Friday, July 24, 2026

How Did British Make Indians Diabetic! | Why Is India The Diabetes Capital Of The World? | StudyIQ

How Did British Make Indians Diabetic! | Why Is India The Diabetes Capital Of The World? | StudyIQ

Author Name:StudyIQ IAS

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Transcript:
(00:00) दोस्तों, इस तस्वीर को ध्यान से देखिए। 1943 कोलकाता की सड़क एक मां अपने बच्चे को सीने से लगाए फुटपाथ पर पड़ी है। उसके शरीर पर सिर्फ हड्डियां बची है। उसके आसपास और जो भी लोग आपको दिख रहे हैं, वह भूख से मर रहे हैं। और यह कोई फिल्म का सीन नहीं है। यह एक असली तस्वीर है बंगाल की, उस अकाल की या भुखमरी की जिसमें करीब 30 लाख लोग भूख से मर गए थे। अब इस तस्वीर से जुड़ा एक इंपॉर्टेंट सवाल आप सोचिए जो शायद आपने कभी सोचा भी नहीं होगा कि क्या उस भूख का असर आज 80 साल बाद भी आपके खून में दौड़ रहा है? कि आज आप या आपके घर में
(00:30) किसी को भी डायबिटीज है उसकी जड़ इस 1943 की पिक्चर के अंदर छुपी है। तो आइए शुरू करते हैं कुछ आंकड़ों से क्योंकि ये आंकड़े हमें इस प्रॉब्लम को अच्छी तरह से समझने में हेल्प करेंगे। आज इंडिया में करीब 10 करोड़ 10 लाख लोग यानी कि 101 मिलियन लोग डायबिटीज का शिकार हैं। आईसीएमआर की एक स्टडी है जो लसेट मेडिकल जर्नल में पब्लिश हुई है। इसमें सबसे डरावनी बात यह है कि करीब 13 करोड़ 60 लाख लोग प्री डायबिटिक हैं। यानी कि वो डायबिटीज के बिल्कुल कगार पर खड़े हैं। और इनमें से करीब 57% लोग ऐसे हैं जिन्हें यह बात पता ही नहीं है कि उन्हें डायबिटीज
(01:00) है। वो घूम रहे हैं। अपना नॉर्मल काम कर रहे हैं। बिना इस बात को जाने कि उनका ब्लड शुगर लेवल धीरे-धीरे अंदर से बढ़ता जा रहा है और उन्हें अंदर से वो खा रहा है। और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह बीमारी सिर्फ बूढ़ों की नहीं रही है। अब 30 से 40 साल के लोगों में यानी कि हमारी सबसे जवान सबसे काम करने वाली आबादी में हर तीन में से एक इंसान का ब्लड शुगर पहले से बढ़ा हुआ है। तो सवाल यह है कि इंडिया दुनिया में सबसे ज्यादा डायबिटीज के मरीजों वाला देश आखिर क्यों और कैसे बन गया? हमें शुरू से बताया जाता है कि इसकी वजह शायद ज्यादा मीठा खाना हो सकता है या
(01:31) फिर कम एक्सरसाइज करना हो सकता है। लेकिन यह बात पूरी तरह से सच नहीं है। क्योंकि चाइना और अमेरिका में भी ऐसे लोग हैं जो बहुत मीठा खाते हैं। और एक्सरसाइज भी नहीं करते हैं उतनी फिर भी उन्हें डायबिटीज नहीं होता है। अगर आप एक एवरेज साउथ एशियन को देखेंगे यानी कि इंडियंस को और इनके नेबरिंग कंट्रीज वालों को तो डायबिटीज होने का खतरा इनमें यूरोपियंस के मुकाबले लगभग चार से छह गुना ज्यादा होता है। यानी कि सेम वेट, सेम डाइट फिर भी हम लोग ज्यादा रिस्क पर हैं। तो आखिर ऐसा क्यों होता है? और इसका जवाब मैं आपको बता दूं कि सिर्फ आपके डाइट में नहीं छुपा है।
