Sunday, July 19, 2026

Nath Sampradaya Secrets Explained | Navnath, Gorakhnath, Matsyendranath, Tantra & Kundalini Truth

Nath Sampradaya Secrets Explained | Navnath, Gorakhnath, Matsyendranath, Tantra & Kundalini Truth

Author Name:YTMahendra Podcast

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Transcript:
(00:00) आप स्त्री के साथ में संभोग्रत रहते हुए भी आप ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते हो। उसी पे ही नवनाथ ने कितनी बड़ी बात कही। भगमुखी व्यंद अग्नि मुख पारा। अग्नि कहां? जो योनि मार्ग में वहां पे लिंग स्खलित हो जाता है। मतलब जहां तुम स्त्री के साथ में अपनी ऊर्जा को संरक्षित रखते हुए उसको उर्द गामी करते हो तो शिव [संगीत] तुल्य हो जाते हो। जहां चमड़ी का सुख भी तुमने लिया नहीं और तुमने अपने पार्टनर को भी शांत किया, सेटिस्फाइड किया। यह संभोग है। इसलिए ओशो जी कह गए थे संभोग से समाधि तक। शुभांकर मिश्रा जी ने एक पॉडकास्ट किया सीमांत जी को लेते हुए। पता नहीं उसने ऐसा
(00:37) क्या बोल दिया होगा। क्या ऐसा संभोग उसने बता दिया। आम दुनिया ने उसको सर्च कर करके कर करके Google की फर्स्ट लेडी बना दी। लोग कहते हैं कि सीमा आनंद को क्रांतिकारी बता रहे हैं। अगर सीमा आनंद जी उनकी रोल मॉडल है। वो क्रांतिकारी महिला होनी चाहिए तो फिर सनी लियोनी ने क्या अपराध किया? वो तो प्रैक्टिकल करके बता रही है। सनी लियोनी को रोल मॉडल बना लो ना। आप लगा लोगे अपने घर में कर लोगे उसकी पूजा। तुम्हारे क्रांतिकारी लक्ष्मीबाई तो है नहीं। जितनी भी बॉलीवुड की हीरोइनें ये क्या है? गणिकाएं ही तो है जिनको आप आजकल की भाषाओं में रशिया बोलते हैं।
(01:08) कंट्रोवर्शियल हो जाएगा। तो होने दो कंट्रोवर्शियल। तो ये तो तुम्हारी रोल मॉडल है। गोरखनाथ [संगीत] जी ऐसा कहते हैं कि उन्होंने क्रोधश। नेपाल में जितने भी बादल थे उनको पकड़ा और अपने आसन के नीचे दबा लिया। बादल तुमने दबा लिए तो बारिश कहां से हुई? नेपाल में 12 वर्ष का सूखा पड़ा। जनता त्राहि करने लगी। तब मत्सिंद्रनाथ [संगीत] जी ने कहा कि भाई मैं जानता हूं गुरु गोरक्षनाथ जी को और मत्सिंद्रनाथ जी ने सारे बाजू छुआए। गुरु गोरक्षनाथ जी से बढ़कर कोई नाथ नहीं। अपने पूर्व जन्मों की प्राप्ति से नाथ पंथ में दीक्षा मिलती है। आज के इस खास एपिसोड में हम बात करने वाले
(01:42) हैं भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के एक रहस्यमय और प्राचीन पंथ नाथ संप्रदाय के बारे में और हमारे साथ है डॉक्टर पूजा शर्मा जी जो एक एस्ट्रोलॉजर और पैरानॉर्मल एक्सपर्ट है और वह भारतीय दर्शन एंड तंत्र परंपरा पर डीप नॉलेज रखते हैं। तो इस एपिसोड में हम जानेंगे नाथ योग्य की परंपरा और भगवान शिव को आदिनाथ क्यों माना गया है और कैसे गुरु गोरखनाथ और गुरु मत्सेंद्र नाथ ने इस परंपरा को पूरे विश्व में फैलाया। [संगीत] [संगीत] तो आज हमारे साथ है पूजा शर्मा जी जिनसे
(02:28) हम डिटेल में बात करेंगे तो फिर से स्वागत है आपका वाईटी महेंद्र पडकास्ट में। थैंक यू महेंद्र जी। मैम हमने जैसे लास्ट पडकास्ट हमने चक्राज भी किया था। तो लास्ट में हमने बात की थी कि चक्राज रिलेटेड बात हुई थी शायद नवनाथ नाथ परंपरा से रिगार्डिंग। तो आज इसी में हम इसको डिटेल में ले चलेंगे कि ये आपस में कैसे कनेक्टेड है और कैसे काम करते हैं। जी बिल्कुल जैसा कि हमने हमारे दर्शकों को बताया था लास्ट पडकास्ट में कि किस तरीके से कोई व्यक्ति हम इस सांसारिक [गला साफ़ करने की आवाज़] भूमि पे आके शिव तुल्य हो सकता है। हम इस पूरी प्रक्रिया की हमने बात की थी
(03:08) जिसमें हमने षटचक्र जागरण और कुंडली जागरण की बात की। लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या ऐसा संभव भी है क्या या यह केवल सैद्धांतिक बातें हैं केवल किताबों की बातें कर रहे हैं हम बिल्कुल भी किताबी बातें नहीं कर रहे हैं और ऐसा संभव किया सर्वप्रथम इस भूमि पे हमारे नवनाथों ने हम इसलिए हमने शायद ये जिक्र छोड़ा था लास्ट टाइम हम हां अलग से डिटेल बात करेंगे नवनाथ पे नाथ पंथ पे हम बात करेंगे तो हम इसी को जारी रखते हुए यह बताना चाह रहे हैं कि देखिएगा कि जो भारतीय दर्शन तंत्र परंपरा है चाहे आप भारतीय साहित्य उठाइए, दर्शन उठाइए, आप वैदिक साहित्य उठाइए या तंत्र
(03:54) परंपरा उठाइए। मेरे ख्याल से नवनाथ का नाम सब जगह है। है ना? बच्चा-बच्चा और खासकर राजस्थान और हरियाणा का जो हमारा प्रदेश है उसमें नाथ परंपरा खूब फली-फूली। आपको कहीं ना कहीं चलते घूमते जोगी दिख जाएंगे। जिनको हम जोगी भी कहते हैं। योगी हैं वो एक्चुअली लेकिन हमारे यहां उनको जोगी भी कहा जाता है जो अपने भगवान धारण करते हैं और मोटे-मोटे कुंडल पहनते हैं। तो ऐसा है कि इस तत्व पे चर्चा करना बड़ा अनिवार्य है कि भाई क्या कोई व्यक्ति वास्तव में सारे चक्रों का भेदन करके अपने कुंडलिनी को जिसको हमने कहा था जी कुंडलिनी कुल है। हम
(04:37) तो वो अपने अकुल से मिला सकता है। तो हमने कहा बिल्कुल मिला सकता है और यह करके दिखाया था नवनाथ ने और नवनाथ वो नाथ हैं जो अयोनिज है का जन्म नहीं हुआ जिनका माता के गर्भ से जन्म नहीं हुआ इसलिए वो अयोनिज कहलाए तो एक हमारे यहां अयोनिज हम किसको मानते हैं शिव भगवान शिव को हमने कभी नहीं सुना कि भगवान शिव का जन्म हुआ ऐसी कोई कथा हां उनके पिता कौन थे कभी सुना नहीं कभी नहीं सुना यानी साक्षात भोलेनाथ क्या है? वह अनादि है और अनंत है। वो स्वयं अयोनिज है। तो ठीक इसी तरीके से नवनाथ भी अयोनिज थे। इसलिए नाथ परंपरा में
(05:23) नवनाथ को साक्षात शिव का स्वरूप बताते हैं। तो जैसे हम बेसिक से स्टार्ट करते हैं। तो हम नवनाथ बोलते हैं। नवनाथ परंपरा की शुरुआत हुई। तो हमारे सबसे पहले नाथ कौन देखिएगा सबसे पहले नवनाथ थे आदिनाथ जी ओके है ना और होता क्या है कि जब कोई अवतार पैदा होता है या कोई अवतार अवतरित होता है है ना तो हर परंपरा कोशिश करती है कि उसको अपने में मिलाने की भाई ये हमारे हैं। हम तो आदिनाथ जी को मिलाने के लिए सब ने प्रयास किया। वेद परंपरा हम कहती है वेद के तो थे ही आदिनाथ जी लेकिन वही जैनिज्म में भी है उनका वर्चस्व बुद्धिज्म में भी उनका वर्चस्व है। तो सब
