकालर खानदान की कंपनी थी। यानी तेल भी अपना गाड़ी भी अपनी जिसके धुएं से जब लोग बीमार पड़े तो उनको दवा भी अपनी ही कंपनी बेचेगी और यह तो कुछ भी नहीं। इन क्रांतिकारियों ने टेट्रा इथाइल लेड में से लेड का नामोनिशान ही मिटा दिया और उसका नाम मार्केटिंग के लिए इथाइल रख दिया। क्योंकि लेड शब्द सुनते ही लोगों के कान खड़े हो जाते क्योंकि दुनिया जानती है कि लेड ज़हर है। इसी ने रोमन साम्राज्य का भट्टा बैठा दिया था। अब रोमंस के साथ क्या हुआ यह कहानी फिर कभी सुनाऊंगा। अभी आगे
(04:13) सुनो। अब मिडग्ले भाई साहब जिनके हाथों से यह केमिकल बना था वो खुद 1923 में लेड की वजह से बीमार पड़ गए। भाई साहब के हाथ कांपने लगे। कमजोरी आ गई पर अपना कभी मुंह नहीं खोला। क्योंकि अगर सच बोला होता तो पेटेंट खत्म, प्रोडक्ट खत्म, जीएम का मल्टी बिलियन डॉलर का बिजनेस खत्म और मिडगले का करियर भी खत्म। अब जो वर्कर इस केमिकल को स्टैंडर्ड ऑयल के बेवे प्लांट में बना रहे थे उनके हाथ पैर कांपना शुरू कर देते हैं। फिर उन्हें होता है हेलुसिनेशन और वह दीवारों से बात करने लगते हैं। 5 दिन में पांच मजदूर मर जाते हैं और 50 से ज्यादा को हॉस्पिटलाइज करना
(04:44) पड़ता है। वर्कर्स ने इस बिल्डिंग का नाम रखा द लूनी गैस बिल्डिंग। सबको पता था कि जो इसके अंदर जाएगा वो पागल होकर ही बाहर आएगा। पर भैया गरीबी और भुखमरी इंसान से वह सब कराती है जो वो करना नहीं चाहता। लोग मरते रहे, नए आते रहे, काम चलता रहा। देखो, तेल में डलने वाला लेड नॉर्मल नहीं था। यह ऑर्गेनिक लेड कंपाउंड था। मतलब चमड़ी से अंदर घुस जाता था। बस हाथ लगाओ सीधा खून में और खून में पहुंचकर यह सीधा दिमाग पर हमला करता है। देखो हमारे दिमाग के चारों तरफ एक दीवार होती है जिसे कहते हैं ब्लड ब्रेन बैरियर जो बाहर की गंदगी को दिमाग तक पहुंचने से रोकती है। लेकिन
(05:19) लेड उस दीवार को तोड़कर अंदर घुस जाता है और अंदर जाकर दिमाग में सूजन, हेलुसिनेशन, झटके और फिर ऊपर का टिकट कंफर्म। अब यही सब स्टैंडर्ड ऑयल में काम कर रहे वर्कर्स के साथ हो रहा था। लेकिन जैसे ही खबर लीक हुई और मीडिया में पहुंची भाई साहब चारों तरफ हड़कंप मच गया और हेडलाइन बनी पोइजनस गैस क्लेम फाइव लाइव जनरल मोटर्स डपों और स्टैंडर्ड ऑयल तीनों के लिए खतरा सीधा गले तक आ पहुंचा था। अगर सरकार बैन ठोक देती तो अरबों खरबों का धंधा चौपट हो जाता। अब स्टैंडर्ड ऑयल ने मिडग्ले को आगे कर दिया कि भैया यह बताएगा इसने बनाया है। मिडगले
(05:53) भाई साहब रिपोर्टर्स के सामने आए एक शीशी लाए। उसमें भरा था लेड वाला तेल। उसे अपने हाथों पर लगाया और 1 मिनट तक सूंघा और कहा यह बिल्कुल सेफ है। इससे कुछ ना होता। मिड ग्ले ने ऑस्कर लेवल एक्टिंग को भी फेल कर दिया था। लेकिन यह सब होने के बावजूद भी अमेरिका के पब्लिक सर्विस हेल्थ कमीशन ने एक मीटिंग बुलाई और मीटिंग का मुद्दा था क्या लेड सुरक्षित है? और इस मीटिंग का नतीजा निकला कि भैया हमें नहीं पता अभी और रिसर्च चाहिए। और जब तक रिसर्च नहीं होती तब तक प्रोडक्शन जारी रहेगी। और रिसर्च चाहिए। यह लाइन याद रख लो। जब भी किसी
(06:24) कंपनी को पता होता है कि उसके प्रोडक्ट में कुछ ना कुछ ऐसा है जो लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचाएगा और वो कंपनी अपने फायदे के लिए उसे बैन नहीं करवाना चाहती तो वो यही जुमला बोलती है कि अभी और रिसर्च चाहिए। हमारे पास पर्याप्त डाटा नहीं है। तंबाकू बनाने वाली कंपनीज ने 40 साल तक यही कहा और आज तेल कंपनियां क्लाइमेट चेंज को लेकर यही बोल रही हैं। इंडस्ट्री ने पैसा खर्च करके रिस्चरर्स खरीदे। रिसर्च पब्लिश करवाई की हो थ्योरी पब्लिश करवा दी जिसमें लिखा था कि भैया लेड तो नेचर से मिलता है। यह नेचुरल है। एनवायरमेंट में मौजूद है और इंसान इसको
(06:58) सहने के लिए इवॉल्व हो चुके हैं। यह किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। 30 साल तक इथाइल कॉरपोरेशन ने विरोध की हर आवाज को कुचल दिया। यूनिवर्सिटीज की फंडिंग रोक दी। इंडिविजुअल रिसर्च पेपर्स को पब्लिश नहीं होने दिया और विरोध करने वालों की पर्सनल लाइफ को पब्लिक करके उनके चरित्र की धज्जियां उड़ा दी। 40 साल तक एक भी मेजर इंडिपेंडेंट रिसर्च पब्लिश नहीं हो पाई। लेकिन फिर आया अपनी कहानी का असली हीरो क्लेयर कैमरून पैटर्सन रियल आयरन मैन। इन भाई साहब को कोई मतलब ना था दुनियादारी से। इन्हें तो 1948 में एक सिंपल सा काम मिला था कि भैया जाओ और धरती
