Thursday, September 3, 2026

The Ugly Truth About TOXIC Feminism in India | Hyper Quest Podcast

The Ugly Truth About TOXIC Feminism in India | Hyper Quest Podcast

Author Name:Hyper Quest

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@HyperQuest

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=qgKtS-DZW4I



Transcript:
(00:00) अगर कोई लड़की फेमिनिज्म की बात कर रही है तो भाई उससे दूर रहो। हां रिठाला से गुड़गांव तक अगर जाना हो तो एक स्त्री जो है खड़े होकर जा नहीं सकती। जो फेमिनिज्म का झंडा उठाकर घूमती है स्त्री वो पुरुष को कहती है कि आप उठ जाइए मुझे बैठना है। आज का फेमिनिज्म बस इतना है कि सोशल मीडिया पे कैमरा उठाओ और मुजरा करो। जहां हायर स्टडीज में स्त्रियों की संख्या है वो बहुत कम है। लेकिन हमने कहा नहीं हम विरोध करेंगे समाज का। हम छोटे कपड़े पहनेंगे। फेमिनिज्म जो स्टार्ट हुआ था वो स्टार्ट ही इसीलिए हुआ था क्योंकि शिक्षा का अधिकार जो उनको नहीं था। संपत्ति का
(00:29) अधिकार जो उनको नहीं था, न्याय का अधिकार, न्याय प्रणाली का अधिकार जो उनको नहीं था, उसके लिए हुआ था। सुबह से लेकर रात तक लड़कियां क्या कर रही है? मुझे क्या पहनना है? मुझे क्या ओढ़ना है? मुझे कैसे दिखना है? बहुत सारी स्त्रियां हाउसवाइफ होना एंजॉय करती हैं। आज अगर मुझे चॉइस दी जाए तो मैं घर पे रहकर के घर सवारना ज्यादा पसंद करूंगी। देन के प्रोफेसरशिप। प्रॉब्लम ये है फेमिनिज्म में कि वो घर को सवारने को बंधन मानता है। बालिकाएं हैं उनके मन में ये रहता है कि बड़े हो के मिस वर्ल्ड बनना है। घर में मासी, चाची, मामी बचपन से ही बच्ची को कहती है हाय कितनी
(01:00) काली है। तेरे से कौन शादी करेगा? तो उनको फंसा दिया गया है। अपने सुंदरता में अटक जाओ, कपड़ों में अटक जाओ तो बाकी तो पुरुष देख ही लेगा। कोई भी लड़की एक निठल्ले लड़के से तो शादी नहीं करेगी। फेमिनिस्ट बोलती है वी डोंट नीड मेन। उनको मेंस की जरूरत नहीं है। आपने कई सारे इंटरव्यूज देखे होंगे जब उनसे पूछा जाता है कि हाउ मच शुड अ गाय मिनिमम अर्न टुडे एट यू? इवन 30 लाख लेफ्ट बट इतना तो होना ही चाहिए। जिसने पढ़ाई लिखाई नहीं की जिसने कुछ नहीं किया। वो 30-40 लाख तो ऐसे बोलती है जैसे कटोरा उसने सामने रखा भीख में कोई डाल देगा। यूपी में एक बच्ची के घर से उठा
(01:28) लिया जाता है नाइंथ क्लास की बच्ची को और उसके ब्रेस्ट कार्ड के एक पत्ते पे उसके मां-बाप को भेजे जाते हैं। हम बात ही नहीं कर रहे उन बच्चियों के बारे में जिसके साथ सोसाइटी अन्याय कर रही है। मेरे पास फेक केसेस भी आते हैं। फेक केसेस वालों को भी मैंने दो-तीन बार अच्छे से पीटा हुआ है। धमकी देती है लड़कियां। हम केस कर देंगे। आज हमारे इंडियास फर्स्ट एवर आइस हॉकी कॉम्पटीशन में इंडिया के लिए ब्रोंज़ मेडल लाने वाली वो मेघालय की बच्चियां है। लेटेंट शो में कोई एक फेमस हो जाती है। कभी देखी है वहां से निकलने के बाद। कुछ गाली बक देती है तो उसको लोग दुर्गा राइज़
(01:58) बोल देते हैं। अरे पता है तुम्हें दुर्गा कौन है? 2022 में एनसीआरबी के मुताबिक प्रत्येक दिन औसतन 88 स्त्रियों के साथ दुष्कर्म के मामले दर्ज हुए। लेकिन इसी एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक वर्ष इन्हीं केसेस में से 5000 से लेकर 10,000 केसेस फेक होते हैं। जिससे तंग आकर कई पुरुषों ने सुसाइड भी किया है। अब यहां पर केवल स्त्रियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और ना केवल पुरुषों को। जिस देश में स्त्री को गृहस्वामिनी और देवी कहा गया है, उसी देश में 6 महीने की बच्ची के साथ दुष्कर्म हो जाता है। और जिस देश में पति को देव
(02:35) कहा गया है, उसी देश में पति को उसी की पत्नी मरवा दे रही है। तो ना तो आप स्त्रियों को दोषी ठहरा सकते हैं और ना ही पुरुषों को। क्राइम दोनों तरफ से हो रहा है। लेकिन फिर भी महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को हम कम नहीं आग सकते। इसीलिए भारत की स्त्रियों की समस्या क्या है और क्या फेमिनिस्ट मूवमेंट सच में स्त्रियों को एमावर कर रहा है या नहीं कर रहा है? इस पर चर्चा करने के लिए मैंने आज दो योग्य स्त्रियों को आमंत्रित किया है। एक तरफ हैं आर्य वीरा जी जो केवल सोशल मीडिया पर बैठकर बात करने वाली फेमिनिस्ट नहीं है बल्कि जमीनी स्तर पर बालिकाओं के लिए
(03:05) लड़ाई लड़ रही हैं जो बेटियों की सुरक्षा, मानसिक मजबूती और भारतीय संस्कृति की असली नारी शक्ति को जगाने के लिए लड़ी जा रही है। आरवीरा जी ने अब तक 13 नाबालिक लड़कियों को तस्करी से बचाया है। इसके साथ-साथ 40 से भी ज्यादा लड़कियों को लव जिहाद जैसे घिनौने जाल से भी बाहर निकाला है। वह अभी तक 20,000 से भी ज्यादा बालिकाओं को जागरूक कर चुकी हैं और 300 से ज्यादा स्कूल्स प्रोग्राम्स को भी सक्सेसफुली रन कर चुकी हैं। मिशन मर्दनी और शक्ति वार्ता जैसी मुहिम के माध्यम से बालिकाओं में आत्मरक्षा, कानून की समझ और मानसिक शक्ति का भी प्रवाह किया है और
(03:38) दूसरी तरफ है वंदना शर्मा जी जो हमारे साथ तीसरी बार जुड़ रही हैं और आप सभी को पता होगा कि आज आधुनिक महिलाओं के लिए उनका व्यक्तित्व कितना प्रेरणादाई है। एक तो वे विदुषी हैं। जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में दर्शन शास्त्री डिपार्टमेंट में वो असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। इसके साथ-साथ भारत का जो फिल्म सेंसर बोर्ड है उसकी भी वो सदस्य हैं। वंदना जी ने अभी तक छह से ज्यादा बुक्स लिखी हैं और अथर्ववेद पर उनकी गहरी रिसर्च भी है। इसके साथ-साथ चीन और इटली जैसे देशों में भारत को वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ फिलॉसफी में रिप्रेजेंट भी किया है। तो केवल वो भारत की बालिकाओं के
(04:10) लिए ही इंस्पिरेशन नहीं है बल्कि बालकों के लिए भी हैं। तो साथियों आप सभी हाइपर को सब्सक्राइब कर लें। अब बिना किसी विलंब के आज की चर्चा को प्रारंभ करते हैं। वंदना जी आरवीरा जी आप दोनों का सबसे पहले तो बहुत-बहुत धन्यवाद और प्रणाम क्योंकि जो आज हम विषय लेने जा रहे हैं हम नारीवाद की बात करेंगे। नारी सशक्तिकरण की बात करेंगे। फेमिनिज्म की बात करेंगे और इसके लिए मैं चाहता था कि इस डेस्क पर दो सशक्त नारियां मेरे साथ बैठे तभी इस पर हम एक फ्रूटफुल चर्चा कर पाएंगे और मैं चाहता हूं ये पडकास्ट थोड़ा सॉल्यूशन बेस्ड भी हो समस्याएं तो बहुत
(04:48) ज्यादा सबको पता होती है आपने अपने जीवन में देखी हैं और विशेषकर भारतीय नारियों की क्या समस्या है समस्याएं तो ऐसे हम जाएंगे तो बहुत ढेर सारी समस्या लेकिन भारतीय कॉन्टेक्स्ट में समस्याएं क्या है ये हम समझे क्योंकि आप दोनों के साथ जैसे आप हैं आर आरवीरा जी आपने 13 से ज्यादा माइनर लड़कियों को ट्रैफिकिंग से बचाया है। करीब-करीब मुझे लग रहा है 40 से ज्यादा ऐसे केसेस हैं लव जिहाद के जहां पर आपने उनको उससे निकाला है। जिस तरह से आप वुमेन एंपावरमेंट के लिए आप सोशल कैंपेन चलाती हैं। तो आपके साथ बात करना बहुत जरूरी था। साथ में वंदना जी आप को मैं
(05:24) तीसरी बार होस्ट कर रहा हूं क्योंकि मैं आपके ज्ञान से और आप जिस तरह से एक पक्ष रखती हैं सनातन धर्म का ज्ञान है या उसके साथ-साथ जो आप मॉडर्न पॉइंट ऑफ व्यू लेकर आती हैं। तो मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है कि मैं एक इंडिपेंडेंट सशक्त नारियों के साथ बैठूं। मेरा जीवन भी अगर आप देखेंगी तो मैं भी बहुत ही शक्तिशाली नारियों के बीच में पला बढ़ा हूं। मेरी जो मां थी वो जिस ऐज में आज लोग विवाह करते हैं उस ऐज में वो हस्बैंड नहीं रहे। वो विधवा हो गई। तो वहां से अब उनके समय में तो ऐसा कुछ फेमिनिज्म कोई वेव थी नहीं कि उसने आकर उनको हेल्प किया और ना वो बहुत शिक्षित थी
(06:04) और ना ही ऐसा था कि हस्बैंड से बहुत मदद मिली हो तो उन्होंने एक एक आम जो भारतीय महिला होती है जो कभी घर से निकली नहीं है जिसको पता नहीं है कि दूसरी गली में कौन सी दुकान है। ऐसी एक स्त्री ने मुझे यहां तक पहुंचाया और मुझे ही नहीं अपने सारे बच्चों को मेरी बहन भी ऐसा नहीं कि उन्होंने शिक्षा को चुना तो यह है कि मेरा बेटा पढ़ जाए तो घर संभाल ले। उन्होंने मेरी बहन को भी इतना शिक्षित किया। वो भी यूनिवर्सिटी टॉपर थी और आज इस चैनल के लिए हिस्ट्री का कंटेंट भी लिखती है। मैं यहां तक पहुंचा हूं। तो एक स्त्री ने करके दिखाया है। उसमें नो डाउट भाई ने किया।
(06:40) लोग लगे लेकिन एक विज़न था कि हां ठीक है हम मेहनत करेंगे। शर्माएंगे नहीं हम अपने बच्चों क्योंकि अगर विक्टिम प्ले करना हो तो हम बने रहेंगे कि भाई देखो मेरा तो हस्बैंड नहीं था तो बच्चों को मैंने जैसे तैसे कर लेकिन वो वहां नहीं रुकी मुझे बेस्ट कराना है अपने बच्चों को तो वो मैं देख के आ रहा हूं मैं अपनी बहन को देखता हूं आज मेरी पत्नी है उनको देखता हूं कि वो भी डॉक्टर हैं साथ में बहुत ढेर सारी ऐसी चीजें होती हैं जहां पर हमें लगता है कि यह स्त्री नहीं कर सकती है। आज छोटी-छोटी चीजों में बताया कि अगर हम देखते हैं अपनी बहन हुई या फिर पत्नी हुई
(07:11) तो कैब बुकिंग हो गई या फिर छोटा सा काम हो गया तो हमें लगता है कि हमें ही करना पड़ेगा। आदमी को ही करना पड़ेगा। ये स्त्री नहीं कर पाएगी। बट नो डाउट मैं पिछले तीन-चार साल से देख रहा हूं जब से स्नेहा के साथ हूं कि किसी भी इमरजेंसी के लिए तो मेरा ऐसा नहीं है कि घर में इमरजेंसी हो गई तो मुझे ही देखना है। तो वो अपने स्तर पर पूरा घर की इमरजेंसी तक संभाल लेती हैं। तो एक सशक्त नारी आपके लिए कोई थ्रेट नहीं है। वो इनफैक्ट एक एक आपके लिए एक मैं कहूंगा कि आप उससे ग्रो करते हैं बहुत और यह आदमियों के लिए भी समस्या है। अगर मान लीजिए कि नारी डरी हुई
(07:49) है तो हमें ही तो प्रॉब्लम हो रही है। हमें ही अपनी बहन बेटी को बचाने के लिए बाहर जाना पड़ता है या एक ये भी चलता है कि मेरी मां या बहन जा रही है तो मुझे छोड़ने जाना है, लेकर आना है। तो हम उनको सशक्त नहीं करेंगे। तो आप अपना समय उसमें भी दे रहे हैं। तो इन सभी मुद्दों पर बात करूंगा। वैसे मैं बोलते जाऊंगा तो मैं काफी बोलूंगा। लेकिन बात शुरू हो इससे पहले फेमिनिज्म को लेकर हम एक 5 मिनट 10 मिनट बात मैं करना चाहता हूं जिससे पडकास्ट सेट हो जाए कि फेमिनिज्म है क्या? क्योंकि इसके पक्ष में और विपक्ष में बहुत बातें बोली जाती हैं। और क्योंकि
(08:23) बड़े-बड़े इन्फ्लुएंसर्स बोलते हैं, बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज बोलते हैं तो क्या होता है? बहुत जल्दी हम अपना फॉर्म कर लेते हैं थॉट कि फेमिनिज्म क्या है? तो ऐसे बहुत ढेर सारे थॉट्स हैं जो सोशल मीडिया पर चल रहे हैं और फॉर्चूनेटली या अनफॉर्चुनेटली हम सोशल मीडिया पर ही ये डालेंगे। तो सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है वो हम देख लेते हैं एक बार। फिर उस पर मैं आप दोनों की प्रतिक्रिया चाहता हूं कि फेमिनिज्म क्या है दोनों से एक-एक करके। तो कुछ वीडियोस हमने कंपाइल की हैं जो बड़े सेलिब्रिटीज ने बोला है। तो पहले हम वो देख लेते हैं और फिर आप बताइएगा कि
(08:55) फेमिनिज्म है क्या एक्चुअल में? जी। लॉट ऑफ़ यंग वुमेन यू से आई एम नॉट अ फेमिनिस्ट। व्हाट इज योर रिएक्शन व्हेन यू हियर? इतनी चिढ़ आती है ना मुझे। इतनी चिढ़ आती है क्योंकि कोई समझ ही नहीं है। एक फेमिनिस्ट का मतलब क्या है? यही किसी को नहीं मालूम है। यू नो दे आर स्टिल एसोसिएटिंग विथ द ब्रा बर्निंग वुमन दे डोंट नो एनीथिंग। एक फालतू फेमिनिज्म औरत मर्द के बराबर होती है। ये सब सोचने की और उस पे विश्वास करने की कोई जरूरत नहीं है। इंडिपेंडेंट हो जाओ। और अपने काम पर ध्यान दो। अगर आप हाउस वाइफ है तो उसको छोटा मत समझो। वो भी बहुत बड़ा
(09:32) काम होता है। अपनी सेल्फ एस्टीम लाओ। बाकी हम बराबर नहीं है। जिस दिन आदमी प्रेग्नेंट होना शुरू हो जाएगा तब बराबर हो जाएंगे। थिंकिंग इट जस्ट फेमिनिज्म लिटल एंड मेड अस रियली एक्साइटेड अबाउट दिस होल लाइक फ्रीडम एंड लिबरेशन एंड एवरीवन इक्वल। वी आर ऑल इक्वल इन मोर मोर सेंटीमेंटल थिंग्स। बट इन सोसाइटी थिंग्स वी आर नॉट इक्वल। एंड नाउ, द सोसाइटी एंड पीपल आर सीइंग द रिप्रोकशन ऑफ़ दिस रैडिकलाइज़ेशन ऑफ़ फ़ेमिनिज़्म। फैमिलीज़ आर सफ़रिंग, किड्स आर सफरिंग, वुममेंस मेंटल हेल्थ इज़ सफरिंग। आई ऍम नॉट अ फ़ेमिनिस्ट रियली। अह व्हेन आई से आई एम
(10:09) नॉट अ फेमिनिस्ट, मैं कभी नहीं मान सकती कि वी हैव टू फाइट द मैन। बिकॉज़ एव्री वुमस इशू इज़ अ मैनस इशू रियली। और अगर हम साथ मिलके नहीं लड़ सकते हैं, इट्स नॉट वर्थ इट। फॉर मी इट्स नॉट वर्थ इट। आई बिलीव दैट मैन एंड वुमेन शुड वॉक हैंड इन हैंड एंड फेस द प्रॉब्लम। व्हाटएवर द प्रॉब्लम टुगेदर। रही बात इक्वलिटी की। कहते हैं कि इक्वलिटी इन सैलरी, इक्वालिटी इन जॉब अपोरर्चुनिटी इज़ यस। दैट वे आई एग्री दैट देयर शुड बी इक्वलिटी। लेकिन व्हाट इक्वलिटी? आप लोग देखिए हमारे कैमरामैन आप बैठे हैं। यहां
(10:55) पे मैं बैठी हूं। आई मीन हाउ बोरिंग इट वुड बी अगर हम सब एक जैसे होते तो थैंक गॉड देयर इज अ डिफरेंस। आई एम सो ग्लैड यो ब्रो। या आई एम रियली हैप्पी दैट वी आर डिफरेंट। अ जो कंपाइलेशन हमने की है इसमें आपने देखा होगा कि कुछ लोग चाहते हैं फेमिनिज्म पर बात हो। कुछ का फेमिनिज्म पे क्या अंडरस्टैंडिंग वो चाहते हैं कि वो क्लियर हो। कुछ बोलते हैं कि मैं फेमिनिस्ट हूं। कुछ बोल रहे हैं कि फेमिनिस्ट जो है वो एक प्रोपेगेंडा है। तो और आज ऐसा हो गया है लड़कों के बीच में खास खास करके ये तो पडकास्ट मैं चाहता हूं कि नारियों के लिए