(01:59) एक्चुअली इसका जवाब छुपा है हमारे इतिहास में। एक ऐसे इतिहास में जिसे अंग्रेजों ने लिखा और जिसकी कीमत हमारे जींस आज तक चुका रहे हैं। इसी कहानी को समझने के लिए हमें दो चीजें जोड़नी होंगी। पहला साइंस और दूसरा इतिहास और हिस्ट्री। तो चलिए पहले साइंस समझते हैं क्योंकि उसके बिना हिस्ट्री किसी कॉन्टेक्स्ट में हम समझ नहीं पाएंगे। अब इमेजिन कीजिए आपके शरीर के अंदर जितने भी सेल्स हैं वो एक इंजन की तरह काम करते हैं जिसे चलने के लिए फ्यूल या एनर्जी की जरूरत होती है। यह फ्यूल और कोई नहीं बल्कि ग्लूकोस होता है यानी कि शुगर जो एक्चुअली आपके खाने की वजह से
(02:29) बनती है। आप रोटी खाएं, चावल खाएं, मीठा खाएं या जो कुछ भी खाएं वो इवेंचुअली जाकर आपके ब्लड में ग्लूकोस ही बनेगा। ग्लूकोस धीरे-धीरे आपके खून में घुलता चला जाएगा। लेकिन इसमें एक प्रॉब्लम है। यह ग्लूकोस ऑलदो फ्यूल होता है सेल के लिए। लेकिन यह सेल के अंदर अपने आप से एंटर नहीं कर पाता है। आप सेल को ठीक ऐसे समझिए कि उसके अंदर एक दरवाजा है जिसके ऊपर एक ताला लगा है और ग्लूकोस लगभग बाहर ही खड़ा रहता है और उसे अंदर जाने के लिए एक्चुअली एक चाबी की जरूरत पड़ती है और यह चाबी और कोई नहीं बल्कि इंसुलिन होता है और इंसुलिन वो
(02:58) हॉर्मोन है जो आपके पैंक्रियाज बनाते हैं। जैसे ही आप खाना खाते हैं आपके खून के अंदर शुगर बढ़ने लगती है और पैंक्रियाज धीरे-धीरे इंसुलिन रिलीज़ करने लगते हैं ताकि यह ग्लूकोस आपके सेल के अंदर एंटर कर सके। यह एक परफेक्ट सिस्टम की तरह काम करता है। जैसे कि शुगर आई और तुरंत पनक्रियाज ने इंसुलिन को रिलीज किया। सेल के दरवाजे खुले और ग्लूकोज अंदर एंटर कर गया और आपके सेल को फ्यूल मिल गया। यानी आपकी बॉडी को फ्यूल मिल गया। अब देखिए जिन लोगों को टाइप टू डायबिटीज होता है उनके अंदर या तो इंसुलिन प्रोड्यूस ही नहीं हो रहा होता है या फिर इंसुलिन बहुत कम
(03:27) मात्रा में प्रोड्यूस हो रहा होता है। और इसे कहा गया है इंसुलिन रेजिस्टेंस। अब सोचिए इसकी वजह से होता क्या है कि ग्लूकोज एक्चुअली सेल के अंदर एंटर ही नहीं कर पाता है। तो इसकी वजह से वह सिर्फ खून के अंदर धीरे-धीरे जमा होता रहता है। और खून में शुगर का लेवल खतरनाक बढ़ने की वजह से धीरे-धीरे आपके सबसे नाजुक ऑर्गन्स बर्बाद होने लगते हैं। जैसे कि दिल, आंखें, किडनी और नर्व्स। डायबिटीज इंसान को सीधा नहीं मारती। वो एक्चुअली अंदर से धीरे-धीरे इंसान को खोखला कर देती है। अब यहां एक बहुत इंपॉर्टेंट बात समझना जरूरी है कि इंसुलिन रेजिस्टेंस का मतलब यह नहीं