(07:31) की उम्र का पता लगाओ कि हमारी धरती को बने हुए कितने साल हो गए हैं। अब पैटर्सन क्योंकि मैन हेडन प्रोजेक्ट पर काम कर चुका था। तो इन्होंने वहीं से रेडियो एक्टिव आइसोटोप्स और डिक रेट के बारे में सीखा और समझा था। और डिक रेट्स का मतलब होता है कि कोई चीज कितनी धीमी या तेज रफ्तार पर खत्म हो रही है। मतलब डिक रेट की मदद से हम किसी भी चीज की उम्र का पता लगा सकते हैं। और इसी को हम कहते हैं डेटिंग। अब पैटर्सन ने धरती की उम्र को पता लगाने के लिए यूरेनियम लेड डेटिंग को चुना। अब क्योंकि यूरेनियम डिक होकर लेड बनता है। एक फिक्स रेट पर बनता है। तो बस
(08:01) पत्थरों में इसके रेट को मेजर करो। बैक कैलकुलेट करो और धरती की उम्र निकल आएगी। अब पैटर्सन बाबू जब यह सारा हिसाब किताब जोड़ रहे थे तो एक समस्या उनके सामने आ गई। भाई साहब हर नापतोल में लेड के लेवल सामान्य से ज्यादा थे। मतलब इक्विपमेंट सही, टेक्निक सही लेकिन फिर भी लेड हर बार ज्यादा निकल रहा था। भाई साहब का माथा घूम गया और भाई साहब ने दुनिया का पहला अल्ट्रा क्लीन लैबोरेटरी बनाया। C केटेक में हर सरफेस शील्ड और एसिड से धुली हुई थी। भाई साहब को महीने लग गए मेजरमेंट करने के लिए लेकिन रिजल्ट निकाल कर दे दिया। और फिर 1956 में उन्होंने यह बताया
(08:34) कि भैया धरती की उम्र है 4.55 बिलियन इयर्स। और यह नंबर आज भी एक्सेप्टेड है। हम इसी को स्टैंडर्ड मानते हैं। लेकिन ये सब करने के बाद भी पैटर्सन के दिमाग में एक सवाल कीर्तन कर रहा था। भाई बार-बार यह सोच रहा था कि आखिर लेड इतना सारा लेड आया कहां से? मतलब ये सब नेचुरल तो नहीं हो सकता। अब भाई पहुंच गया सीधा ग्रीनलैंड। मतलब वही ग्रीनलैंड जिसे आजकल ट्रंप कप जाने के चक्कर में है। अब भाई ने हजारों साल पुराने बर्फ के टुकड़े निकलवाए। हर टुकड़े के अंदर उस जमाने की हवा कैद थी। यह बिल्कुल ऐसे था जैसे जमीन अपनी डायरी खुद लिख रही हो। अब इसके बाद पैटर्सन बाबू
(09:09) ने लेयर बाय लेयर हर साल का लेड लेवल निकाला जिसमें 2500 साल पहले लेड बिल्कुल ज़ीरो और जैसे ही 1923 में पेट्रोल यानी कि लेड वाले पेट्रोल की गाड़ियां मार्केट में आई भाई साहब हवा में लेड का ग्राफ सीधा रॉकेट हो गया बिल्कुल सीधा ऊपर। इस खोज ने की हो रिसर्च का 30 साल पुराना दावा इसे ध्वस्त कर दिया। अब यह सब होता देख इंडस्ट्री ने पैटर्सन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। लेकिन फिर भी पैटर्सन का लैंडमार्क पेपर पब्लिश हुआ जिसके पब्लिश होते ही पैटर्सन की जिंदगी को नर्क बना दिया गया। अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टट्यूट ने पैटर्सन को कमेटी से बाहर निकाल दिया। यूएस पब्लिक
(09:44) हेल्थ सर्विस कमीशन ने पैटर्सन की फंडिंग रोक दी। अब लेड बनाने वाली कंपनीज़ पैटर्सन के पास जाती हैं। बोलती हैं कि हम तुम्हारी रिसर्च को फंड करेंगे। बस तुम यह लेड की रिसर्च का पीछा छोड़ दो। और भाई साहब ने कंपनीज को कहा, "नो, अब इंडस्ट्रीज ने C केक यूनिवर्सिटी पर दबाव बनाया कि भैया इसको नौकरी से निकालो। इनके एक्सपेरिमेंट करने के तरीकों पर सवाल उठाए गए। पर भाई बोला मैं झुकेगा नहीं। कर लो तुम्हें जो करना है। भाई साहब पैटर्सन का डाटा बुलेट प्रूफ था। उसे झुठलाया नहीं जा सकता था। फिर भी लड़ाई 20 साल तक चली और 1973 में क्लीन एनर्जी एक्ट पास हुआ और
(10:17) ईपीए यानी कि एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी ने लेड वाले तेल पर पूरी तरह से बैन लगा दिया। इसके बाद इंडस्ट्री कोर्ट गई। 1976 में हारी। 86 में पूरा बैन लगा और 96 तक यानी कि 1996 तक यह बैन पूरे देश में रोल आउट हो गया। भाई साहब कहानी अभी खत्म नहीं हुई। आपको लग रहा होगा अपना हीरो जीत गया। नहीं जीत अभी भी इंडस्ट्री की हुई। जीता बिजनेस और पैसे कमाने का लालच। कैसे? यह सुनो। देखो, इंसानों की बिगड़ती हुई सेहत 50 साल में भी लेड वाले तेल को बैन नहीं करा पाई। लेकिन 1975 में अमेरिकन गाड़ियों में कैटेलेटिक कन्व्टर आ गए। यह मैंडेटरी थे। इनका काम होता है