(06:08) ने कोशिश की कि ये तो हमारे हैं। ये तो हमारे हैं। है ना? लेकिन आदिनाथ जी नवनाथ के प्रथम नाथ थे। ओके। तो जैसे हम नाथों को देखते हैं और जैसे अभी आपने बताया कि वो कुंडल पहने हुए हमें दिखते हैं तो ये कुंडल परंपरा कैसे शुरुआत हुई या इसका क्या मतलब होता है? ये बड़ा रोचक तथ्य है। ऐसा कहते हैं कि अगर कुंडल नहीं तो वो नाथ नहीं। हम है ना? क्योंकि ये एक देखिएगा दिव्य परंपरा है। क्योंकि हम जहां देखते हैं वेशभूषा को देख के हमें पता चलता है भाई ये नाथ है। ये तांत्रिक है ये अघोरी है। क्योंकि वेशभूषा के के रूप में भी हम देखते हैं।
(06:44) जानते हैं। तो इसीलिए कुंडली इनके प्रतीक स्वरूप है। पहचान है कि ये नाथ है। तो नाथ में क्या हुआ था? आप देखिएगा भगवान शिव का स्वरूप भगवान शिव साक्षात मोटे-मोटे कुंडल धारण करके रखे हुए हैं। तो वो कुंडल एक्चुअली प्रतीक है सत्य ज्ञान का हम विवेक ज्ञान का मिथ्या ज्ञान नहीं सत्य ज्ञान तो ऐसा कहते हैं कि एक बार आदिनाथ जी जब भगवान शिव की तपस्या कर रहे थे और खूब खूब खूब अनगिनत सालों उन्होंने भगवान शिव को मनाने की तपस्या की तो जब भोलेनाथ प्रकट हुए तो उनका ध्यान गया भो भोलेनाथ जी के कुंडलों पे आदिनाथ जी का तो उन्होंने बोला कि मैं तुमसे प्रसन्न
(07:27) हूं। तुम बोलो क्या मांगते हो? तो आदिनाथ जी ने कहा जी ये आपके कुंडल बड़े चमक रहे हैं। ये दे दो मुझे। भगवान शिव ने कहा कि ये मैं दे नहीं सकता क्योंकि यही तो पूरे ब्रह्मांड में सत्य ज्ञान के प्रकाशक हैं। हम ये जो प्रकाश इनसे निकल रहा है ये कोई साधारण प्रकाश नहीं है। ये सत्य है। ये सत्य है। तो फिर भी वे उनसे प्रसन्न थे। तो भगवान शिव ने अपने कुंडल की छाया दे दी। बोलो यह लो यह मेरे कुंडल की छाया रखो और आज के बाद तुम भ्रमण करो। तुम आज के बाद ऐसे नाथ प्रसिद्ध होगे जो कहीं रुकेगा नहीं एक जगह और आप देखिएगा जो हमारे नाथ
(08:10) पंथ के जितने भी जोगी हैं ये जगह-जगह जगह-जगह विचरण करते हैं। क्यों करते हैं? क्योंकि वो जो शिव के कुंडल मिले थे आदिनाथ जी को वो उन्होंने कहा कि शिव ने कि तुम सब जगह जाओ घूमो और मेरे इन कुंडलों यानी सत्य ज्ञान का प्रकाश फैलाओ पूरी दुनिया में तो जितने भी जोगी हैं नाथ योगी हैं वो देखिएगा कुंडल धारण करते हैं कान चिरवाते हैं यहां थोड़ा सा फर्क है जो हमारे मत्सेंद्र नाथ जी हुए हम मत्सेंद्र नाथ जी और गुरु गोरक्षनाथ की जो परंपरा है वो यहां पे जो मध्य में चिरवाते हैं कर्ण को हम और जो कनिफानाथ जी जालंधर नाथ जी की परंपरा है वो मुद्रा धारण करते हैं नीचे
(08:54) अच्छा कान के मत्सेंद्रनाथ जी और गोरखनाथ जी बीच में से चिरवाते हैं। हां जो मोटा जो भाग है कान का और इसके पीछे भी एक रोचक रहस्य है। क्या ऐसा कहते हैं कि यहां पे कहीं कान के अंदर कोई एक नस है हम वह जब दबती है तो ब्रह्मचर्य का पूरा मतलब व्यक्ति मनुष्य से मानव से महामानव बन सके और ब्रह्मचर्य उसके जीवन में उदय होने लगता यही हमने सुना था जैसे ये इसके पीछे एक रहस्य ये है कि मेडिटेशन अगर वो जब ध्यान करते हैं तो उनका ध्यान भंग नहीं होता राइट उनका ध्यान केंद्रित रहता है और भटकता नहीं है ये हमने सुना नहीं यानी कि मन की स्थिरता आ जाती है। मन
(09:37) की चंचलता नष्ट होके स्थिरता आ जाती है। और अगर आपका मन स्थिर हो गया जिसकी हम आगे पूरी बात करेंगे। हम इस पूरे पडकास्ट में अगर हमारे दर्शकों को बहुत कुछ जानने को मिलने वाला है। हम पूरा कवर करेंगे योग को भी। पतंजलि दर्शन हठ योग सब कवर करेंगे। तो देखिएगा ऐसा कहते हैं कि अगर आपका मन स्थिर है तो ब्रह्मचर्य की पकड़ मजबूत हो जाती है। और नवनाथों ने क्या दर्शन दिया? उन्होंने ब्रह्मचर्य का दर्शन दिया। उन्होंने कहा कि मोह माया से निकलो। ब्रह्मचर्य यानी उर्ध्व रेतस बनो। हे मनुष्य तू उर्ध्व रेतस बन। हम और आज हर कोई व्यक्ति क्या करता है? सारी
(10:22) ऊर्जा तो नीचे से बहा देता है और इसी ऊर्जा को हम कैसे ऊपर खींच के कुल से अकुल मिला के हम हमारा आध्यात्मिक जो जागरण कर सकते हैं ये बात हमने पूरी कुंडलिनी वाले पडकास्ट में बात की थी हम तो खैर साइंटिफिक मुझे नहीं पता बट हां अगर यहां से कोई नस वैसे तो सारे पॉइंट्स हैं कान में हम जानते हैं हाथ में है तलवों में है तो कान में भी है तो कहीं ना कहीं कहीं कोई नसबती होगी। अब कहने का अर्थ है कि अह क्या यह कुंडल श्रृंगार प्रति स्वरूप है? और क्या नवनाथों में अनिवार्यता है? क्या अगर आपने नाथ परंपरा से दीक्षा ली है तो क्या कुंडल पहनना
(11:08) अनिवार्य है? या बिना कुंडल के नाथ होंगे? तो ऐसा कहते हैं कि जो कुंडल पहनना अनिवार्य किया वो किया गुरु गोरक्षनाथ जी ने। आदिनाथ जी से इतना अनिवार्यता नहीं थी। उन्होंने इतना स्ट्रिक्टली नहीं बोला पहनो तो ठीक है नहीं पहनो तो ठीक है लेकिन गुरु गोरक्षनाथ यहां पे जब हम नवनाथ में बात करेंगे तो एक्चुअली हम बात करेंगे गुरु गोरक्षनाथ जी की क्योंकि गुरु गोरक्षनाथ जी ने क्रांति कर दी कैसी क्रांति योगिक क्रांति उन्होंने कहा अरे कहां तुम दलदल में फंसे पड़े हो सारा सारी जनता हम बस मोह मोह मोह तो उन्होंने एक योगिक क्रांति दी और मनुष्य को कहा कि नहीं
(11:48) उर्ध्व रेतस बन इंद्रियातीत बन अपने इंद्रियों पे, कर्मेंद्रियों पे, मन पे, अहंकार पे, इन पे विजय प्राप्त कर। हम जैसे नाथ बोलते हैं या नवनाथ बोलते हैं तो इस नाथ शब्द का अर्थ क्या होता है? क्या समझे इसको हम? बिल्कुल ठीक कहा क्योंकि कोई भी परंपरा अपने नाम से पहचानी जाती है और उसका नाम ऐसे ही नहीं रख दिया जाता। है ना? उसके अर्थ होते हैं। तो हम कहते हैं कि जो ना शब्द है तो ना से अर्थ होता है कि ऐसा कोई योगी जो हर वर्जना हर वर्जना को जीत कर आया है और थ है जैसे जैसे कोई भुवंत का थ मतलब स्थिरता तो कोई ऐसा गुरु पद पे कोई व्यक्ति है जो
(12:30) इस पूरे भुवन तरह की को स्थिर किए बैठा है तो जो नाथ शब्द है वो एक तरीके से इंद्रियातीत कोई गुरु है ना जो उधरेतस गुरु है उसको प्रकट करता है नाथ का एक अर्थ होता है परम पद तो हम कहते हैं ना कि जी शिव तुल्य हो जाओ तो जो शिव तुल्य होगा जो परम पर प्राप्त करेगा जो परमहंस हो जाएगा वो नाथ होगा जो अपनी मोह माया इंद्रियों पे विजय पा चुका हो पा लेगा तो वो तो साक्षात शिव तुल्य ही हो गया ना उसमें और भगवान शिव में कोई भेद नहीं बचा अब तो इसलिए हम कहते हैं ना भोलेनाथ हम
