Thursday, September 3, 2026

पद्म पुराण के अनुसार पापी पुरुष के लक्षण || HG ACHINTYA RUPANI DASI

पद्म पुराण के अनुसार पापी पुरुष के लक्षण || HG ACHINTYA RUPANI DASI

Author Name:Achintya Rupani Dasi | ISKCON Lucknow

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@AchintyaRupaniDasi

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=E1I2q4yi-18



Transcript:
(00:00) रामा हरे हरे हरे कृष्णा तो आज हम लोग जो चर्चा शुरू करेंगे वह होगा आज की भी चर्चा हम पद्म पुराण से ही करेंगे पद्म पुराण के भूखंड से आज की चर्चा हमारी होगी पद्म पुराण भूखंड ना पद्म पुराण में कई खंड दिए गए हैं। तो उसमें से एक है भूखंड। तो आज जो हमारी चर्चा है उसमें है जो पापी लोग होते हैं। है ना? उन पापी
(00:49) लोगों को अपने पाप का क्या फल मिलता है? है ना? जब पाप करते हैं तो पाप का फल मिलेगा या नहीं मिलेगा? मिलना चाहिए। पुण्य करते हैं तो पुण्य का फल, पाप करते हैं तो पाप का फल। तो पापियों को पाप का फल फल और जो पुण्य करते हैं उन्हें पुण्य का फल इसके बारे में हम जानेंगे। तो यहां पर ययाति हैं और यहां पर ययाति से प्रश्न पूछ रहे हैं। ययाति जी पूछते हैं और मातली से पूछते हैं प्रश्न ना तो ययाती जो
(01:36) है वह कहते हैं कि मृत्यु लोक के जो मानव हैं मृत्यु लोक के जो लोग हैं वह बहुत बड़े-बड़े भयानक पाप करते हैं। तो उनके जो कर्मों का उन्हें जो फल मिलता है वह मुझे बताइए। मैं जानना चाहता हूं। अब जो प्रश्न पूछ रहे हैं ययाति कि क्या है उन पापियों के पाप का फल। अब ययाती कौन है? याति एक प्रसिद्ध राजा हैं जो जो बहुत ही कामी हैं, भोगी हैं और फिर बाद में बैरागी हो जाते हैं। यह याति राजा इतने कामी होते हैं कि वह उनकी वृद्धा अवस्था होती है और उनके पांच पुत्र होते हैं। तो वह काम के
(02:23) वशीभूत होकर अपने पुत्रों से याचना करते हैं। तुम क्या करो? मेरी वृद्धा अवस्था ले लो और मुझे अपनी युवा अवस्था दे दो। यह याचना करते हैं। तो उसमें से उनके पांच पुत्रों में से एक पुत्र है पुरु नाम का पुत्र। पांचवा सबसे छोटा पुत्र पुरु। वह अपने पिता की याचना को सुनता है और उन्हें अपनी जवानी देता है। उनकी वृद्धावस्था ले लेता है। पुरु नाम का पुत्र। तो यही ययाति अब पूछ रहे हैं। है ना? यह बैरागी हो गए। जब इन्हें समझ में आया कि नहीं नहीं यह तो बहुत गलत है। ना इतना पाप कर्म में डूबना, इतनी काम इच्छाओं में डूबना यह तो अच्छा नहीं है।
(03:07) मैंने अपने पुत्र के साथ भी बिल्कुल अच्छा नहीं किया। मनुष्य झूठ बोलता है। ध्यान से सुनो सब लोग। जो मनुष्य झूठ बोलता है। स्वामी मित्र और गुरु से द्रोह रखता है। है ना? दुश्मनी द्रोह रखता है। है ना? माया रचता है और और उनके खिलाफ क्या माया रचता है षड्यंत्र रचता है प्लानिंग करता है जो स्त्री पुत्र मित्र बालक वृद्ध और दुर्बल मनुष्य अतिथि तथा बंधु बांधुओं को भूखा छोड़कर अकेले भोजन कर लेता है किसी से कोई मतलब नहीं है लेना देना नहीं है आज देखते हो ना ऐसे ही
(03:52) ना मां को पुत्र से मतलब ना पुत्र को मां से मतलब ना किसी को किसी से मतलब है ना पहले सुनते थे ना कि माता कभी कुमाता नहीं होती पुत्र कुपुत्र हो सकता है लेकिन जैसेजैसे कलयुग का प्रभाव बढ़ेगा सारी चीजें उल्टी पुलटी होती जाएंगी ना सब डामाडोल दिखेगा तो यहां पर यही बोल रहे जो मनुष्य क्या कर रहा है स्त्री से पुत्र से मित्र से या कोई दुर्बल व्यक्ति है वृद्ध व्यक्ति है अतिथि हैं बंधु बांधव हैं जिनको को भूखा छोड़ देता है और खुद क्या मिष्ठान खाता है। खुद अपने मन का खा रहा है। लेकिन उनके भूख की उसे चिंता नहीं है। क्या लिखा है? और अपने को तो खूब मिठाई