(03:57) है कि आपके अंदर इंसुलिन रिलीज नहीं हो रहा है। लेकिन प्रॉब्लम यह है कि इंसुलिन रिलीज होने के बाद भी वो ग्लूकोस को सेल के अंदर एंटर करने में फैसिलिटेट नहीं कर रहा है। यह सालों पहले से आपके अंदर डेवलप हो रही होती बीमारी। डायग्नोस्टिक डाटा यह बताता है करीब 58% टेस्टेड लोगों में पहले से ही इंसुलिन रेजिस्टेंस की शुरुआत हो चुकी होती है। यानी कि बीमारी आने से बहुत पहले आपका शरीर कुछ सिग्नल्स देने लगता है कि आपके अंदर इंसुलिन रेजिस्टेंस की शुरुआत हो चुकी है। अब साइंस को एक पल के लिए यहीं रोक देते हैं और वापस चलते हैं
(04:23) 1943 की उस पिक्चर पर। क्योंकि असली सवाल यह है कि हमारे सेल्स के अंदर क्यों या हमारी बॉडी के अंदर क्यों ये इंसुलिन रेजिस्टेंस डेवलप होने लगा? क्यों इंडियन पॉपुलेशन में इंसुलिन रेजिस्टेंस के चांसेस बहुत ज्यादा हैं? इसका जवाब ढूंढने के लिए हमें एक्चुअली हिस्ट्री में जाना होगा। 1858 से लगाकर 1947 तक ब्रिटिश राज के दौरान इंडिया में कई बार भयंकर अकाल या भुखमरी आई। अलग-अलग अनुमान के मुताबिक कॉलोनियल पीरियड में साउथ एशिया में कम से कम 24 से 31 बड़े अकाल देखे गए। सोचिए एक इंसान एक जिंदगी में या उसके परिवार के दो-तीन पीढ़ियों में बार-बार भूख से मर
(04:57) रहे हैं या फिर भूख से तड़प रहे हैं। और इनमें सबसे क्रूर था 1943 का बंगाल का फेमिन या फिर भुखमरी। उस अकाल में करीब 30 लाख लोग मारे गए और ज्यादातर मौतें ऐसी थी जो एक्चुअली रोकी जा सकती थी। उस वक्त की ब्रिटिश सरकार और खासकर विंस्टन चर्चल की पॉलिसीज इस तबाही के लिए काफी हद तक जिम्मेदार मानी जाती है। अलजजीरा जैसी रिपोर्ट्स और हिस्टोरियंस के मुताबिक यह माना गया है कि जो बंगाल की भुखमरी थी उस वक्त जब लोग मर रहे थे तब भी इंडिया से अनाज को एक्चुअली बाहर भेजा जा रहा था और वो रिलीफ प्रोवाइड करने की बजाय यहां से डायवर्ट किया जा रहा था। तो कुछ
(05:29) हिस्टोरियंस मानते हैं कि यह भुखमरी शायद सप्लाई शॉक की वजह से, साइक्लोनस की वजह से और बर्मा के फॉल की वजह से थी। लेकिन यह बात लगभग सभी मानते हैं कि इंसानी फैसलों ने ही अकाल को बहुत ज्यादा भयानक बना दिया था। अब यहां वो बात आती है जो हिस्ट्री की किताबों में नहीं बताई जाती है कि भूख सिर्फ एक पीढ़ी को नहीं मारती है। भूख एक्चुअली आने वाली पीढ़ियों के जींस पर इंसान के निशान छोड़ देती है और अपने निशान छोड़ देती है। यहां आती है एंथ्रोपोलॉजी और उसका एक नया हैरान कर देने वाला फील्ड जिसे हम कहते हैं एपिजेनेटिक्स। इसे जानना बहुत जरूरी है
(06:00) क्योंकि आपके जींस आपका डीएनए एक किताब की तरह काम करता है जिसके अंदर आपके पास्ट जनरेशंस की मेमोरी हमेशा रहती है। एपिजेनेटिक्स वो चीज है जो तय करती है कि उस किताब के अंदर कौन से पेज खुलेंगे या कौन से पेज बंद रहेंगे। यह आपके डीएनए को बदलती नहीं है एक्चुअल में। पर यह तय करती है कि कौन सा जीन ऑन होगा और कौन सा ऑफ रहेगा। और सबसे अजीब बात यह है कि ये ऑन ऑफ के सेटिंग्स जो है कभी-कभी मां-बाप से बच्चे के अंदर और बच्चों से बच्चों के अंदर भी ट्रांसफर हो जाती है। और इस थ्योरी को हम एक नाम देते हैं जिसे हम कहते हैं थ्रिफ्टी फिनोटाइप यानी कि