(13:14) देखिए वो भी नाथ है और भगवान शिव योगियों के योगी हैं। हम है ना? आप देखिएगा शैव संप्रदाय में उनको योगीराज कहा तो उससे बड़ा योगी तो कोई नहीं है। और [नाक से की जाने वाली आवाज़] नवनाथ ने उन्हीं को ही उसी पद को प्राप्त करने की कोशिश की और किया भी और सबसे बड़ी दिव्य बात तो मुझे यह लगी कि मुझे तो लगता है ये शिव ही हैं। क्योंकि देखिएगा किसी नाथ का जन्म गोबर के पिंड से हुआ। किसी नाथ का जन्म मछली से हुआ। मतलब माता के उससे नहीं हुआ। मछली के अंश से हुआ। हम तो ये भी अयोनि थे। तो मुझे लगता है कि साक्षात भगवान शिव इस पूरे संसार को ये
(14:00) प्रवचन देने आए थे। ऐसा ज्ञान देने आए थे। नवनाथ का तो केवल नाम था वो शिव ही है कि देखो एक योग मार्ग। जैसे हमने बात की ना शक्ति मार्ग शव मार्ग उन्होंने एक योग मार्ग दिया कि तुम योग के बिना इंद्रियातीत नहीं हो सकते। तुम योग के बिना समाधि तक नहीं पहुंच सकते। तो इसलिए हम इतनी आज चर्चा कर रहे हैं कि मान लीजिए मैंने आपसे कहा कि महेंद्र जी ये चार घंटे पाठ करना है। हम ठीक है? तो आपकी कुंडली जागृत हो जाएगी या छोड़िए आपका आध्यात्मिक वो शुरू हो जाएगा। हम तो आपने कहा जी मेरा मन नहीं लगता इसमें मैं नहीं कर सकता ये
(14:45) तो मैंने कहा चलो छोड़ो आप कीर्तन करो आपने कहा कीर्तन भी मैं कितने दिनों तक करूं तो मैंने कहा चलो ये भी छोड़ो एक्सरसाइज में मन लगता है हम हमने कहा मैं वो कर लूंगा तो फिर हमने एक रास्ता दिया भगवान शिव ने एक रास्ता दिया कि जिनको योग में आसन में मन लग रहा है एक्सरसाइज में मन लग रहा है तो वह भी मुझे प्राप्त कर सकते हैं तो इसके बहुत सारे रास्ते बना दिए गए वन वे फोर वे कह सकते हैं जिसको जो अच्छा लगे वो ले हां आप देखिएगा श्रीमद् भगवत गीता में कहा गया है वहां योग भी तीन तरह का है ज्ञान योग कर्म योग भक्ति योग हम तो भगवान कृष्ण को तीन योग देने की क्या
(15:27) जरूरत थी भाई एक ही लेके आते ना वो पर उन्होंने देखा कि अलग-अलग प्रवृत्ति के लोग हैं हम ज्ञान योग मतलब जिसको सत्य ज्ञान की खोज करनी है जो तर्क वितर्क करेगा आपसे हम वो अनुस अनुसंधान करेगा ज्ञान पर रिसर्च करेगा वो बैठेगा नहीं हम वो ज्ञान योग है वो सत्य को प्रकाशित करेगा अब किसी को नहीं मन लगता पढ़ने लिखने में नहीं पढ़ते लोग नहीं चाहिए उनको सत्य ज्ञान तो क्या करें तो उन्होंने कहा जी तुम अपना कर्म ही कर लो हम जो तुम्हारी ड्यूटी है उसी को ठीक से निभाओगे तो परमात्मा तक मिल जाओगे हम है ना एफर्ट्स करो शारीरिक कर्म करो वही तुम्हारी तपस्या है किसी को कहा जी तो
(16:09) मेरे मेरे से तो ना तो ज्ञान होगा ना मेरे से काम होता ना मेरे से कुछ तपस्या होती उन्होंने कहा चल तू बेटा नाम जपी कर हम तू भक्ति का मार्ग ले भक्ति मार्ग कितना फला फुला भारत में मुगलों का जो साम्राज्य था तो कहने का यह है कि भगवान श्री कृष्ण ने भी तुम्हें तीन योग दिए है ना तो योग याद रखो भारतीय दर्शन परंपरा में योग का हमेशा स्थान रहा आप जैनिज्म में जाओगे तो जैनिज्म के जो पंच पंच रत्न है वो क्या है? योग योग के यम नियम ही तो है। ठीक। उधर आप देखिएगा जो पंचशील है बुद्धिज्म में वो भी योग के यम ही है। तो यानी और इधर शवागम में भगवान शिव योगीराज
(16:52) हैं। तो योग कब नहीं रहा? वेदों में भी योग रहा। अभी के टाइम कौन सा योग ज्यादा अभी के टाइम जैसे बाबा रामदेव को एक इतना क्रेडिट जाता है कि उन्होंने घर-घर तक टीवी के माध्यम से योग पहुंचाया था। हम वो योग कौन सा योग है बेसिकली वो है पतंजलि योग हम जो हमारे ऋषि थे महर्षि पतंजलि उन्होंने जो सांख्य योग आपने नाम सुना होगा तो जो सांख्य है वो योग की सैद्धांतिक बात करता है तो योग दर्शन ने कहा जी ये जो आप बातें कर रहे हो यह मैं करके दिखाता हूं प्रैक्टिकली तो वो योग दर्शन है महर्षि पतंजलि का तो अभी महर्षि पतंजलि का योग का खूब प्रचार प्रसार हुआ
(17:36) लेकिन लेकिन आप नाथ के योग को उससे एकदम अलग करके नहीं निकाल [नाक से की जाने वाली आवाज़] सकते। वो सब मिलाजुला मिक्सचर चल रहा है। तो नाथों ने कौन सा योग दिया? हठ योग। मैंने कहा कि गुरु गोरक्षनाथ जी ने एक योगिक क्रांति फैला दी। कौन सी? हठ योग। नवनाथ ने हठ योग दिया। जिसमें सारा जो मुख्य जो सारा क्रेडिट जाता है वो गुरु गोरक्षनाथ जी को जाता है। हठ योग में वैसे है क्या? क्या चीजें दी हुई है? हम हठ योग की आगे पूरी हठ योग और पतंजलि योग की पूरी हम कंपैरेटिव स्टडी करेंगे। हम बात करेंगे। ओके। जैसे अभी शुरू में अपने बात की कि सबसे
(18:21) पहले जो नाथ हुए वो आदिनाथ जी हुए। तो आदिनाथ जी के बाद में कौन आए? आदिनाथ जी के बाद में हुए मत्सेंद्रनाथ जी ओके और मत्सेंद्रनाथ जी की बड़ी रोचक रोचक कथाएं उनको आपकी उदंतियां भी बोल सकते हो पूरा साहित्य भरा पड़ा है हम लेकिन मेरा थोड़ा सा ये क्योंकि मेरी दृष्टि ज्ञानात्मक है मैं उसमें से दर्शन निकालती हूं किसी भी चीज में से तो मैंने देखा कि जो गुरु मत्संद्रनाथ जी का दर्शन है हम वो थोड़ा सा हटके है गुरु गोरक्षनाथ जी से कैसे और जो मत्सेंद्रनाथ जी हैं तो सबसे पहले तो थोड़ा सा वातावरण हल्का रहे। मैं हमेशा कहती हूं भाई हमारे व्यूअर्स को वो बात
(19:06) सुनेंगे तो थोड़ा सा उनका लेवल ऊपर होना चाहिए ज्ञान का। तो सबसे पहले एक रोचक सी हम घटना बताते हैं कि देखिएगा जो भगवान कार्तिकेय हैं हम वो हमेशा क्या गुस्से में गुस्से में ही रहते थे। मतलब ज्यादा उनसे सहन नहीं होता था। उन्होंने एक दिन कुलागम उठाए और समुद्र में फेंक दिए। कुल आगम क्या? कुल प्लस आगम। कुल कौन? मैंने लास्ट टाइम बताया कुल कुंडलिनी। हम और कुल कुंडलिनी में किसकी बात होती है? शक्ति की। भगवती की। और अकुल कौन है? शिव। शिव। जिसकी पर्टिकुलर बात होती है शिववागम में। हम तो कहते हैं कि कार्तिकेय जी ने सारे आगम भगवती के उठाए, शक्ति के उठाए। उनको कहते
(19:48) हैं कुलगम और सारे शास्त्र फेंक दिए समुद्र में। जा खत्म। अब समुद्र गुस्से घुसे समुद्र में गए तो कौन गया शक्ति गई हम अब शक्ति के बिना अधूरा कौन शिव शिव तो भगवान शिव को लगा ये क्या हो गया शक्ति कौन है इ इकार भगवान शिव ने तो लाने ही थे वापस कुलागम और वो फिर समुद्र में गहराइयों में गए कहते हैं 12 वर्ष लग गए ढूंढने में वापस कुलागम लाने में और 12 वर्ष तक शक्ति के बिना शिव रहे। तो जब वो कहते हैं कि जब कुलागम वो ले आए तो कहीं-कहीं ऐसी किवदंती ही मैं कहूंगी कि वो मत्स मत्सेंद्रनाथ जी के रूप