(11:33) ही हो। बहुत ज्यादा लड़कों की बात ना हो यहां। लेकिन फिर भी बीइंग अ मैन या फिर बॉय मैं लड़कों के बीच में ऐसा होगा। अगर कोई लड़की फेमिनिज्म की बात कर रही है तो भाई उससे दूर रहो। और वैसे अगर देखेंगे लड़के से पूछेंगे आप फेमिनिस्ट हो तो वो भले ही आपके सामने बोलेगा कि हां हां मैं फेमिनिस्ट हूं मतलब बढ़ना चाहिए लड़कियों को लेकिन अगर कोई लड़की बोलेगी कि मैं फेमिनिस्ट हूं तो थोड़ा सा कान खड़े हो जाएंगे कि भाई ये तो कुछ कोई प्रोपेगेंडा या अभी जो सोनम और मुस्कान का केस हो गया तो वो उसमें आ जाते हैं। तो मैं पहले वंदना जी आपसे ही प्रारंभ करूंगा कि आपने
(12:04) जो सुना उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है और आपका फेमिनिज्म क्या है? एक्चुअली बहुत सारे सेलिब्रिटीज जो हैं जो फेमिनिज्म की बात करते हैं वह उसका ऐतिहास ऐतिहासिक पक्ष जानते ही नहीं है। फेमिनिज्म का कांसेप्ट जो है वो वेस्ट से स्टार्ट होता है। अब्राहमिक रिलिजन से स्टार्ट होता है। जहां स्त्री जो है वो पुरुष की अंतिम पसली से निकली है। और क्योंकि बहुत वर्षों तक उनको दबाया गया था। उनको इक्वलिटी नहीं मिली थी। इसलिए वहां पे फेमिनिज्म का कांसेप्ट आया। भारत में ये कांसेप्ट एप्लीकेबल नहीं था। जहां पर स्त्री या प्रकृति जो है वो मूल रही है
(12:41) पूरी क्रिएशन का। जहां पर स्त्री जो है उसको परबह्म स्वरूपिणी माना गया है। तो यहां पे फेमिनिज्म का कांसेप्ट जो है वो एप्लीकेबल ही नहीं था। वैसे तो फेमिनिस्ट क्या चाहते हैं? किससे लड़ रहे हैं? क्यों लड़ रहे हैं? हमको इस बात की कोई समझ नहीं है। लेकिन मोटा-मोटा अपने जीवन में मैंने जो देखा है वो यह देखा है कि फेमिनिस्ट यह कहते हैं कि लड़कियां सताई हुई हैं। वो अबला है। वो दुखी हैं और इसका विरोध हम कर रहे हैं। हमारे को जो है इक्वलिटी चाहिए। इक्वलिटी कैसे जो शारीरिक स्तर पर इक्वलिटी हो। अब इसको समझने की आवश्यकता है कि आप जब ऐसा हाइपोथेसिस लेकर चलते हैं
(13:19) कि नारी अबला ही है। समाज में जितनी नारियां हैं वो सताई हुई हैं, वो दुखी हैं तो फिर आप किससे मुक्ति मांग रहे हैं? आपने यह बात मान ही ली कि सारी नारियां जो हैं वो अबला है, वो डरी हुई है, वो सहमी हुई हैं। वो दुखी हैं तो फिर तो आपका हाइपोथेसिस ही नेगेटिव है। अगर मैं यह मान करके ही अगर एक दिया मान के ही चल रहा है कि मेरे अंदर तेल नहीं है। मेरी लौ जल नहीं सकती। तो फिर वो कैसे जलेगा? सो हाइपोथेसिस ही आपका नेगेटिव है। दूसरी बात यह है कि हमारे यहां पर या भारतीय ज्ञान परंपरा जो रही है वहां पर पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरक
(13:57) रहे हैं। एक दूसरे के विरोधी नहीं रहे हैं। स्त्री तत्व और पुरुष तत्व जब तत्व जब मिलता है तो यह पूरा ब्रह्मांड अपने उच्चतम सुंदर स्वरूप में प्रकट होता है। दूसरी चीज़ जो है हमारे यहां स्वधर्म की बात की गई है। हमारे यहां राइट्स की बात नहीं की गई। आप यह सोचिए कि अगर आप एक पेड़ से फल ले रहे हैं और आप केवल राइट्स की बात कर रहे हैं तो उसको जो सींचना है उसकी तरफ जो आपका धर्म है उसकी बात कौन करेगा? इसी प्रकार से अगर पुरुष अपनी बात करने लग जाए, स्त्रियां अपनी बात करने लग जाएं तो फिर धर्म की बात कौन करेगा? स्वधर्म का कांसेप्ट जो है वो ऐसा नहीं है
(14:34) जो केवल पुरुषों या स्त्रियों पर लागू होता है। अगर आप पढ़ते हैं इसलिए पढ़ना बहुत जरूरी है। आप पशु-पक्षियों के संसार में भी यदि देखेंगे तो शेर और शेरनी को अगर आप ऑब्जर्व करेंगे शेरनी जाकर के खाना लेकर आती है। सबसे पहले शेर खाता है। फिर बच्चे खाते हैं। अंत में शेरनी खाती है। उसको किसने यह सब सिखाया? उसको प्रकृति ने सिखाया। शेर क्या करता है? बच्चों की और शेरनी की रक्षा करता है। यानी कि रोल्स डिवाइडेड हैं और यह प्रकृति ने डिवाइड किए हैं। तो हम उन रोल्स को चेंज करने वाले कौन होते हैं? लास्ट थिंग ये है कि हमारी जो स्त्रियां हैं आज जो फेमिनिज्म पढ़
(15:12) लिया है थोड़ा बहुत जो कि वेस्ट का कांसेप्ट है उसको पढ़कर यह नहीं समझ पा रही कि हम सब जो हैं शक्ति पुंज हैं। और हमें अपनी शक्ति को समझना चाहिए। हमें अपनी शक्ति को जानना चाहिए और अपने अंदर की यात्रा जो है उसको प्रारंभ करना चाहिए। यहां पर क्या हो रहा है? हम शक्ति की बजाय विरोधी बन रहे हैं। हमें सशक्त होना चाहिए था पढ़ाई लिखाई करके हायर स्टडीज में जाके जहां हायर स्टडीज में स्त्रियों की जो संख्या है वो बहुत कम है। लेकिन हमने कहा नहीं हम विरोध करेंगे समाज का। हम छोटे कपड़े पहनेंगे। हमको सशक्त होना चाहिए था। अपनी हेल्थ पे
(15:50) ध्यान देना चाहिए था। अपने परिवार की हेल्थ पे ध्यान देना चाहिए था। अपनी समाज की हेल्थ पे ध्यान देना चाहिए था। हमने शराब और सिगरेट को चुन लिया। पढ़ी लिखी स्त्री जब शराब और सिगरेट पीती है जिससे के सीओपीडी हो सकता है, अस्थमा हो सकता है, लंग्स की प्रॉब्लम आ सकती है। आगे बच्चे होने में प्रॉब्लम हो सकती है। तो वो कहां से पढ़ी लिखी है और कहां से मॉडर्न है? एक और बात है कि जो लोग अपने आप को फेमिनिस्ट कहती हैं, छोटे कपड़े पहनती हैं, शराब और सिगरेट पीती हैं। आप एक समझ लीजिए आप पूरे ब्रह्मांड में कण मात्र हैं। आप क्या करती हैं? इससे रत्ती
(16:23) भर किसी को फर्क नहीं पड़ता। आप आज हैं, कल आप नहीं रहेंगी। आप केवल जो है अपना जो है अहित कर रही हैं। अपने धर्म का विनाश कर रही हैं। और जनरल लोगों के लिए धर्म यहां पर जो है मैं बोल रही हूं आपका जो शारीरिक धर्म है। आपका जो जो आपके इस पूरे ब्रह्मांड के अंदर जो आपने करना था जो आपके कार्य था आप वो जो है पूर्ण नहीं कर पाएंगी। इसलिए आप अपने धर्म का विनाश कर रही हैं। लास्ट बट नॉट द लीस्ट शारीरिक स्तर पर अगर आप इक्वलिटी की मांग कर रही हैं तो यह इसी प्रकार है जिस प्रकार के एक सेब का पेड़ कहे कि मुझे तो आम का पेड़ बनना है। और वो जब आम का पेड़ नहीं पहली
(17:00) बात तो वो आम का पेड़ बन ही नहीं पाएगा। दूसरी बात वो जब आम प्रोड्यूस नहीं कर पाएगा तो डिप्रेशन में आ जाएगा। और डिप्रेशन में आने से वह अपने भी धर्म का विनाश कर लेगा। यही स्त्रियों के साथ भी हो रहा है। वो पुरुष की तरह बनना चाहती हैं। या आपको जानना होगा शारीरिक स्तर पर आपकी शक्ति पुरुष से कम ही है। और जहां तक आत्मा का सवाल है जहां तक चेतना का सवाल है सब में एक ही चेतना है। एक एग्जांपल देती हूं। यहां रिठाला से गुड़गांव तक अगर जाना हो तो एक स्त्री जो है खड़े होकर जा नहीं सकती। जो फेमिनिज्म का झंडा उठाकर घूमती हैं स्त्री वो पुरुष को कहती हैं कि
(17:35) आप उठ जाइए मुझे बैठना है। फिर जब फेमिनिज्म की बात आप कर रहे हैं तो वहां पे किसी पुरुष को उठाइए मत। भले ही आप प्रेग्नेंट ही क्यों ना हो। तो हमारा फेमिनिज्म जो है जो अभी भारत में चल रही है ओपोरर्चुनिस्ट फेमिनिज्म है। जहां हमें कोटा भी चाहिए जहां हमको जो है रिजर्वेशन भी चाहिए। जहां हम पुरुष को सीट से उठा भी दें और हमको जो है हमारे को जो सुविधाएं मिल रही हैं हमको वो भी चाहिए। तो ये एक तरफ़ा फेमिनिज्म है। जहां केवल वुमेन एंपावरमेंट की बात हो रही है। लेकिन पुरुष की बात नहीं हो रही। समाज जो है केवल स्त्रियों से नहीं चलता। समाज पुरुष
(18:10) और स्त्री दोनों तत्वों की बराबरी से दोनों पद तत्वों के ओरिजिनल स्वरूप से चलता है। ऐसा मेरा मानना है। इसमें वीरा जी आपका क्या मत है? एक्चुअली जो आज का फेमिनिज्म है जस्ट लाइक उन्होंने बताया वंदना जी ने बताया। तो मैं भी बहुत फ्रीक्वेंटली देख रही हूं सोशल मीडिया पे। आज का फेमिनिज्म बस इतना है कि सोशल मीडिया पे कैमरा उठाओ और मुजरा करो। आज का फेमिनिज्म है माय बॉडी माय चॉइस। अपने कपड़ों के लिए लड़ रही है वो। आज की महिलाएं मुझे नहीं लगता जो फेमिनिज्म की बातें करती है वो महिलाएं एक्चुअल फेमिनिज्म के बेस पर काम करना चाहती है। क्योंकि जब उन्होंने हिस्ट्री
(18:48) बताई तो फोर वेव्स में जो फेमिनिज्म आता है कि कभी उन्होंने शिक्षा का अधिकार मांगा, कभी उन्होंने न्याय का मांगा, कभी उन्होंने संपत्ति का अधिकार मांगा। तो इन अधिकारों के तहत वो मांगते आई क्योंकि कहीं ना कहीं इतिहास में उनके यहां ऐसा कांसेप्ट था कि उन्हें अधिकार नहीं दिया जाता था। कहीं ऐसा अरस्तु कहीं बोल देते हैं कि एक दांत की कमी होती है तो महिलाएं बुद्धिशील नहीं होती है। उनकी डेलीबेटिव फैकल्टी कम होती है। इवन उनको संपत्ति के अधिकारों से निकाल दिया जाता है। कहीं पे उनका एफजीएम, फीमेल जेाइटल मिटुलेशन होता है। इथोपिया और सोमानिया में आज भी होता
(19:18) है। यदि हम चाइना की बात करें तो फूड बाइंडिंग हुआ करती थी। आज इराक और ईरान देखिए स्टडी तक उनकी बंद की जा रही है। अफगानिस्तान का हाल देखिए। अभी रिसेंट न्यूज़ आई थी कि वहां पर उनको खिड़कियों तक बैठना अलाउड नहीं है। खिड़कियों पर बच्चियां नहीं बैठ सकती। वहां इसकी बात हो तो मैं बात कर सकती हूं। लेकिन इंडिया में हर चीज का अधिकार है। हर चीज के लॉ बने हुए हैं। आप देखिए महिला के साथ कुछ भी होता है। मैं रियल केसेस की बात नहीं कर रही हूं यहां पर। जो रियल केसेस है उस पर कानून कुछ प्रक्रिया नहीं देता है। लेकिन आज एक महिला खड़ी होकर केवल ये बोल देना
(19:48) कि मेरे साथ ये हुआ है। भले हुआ हो या ना हुआ हो। वहां पर केस लागू हो जाएगा और एक मैन को अरेस्ट कर लिया जाएगा। ये हमारे देश में आज हो रहा है। तो आज का जो फेमिनिज्म है वो केवल कपड़े उतारने, कपड़े पहनने की बातें करता है। आज का फेमिनिज्म स्वतंत्रता की बातें नहीं करता। ये लोग कहते हैं कि हम फ्री है। हमें हमें फ्रीडम चाहिए। हम स्वतंत्र हैं। इन्हें फ्रीडम किस चीज का चाहिए? केवल बॉडी के लेवल पर चाहिए। केवल फोहड़ता करने के लिए फ्रीडम चाहिए कि मैं शराब पीूं ये मेरा फ्रीडम है। क्या ही होता है शराब पीने से? पुरुष की भी किडनी लीवर खराब होगा। मेरा भी
(20:19) किडनी लीवर खराब होगा। तो यह इस तरीके के तो उनके तर्क होते हैं। लेकिन उसके बाद जो वुमेन की हेल्थ ड्रिंक को किसी भी अल्कोहल को कंज्यूम करने के बाद जो खराब होती है उसके ऊपर ये बात नहीं करते। ये लोग लोगों को इन्फ्लुएंस करते हैं कि आप ऐसा करो। लेकिन जब वो उसमें जाके फंस जा रही है तो वहां उसे बचाने कोई नहीं आता। हमारे देश में आपने देखा होगा बहुत प्रोटेस्ट होती है। जब रेप होते हैं कुछ भी केसेस आते हैं बहुत बहुत प्रोटेस्ट होते हैं। लेकिन फिर चार दिन बाद क्या होता है? एक फेमिनिस्ट आपको दिखाई नहीं देगी ऐसे केसेस के पास।
(20:47) एक फेमिनिस्ट आपको वहां नहीं दिखाई देगी। मैं उन फेमिनिस्ट की बात कर रही हूं। उनकी नहीं जो एक्चुअल ग्राउंड बेस वर्क करते हैं। मैं उनकी बात कर रही हूं जो आज सोशल मीडिया पर बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं कि हमें आजादी चाहिए। आजादी किस चीज की चाहिए? फुहड़ता की। वास्तविक आजादी क्या होती है? अपने आप पर नियंत्रण रखो। जैसे वन्ना जी ने बताया कि वास्तविक आजादी ये है कि आप इक्वलिटी मांग रहे हो तो फिर हर वे में इक्वल रहो। लेकिन वो पॉसिबल नहीं है। बायोलॉजिकली वो पॉसिबल नहीं हो सकता। कभी भी जैसे हमने अभी क्लिप भी देखी कि जब
(21:14) वो बच्चा पैदा करने लग जाएगा कोई मेन तो हम बात कर सकते हैं। लेकिन मैं ये कहती हूं कि वहां भी वो बात नहीं की जा सकती। क्योंकि एक साइकोलॉजी अलग काम करती है, बायोलॉजी अलग काम करती है और जो नेचर काम कर रहा है, आप नेचर के अगेंस्ट क्यों जाना चाह रहे हैं? एंड यदि आप जा भी रहे हैं, आप इन्फ्लुएंस कर भी रहे हैं तो फिर आप एक्चुअल फ्रीडम पर काम क्यों नहीं कर रहे हैं? एक्चुअल फ्रीडम क्या है? कि आपका अपनी आत्मा पे नियंत्रण होना चाहिए। आप अपनी रक्षा स्वयं करो। अच्छा कपड़े पहनने में आपको आजादी चाहिए। आई एम नॉट टॉकिंग अबाउट कि आप जींस पैंट या कोई सभ्ये कपड़े
(21:44) पहन रहे हो। मॉडर्न क्लॉथ्स के मैं अगेंस्ट नहीं हूं। मैं अगेंस्ट उन लोगों की हूं जो बहुत रिवेलिंग क्लॉथ्स पहनते हैं एंड देन वो कहते हैं कि ये तो हमारा अधिकार है। इट्स माय बॉडी माय चॉइस। और लोगों को देखना क्यों है? तो व्हनेएवर आपकी बॉडी आपका चॉइस तो देखने वाले की भी अपनी चॉइस है ना। और ये बायोलॉजी बोलती है कि जब वुमस ऐसी कुछ चीजें करती है तो मैन ऑटोमेटिकली अट्रैक्ट होता है। वहां पर ये नहीं है आप किसी डॉक्टर से जाकर इस पे नहीं भिड़ सकते कि ऐसा नहीं हो सकता। तो जब बात स्वतंत्रता की आती है तो क्यों आप फूहड़ता को चुनते हैं? क्यों आप शक्ति को
(22:14) नहीं चुनते? क्यों आप दिव्यता को नहीं चुनते? हमारा जो भारतीय कांसेप्ट रहा महिषासुर मर्दिनी का कांसेप्ट रहा। मैं हमेशा कहती हूं भारत को परियों की जरूरत बिल्कुल नहीं है। महिषासुर मर्दिनी की जरूरत है। भारत को जरूरत ही नहीं है उस छोटे-छोटे कपड़े पहनने वाली स्त्री की। आप कर क्या रहे हो? जहां आप इंटेलेक्चुअल बन सकते हो। जहां आप एक साइकोलॉजिकल, बायोलॉजिकल या कहूं कि एक अपने मेंटलिज्म को स्ट्रांग करके आप बहुत आगे जा सकते हो। वहां आप किस चीज में अटक गए हो? सुबह से लेकर रात तक लड़कियां क्या कर रही है? मुझे क्या पहनना है? मुझे क्या ओडना है?