(10:54) गाड़ियों से निकलने वाले धुएं को फिल्टर करना। अब लेड वाला पेट्रोल कैटेलिक कन्व्टर को पोइजन कर देता था। यानी कन्व्टर खराब हो जाता था और इसको बदलवाना बहुत महंगा था। अब ना बदलवाए तो पोलशन टेस्ट में फेल और टेस्ट में फेल होने का मतलब था कि गाड़ी चलाने का लाइसेंस रद्द। अब इन सारे सरकमस्ट्ससेस में गाड़ियों की सेल धड़ाधड़ नीचे आने लगी। अब कंपनीज़ को यह बात समझ में आ गई कि भैया अगर सेल को बचाना है तो लेड को मार्केट से निकालो। और अब मैं इस वीडियो की सबसे ज्यादा काम की जानकारी को आपको देने वाला हूं। तो बहुत ध्यान से सुनना। जरा यह समझो कि लेड हमारे
(11:29) दिमाग के साथ करता क्या है? और कैसे करता है? देखो हमारा दिमाग हमारे पूरे शरीर को कंट्रोल करता है। तो उसकी सिक्योरिटी भी बहुत टाइट है। बहुत कम ऐसी चीज हैं जो हमारे दिमाग तक पहुंच पाती हैं। हमारा दिमाग जेड प्लस सिक्योरिटी लेकर बैठा है। जिसकी जिम्मेदारी है ब्लड ब्रेन बैरियर के पास। लेकिन यह ब्लड ब्रेन बैरियर जरूरी चीजों को दिमाग तक जाने देता है। जैसे कैल्शियम जिसके बिना दिमाग ठीक से काम नहीं कर सकता। अब जैसे ही कैल्शियम के लिए ब्लड ब्रेन बैरियर अपना गेट खोलता है भैया लेड भी उसके साथ खिसक लेता है। कैसे? क्योंकि दोनों का साइज और चार्ज लगभग एक
(12:02) जैसा है। जैसे एक दूसरे के जुड़वा हो और हमारा शरीर कैल्शियम और लेड में फर्क नहीं कर पाता है। इसी कारण की वजह से तो लेड हमारी हड्डियों में और दांतों में जमा होता है क्योंकि हड्डियों में भी कैल्शियम है और दांतों में भी कैल्शियम है। अब लेड को कैल्शियम के साथ देखकर हमारी बॉडी समझती है कि यह तो अपना ही बच्चा है। आने दो इसको अंदर। अब अगर आपने सलार मूवी देखी है तो आपको यह चीज बड़े आसानी से समझ में आ जाएगी। भाई साहब जब प्रभास अपने दोस्त के साथ खानसार शहर के अंदर एंट्री मारता है तो आप उसके दोस्त को समझ लो कैल्शियम और प्रभास को समझ लो लेड और एंट्री गेट को
(12:34) समझ लो ब्लड ब्रेन बैरियर। अब जैसे ही प्रभास अंदर गया यानी कि लेड अंदर पहुंचा वो खानसार की ईंट से ईंट बजा देता है। लेड भी दिमाग के साथ यही काम करता है। अब लेड दिमाग रूपी शहर के अंदर सबसे पहले सीखने समझने सोचने की क्षमता को धीमा कर देता है। भाई साहब हमारे दिमाग में एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक सिग्नल के लिए नर्व फाइबर रूपी तार है और जैसे बिजली के तार के ऊपर पीवीसी कोटिंग होती है वैसे ही नर्व फाइबर के ऊपर भी एक कोटिंग है। लेड उसे छील देता है। जिसके बाद आप चाहे जितनी भी कोशिश कर लो याद करने की कुछ याद आएगा ही ना। अब हमारे दिमाग में एक मैनेजर भी
(13:10) होता है जिसे हम प्रीफ्रोंटल कॉर्टेक्स कहते हैं जिसे बायोलॉजी वाले अच्छे से समझते होंगे। अब इसका काम है डिसीजन मेकिंग। अब ये डिसीजन मेकिंग, प्लानिंग, गुस्सा कंट्रोल, सही और गलत में फर्क, किसी काम को करने का क्या नतीजा होगा? यह सब सोचना, इमोशन पे कंट्रोल करना। मतलब किसी की मयत में गए हैं तो दांत दिखाकर नहीं हंसना है और अगर किसी की खुशी में गए हैं तो छाती पीट-पीट कर नहीं रोना है। इन सभी हरकतों को काबू में रखने का काम इसी मैनेजर का है। अब लेड इस मैनेजर की ऐसी धुनाई करता है कि यह अपना काम ही भूल जाता है और उसके बाद इंसान कुछ भी कर सकता है।
(13:44) और सबसे ज्यादा डरा देने वाली बात यह है कि लेड के नुकसान को पलटा नहीं जा सकता। ना कोई दवा, ना कोई इलाज, ना कोई सर्जरी लेड के द्वारा किए गए नुकसान को ठीक कर सकती है। लेड हमारे दिमाग को परमानेंट डैमेज करता है और यह सब कुछ छोटे बच्चों में ज्यादा होता है। क्योंकि 6 साल से कम उम्र के बच्चों का दिमाग अंडर कंस्ट्रक्शन होता है। भाई साहब किसी का बच्चा देर से बोलता है। किसी का तुतलाता है। किसी के बच्चों की आंखों में फर्क है। किसी को सुनने में दिक्कत है। किसी को बोलने में दिक्कत है? कभी सोचा है कि आखिर यह दिक्कत क्यों है? इसके पीछे आखिर क्या कारण है?