(04:38) उड़ाता है और दूसरे को अन्न भी नहीं देता। तो ऐसे व्यक्ति को क्या नरक जाना ही पड़ता है। वह पापी कहलाता है। हमें क्या लगता है? छोटी-छोटी सी चीजें हमें क्या लगती है? अरे इससे थोड़ी ना कुछ होगा। हां, ठीक है। मेरा मन किया था ना। मेरा मन किया था इसलिए मैंने किया था। मेरा बहुत मन कर रहा था यह खाने का। इसलिए मैंने खाया। हां, मुझे ध्यान नहीं था ना कि आपको भी देना है। बिल्कुल मुझे याद ही नहीं रहा। मुझे ध्यान में ही नहीं था। आपको ध्यान में हो या ना हो। आपको भूख लग रही हो या आपका मन कर रहा हो। जो आपने किया है उसका परिणाम आपको भोगना ही होगा।
(05:19) वहां यह नहीं चलेगा। नहीं मुझे भूल गया था। मुझे ध्यान नहीं था। मुझे समझ नहीं आया था। मैं तो मैं तो उस समय कहीं और था मेरा दिमाग ना। मुझे बहुत तेज भूख लग रही थी। ना ना कोई एक्सक्यूज नहीं सुने जाएंगे। कुछ भी नहीं। जो किया है उसका परिणाम आपको भोगना ही होगा। तो वेद ऐसे पुरुषों की क्या निंदा करते हैं। ऐसे पुरुष बिल्कुल भी अच्छे नहीं है। ऐसे व्यक्ति बिल्कुल भी अच्छे नहीं है। जो स्वयं ही नियम लेकर और फिर उन्हें नियम को तोड़ देते हैं। कितने कितने लोग ऐसा करते हैं बताओ। हाथ उठाओ सब लोग। कितने लोग करते हो ऐसा? पहले खुद से नियम लोगे और
(05:58) फिर खुद ही नियम को तोड़ोगे। हम अब से मैं ऐसा करूंगा। अब से हम ऐसा करेंगे। अब निश्चित तौर पर हम ये करेंगे। खुद से ही नियम लेंगे और खुद ही क्या करेंगे? नियमों को तोड़ देते हैं। और जो दूसरों के साथ धोखा किया करते हैं और जो मदिरा पीने वाले के संसर्ग रखते हैं और घाव एवं रोगों से पीड़ित तथा भूखे भूख प्यास से व्याकुल गौ का यत्न पूर्वक पालन नहीं करते। वे सब गौ हत्यारे माने जाते हैं। कौन-कौन गौ हत्यारा है? जो मदिरा पीने वाले से संसर्ग रखते हैं। मदिरा समझ
(06:45) रहे हो? शराब, अल्कोहल ना इससे पीने वाले से जो क्या रखते हैं? संसर्ग रखते हैं। मैं पीता थोड़े ना हूं। बस मेरा फ्रेंड है उसके साथ बैठना पड़ता है। मेरा काम ही ऐसा है। अगर साथ में नहीं बैठे तो काम नहीं बनेगा। मैं थोड़ी ना पीता हूं लेकिन स्मेल तो आ रही है तुम्हारे पास पीते नहीं हो तो अरे वह थोड़ी सी छिड़कनी पड़ती है ना अपने ऊपर कैसे काम कैसे बनेगा थोड़ा दिखाना पड़ता है छिड़कना पड़ता है कह रहे हैं पद्म पुराण में बता रहा है क्या कि जो ऐसा करते हैं जो ऐसे पीने वालों से संसर्ग रखते हैं पता है किसी भी व्यक्ति के बारे
(07:24) में जानने के लिए हमें क्या जानना जरूरी है कि वह किन-किन लोगों के साथ रहता है। कैसे-कैसे लोगों के साथ बैठता है और कौन उसका मित्र है। ना हम किसी व्यक्ति के बारे में पता लगाना चाहे तो उसके मित्रों के बारे में पता लगा लो। कौन-कौन है उसका मित्र? अब बताओ हम पीते तो नहीं है लेकिन है सारे शराबी हमारे मित्र। तो कोई वो समझेगा कि ना तुम भी नहीं पीतेगे। कोई मानेगा? विश्वास करेगा आपकी बात पे। कितने लोग मुंह सूंघ सूंघते हैं आके ऐसे सूंघाओ सूंघाओ जैसा ये है। है ना? आपको देख रहे हैं ना आप उन लोगों के साथ हो तो आपको भी क्या वैसे ही समझेंगे तो वही बता रहा है