(22:42) मुझे कैसे दिखना है? तो ये फेमिनिज्म नहीं होना चाहिए। फेमिनिज्म जो स्टार्ट हुआ था आई सपोर्ट दैट कि वो स्टार्ट ही इसीलिए हुआ था कि ताकि शिक्षा का अधिकार जो उनको नहीं था। संपत्ति का अधिकार जो उनको नहीं था। न्याय का अधिकार, न्याय प्रणाली का अधिकार जो उनको नहीं था उसके लिए हुआ था। लेकिन आज उसकी मुझे नहीं लगता कि जरूरत है। भारत को कभी से जरूरत नहीं रही। यदि हम अपना इतिहास खंगालें तो वैदिक काल में हमें विदुषियां मिलती है। मध्यकाल देख के हम पूर्व मध्यकाल देखें और जितना भी समय हम देखते हैं हमारे पास आज भी मेरे पास इस
(23:10) समय 100 प्लस वीरांगनाओं का इतिहास है जिस पर मैं काम कर रही हूं। तो मैंने जो इतिहास देखा है, मैंने जो अपनी संस्कृति देखी है या मैंने जो फेमिनिज्म या नारी शक्ति नारी सशक्तिकरण देखा है, वो मैंने यह देखा है कि हमारे यहां नारी को सशक्त करने की जरूरत नहीं है। हम वही संस्कृति के लोग हैं जो नवरात्रि मनाते हैं। हम देवी को पूजते हैं। बस दिक्कत ये हुई ना कि हमने पूजते-पूजते केवल पूजना शुरू कर दिया। हमने बच्चियों को समझाना बंद कर दिया कि आप देवी हो तो आप देवी बनोगे कैसे? एवरीवन इस टॉकिंग अबाउट बेटियां तो लड़कियां तो देवी होती है। लेकिन देवी
(23:43) बनना कैसे है? इस कांसेप्ट पे तो वर्क करो। तो इस कांसेप्ट पे वर्क नहीं हो रहा है। इसीलिए जो वेस्ट का फेमिनिज्म है वो इंडिया में हावी हो रहा है। मेरा ये मानना है। मैंने आप दोनों की बात सुनी और मुझे लग रहा है कि जो मेजर मुझे कॉमन बात लगी कि फेमिनिज्म वेस्ट का कांसेप्ट है और हमारे यहां पर जो परंपरा रही है उसमें उसमें नारी और पुरुष दोनों एक अभिन्न अंग देखे गए हैं सोसाइटी के। इसमें मैं आऊंगा परंपरा पर आपने बात की है तो बहुत ढेर सारी ऐसी भी चीजें जो हम अपने घर परिवार में देखते हैं जो सनातन परंपरा ने एक समाज सेट किया है वहां पर क्या गलतियां हुई या
(24:16) उस पर भी मैं चर्चा करूंगा हम फेमिनिज्म पर बहुत ढेर सारी बातें तो इतनी नहीं करेंगे क्योंकि पहले ही पार्ट में ये रिवील हो रहा है कि जो चीज बाहर की है या फिर उसका कितना कंट्रीब्यूशन है उस पर हम चर्चा कर सकते हैं भारत में जैसे हम जब फेमिनिज्म की बात कर रहे हैं और अभी आपने बात की कि हम अह ज़्यादातर भारत में अह एक यह रियलिटी है कि मोस्ट ऑफ़ द वुमेन जो है अभी हाउसवाइफ़ हैं। बढ़ रही हैं, आगे आ रही हैं। काम में आ रही हैं। लेकिन हाउसवाइफ्स तो हैं। फेमिनिज्म मैं ये आपसे जानना चाहता हूं कि हाउसवाइफ्स को एमावर कर रहा है या उनको
(24:54) विक्टिमाइज कर रहा है। क्योंकि अभी एक मूवी आई। आप दोनों ने शायद सुना होगा। मिसेज मूवी एक आई थी। मैंने मूवी नहीं देखी इसलिए मेरा कोई उस पर ओपिनियन नहीं है। लेकिन उस पर रिसर्च टीम ने बताया कि बहुत ढेर सारा ऐसा उस पर रिएक्शन ऐसा है कि एक महिला अगर घर के परिवार के लिए अपने पति के लिए बच्चों के लिए खाना बना रही है तो आदमी भी तो 144 16 घंटे फैक्ट्री में काम करता है या फिर मजदूरी करता है तो इसमें कौन सा बहुत बड़ा काम कर लिया। हाउसवाइफ्स भारत में सबसे ज्यादा है और फेमिनिस्ट हाउसवाइफ्स के लिए क्या कर रही हैं? सो इसमें आपको यह समझना होगा कि हमारे
(25:33) यहां स्त्री शक्ति स्वरूप तो थी और हर कार्य करती थी। जब मुस्लिम इन्वजन होता है और स्त्रियों को उठा के ले जाया जाता है और उनसे जबरन निकाह किया जाता है तब अ सती प्रथा या फिर जौहर जैसे कांसेप्ट्स जो हैं आते हैं या घूंघट जैसे कांसेप्ट आते हैं। वहां पे पुरुष जो थे वो अपनी स्त्रियों को घर में रखा करते थे। वो चीज चलते-चलते आज यहां तक आ गई कि मैं मानती हूं कि कुछ ऐसी स्त्रियां हैं जो कि घर के बंधन में हैं। लेकिन आप कुछ के बेसिस के ऊपर पूरे समाज की पिक्चर प्रस्तुत नहीं कर सकते। कुछ एक आचार्य हैं सेल्फ स्टाइल्ड आचार्य जो कि
(26:12) कहते हैं कि एक स्त्री जो है वो करेला 4 घंटे काटती है। फिर उसको बनाती है। उसमें उसको क्या प्राप्त होता है? तो उसको वही प्राप्त होता है। मैं आपको बता दूं जो एक गायक जब अच्छा गाना गाता है उसको प्राप्त होता है या चित्रकार जब चित्र बनाता है तो उसको प्राप्त होता है या फिर कोई कविता लिखता है तो उसको प्राप्त होता है उसको और मैं यह इसलिए कह सकती हूं क्योंकि यह मेरे अनुभव में आया है। मैं पढ़ी लिखी हूं, मैं पढ़ाती हूं, मैं प्रोफेसर हूं। यह मेरा सौभाग्य है या मेरा भाग्य है वह अलग बात है। लेकिन आज के समय पे जब मैं 45 की हो
(26:45) चुकी हूं तो मुझे ऐसा फील होता है कि घर के अंदर खाना बनाना, कपड़े धोना या मेरे जो छोटे पेट्स हैं उनका ख्याल रखना या अपनी माताजी का ख्याल रखना यह मुझे ज्यादा खुशी देता है। इसलिए आप देखेंगे कि मैं अपनी कक्षा पूरी करके ना मुझे कोई इच्छा है स्टाफ रूम में बैठने की, ना किसी से दोस्ती यारी करने की, कुछ नहीं। मुझे घर आना है। मुझे अपने घर देखना है। यानी कि समय के साथ-साथ जो आपकी मूल प्रकृति है वो टेकओवर कर ही जाती है। तो जो इस प्रकार की बात कहते हैं पहले तो वो स्त्री है नहीं। तो वो जो बात कहते हैं अनुमान से कहते हैं और अनुमान से कही बात सही भी हो सकती है
(27:20) और गलत भी हो सकती है। दूसरी चीज जो है आप सबको एक ही रंग में ना रंगे। बहुत सारी स्त्रियां जो हैं वो हाउसवाइफ होना एंजॉय करती हैं। आज अगर मुझे चॉइस दी जाए तो मैं घर पर रहकर के घर सवारना ज्यादा पसंद करूंगी देन के प्रोफेसरशिप। यह मेरी अपनी चॉइस है। और अगर कुछ लोग यह कहते हैं कि नहीं नहीं अरे तुमने घर हाउसवाइफ हो के क्या कर लिया? तो फिर आप फेमिनिज्म अगर फेमिनिज्म को फॉलो भी करते हैं तो आप उसको ठीक से फॉलो नहीं कर रहे हैं क्योंकि आपने स्त्री की चॉइस पे प्रश्न उठा दिया। या तो आप उसकी चॉइसेस का सम्मान करें। अगर वह घर
(28:00) पर रहना चाहती है, अच्छा अचार अच्छा बनाती है, कपड़े अच्छे सिलती है, तो उसको निचले स्तर का कार्य ना समझें। उसकी चॉइस का सम्मान करें और या फिर आप फेमिनिज्म की बात ही ना करें। जहां तक बात यह है कि क्या वास्तविकता में यही पूरे सोसाइटी की इमेज है? नहीं यह पूरे सोसाइटी की इमेज नहीं है। एक स्त्री घर पर रहते हुए भी घर की शक्ति हो सकती है। प्रॉब्लम यह है फेमिनिज्म में की वो घर को सवारने को बंधन मानता है। शादी संस्कार हो सकता है। शादी बंधन नहीं है। घर को संवारना बंधन नहीं है। ये आपकी उन्मुक्त चॉइस है कि मैं घर को सवारना चाहती हूं और आज ये मेरी भी
(28:39) चॉइस है जैसा मैंने आपको बताया। तो मुझे नहीं लगता कि स्त्री जो घर में रहती है वो कोई छोटा काम कर रही है। परिवार को सवारना यानी कि समाज के हिस्से को संवारना। हर स्त्री अगर अपना धर्म निभाएगी तो समाज सवरेगा। समाज सवरेगा तो देश सवरेगा। देश सवरेगा तो विश्व गुरु बनेगा। सो सबसे पहली गुरु जो है वह स्त्री ही है। आर्य अंबा जो जगद्गुरु आदि शंकराचार्य की माता थी। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने ही जेन्यु संस्कार किया था। क्या वो गणी नहीं थी? उभय भारती जिन्होंने शंकराचार्य को लिटरली हरा दिया था। क्या वो गणी नहीं थी? सावित्री क्या गणी नहीं थी? ये सब हमारे
(29:20) को जो है वैदिक ah स्वरूप महिलाओं के दिखते हैं। ये जो नौ देवियां हैं ये कोई बाहर नहीं है। ये एक ही स्त्री के नौ अलग-अलग रूप हैं और ये शक्ति के स्वरूप है। सवारना भी शक्ति का एक स्वरूप है। और जब सवारते सवार सवारते उस पर अत्याचार होने लग जाए तो काली का रूप लेना भी स्त्री का ही एक स्वरूप है। वंदना जी जो आपने बात की हाउसवाइफ्स को लेकर कि हाउसवाइफ्स को भी जो छोटा दिखाया जा रहा है वह गलत है। क्योंकि चॉइससेस की जब रिस्पेक्ट हो रही है तो दोनों तरफ से होनी चाहिए। इसमें अगर हम मान भी ले एक बार कि हाउसवाइफ का जो रोल है वो थोड़ा कम है,
(29:56) कमतर है या फिर आप जब पूरी तरह से फेल हो गई अपनी जिंदगी में तो आप हाउसवाइफ हैं। मतलब एक एक तरह से मान भी लिया जाए कि एक एक स्त्री को हाउसवाइफ नहीं होना चाहिए। तो हाउस को संभालने के लिए या फिर आप मेड रखेंगे या फिर आप किसी होममेकर को रखेंगे। अगर इसमें हस्बैंड रेडी हो जाए या ऐसे भी लड़के हैं। बहुत से लड़के होंगे। इसको आप थोड़ा सा फन वे में भी ले सकते हो या फिर सीरियस भी होंगे कुछ लड़के जो ये चाहेंगे कि ठीक है मेरी वाइफ काम करे मैं घर संभालूंगा तो ये भी एक समस्या देखने को मिलती है अक्सर बताया जाता है कि भाई कोई भी लड़की एक निठल्ले लड़के से तो मतलब
(30:29) शादी नहीं करेगी तो क्या इसका फिर सलूशन क्या है कि फिर घर कोई ना संभाले घर संभालने वाला फिर या तो फिर नौकर ही रखा जाए तो आपको क्या लगता है कि क्या यह स्त्रियों में अभी है कि ऐसे पुरुष से हम विवाह नहीं करेंगे जो केवल घर चलाना चाहता हो। जी कुछ तौर पे सोशल मीडिया के तौर पे देखा जाए तो यह चीज बहुत हो गई है। अब आप किसी का कमेंट सेक्शन खोलेंगे तो वहां वुमस यही बोलेगी कि व्हाट इफ ही यदि ये खाना नहीं बनाएगा तो ये करेगा क्या मेरे लिए? और यदि कोई शेफ दिख जाए उनकी रील्स दिख जाए उनको और शेफ बोले अरे ये तो चाहिए मुझे। ये मुझे बना के खिलाएगा ये चीज।
(31:04) अच्छा इसमें जो हमने बात की मिसेज मूवी वाली मुझे ऐसा लगता है कि हम लोग काफी सिलेक्टिव अप्रोच करते हैं। हम ह्यूमिलिएशन दिखाते हैं, स्ट्रेस दिखाते हैं, वुमस का दिखाते हैं। तो हमें मेंस की साइड पे भी बात करनी चाहिए। बिकॉज़ सोसाइटी बायस्ड होने पे नहीं चलती। जहां सोनम रघुवंशी जैसे केसेस आते हैं वहां पर खंडवा में एक महिला का रेप होता है। 45 इयर्स की शादी से लौटती हुई महिला का रेप होता है। आर जेकर मेडिकल कॉलेज में रेप होता है। बहुत ब्रूटल होता है। तो हम बायस्ड क्यों हो जाते हैं? जब क्राइम मैन एंड वुमेन दोनों के साथ हो रहा है तो हम क्रिमिनल को
(31:32) बायस नजरों से क्यों देखते हैं कि वुमेन ने किया तो ठीक है भाई फेमिनिज्म को क्रिटिसाइज करो। मैन ने किया तो मिस मिसिस्ट का झंडा खड़ा कर दो। और एक और बात जैसे कि अभी कहा गया कि खाना बनाने के मामले में मुझे ऐसा लगता है ये एक बेसिक स्किल है। भूख लगती है खाना बनाना आना चाहिए। रादर देन आप हस्बैंड हो, वाइफ हो जो भी हो आपको आना चाहिए। मैटर यह करता है कि टाइम किसके पास बच रहा है। यदि टाइम महिला के पास ज्यादा है जैसे कि इन्होंने बताया कि उनकी इच्छा है। अब एक और चीज है कि यहां पे उर्फी जावेद कपड़ों के चिथड़े बना करके पहनती है तो उसको स्किल्ड बोला
(32:04) जाता है। मतलब कि बहुत स्किल्ड लड़की है भाई क्रिएटिव लड़की है। लेकिन वही कोई महिला अपने खाने की डिशेस बनाए या वो खाने में इंटरेस्ट दिखाए या वो साड़ी पहन के जिम चले जाए तो फेमिनिस्टों की आफत आ जाती है। उनको बड़ा दुख होने लगता है उनको कि अरे कैसे पहन सकते हो? जिम का जिम का क्लॉथ्स पहनो। जिम में जिम वियर पहनो, स्पोर्ट्स वियर पहनो। ठीक है वो पहन लेगी। बट व्हाट अबाउट हर चॉइस? आपने अपनी चॉइस बता दी कि आपको स्किल्ड होना पसंद है। आपको क्रिएटिव आर्ट पसंद है। क्रिएटिव आर्ट के नाम पर आप जो जो चाहे मुजरा वाली या जो चाहे कपड़े उतारने वाली को आप
(32:34) सपोर्ट कर देते हो। लेकिन अच्छा सोशल मीडिया पे नाचने वाली को भी आप सपोर्ट कर रहे हो, जस्टिफाई कर रहे हो कि ये क्रिएटिव है। लेकिन वहीं जब एक महिला खाने के ऊपर बात करती है या महिला घर के कामों के ऊपर बात करती है या घर को सजाती सवारती दिखाई देती है जो कि हमारा कांसेप्ट रहा है गृहस्वामिनी का। अच्छा एक सिंपल सा एक सिंपल सी बात समझिए। किसी भी चीज को डेकोर करना किसी भी चीज को श्रृंगारित करना। वो महिला बहुत अच्छे से कर सकती है। क्योंकि उसको वो इमोशंस दिए गए हैं। दिस इज नॉट अबाउट मैन एंड वुमेन। पुरुष के साथ पुरुष के पास भी वो शक्तियां हो सकती है। पुरुष
(33:04) के पास भी चाहे तो वो स्किल हो सकती है। लेकिन जो ज्यादातर देखा जाता है वो महिलाओं के पास होती है। ज्यादातर महिलाएं किसी भी चीज को श्रृंगारित कर सकती है। रंगोली हो गई, दिवाली हो गई, डेकोरेशन हो गया या छोटे छोटे से छोटे आर्ट क्यों ना हो गए? महिलाएं उसमें एक्सपर्ट होती है और ये हमें मानना पड़ेगा। लेकिन जब वो अपना वही काम करती है तो मुझे ऐसा लगता है समाज का एक दर्रा आके ये क्यों बोल देता है कि आप इसमें कहीं ना कहीं प्रताड़ित हो रही हो या पेट्रिय्कल सोसाइटी का आप शिकार हो रही हो क्योंकि आप अपने घर का काम कर रहे हो। पहला जिस घर में आप रह रहे हो उस घर
(33:36) की सफाई करना आपका कर्तव्य है। जिस घर में आप रह रहे हो भूख लग रही है खाना बनाना आपका कर्तव्य है। चाहे पुरुष और स्त्री हो। अब दिक्कत यह है कि ज्यादातर हमारे यहां पर भारत में अह जो होती है फीमेल्स घर पर रहती है। अभी-अभी जो कांसेप्ट आया जॉब करने का या जो बहुत इंटेलेक्चुअल हो या हाइली प्रोफेशनल हो वर्किंग वूमेन हो कॉर्पोरेट सेक्शन में हो वो वर्क करते हैं। वर्किंग प्रोफेशन में जाते हैं। तो मुझे लगता है कोई बड़ी डील नहीं है। बिकॉज़ मेरी एक फ्रेंड है वो बहुत अच्छे डॉक्टर है। एंड वो वर्क करती है। उनके पति घर में रहते हैं। और वो खाना भी बनाते
(34:05) हैं। कभी वो फ्री होती है तो वो भी खाना बनाती है। पूरी फैमिली को देखती है। मैंने उनके घर में कभी ये लड़ाई नहीं सुनी कि भाई मेरा पति खाना नहीं बना रहा है या मेरा पति खाना बना रहा है तो झगड़ना या मेरी पत्नी बाहर जा रही है तो तो ये एक मुझे लगता है मानसिक समझ होती है और दूसरा कि जो व्यक्ति कुछ कर नहीं रहा है इट मींस आपने कहा शायद खाना बना रहा है या नहीं बना रहा है क्या कहता है मेरा ये प्रश्न है कि जो फेमिनिस्ट है जो कहती हैं कि स्त्रियों को आगे आना चाहिए काम करना चाहिए तो क्या वो ऐसे पुरुष से विवाह करेंगी जो घर पे रह के घर संभाले मतलब ये
(34:36) एक्सेप्टेंस फेमिनिस्ट ग्रुप में है क्या? क्या कोई ऐसी फेमिनिस्ट आपको दिखी है जिसका पति कोई काम ना करता हो या उससे शादी की हो? जी ऐसा तो कहीं देखने नहीं मिलता। आपने कई सारे इंटरव्यूज देखे होंगे जब उनसे पूछा जाता है कि आपका जो पति है होने वाला पति वो कितना कमाने वाला होना चाहिए? तो आप वहां पे अमाउंट सुन के शॉक्ड हो जाएंगे। जिसने पढ़ाई लिखाई नहीं की जिसने कुछ नहीं किया। वो 30-40 लाख तो ऐसे बोलती जैसे कटोरा उसने सामने रखा। भीख में कोई डाल देगा उसको। यदि तुम इंटेलेक्चुअल हो, तुम फेमिनिस्ट हो, तुम अपने आप को स्ट्रांग इंडिपेंडेंट वुमेन समझ रही हो तो
(35:07) कमाओ। करो। फिर पति का इंतजार क्यों करना है तुम्हें? अच्छा फेमिनिस्ट बोलती है वी डोंट नीड मैन। उनको मेनस की जरूरत नहीं है। लेकिन यही फेमिनिस्ट क्या ये ब्रह्मचारी होती है? क्या ये संयमी होती है? क्या इनके पास आत्मनियंत्रण होता है? नहीं होता है। तो जिन चीजों के लिए पुरुषों के पास जाना है उनके लिए तो ये जा रही है। दुनिया में बहुत सारी फेमिनिस्ट है जो इस तरह की फिजिकल एक्टिविटीज के लिए मेंस को प्रेफर करती है। और चाहे वो उनको बड़ा ट्रीट करे, छोटा ट्रीट करे जैसा भी करें। लेकिन वो उस एक्टिविटी के लिए पर्टिकुलर मैन को तलाशती है। लेकिन जब बात
(35:39) घर की आ जाए तो उनको वो पुरुष नहीं चाहिए। उनको चाहिए कि हम पुरुष से बराबरी करें। लेकिन जब बराबरी में यदि पुरुष घर का काम ना करे और वो करें तो फिर वो इसमें वो इसको एक्सेप्ट नहीं करते। इवन हमारी सोसाइटी भी एक्सेप्ट नहीं करती। आप कहीं जाओ शादी का रिश्ता लेके यदि लड़का लड़की से कम वाली भी जॉब करता होगा ना तो शादी नहीं होगी। गवर्नमेंट जॉब फाइंड की जाती है। पहले तो शादी के कांसेप्ट में कि गवर्नमेंट जॉब है कि नहीं? पैसा है कि नहीं? सिक्योरिटी देखी जाती है और लड़कियां आज भी सिक्योरिटी देखती है। ये आप सोशल मीडिया देख लो आप ये ग्राउंड लेवल
(36:09) देख लो हर जगह ये बात है कि जो व्यक्ति कुछ करता नहीं है जो पुरुष करता नहीं है उसके पीछे महिला नहीं जाना चाहती लेकिन जो महिला कुछ नहीं करती है उससे शादी होती है समाज में ऐसा नहीं है और आज भी हो रही है तो हम ये कांसेप्ट समझ सकते हैं कि शुरू से ये कांसेप्ट आ रहा है कि यहां पे यदि महिला कुछ नहीं करती है तो उसको एक्सेप्ट किया जाता है लेकिन पुरुष कुछ ना कहे तो उसका एक अलग ही दरकिनार कर दिया जाता है। उसको सोसाइटी से कॉर्नर कर दिया जाता है कि अरे यह तो बड़ा यह तो कुछ नहीं करता है। तो मुझे लगता है कि यहां पर फिर इक्वलिटी आनी चाहिए। यहां पर फिर उन