(06:33) किफायती शरीर। जब एक मां लंबे अकाल में भूख में अपने बच्चे को जन्म देती है तो उस बच्चे के शरीर शरीर जो है वह गर्भ में ही एक सबक सीख लेता है कि दुनिया में एक्चुअली खाना कम है क्योंकि मां भुखमरी से ऑलरेडी तड़प रही है। इसलिए जो भी मिलेगा उसे वह जमा करने लगता है। तो फैट स्टोर होने लगता है बॉडी के अंदर और कम में ही जिंदा रहने की वह एक स्ट्रेटजी बना लेता है। वैसे देखें तो एक जीनियस सर्वाइवल स्ट्रेटजी है। उस दौर में इसे काफी किफायती प्रूव किया। जो शरीर फैट स्टोर कर सकता था जो कम खाने में भी चल सकता था वही एक्चुअली अकाल के अंदर बच भी
(07:05) पाएगा। तो ये एक तरह का एडप्टेशन था जिसे हम एडप्ट जिसे हम अनुकूल स्ट्रेटजी कह सकते हैं एंथ्रोपोलॉजी के हिसाब से। इसे कहते हैं स्टार्वेशन एडप्टेशन। और यह सिर्फ एक थ्योरी नहीं है। दुनिया भर के अकालों में जो स्टडीज की गई है उनमें भी ठीक यही बात पाई गई है। चाहे वो नीदरलैंड्स का डच हंगर विंटर हो या चाइना का ग्रेट फेमिन हो या स्वीडन के रिकॉर्ड्स देख लीजिए। तीनों में यह पाया गया कि अकाल झेलने वाले बच्चे और उनके मामलों में उनके पोते-पोती तक कार्डियो मेटाबॉलिक बीमारियों से ज्यादा शिकार होते हैं। चाइनीस फेमिन सर्वाइवर्स में डीएनए
(07:36) मिथाइलेशन जो कि एपिजेनेटिक बदलाव का एक बहुत ही इंपॉर्टेंट साइन है वो ज्यादा पाया गया है। [गला साफ़ करने की आवाज़] और साउथ एशियंस जिन्हें टाइप टू डायबिटीज ज्यादा हो जाती है उनमें भी यह डीएनए मिथाइलेशन एक्चुअली बाकी पॉपुलेशन से कई गुना ज्यादा पाया गया है। यही एक डॉक्टर हैं जिनका नाम है मोबीन सैयद। वो और उनके साथियों ने 2022 की एक रिसर्च में पूरी कहानी को जोड़ दिया। उन्होंने यह तर्क दिया कि जिस तरह साउथ एशियंस में इतने सारे इतने भयानक अकाल झेले हैं, उस आबादी का एक्चुअली शरीर स्टार्वेशन अप्टेड हो गया है। और यह किफायती यानी कि स्टार्वेशन
(08:08) एडप्टेड उन कॉलोनियल फेमिनंस में और गहरी हो गई थी। लेकिन बहुत जरूरी बात यह है कि हम सच से आगे ना बढ़े। यह एक स्ट्रांग हाइपोथेसिस है। यह एक्चुअली एक शक्तिशाली संभावना है ना कि एक 100% प्रूव किया गया सत्य हो। इंसानों में एपिजेनेटिक चेंजेस का सीधा गर्भ से जुड़ा असर तो काफी सॉलिड है। लेकिन उसका तीन-तीन पीढ़ियों तक जाना अभी भी साइंस में एक रिसर्च का इंपॉर्टेंट विषय बन चुका है। इसलिए हम यह नहीं कहेंगे कि अंग्रेजों ने एक्चुअली हमारे यहां इंसुलिन रेजिस्टेंस क्रिएट किया। यह तो एक साबित फैक्ट ही है। हम यह कहेंगे कि एक गहरा एविडेंस से जुड़ा इशारा है कि हमारी