(08:05) पद्म पुराण क्या ऐसे लोगों से संसर्ग रखते हैं तो वह गौ हत्यारे हैं गौ हत्यारे कहलाते हैं और जो जो घाव से पीड़ित लोग हैं रोग से पीड़ित लोग हैं या भूख प्यास से व्याकुल हैं ऐसे व्यक्तियों पर ध्यान नहीं देते वह सब भी गौ हत्यारे कहलाते हैं। उन्हें नरक की यातना भोगनी ही पड़ती है। जाना ही पड़ेगा। कई लोग यह भी कहते हैं किसने देखा स्वर्ग और नर्क आप देख के आए हैं क्या? स्वर्ग और नर्क किसने देखा? अरे नहीं देखा तो अभी देख लोगे क्या फर्क पड़ रहा है? अभी बस शरीर छूटते ही पता चल जाएगा। है या नहीं है? हम किसने देखा? पता चल जाएगा। अच्छा यह बताओ
(08:51) एक व्यक्ति जो देख के समझ जाता है एक व्यक्ति जो सुन के समझता है और एक व्यक्ति जब बीतती है तब उसके समझ में आती है कौन ज्यादा बुद्धिमान है क्योंकि हम तो जानेंगे जब हमारे ऊपर बीतेगी तब हम जाने कि ऐसा होता है हम तो ठीक है फिर तैयार रहो फिर नरक जाने के लिए वह सारे काम करो जो शास्त्र के विरुद्ध 100% जाओगे। कोई नहीं रोक सकता। ना तो अभी तक कोई रोक पाया ना अब कोई रोक पाएगा। तो ऐसे लोग 100% नर्क भोगते हैं। नर्क की यातनाएं भोगते हैं। जो सब प्रकार के पापों में
(09:38) डूबे रहते हैं। सभी प्रकार के पापों में डूबे रहते हैं। उन्हें क्या लगता है हम कि यह जो जो शास्त्रों में जो पाप बताए गए हैं आज के समय में हम उसे एडवांस समझते हैं। हमें क्या लगता है? नहीं नहीं ऐसे व्यक्ति क्या बहुत स्मार्ट होते हैं ना आज के समाज के हिसाब से कदम से कदम मिलाकर हम चल रहे हैं। हम वह व्यक्ति हैं। फिर कहते हैं कि साधु ब्राह्मण गुरु और गौ को जो मारते हैं तथा सनमार्ग से स्थित निर्दोष स्त्रियों को जो पीटते हैं जिनका कोई दोष नहीं है ना निर्दोष हैं। लेकिन फिर भी उन उन्हें पीटते हैं जिनका सारा शरीर आलस से व्याप्त
(10:26) रहता है। सदैव पड़े रहते हैं। आलसी हैं। आज का काम कल को टालेंगे। कल का परसों को, परसों का नरसों को है ना? ऐसे क्या होते हैं? आलसी व्यक्ति होते हैं और आलसी व्यक्ति 100% नरकगामी होता है। नरक जाता ही जाता है। आलसी व्यक्ति अपने आलस के कारण क्योंकि वह हर चीज को टाल रहा होता है। दीर्घसूत्री होता है। अतः जो बार-बार सोया करते हैं, जो दुर्बल पशुओं को काम में लगाते हैं, बलपूक हाकते हैं, उन्हें अधिक भार लादकर कष्ट देते हैं और घायल होने पर भी उन्हें जोतते रहते हैं। देखा है ना ऐसे लोगों को? उन्हें सिर्फ
(11:12) अपने काम से मतलब है। उन्हें दूसरे दूसरे जीव की पीड़ा से कोई लेना देना नहीं है। पशु पक्षी तो छोड़ो। जीवित जो मनुष्य दिखते हैं, अपने परिजन हैं, उनकी भी पीड़ा से उन्हें लेना देना कुछ नहीं होता। उन्हें सिर्फ अपने सुख से मतलब है। मुझे कैसे सुख मिले? मेरी इंद्रियां कैसे तृप्त हो? मुझे कैसे आराम मिले? बस इससे उन्हें मतलब होता है। जो दुरात्मा मनुष्य बैलों को या फिर बची जो गाय के बछड़ों को नादते हैं, वह सभी महापापी कहलाते हैं। उनके यह कार्य
(12:02) महान पाप के तुल्य हैं। जो भूख, प्यास और परिश्रम से पीड़ित एवं आशा लगाकर घर पर आए हुए अतिथि का आदर नहीं करते, वह सब नरकगामी होते हैं। अतिथि का मतलब समझे? अतिथि कौन है? जो बिना तिथि के आए यानी कि बिना बताए आए वह कौन है? अतिथि हम क्या कहते हैं? देखो भाई आना एक बार कॉल जरूर कर देना। इनफॉर्म कर देना मुझे क्या आ रहे हो? तो हमें अतिथि नहीं चाहिए ना। एक बार अगर कोई बिना बताए आ भी जाए तो हम कहेंगे आप खड़े रहो गेट के बाहर। खोलेंगे ही नहीं गेट। एक बार कॉल तो करना चाहिए था ना। कोई मैनर्स होते हैं या नहीं होते? कुछ मैनर्स ही नहीं है। आने से पहले