(14:17) अब देखो लेड इन दिक्कतों का एकमात्र कारण नहीं है। लेकिन बहुत बड़े कारणों में से एक है। बच्चे पर किलोग्राम बॉडी वेट ज्यादा लेड अब्सॉर्ब करते हैं। अगर एक एडल्ट बॉडी 10% लेड को अब्सॉर्ब करती है तो बच्चे 50% को अब्सॉर्ब करते हैं। अब जरा आप यह सोचो कि छोटा शरीर डेवलपिंग ब्रेन पांच गुना ज्यादा अब्सॉर्प्शन और डैमेज परमानेंट यह लेड का साइंस है। थ्योरी नहीं है। यह पीियर रिव्यूड रेप्लिकेटेड प्रूवन फैक्ट है। अब आपके दिमाग में एक जेन्युइन सवाल आना चाहिए कि आखिर ये सब साबित कैसे हुआ? मतलब किसने किया? तो भैया पहले ये समझ लो कि आखिर ये
(14:51) सब साबित कैसे हुआ? तो एक टेस्ट होता है बीएलएल यानी कि ब्लड लेड लेवल। अगर किसी के खून में 10 से 20 मिलीग्राम पर डेसीलीटर लेड लेवल है तो यह दो से पांच आईक्यू पॉइंट्स को खत्म कर देगा। आपको यह सब सुनकर कम लग रहा होगा। भाई साहब आप एक जनरेशन का आईक्यू पांच पॉइंट नीचे कर दो। तो जो बच्चे जीनियस बनते वो एवरेज, जो एवरेज वो बिलो एवरेज और जो बच्चे बिलो एवरेज बनते वो डिसएबल्ड हो जाएंगे। ये है लेड का नुकसान और ये सब कुछ हुआ था। आज भी हो रहा होगा। लेड ने एक पूरी जनरेशन के आईक्यू को तहस-नहस कर दिया। अब बताता हूं कि यह सब हमें कैसे पता चला। एक डॉक्टर
(15:29) साहब थे डॉक्टर हरबर्ट नीडलमैन। इन्हें पता था कि लेड हड्डियों में और दांतों में जाकर जमा होता है। अब क्योंकि बच्चों पर लेड का सबसे ज्यादा असर होता है तो इन्होंने 2000 बच्चों के दूध के दांतों को इकट्ठा किया। हर एक बच्चे का नाम, पता और उसके रिकॉर्ड को डायरी में लिखा। अब क्योंकि बच्चों का ब्रेन लगभग 5 छ साल की उम्र में 95% डेवलप हो चुका होता है और इसी उम्र तक उनके दूध के दांत गिरते हैं तो दिमाग में कितना डैमेज हुआ होगा इसका बढ़िया आईडिया लग सकता था। इसी को आधार बनाकर इन्होंने यह एक्सपेरिमेंट किया। अब अपनी रिपोर्ट तैयार करने के बाद यह हर
(16:01) बच्चे के स्कूल गए। फिर बच्चों को पढ़ाने वाले हर टीचर से बात करी। मतलब बच्चे की अटेंशन, बिहेवियर, लैंग्वेज, मोटर स्किल और परफॉर्मेंस का डाटा स्कूल से लिया। और जब यह डाटा खून में मौजूद लेड से मिलाया गया तो भाई साहब सबके होश उड़ गए। हाई कंसंट्रेशन लेड वाले बच्चों का आईक्यू 45 पॉइंट नीचे था। वो कंसंट्रेट नहीं कर पा रहे थे। उनकी राइटिंग गंदी थी। चीजें देर से समझ में आती थी। जल्दी भूलते थे और औरों से अलग दिखते थे। नीडल मैन ने यह साबित कर दिया कि लेड बच्चों के दिमाग को धीरे-धीरे नष्ट कर रहा है। भाई साहब सबको एक स्लो बच्चा दिख रहा था जिसको टीचर बोल
(16:36) रही थी कि यह मेहनत नहीं करता। पेरेंट्स बोल रहे थे कि इसका मन पढ़ाई में नहीं लगता और किसी को पता ही नहीं था कि समस्या बच्चे में नहीं उसकी नसों में बहने वाले खून में थी। उस हवा में थी जिस हवा में वो सांस ले रहा था। अब इतनी मेहनत करके इस चीज को साबित करने वाले को भाई साहब कोई ना कोई इनाम तो जरूर मिलना चाहिए और इनाम मिला भी। जैसे ही यह रिसर्च मीडिया में पब्लिश हुई, तुरंत भाई साहब के अस्ते-बस्ते पैक करके इन्हें घर भेज दिया गया और इन पर समाज को गुमराह करने का इल्जाम लगाकर जांच बैठा दी गई। इन्होंने सालों तक लड़ाई लड़ी, क्लीन चिट मिली और