(08:42) आज की बीमारी की एक जड़ हमारे भूखे इतिहास में भी हो सकती है। तो फिर इंसुलिन आखिर रेजिस्टेंस हमारे यहां आया कैसे? इसका मतलब लिटरल चोरी नहीं है। इंसुलिन तो 1921 में ही डिस्कवर हुई थी। लेकिन इसका मतलब यह है कि अंग्रेजों की पॉलिसीज ने हमारे पूर्वजों या एनसेेस्टर्स से उनके पोषण, उनके न्यूट्रिशन इतनी बुरी तरह से छीनी कि हमारे शरीर को परमानेंटली एक स्केरसिटी मोड में उन्होंने छोड़ दिया। यानी कि एक कमी उन्होंने क्रिएट कर दी। उन्होंने हमारी पीढ़ियों की मेटाबॉलिक हेल्थ को चुरा लिया। और उस चोरी का बिल आज तक आप और हम भुगत रहे हैं। अब यहां एक इंपॉर्टेंट
(09:14) सवाल उठता है कि अगर यह किफायती शरीर एक अच्छी चीज थी जिसे हमें जिंदा रखा जिसने इतने भुखमरी में हमें जिंदा रखा तो आज वो बीमारी कैसे बन गई है? इसका जवाब एक शब्द छुपा है जिसे हम कहते हैं मिसमैच यानी कि इवोल्यूशनरी मिसमैच। सोचिए कि हमारा शरीर सदियों तक भूख के लिए तैयार हुआ था। यह मानकर चल रहा था कि खाना हमेशा कम ही रहेगा। और फिर सिर्फ एक दो पीढ़ी में सब कुछ बदल गया। ग्रीन रिवोल्यूशन आया। अनाज भरकर पैदा हुआ। शहर बसे और अचानक हमारे सामने खाने का पहाड़ आ गया। चावल हो, रोटी हो, चीनी हो, तेल हो, सब कुछ बिना कमी के अवेलेबल हो गया। अब वो किफायती शरीर जो हर
(09:53) चीज को फैट में बदलकर बचा के रखने के लिए बना था, उसे अचानक इतना खाना मिल गया जिसे वो संभाल ही नहीं पा रहा है। वो अभी भी सोच रहा है कि अकाल आएगा और बचा के रख लेना चाहिए। जबकि अकाल अब कभी नहीं आएगा। और इसका नतीजा क्या है कि जो ग्लूकोस था वह फैट की तरह आपकी बॉडी के अंदर कन्वर्ट होता जा रहा है। खासकर पेट के आसपास वाले एरियाज में यह बहुत ज्यादा जम जाता है और इसी की वजह से आपके यहां पर इंसुलिन रेजिस्टेंस होता है। यही वजह है कि साउथ एशियंस में एक खास टाइप की बॉडी टाइप पाई जाती है। एंथ्रोपोलॉजी में इसे कहा जाता है थिन फैट फिनोटाइप। यानी कि बाहर से
(10:24) दुबला पतला दिखने वाला इंसान जिसके शरीर के अंदर खासकर पेट में फैट एक्चुअली बहुत ज्यादा लेवल्स पर जमा होता है। एक इंडियन जिसका वेट नॉर्मल लगता है वो भी अंदर से एक्चुअली मेटाबॉलिकली मोटापे का शिकार हो सकता है। उसके अंदर विसरल फैट्स जमा हो रहे होंगे। इसीलिए हमारे यहां पतले लोग भी डायबिटीज के शिकार हो जाते हैं जो वेस्टर्न लोगों को काफी हैरान कर देता है। तो आप पूरी तस्वीर जोड़िए। एक तरफ हमारे पूर्वजों का भूखा अकाल से झेला हुआ इतिहास जिसने हमारे शरीर को शरीर को कमी के लिए प्रोग्राम किया था। दूसरी तरफ आज का दौर जिसमें खाना भी ज्यादा है और मेहनत भी कम