(12:47) एक बार पूछना चाहिए हम बिजी हैं या नहीं है? घर में है या नहीं है? तो आज हमें अतिथि तो चाहिए नहीं। हम चाहिए किसी को जो बिना अतिथि के आ जाए जब मन करा तब उठा चला आया आपके घर अतिथि बनके नहीं। तो जो जो भूख प्यास और परिश्रम से पीड़ित एवं आशा लगाकर घर पर आए हुए अतिथि को कुछ आशा लगाकर आए हैं कि नहीं नहीं आपसे हेल्प मिल जाएगी। आप मेरी इसमें मदद करोगे ना और उनकी हम मदद नहीं करते उनका अनादर करते हैं तो वह व्यक्ति नरकगामी होता है क्योंकि जिसके भी घर पर अतिथि आता है और वह अतिथि का सम्मान नहीं करता तो वह अतिथि उस व्यक्ति के सारे पुण्य लेकर अपने
(13:32) साथ चला जाता है। सारे पुण्य लेकर यह ऐसा नहीं है कि तब होता था अब नहीं होता है। अब भी होता है। अब भी होता है। आप सोचो हम तो पुण्य करते ही नहीं है। कभी भूले भटके अनजाने में हो जाए और उसमें भी कोई आते हैं अतिथि वो सब ले चले जाते हैं। तो बचा क्या हमारे पास माइनस में चल रहे हैं हम तो है ही नहीं कुछ भी क्या बचा जो भूख जो मूर्ख हैं अनाथ हैं विकल हैं दीन है बालक हैं वृद्ध हैं ऐसे व्यक्तियों पर जो दया नहीं करते वह नरक के समुद्र में गिर जाते हैं अच्छा समुद्र में गिर जाए तो क्या होगा बताओ
(14:18) क्या होता है निकलना बहुत मुश्किल होता है ना समुद्र की लहरें क्या वही से वही फेंकती रहती है तो ऐसे नरक के समुद्र में गिरते हैं कि बाहर निकलने के कोई चांस नहीं जो नीति शास्त्र की आज्ञा का उल्लंघन करके प्रजा से मनमाना कर वसूल करते हैं और अकारण दंड देते हैं। उन्हें भी नरक में पकाया जाता है। जैसे हम लोग तेल में पकोड़े पकाते हैं ना तलते हैं वैसे पकाया जाता है नरक में ऐसे व्यक्तियों को जिस राजा के प्रजा राजा के राज्य में प्रजा अधिकारियों और चोरों द्वारा पीड़ित होती
(15:04) है उसे भी नर्क में गिरना पड़ता है क्योंकि कहीं ना कहीं अगर राजा के राज्य में ऐसा चल रहा है अधर्म हो रहा है तो उसमें राजा बराबर वर का भागीदार है। राजा को दंड भोगना ही पड़ेगा। भोगना ही पड़ेगा। जैसे एक गुरु के संरक्षण में शिष्य है। है ना? इसीलिए गुरु बहुत नाच प्रताल के अपने शिष्य को बनाते हैं। किसी को भी दीक्षा नहीं देते। किसी को भी शिष्य नहीं बनाते। क्योंकि शिष्य के द्वारा किए गए कार्य गुरु को भोगने पड़ते हैं। गलत कर्म। गलत कार्य गुरु पर आते हैं और जैसे माता-पिता अगर बच्चे कुछ गलत करते हैं तो माता-पिता
(15:52) को भी उसका परिणाम भोगना पड़ता है। पति पत्नी अगर पत्नी कुछ गलत करती है तो पति को उसका परिणाम भोगना पड़ता है। जीतेजी तो भोगना ही पड़ता है। शरीर छोड़ने के बाद भी भोगना पड़ता है। आपके संरक्षण में था यह व्यक्ति ना। क्यों नहीं संभाला? कहीं ना कहीं आपके अनुशासन में आपकी चीजों में कहीं ना कहीं ढील थी। आप नहीं संभाल पाए। जब संभाल नहीं सकते तो शादी करने की जरूरत नहीं थी। बच्चे संभाल नहीं सकते तो बच्चे नहीं पैदा करने चाहिए। पत्नी नहीं संभाल सकते तो शादी नहीं करनी चाहिए। पहले समझना चाहिए कि एक पत्नी पति का धर्म क्या है? एक पिता का धर्म क्या है? एक पत्नी का