(17:09) यह सिस्टम से लड़कर जीत गए। अब यहां यह बताना भी जरूरी है कि लेड ने दुनिया में क्राइम को कैसे बढ़ाया। भाई साहब, अमेरिका में रिक नेविन नाम का एक इकोनॉमिस्ट था। अब सरकार ने उसे पुरानी बिल्डिंग्स में लेड वाले पेंट को हटाने पर होने वाले खर्चे और हटाने के बाद लोगों को मतलब लोगों की सेहत को उससे होने वाले फायदे के बारे में हिसाब किताब जोड़ने के लिए कहा। अब भाई साहब ने हिसाब किताब जोड़ा कि भैया लेड 1920 के आसपास आया। 1970 में पीक हुआ और फिर धीरे-धीरे घटने लगा। पर पता नहीं इनको क्या सूझी। इन्होंने क्राइम का डाटा उससे मिला लिया। इन्होंने यह देखा कि 1960
(17:42) के आसपास अचानक से क्राइम बढ़ने लगा और फिर 1990 में अचानक से क्राइम घटने लगा। अब इनके दिमाग में खिचड़ी पक गई कि क्या ये दोनों चीजें एक दूसरे से जुड़ी हुई हो सकती हैं। अब इन्होंने एक सिंपल सा काम किया। दोनों का ग्राफ बनाया और फिर लेड वाले ग्राफ को 20 साल आगे बढ़ाकर जैसे ही एक दूसरे से मिलाया दोनों ग्राफ बिल्कुल सेम निकल कर आए। अब आप यहां पर सोच रहे होंगे कि इसने भैया 20 साल आगे ग्राफ को क्यों बढ़ाया? तो देखो भैया जब लेड आया तो जिन बच्चों के दिमाग पर असर पड़ा उनकी उम्र लगभग 5 साल के आसपास रही होगी। फिर जब वह 20 साल के आसपास हुए होंगे तब जाकर
(18:15) वह क्राइम करने लायक होंगे। अब यह शक तो पैदा करता है लेकिन पक्का सबूत नहीं था। इसीलिए नौ अलग-अलग देशों का डाटा निकाल कर मिलाया गया और सब जगह सेम ग्राफ निकल कर आया। क्या जर्मनी, क्या फ्रांस, क्या न्यूजीलैंड हर जगह क्राइम बढ़ रहे थे और फिर धीरे-धीरे घटना शुरू हो गए। भाई साहब इंडस्ट्री के एक डिसीजन कि लेड या इथेनॉल इसने एक पूरी जनरेशन को फिजिकली मेंटली कॉग्निटिवली जबरदस्त तरीके से डैमेज पहुंचा दिया था। आईक्यू गिराया, क्राइम बढ़ाया, एडीएचडी को बढ़ाया, किडनी डैमेज हुई, हार्ट डैमेज हुए और रिप्रोडक्टिव सिस्टम को भी डैमेज कर दिया। किसके लिए?
(18:51) ताकि इंडस्ट्री पैसा कमा सके। आप जरा भारत की कहानी सुनो। कमाल के काम हुए थे अपने देश में। देखो, अंग्रेजों की गुलामी के समय से ही भारत में लेडेड पेट्रोल इंपोर्ट होता था। अब क्योंकि भारत एक कॉलोनी था तो कोई सवाल नहीं, कोई टेस्ट नहीं, कोई डिबेट नहीं, जो गोरे साहब ने बोल दिया वही सच था। फिर आजादी मिली। क्या फिर कुछ बदला? भाई साहब कुछ नहीं बदला। नया देश बंटवारे का जख्म झेल चुका था। लोग भूखे थे, गरीब थे। देश को डेवलपमेंट चाहिए था, इंडस्ट्री चाहिए थी और पेट्रोल की कुंडली खलने का ना तो समय था और ना जरूरत थी। लेड 1980 तक
(19:23) हवा में ऐसे ही घूमता रहा। हमारा बड़ा देश है। भाई साहब झेल गया। उस समय तो गाड़ियां भी ज्यादा नहीं थी। लेकिन फिर वो दिन आया जिसने सब कुछ बदल दिया। 14 दिसंबर 1983 प्राइम मिनिस्टर इंदिरा गांधी ने 47,500 में आने वाली Maruti 800 को मतलब Maruti 800 की चाबी को सबसे पहले खरीदार हरपाल सिंह को दे दिया। अब Maruti 800 से सस्ती कार उस जमाने में नहीं थी। Maruti से पहले सिर्फ अमीर लोगों के पास ही गाड़ियां होती थी। लेकिन Maruti के आते ही बिक्री आसमान छूने लगी। ये गाड़ी हर मिडिल क्लास का सपना बन गई और जैसे ही गाड़ियां बढ़ी लेड
(19:59) वाले तेल का जहर चारों तरफ फैल गया और यहां एंट्री होती है भारत के पहले हीरो की डॉक्टर इब्राहिम जॉर्ज। अब डॉक्टर जॉर्ज भारतीय आर्मी में आर्टिलरी ऑफिसर थे। 1968 में डायनामाइट एक्सप्लोजन की वजह से इन्हें चोट लगी। अब इन्हें सुनने में दिक्कत आई तो यह इलाज के लिए अमेरिका चले गए। अब अमेरिका में रहकर इन्हें पता लगा कि लेड पोइजनिंग कितना बड़ा इशू है। इन्होंने सीडीसी यानी कि सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल का डाटा, पैटर्सन की रिपोर्ट और नीडल मैन की स्टडीज को ध्यान से पढ़ा। इन्हें लगा कि भारत का तो कोई डाटा ही नहीं है। किसी ने कभी पूछा ही नहीं। और तो