(36:38) महिलाओं को ऐसे पुरुषों का साथ देना चाहिए जो कुछ नहीं करते या जिनकी जॉब नहीं लग पा रही या जो बेरोजगार हैं। तो ऐसा होते हुए तो नहीं दिख रहा है सोसाइटी में। तो मुझे लगता है यहां पे जो पुरुषों का एंगल है वो थोड़ा डिफरेंट है। डिफरेंट है। ये ओपोरर्चुनिस्ट फेमिनिज्म है। जैसा मैंने आपको बताया कि यहां पे ओपोरर्चुनिटी देखी जाती है। मतलब महिला अपने लिए तो सब कुछ चाहती है लेकिन पुरुष जो है उसके लिए कुछ नहीं चाहती है। और ये दोनों तरफ से जब इस प्रकार का होता है तो हम जो है इंडिविजुअलिस्टिक हो जाते हैं। लेकिन जब हम धर्म को देखते हैं तो पूरे समाज को
(37:09) देखते हैं। ये समझना जरूरी है। और जो महिलाएं खुद को मूर्ख बनाती हैं कि मुझे पुरुष की आवश्यकता नहीं है। तो तुम जिस शरीर में हो पुरुष तत्व तो उसमें भी है। साइंस कहती है कि लास्ट क्रोमोसोम जो है पुरुष में स्त्री का होता है। स्त्री में पुरुष का होता है। तो आप किसको जो है मूर्ख बना रही हैं? साइंटिफिक लेवल पे भी आप पुरुष तत्व से मुक्त नहीं हो सकती और पुरुष स्त्री तत्व से मुक्त नहीं हो सकता। सो और जहां तक खाना बनाने की बात है ये एक लाइफ स्किल है। ये दोनों को आना चाहिए। महिला बीमार है तो पुरुष जो है खाना बना दे। पुरुष बिजी है तो महिला खाना बना दे।
(37:48) इसमें ईगो प्रॉब्लम्स नहीं होनी चाहिए। दिक्कत ये है कि हम ये समझते हैं कि मैं काम कर रही हूं। मैं ज्यादा कमा रही हूं तो मेरा हक ज्यादा बनता है आराम करने का। जब शादी में या किसी भी रिश्ते में माता-पिता का रिश्ता हो, भाई-बहन का रिश्ता हो। जब ये ईगो वाली बात आ जाती है तो व्यवस्था जो है वो ध्वस्त हो जाती है। जी आजकल इसमें मैं एक चीज बोलूंगी कि आजकल कर्तव्य प्रमुख नहीं है अधिकार प्रमुख है। मतलब आपको अपने राइट्स पता है लेकिन आपको अपना ये नहीं पता कि मेरा कर्तव्य क्या बनता है। यदि मैं शादी करती हूं आज जितने भी लोग शादी कर रहे हैं आप उनसे पूछो कि
(38:22) एक पति का कर्तव्य क्या होता है। बहुत बेसिक बात भी नहीं बता पाएंगे जो हमारे शास्त्रों में लिखा है या जो एक बेसिक कांसेप्ट होता है और महिलाओं के साथ भी ये है। हम अधिकार मांगने तो आ जाते हैं। झंडे खड़े कर देते हैं हम अधिकारों के नाम पे कि मेरा यह अधिकार है, मेरे यह राइट्स है, मेरे वो राइट्स हैं। मेंस का भी होता है कि मेरी पत्नी ऐसा करनी ही चाहिए क्योंकि ये मेरी पत्नी है तो पत्नी का ये कर्तव्य होता है। एक दूसरे के लिए अधिकार गिना रहे हैं कि ये मेरा अधिकार है। ये उसका अधिकार है। कर्तव्य नहीं गिना रहे। तो यहां बेसिकली कमी है कि जब हम बात करते हैं तो
(38:50) हमें अपने कर्तव्य पता होने चाहिए और दूसरों के अधिकारों का सम्मान होना चाहिए। यदि हमें खुद के कर्तव्य नहीं पता तो फिर हम खुद के अधिकारों पर बात नहीं कर सकते। दोनों के लिए और हमारे शास्त्रों को भी अगर आप देखें तो वहां पत्नी धर्म, गुरु धर्म, शिष्य धर्म, मानव धर्म की बात की गई है। ये राइट्स का कांसेप्ट तो वेस्ट से आया था। हमने कभी राइट्स की बात नहीं की। हमने हमेशा कर्तव्य की ही बात की है। जब आप अपनी पति के प्रति कर्तव्य निभाते हैं तो ऑटोमेटिकली प्रेम से वो भी आपके प्रति जो अपना कर्तव्य निभाती है। अभी तक जितनी हमने चर्चा की है काइंड ऑफ एक एक पड़ाव
(39:24) हमने पार किया है। इसमें हमने फेमिनिज्म पर बात की और हम ये जान गए कि ये जो फेमिनिज्म का मॉडल है ये वेस्टर्न मॉडल है क्योंकि ये बाइनरी में सोचता है। अगर ये अगर ये महिला के लिए सोचेगा तो उसमें पुरुष मरेंगे। पुरुष के लिए सोचेगा तो महिला मरेंगी। तो इनको जो धर्म का कांसेप्ट है जो स्पेक्ट्रम के साथ चलता है जहां पर आप एक एक पूरी पिक्चर देखते हैं केवल ब्लैक एंड वाइट में नहीं देखते हैं तो धर्म का कांसेप्ट जो भारतीय कांसेप्ट है वो ज्यादा इंपॉर्टेंट है क्योंकि अभी देखिए फेमिनिज्म जैसे-जैसे राइज करता है तो फैमिली वैल्यू्यूज राइज नहीं करती हैं।
(39:52) भले मैं यहां गलत हो सकता हूं लेकिन आप बताइएगा कि फेमिनिज्म जब आता है तो कहीं ना कहीं फेमिनिज्म ही नहीं लेफ्टिस्ट जो विचारधारा है वो कहीं ना कहीं फैमिली वैल्यूज को नीचे ही लाना चाहती है कि अगर जो ज्यादा इंडिपेंडेंट महिला है जो कमाने लगी कमाने वाली महिला है उसको किसी की आवश्यकता नहीं है। उसको फैमिली की आवश्यकता नहीं है। फिर आज आप देखिए इसका ये रिपकशन आ गया है कि लोग अपने सासससुर के साथ नहीं रहना चाहते या पति के साथ अलग ही जाके रहना चाहते हैं। तो फैमिलीज़ को किसी तरह से ब्रेक करना है। क्योंकि जब फैमिलीज में इंसान नहीं रहेगा तो फिर वह
(40:23) यूनिवर्सल कांसेप्ट्स को सोचना शुरू करेगा। फिर वो देश से ऊपर आएगा। तो ये कुछ कहीं ना कहीं लेफ्ट की विचारधारा है जिसने फेमिनिज्म को भी पोषित किया है। अब हम फेमिनिज्म से आगे निकलते हैं इस पड़ाव से क्योंकि जब उसका इतना रेलेवेंस है नहीं और अगर वो महिलाओं को मैं ये नहीं कहता हूं कि 0% ही 10% भी अगर वो कुछ फायदा दे रहा है तो अच्छी बात है। लेकिन जो 80 90% और विचार है जिन पर हमें बात करनी चाहिए जिससे जो भी बच्ची जो भी बालिका या स्त्री नारी इस पॉडकास्ट को देख रही हो जिससे उसके जीवन में सुधार हो। उस पर अब हम चलते हैं। अभी जैसे आपने बात किया कि सनातन धर्म
(41:00) में नारी को देवी कहा गया है। लेकिन कहीं ना कहीं हम यह भी देखते हैं कि जब भी रूढ़िवादिता आती है या फिर हम उसको केवल इतना कह के किनारे नहीं कर सकते हैं कि यह तो एक सामाजिक असामाजिक तत्व आ गया। क्योंकि उसको भुगता है स्त्रियों ने। आप देखिए तो हमेशा यही सिखाया गया कि पतिदेव होता है। चाहे वह शराबी ही क्यों ना हो। चाहे वो आपको मारता ही क्यों ना हो। पति को देव की नजरों से देखो। ज्यादा तेज मत बोलो। ज्यादा तेज मत हंसो। ज्यादा शॉर्ट स्पोकन रहो। और सीरियल टीवी सीरियल्स में अगर आप देखें तो जो ज्यादा तेज बोलती है वो उसको चालाक दिखाया जाता है। शातिर
(41:38) दिखाया जाता है। विलेन दिखाया जाता है। वही जो लड़का ज्यादा कनिंग होता है उसको हीरो दिखाया जाता है कि देखो इसका कितना तेज दिमाग है। तो ये बायसेस कहीं ना कहीं सोसाइटी में है। तो ये इस इसका क्या समाधान हो सकता है? और इतना जब हमारा सनातन धर्म जो जो वसुधैव कुटुंबकम की बात कर रहा है जीवों के प्रति अहिंसा की बात कर रहा है वो नारी को किस क्यों इस तरह से हमने इंबाइब किया एक ऐसे समाज ने जो इतना ओपन था ऐसी तुच्छ मानसिकताओं को कैसे हम अपने समाज में और परिवार में ले आए इस पर मैं चाहता हूं कि हम चर्चा करें कि हम कितना भी कह ले कि हमारा धर्म ऐसी बातें
(42:13) नहीं सिखाता है। बट एट द एंड ऑफ द डे कहीं ना कहीं आज महिलाओं को धर्म से ही चिढ़ होने लगी है क्योंकि उस उसके या तो वो धर्म का सही कांसेप्ट नहीं समझ पा रहे हैं या जो उनको बताया गया उसमें कहीं ना कहीं उसको दबाया ही जा रहा है। कंपैरिजन मैं नहीं करना चाहता कि इस्लाम में देखिए तो ये होता है अफगानिस्तान में तो ये होता है। मुझे कंपैरिजन वो मेरा है ही नहीं। वो वेस्ट का मामला है वो अपना समझे। बट भारतीय महिलाओं को कैसे हम यहां पर बेहतर बना सकते हैं। मैं बस हिस्टोरिकली ये जानना चाहता हूं कि सनातन धर्म ऐसा समाज क्यों क्रिएट किया जहां पर एक महिला को
(42:46) देवी कहते हुए भी इतना झेलना पड़ रहा है। सो सनातन धर्म ने ये कांसेप्ट क्रिएट नहीं किया। कल्चरल चीजें आई और वो हिस्सा बन गई। जैसे कि अभी मैं अंदर जो है एक गुड़िया को बता रही थी कि अगर मेरा और आपका जो है मेरे को आपको रेंट देना है। मैं आपके घर में रह रही हूं और हमारे लिखित में हुआ है कि 10 तारीख को देना है। लेकिन मैं आपको हर महीने एक तारीख को दे देती हूं। तो 12 महीने के बाद अगर मैंने आपको एक तारीख को नहीं दिया तो 3 तारीख तक आपका मेरे पास कॉल आ जाएगा। यह रीति हमने बना ली। ये लिखी भी नहीं थी। उसी प्रकार से सती प्रथा कहीं लिखी भी नहीं थी। किसी
(43:21) शास्त्र में घूंघट लेना कहीं लिखा हुआ नहीं है किसी शास्त्र में। यह कल्चरल इन्वेजंस के साथ आए और आपके कल्चर का हिस्सा बन गए। उसी प्रकार से किसी टेक्स्ट में यह बात नहीं लिखी है कि अधर्मी के साथ आपको जीवन बिताना है। कात्यायनी स्मृति हो या मनुस्मृति हो या फिर आपका जो है नारद स्मृति हो सब में इस बात की पुष्टि की गई है कि यदि आपका पति सन्यास ले लेता है। यदि आपका पति अधर्म के मार्ग को चुन लेता है तो स्त्री जो है उसको पूरी फ्रीडम है कि वो जो है आगे बढ़कर शादी कर सके या अपना नया जीवन स्टार्ट कर सके। तो ये तभी होगा देखिए अविद्या जितनी प्रॉब्लम्स हैं
(44:02) दुनिया में वो अविद्या से ही जन्म लेती हैं। तो अपनी संस्कृति को ना जाना जानना अपने शास्त्रों को ना जानना इससे जो है हम अविद्या की स्थिति में आ जाते हैं और समझते हैं कि इस चार दीवारी के बंधन में रहना ही अब मेरा भाग्य है। ऐसा कोई शास्त्र नहीं कहता है। और इसमें शब्दों का चुनाव भी जैसे आपने गृहस्वामिनी बोला और मैंने भी अथर्ववेद आदि में जब पढ़ा तो ये एक एमावरिंग वर्ड है गृहस्वामिनी रेदर देन अ हाउस वाइफ या होम लाइक कि स्वामी है वो किसी चीज की किसी चीज की और एक नई बहू के क्या अधिकार होते हैं इस अथर्ववेद में बहुत अच्छे से इंगित है और
(44:40) मैंने भी इस पे लोग बात तो करते हैं लेकिन लोग ये नहीं पढ़ते कि जो विवाह के मंत्र या वधू के कर्तव्य हैं उसका मंत्र दर्शन करने वाली ऋषि का कौन सूर्य सूर्य सावित्री तो हम ये बात ही नहीं कर रहे हैं कि जो नियम भी बनाए वो भी एक बनाए नहीं जो मंत्र दर्शन किया जिसके बारे में हमें जिसके बारे में हमें बताया गया वो हमें कहां से पता चला वो हमें एक ऋषिका के थ्रू पता चल रहा है तो फिर हम कैसे बोल सकते हैं कि हमारी सोसाइटी कभी ऐसी थी या इनवेडर्स आए और ऐसा करके चले गए जैसे सती प्रथा के ऊपर आया तो अथर्ववेद के 18वें कांड के तीसरे अध्याय का दूसरा मंत्र है
(45:11) ये जिसमें स्पष्ट कहा गया महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने भी पुणे में कहा था कि स्त्री वेद स्त्री को सती होने की आज्ञा नहीं देते। जैसे ही आपका पति जो जो आपका मृत पति है उसको आप दाह करके आप संसार की ओर गमन करो। ये चीज स्पष्ट कही गई है। और जब आपको बताया गया कि आपके यहां सती प्रथा थी ही नहीं। पर बार-बार बार-बार जो लेफ्टेस्ट मेंटालिटी है ये जानबूझ के कुछ ऐसी चीजों को उठाते हैं जो 300 400 साल पहले लिखी गई। ये वेदों के ऊपर नहीं जाते। अच्छा वेदों के ऊपर भी जाना है तो मैं ये बोलती हूं कि फिर पढ़ो निरुक्त फिर पढ़ो निरुक्त निघंटू फिर पढ़ो व्याकरण और फिर
(45:45) करो ना आप बात। आपको वो नहीं पढ़ना है। आप लाल पीली किताब उठाओगे और बोलोगे अरे ये तो सनातन धर्म में तो यह दिक्कत है। सनातन धर्म में तो वो दिक्कत है। जैसे आपने कहा कि हम कंपेयर नहीं करना चाहते। लेकिन ऑब्वियसली यदि आप टेक्स्ट उठाते हैं तो फिर मिलता है ना आपको फूड बाइंडिंग मिलती है। एफजीएम मिलता है। कहीं विच हंटिंग मिलती है आपको। 80,000 महिलाएं विच हंटिंग के नाम पर जला दी जाती है। लेकिन उसके ऊपर कोई बात नहीं करता है। उसके ऊपर सब साइलेंट है। और जहां कहीं चार पांच 10 15 केसेस मिलते हैं राजा राममोहन राय का ये जो लेफ्टिस्ट प्रोपेगेंडा है इसको खड़ा कर
(46:16) दिया जाता है कि नहीं नहीं भारत में तो सती थी। भारत में तो ऐसा था। भारत में तो ऐसा था। यदि सती का कांसेप्ट है तो फिर आपको क्यों नहीं मिलता कि दशरथ की मृत्यु के बाद उनकी तीनों रानियों ने सती कर लिया। क्यों नहीं हमें इतिहास में ऐसा मिलता कि जब हमारे राजाओं की मृत्यु हुआ करती थी या जो हमारे योद्धाओं की मृत्यु होती थी उसके बाद जो शत्राणियां होती थी वो जौहर नहीं करती थी वो युद्ध को वो शासन को संभालती थी राज करती थी रानी करणावती गढ़वाल की यदि आपने पढ़ा होगा नकटी रानी उन्हें कहा जाता है जब औरंगजेब ने गढ़वाल पर आक्रमण कर दिया उनके पति की मृत्यु हुई
(46:48) थी औरंगजेब को लगा कि अब तो अबला है क्या ही कर लेगी एक स्त्री क्या कर सकती है यही तो मुगलों की मेंटालिटी थी वो गए अपनी 30ज़ की सेना लेके रानी ने क्या किया? रानी ने 3000 सैनिकों की नाक कटवा के भेजा। इसीलिए उसका नाम हो गया नाक कटी रानी। लेकिन उस रानी की चर्चा कोई नहीं करेगा। हमें बताया जाएगा सती प्रथा थी। और ये कांसेप्ट क्यों स्प्रेड किया गया? ताकि हमारी जो वर्तमान जनरेशन है जो हमारी करंट जनरेशन है जिनको हम जेंसी कहते हैं। वो बेचारे बहुत ज्यादा सॉफ्ट हार्टेड लोग हैं। वो तो थोड़ा सा कुछ सुन लेते हैं। किसी पडकास्ट में किसी
(47:18) कल्पेट को भी सुन लेते हैं कि वो बेचारा थोड़ा मैनपुलेटिव बात कर रहा है या थोड़ा विक्टिम कार्ड प्ले कर रहा है। चाहे वो लड़की हो, चाहे वो लड़का हो। यहां पे जेंडर बायस नहीं है तो वो बेचारे सॉफ्ट हार्टेड हो जाते हैं। उनको लगता है कि नहीं नहीं यहां पे तो कोई गलती नहीं। इतने जल्दी मैनपुलेटेड हो जाते हैं। तो ऐसी जनरेशन जब ऐसे टेक्स्ट पड़ेगी जहां पे इतनी ब्रूटल बातें की गई हो कि पति के मरने के बाद पत्नी को जला दो। तो ऑब्वियसली वो लोग हमसे दूर होंगे। ऑब्वियसली महिलाएं हमसे दूर होगी। जबकि हमारे यहां कांसेप्ट आता है तो हमारे यहां
(47:46) जैसे पतिव्रता का कांसेप्ट है। पत्नीवता का भी कांसेप्ट है। जो हमें पतिव्रता सिखाया जाता है। बड़ी-बड़ी कथाएं होती है जिसके ऊपर आमतौर पे बताया जाता है कि एक स्त्री को पतिव्रता होना चाहिए। लेकिन वेदों में पत्निव्रता का भी कांसेप्ट है। एक पत्नीव्रत का भी कांसेप्ट है। यजुर्वेद के सातवें कांड का 37वें अध्याय का पहला मंत्र बोलता है कि एक पति को भी पत्निव्रता होना चाहिए। एक पत्नीव्रत धारण करना चाहिए। यदि हमारे वेद बोल रहे हैं पत्नीव्रत के ऊपर बात कर रहे हैं वो भी एक पत्नीव्रत के ऊपर तो आपको क्या लगता है जो ये एक्स्ट्रा मैरिजेस होने का रिवाज है ये
(48:16) क्या हमारा है? ये नहीं है। ये जो मध्यकालीन इतिहास आया इसमें सब डिस्टर्ब होता चला गया। राजा राम की एक पत्नी हुई सीता। हमने उसको विक्टिमाइज कर दिया। सीता बेचारी उसको ऐसा दिखा दिया गया कि सीता तो कुछ है ही नहीं। मां रामायण में उनके लिए योगिनी शब्द का वर्णन है। उनके उपनयन संस्कार का वर्णन है। उनके बारे में बताया गया है कि वो एक शूरवीर थी। वो एक योद्धा प्रकार की स्त्री थी। अपने पति का चयन कैसे किया? अपने पति के चयन के लिए उन्होंने स्वयंबर किया। ऐसे ही नहीं चुन लिया। खूटे के बैल की तरह नहीं बांधी गई थी। मतलब चुनने का अधिकार दिया गया। तो
(48:48) मुझे ऐसा लगता है कि ये जो आक्षेप लगते हैं या आक्षेप इसीलिए लगते हैं कि आक्षेप लगाने वाले ठीक से पढ़ते नहीं है इतिहास को। यदि वो पढ़े तो मुझे ऐसा लगता है कि वहीं उनके मुंह पर टेप लग जाएगा। और दूसरी बात यह है कि हमें यह समझना है कि वेद शब्द हैं। पुराण जो हैं वो उसी प्रकार से हैं जैसे कोई पीएचडी स्कॉलर अपनी थीस लिखता है। यानी ऋषि मुनियों के अपने विचार पुराणों में है। लेकिन पुराण में भी सिंबलिज्म है। जो सती की घटना के ऊपर आप सती प्रथा की बात कर रहे हैं वो बिल्कुल भिन्न है उससे जो आपने उसको इंटरप्रेट किया है। सती में सती देवी जो हैं वो दक्ष
(49:21) प्रजापति के यज्ञ में अपनी आहुति देती हैं। कोई उनको फोर्स नहीं करता और वो आहुति का जब आप फिलॉसोफिकल इंटरप्रिटेशन करते हैं तो सती का अगर आप पूरा कैरेक्टर पढ़ते हैं शिव पुराण में तो उनके अंदर चंचलता बहुत होती है। उनके अंदर अहम बहुत होता है। जब वो अपने को वहां पे अग्नि को समर्पित कर देती हैं। वहीं से पार्वती का जन्म होता है। वहीं से सहनशील आदि शक्ति जिसको 10 महाविद का ज्ञान मिला था उस देवी का जन्म होता है। तो इट इज़ अ सिंबॉलिक अह एक्सप्रेशन। इट डज़ नॉट मीन के वहां पे जलाने का मतलब लिटरली जला जलाना था। राइट? यह समझना भी बहुत जरूरी है कि हम उसको सही
(50:05) तरीके से इंटरप्रेट करें। अह जो मुझे समझ में आ रहा है, देखिए, यहां पर समस्या तो मुझे साफ़-साफ़ दिख रही है कि जो वेस्टर्न अह इंटरप्रिटेशन है, वह उतना अच्छा नहीं है या फिर उन्होंने जानबूझ के किया है अपने मोटिव से या फिर जैसे कि निरुक्त नहीं आप पढ़ेंगे, व्याकरण नहीं पढ़ेंगे तो वेदों को तो इतना आसान नहीं है। स्वामी जी भी पूरा जीवन लग गया उनका और वो पूरी तरह से चारों वेदों का नहीं कर पाए। लेकिन यहां पर फिर भी यह प्रश्न रह जाता है। हम बाहरी लोगों को छोड़ भी दें। वो हमारे ऊपर क्या टीका टिप्पणी करते हैं या हमारे समाज को कैसे दूषित करना चाहते हैं।
(50:39) लेकिन अपने भी तो हैं। अपने भी तो लोग हैं जो पढ़े हैं ग्रंथों को और उसके बाद बोलते हैं स्त्रियां पाप की योनि है और इनको मोक्ष नहीं मिलेगा। इनको मोक्ष के लिए पुरुष बनना पड़ेगा। ये वेद मंत्र नहीं पढ़ सकती। गायत्री मंत्र नहीं पढ़ सकती। इनका उपनयन संस्कार नहीं होना चाहिए। ये तो बाहर वाले नहीं कह रहे हैं। ये तो अपने ही आचार्य गुरु कह रहे हैं। और ऐसा ये भी नहीं है कि नहीं कहा गया। मैं अपनी तरह तरफ से फैब्रिकेट कर रहा हूं। बोला ही जाता है। तो इस पर क्या किया जाए? ये तो अपने लोग भी तो स्त्रियों को दबा ही रहे हैं। तो मेरा तो इसमें मैं ये मेरा