(16:30) धर्म क्या है? तब हमें आगे बढ़ना चाहिए। जानबूझ जान समझ के। जो ब्राह्मण अन्याय राजा से दान लेते हैं उन्हें भी घोर नरक में जाना पड़ता है। राजा कैसा है? अन्याय है, अधर्मी है। और ऐसे राजा से अगर कोई ब्राह्मण दान लेता है तो उसे भी नरक में जाना ही होगा। है ना? तो कई बार यह चीजें लोगों के दिमाग में होती है। तो कई बार लोगों को लगता है कि क्या फिर दो नंबर के पैसे का दान नहीं कर सकते हम? दो नंबर का काले धन काले धन का क्या होगा? काले धन का एक बार शील
(17:15) प्रभुपाद जी से भी ऐसा प्रश्न पूछा किसी ने कि प्रभुपाद जी क्या हम जो हमारी ब्लैक मनी है क्या इसको हम दान में दे सकते हैं या नहीं देना चाहिए? दान में देंगे तो उसका पाप कर्म हमें भोगना पड़ेगा। श्री प्रभुपाद जी बोलते हैं देखो हमारे पास ना ब्लैक और वाइट दोनों ठाकुर जी हैं। तो ब्लैक मनी है तो ब्लैक वाले के खाते में डाल दो। वाइट मनी है तो वाइट वाले के खाते में डाल दो। कौन है? ब्लैक ठाकुर जी। हमारे ठाकुर जी है ना? कृष्ण वो ब्लैक है। ब्लैक मनी वहां दे दो। और वाइट मनी है तो भी दे दो। कौन है? बलराम जी। तो वहां वाइट मनी दे दो। तो भगवान पर कभी कोई दोष नहीं
(17:59) लगता। भगवान पर कोई पाप नहीं चढ़ता। तो कह रहे हैं अगर कोई राजा अन्याय है और ऐसे अन्याय राजा से अगर ब्राह्मण दान लेता है तो उसे नरक भोगना पड़ता है। लेकिन भगवान को जब हम देते हैं तो भगवान को थोड़ी ना नरक भोगना पड़ेगा या भगवान को थोड़ी ना यातनाएं मिलेगी। भगवान सारे नियमों से परे हैं। सब कुछ भगवान का है। चाहे ब्लैक हो, चाहे वाइट हो, चाहे दो नंबर हो, चाहे एक नंबर हो, चाहे चार नंबर हो, चाहे तीन नंबर, कोई भी नंबर हो, सब भगवान के हैं। सब कुछ भगवान का है। इस संसार की सारी संपत्ति इस संसार की नहीं अनंत ब्रह्मांडों की भी
(18:42) सारी संपदा सब कुछ ठाकुर जी का ही है। तो उनको दे देने से पाप नहीं लगता। पापाचारी पूर्ववासियों का पाप राजा राजा का ही समझ समझा जाता है। अतः राजा को उस पाप से डरकर प्रजा को शासन में रखना चाहिए। जो राजा भली-भांति विचार ना करके जो चोर नहीं है उसे भी चोरी चोर के समान दंड देता है और चोर को साधु समझकर छोड़ देता है तो वह राजा भी नरक में जाता है। सुन रहे हैं? [नाक से की जाने वाली आवाज़] कुछ कुछ लड़कियां हैं यहां पर जो क्या लॉयर बनना चाह रही हैं। ठीक है? ध्यान से समझ लो।
(19:30) कहीं कुछ भी गलत नहीं होना चाहिए। अगर कुछ भी गलत होता है तो उसका परिणाम आपको भोगना पड़ेगा। अगर किसी निर्दोष को दंड मिल गया तो बहुत गलत है। चाहे 100 दोषी छूट जाए कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन एक निर्दोष को दंड नहीं मिलना चाहिए। बहुत बड़ा उत्तरदायित्व होता है। जो राजा भलीभांति विचार ना करके भलीभांति विचार नहीं कर रहा। सोच समझ नहीं रहा ना। और चोर को क्या साहूकार समझ ले रहा है और साहूकार को चोर। तो उसको नरक जाना ही होगा। जो मनुष्य दूसरों से ध्यान से सुनिए अब यहां पे जो मनुष्य मनुष्य में दोनों ही आ गए स्त्री
(20:17) हो चाहे पुरुष हो है ना दोनों ही है जो मनुष्य घी तेल मधु गुड़ दूध साख दही अन्य ऐसी ऐसी सामान है ना इसी तरह से जो दूसरों से लेते हैं यानी कि इन सामान सामानों को चुराते हैं उनका अपहरण करते दूसरे की वस्तु चाहे थोड़ी हो या बहुत उस पर अपनी ममता रखते हैं। दृष्टि रखते हैं। कुदृष्टि ना उसे चुराते हैं। ऐसे व्यक्ति निसंदेह नरकगामी होते हैं। अरे क्या फर्क पड़ता है? चले जाएंगे नरक। अभी तो ऐश करेंगे ना। क्या ही फर्क पड़ता है? किसी ने देखा स्वर्ग नरक। अच्छा बताओ। फालतू की