(20:33) और जब वेस्टर्न कंट्रीज में लेड वाला पेट्रोल बैन हुआ तो इंडस्ट्रीज ने इस तेल को बनाना बंद नहीं किया बल्कि गरीब और डेवलपिंग देशों में इसे डंप करना शुरू कर दिया। जिनमें से भारत भी एक था। 1990 में डॉक्टर जॉर्ज की फाउंडेशन जॉर्ज फाउंडेशन ने प्रोजेक्ट लेड फ्री को चलाया। 22,000 बच्चों के ब्लड सैंपल्स लिए। भाई साहब क्या दिल्ली, क्या मुंबई, क्या कोलकाता हर जगह एलिवेटेड लेड मिला। पूरे भारत में आधे से ज्यादा बच्चों के दिमाग में लेड नुकसान कर चुका था और यहां पर एंट्री हुई दूसरे हीरो की अनिल अग्रवाल जी की। इन्होंने आईआईटी से इंजीनियरिंग करी और उसके बाद
(21:06) पत्रकारिता में आ गए। फिर 1980 में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट नाम के एनजीओ की स्थापना करी। जिसे आज के समय सीएससी कहते हैं। भाई साहब फिर नवंबर 1996 में सीएससी ने हाई प्रोफाइल इवेंट में वाइस प्रेसिडेंट के आर नारायण के द्वारा अपनी मैगजीन में एक रिपोर्ट को मीडिया के सामने रख दिया जिसका टाइटल था स्लो मर्डर द डेडली स्टोरी ऑफ व्हीकल पोल्यूशन इन इंडिया। इस मैगजीन के कवर पर तीन लोगों की फोटो थी। पहले थे जय नारायण प्रसाद निषाद। यह थे एनवायरमेंटल मिनिस्टर। पोल्यूशन कंट्रोल करने का काम इन्हीं के अंडर था लेकिन कुछ ना हुआ। दूसरे थे टीआर बालू
(21:40) पेट्रोलियम मिनिस्टर लेड फ्री तेल को देश में लाने की जिम्मेदारी इनकी ही थी। लेकिन भाई साहब रेकमेंडेशंस की फाइल इनके दफ्तर में धूल खा रही थी। और तीसरे थे राहुल बजाज। बजाज मोटर के ओनर इंडिया के ऑटो किंग। अब रिपोर्ट के आते ही सुप्रीम कोर्ट ने सुमोटो कॉग्निजेंस लेकर दिल्ली गवर्नमेंट को एक नोटिस जारी कर दिया। और यह नोटिस मर्ज हुआ एमसी मेहता की 1985 की रिट पिटीशन 1329 में जाकर। अब आप में से जो लोग लॉ कर रहे हैं या कर चुके हैं वो एमसी मेहता का नाम जरूर जानते होंगे। एमसी मेहता एक एनवायरमेंटल लॉयर 1985 में गंगा पोलशन के लिए पीआईएल फाइल करते हैं। केस
(22:18) एक्सपेंड हुआ और इसमें इंडस्ट्रियल पोलशन, एयर पोलशन और व्हीकल पोलशन सब कुछ जुड़ते हुए चले गए। आज के समय जो थोड़ी बहुत साफ हवा आपको मिल रही है उसके पीछे एमसी मेहता के रिट पिटीशंस का बहुत बड़ा योगदान है। नहीं तो भाई साहब अब तक आप गैस चेंबर के अंदर बैठे होते। अब भाई साहब 1998 में सुप्रीम कोर्ट का आर्डर आया और कोर्ट के ऑर्डर से ईपीसीए यानी एनवायरमेंटल पोलशन प्रिवेंशन कंट्रोल अथॉरिटी बना दी गई और इसी ईपीसीए की रेकमेंडेशन पर सन 2000 में लेडेड पेट्रोल को बैन कर दिया गया। अब ये सब होता देख भारत की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री ने विरोध का डंका बजा दिया। आप
(22:54) 1999 की बात सुनो। भारत की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री ने अनिल अग्रवाल के सीएससी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। देखो सरकार ने डीजल पर सब्सिडी दे रखी थी क्योंकि डीजल ट्रांसपोर्ट में यूज़ होता था। अब कार कंपनीज़ ने यह सोचा कि अगर हम डीजल वाली कार बनाकर लॉन्च कर दें तो लोगों को डीजल सस्ता पड़ेगा। लोग ज्यादा कार खरीदेंगे। अपनी सेल बढ़ेगी। लेकिन भाई साहब डीजल पीएम 2.