(51:11) दृष्टिकोण है। कोई गेरवा कपड़ा पहन के तिलक त्रिपुण लगाकर यदि बैठा है वो ज्ञानी है ऐसा आप अनुमान नहीं लगा सकते। यदि वो जीव करुणा की बात नहीं करता। यदि वह विश्व बंधुता की बात नहीं करता तो वो ज्ञानी तो नहीं हो सकता क्योंकि ज्ञान जोड़ता है। ज्ञान तोड़ता नहीं है। सो मोस्टली जो कथावाचक हैं जो इस प्रकार की बातें कहते हैं जैसे मैंने पहले भी बताया कि वो तो एक कोर्स करके आते हैं और उनका कोर्स करने का उद्देश्य यही होता है कि हम कथा कथावाचक के रूप में स्थापित हो जाएं। खूब धन आए लोगों को बोले माया छोड़ दो स्वयं माया में लिप्त रहें। और अन्य लोग भी जो हैं
(51:49) अगर कोई किसी पदवी पर भी बैठा है कोई शंकराचार्य है कोई एक्स व जेड है उनको शास्त्र याद हो सकते हैं लेकिन पोथी पढ़ पढ़ जगमु पंडित भयो ना कोई आप कितने भी शास्त्र पढ़ लीजिए यदि आपने करुणा का पाठ नहीं सीखा मैत्री का पाठ नहीं सीखा विश्व बंधुता का पाठ नहीं सीखा तो आप अज्ञानी ही रहेंगे सो इसलिए जो है जब आप यह कहते हैं कि वो लोग कहते हैं पाप योनि पाप योनि का अर्थ क्या पाप पाप जो है किस प्रकार से आप पाप योनि है? यदि स्त्री पाप योनि है तो संपूर्ण ब्रह्मांड पाप योनि है। क्योंकि आप भी स्त्री की योनि से ही प्रकट हुए हैं। एक
(52:26) श्वान जो है वो भी स्त्री की ही योनि से प्रकट हुआ है। एक चींटी भी स्त्री योनि से ही प्रकट हुई है और यहां इस संसार में जितने जीव जंतु हैं वो स्त्री योनि से ही प्रकट हुए हैं। अर्थात जितना संसार है वह पाप योनि में है। अर्थात जो बात कर रहा है, जो बोल रहा है वह भी तो पाप योनि की ही उत्पत्ति है। तो उसके शब्द भी पाप योनि की ही उत्पत्ति है। तो किस चीज का खंडन कर रहा है? वह स्वयं का ही खंडन कर रहा है। स्त्री को पाप योनि कह के। तो यह विचार करने का विषय है कि आप में करुणा नहीं है। हमारी बड़ी हम मूर्ख हैं। हम लोग किसी को भगवे कपड़े में देखते
(53:03) हैं तो सोचते हैं कि ये मनुष्य जो है यह कोई गुरु है। यह कोई ज्ञानी है। ऐसे गुरु ज्ञानी नहीं बनते। जींस और टीशर्ट में बैठा हुआ इंसान आपके जैसा भी ज्ञानी हो सकता है। आवश्यकता नहीं है कि वह त्रिपुंड या फिर रुद्राक्ष या फिर स्फटिक की माला को ग्रहण करें तभी वह ज्ञानी है। देखिए जहां तक धर्म को मैं देखती हूं तो धर्म धारण करने के सिद्धांत हैं। धर्म पाखंड नहीं है। धर्म दिखावा नहीं है। यदि पाखंड को हम सर्च करने जाए तो वेद विरुद्ध आचरण ही पाखंड कहलाता है। तो ऐसा आचरण मेरा एक छोटा सा एक्सपीरियंस बताती हूं। मैं बहुत छोटी उम्र में अध्यात्म के लिए
(53:38) मैं घर से बाहर गई थी। मैं हरिद्वार में मेरे लगभग छह साल व्यतीत किए हैं मैंने। तो वहां मैं एक बार गंगा जी में खड़े होकर मेरी आदत थी। मैं गंगा मैया को बहुत मानती थी और मैं काली माता की बहुत मतलब मैंने भक्ति की है। उसके बाद जब मैं तर्क पूर्ण हुई थोड़ा मैंने धर्म को समझा तो मुझे समझ में आया कि काली क्या है? अंदर से जिसको इनफोर्स करना है अंदर से जिसको जगाना है वो काली है। मैं गंगा जी में खड़े होकर गायत्री मंत्र जम रही थी और मेरी आदत है कि मैं उच्चारण करके जपती हूं। मुझे किसी ने बताया नहीं सिखाया नहीं। मैं गायत्री
(54:06) मंत्र पढ़ रही थी। कोई आए वो अपने आप को किसी मठ से बोल रहे थे कि ऐसा है। बोले आपको पता है स्त्रियों को अधिकार नहीं है गायत्री मंत्र का। मैंने कहा क्यों? बोले नहीं है पाप लगेगा। मैंने कहा किसी मंत्र को पढ़ने से मैंने कहा आचार्य जी किसी मंत्र को पढ़ने से किसी स्त्री को पाप लगेगा तो फिर मंत्र बनाए ही क्यों है? और ये मंत्र किसने बनाया? बोले ईश्वर द्वारा रचित है। तो मैंने कहा ईश्वर बायस्ड है क्या? और मैं छोटी थी उस समय 16 साल की समथिंग 15 साल की मेरी ऐज थी। मैंने कहा ईश्वर बायस्ड हुआ फिर तो फिर कहा फिर तो जो आपका ईश्वर है वो जिसको आप सार्वभौमिक
(54:38) बोल रहे हो जिसको आप सर्व्यापक बोल रहे हो जिसको आप दयालु बोल रहे हो वो दयालु नहीं है क्योंकि वो बायस्ड हो रहा है वो मैनस के लिए अलग राइट बना रहा है वुमस के लिए अलग राइट बना रहा है और किसी मंत्र को पढ़ने से कोई पाप का शिकार हो जाए या किसी को कुछ हानि हो जाए ऐसा मैंने तो नहीं देखा कभी कि कोई मंत्र पढ़ने से मंत्र बहुत तार्किक होते हैं। मंत्रों को बहुत अलग तरीके से देखा जाता है। जो मंत्रों का दर्शन करके आए ऋषिकाए या जिन ऋषियों ने उसका दर्शन किया वो यह समझते हैं कि वो मंत्र बहुत डीप थे। वो समझने का विषय थे। वो जपने का विषय नहीं थे। आज हमने जपने का
(55:09) विषय बना दिया। आज माला ले के कंठी माला ले के सब जप रहे हैं। ठीक है? आपकी खुशी के लिए आप जपो। लेकिन किसी भी चीज का मीनिंग समझना बहुत जरूरी है। आज राम को हमने केवल जय श्री राम का नारा बना के रख दिया है। आज राम हमारे लिए वो नहीं है कि भारत का प्रत्येक भारत का प्रत्येक व्यक्ति राम को अपना आदर्श बनाकर मर्यादा पुरुषोत्तम वाला आचरण करे। आचरण में राम नहीं है। आज चित्र में राम है। चरित्र में राम नहीं है। तो ये जो कांसेप्ट आया ना कि चित्रण करने का कांसेप्ट किसी भी चीज का चित्रण कर दो। किसी भी चित्र चीज का गायन कर दो। अच्छा गायत्री मंत्र का सिंपल सा
(55:39) जो अर्थ आता है मुझे एक गुरुकुल के आचार्य ने बताया था अच्छे से एक्सप्लेन करके कि वहां जो बोला गया है धियो योन प्रचोदयात। हम सभी को बुद्धि दो। बुद्धि बल प्रदान करो। तो क्या बुद्धि बल केवल पुरुषों के लिए है? स्त्रियों के लिए नहीं है। फिर आप बात करते हो कि हमारे यहां तो देवी भी है। हमारे यहां तो देवी के अवधारणाएं कहीं उभय भारती जी की बात आती है तो वो कह देते हैं वो तो एक्सेप्शन है। फिर अपाला गोशा विश्वरा मैत्री लोपा मुद्रा गार्गी और रोमशा अपाला वाक अभ्रणी ये जितनी भी आती है जितने सुक्त आते हैं देवी सुक्त आते कहीं कोई सुक्त आ रहा है या विवाह के
(56:11) मंत्रों को दर्शन करने वाली सूर्य सावित्री आ रही है तो ये कहां से आ जाती है फिर? मुझे यह समझना है इन लोगों से कि एक्सेप्शन में क्यों डाल देते हो? सोसाइटी में जब भी कोई लड़की अच्छा काम करती है तो उसको एक्सेप्शन में डाल दिया जाता है। लेकिन जो गलत कर रही है तो सारी महिलाएं ऐसी होती हैं। एक्सेप्शन नहीं होना चाहिए। आपको रिस्पेक्ट होनी चाहिए। आपको समझ होनी चाहिए और समझ नहीं है। तो मुझे ऐसा लगता है मैंने कई लोगों को देखा सोशल मीडिया पे आपने भी देखा होगा झगड़ते रहते हैं। महिलाओं का अधिकार है। महिलाओं का अधिकार नहीं है। महिलाओं के लिए ये चीज होनी
(56:40) चाहिए। महिलाओं के लिए वो चीज होनी चाहिए। बोल कौन रहा है? पुरुष। जिसे अपने खुद के कर्तव्य नहीं पता है कि शास्त्रों में पुरुष को कैसे होने का बताया गया है। यहां पर बात आती है ब्रह्मचर्य आश्रम की। पहला आश्रम है वर्णित है। पुरुषों को गुरुकुल में जाकर ब्रह्मचर्य आश्रम की विद्या लेनी चाहिए। आज कौन ब्रह्मचर्य का पालन कर रहा है? हम पालन नहीं कर रहे लेकिन हम दूसरे को सिखाएंगे कि तू ये कर। तो ये जो कांसेप्ट है ये सनातन धर्म का नहीं है। पहले स्वयं सुधरो फिर दूसरों को सुधारो और जो स्वयं नहीं सुधरा हुआ है। जो Instagram सोशल मीडिया पे महिलाओं को गाली बा गा-
(57:09) गाली देते रहते हैं। कुछ भी बोलेंगे। किसी ने कुछ गलत क्या बोल दिया तो नीचे गाली भरी लाइनें लिखना शुरू कर देंगे या महिलाओं का अपशब्द बोलेंगे। वो अपने आप को सनातनी कहने लगते हैं। एक और बात मैं यहां कहना चाहूंगी कि हमारी जो स्त्रियां हैं हमने ना क्या किया है? शास्त्रों को और वेस्टर्न थॉट को पूरा मिक्स अप करके कुछ अलग सा बना दिया है। आप अगर ज्योतिष शास्त्र को देखते हैं तो 12वें घर की स्वामिनी काली हैं। वो मोक्ष का घर है। आप अगर दुर्गा सप्तशती देखते हैं। कहते हैं सारे शास्त्र एक तरफ और ओम ऐंग हिंग कृ चामुंडाय विच्चे यह मंत्र एक तरफ नवारण
(57:45) मंत्र आप किसी भी चीज की सिद्धि इस मंत्र से कर सकते हैं। और ऐंग यहां पर जो है वह सरस्वती हैं। हिंग यहां पर जो है वो लक्ष्मी है। क्लीम यहां पर जो है वो काली है। चामुंडाय विचे तो यहां तो पूरा जो देवी मंत्र है वो एक बहुत पावरफुल शक्तिशाली मंत्र है। आपने कैसे ये बात मान ली कि स्त्रियों को जो है कमतर बताया गया है या वेद पढ़ना जो है वो स्त्रियों के लिए ठीक नहीं है। ये तो केवल पुरुष प्रधान समाज अब बन गया है। तो वो अपनी प्रधानता दिखाना चाहते हैं। उसमें सॉरी टू से हमारे जो शंकराचार्य हैं चार मठों के उनकी भी बहुत बड़ी भूमिका है। जब आदि जगत गुरु
(58:26) शंकराचार्य घर को छोड़ते हैं तो वह अपनी माता के बिना जो है जब तक वो उनको जो है नहीं देती कि ठीक है तुम जाओ सन्यास ग्रहण करो वो तब तक वहां से निकलते नहीं है कालड़ी से लेकिन इन्होंने जो कहा कि नहीं स्त्री जो है स्त्री का अधिकार ही नहीं है वेद पढ़ने का पहली गुरु शंकर जो माधवा आचार्य शंकर दिग्विजय है उसमें पहला गुरु आदि शंकर का उनकी माता आर्यंब को बताया गया है तो सारी सारी जो 10 महाविद्याओं का ज्ञान था शिव ने पार्वती को दिया था। तो आप किस प्रकार से क्या पार्वती आप सोचते हैं कि उनको वेद नहीं आते होंगे तो जब ये मैं शंकर मठ वालों के सामने रखती हूं। वो
(59:05) कहते हैं नहीं नहीं वो स्पेशल केस है। ये स्पेशल और यू नो कॉमन केस क्या होता है? आप सब जो है उस परबह्म स्वरूपिणी की योनि से ही पैदा हुए हैं। जितने जीव जंतु हैं और वेदों में तो पशु पक्षी भी दृष्टा रहे हैं मंत्रों के। तो आप कैसे विभाजन कर सकते हैं इस प्रकार का? यह दिखाता है कि उनकी मंशा जो है वह शुद्ध नहीं है। सात्विक मंशा नहीं है इन लोगों की। तो गुरु को मेरा ऐसा कहना है जो गुरु आपके मन में द्वैतवाद को डाले उसको त्याग दीजिए। जैसे जगुरु आदि शंकर भी कहते हैं ना वेदा ना यज्ञा न में जाति भेदा पिता न में मैं न माता ना जन्मा ना
(59:44) बंधुर ना मित्रम गुरु न शिष्य ये आत्मा ही आपकी गुरु है चिदानंद रूप शिवोहम शिवोहम एक तो दिक्कत है हमारी सोसाइटी का कि हमारे जो थोड़े बहुत 300 साल पहले हम जाते हैं हमारे पूर्वज गलत लिखना सीख गए ठीक है अब गलत पढ़ना सीख रहे हैं और आगे वाली पीढ़ी गलत को जस्टिफाई कर रही है तो ये जो जस्टिफिकेशन चल रहा है ना जैसे कि हम सिंपल सी बात आपने बताई कि सारे कांसेप्ट में बता दिया गया जैसे बहुत अच्छी बात इन्होंने बोली कि स्त्री के ही रज से जन्म लेने के बाद वो कह रहा है कि स्त्री अपवित्र है। तो ये जो कांसेप्ट आता है ये जो हिला हुआ कांसेप्ट है हिलता हुआ
(1:00:20) कांसेप्ट ये आता कहां से है? ये हमारा कांसेप्ट तो कभी नहीं था। क्योंकि राम यदि प्रसिद्ध है तो कौशल्यानंदन राम कहा जाता है। यशोदा कृष्ण कहा जाता है। जब वहां पर कृष्ण और राम भी अपनी माता के कारण पूजित हो रहे हैं। जहां सीता के लिए योगिनी शब्द का वर्णन है। जहां जहां महाभारत में सिद्धा नाम की पंडिता मिलती है। ऋषिका मिलती है। महाभारत में वर्णन मिल जाता है। यदि उसके पहले जाते हैं तो श्रुतावली पंडिता मिलती है। हमें कई सारे प्रमाण मिलने के बाद भी हम क्यों यहां पर आके अटक जाते हैं? जैसे कि हमें गार्गी मिलती है। यज्ञवलक से शास्त्रार्थ करते समय हमें
(1:00:52) मैत्रई मिलती है। हमें इतने एग्जांपल आने के बाद भी रीसेंट करंट जनरेशन जो है आज बात करें तो आज मुझे ऐसा लगता है मध्यकालीन इतिहास के बाद इसको बहुत ज्यादा जस्टिफिकेशन एक होता है ना कि एक सेपरेटाइज कर दिया गया कि ये तुम करो ये तुम मत करो। ठीक है? आपने इनविडर्स के आने के कारण कुछ चीजें की लड़कियों को घर में रखा। लेकिन उसके बाद जब वो निकली तब तो आपको समझना चाहिए था। आप यदि शास्त्रों की बात करते मैं तो बोलती हूं मैं इतनी ज्ञानी नहीं हूं। जिसको लोग मुझसे झगड़ने आ जाते हैं। नहीं नहीं आप शास्त्रार्थ करने आओ। मैं बोलती हूं मैंने वेद नहीं
(1:01:22) पढ़े। मैंने निरुक्त और व्याकरण नहीं पढ़ा है। जिन्होंने पढ़ा है उन्होंने मुझे बताया है। तो यदि आपको दिक्कत है तो जाओ दर्शनाचार्यों के गुरुकुलों में जाओ। आज भी महिलाओं के गुरुकुल चल रहे हैं। आज भी स्त्रियों के गुरुकुल चल रहे हैं। एक आचार्य डॉक्टर सुकामा जी है। वो पद्मश्री अवार्डेड है। उन्होंने 4000 बच्चियों को वेद पढ़ाए हैं। तो जाओ कभी उनके आगे करो कभी प्रश्न। आपको जो दिक्कत है तो उसको एकदम ऑनलाइन ऑनलाइन लेवल पर करो ना उसको पूरी दुनिया को दिखाओ फिर रखो वहां पर तर्क वहां नहीं रखेगा कोई तर्क वहां चुप हो जाएंगे विशाल जी एक बात और मैं यहां
(1:01:53) कहना चाहूंगी कि जैसे मैं आपसे कहती हूं देखिए विशाल वो मेरा घर है ये उंगली जो है यह संकेत करती है मेरे घर की तरफ यह मेरा घर नहीं है उसी प्रकार से जो शास्त्र हैं जो वेद हैं पुराण हैं ये केवल परम सत्य की तरफ संकेत करते हैं इनमें उलझ मत जाना सत्य की तरफ तरफ अपनी दृष्टि रखना। तुम अगर इसमें उलझ जाओगे, इन्हीं को सत्य मान लोगे तो जो परम सत्य है उससे वंचित हो जाओगे। सत्य को वैसे भी अनिर्वचनीय और अकल्पनीय शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है। बार-बार हमारे ऋषि मुनियों ने कहा है और अभी जितना मुझे इस पड़ाव पे मतलब ये एक दूसरा पड़ाव यहां पर खत्म हो रहा है। यहां
(1:02:31) पर मुझे यह समझ में आ रहा है कि धर्म को लेकर जो अज्ञानता है उसका बहुत दुष्प्र हुआ है और केवल महिलाओं पुरुषों ने नहीं महिलाओं ने भी मतलब दोनों तरफ से किया गया है। आज आप सोशल मीडिया पे देखिए ऐसे बहुत ढेर सारे आपको अकाउंट्स दिखेंगे कि डेली उनकी रील्स आ रही है। नग्नता फैला रही हैं। और एक फोटो आ जाएगी कि इस मंदिर में जाके साड़ी पहन के और सलवार सूट पहन के म्थ टेक लिया। फिर अगले दिन से नग्नता आ रही या पुरुषों के केस में देखिए तो गंदी गंदी गालियां दे रहे हैं और जय श्री राम लिखा है। वो जो ये सोशल सनातनी वाला जो एक एक बहुत गंदा कल्चर आया है उससे भी क्या
(1:03:06) है कि धर्म के प्रति लोगों के मन में घृणा आती है कि भाई ये इतने बड़े धार्मिक व्यक्ति हैं। बड़ा-बड़ा स्टेटस डालते हैं लेकिन इनके आचरण ऐसे हैं। तो जो आपने बोला कि श्री राम जी तो हम पूज रहे हैं लेकिन हम आदर्श नहीं बना पाए और उनकी तरह हम चल नहीं पाए। तो ये भी एक बहुत बड़ा कारण बन जाता है कि धर्म से लोग विमुख होने लगे हैं। हमने महिलाओं पर जो एनवायरमेंट का प्रभाव है उस पर चर्चा की कि कोई फेमिनिज्म लेकर आता है तो उसका क्या प्रभाव है एक महिला के जीवन पर। धर्म धर्म एज इन वह एक कॉस्मिक ऑर्डर नहीं धर्म मतलब जो रिचुअल्स हैं या फिर जो आपको एक समाज
(1:03:47) में बांधने के जो नियम है वो आते हैं तो महिलाओं को के लिए क्या सोचते हैं? अब हम इंटरनली थोड़ा जाते हैं बाहर से नहीं। इंटरनली महिलाओं की साइकोलॉजी पर भी कुछ एक दो प्रश्न है मेरे। जैसे कि मैं वंदना जी आपसे ही पूछूंगा कि बचपन से ही जो हमारे बीच में बालिकाएं हैं उनके मन में यह रहता है कि बड़े हो के मिस वर्ल्ड बनना है। एक अच्छी अभिनेत्री बनना है। माधुरी दीक्षित बनना है। तो ये ये माइंडसेट जो है मुझे कहीं ना कहीं लगता है ये इतना सही माइंडसेट नहीं है क्योंकि एक केवल आपको एक मॉडल बनना है। सुंदर-सुंदरता एक स्त्री को सुंदर होना
(1:04:24) चाहिए। इसकी वजह से क्या होता है कि बहुत सी ऐसी भी स्त्रियां होती हैं जो नहीं उतने रंग रूप से जो एक समाज की एक कसौटी है उस पर उतनी अच्छी हैं। तो वो बचपन से ही उसी उस गिल्ट में रहती हैं और उनके लिए तो फेमिनिज्म तो कुछ कर नहीं रहा है या कुछ इस तरह से ऐड ऑन कर रहा है। तो आपको क्या लगता है कि कैसे बालिकाओं के मन से केवल सुंदरता के प्रति जो एक है और उसको लेकर एक ब्यूटी पे एजेंट बनाना और फिर सुंदरता का वहां पर मापन करना भले वहां पर आपसे दो चार इंटेलेक्चुअल क्वेश्चंस भी वो भी उनका प्रोपोगेंडा ही रहता है एक आईडियोलॉजी का
(1:04:58) अभी हमने रिचल एक न्यूज़ गुप्ता का देखा कि कितना हैरास हुई वो शायद उन्होंने अपना वापस भी कर दिया तो ग्लैमर की दुनिया लोगों को पसंद है और विशेषकर ग्लैमर जो है वो एक बालिका चाहती है कि वो आगे जाके एक एक्ट्रेस बने, मॉडल बने। लेकिन उसको नहीं पता है कि उसकी आड़ में क्या-क्या हो रहा है। तो इस माइंडसेट से कैसे बच्चियों को निकाला जाए। सो यहां दो पार्ट्स में मैं इसका आंसर करूंगी। पहले तो यह जो ब्यूटी पैजेंट्स हैं, यह कितने गलत हैं। एक्चुअली जब देखा जाता है कि भारत के अंदर अभी भी बहुत सारे ऐसे क्षेत्र हैं जहां लोग नेचुरल ब्यूटी स्टैंडर्ड्स को फॉलो करते