(21:03) बातें हैं। एक लोग तो बोल रही थी। एक माता जी मुझसे बोल रही थी कि देखो यह शास्त्र सारे पुरुषों ने ही लिख दिए और सारी अच्छी-अच्छी चीजें पुरुषों के लिए और सारी बातें महिलाओं के लिए नहीं ये महिलाओं को ऐसा नहीं करना चाहिए महिलाओं के लिए ये महिलाओं के लिए वो महिलाओं के लिए ये पुरुष के लिए कुछ भी नहीं है कि पुरुष नहीं लिख दिए अपने लिए सब कुछ अच्छा अच्छा महिलाओं के लिए ऐसासा ऐसा आपको भी ऐसा लगता है हम देखो एक चीज हमेशा ध्यान में रखो जो अच्छा है वो वो हमेशा से अच्छा है। है ना? वो ना बिगड़े उसके लिए चीजें बताई जाती हैं। है
(21:40) ना? जो अच्छे हैं। अच्छे में अगर एक दो खराब होंगे तो उसमें बताया जाएगा ना ये अच्छा ये खराब। जो खराबी है उससे अच्छे अच्छे का क्या बताया जाए? है ना? जो अच्छा है उसके लिए बताया जाता है कि नहीं नहीं यह इसमें यह अवगुण नहीं होने चाहिए। ठीक है। लेकिन जो अच्छा है ही नहीं उसके लिए क्या बताया जाए? अच्छा। समझ में आ रहा है कुछ या नहीं आ रहा है? समझदार हो बहुत समझ जाते हो सब। तो ऐसा व्यक्ति कहां निसंदेह नरक में गिरता है। तो किसी भी दूसरे की वस्तु पर चाहे छोटी हो या बड़ी उस पर हमें कुदृष्टि नहीं रखनी चाहिए। इस तरह से पाप करने वाले मनुष्य
(22:27) मृत्यु के पश्चात यमराज की आज्ञा से यमलोक में जाते हैं। है ना? अब देखो पाप कर रहे हैं। है ना? और मृत्यु हो गई है। अब यहां पे भी यमराज की आज्ञा से ही यमलोक में जाओगे। बिना आज्ञा के काम नहीं चलेगा। सब जगह आज्ञा ही चलती है। अगर यह चीज हमें यही जीते जी समझ में आ जाए तो क्यों जाना पड़े यमलोक? सोचो। अगर हम जीते जी आज्ञा को मानने लगे, आज्ञा का पालन करने लगे तो यमलोक जाएंगे। फिर यमराज की आज्ञा से यमलोक जाता है। यमराज के महा भयानक दूत उसे ले जाते हैं। उस समय
(23:15) उसको बहुत दुख भोगना पड़ता है। देवता मनुष्य तथा पशु पक्षी इसमें से जो भी हो अधर्म में मन लगाते हैं। उनके शासक धर्मराज माने गए हैं। वे भांतिभांति के भयानक दंड देकर पापों का भोग कराते हैं। अलग-अलग पाप के अलग-अलग दंड है और उन पापों का दंड उस व्यक्ति को भोगना ही होता है। विनय तथा सदाचार से युक्त मनुष्य यदि भूल से मलिन आचरण में लिप्त हो जाए तो उनके लिए गुरु ही शासक माने गए हैं। वे कोई प्रायश्चित कराकर उसके पाप को धो सकते हैं। ठीक है? अगर भूल से किसी से कोई पाप हो गया और उसे समझ में आ रहा नहीं कि
(24:01) मैंने बहुत गलत किया। अंदर से उसे ग्लानी हो रही है। पश्चाताप करना चाहता है तो फिर क्या गुरु उसे क्या कोई प्रायश्चित बताएंगे कि ऐसेसे आप प्रायश्चित कर लो तो उसका पाप वही नष्ट हो जाता है। फिर उसे पाप भोगने के लिए नरक नहीं जाना पड़ता। ठीक है? इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में गुरु तो जरूर होने चाहिए। कौन गुरु? प्रमाणिक गुरु जरूर होने चाहिए क्योंकि हम गुरु हमारे जीवन में नहीं भी है तब भी हम सलाह तो लेते ही हैं लोगों से गुरु नहीं होंगे तो कुछ गुरु घंटाला से सजा लेंगे ऐसे ऐसे लोगों से सजा लेंगे ना जो खुद ही फंसे हुए हैं और क्या क्या हमें
(24:45) सलाह दें हम और फंस जाए ना तो ऐसे व्यक्ति से सलाह नहीं लेनी ठीक है ऐसे लोगों को यमराज के पास नहीं जाना पड़ता जो गुरु के शासक में रहकर गुरु के अनुशासन में रहकर उनके शरणागत होकर प्रायश्चित कर लेते हैं। पर स्त्री पर स्त्री लंपट चोर तथा अन्याय पूर्ण वार्ता करने वाले पुरुषों का राजा का शासन होता है। राजा ही उनके दंड विधान माने जाते हैं। अच्छा राजा ही क्या उनके दंड दंड देने वाले माने जाते हैं। वही उनके विधाता