(20:35) में आए हम और हमारे यहां श्रीमद आदि शंकराचार्य जी ने सौंदर्य लहरी लिखा तो उसमें स्पष्ट बोला उन्होंने पहले ही श्लोक में कि शिव शक्त युक्तो यदि भवती शक्त प्रभु नचे देवम देवो न खलु कुशला स्पंदित मपी कि बिना शक्ति के शिव क्या है? शव के समान शिव तो तभी शिव है जब शक्ति उस पे आरोपित होती है। और बिना शक्ति के शिव एक पत्ता नहीं हिला सकता। क्योंकि शक्ति क्या है? शक्ति में रज है। रज क्या है? रज गति देता है। आपने तीन पढ़े होंगे सत्व रजतम। लेकिन जो रज है वो भगवती में है। और भगवती अगर एक पत्ता
(21:20) भी हिलेगा हवा से तो वो कौन हिला रहा है? शक्ति। अब शक्ति के बिना तो सब कुछ खत्म होने वाला था। इसलिए भगवान शिव लेके आए और वह कहते हैं कि 12 वर्ष बाद तो मत्सेंद्र नाथ जी के रूप में आए। एक ऐसा भी कहते हैं कि एक दिन भगवान शिव भगवती ने देखा कि उन्होंने नर मुंडों की माला पहनी है। तो भगवती ने कहा कि ये नरमुंड किसके हैं? बोला आपके हैं। तो देवी को बड़ा आहत हुआ। तो देवी ने कहा कि भाई जैसे आप अजर और अमर हो तो मुझे भी तो अमरता दो। मुझे भी अमर होना है। मैं क्यों बार-बार मरती हूं? क्यों बार-बार जन्म लेती हूं? आप मुझे भी अमरता
(21:58) का ज्ञान दो। तो भगवान शिव ने कहा, ठीक है देवी मैं दे देता हूं। लेकिन मुझे इस ज्ञान को आपको देने के लिए एक पूरी सृष्टि में ऐसा वातावरण, ऐसी जगह चाहिए जहां कोई और ना सुने। हम ठीक है जी। तो तय हुआ हम समुद्र की गहराइयों में नौका में बैठ के ज्ञान देंगे। वहां कोई ना सुन सकेगा। परिंदा भी ना होगा। हम भगवान शिव गए। बीच समुद्र में नौका विहार हुआ और भगवती को ज्ञान देने लगे। अब कहते हैं कि भगवती को नींद आ गई। लेकिन नौका के नीचे एक बड़ा सा मत्स्य सारा ज्ञान सुन रहा था। और उसने देखा कि ज्ञान में खलल ना आ जाए तो वो हुंकारे भरने लगा। तो भगवान
(22:41) शिव को ऐसा कहते हैं कि लगा भगवती सुन रही है। वो हम करता रहा। सारा ज्ञान हो गया। [हंसी] तो भगवती कहती है आज तो बोले चलो ज्ञान दे दिया आपको मृता का तो उन्होंने बोला मुझे नींद आ गई हम बोले अरे तो फिर ज्ञान में हुंकार कौन भर रहा था तो देखा तो मत्सराज छिपे बैठे हैं तो भगवान शिव ने कहा कि देखिए क्योंकि ये ज्ञान आपने ले लिया तो अब आपको संसार में प्रसिद्ध होने से तो कोई नहीं रोक सकता भाई अब तो तुम ज्ञानवान हो गए हो विवेक ज्ञान आ गया तुम्हारे अंदर सत्य ज्ञान आ गया है तो प्रसिद्धि तो तुम्हारी फैलेगी लेकिन तुमने धोखे से लिया
(23:16) हम तो ऐसा एक अवसर आएगा कि तुम उस समय हमारा सारा ज्ञान भूल जाओगे। सारा सत्य ज्ञान तुम्हारे दिमाग से निकल जाएगा उस अवसर पे। तो ऐसा कहते हैं कि यहां से फिर मत्संद्रनाथ जी का आरवी भाव हुआ। और भगवान शिव के ही आशीर्वाद से उन्होंने भ्रमण शुरू किया और जगह-जगह जगह-जगह सत्य ज्ञान को फैलाया। तो जैसे इस ज्ञान के बाद में वो भ्रमण करते रहे। जी तो एक बार मछेंद्रनाथ जी कामाख्या भी गए थे तो वो कथा इससे रिलेटेड ही है। बिल्कुल रिलेटेड है। यही तो वह अवसर था। हम मत्सेंद्र नाथ जी को ऐसा तो कोई ज्ञान बाकी ही नहीं था ना जो ना मिला हो। सारा
(23:57) ज्ञान उन्होंने लिया था। सब कुछ उनमें आ गया था। हम सारा तत्व ज्ञान का। ऐसा कहते हैं कि यह भी बड़ा रोचक तथ्य है। है ना? इसको फिर हम और दार्शनिक दृष्टि से भी हम बताएंगे हमारे व्यूअर्स को। पर ऐसा कहते हैं कि एक बार मत्स्य दिन जी भ्रमण करते-करते कामरूप प्रदेश चले गए। हम वहां पे तो ऐसा ऐसा देश है कि भ ऐसीऐसी स्त्रियां थी बड़ी जादूगरनी टाइप। तो ऐसा कहते हैं कि कमला अरुण के साथ में एक और सखी थी। वहां मत्सेंद्र नाथ जी फंस गए। उनके रूप में, मोह में, मायाजाल में और सारा ज्ञान चौपट वसेंद्रनाथ जी का और वो वहां कई वर्षों तक रहे और वो वहां पर
(24:38) स्त्रियां नृतिकियों के नृत्य होते मोह, माया, मदिरा कुछ भी नहीं बचा। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो जब गोरखनाथ जी तक ये बात आई हम भ तुम्हारा गुरु तो वहां फंसा पड़ा है। हम तो गोरक्षनाथ जी ने खूब ढूंढा खूब ढूंढा खूब ढूंढा और वो आए तो पता चला कि नर्तकियों के देश में तो किसी संत को जाने की आज्ञा ही नहीं और गोरक्षनाथ जी को द्वार पे ही रोक दिया गया। तो गोरक्षनाथ जी ने नर्तकी का भष बनाया। नर्तकियां तो जाती थी। तो नर्तकी का भष बनाया। पहुंच गए सभा में। देखे तो गुरु जी तो मदिरा में पूरे लिप्त हैं। चारों तरफ जैसे इंद्र की अप्सराएं हैं। ऐसी
(25:21) स्त्रियां हैं। ये क्या हो गया? तो जब गोरखनाथ जी ने नृत्य आरंभ किया तो उनके घुंघरूओं से आवाज आई संगीत में कि जाग मछंद गोरख आया। जाग मछंद गोरख आया तो गोरख मछिंद्र नाथ जी की एकदम निद्रा टूटी। बोले ये कैसी आवाज है? जाग मछंद गोरख आया और मत्सिंद्रनाथ जी एकदम सारा जैसे धूल छट गई हो अज्ञान की वो उठे और गोरखनाथ जी बोले चलो कहां फंस गए और वो अपने गुरु को उस मोह माया के जंगल से निकाल के लाए और ऐसा कहते हैं आप देखिए कि पूरे इतिहास में सब जगह आपको तथ्य मिलेंगे ऐसे ऐसे वृतांत मिलेंगे कि गुरु ने शिष्य को ज्ञान
(26:07) दिया पर कहीं ऐसा वृतांत नहीं मिलेगा कि शिष्य ने गुरु को हम विवेक ज्ञान इसका भी गोरखनाथ जी को श्रेय जाता है और फिर यही वो क्योंकि शिव जी का वो था ना श्राप था कि एक अवसर ऐसा आएगा तो वो अवसर ये कामरुक प्रदेश का था तो वापस फिर वापस वो ज्ञान आ गया था हां हां जैसे ही क्योंकि वो घुंघरूओं से सहारा उनको उन्होंने स्मृति में लाया और उनका जैसे देखो यह बहुत बड़ी घटना नहीं होती है एक क्षण लगता है वैराग्य होने में एक क्षण लगता है अज्ञान की धूल छटने में छटेगी तो एक क्षण में छटेगी नहीं तो सालों में जब कई जन्मों में नहीं छटेगी तब वो