(1:05:35) हैं। वहां बहुत ज्यादा कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स नहीं बिकते हैं। तो उसी साल लोरियल या ये सब जो हैं एक बड़े पैजेंट में भारत की किसी नारी को मिस वर्ल्ड या मिस यूनिवर्स बना देते हैं। अब जैसे ही वो भारत की नारी मिस वर्ल्ड या मिस यूनिवर्स बनती है तो बच्चे उसको आइडियलाइज करने लग जाते हैं। यह जो आइडियलाइजेशन भी होता है, यह बहुत अननेचुरल होता है। क्योंकि अगर आप खजुराहो जाएं या अन्य मंदिरों में जाएं तो स्त्रियों के जो आप वहां पर स्टोन काविंग्स देखेंगे तो आप उसमें देखेंगे कि भारत की स्त्रियां कभी बहुत ज्यादा स्लिम नहीं रही हैं। उनके हिप्स हैवी थे। उनके
(1:06:10) बॉसम्स हैवी थे। एक्सट्रा एक्सट्रा लेकिन यहां पर एक मापदंड दिया जाता है गोल्डन रेशो फेस के गोल्डन रेशो का कि आपकी आंखें बड़ी होनी चाहिए, नाक पतली होनी चाहिए, लिप्स मोटे होने चाहिए। आजकल जितनी एक्ट्रेसेस को देखेंगे सब वो गोल्डन रेशो अचीव करने के चक्कर में सब एक जैसी लगने लगी हैं। आपकी कमर इतनी हो। इंडियन वूमन वास नॉट सपोज्ड टू बी वेरी टॉल। लेकिन अब हमने अननेचुरल ब्यूटी स्टैंडर्ड्स बना डाले हैं। और अब क्या होता है? घर में मासी चाची मामी बचपन से ही बच्ची को कहती है हाय कितनी काली है तेरे से कौन शादी करेगा हाय कितनी मोटी है कैसे शादी होगी
(1:06:46) तुम्हारी इस प्रकार की बातें वो करती है यानी कि बच्चे को पहले से ही यह बताया जाता है कि बाहर से अगर तुम सुंदर हो तो ही समाज में तुम्हारी वैल्यू है अदरवाइज नहीं है। वह जब तक कॉलेज में आती है, वह अपने ऊपर पूरा कंसंट्रेशन उसका सारा जो है ध्यान उसकी सारी जो है मेहनत इसमें झोंक दी जाती है कि मैं सुंदर कैसे लगूं, अट्रैक्टिव कैसे लगूं। और जब उसको फ्रेंड से मिलता है कि यार तुम तो बहुत सुंदर लग रही हो आज। तो उसको जो है एक डोपामिन हां उसको डोपामिन नहीं उसको एक वो सुनिश्चित होती है कि हां मैं भी कहीं ना कहीं मेरी भी कोई वैल्यू है लेकिन जब तक वो 30 साल
(1:07:24) की होती है और ये चेहरा ढलने लगता है और ये खाल लटकने लगती है और बालों में सफेदी आने लगती है तो उसको उसकी वैल्यू धीरे-धीरे समाज में लोगों में घटने लगती है। अब क्या है जो उससे छोटे उम्र की लड़कियां हैं उनसे वो जेलस होने लगती है। अब वो और डिप्रेशन में जाने लगती है। अब जिस पति ने उसके रूप से उससे प्रेम किया था अब वो उसकी तरफ ज्यादा ध्यान देता नहीं क्योंकि शादी गलत कारणों की वजह से हुई थी रूप से तो कैसे ध्यान दें? उसने कभी भी अपना समय अपना तप अपना त्याग इस बात में नहीं लगाया कि मैं बौद्धिक विकास करूं। मैं आत्मिक विकास करूं। मैं आंतरिक यात्रा
(1:08:00) को प्रारंभ करूं। नहीं। तो इसलिए जब तक वो 40ज में पहुंचती है वो एक बहुत ही जेलस बहुत ही कटु बहुत ही कड़वी स्त्री बन चुकी होती है। इस सब का प्रारंभ हमारे बचपन से होता है। और यह जो अननेचुरल ब्यूटी स्टैंडर्ड्स हमने खड़े किए हैं कि स्त्री की कमर इतनी होनी चाहिए वो दीपिका पादुकोण जैसी लगे तभी वो खूबसूरत है। आप सब ब्यूटीफुल हैं ऑलरेडी। आप अपने सत्य स्वरूप को पहचानने का प्रयास करें। तप करें, त्याग करें, पढ़ाई करें, लिखाई करें, हायर एजुकेशन में जाएं। हमारी लड़कियां हायर एजुकेशन में है ही नहीं। यू विल बी सरप्राइज़्ड पीएचडी में आपको
(1:08:38) लड़कियां नहीं मिलती हैं। इक्का-दुक्का लड़कियां मिलेंगी केवल। आप किसी भी बौद्धिक अ मंच पर जाएं। वहां पे लड़कियों की संख्या आपको कम ही मिलती है। क्योंकि उनको फंसा दिया गया है कि देखो तुम इसमें रहो। इसमें अटक जाओ। अपने सुंदरता में अटक जाओ। कपड़ों में अटक जाओ। तो बाकी तो पुरुष देख ही लेगा और वो देख ही लेता है फिर वहां पर। आप वंदना जी बिल्कुल सही कह रही हैं क्योंकि जैसे कि अभी मैं एक लाइव एग्जांपल दूं जैसे हम लोग हाइपर चैनल पर बात कर रहे हैं। अगर मैं अपना इसके एनालिटिक्स भी दिखाऊं तो मेरे चैनल पर 25% फीमेल ही देखती हैं। उनकी व्यूअरशिप है।
(1:09:16) जबकि ऐसा नहीं है कि मैं मेल्स के लिए कंटेंट बना रहा हूं। बाय फिलॉसफी इंडियन हिस्ट्री थोड़ा विज्ञान की बातें अपने देश की बातें तो हम जब इन पर बातें कर रहे हैं तो मैं भी चाहूंगा कि मेरे चैनल पर मतलब 50-50 एटलीस्ट तो होना ही चाहिए कि मेल फीमेल दोनों देख रहे हो। फिर मन में ये आया कि हो सकता है कि मोबाइल ना हो। लेकिन मुझे ऐसा लगता है ये इतनी बड़ी प्रॉब्लम अभी नहीं है कि 18 के ऊपर बच्चियों के पास मोबाइल नहीं है या फिर तो यही माइंडसेट में बात कर रहा हूं कि जो बचपन में ही आपको ब्यूटी के पीछे फंसा दिया गया ना आप उसमें क्या होता है कि आप जो जहां पर
(1:09:49) इंटेलेक्चुअल कंटेंट है जहां पॉलिटिक्स की बात हो रही है जहां पर फिलॉसफी की बात हो रही है जहां पर समाज की बात हो रही है या तो वहां पर महिलाएं फिर जैसे आपने बोला बड़े-बड़े मंचों पे कम दिख रही हैं तो इस पर आप आपकी क्या अंडरस्टैंडिंग रहिए। आप इतनी बच्चियों से मिलते हैं कि क्यों इस तरह से वो ऐसे विषयों पर नहीं बात करती हैं। जी अभी करेंटली हम लोग वेबिनार करते हैं। ऑनलाइन करते हैं। हमारे पास काफी बच्चियां जॉइन होती हैं। जब हम उनको कुछ बताते हैं बेसिक्स लाइक हमारी हिस्ट्री के बारे में बताते हैं। वो बच्चियां लिटरली रो देती है। मेरे पास एक्सपीरियंसेस हैं।
(1:10:21) मेल्स हैं। मैं आपको भेज सकती हूं कि वो बच्चियां रो देती हैं। कॉल करती है। मैम प्लीज एक बार कॉल कर लो। कॉल करते हैं तो वो ये बोलती है कि मैम हमसे ये क्यों छुपाया गया? हमसे हमारी हिस्ट्री क्यों छुपाई गई? एक रानी थी हमारी हिस्ट्री के बारे में। बेसिकली मैं वहां से शुरू करना चाहूंगी कि सब कुछ है साइकोलॉजी बेस्ड। यह समाज जो है ना हमारा यह समाज ने ऐसा वातावरण बना के रखा है, डिमांड बना के रखी है। हम वुमन एंपावरमेंट का जो सेक्शन देखते हैं, यह वुमस का सेक्शन नहीं है। यह बेस्ड ऑन है मेंस के ऊपर कि एक पुरुष अपने जीवन में किस प्रकार की स्त्री चाहता है।
(1:10:53) वो अपनी बेटी को किस तरीके से बनाना चाहता है। यदि कोई लड़की नाच गा रही है, मुजरा कर रही है, अपने पिता के साथ कंटेंट बना रही है और अपने आप को कंटेंट क्रिएटर बोल करके कुछ भी उल्टा सीधा कर रही है। एंड देन लोग उसको सोसाइटी उसको प्रमोट कर रही है। इट मींस कि सोसाइटी चाहती है कि वो मुजरा ही करे। सोसाइटी नहीं चाहती इंटेलेक्चुअल लड़की एंड जब आप नहीं चाहोगे लोग केवल बातें करते हैं कि लड़कियां नाच रही है, लड़कियां कपड़े उतार रही है। आपने रखा क्या उनके हाथ में? कुछ दिया आपने उनको कुछ आपने उनको बताया या आपने कुछ ऐसा उनके लिए स्टार्ट किया कि लड़कियां ये सब
(1:11:23) कर सके। एंड देन उन सब लड़कियों को देखने वाले आप देखिए हमारे देश में ऐसे लोगों के इन्फ्लुएंसर्स ऐसे इन्फ्लुएंसर्स के उनको इन्फ्लुएंसरर बोला जाता है। उनके फॉलोवर बहुत ज्यादा है जो केवल कपड़े उतारते हैं। जो सोशल मीडिया पे केवल नाचते हैं। उनके सबसे ज्यादा फॉलोअर्स कौन होते हैं? मेंस होते हैं। तो ये रीजन है कि हमारी सोसाइटी ऐसे लोगों की डिमांड करती है। हमारी सोसाइटी की डिमांड है कि लड़कियां ऐसी बने। लड़कियां ऐसी दिखे। दैट्स व्हाई लड़कियों ने खुद को डेवलप करना स्टार्ट कर दिया कि अब क्या करना है? अब लड़कियां दर्शन पर बातें नहीं करती। साइकोलॉजी पर
(1:11:54) बातें नहीं करती। वो मैथ्स पर बातें नहीं करती। बहुत कम दिखाई देती है। जस्ट लाइक आपने बताया 25% आपको दिखाई देगी क्योंकि वो करेगी। बाकी 75% क्या कर रही है? क्योंकि उनकी साइकोलॉजी में घुसा दिया गया है। जैसे आपने शादी का भी बताया था घुसा दिया गया है कि सुंदर नहीं दिखोगे तो शादी कौन करेगा? कौन करेगा? दिमाग में शुरू से उनकी साइकोलॉजी के साथ एक गेम खेला जा रहा है। एक ट्रैप किया जा रहा है। क्रिएट किया जा रहा है। पुरुषों के साथ इतना नहीं है। पुरुषों के मेकअप प्रोडक्ट आप देखिए। बहुत सीमित होते हैं। महिलाओं के तो फाउंडेशन
(1:12:20) के वेरिएंट्स हैं। लिप शेड के वेरिएशंस हैं। हेयर कराने जाएगी तो उसके वेरिएशंस हैं। कपड़ों के वेरिएशंस हैं। इतने वेरिएशन डाल दिए गए हैं कि जब कोई व्यक्ति इतने वेरिएशन देखता है। आप ही सोचिए आपके पास 15 प्रकार की चीजें खाने के लिए रखी हुई है। आप कंफ्यूज होगे पहले शुरू कहां से करें। अब इतना ज्यादा दे दिया गया है उनको मार्केट में कि उनको पता ही नहीं है कि हमें शुरू कहां से करना है, अंत कहां से करना है। क्योंकि उनको स्टार्टिंग में भी वही भोग दिख रहा है। उनको अंत में भी वही भोग दिख रहा है। उनको एक ही चीज बताई जा रही है कि आपके पास एक ऐसी चीज है
(1:12:47) जिससे आप मैन को अट्रैक्ट कर सकते हो। तो क्या करना है? अट्रैक्ट करो। अब क्या करना है? नाचो गाओ। तो उनको जो अट्रैक्शन वाली चीज है ना वो डाल दी गई। आपने उन्हें कभी नहीं बताया कि हमारे इतिहास में ऐसी रानियां भी हुई। सातवाहन वंश की 17 बीसी में एक रानी मिलती है हमें नागनिका सातकर्णी। सातकर्णी साम्राज्य की वो रानी थी। उन्होंने लीड किया उस साम्राज्य को। उन्होंने कई सारे युद्ध लड़े। इवन महाराष्ट्र में टेरेकोटा रिसर्च में उनके सिक्कों पर उनकी छवि मिलती है हमें। 17 बीसी 170 बीसी। यदि 17 बीसी में कोई रानी थी जो सशक्त होकर राज कर रही थी, जो युद्ध
(1:13:19) कर रही थी, जो अश्वमेद और राजसूय यज्ञ करवा रही थी। देन हमें क्यों नहीं बताया गया हमारी हिस्ट्री में कि ऐसी भी रानी थी। हमारी हिस्ट्री कभी नहीं बात करती रानी दिदा के बारे में। हमारी हिस्ट्री कभी नहीं बात करती रायबागिनी भौशंकरी के बारे में। हमारी हिस्ट्री कभी नहीं बात करती कन्नगी के बारे में। जिन्होंने तमिलनाडु में उनके पति को एक आरोप में राजा ने बंदी किया और मार दिया कि उन्होंने पायल चोरी की है रानी की। देन वो गई। उन्होंने वहां पे अपने तर्क रखे। उन्होंने कहा रानी की पायल ऐसी थी, मेरी पायल ऐसी थी। मेरी में मोती लगे थे। उसमें
(1:13:47) रूबी और पन्ना लगा हुआ था। तो उन्होंने अपने तर्क रखे। हमें नहीं बताया जाता कि उस समय की नारियां इतनी तर्कशील भी थी कि वो राजा से लड़ती थी। और उन्होंने राजा को बोला कि ऐसे राजा को राजा नहीं होना चाहिए जो इस तरीके का उल्टा न्याय करे। तो राजा और रानी ने अपने प्राण त्याग दिए थे। हमें हमारी हिस्ट्री में अबका चावटा के बारे में कभी नहीं बताया जाता। हमारे हम हमें हमारी हिस्ट्री में तिलू रौतेली के बारे में नहीं बताया जाता। हमें हमारी हिस्ट्री में कितनी ही वीरांगना हुई जिनके बारे में हमें आज तक नहीं पढ़ाया जाता। सिकंदर से
(1:14:14) युद्ध करने वाली एक रानी थी क्लियोफिस जिसे कार्विका कहा जाता है या जिसे रानी कृपा कहा जाता था। उनका इतिहास भी मैनपुलेट करके सिखाया बताया जाता है कि असा की एक रानी हुई। वह रानी क्या किया उन्होंने? सिकंदर से युद्ध किया। और जब वह हार गई, तो उन्होंने सिकंदर से शादी कर ली और एक बेटा पैदा किया। जबकि उसके आपको कुछ हिस्टरिकल प्रॉपर रेफरेंस नहीं मिलते। लेकिन यह रेफरेंस मिलते हैं कि एक रानी थी जिसने सिकंदर से युद्ध किया। तो क्यों हमेशा हमें यह बताया जाता है कि जो जीता वही सिकंदर। क्यों हमें रानी कृपा की हिस्ट्री नहीं बताई जाती? क्यों हमें ये
(1:14:43) नहीं बताया जाता कि स्वतंत्रता संग्राम में ना जाने कितनी ही महिला थी। नीरा नागिनी के बारे में या नीरा आर्य के बारे में नहीं बताया जाता। जिनकी ब्रेस्ट तक काटने का ब्रिटिशर्स ने प्रयास किया उनसे सूचना निकलवाने के लिए। लेकिन वो इतनी स्ट्रांग थी कि वो कुछ नहीं बोली मुंह से। आप उनकी स्ट्रांगनेस के बारे में नहीं बात कर रहे। आप उनके मेंटलिज्म की बात नहीं कर रहे। आज महिलाएं मां बन जाती है। लेकिन उनको ये नहीं पता है कि मां बनना कैसे है। छत्रपति शिवाजी महाराज के पीछे जो मेंटालिटी काम की उसके ऊपर कोई बात नहीं कर रहा। लोग पत्नियां बनने में इंटरेस्टेड
(1:15:11) है कि मैं अपने पति के साथ गुलछरे उड़ाऊं या मैं घूमूं या मैं जो भी करना है मुझे व्हाटएवर घूमूं। मैं कहीं पे भी जाऊं मैं सब कुछ करूं। लेकिन वो कभी यशुबाई का इतिहास नहीं पढ़ते कि छत्रपति संभाजी महाराज की मृत्यु के बाद 30 वर्ष 30 वर्ष उन्होंने जेल में व्यतीत किए। अपने बेटे को लेकर रही फिर भी हारी नहीं। बाहर निकलने के बाद फिर से स्वराज्य की लड़ाई की। तो हमें कौन बताएगा? छत्रपति तारुणी के बारे में कौन बताएगा? अहिल्याबाई होलकर ऐसा न्याय उस स्त्री का। पूरे मैं कहूं कि अटक से लेकर कटक तक के मंदिरों का निर्माण किया। औरंगजेब ने जितना ध्वस्त किया था।
(1:15:43) हम औरंगजेब की कहानियों पे आके अटक गए। हमने कभी नहीं बताया कि एक ऐसी नारी भी हुई जिसने बचपन से लेकर बड़े होते तक सिवाय संघर्ष के कुछ नहीं देखा। एक गडरिया की बेटी से एक अहिल्याबाई मातोश्री तक का सफर किया उन्होंने। अभी उनको 300 साल पूरे हुए। पूरे साल भर हम लोगों ने इसके इवेंट किए। हम स्कूलों में गए, कॉलेजेस में गए। हमने बच्चियों को बताया कि एक अहिल्याबाई भी थी। लोग शॉक्ड होते हैं। अच्छा ऐसी रानी भी थी। आज न्याय की देवी आंखों पे पट्टी बांधी हुई न्याय की देवी है। सबसे बड़ी न्याय की देवी देखोगे तो अहिल्याबाई होलकर को देखो। हर क्षेत्र में न्याय है।
(1:16:11) किसी ने सती प्रथा की बात की। उन्होंने खंडन ला के रख दिया। किसी ने स्त्री शिक्षा पर बात की। अभी कहा जाता है कि सावित्रीबाई फुले जी ने स्त्री शिक्षा आरंभ की। आप अहिल्याबाई होलकर के बारे में पढ़ेंगे तो उन्होंने सबसे ज्यादा स्त्री शिक्षा और स्त्रियों को सशक्त बनाने के ऊपर कार्य सशक्त बनाने के ऊपर काम किया। नारियों की सेना गठित की। उन्होंने स्त्रियों को शिक्षा दी। क्या करती थी? एक महीने तक के आकर बैठती थी गांव में। क्योंकि उस समय ऐसा था कि नहीं हमारे घर की स्त्रियां नहीं पढ़ेगी। यदि पढ़ लिख गई यदि व्यापार करने लगी तो फिर हमारा क्या
(1:16:37) होगा? ये मानसिकता हमारी नहीं थी। हमारे यहां वर्णन आता है कि स्त्रियों के गुरुकुल होने चाहिए। हमारे यहां यजुर्वेद के 10वें अध्याय का सातवां मंत्र बोलता है कि एक राजा को चाहिए कि वो अपनी प्रजा में स्त्रियों को विदुषी बनाएं। तो हम क्यों नहीं उस वैदुष्य पर काम कर रहे हैं? हम एक्चुअली हम काम भी नहीं कर रहे। हम बता भी नहीं रहे। हमारी हिस्ट्री में वही सुनने मिल रहा है। बचपन से बच्चियों के दिमाग में डाला जा रहा है। क्या बनना है? ऐश्वर्या राय बनना है। क्या बनना है? ये हीरोइन बनना है। क्या बनना है? ब्यूटी पैजेंट बनना है। तो आपने स्टैंडर्ड ही ऐसे
(1:17:06) सेट कर दिए। आप कभी अपने इतिहास पे बात नहीं कर रहे। अरे इतिहास छोड़ो। आप वर्तमान पे भी बात नहीं करते। डॉक्टर गली माधवीता चनाब ब्रिज उन्होंने 17 साल की मेहनत पहाड़ों से जंग लड़ के उस स्त्री ने इतना बड़ा ब्रिज खड़ा किया। इतनी बड़ी मेंटालिटी उसके पीछे थी। आज हमारे इंडियास फर्स्ट एवर आइस हॉकी कंपटीशन में इंडिया के लिए ब्रोंज़ मेडल लाने वाली वो मेघालय की बच्चियां है। लद्दाख की ठंड लद्दाख की बर्फीली मतलब लद्दाख की बर्फ में उन्होंने क्या किया? बाल्टियों से रिंग बनाती थी। पक नहीं मिलता था तो टायर काट के बनाती थी। और उसके अलावा हेलमेट नहीं मिले,
(1:17:38) ब्रांडिंग कोई जर्सी नहीं मिली, जैकेट्स नहीं मिले। कुछ नहीं मिला। चोटें लगती रही लेकिन फिर भी वह लड़कियां मेहनत करके आज हमारे देश के लिए ब्रोंज़ मेडल जीत के आई है। कौन बात कर रहा है? कोई चर्चा हो रही है इसकी? हमारे देश में वो एक कोई थी अभी लेटेंट शो में कोई एक फेमस हो जाती है। कुछ गाली बक देती है तो उसको लोग दुर्गा राइज बोल देते हैं। अरे पता है तुम्हें दुर्गा कौन है? असुरों का विनाश करने वाली दुर्गा है। तो आप जब ये मेंटालिटी डेवलप ही नहीं कर रहे अपनी बच्ची की कि बेटा कोई तेरी और आंख उठाकर देखे तो उसको उधर ही चीर के आ जाना। क्यों? क्यों? क्योंकि ये
(1:18:08) दुर्गा की संस्कृति है। ये काली की संस्कृति है। ये किसी परी की संस्कृति नहीं है कि कोई छेड़े तो बेटा मम्मी पापा के पास आ जाना या कोई प्रिंस चार्मिंग आएगा और बचाएगा। हमारे यहां राजकुमारी रत्नावती हुई। हमारे यहां तिरुतली हुई। हमारे यहां सूर देवी परिमल देवी हुई। हमारे यहां यदि कारविका की बात करूं तो कारविका हुई। हमारे यहां ताज कुंवर हुई। इतनी सारी इतिहास में भरी हुई वीरांगनाओं के बावजूद भी हमें क्या बताया जाता है? प्रेजेंट में आज द्रोपदी मुर्मू जी हमारे देश की राष्ट्रपति है। एनडीए में अभी 17 बच्चियां सिलेक्ट हुई। कौन बात कर रहा है?