(10:56) है। और इस आज के दौर ने लोडेड गन का ट्रिगर दबा दिया है। कैसे कि पहला हमारी प्लेट आज की इंडियन डाइट रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट से भरी हुई है। सफेद चावल, मैदा, चीनी। जब इन चीजों को फाइबर के बिना बड़े प्रोपोर्शनंस में खाया जाता है तो यह सीधा खून में शुगर का बम बन जाती है और पहले से थके हुए पैंक्रियाज पर हमला करती है। दूसरा हमारी लाइफस्टाइल कभी हमारे पूर्वज खेतों में दिन भर मेहनत करा करते थे। आज हम कुर्सी पर बैठे स्क्रीनंस के सामने घंटों काम करते हैं। शहर की सेडेंट्री लाइफ यानी कि बैठी हुई जिंदगी, बढ़ता हुआ स्ट्रेस और प्रोसेस्ड फूड तीनों
(11:30) ने मिलकर हमारे इस किफायती शरीर को सीधा बीमारी की तरफ धकेल दिया है। इसीलिए 90% से ज्यादा डायबिटीज टाइप टू है जो पूरी तरह इसी लाइफस्टाइल से जुड़ा हुआ है। और तीसरा डायबिटीज अकेला नहीं है। वो अपने साथ एक पूरी फौज लेकर आता है। डाटा बताता है कि 90% से ज्यादा हाई ब्लड शुगर वाले रिपोर्ट्स में लिवर, कोलेस्ट्रॉल, हार्ट या थायरॉइड में भी गड़बड़ी मिलती है। हर चार में से एक हाई शुगर वाले इंसान को थायरॉइड की भी प्रॉब्लम होती है और धीमा थायराइड मेटाबॉलिज्म को और स्लो कर देता है। उसकी वजह से शुगर को कम कर पाना और मुश्किल हो जाता है। तो यह एक तरह से एक
(12:04) विशियस साइकिल बन जाती है। एक इसे कह सकते हैं दुष्ट चक्र बन जाता है जिसमें एक बीमारी दूसरे को बीमारी को और प्रमोट करती है। अब यहां तक सुनकर आपको लग सकता है कि यह एक लाइफ सेंटेंस है। एक ऐसी सजा जो हम बदल नहीं सकते हैं। लेकिन यह सच नहीं है। और यही इस वीडियो का एक्चुअली सबसे इंपॉर्टेंट हिस्सा है। क्योंकि जींस आपके डेस्टिनी नहीं होते हैं। वो एक लोडेड गन हो सकते हैं। पर ट्रिगर एक्चुअली हमारे हाथ में होता है। और अगर हम ट्रिगर नहीं दबाएंगे तो वह गोली कभी भी नहीं चल सकती है। और यह सिर्फ एक उम्मीद नहीं है। यह एक्चुअली डाटा भी साबित करता है। रियल
(12:37) वर्ल्ड डायग्नोस्टिक डाटा बताता है कि जिन लोगों ने अपने आप को 6 महीने के अंदर दोबारा टेस्ट कराया उनमें से करीब 22% लोगों का ब्लड शुगर वापस नॉर्मल पर आ गया। और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने सिर्फ मॉनिटरिंग और जल्दी अपनी लाइफस्टाइल के अंदर चेंजेस किए। इसका मतलब प्री डायबिटीज को रिवर्स किया जा सकता है। उसे वापस मोड़कर ठीक भी किया जा सकता है। लेकिन एक चेतावनी भी जरूरी है कि अभी हाल ही में यह कि टाइप टू डायबिटीज वाले सिर्फ 7% लोग ही अपने सारे मेटाबॉलिक टारगेट्स यानी शुगर, ब्लड ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल तीनों को
(13:07) कंट्रोल करने में सक्सेसफुल हो पाते हैं। यानी कि जंग जीती जा सकती है पर अभी हम जीत नहीं रहे हैं इससे। तो आखिर रास्ता क्या है? इसे दो लेवल पर आप देखिए। एक व्यक्तिगत लेवल पर वही पुरानी पर साइंस से साबित हुई बातें यानी कि रिफाइंड कार्ब्स को कम करिए। प्लेट में प्रोटीन और फाइबर बढ़ाइए। दिन में थोड़ी मूवमेंट जरूर कीजिए और खाना खाने के बाद में एक छोटी वॉक भी कीजिए ताकि शुगर स्पाइक को कम कर सकें। और सबसे जरूरी अगर आप 30 साल से ऊपर हैं तो साल में एक बार अपना शुगर टेस्ट जरूर करवाइए। चाहे आप बिल्कुल ठीक महसूस कर रहे हो तब भी करवा लीजिए। क्योंकि याद रखिए