(26:48) अपने शिष्य के साथ वापस आने में समर्थ हुए हालांकि इसमें और भी बहुत सी कथाएं हैं कि दंतियां हैं तो जिनका तो कोई अंत ही नहीं है और जो ये बातें हुई जैसे आपने ये बताई ये कहां पे लिखी हुई है और किन्होंने दिया ये ज्ञान देखिएगा पूरा भारतीय साहित्य में नाथ साहित्य की कोई कमी नहीं है। हम यह ना केवल भारत में है बल्कि यह तिब्बत क्षेत्र में है। हम यह हमारे नेपाल में भरा पड़ा है। नेपाल में तो महिमा है। नेपाल में तो इनके मेले लगते हैं। इनके अलग से मतलब पाठ पूजा क्या-क्या नहीं है। वहां तो प्रदेश है। हम जो पूरे गोरखा जाती है। है ना? और
(27:26) पशुपतिनाथ जी हैं वहां पे। तो ये क्योंकि भ्रमण करते थे तो वहां पे गोरखनाथ जी का मत्सिंद्रनाथ जी का खूब भ्रमण हुआ। जैसे आपने नेपाल का बताया तो नेपाल में मत्सेंद्र नाथ जी और गोरख जीनाथ जी की और तिब्बत में भी पूजा होती है। तो यहां में इन्होंने जो हठयोग दिया है इन दोनों में कोई अंतर है या सेम ही है या सेम ही माना है। देखिए हठयोग तो अलग हम चर्चा करेंगे लेकिनकि हमने कहा कि ये योगी जो थे वो घूमते थे भ्रमण करते थे। कहीं एक जगह नहीं रुकते थे। तो इनके नेपाल से जुड़े हुए भी बड़े रोचक वृतांत हैं। और सबसे बड़ी हमारे व्यूवरर्स को हम बताएं कि नेपाल और
(28:05) तिब्बतियन जो बुद्ध परंपरा है वहां इनका बड़ा मतलब हम कहेंगे कि साक्षात ये भगवान शिव की तरह पूजे ही जाते हैं। ना बड़ा सम्माननीय पद है इनका वहां पे। और नेपाल में तो ये बंगो के नाम से प्रसिद्ध है। और जो बंगो क्या है? वर्षा और स्मृद्धि का देवता है। वर्षा और स्मृद्धि ओके है ना तो उनको खासकर मत्सेंद्र नाथ जी को वहां बोलते हैं बमो जो कि स्मृति का देवता है हम इनको वहां कहते हैं रातो मच्छिंद्रनाथ रातो रातो मछिंद्रनाथ मतलब बगंतो मतलब करुणामय ये करुणामय देवता है तो इसकी भी कथा जुड़ी हुई है कि इनको क्यों वर्षा का और स्मृद्धि का देवता
(28:49) बताया गया और आपने सुना होगा कि जो तिब्बतियन बुद्धिज्म परंपरा है उसमें उसमें 84 सिद्ध हुए। तो 84 सिद्धों में मत्सेंद्रनाथ जी को मीनप्पा कहा जाता है। यहां ये अपने मत्सेंद्र नाथ जी हैं। वहां मीनप्पा है। तो प्रश्न उठा कि ये कैसे हो गया? भाई जहां-जहां जा रहे हैं नाम चेंज हो गए। हां नाम चेंज हो गए। वहां की जनता के लिए आम जनता के लिए इन्होंने बहुत अच्छे-अच्छे कार्य किए थे। तो ये भगवान के रूप में वहां प्रतिष्ठित हुए। तो 84 सिद्ध साक्षात भगवान तुल्य हैं। उनमें ही मत्सनाथ जी मीनप्पा है। तो एक कथा हमें याद आती है। उस समय नेपाल के
(29:24) राजा हुए करते थे नरेंद्र देव मल हम और गुरु गोरक्षनाथ जी का जाना हुआ भ्रमण काल के दौरान तो ऐसा कहते हैं कि राजा ने उनका सम्मान नहीं किया। उचित सम्मान नहीं किया। उनको प्रणाम भी नहीं किया। तो गोरखनाथ जी ऐसा कहते हैं कि उन्होंने क्रोधवश नेपाल में जितने भी बादल थे हम उनको पकड़ा और अपने आसन के नीचे दबा लिया। अब बादल तुमने दबा लिए तो बारिश कहां से हो? हम तो बारिश नहीं हुई। नेपाल में 12 वर्ष का सूखा पड़ा। जनता त्राह त्राहि करने लग गई। तब किसी ने कहा कि ये ऐसे तो नहीं छोड़ेंगे। हम हठयोग का मतलब समझ गए ना? अरे भाई जो हठयोग का साधक है
(30:08) तो वो फिर छोटी सी बात में भी हठ कर लेता है हम और बड़ी से बड़ी में भी नहीं करेगा तो अब त्राहि त्राहि मची तो किसी ने कहा कि ऐसे तो ये छोड़ेंगे नहीं बादल इनके गुरु को लाओ तुम हम तब राजा मत्सेंद्र नाथ जी के पास गए कि चलिए महाराज आपके शिष्य बादल दबा के बैठे हैं। हम जनता मर रही है। तब मत्सिंद्रनाथ जी ने कहा कि भाई मैं जानता हूं गुरु गोरखनाथ जी को। हम तो उन्होंने कहा कि ऐसे तो वो नहीं छोड़ेंगे। ऐसा करो तुम मेरी यात्रा निकालो एक हम और जैसे ही मेरी यात्रा उनके सामने से निकलेगी हम वो प्रणाम करने अवश्य उठेंगे मुझे हम भाई शिष्य गुरु को तो प्रणाम करेंगे ही ना
(30:47) एकदम से सामने से निकलेंगे तो वैसा ही किया मत्सिंद्रनाथ जी की यात्रा का आयोजन किया गया और जैसे ही उन्होंने देखा कि ये तो मेरे गुरु हैं और खड़े हुए आसन से प्रणाम करने के लिए बादल छूट गए और मत्सिंद्र नाथ जी ने सारे बादल छुड़वाए ओके तो ये भी कथा बड़ी रोचक है एक गुरु और शिष्य शिष्य के मतलब मिलाप की के कई बार शिष्य हट कर लेता है गुरु के सामने पर गुरु तो गुरु होता है बड़ा करुणामय होता है तो तब से ही मत्सेंद्र नाथ जी वहां बुंदंगो के रूप में फेमस हुए जो कि वर्षा का देवता है हम ओके जैसे हम बात करें अगर गोरखनाथ जी की और मत्सिंद्रनाथ जी की परंपरा में क्या
(31:25) अंतर है? देखिए परंपरा इसको हम थोड़ा सा बदलेंगे दर्शन में क्योंकि इनका जो तत्वदर्शन है हम ऐसा है जी कि जब मत्सेंद्रनाथ जी थे तो मत्सेंद्रनाथ जी से पहले भी कॉल ज्ञान था है ना अबकि थोड़ा सा मुझे यह नहीं पता कि मैं इसको किस सांकेतिक में ही बोलूं हमारे व्यूवर्स के लिए थोड़ा मैं समझाती हुई बोलूं जो कॉल ज्ञान है जो कॉलिक होते हैं वो किसी चीज में भेद नहीं समझते हैं। है ना? जैसे वहां कुछ आपके और मेरे समक्ष या आम दुनिया के समक्ष जो बुराई है वो बुराई में भी अच्छाई ढूंढ लेते हैं। हम है ना? तो हम कहते हैं कि सारी दुनिया स्त्री और संभोग के पीछे मरी जा रही है।
(32:12) आप जहां भी उठा के देख लो। हम दो ही बात होती है। तो जो कोलिक थे उन्होंने स्त्री से संभोग के साथ ही परमात्मा की प्राप्ति को ढूंढ लिया। क्या यह संभव है? हम पहले ही बात कर चुके हैं पहले पडकास्ट में कि देखिएगा जी कि जब आप कुंडलिनी जागरण हो रहा है तो उसमें जो सारी प्रक्रिया मैंने बताई अंततः वो क्या थी कि अपनी जो नीचे बह रही ऊर्जा है उसी को तो रेतस किया था हमने। हम कि वो नीचे से बह के खत्म नहीं हो जाए। उसको हमने ऊपर चढ़ाते चढ़ाते चढ़ाते उसमें तीन जो बंद थे उनका आज भी हम बंद बताएंगे उस समय मैंने विस्तृत नहीं बताए थे और जो
(32:55) चक्रों का भेदन करते हुए सुष्मना में जो बह रही है कुंडलिनी और वो यहां तक पहुंच गई तो वही तो ऊर्जा ऊपर चढ़ाई है आपने हम ये कॉल ज्ञान था कि आप स्त्री के साथ में संभोग्रत रहते हुए भी आप ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते हो जैसे आपने देखा होगा कि एक बार आपने छाछ से मक्खन निकाल लिया और वो उसी में पड़ा है क्या वापस उसमें लिप्त होगा वो नहीं वो अलग ही पड़ा रहता है तुम उसको कितना भी प्रेस करना वो घुलता नहीं है हम यही क्या है ये असली ब्रह्मचर्य है कि तुम वहां पड़े रहकर भी उसमें घुल नहीं रहे हो अब तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा
(33:40) तो यह जो कोल ज्ञान था इसका अनुपालन पूरा किया था मत्सेंद्रनाथ जी ने और इन्होंने एक शानदार बुक लिखी कोल ज्ञान निर्णय जो कोलावली निर्णय के ही कुछ समकक्ष है पर इनकी जो कॉल ज्ञान निर्णय है अभी कभी किसी के इंटरेस्ट का हो तो अवश्य हमें पढ़ना चाहिए जिसमें व्यक्ति स्त्री के साथ संभोग्रत रहते हुए अपनी ऊर्जा को स्थलित नहीं होने देता और उसी को ही वो ऊपर चढ़ा लेता है रेत रेतस और वो उर्दू रेतस बनता है तो इसको छोटे से सिंपलीफाई करके ओशो ने कहा था संभोग से समाधि तक पॉसिबल है 100% इसीलिए तो हमने सारी चर्चा की हम
(34:24) इसीलिए तो नवनाथनाथ हुए इस भुवन के मालिक हुए वो कैसे तो जब वो हार्ड मास में थे तो विकृतियां तो क्या पता उनमें भी होगी ना तो उन्होंने एक सिद्ध सिद्धांत पद्धति दी मत्सिंद्रनाथ जी ने दी सिद्ध सिद्धांत पद्धति इसका श्रेय ज्यादा जाता है गुरु गोरक्षनाथ जी को लेकिन ऑडियंस ऐसे कंफ्यूजन में हो जाएगी कि कोई आता है वह बोलता है कि ब्रह्मचार्य का पालन करो। फिर कोई बोलता है कि संभोग से समाधि। हां हां सुनो ना। हां। ये आपके ही पडकास्ट से आज ये जो ज्ञान जाएगा क्योंकि मेरे को लगता है कि बाहरी दुनिया में इस ज्ञान की बहुत आवश्यकता है। अभी
(35:04) हमारा युवा भ्रमित हो रखा है। हम आप बुरा ना मानिएगा। थोड़े समय पहले वो जो शुभांकर मिश्रा जी ने एक पडकास्ट किया। हम सीमा आनंद जी को लेते हुए तो सीमा आनंद तो अपना काम कर रही है हम भाई वो किताबें लिखती है कामसूत्र पे वात्सन पे तो आप जैसा आपने ज्ञान पढ़ा आप वैसा ही तो दोगे और आम दुनिया ने उसको सर्च कर कर के कर करके Google की फर्स्ट लेडी बना दिया क्यों सीमांद में ऐसा कुछ नहीं था लोगों को यह मिसगाइड है हमारी जनता भ्रमित है कि पता नहीं उसने ऐसा क्या बोल दिया होगा हम वह स्क्रॉल कर रहे हैं, ढूंढ रहे हैं कि क्या ऐसा संभोग उसने बता दिया।
(35:48) उसने ऐसा कुछ नहीं बताया। लोग कहते हैं वो क्रांतिकारी महिला है। वो क्रांतिकारी महिला कैसे हो गई? सिर्फ इसलिए कि वो संभोग पर खुल के बात करती है। बस यही है तुम्हारे जीवन में। वो संभोग पर खुलकर बात करती है। वो संभोग के द्वारा उर्धरत सोने की बात नहीं करती है। वो ज्ञान नहीं है वहां पे। उनका ज्ञान उतना ही है। चमड़ी के सुख तक है। वो तुम्हारे रोल मॉडल हो गए। अच्छा एक बात बताओ जो जितनी भी बॉलीवुड की हीरोइनें हैं ये क्या है? गणिकाएं ही तो हैं। इस भारत भूमि पर हम जब सतयुग था, त्रेता युग था, राजाओं का
(36:34) युग था। यहां गणिकाएं होती थी, ग्राम वधुएं होती थी। कौन होती थी ग्राम वधुएं? जिनको आप आजकल की भाषाओं में वैश्या बोलते हम तो हमारी बॉलीवुड की जितनी भी गणिकाएं हैं सॉरी हीरोइन है ये क्या है इनको सबको फिल्में मिलती है क्या ये फिल्मों में मेहनत करके कमाती है क्या इनका पर डे का खर्चा लाखों का है ये ग्राम वधुएं ही तो हैं तो ये तो तुम्हारी रोल मॉडल है ये कंट्रोवर्शियल हो जाएगा तो होने दो कंट्रोवर्शियल कंट्रोवर्शियल तो वो होते हैं ना जो गलत बात कर रहे हैं। हम तो सत्य एट लीस्ट मेरे युवा को एटलीस्ट हमारे यूथ को जरूरी है यह
(37:10) बात यहां तक पहुंचाना। नहीं कई बार एक्टर्स ये दा बताती भी है कि फिल्में कैसे मिलती है और कैसे वो आगे से आगे बढ़ती रहती है। ये सारी चीजें वो एक्सपोज भी करती है। श्रीवांत सुनिए जब हम ज्योतिष कर रहे थे तो छोटे-मोटे ऐसे प्रोग्राम होते थे हम तो हमें इतने आवेदन आते थे कि आप आइए हम फलानी हीरोइन आएगी उससे वो दिलाएंगे। मैंने कहा अब यही औकात रह गई है। यह गणिकाएं देंगी हमें प्राइस। हम हम यहां दिन रात एक कर दिए। हमारी तपस्या में ज्ञान में अब गणिका से हम प्राइस लेके हम हमारी फोटो लगाएं। हमें नहीं चाहिए। हम तो ये तुम्हारे रोल मॉडल नहीं बन सकते।
(37:52) लोग कहते हैं कि सीमा आनंद को क्रांतिकारी बता रहे हैं। ऐसी-ऐसी महिलाओं ने पोस्ट डाली है उनके सामर्थ्य में। अच्छी बात है। मैं कह रही हूं वो तो बेचारी अपना काम कर रही है लेडी। और अगर यह मैसेज मेरा यूथ के लिए है। युवा वर्ग के लिए है कि अगर सीमा आनंद जी उनकी रोल मॉडल है। वो क्रांतिकारी महिला होनी चाहिए तो फिर सनी लियोनी ने क्या अपराध किया? उन्होंने वो सेम प्रैक्टिकल के साथ वो तो प्रैक्टिकल करके बता रही है। जैसा कि हम अभी सांख्य योग की बात कर रहे हैं। सांख्य ने सारा सिद्धांत दिया। योग ने कहा नहीं जी मैं करके बताता हूं। तुम कैसे योग
(38:24) करके परमात्मा को प्राप्त कर सकते हो। तो सीमानंद तो किताबें बात कर रही है। सनी लियोनी को रोल मॉडल बना लो ना। आप लगा लोगे अपने घर में कर लोगे उसकी पूजा। हम इसीलिए हमें बताना जरूरी है कि क्या सही है, क्या गलत है। कितना ग्रहण करने योग्य है और कितना छोड़ देने योग्य है। हम तुम्हारी क्रांतिकारी लक्ष्मीबाई तो है नहीं। जो संभोग पे खुल के बात कर रहा है। जो बात कमरे के अंदर होनी चाहिए। आप अच्छा आपके घरों में 8 साल, 10 साल, 9 साल के बच्चे नहीं है क्या? आप माता-पिता बीइंग या आप मदद फादर क्या उनके सामने ऐसी बातें करते हो? वो एक कौन
(39:06) सा पडकास्ट आया था जिसमें सारी जनता ने उसको तमाचा मारा था जिसने खुले में इस तरह की गंदी बातें की समय के शो में तो हुआ था ना सबने विरोध किया था ना तो वो जो बातें तो वो सिर्फ एक पार्ट है भारतीय संस्कृति का जो वात्सन जी ने लिखा कामसूत्र के रूप में लेकिन पूरा कामसूत्र उठा के आप स्कूलों में पढ़ा रहे हो क्या है क्या आपके सिलेबस में कामसूत्र वात्सन जी का है नहीं तो ये बातें आपकी रोल मॉडल नहीं हो सकती और अगर आज आज आपको इसी टॉपिक पे बात करनी है तो मेरे से कीजिए। लेकिन कोई तो समझाएगा नामासूत्रा लिखा है तो किस लिए लिखा है?
(39:51) बिल्कुल देखिएगा सुख हम सब मनुष्य सुख ढूंढ रहे हैं इस पृथ्वी पे। तो इसमें से सबसे बड़ा सुख क्या है? एक इस चमड़ी का सुख, स्किन का सुख। हम है ना? 5 मिनट, 10 मिनट, 3 मिनट का जो सुख है, उसी पे ही नवनाथ ने कितनी बड़ी बात कही। यही तो आज हम बात करने जा रहे हैं। इसी सुख से तुम अपनी ऊर्जा को स्खलित मत होने दो। समझ रहे हैं? देखिएगा अरे कितनी अच्छी बात याद आई। गुरु गोरक्षनाथ जी ने कहा अपने गुरु मत्संद्रनाथ जी के लिए। वो कहते हैं बग मुखी व्यंद अग्नि मुख पारा जो राखे सो गुरु हमारा। बग मुखी व्यंद का क्या अर्थ हुआ?