(1:18:37) कोई इनको दिखाएगा। अच्छा ऐसा नहीं है। सोशल मीडिया के लेवल पर भी काफी अच्छे कंटेंट क्रिएटर है। वुमस है। उनको हाईलाइट कोई नहीं करेगा। क्यों? क्योंकि आपने आदत डाल ली है कि जो मुजरा करेगी आप उसे ही हाईलाइट करेंगे। और ये सोसाइटी का ये बायस्ड है सोसाइटी। वो स्त्रियों के दुष्कर्म दिखाती है। वो स्त्रियों के अभी वो सोनम रघुवंशी ने अपने पति को मार दिया, मुस्कान ने किया, प्रगति ने किया। ये केसेस दिखाती है। लेकिन मैं आपको बता रही हूं। मेरे पास एक 14 साल की बच्ची का केस आया था। उस बच्ची के साथ रेप हुआ था। चार लोगों ने उसके साथ उसके ही स्कूल में रेप
(1:19:07) किया था। एंड उसके मां-बाप को भी किसी को नहीं पता चला। बिकॉज़ मम्मी पापा दोनों जॉब में थे। उन्होंने कहा एक दिन उस बच्ची ने 6 घंटे बाथरूम में ही वो रही। उसकी मम्मी वापस भी आ गई। तब से वो बाथरूम में नहीं थी। गेट नहीं खोल रही थी। पूरा उन्होंने घर हिला दी। सोसाइटी हिला दी कि मेरी बेटी खोल नहीं रही है। जब खोला गया तो लड़की सुधबुध उसकी खोई हुई थी। वो बैठी हुई थी और विदाउट ड्रेस वो बैठी हुई थी और आसमान की ओर देख रही थी। तो उन्होंने मुझे भी बुलाया था। मैं भी गई थी। मैंने उसको जब देखा तो मेरी आंखों में आंसू आ गए कि ये
(1:19:34) क्या है हमारी सोसाइटी? क्या कर रही है? फिर मैंने उसको पूछा कि क्या हुआ बेटा? उसको बहुत पैंपर किया। बहुत पैंपरिंग के बाद बिकॉज़ शी इज़ बिकॉज़ वो पीटीएसडी से डील कर रही थी। तो उस डिसऑर्डर से डील करने के बाद वो छ महीने से उस डिसऑर्डर में थी। घर वालों ने किसी ने ध्यान नहीं दिया। जब उससे बात की तो 2 महीने में वो मुझसे खुली। अभी भी मुझसे बात करती है। कभी उसको एंजायटी फील होती है। कभी भी पैनिकिक अटैक्स आ जाते हैं। ब्रीथिंग इशू हो जाता है। हम बात ही नहीं कर रहे उन बच्चियों के बारे में जिसके साथ सोसाइटी अन्याय कर रही है। हम हमेशा एक फेमिनिस्ट मूवमेंट ले आते
(1:20:04) हैं कि कोई फेमिनिस्ट है। उसने गलत किया तो बस सब रेप केस सारे फेक हैं। एक्चुअली मैंने विक्टिम्स के साथ डील किया है। उनको आप जब देखेंगे ना विशाल जी आपकी आंखों आंखों में आंसू बिना आए बिना नहीं रह सकते आप। आपकी आंखों में आंसू आ जाएंगे। क्यों? क्योंकि जब इतनी मासूम मासूम छोटी-छोटी बच्चियां जिन्हें हम देवी कह रहे हैं जिन्हें हम कह रहे हैं कि पूरे परिवार को संभाल रही है। एक पिता की माता की जान बचती है। भाई की जान बचती है। एक कॉल आई मुझे रात के 1:30 बजे। एक लड़का फोन पर रो रहा था। मैम मेरी 17 इयर्स की बहन है। उसको बचा लो प्लीज। वो सुसाइड कल उसने
(1:20:35) सुसाइड करने की कोशिश की। क्योंकि मैम उसके साथ रेप हुआ था। मैं आपके हाथ जोड़ता हूं। मैम पैर वो इतना फूट-फूट के रो रहा था। लड़का था 22 साल का लड़का था। तो हम यह नहीं कह सकते कि लड़के सारे गलत है। यहां पे उसका भाई मेहनत कर रहा है। यदि यदि सोनम जैसी लड़कियां गलत है तो रेप करने वाले भी गलत है। दंड विधान कहां है? न्याय प्रणाली कहां है? जहां अहिल्याबाई होलकर रेप करने वालों को चौरंगा करवा के फेंकवा देती है कि हाथ काट दो, पैर काट दो। जहां मनुस्मृति है या वेद है वो ऐसे हिंसकों को, ऐसे अत्याचारियों को दंड देने की बात करते हैं। हम दंड पे काम नहीं कर
(1:21:07) रहे। हम सेंसरशिप पे काम नहीं कर रहे। हम बच्चियों की साइकोलॉजी पे काम नहीं कर रहे। एंड देन फिर हम कहते हैं क्यों लड़कियां ऐसी हो रही है? वो लड़कियां वैसी ही बनेगी क्योंकि आपकी सोसाइटी में जगह-जगह नुक्कड़ नुक्कड़ कॉर्नर कॉर्नर पर पार्लर दिख जाएंगे आपको लेकिन आपको मार्शल आर्ट की क्लासेस नहीं मिलेगी। आपको यह नहीं बताया जाएगा कि लड़कियों को सिलम बम भी सीखना चाहिए, कराटे भी सीखना चाहिए, लाठी भी सीखनी चाहिए। लड़कियों को डिफेंस टेक्निक्स आनी चाहिए। नहीं बताएगा कोई। तभी तो किसी भी चौराहे पे वो बलात्कार के शिकार हो जाती है। तभी तो किसी भी चौराहे
(1:21:33) पे उसे ताड़ने वाले लोग खड़े होते हैं। और यह बायस्ड हो जाएगा यह बोलना कि सब ताड़ रहे हैं। कई जगह तो वो खुद भी इन्वॉल्व हो रही है। केरल का रिसेंटली एक केस आया था। एक 13 साल की बच्ची 5 साल पुराना केस था। 13 साल की बच्ची को बहुत छोटे घर से बिलोंग करती थी। स्पोर्ट्स में थी वो। 5 साल बाद उसने किसी काउंसलर को बताया कि मेरे साथ लगभग 58 लोगों ने मेरे साथ रेप किया। 58 ये कोई संख्या कम नहीं है। लेकिन फिर भी हमारा जो समाज है वो स्क्रोल स्क्रोल स्क्रोल में लगा हुआ है। हम हर चीज को स्क्रोल करना सीख गए हैं। कोई केस आया स्क्रोल कर दो। कुछ आया स्क्रोल कर
(1:22:06) दो। हर चीज हमारे लिए केवल एक पोस्ट है। हम सेंसिटिव बिल्कुल नहीं है। वो जो बच्ची जिसे मैंने बाथरूम से निकाला बैठी मेरे साथ मेरे कंधे पर सर रखकर रोई उसको मैंने जब उससे जब मैंने डील की तो उसके पेरेंट्स ने बताया कि दो-तीन दिनों से इसके साथ प्रॉब्लम हो रही है। जब पता चला तो काफी समय से स्ट्रेस पिल्स ले रही है। स्लीपिंग पिल्स ले रही है और पिल्स लेने के बाद क्या करती है? तो बेसुद हो के पड़ जाती है। अपने आप में है ही नहीं वो बच्ची। और उसके बाद उसको बहुत प्रॉब्लम हुई। उस बच्ची को बहुत प्रॉब्लम हुई और उसको देख के कई बार मैं स्ट्रेस में नहीं आती हूं
(1:22:36) क्योंकि हम उनके सामने स्ट्रेस में आते हैं तो फिर वो बेचारे और डर जाते हैं। तो मैं जब घर आती हूं मेरी मां से आप पूछ सकते हैं कि बहुत स्ट्रेस हो जाता है कई बार ये सोच के कि जहां एक तरफ सोसाइटी कॉन्स्टिट्यूशन कुछ भी वर्क नहीं कर रहा है और एक तरफ ये स्थिति है कि हमारी बच्चियां ऐसी चीजों से डील कर रही है कि वो घर में बता ही नहीं पा रही है कि मुझे हो क्या रहा है। और ऐसा नहीं है कि 13 14 साल मैंने 6 महीने की बच्ची को भी देखा है जिसका रेप हुआ था। मैंने 5 साल की बच्ची को भी देखा जो जो रो-रो के बच्ची यह बता रही है कि अंकल ने मेरे साथ ऐसा किया।
(1:23:04) उसको समझ भी नहीं है अभी कि उसके साथ हो क्या रहा है। कहीं लव जिहाद में मर रही है, कहीं रेप में मर रही है, कहीं मैरिटल रेप्स हो रहे हैं। बहुत सारी चीजें हो रही है। हर तरफ तो आप देखोगे सोसाइटी में क्राइम है। दूसरी तरफ आप देखोगे एक तरफ क्राइम है जिसके कारण उनको घर से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा। एक तरफ वो है कि वो घर से बाहर निकल रही है। तो ये जो इन्फ्लुएंसरर के नाम पे ये जो फीमेल छाप मुजरा छाप के नाम पे जो इन्फ्लुएंसरर बने पड़े हैं ये क्या कर रहे हैं? ये उनको टारगेट दे रहे हैं कि आओ जाल बिछा रहे हैं, ट्रैप कर रहे हैं। आओ सजो धजो आओ
(1:23:31) ब्यूटी पैजेंट बनो आओ दिखावे का साधन बनो। अपने आप को प्रदर्शनी बनाकर लगाओ लोग आपको दिखेंगे। तो फिर हम कैसे बात कर सकते हैं कि उस सोसाइटी में जिस सोसाइटी में इतनी सारी चीजें चल रही है कि इंटेलेक्चुअल बातें उनको दी ही नहीं जा रही है। उनको बताया ही नहीं जा रहा है। अच्छा टीनएज आती है। मैं श्योरिटी से कह सकती हूं हमारे देश के 95% घरों में कभी बच्चियों से डील नहीं किया जाता कि आपको टीनएज आएगा तो आपकी बॉडी में चेंजेस होंगे। यदि आप उसको पहले ही बता दोगे तो उसको समझ में आएगी चीजें। जब उसको समझ ही नहीं आ रही है चीजें उस कंडीशन में क्या हो रहा है कि वो
(1:24:03) डायवर्ट हो रही है। वो डाइल्यूट हो रही है। उसको पता नहीं चल रहा है मुझे करना क्या है जीवन में। जो देखा वो कर लिया। यदि पेरेंट्स घर में ही काउंसलिंग करना स्टार्ट करें। पेरेंट्स ब्रेन फीडिंग करना स्टार्ट करें। बचपन से माता-पिता उसका दिमाग भरना स्टार्ट करें कि बेटा कोई घूर के आया तो क्या करने का? छोड़ना नहीं उसको। नहीं छोड़ना ऐसे लोगों को। जब हम अपनी बेटी को सिखाएंगे। अभी एक हमारे ग्रुप में एक बच्ची थी। वो किसी से लड़ के आई, किसी ने कुछ गलत बोला करके आई। तो घर में ही पेरेंट्स ने बहुत डराया। फोन करके बहुत रो रही। दीदी देखो आप बोलते हो ऐसा
(1:24:32) करना चाहिए। मम्मी ऐसा बोल रही है कि तेरे को कुछ हो गया तो। आप मुझे सिंपल सी एक बात बताइए विशाल जी। यदि कोई बलात्कारी है, यदि कोई अपराधी है और उसने ठान लिया है कि वो आपकी बच्ची के साथ कुछ गलत करेगा तो क्या वो छोड़ेगा? क्या वो वहां दया दिखाएगा? तो माता-पिता क्यों दया दिखाने बोलते हैं बेटियों को? इमोशंस क्यों इतने भर दिए जाते हैं कि हर चीज पर इमोशनल हो जाओ। इंटेलिजेंस का यूज़ ही मत करो। आपका सिक्स सेंस ईश्वर ने आपको दिया है। आपको कोई टच भी करे, कोई देखे भी तो पता चल जाता है कि आपको कौन किस नजर से देख रहा है। लेकिन उस नजर को ताड़न करने की जगह हम
(1:25:04) यह सिखा रहे हैं कि बेटा चुप हो जाओ। यह सोसाइटी बहुत गलत कर रही है और यह सोसाइटी मुझे ऐसा लगता है कि बिल्कुल डिर्व नहीं करती बेटियों का पैदा होना। और बेटियां इट मींस फेमिनिस्ट नहीं। वो जिस तरह की आज नग्नता फैला रही है, अश्लीलता फैला रही है, उनकी बात नहीं कर रही हूं। जमीनी लेवल की हकीकत बहुत अलग है। यहां दो साल की बच्ची भी बेची जाती है, पांच साल की बच्ची भी बेची जाती है। और बिकाऊ तो ऐसी है कि सबसे ज्यादा छोटी बच्चियों की डिमांड है मार्केट में कि छोटे बच्चों को सेल होना चाहिए। उनके पैसे उनका ज्यादा लगता है। क्योंकि बचपन से घुसेगी प्रोफेशन में तो
(1:25:37) बड़े होते तक ज्यादा देगी। ज्यादा उम्र तक के अर्निंग देगी वो। इतना प्रॉफिट होगा। तो इतने प्रॉफिट्स लड़कियों को से इतने प्रॉफिट लड़कियों को सोच करके देखे जा रहे हैं। इतने बिजनेस क्रिएट किए जा रहे हैं। सब कुछ उसके पीछे चल रहा है। एक लॉबी चल रही है पूरी। एक काम चल रहा है। और फिर हम आके केवल सोशल मीडिया की छपरी लड़कियों को देखकर अटक जाए या हम चार केसेस को देखकर अटक जाए तो मुझे लगता है यह नाइंसाफी होगी। और यदि कोई स्त्री ऐसा कर रही है तो मैंने एक पिटीशन डाली थी रौर। आपने भी जिसके बारे में बताया था। मैंने उसमें सिंपली यह कहा था कि जो लड़कियां अपराध कर
(1:26:07) रही है उनके लिए भी कानून बनने चाहिए। आप किसी भी कानून का फायदा उठाकर निकल जा रहे हो उसका प्रभाव क्या हो रहा है कि जो एक्चुअल ग्राउंड बेस पे जो डील कर रही है बच्चियां जो सफर कर रही है वो परेशान हो रही है क्योंकि जब हम ऐसी कोई पिटीशन लगाते हैं तो सबसे ज्यादा उसको मेंस का सपोर्ट नहीं मिलता मैं तो कहूंगी मेरे केस में तो मिला मुझे फीमेल्स का सपोर्ट नहीं मिला फीमेल्स ही फीमेल्स के लिए नहीं खड़ी है यहां पर बातें हो रही है केवल फेमिनिज्म की केवल बातें हैं जब किसी के साथ कोई घटना हो रही है तो आपको नहीं दिखेगी ये जो जितनी मेकअप करती हुई या फिर
(1:26:38) जो जितनी नाचती ती हुई मुजरा छाप इनफ्लुएंसरर दिखती है जो अपने आप को राइट समझती है कि हमारे राइट सही है। वुमस को ऐसा होना चाहिए, इंडिपेंडेंट होना चाहिए, एमावर होना चाहिए। तो मुझे क्यों नहीं दिखती ये महिलाएं उस केस पे बात करते हुए कि जहां 9 साल की बच्ची को दिल्ली में रेप किया जाता है। सूटकेस में पैक कर दिया जाता है। अधमरी हालत में मिलती है। यूपी में एक बच्ची के घर से उठा लिया जाता है नाइंथ क्लास की बच्ची को और उसके ब्रेस्ट कार्ड के एक पत्ते पे उसके मां-बाप को भेजे जाते हैं। तो ये हमारे ही देश में हो रहा है। और इसके आपको न्यूज़ भी मिल
(1:27:06) जाएगी। कोई बोलेगा फेक है तो न्यूज़ भी है, केस भी चल रहा है। काफी सारी चीजें हो रही है। मेरे पास फेक केसेस भी आते हैं। फेक केसेस वालों को भी मैंने दो-तीन बार अच्छे से पीटा हुआ है। धमकी देती है लड़कियां हम केस कर देंगे आप पे। तो ऐसा नहीं है कि फेक केसेस नहीं है। पर रियल केसेस भी है। फेक को दंड ना मिलना चाहे रियल कल्पिट हो उसे दंड ना मिलना। यह भी अपराध का कारण है और ऐसी महिलाएं जो स्वतंत्रता के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी कर रही है यह महिलाएं भी समाज के लिए केवल खतरा ही है और कुछ नहीं है। एक और चीज मैं
(1:27:39) यहां बोलना चाहूंगी कि हमारे यहां जो सामुद्रिक शास्त्र है या सौंदर्य शास्त्र है या भरत मुनि जी का नाट्यशास्त्र है उसमें सौंदर्य रस है वहां पर भी सज्जा सजावट मेकअप की बात की गई है। उसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन उस समय जो बात की गई थी वहां वीर रस भी था। तो सौंदर्य के साथ-साथ वीर रस होना भी आवश्यक है। लेकिन आपने एक बात बोली कि स्त्री ही स्त्री स्त्री की दुश्मन है। आज के समय में यदि कोई इंटेलेक्चुअल स्त्री आ जाती है गलती से तो पुरुष उसे एक्सेप्ट नहीं करते कि अरे ये कैसे आ गई? हमारा जो पूरा सर्कल है उसे भंग करने कैसे आ गई? और महिलाएं उसे इसलिए
(1:28:16) एक्सेप्ट नहीं करती कि अरे हम तो ये कर रहे हैं। जैसा कि आपने जो शब्द यूज़ किए तो ये कैसे इंटेलेक्चुअल निकल गई? इसको भी यही करना चाहिए। तो इस वजह से जो इंटेलेक्चुअल स्त्रियां हैं उनकी एक्सेप्टेंस ही नहीं है। उनके इर्दगिर्द ऐसा एक माहौल बनाया हुआ है। उनको प्रमोशन नहीं होने देंगे। उनको आगे नहीं बढ़ने देंगे। आपकी सरकार भी इसमें इनवॉल्व्ड होती है। एक इंटेलिजेंट स्त्री के लिए आसान नहीं है। युद्ध करना वहां पर कार्य क्षेत्र के अंदर और आगे जाना। ये तो हम भी फेस कर रहे हैं। कल रात को मेरी एक बच्ची से बात हुई। उसने मुझे कहा
(1:28:53) कि मैम मेरी फ्रेंड ने मुझे बोला कि सुंदर कैसे दिखा जाएगा? मुझे बता कि मैं कौन सा ट्रीटमेंट कराऊं कि मैं सुंदर दिखूं बिकॉज़ मेरे ऑफिस में मुझे कुछ भी रिस्पांस नहीं मिलता। जो लड़कियां सुंदर दिखती है उसको रिस्पांस मिलता है। तो मुझे पता। उसने मुझे बोला दीदी ऐसा क्यों है? मैंने कहा क्योंकि लगातार एक लॉबी चल रही है। इसके पीछे पूरे एक बिजनेस मॉडल चल रहे हैं और यह हमें सबको पता है। ऐसा नहीं है। मतलब सब जानते हैं इसके पीछे। बड़े-बड़े लोगों को इसका सच पता है। जब ग्राउंड लेवल पर आप लड़ने के लिए जाते हो तो विरोध भी आपको वहीं से मिलता है। जो बड़े-बड़े
(1:29:23) भाषणों में बातें करते हैं कि नारी को ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए। हम यह सपोर्ट करेंगे। वो सपोर्ट करेंगे। जब आप उनके पास किसी का केस लेकर जाओगे ना सबसे पहले बोलेंगे ज्यादा नाक मत घुसाओ। तो यह चीज है सोसाइटी में। हम वो लोग हैं कि हम एक्सेप्ट करके गलतियां सुधारा करते थे। हमारे महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने सत्यार्थ प्रकाश नाम का एक ग्रंथ लिखा उसमें उन्होंने मेंशन किया कि यदि किसी को कोई गलती दिख जाती है जिन्हें ऋषि कहा गया वर्तमान समय में 200 साल पहले जिनको ऋषि कहा गया। ऋषि की उपाधि मिली। ऐसा व्यक्ति भी लिखता है कि कोई गलती हो जाए तो बता
(1:29:55) देना या फिर उसको प्रॉपर व्यवस्थित तरीके से उसको ठीक किया जाए। ठीक करने की बातें होती है। ऐसा नहीं होता कि हम ही सही है। वो जो एक होता है ना जस्टिफिकेशन कि मैं सही हूं। मैं कभी गलत नहीं हो सकता। इसमें सबको लेके डूबे। क्या पॉलिटिशियंस के केस नहीं होते? 3000 लड़कियों की वीडियो बना के स्कैंडल करने वाला व्यक्ति भाग जाता है। कुछ नहीं हो रहा है। 130 केस वाला व्यक्ति भी आ रहा है कि जिसके ऊपर 130 केसेस हैं। अच्छा मैं पक्ष विपक्ष नहीं खेल रही हूं। मैं ये बात कर रही हूं। कांग्रेस में भी ऐसे लोग हैं जो खड़े होकर पार्लियामेंट में स्टेटमेंट देते हैं कि
(1:30:24) यदि रेप हो जाता है तो लेट कर एंजॉय करो। ऐसे स्टेटमेंट भी हमारे देश में है। तो हर कोई तो ऐसी बातें कर रहा है। हमने क्या समझ लिया? महिलाओं को यूज़ एंड थ्रो का सामान समझ लिया। एक तरफ हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। दूसरी तरफ ऐसे स्टेटमेंट पास करने वालों को कोई सजा नहीं होती। छोटी-छोटी चोरी चकारी होगी तो उसको सजा दे देंगे। इनको नहीं देंगे। क्या आपके देश में इतने लोग भूखे मर रहे हैं लेकिन उसके बावजूद भी आपको एक बलात्कारी को जेल में बिठा करके दो वक्त की रोटी तुड़वानी है। यह कौन सी न्याय प्रणाली है? ये मेरा सच में प्रश्न है न्याय प्रणाली से। ये कौन