(23:18) 5 छोड़ता है। यह सीधा फेफड़ों में जाकर कैंसर का कारण बनता है। अब अनिल अग्रवाल की सीएससी को इंडस्ट्री की इस चाल के बारे में पता चल गया और अनिल अग्रवाल ने इंजंस ऑफ डेविल नाम की एक रिपोर्ट छाप दी। अब भारत की टॉप कार कंपनीज, कार मैन्युफैक्चरिंग कंपनीज अब मैं किसी का नाम नहीं लूंगा। आप इंटरनेट पर जाकर ढूंढ लेना। इन टॉप की कार कंपनीज ने अनिल अग्रवाल के सीएससी पर केस ठोक दिया। आप जानते हो इनके वकील कौन थे? भाई साहब फैली, एस नरिमन, अरुण जेटली, पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल इन बड़ी-बड़ी कार बनाने वाली कंपनीज को रिप्रेजेंट कर रहे थे। इन चारों में से तीन भविष्य में भारत के कैबिनेट
(23:52) मिनिस्टर बने। अब वकीलों ने कोर्ट में कहा कि भैया पर्टिकुलेट मैटर डेंजरस नहीं है। बकायदा एफिडेविट दिया था और आज 2026 में अगर कोई यह कह दे तो दुनिया हंसेगी क्योंकि भैया WHO कहता है कि पीएम 2.5 ग्रुप वन का कार्सिनोजेन है। यानी डेफिनेटली कैंसर करता है। अब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश सालवे को अपॉइंट किया कि भैया तुम समझो कि कौन सही बोल रहा है इंडस्ट्री या सीएससी? इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर आया कि भैया दिल्ली में डीजल वाहनों का लाइसेंस तुरंत सस्पेंड करो। 15 साल पुराने वाहन बैन पूरी के पूरी दिल्ली के ट्रांसपोर्ट सिस्टम को डीजल से
(24:27) हटाकर सीएनजी पर शिफ्ट करो क्योंकि यह लोगों के राइट टू लाइफ का मामला है। अब उस समय शीला दीक्षित की सरकार थी। अब शीला दीक्षित ने कोर्ट के ऑर्डर को मानने से मना कर दिया और कहा कि मैं कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट झेलने को तैयार हूं। पर कोर्ट का आर्डर नहीं माना जाएगा। फिर 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट की प्रोसीडिंग शुरू करी। तब जाकर मजबूरी में दिल्ली सरकार ने अपने ट्रांसपोर्ट सिस्टम को डीजल से सीएनजी पर शिफ्ट करना शुरू किया। भैया इसके बाद सबको यह लगा कि सब कुछ ठीक हो गया। लेकिन 2019 से 20 में एक स्टडी हुई जिसमें 10 शहरों में 2247
(25:02) बच्चों के टेस्ट हुए और सब में फिर से एलिवेटेड लेड लेवल्स पाए गए। मतलब बैन के 20 साल बाद बच्चों के शरीर में लेड कहां से आ गया? अगर लेड वाला पेट्रोल मार्केट में नहीं है तो लेड कहां से आ रहा था? आओ बताता हूं सारी चीजें एक-एक करके। भाई साहब आपके घर का पेंट अमेरिका ने 1978 में लेड वाले पेंट को अपने देश में बैन कर दिया और भारत में आज भी पूरी तरह से बैन नहीं है। भाई साहब 2019 में एक स्टिंग हुआ था। पता चला कि कुछ कंपनियां हल्दी के अंदर लेड क्रोमेट डाल रही हैं ताकि हल्दी का रंग गाढ़ा आए। देखो हल्दी बनाने के प्रोसेस में कई बार हल्दी का रंग फीका हो
(25:37) जाता है। तो हल्दी के रंग को बढ़ाने के लिए कंपनियां लेड क्रोमेट का इस्तेमाल करने लगी। आप 2015 में मैगी का केस याद करो। भाई साहब यूपी के बाराबंकी में Maggi के सैंपल्स टेस्ट में फेल हो गए थे। फिर पूरे देश में Maggi पर बैन लगा और अगस्त में दोबारा टेस्ट हुआ और उसके बाद बैन हट गया। क्या कंपनी को यह नहीं पता था कि उनके सामान में क्या चीज है? भाई साहब आपके काजल में खिलौनों में बैटरीज में कॉस्मेटिक आइटम्स में हर जगह लेड मौजूद है। भारत में आज भी लेड वाली बैटरीज को नंगे हाथों से तोड़कर लेड रिसाइकल किया जाता है। जबकि लेड को कंट्रोल एनवायरमेंट
(26:11) में प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट के साथ सही गाइडलाइंस को फॉलो करते हुए रिसाइकल होना चाहिए। भाई साहब सिंदूर हो गया, काजल हो गया, लिपस्टिक हो गया। बड़ी-बड़ी कंपनीज के ब्रांड में भी लेड मिला है। अब लगाओ बच्चों को काजल कि कहीं उसे किसी की नजर ना लग जाए। क्या आपको मालूम है लेड वाले पेंट्स आपके नर्वस सिस्टम को हानि पहुंचा सकते हैं? अच्छा हम किसी भी पेंट में 90 पीपीएम से ज्यादा लेड नहीं होना चाहिए। लेकिन क्या आपको पता है कि दशकों तक यह स्टैंडर्ड वॉलंटरी थे। आप इसे ऐसे समझो कि जैसे ट्रैफिक लाइट तो लगा दी और लोगों से यह बोल दिया जाए कि भैया