(40:36) आप समझ रहे हैं ना? क्योंकि हो सकता है पडकास्ट बच्चे भी सुने मैं इससे ज्यादा इसको नहीं बता सकती भग मुखी बंद अग्नि मुख पारा अग्नि कहां जो योनि मार्ग में जो कर्माहट है जो अग्नि है वहां पे लिंग स्खलित हो जाता है तो वो कहते हैं वहां पे होते हुए भी अग्नि मुख पारा होते हुए भी जो राखे सो गुरु हमारा हम मेरा गुरु मतलब यह वो विद्या है कोल ज्ञान वो है जहां तुम स्त्री के साथ में अपनी ऊर्जा को संरक्षित रखते हुए उसको उध्वगामी करते हो तो शिव तुल्य हो जाते हो। यह संभोग है ये मेरे संस्कृति का संभोग है जहां चमड़ी का सुख भी तुमने लिया नहीं और
(41:24) तुमने अपने पार्टनर को भी शांत किया सेटिस्फाइड किया और तुम अपनी ऊर्जा को उधरति करते हुए इंद्रियातीत हो गए। तुम साक्षात शिव तुल्य हो गए। इसलिए ओशो जी कह गए थे संभोग से समाधि तक कि तुम उस संभोग से भी समाधि प्राप्त कर सकते क्या किसी ने सोचा तो उन्होंने [नाक से की जाने वाली आवाज़] बड़ी सरल भाषा में बताया ओशो का अपना कोई ज्ञान नहीं था ओशो ने एक सिद्धांत नहीं दिया एक रूल नहीं एक कुछ दर्शन नहीं दिया केवल सभी दर्शनों को सभी मत को सभी सिद्धांतों को उसने एक दिव्य दृष्टि से प्रस्तुत किया उसका खुद का कोई ज्ञान नहीं था तो हमें आज उस दिव्य दृष्टि की जरूरत है
(42:03) हमारे बच्चों को हमारे युवा को जरूरत है। आप देखिए कितना क्राइम हो रहा है। आप सुनते नहीं है मोबाइल पे। तो हमारे जो बच्चे अब मोबाइल को स्क्रॉल कर कर के कर के झूठ मत बोलिएगा। सच बताइएगा। हम सब जानते नहीं कि वो क्या स्क्रोल कर रहे हैं उसमें। हम्। और अगर कोई स्त्रियां अगर खुलकर अगर आप इस तरीके के पडकास्ट करोगे तो वह बच्चों के भी हाथ में जाएंगे। तो या तो उनको सही से बताओ कि भारतीय संस्कृति के जो रोल मॉडल हैं वो नवनाथ हैं। हम जिन्होंने तुम्हें संभोग से भी उधरतस होना बताया। भारतीय रोल मॉडल गणिकाएं नहीं हो
(42:50) सकती हैं। हम नायिकाएं नहीं है यहां की रोल मॉडल। मैं एक पडकास्ट सुन रही थी अभी थोड़े दिन पहले। उसमें वह स्त्री कहती हैं नाम तो मुझे नहीं पता पर वो कहती हैं कि मैं स्लीवलेस पहनती हूं। उनके हर पडकास्ट में वो क्लीवेज दिखाती हैं। अंग प्रदर्शन जिसको आप लोग कहते हैं तो वो कहती है कि मैं क्यों ना दिखाऊं। कल को मैं परमात्मा के पास गई और वो कहेगा कि देखो मैंने तुम्हें इतना बढ़िया शरीर दिया और तुमने इसका इसको सजाया तक नहीं तो मेरे से परमात्मा रुष्ट होंगे। हां सजाओ पर दिखाओ मत बिना बात का प्रदर्शन मत करो। क्या भगवान आपसे यह पूछेगा कि मैंने तेरे को ये
(43:32) शरीर दिया और तूने इसका ठीक से प्रदर्शन किया या नहीं किया? परमात्मा यह पूछेगा आपसे या परमात्मा आपसे यह पूछेगा कि मैंने तेरे को ये इतना बढ़िया हार्ड मांस का शरीर दिया। तू चाहता तो इसके थ्रू मुझे प्राप्त कर सकता था। हम ये ये पूछेगा ना परमात्मा तो या ये पूछेगा बताओ मुझे हंसी आ रही थी कि तुम क्लीवेज दिखा रहे हो और परमात्मा तुमसे पूछेगा भाई तूने इसका बढ़िया से उपयोग किया या नहीं किया? ये तो बातें हो रही है बाहर। इसीलिए आपने प्रश्न किया जी मत्सनाथ जी और गुरु गोरखनाथ जी के दर्शन का मूल भेद क्या है? तो मूल वेद ये है। लेकिन जब गुरु
(44:10) गोरक्षनाथ जी की जो दिव्य दृष्टि थी वो बहुत दूर की थी। [नाक से की जाने वाली आवाज़] उनको लग गया कि अगर कोल ज्ञान हठयोग में शामिल रहा तो एक दिन कलयुग भी आएगा हम और बड़ी अराजकता फैल जाएगी क्योंकि हर किसी व्यक्ति की तो एक क्षमता नहीं है कि वो उस मोमेंट पे अपनी ऊर्जा को रोक लेगा। हम कितना मुश्किल है और अगर आपने ये कर लिया तो आप तो असली ब्रह्मचर्य हो गए। आप तो अचुतेश्वर हो गए। तो गोरखनाथ जी ने स्पष्ट बोला कि स्त्री दूर रहो। स्त्रियों का कोई स्थान नहीं है नाथ पंथ में। उन्होंने कहा ना ना दूर। ऑलदो वो भी खोल ज्ञान को।
(44:54) स्त्रियां नहीं पा सकती इस पे विजय। क्यों नहीं पा सकती? पर तुम नोटिस करो बुद्धिज्म में शुरुआत में स्त्रियां थी। फिर वो वो दोनों भी बोला हाथ जोड़े क्योंकि आखिर स्त्री में एक कामिनी स्वरूप भी है। हम है ना? और मैं आगे आपसे बात करूंगी कि अगर स्त्रियां वज्रौली जैसी साधना करती हैं हम वज्रौली जो कुछ मुद्राएं हैं आसन है तो हमारे यहां तो कहा गया है वो साक्षात योगिनी बन जाती है जैसे पुरुष योगी बनता है तो स्त्रियां भी योगिनी बनती हैं जो तपस्विनी है जो तपश्चर्या करती हैं जो स्वाध्याय करती हैं जो ईश्वर प्रणिधान करती हैं जो योग का
(45:34) अनुपालन करती हैं वो साक्षात शिव तुल्य भगवती के पार्वती के स्वरूप बन जाती है क्यों नहीं बन सकती तो उनको भी तो वो ऊर्जा रोकनी आनी चाहिए ना। हम तो इसका एक बड़ा सा बड़ा सिंपल सा है वजरोली करना। तो वजोली हम आगे बताएंगे इसमें। तो कहने का अर्थ है कि गुरु मत्सेंद्र नाथ जी ने कोलाव को ज्ञान निर्णय को स्वीकार किया। बहुत बढ़िया उनका शास्त्र है वो। और जो हमारे तंत्र के वेता हैं वह जानते हैं कि कोल ज्ञान क्या है और इससे भी आगे कुछ साधनाएं होती हैं। इसमें लता साधनाएं बस इस नाम को ही मैं यहीं तक रहने दूंगी। फिर इसको ठीक से हम अभी उजागर कर नहीं
(46:15) पाएंगे तो ठीक मैसेज नहीं जाएगा। लेकिन नाथ संप्रदाय में लता साधना नहीं थी। उसका कुछ स्वरूप था। और गोरक्षनाथ जी ने देख लिया कि कलयुग आएगा तो बड़ा अराजकता फैल जाएगी। हर कोई व्यक्ति संत नहीं हो सकता। तो उन्होंने कहा कि स्त्री दूरी रहे तो ठीक है। और उन्होंने हठ योग पे क्रांति ला दी। हठ योग का जो वर्चस्व है वो बड़े कठोरता पूर्वक पालन कराया और नाथों के लिए कहा कि तुम ध्यान रख लेना हठ योग का कठोरता से पालन करना पड़ेगा। तो जैसे आपने बताया कि स्त्रियां इससे दूर रहती है। तो फिर ये जो नागा साधु बनती है इनमें बहुत अभी लेडीज फेमस हुई थी।
(46:55) वो अोर पंथ में है और मैंने ये नहीं कहा। इसमें भी बन सकती है। हमने कहा ना योगिनी बन सकती है। योग के माध्यम से स्त्री योगिनी बन सकती है। है ना? और हमारे यहां सबसे बड़ी योगिनी कौन है? आपने याद दिलाया लोना चमारी। बड़े सम्मान पूर्वक पूरी तंत्र परंपरा में उनका नाम लिया जाता है। ऐसा कौन सा तंत्र है जो उनको नहीं आता था। हम ऐसा कहते हैं कि वह तोता बना के रख लेती थी बड़े-बड़े संतों को। तो किस किस कैसे ये सिद्धियां मिलती है? योग से मिलती हैं। जितने भी हमारे अष्ट सिद्धियां हैं, अष्ट ऐश्वर्य हैं, वह व्यक्ति को योग के माध्यम
(47:30) से मिलते हैं। और जो हमारे नागा साधु है, उस पे हम नेक्स्ट पडकास्ट ले आएंगे। हम एक अलग परंपरा है वो। हम उसमें स्त्रियां भी हैं। स्त्रियां यहां भी हैं। पर वो जो हमने कहा ना कि भ कुछ आगे अब जैसे आज कलयुग में हो ही रहा है ना जी। किसी को ज्ञान तो है नहीं। बस अंधेरे में जहां लठ पड़ा। ठीक है। [हंसी] तो गुरु गोरक्षनाथ जी ने भांप लिया था तो उन्होंने कहा कि नहीं अगर आप नाथ संप्रदाय में आना चाहते हैं तो आप कठोरता से हठ योग का पालन कीजिए ताकि आप ब्रह्मचर्य का पालन कर सके और देखिएगा यह ऐसा ब्रह्मचर्य है। अच्छा आपसे मैं एक सवाल पूछती हूं।
(48:09) हमारे पूरे भारतीय सनातन परंपरा में सबसे बड़ा योगी कौन है इस समय जिसे अचुतेश्वर भी कहा जाता है। नहीं पता श्री कृष्ण भगवान श्री कृष्ण को अचुतेश्वर क्यों कहते हैं क्यों जो बिल्कुल भी अपने रास्ते से नहीं होगा अचुतेश्वर है देखिएगा एक पोटकास्ट सुन रही थी मुझे याद आया उसमें वो महिला कहती है यहां तो दो शादियां चार शादियां कर ली तो क्या हुआ श्री कृष्ण के भी तो 168 रानियां थी हम तो मैंने कहा देखो मुझे बड़ा दुख हुआ तो श्री कृष्ण जी की ये व्याख्या कर रहे हैं आप हमारे युवाओं के सामने जिनके सबके हाथ में मोबाइल है हम श्री कृष्ण जी के 16000 रानियां थी कि 16