(25:30) होंगे। परंतु जो पाप छिपकर किए जाते हैं उनके लिए यमराज ही दंड का निर्णय करते हैं। जो परिस्थिति परिस्थिति है, लंपट है, अन्यायपूर्ण वार्ता करता है। तो अगर उसकी चीजें सामने उजागर हो जाती है तो क्या दादा दंड दे देते हैं। है ना? दंड मिलता है ना पनिशमेंट मिलती है लेकिन जो क्या कहते हैं छुप के कर लिया किसी ने नहीं जाना किसी को पता नहीं चला हमने बस हमने ही जाना और किसी ने नहीं जाना किसी ने देखा ही नहीं कोई था ही नहीं तो ऐसे व्यक्ति को यमराज के डंडे पड़ते हैं यमराज दंड देते हैं उन्हें यमलोक जाना
(26:15) ही होता है उनके लिए धर्मराज का दंड का धर्मराज दंड का निर्णय करते हैं फिर इसलिए अपने किए हुए पापों के लिए प्रायश्चित करना चाहिए। अगर हमसे कोई गलती हो गई है तो स्वीकार कर लेना चाहिए। गंदी आदत छोड़ दो। बिल्कुल। गलती करते हैं फिर भी गलती को स्वीकार। नहीं नहीं मैंने नहीं किया। नहीं मैं ऐसा नहीं हूं। नहीं नहीं ऐसा नहीं। ऐसे नहीं है हम। अरे भाई अगर कमी है, गलती है तो स्वीकार कर लो। गलती को स्वीकार करने से हम उसे दोहराते नहीं है। फिर है ना? अगर कोई भी गलती आपको बार-बार नहीं दोहरानी है तो जब गलती होती है तो हमें उसे क्या स्वीकार कर लेना चाहिए। जब
(26:57) हम स्वीकार कर लेते हैं तो उसे बार-बार दोहराते नहीं। तो इसलिए क्या प्रायश्चित करना चाहिए? अन्यथा वे करोड़ों कल्पों में भी नष्ट नहीं होते। ऐसे पाप जब उन्हें हम स्वीकार नहीं करते। करोड़ों कल्पों जब तक उनके फलों का भोग नहीं कराया जाता तब तक नष्ट नहीं होते। मनुष्य मन वाणी तथा शरीर से जो भी कर्म करता है उसका फल उसे स्वयं ही भोगना पड़ता है। कोई नहीं आएगा आपका आपका पार्टनर बनने। उसमें गलत काम में पार्टनर बनने सब आ जाएंगे। चलो ठीक है थोड़े से हम भी हाथ धो लेते
(27:41) हैं इसमें है ना लेकिन अगर कर्म फल भोगना होगा आपको ही भोगना पड़ेगा कोई आपका सहपाठी नहीं आएगा आपके साथ कर्मों के अनुसार उसकी सद्गति या अधोगति होती है कर्मों के अनुसार हम जैसे कर्म करेंगे उसी के अनुसार होगा सद्गति या फिर अधोगति हे राजन इस प्रकार संक्षेप में मैंने तुम्हें पापों के भेद बताए हैं। अब कहते हैं बोलो अब और क्या सुनाऊं ये बताओ वो मैं सुनाता हूं। अवयाति ने कहा मातले अधर्म के सारे फलों का वर्णन मैंने सुन
(28:26) लिया। अब धर्म के भी फल बता दो। अगर कुछ धर्म धर्म का कोई कार्य करता है तो उसका क्या फल है? क्या फल मिलेगा? तो फिर मालती फिर धर्म के कार्यों का भी फल बताते हैं याति को देखो इससे मुझे एक चीज और पता चलती है कि कोई भी व्यक्ति अगर गलत है बुरा है ना बहुत इसके अंदर कामनाएं हैं बहुत पापी है तो ऐसा व्यक्ति भी वैरागी हो सकता है ऐसा व्यक्ति भी वैरागी हो सकता है ढेरों शास्त्रों में कथाएं हैं जो बुरा है वह हमेशा बुरा नहीं रह सकता और जो अच्छा है हो सकता है वह हमेशा अच्छा ना रहे।
(29:12) कोई अच्छा व्यक्ति तभी तक अच्छा रह सकता है जब तक वह निर्देशन का पालन कर रहा है। शास्त्र के अनुसार जो निर्देश दिए गए उनका पालन कर रहा है। तब तक ही वह अच्छा रह सकता है। जैसे ही वह निर्देशों का पालन छोड़ता है वह कब बुरा बन जाएगा कुछ कह नहीं सकते। तो ऐसा ही व्यक्ति अच्छा है जो भगवान की शरण में है जो भगवान का नाम ले रहा है वह व्यक्ति अच्छा है क्योंकि ऐसे व्यक्ति से उम्मीद की जा सकती है कि वह और अच्छा हो जाए वह अपनी बुरी आदतों को छोड़ दे और और अच्छी आदतों को लेकर आए क्योंकि हर व्यक्ति में अच्छाई और बुराई होती है ना