(26:46) लाल बत्ती पर रुकना होता है। लेकिन तुम्हारी मर्जी है कि चाहो तुम रुको या ना रुको कोई चालान नहीं कटेगा। तो क्या लोग मानेंगे? अब आपको क्या लगता है कि जो वंटरी कानून बनाया गया क्या कंपनियों ने उसे माना होगा? हमारे देश में समस्या कानून की नहीं बल्कि उसके इंप्लीमेंटेशन की है और इंप्लीमेंटेशन पॉलिटिकल विल से जुड़ा हुआ है। मैं या आप या कोई और भी गला फाड़-फाड़ के मर भी जाए ना तो भी किसी को कोई फर्क ना पड़ने वाला। अमेरिका ने लेड से निपटने के लिए एक डेडिकेटेड प्रोग्राम चलाया जिसमें मैंडेटरी ब्लड टेस्टिंग, लेड पेंट को बैन और अवेयरनेस कैंप लगाए,
(27:19) कैंपेन चलाई जिसका नतीजा निकला कि अमेरिका में बच्चों का एवरेज ब्लड लेड लेवल 88% तक नीचे गिर गया। लेकिन हम भी अपने बच्चों को बचा सकते हैं। यह सब कुछ मुमकिन है अगर हमारे देश की सरकार हर बच्चे का ब्लड लेड लेवल टेस्ट मैंडेटरी कर दे। लेड पेंट को पूरी तरह से बैन कर दे और जो ना माने उस पर क्रिमिनल पेनल्टीज लगाए। भाई साहब हमारे देश में मसालों की बड़े स्तर पर टेस्टिंग की जानी चाहिए। आपको जानकर हैरानी होगी कि बड़ी-बड़ी कंपनीज के कुछ मसाले विदेशों में बैन है। लेकिन हमारे देश में बिक रहे हैं। भाई साहब हमारे देश में मिलावट करने वाले असली दूध, घी, दही
(27:56) यहां तक कि दवाइयों को भी नहीं छोड़ते। अब सरकार को इन्हें रोकने का कोई ना कोई प्लान तो बनाना ही होगा। इसके अलावा बैटरी रिसाइकल के लिए रजिस्टर्ड यूनिट बनाओ, लाइसेंस दो, ट्रेनिंग दो, सेफ हैंडलिंग के लिए इक्विपमेंट दो, प्रोटेक्टिव गिय्स दो और प्रॉपर फर्नेस वेंटिलेशन सिस्टम को सब्सिडाइज करो। भाई साहब, बच्चों के खिलौने हो गए, कॉस्मेटिक्स हो गए, बाहर के देश से आने वाला सस्ता सामान हो गया। इन सबकी रैंडम टेस्टिंग होनी चाहिए और जिसमें लेड मिले उसे भारत में घुसने मत दो। हम सब यह बात बहुत अच्छे से जानते हैं कि यह सारा काम एक साथ करना संभव नहीं है। पर कम
(28:29) से कम शुरू तो करो। भाई साहब एनवायरमेंटल हिस्टोरियन जे आर मैकनेल ने लिखा है कि धरती के इतिहास में मिडगले ने किसी भी सिंगल ऑर्गेनिज्म से ज्यादा धरती के एटमॉस्फेयर को नुकसान पहुंचाया है। क्योंकि आपको जानकर हैरानी होगी कि मिडग्ले ही वो इंसान था जिसने सीएफसी रेफ्रिजरेंट की खोज करी थी और इसी सीएफसी ने ओजोन की परत को उधेड़ कर रख दिया था। जिसकी वजह से बाद में ओजोन होल बना था। एक इंसान की दो खोज ने धरती के एटमॉस्फेयर को मैक्सिमम डैमेज पहुंचाया और फिर 51 साल की उम्र में मिडग्ले को पोलियो हो गया। यह भाई साहब बेड पर आ गए। इनके पैर अकड़ गए।
(29:08) लेकिन इन्होंने बिना किसी मदद के अपने आप को चलाने के लिए उठाने के लिए बेड से हिलाने डुलाने के लिए एक पुली सिस्टम बनाया। लेकिन एक दिन यह अपनी ही खोज की रस्सियों में उलझकर फंदा लगने की वजह से मारे गए। आपको क्या लगता है? क्या इस आदमी ने जानबूझकर दुनिया को जहर दिया था? नहीं। भाई साहब मिडग्ले एक ब्रिलियंट इंजीनियर था। एक साइंटिस्ट था। प्रॉब्लम सॉल्व था। सिस्टम ने उसको एक समस्या दी और उसने वो समस्या सुलझा दी। यह सिस्टम ही था जिसने उससे कहा कि नॉकिंग को सॉल्व करो। हमें रेफ्रिजरेंट बनाकर दो। उसने वो काम कर दिया। बस मिडगले की यह गलती थी कि उसे
(29:41) नुकसान पता था। लेकिन फिर भी वह चुप रहा और यह भी उसने सिस्टम के ही कहने पर किया। अगर मिडगले यह सब ना करता तो कोई और करता। भाई साहब मिडग्ले 1944 में मर गया। पर सिस्टम आज भी जिंदा है। अब आपसे मेरी एक ही विनती है कि जागरूक बनिए अपने प्यारे देश को और देश की आने वाली नस्लों को बचाने के लिए आपसे जो कुछ भी हो सकता है उसे करने का प्रयास करें। तो इसी नोट के संग यह है इस वीडियो का अंत। मिलते हैं नेक्स्ट वीडियो में। जय हिंद, जय भारत।

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