(13:38) 57% लोगों को यह पता ही नहीं है कि उन्हें डायबिटीज है। और दूसरा देश के लेवल पर यह है कि सरकार ने एक खतरे को पहचाना है। आयुष्मान भारत के हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स के तहत अब 30 साल से ऊपर हर व्यक्ति की कॉमन नॉन कम्युनिकबल डिजीज जैसे डायबिटीज, ब्लड प्रेशर की स्किनिंग का टारगेट भी उन्हें दिया गया है। यह एक [गला साफ़ करने की आवाज़] बड़ी सोच है। महंगे हॉस्पिटल्स इलाज से हटकर सस्ती जल्दी जांच और प्रिवेंशन की तरफ। क्योंकि जिसने पहले पकड़ लिया उसे रिवर्स किया जा सकता है। तो चलिए इस पूरी कहानी को एक जगह लेकर आते हैं। इंडिया दुनिया का डायबिटीज
(14:10) कैपिटल सिर्फ इसलिए नहीं बना कि हम मीठा खाते हैं। यह एक बहुत गहरी पुरानी और बहुत पुरानी कहानी है। एक तरफ कोलोनियल फेमिल्स ने उस भूख ने जो हम पर थोपी गई और हमारे शरीर को कमी के लिए प्रोग्राम किया गया। एक किफायती फैट बचाने वाले शरीर को बना दिया गया। और दूसरी तरफ आज के अबंडेंस ने इस खाने को और आराम वाली दुनिया को उस पुराने प्रोग्राम शरीर को सीधा बीमार बना दिया। पुरानी भूख और नई भरी हुई दुनिया भरपूरी वाली दुनिया या अबेंडेंस वाली दुनिया ने मिलकर इस एपिडेमिक को क्रिएट किया है। और यही इस कहानी का सबसे गहरा सबक है कि हमारी सेहत सिर्फ हमारी प्लेट
(14:43) की कहानी नहीं है। वो एक्चुअली हमारे इतिहास की, हमारे पूर्वजों के दुख की और उन फैसलों की कहानी है जो हमसे पहले लिए गए थे। लेकिन इतिहास हमारी किस्मत नहीं है। वो सिर्फ हमारी शुरुआत है। अंग्रेजों ने शायद हमारे पूर्वजों से उनकी पोषण को छीन लिया था। उनके शरीर को एक जाल में बांध दिया था। लेकिन उस जाल को तोड़ने की चाबी आज हमारे और आपके पास में है। हमारी प्लेट में है। हमारे रोज की वॉक में है और एक सालाना टेस्ट के अंदर छुपी है। क्योंकि असली आजादी सिर्फ 1947 में मिली थी। असली आजादी वह भी है जब हम अपने इतिहास को बोझ जो हमारे खून में लिखा गया है उसे समझकर
(15:18) उसे बदलने का फैसला करें। और वह आजादी किसी सरकार से नहीं हमारी अपनी थाली से शुरू होती है। अंग्रेजों ने हमें भूखा रखा। अब भरपूर रहना और समझदारी से रहना यह एक्चुअली हमारे हाथ में है। तो ध्यान रखिए यह एक बहुत इंपॉर्टेंट इशू है। अगर आपको यह पसंद आया एनालिसिस तो प्लीज कमेंट करके बताइए। माय नेम इज मंगल सिंह एंड आई टीच एंथ्रोपोलॉजी स्टडी आईक्यू। स्टडी आईक्यू आईएस आपका सिलेक्शन [संगीत] हमारा मिशन।

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