(29:56) कुछ अच्छे गुण भी होते हैं कुछ बुरे भी गुण होते हैं अब अगर किसी को पता ही नहीं चलेगा कोई मानेगा ही नहीं है कि मेरे मेरे अंदर यह बुराई है तो वह सुधरेगा कैसे? तो सबसे पहले तो खुद को जानना, समझना कि नहीं यह बुराई है, यह अच्छाई है मेरे अंदर। जो बुराई है उसको हमें छोड़ना है। क्योंकि यह बुराइयां ही हमें कहां से कहां लेकर चली जाएंगी। अच्छा कोई भी अपनी स्थिति से नीचे गिरना चाहता है। आज के समय में आज की स्थिति से हम यहां पे हैं। यहां से नीचे गिरना चाहते हैं? हम चाहते हो कोई? नहीं चाहते ना? यहां है तो लगता है या तो यहीं बने रहे या
(30:35) तो ऊपर चले जाए तो कोई दिक्कत नहीं। ऊपर जितने भी चले जाए कोई फर्क नहीं पड़ता। नीचे नहीं गिरे बस। अब सोच के देखो ना हम इस मनुष्य जीवन से नरकगामी होने वाले हैं। पतन होने वाला है। नीचे गिरने वाले हैं। आपको पता नहीं है। जैसे अभी जेल का सोच के देखो। कैदी होते ना जेल में अगर जेल में बंद हो जाओ। तो कैसा लगेगा? अच्छा लगेगा, मजे आएंगे। अरे बहुत अच्छा है। आराम से सोएंगे और खाएंगे जेल में कौन सा काम करना है, ना कमाने जाना, ना कुछ करना। ऐसा हम आराम मिलेगा वहां पे? किसको लगता है कि आराम मिलेगा? नहीं ना तो वैसे ही है
(31:21) वहां पर भी जेल में भी अपने तरीके से बहुत सारे कार्य करवाए जाते हैं। कोई सफाई करता है, कोई बर्तन धुलता है, कोई रोटियां बनाता है, कोई कपड़े साफ करता है, कोई कुछ, कोई कुछ, कोई कुछ काम करते हैं वहां पे भी। तो ऐसा नहीं है। वहां पे भी लेटे सारा कुछ हो जाएगा। वैसे नरकों में भी यातनाएं तो भोगनी पड़ती हैं और सेवाएं भी होती हैं। ऐसा नहीं है। मुफ्त में कहीं कुछ नहीं होता। ठीक है? तो कहने का मतलब है हमारे कर्मों का परिणाम हमें ही भोगना पड़ेगा। अभी अगर कहीं पर भी लग रहा है कि नहीं नहीं हमसे रोका नहीं जाता। हमसे रहा नहीं जाता। हमसे
(32:00) सहन नहीं होता। हम ऐसा कर ही नहीं सकते। हमसे होता ही नहीं। हमने कभी किया ही नहीं। तो उसका परिणाम आपको ही भोगना पड़ेगा। जो सही है वह सही है। जो गलत है वह गलत है। जो भक्ति के अनुकूल चीजें हैं जो भक्ति छोड़ो जो इस मनुष्य जीवन के जो अनुकूल हैं हमें उनको अपनाना होगा और प्रतिकूल को सबको छोड़ना होगा। तभी हम अपनी स्थिति से या तो टिके रहेंगे या फिर ऊपर उठेंगे। ना अगर हम सारी प्रतिकूलताओं को ही अपनाएंगे तो क्या लगता है? हम टिके रहेंगे अपनी स्थिति पे हम नीचे गिरना ही होगा फिर हमें
(32:45) ठीक है इसलिए अपने कर्तव्यों को अपने धर्म को अपने एक-एक कर्म को हमें जज करते रहना है दूसरों को जज करना बंद करो क्योंकि हम क्या करते हैं सामने वाले को जज करना शुरू करते हैं ये ये ये तुम तुम तुम तुम तुम तुम और खुद खुद को तो खुद को करो हम हमारे सुधरने से हमारा भला होगा। सामने वाले के सुधरने से मेरा कोई भला नहीं होने वाला। खुद में देखो आप में कितनी कमियां हैं। कितनी बुराइयां हैं। तभी आपको दूसरे में दिख रही है वो कमियां। वो बुराइयां। आप में है वो सारी कमियां। ठीक है? तो अपने कर्मों पर ध्यान दो और
(33:31) अपना जीवन सुखमय बना लो। शील प्रभुपाद की जय गुरु महाराज की जय समस्त भक्त वृंद की जय

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