(1:30:53) सी न्याय प्रणाली है? बदलना चाहिए चीजों को। और जिन लोगों को हमने अपना आइडियल बनाया हुआ है, जितनी भी लड़कियां हैं, सब कॉस्मेटिक सर्जरीज करा कर आती हैं। मुझे याद है जब मैं अपने स्कूल में थी, तो सब मुझे मंकी इयर्ड बोला करते थे कि आपके कान मंकी की तरह हैं और मैं इससे बहुत आहत हो जाती थी। घर आकर रोती थी। तो हमारी कभी फैमिली में किसी ने इस चीज पे शायद उन्हें पता होगा कि मंकी इयर्स हैं। लेकिन कभी इस पर जो है उन्होंने ध्यान नहीं दिया क्योंकि मेरी आठवें महीने की पैदाइश थी। तो पूरी तरह कान मेरे खुले नहीं थे। लेकिन हमारे ग्रैंडफादर ने हमेशा हमें कहा कि
(1:31:26) तुम वैसे ही सुंदर हो। कंसंट्रेट ऑन योर स्टडीज। पढ़ाई करो। हमारे सामने जो है वहां पर अन्य विषयों पर बात होती थी। चाहे वो कार्ल मार्क्स की बात हो, चाहे आदि शंकराचार्य की बात हो, चाहे स्वामी दयानंद सरस्वती की बात हो, चाहे मिर्जा गालिब की बात हो, चाहे जॉब की बात हो। तो ये सब चीजों में हमको इनवॉल्व किया गया और ऐसे समय पे आपको पता चलता है कि आपका जो परिवार है उसकी स्ट्रेंथ कितनी इंपॉर्टेंट होती है। सो टुडे आई कैन टेल यू कि मैं कभी नहीं चाहूंगी कि कोई मेरे को केवल मेरी सुंदरता या मैं कैसी दिखती हूं कपड़ा कैसे पहनती हूं इसके बेसिस पर जाने। मुझे
(1:32:00) याद रखा जाए तो मैंने पुस्तकें क्या लिखी। मैंने इंटेलेक्चुअल अपना योगदान क्या दिया इस पर मुझे लोग जाने। अह लेकिन कभी भी केवल इस बात पर ना जाने कि आप दिखते कैसे थे। सो बौद्धिक विकास आपका बहुत इंपॉर्टेंट है क्योंकि अंत में जैसे-जैसे आप बुढ़ापे की तरफ जाएंगे यही रह जाएगा। बिल्कुल। अच्छा इसमें एजुकेशनल फील्ड को टच करते हुए कुछ कहना चाहूंगी कि एक बात मैं और यहां ऐड करना चाहूंगी। बहुत दुख की बात है कि दो दिन पहले ऐसा हुआ है कि धर्मशास्त्रों को दिल्ली यूनिवर्सिटी से हटा दिया गया है और इसकी जगह अब जो बच्चों को पढ़ाया जाएगा मतलब सुन के लगता है कि
(1:32:41) अब तो कलयुग आ गया कि इंटिमेट रिलेशनशिप्स में कैसे डील करना है यह आपको बताया जाएगा। धर्मशास्त्रों को हटा के एक स्त्री और एक पुरुष इंटिमेट रिलेशनशिप को कैसे चलाएं यह बताया जाएगा दिल्ली यूनिवर्सिटी में। यह दुख की बात है। इसको दुर्भाग्य कहूंगी मैं। यही दुर्भाग्य है और यह हमको बहुत गहरे अंधकार में अविद्या के धकेलेगा। हमारी जनरेशन को भी हमको भी। कानून की भी अगर हम बात करें कोई आवश्यकता नहीं थी कि इलजिटिमेट रिलेशनशिप्स को या जहां पर शादियां नहीं होती हैं उनको जो है लॉफुल बनाने की। कि दो लोग जिनकी शादी नहीं हुई है वो साथ में रह सकते। क्या कानून को यह
(1:33:22) नहीं पता था कि अगर ऐसा होगा तो अबॉर्शन रेट्स भी बढ़ेंगे? क्या उनको नहीं पता था कि जो बच्चे पैदा होंगे हमारे मेरे घर के पास में पलना है। एक एनजीओ लोग वहां उन बच्चों को छोड़ के चले जाते हैं जो इलेजिट होते हैं। वहां पालना बनाया हुआ है। लोग अपने बच्चे वहां छोड़ के चले जाते हैं। क्या यह आईडिया नहीं था गवर्नमेंट को? कैसे आपने ऐसा अधर्मी डिसीजन ले लिया? तो हमारी जो सरकार है, हमारी जो कानून व्यवस्था है और हमारी जो शिक्षा प्रणाली है, इनको भी विचारशील होने की आवश्यकता है। बिल्कुल। जैसे आपने अभी कहा कि धर्म को हटा दिया गया वहां से। धर्मशास्त्र
(1:34:02) धर्मशास्त्रों को। एक सिंपल सी बात कही जाती है। अति सर्वत्र वर्षत। यदि अति अति हो गई ना किसी भी चीज की। आप देखिए आजकल रिलेशनशिप्स के बारे में ही बातें हो रही है और कुछ हो ही नहीं रहा है। युवा पीढ़ी कर क्या रही है? इसके साथ मुंह मारना है, उसके साथ मुंह मारना है। मैं सीधे यही बोलती हूं क्योंकि जब आप वर्क करते हो ना तो आपकी लैंग्वेज ऐसी हो जाती है कि आप प्रैक्टिकल चीजों को समझने लगते हो। जब हम जा रहे हैं हम एक कैंपस में गए थे। एक एक छात्रावास में गए थे हम लोग। बच्चियों का कैंपस होता है वहां पर प्रोग्राम करने गए
(1:34:31) थे। हमारे साथ एक गायनकोलॉजिस्ट भी थी। जिन्होंने लड़कियों की फेस देखकर बता दिया मुझे कि आपको पता है इनमें से कई बच्चियां अबॉर्शन कराने आई थी। तो ये जो चीजें हो रही है ना ये जो घटनाएं घट रही है समाज में ये क्यों हो रहा है? क्योंकि हमने उसको अति को बढ़ा दिया। वो पहले से ही देखिए भोग है ना पत्थर को पहाड़ पर चढ़ाने में बहुत मेहनत लगती है। ढकाने में 2 मिनट लगता है। व्यक्ति को संयम साधने में नियंत्रण साधने में बहुत मेहनत लगती है। अपने चरित्र को ऊपर उठाने में पूरा अपने चरित्र को ऊपर उठाने में पूरा जीवन लग जाता है। लेकिन उसको गिराने के लिए
(1:35:01) बिल्कुल साधन आपको मिल रहे हैं। एकदम मिल रहे हैं। आपको अवेलेबल मिल रहा है। आपको राइट्स मिल रहे हैं। एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के राइट्स मिल रहे हैं आपको और फिर आप कहते हो कि फिर आप कहते हो कि आजकल ऐसे केसेस बढ़ रहे हैं। तो जब उसको लॉफुल कर दिया गया है तो केस क्यों नहीं बढ़ेंगे? हर कोई स्वच्छंद होना चाहता है। हर कोई आप अपने मन को थोड़ा नियंत्रण मत दीजिए। तो आपका खुद का मन बोलेगा कि नहीं नहीं जो नहीं करना है उसको भी एक्सप्लोर करो। हमारी जो हमारा शरीर जो है पानी से बना है। मतलब मैक्सिमम इसमें पानी है। भले ही विशाल जी अपनी दादी को नहीं जानते। परदादी
(1:35:32) को नहीं जानते। लेकिन आज भी इनके परदादी की नाक इनके चेहरे पर है। इनके फीचर्स हैं वैसे। उसी प्रकार से हमारे यहां जो बोला गया एक पुरुष के साथ संभोग एक स्त्री के साथ संभोग हमारी बॉडी जो है वो मेमोरी रखती है उस टच की उस फील की उन जेनेटिक्स की तो इसलिए जो है जब आप कई लोगों से जो है संभोग करेंगे तो आपके लाइफ में डिप्रेशन आपके लाइफ में कंफ्यूजन आपके लाइफ में बीमारियां ये आनी ही आनी है। बिल्कुल यूज़ एंड थ्रो का सामान जिसे कहेंगे ये खुद को बना दिया। इस फ़ेमिनिस्ट का एक प्रोपेगेंडा यह भी होता है या फिर बहुत सारी मौसी लड़कियों का होता है कि
(1:36:09) हमें ऑब्जेक्टिफाई मत करो। खुद को ऑब्जेक्ट बनाके आप परोस रहे हो सोसाइटी के सामने और आप कह रहे हो ऑब्जेक्टिफाई मत करो। क्योंकि ये लोग नहीं ये लोग रियल केसेस पे बात नहीं करते हैं। इनके बारे में क्या ही बात करूं। एक जो लास्ट मेरा टॉपिक रहेगा एजुकेशनल फील्ड में। आप देखिए सबसे ज्यादा बीए कर लो, एमए कर लो या बीएससी कर लो। लड़कियों को यही सिखाया जाता है। या तो डॉक्टर बन जाओ या तो टीचर बन जाओ। कभी भी हमारी सोसाइटी में बहुत रेयर फैमिलीज होती है जिनको यह पता होता है कि रॉ में भी लड़कियां जाती है, आईबी में भी जाती है, सीआईडी में भी जाती है,
(1:36:36) सीबीआई में भी जाती है। उनको नहीं पता होगा कि इंटेलेक्चुअल फील्ड में भी लड़कियां जाती है। क्यों? क्योंकि हमने एजुकेशनल एक होता है ना कि एजुकेशन के नाम पे भी प्रोपेगेंडा खेल गए हम कि हमने नारे तो दे दिए बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ। लेकिन आज भी कई ट्राइबल एरियाज ऐसे हैं जहां पे स्कूल ही नहीं है। क्या बात करेंगे हम कि हम एजुकेशन फैला रहे हैं। देखो इसमें मैं गवर्नमेंट का दोष भी नहीं बोलती हूं कि हम सारी क्योंकि हमारे देश में एक प्रोपगेंडा ये भी चलता है कि जब भी कुछ हुआ दोष गवर्नमेंट को दे दो। क्या आप मनुष्य नहीं हो? क्या आपके कर्तव्य नहीं है। आपको भूख
(1:37:06) लगती है तो आप आवाज उठाना जानते हो। आपको कोई चांटा मार दे तो आप आवाज उठाना जानते हो। सड़क पे कोई गाड़ी ठोक दे तो आप उसकी कॉलर खींच लोगे। लेकिन जब सोसाइटी में कुछ गलत होता है तो सब मुंह पे चुप्पी क्यों करते हैं? सब मुंह पर उंगली रख के चुप हो जाते हैं। क्यों? क्या सोसाइटी आपकी नहीं है? क्या समाज को बदलना आपका कर्तव्य नहीं है? आप प्रेशर डालोगे तो गवर्नमेंट वो करेगा। चार दिन का प्रेशर डालते हो। यदि निर्भया जैसा केस होता है। यदि आकर मेडिकल कॉलेज जैसा केस होता है तो चार दिन आप प्रेशर करते हो, धरना देते हो तो गवर्नमेंट भी सक्रिय हो जाती है। फिर आप
(1:37:36) सोते हो तो गवर्नमेंट भी सो जाती है। और गवर्नमेंट में कौन है? कोई देव मानुष बैठे हैं क्या? आप लोगों ने इतनी ढेर सारी बातें की है और जो मैंने सुना बाद में जो अंतर्मन से और जो आपने देखा है आपने तो फील्ड वर्क किया हुआ है। आप भी बच्चों से जुड़ते हैं बच्चियों को पढ़ाते हैं। मुझे यही समझ में आ रहा है कि बेसिक समस्या तो अभी यही है कि हम पहली बात तो धर्म से विमुख हो गए। धर्म को सही से हमने नहीं समझा और आपने बताया कि इतने ढेर सारे एग्जांपल्स जो भारत में मिलते हैं जो शायद आप वेस्ट में ढूंढने जाएंगे तो मैं किसी को क्रिटिसाइज क्या करूं लेकिन इतने नहीं
(1:38:09) मिलेंगे जितने आपको भारतवर्ष में मिलते हैं और ऐसा नहीं कि केवल एक भाग में आप नॉर्थ ईस्ट में देखिए आप उत्तर भारत में देखिए भारत के दक्षिण भाग में जाइए आपको हर जगह मिलेगा ये एग्जांपल्स हमें सामने रखने चाहिए। मैं अपने प्लेटफार्म के माध्यम से भी लगातार प्रयास करता हूं। चाहे वो ओके ओबा की कहानी हो, चाहे रानियां बक्का हो, चाहे मैं अपने प्लेटफार्म से लगातार महापुरुषों पर बात करता हूं। वीरांगनाओं की बात करता हूं। तो हमें जैसे बता रहे हैं ना कि ठीक है। हम अगर हम डॉक्टर टीचर बन रहे हैं अच्छी बात है। हमारे पास और भी अवेन्यूस होने चाहिए
(1:38:43) जहां पर महिलाएं कार्य कर सकती हैं। ब्यूटी पैजेंट चल रहा है। ठीक है वो भी मैं नहीं कह रहा हूं कि चलिए लेकिन उसके साथ और भी चीजें हैं। वो एक स्पेक्ट्रम पूरा आ जाए। बाइनरी ना रहे। लेकिन विशाल जी ब्यूटी पैजेंट के अंदर अपने शरीर की नुमाइश करना है ना बिकनी वाला राउंड इस सब की क्या आवश्यकता है मतलब किसी की कमर अगर 24 नहीं है ब्रेस्ट 36 नहीं है और हिप्स 36 नहीं वो सुंदर नहीं है ऐसे पैमाने बनाने ही क्यों सोसाइटी के अंदर तो हमने बहुत ढेर सारे मैं एक बार से थोड़ा सा रिककैप कर दूंगा जिससे कि जितनी बातें हुई है एक बार दर्शकों को और विशेषकर जो
(1:39:18) बालिकाएं देख रही हैं जिनको इस पॉडकास्ट से बहुत ज्यादा शक्ति मिलेगी रहेगी और राइट विज़न की तरफ जब वह आगे बढ़ेंगे जो प्रकृति के अनुसार उनकी प्रवृत्ति है उसमें आगे जाना चाहिए ना कि दूसरों से इन्फ्लुएंस होना चाहिए क्योंकि हम दूसरों से इन्फ्लुएंस हो रहे हैं तो जो जो सबके अपने प्रोपोगेंडा है उसी में हम फंसते हैं चाहे वो वेस्ट का हो चाहे हमारे अपने ही लोगों का हो तो हम एक बेटर क्लेरिटी रखें अपनी प्रवृत्ति के अनुसार बढ़े हमने देखा कि किस तरह से फेमिनिज्म जो है वो भी एक अपॉर्चुनिस्ट एक एक आईडियोलॉजी बन चुका है जहां पर जो भी उसको चैंपियन कर रहे हैं वो
(1:39:51) लोग उस तरह को उस तरह तरह की चीजें फॉलो करते नहीं दिख रहे हैं। फिर अगर हम धर्म में भी आएंगे तो जैसे कि आपने बताया कि शास्त्र जो है शास्त्र भी अपने आप में ऐसा नहीं कि शास्त्र पढ़ लेने से ही मोक्ष हो जाएगा। क्योंकि हमारे ऋषि मुनियों ने तो कहा ही है कि सब कुछ अनुभव है और अनुभव के बिना हर चीज जो है केवल वो शब्द है और वो शब्द भी शब्दों में बांधा ही नहीं जा सकता सत्य को। तो शास्त्र भी जो है वो शास्त्र भी केवल आपने बताया कि एक इशारा मात्र है। तो धर्म में भी जब आप चेतना की बात कर रहे हैं तो वहां पर फिर आपके शारीरिक जो भी
(1:40:22) चीजें हैं वो तो फिर वो विकार के ही जगत में आ गए। अद्वैत में भी आप जाएंगे तो फिर सब जगत प्रतीति ही हो जाता है। तो अगर हम धर्म को सही से समझ जाएं। बाइनरीज में ना फंसे कि यह अच्छा है तो यह बुरा ही है। अगर सोनम रघुवंशी ने यह किया है तो सारी स्त्रियां बुरी ही हैं। हमें विवाह नहीं करना चाहिए या महिलाओं के साथ। अभी अगर हम फैक्ट्स की भी बात करें तो एनसीआरबी का यह फैक्ट है। ये कितना सही नहीं। मैं एक बार फिर से मुझे चेक चेक करना होगा कि 1 लाख आदमियों में 25 आदमी कहीं ना कहीं डोमेस्टिक वायलेंस की वजह से सुसाइड कर रहा है। नहीं एक एक और तरह के
(1:41:02) विचार एक सामने आ रहा है कि इतने सालों तक तो स्त्रियों के साथ हुआ। अब पुरुषों के साथ हो रहा है तो क्या प्रॉब्लम है? या क्यों नहीं? देखिए किसी के साथ भी नहीं होना चाहिए। ना स्त्रियों के साथ, ना पुरुषों के साथ, ना पशुओं के साथ सब जीव हैं। सबको कष्ट होता है। सबको चोट लगती है। तो किसी के साथ भी ना करें। तो बहुत अच्छा लगा आप दोनों के साथ बात करके और बहुत ऊर्जावान ये एक एक पडकास्ट था जहां पर भारतीय महिलाएं भारतीय स्त्रियां बहुत आगे बढ़े। अभी हमने ऑपरेशन सिंदूर में देखा कि कुरैशी जी थी और वमिका सिंह जी थी। तो वो भी एक हम ऐसा नहीं कि किसी किसी
(1:41:37) पुरुष को हो सकता है होंगे। कमेंट सेक्शन में मिल जाते हैं। लेकिन मोस्ट ऑफ दी जो हम पुरुष हैं वो भी बहुत गौरवान्वित महसूस करते हैं कि हमारे देश की महिलाएं भाई भारत की स्त्रियां हमारी माताएं हैं, बहनें हैं। तो हम जैसे आपने बोला जब आपने भेजा था कि पिटीशन डाला था तो मुझे भी अच्छा लगता है क्योंकि मेरी भी तो बहन है। मेरी भी तो माता है और ऐसा नहीं है कि मेरी ही माता और बहन है। मैं उसके लिए ही करूं। पूरा समाज ही सुरक्षित रहेगा तो मेरे लिए भी अच्छा है। तो पुरुषों को मुझे नहीं लगता है कि अपने स्तर पर ऐसी कोई प्रॉब्लम है
(1:42:10) कि कोई मेरी टीम में भी दो तीन टैलेंटेड लोग हैं। स्नेहा भी पूरी तरह से लगी रहती है। तो कहीं ऐसा नहीं होता है कि आप नहीं बेटर जानते हो। इनफैक्ट इस पॉडकास्ट के पहले मैंने उनको भी मैसेज किया कि मेरे से बेटर आपके क्वेश्चन होंगे क्योंकि यू बीइंग गर्ल्स आपको ज्यादा पता है क्या है? तो उनके भी क्वेश्चंस आए। मैंने उनके भी क्वेश्चंस रखे। तो यही है कि जहां पर हम इंक्लूसिव और सबको साथ में लेकर बढ़े अगर मैं एक आदमी किसी स्त्री की समस्या नहीं समझ सकता या एक स्त्री एक पुरुष की समस्या नहीं समझ सकती है तो समस्या का निदान होना ही नहीं है। कभी नहीं होगा कि
(1:42:48) आप यह सोचिए कि एक स्त्री ही अपनी समस्या का समाधान कर लेगी। क्योंकि किसी ना किसी स्फेयर में तो आपको काम करना ही है। आप आपके पिता भी हैं, आपके भी पति हैं, पुत्र हैं या और अगर मेरी कोई समस्या है और मैं सोचूं कि केवल लड़के ही या हम सॉल्व कर लेंगे तो वो भी नहीं होना है। एक एक बात है कि हमारे यहां प्रत्यक्ष समुतापाद है बौद्ध दर्शन के अंदर और यहां पर भी वेदांत में भी जब आप आते हैं तो सब में एक ही चेतना है। कहीं ना कहीं ये कनेक्टिंग वो धागे हैं जो कि हमें बताते हैं कि केवल इंडिविजुअलिस्टिक होकर के या केवल अपने तक सीमित होकर के आप जीवन को नहीं जी सकते।
(1:43:23) आप अपने परिवार पे निर्भर करते हैं। आप समाज पे निर्भर करते हैं। आप प्रकृति पर निर्भर निर्भर करते हैं। आप विश्व पे निर्भर करते हैं। तो इस पूरी जो ये जो संसार है इसमें आप एक छोटा सा पार्ट हैं जो सब हर चीज से कनेक्टेड है। और डिपेंडेंसी मुझे लगता है कि एक बेसिक नीड है। हम खाने के लिए प्रकृति पर बेस्ड है। हम जीने के लिए आज हम यहां बैठे हैं। घरों में बैठे हैं। बॉर्डर पे हमारे सैनिक सुरक्षा कर रहे हैं। सिर्फ खाने के लिए नहीं। सिर्फ खाने के लिए प्रकृति पर हम निर्भर नहीं हैं। हम प्रकृति का हिस्सा ही है। प्रकृति ही हम हैं। यह जो आपके पंच
(1:43:56) महाभूतों से निर्मित शरीर है, यह भी तो प्रकृति ही है। तो हमारे को प्रकृति केवल नेचर जो बाहर आपको दिखता है वो नहीं है। आपका इंटरनल भी नेचर है। आप जिससे आपकी उत्पत्ति होती है वो भी नेचर ही है। नेचर ही है। मैं आप दोनों का फिर से बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं कि समय निकाला आप लोगों ने और हर एक पहलू पर हमने चर्चा की है और वहां पर सत्य तक जाने का प्रयास किया है। अब जो चीजें चल रही हैं उससे बालिकाएं अवेयर हो जाए। स्त्रियां अवेयर हो जाए। गणियां, माताएं, बहने सब अवेयर हो के और अच्छा करें जीवन में। वही हम लोग चाहते हैं और ऐसा ना हो कि बस किसी एक माइंडसेट
(1:44:35) में हम फंस के रह जाए और फिर बाद में हम पूरी जिंदगी हम ब्लेम करते रहें। तो फिर से मैं धन्यवाद करूंगा आप दोनों का कि इस पॉडकास्ट से जुड़े। इसी इसी नोट पर इस पॉडकास्ट को यहां पर हम समाप्त करेंगे। धन्यवाद। हम्म

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