(48:51) लाख रानियां थी उसके बावजूद भी वो अचुतेश्वर थे वे श्री कृष्ण जिन्होंने कभी भी अपने वीर्य का स्खलन नहीं होने दिया वो अचुतेश्वर बनता है तब वो ईश्वर तुल्य हो जाता है तो ठीक इसी तरीके से नवनाथ की परंपरा भोग योग साचार्यवादी है जिसमें भोग होते हुए भी योग है जैसे हमने कहा ना जी एक बार तुमने मक्खन निकाल लिया ऑलदो उसमें पड़ा है पर वो उसमें विलय नहीं होगा। ठीक इसी तरीके से परमात्मा श्री कृष्ण उनकी कितनी भी रानियां थी उसके बावजूद भी वो अस्स्खलित बिंदु थे। इंद्रियातीत थे भगवान।
(49:36) जिस तरीके से आप सम्मान पूर्वक हनुमान जी का नाम लेते हैं ना कि वो परम ब्रह्मचर्यवादी थे। ठीक इसी के समान भगवान श्री कृष्ण थे। और एक जगह मैंने और सुना वह महिला जििद करती है कि देखिए हनुमान जी ने तो शादी की थी आपके एमपी में उनका मंदिर है उनकी पत्नी के साथ जो सूर्य की पुत्री है हम तो क्या दिक्कत है ये गलत चीजें नहीं फैलाएं हम जो भगवान हनुमान जी की जो सूर्य की पुत्री अह सुवर्शिला के साथ जो मूर्ति है वो एक्चुअली एक तंत्र का संकेत है। वह क्या है कि एक तरफ बिंदु है और एक तरफ नाद है। बिंदु क्या होता है? स्त्री तुल्य।
(50:23) और नाद क्या होता है? बिंदु होता है स्त्री का रज। और नाद क्या होता है? पुरुष का रेतस। हम तो उसमें यह बताया गया है कि जब सृष्टि मिलेगी तो इन दो तत्वों से ही मिल सकती है। हम हमने बताया ना कि बिना शक्ति के तो शिव भी शव है। वो सृष्टि नहीं कर पाएगा। हम भगवान हनुमान जी को सारी विद्याएं दी थी सूर्य भगवान ने हम तो उसमें ये श्री विद्या आ गई एक तो उन्होंने कहा भगवान इसका तो मैं पूरा आपको वर्णन दे नहीं सकता क्योंकि इसमें आपको सृष्टि का जो लय है उसमें आपको एक स्त्री तत्व की आवश्यकता है। तो सांकेतिक रूप से एक तत्व को दिखाने के लिए फिर उन्होंने
(51:04) अपनी पुत्री का दान किया। उसके बावजूद भी हनुमान जी परम ब्रह्मचर्यवादी है तो गलत मिथ्या तत्व नहीं जाए भगवान श्री कृष्ण परम अचुतेश्वर है नवनाथ परम अचुतेश्वर है ऑलदो मत्संद्रनाथ जी की परंपरा कोल ज्ञान की है और जब यह भाप लिया गोरक्षनाथ जी ने कि कलयुग में हाहाकार मच जाएगा ये ज्ञान तो छुप जाएगा और अराजकता फैल जाएगी तो उन्होंने कहा देखो जी नाथ परंपरा में तो आपको हठ योग से कड़ाई से पालन करना पड़ेगा। मैम मैंने सुना है राजा जनक भी परम योगी थे। बिल्कुल थे। आप देखिएगा त्रेता युग में ऐसा एक कहानी के माध्यम से समझा देती हूं।
(51:46) व्यूवर्स को भी इंटरेस्टिंग भी लगेगा और समझ आएगा। नारद भगवान को हमेशा कुछ ना कुछ पंगा लेने की आदत थी। तो वो गए विष्णु जी के पास कि इस युग में कौन परम योगी है? तो भगवान विष्णु ने कहा कि साक्षात राजा जनक तो कहा अच्छा हम तो मैं परीक्षा लेने जाता हूं। हम तो नारद जी सीधा परीक्षा लेने के लिए रात्रि में हम ऐसा कहते हैं कि राजा जनक के कक्ष में ही उपस्थित हो गए। हम देखता हूं कितना बड़ा परम योगी है। तो उस समय क्या था? राजा जनक अपनी भार्या को अपनी पत्नी को अपने आलिंगन में लेकर सो रहे थे। हम भी तो शयन काल के लिए होती है। तो नारद जी ने कहा यह काहे का परम योगी
(52:27) है। मैं यहां प्रकट हो गया और इनकी निद्रा तक नहीं खुली। हम यह परम योगी है इस समय पृथ्वी पे। तो राजा जनक ने आंख खोली और इशारे से कहा प्रणाम करते हुए कि मुनिराज थोड़ा इधर आके झांकिए। क्योंकि वो इस साइड थे। हम तो जैसे ही नारद जी इस साइड आए तो इस हाथ में उन्होंने पत्नी का आलंघन किया था और यह वाला हाथ अग्नि में तप रहा था नीचे भूमि पे इसका सांकेतिक अर्थ क्या है कि मैं भोग में हूं लेकिन मैं अभी भी योग में हूं मैं तपस्या में हूं जिस कोल ज्ञान की हम बात कर रहे हैं जिस हम ब्रह्मचर्यवाद की बात कर रहे हैं ये हमारे सनातन का योग है यह हमारे सनातन का
(53:12) भोग है तब नारद जी ने हाथ जोड़ प्रभु मुझे माफ कीजिए। मुझसे गलती हो गई। तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] कहने का अर्थ है यहां से आप देखिएगा आप देखिएगा एक बात बड़ी रोचक है कि हमारा जो वैदिक साहित्य है तो वैदिक साहित्य कहता है कि ब्रह्मचर्य क्या है वहां पे? स्त्री से दूर रहो। है ना? स्त्री नरक का द्वार है। और तंत्र मार्ग का ब्रह्मचर्यवाद क्या कहता है? कि स्त्री के साथ रहते हुए ब्रह्मचर्य बनो। हम यह असल ब्रह्मचर्यवाद है। आप देखिए कितनी बड़ी बात है। भाई वरना तो जैसे अगर सभी इसका पालन करें तो फिर स्त्रियों को कौन महत्व देगा? नहीं
(53:53) आप बात समझ नहीं रहे हैं। स्त्रियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितने कि पुरुष हैं। यह मैसेज स्त्रियों के लिए भी तो है। हम अगर स्त्रियां गृहस्थ आश्रम में रहकर भी अपने पति के साथ में रहकर भी गृहस्थ आश्रम निभाते हुए परम पद तक पहुंच सकती है। इस योग भोग साचर्यवाद से कि आप संभोग में है भी और नहीं भी। आप होकर भी लिप्त नहीं है। आपने अपनी एनर्जी को स्कलित नहीं होने दिया ना। उस क्षण जो ऊर्जा बनी आपने उसको तुरंत खचा बंद मारा और ऊपर चढ़ा दिया। आप परम योगी है और आप परम योगिनी है हम तो स्त्रियों को हम महता नकार नहीं रहे।
(54:39) तंत्र शास्त्र में तो स्त्री ही प्रमुख है और हम तो भगवती के उपासक हैं। हम तो शाक्त मार्ग से हैं। जहां भगवती ही सब कुछ है। वो ब्रह्मांड नायिका है। भगवती त्रिपुर सुंदरी और यही अगर हम बात करें जैसे गोरखनाथ जी की तो गोरखनाथ जी ने नाथ परंपरा को कैसे समृद्ध बनाया? देखिएगा गोरखनाथ जी ने एक बहुत बढ़िया उनका शास्त्र लिखा। उन्होंने सिद्ध सिद्धांत पद्धति। उन्होंने बहुत साहित्य लिखा है। उनके मुख्य साहित्य जैसे उन्होंने गोरखवाणी लिखा है ना योग चिंतामणि दिया। गोरख कोमुदी लिखा। बहुत से उनकी किताबें हैं। एक सिद्ध सिद्धांत पद्धति उनका इस विश्व को बढ़िया
(55:20) देन है। अगर किसी को इंटरेस्ट हो तो वो देखिए। सिद्ध मतलब योगी। सिद्ध मतलब जो सिद्ध हो गया। और सिद्धांत मतलब एक मार्ग। तो कैसे आप सिद्ध योगी बने वह मार्ग दिया उन्होंने इसी मार्ग को कहते हैं हठ योग और उन्होंने जब अपना भ्रमण किया पूरे देश में तब तो इतना देश बटा हुआ था ना उस समय नहीं बटा हुआ था कि ये नेपाल है ये तिब्बत है सब कुछ एक ही था हम अपने भ्रमण काल के दौरान उन्होंने देखा उन्होंने कहा जी देखो जो मोक्ष का मार्ग है हम वो आत्मदर्शन का मार्ग हो सकता है और आत्मदर्शन का मार्ग दिव्य मार्ग दिया कौन सा मार्ग दिया दिव्य
(56:03) गोरखनाथ जी ने दिव्य मार्ग तो यह क्या था तो उन्होंने देखा कि जितने भी मोक्ष को प्राप्त करने के मत मतांतर प्रचलित थे सबसे पहला कौन सा मत था वैदिक तो उन्होंने कहा अच्छा बताओ तुम ये अग्नि के मध्य हवन के अंदर विभिन्न वस्तुएं डालते हो तो इससे मोक्ष मिल जाएगा क्या बोले नहीं मिलेगा अधूरा है फिर उन्होंने देखा कि जैन जैन दर्शन को दिगंबर वो दिगंबरों ने कपड़ों का वस्त्रों का त्याग कर दिया। तो उन्होंने कहा कि अगर नग्नता परिचायक है मोक्ष का तो पशुओं को तो तुमसे पहले मिलेगा। हम यानी इससे भी मोक्ष नहीं मिलने वाला। वस्त्र त्याग करके मोक्ष नहीं मिलने वाला।
(56:48) फिर उन्होंने देखा कि और भी कई मार्ग प्रचलित थे। जिनमें सब में छोटी-छोटी छोटी-छोटी कमियां थी। हम तो उन्होंने बोला जी इसमें भी कमी है। इससे भी नहीं मिलेगा। इससे भी नहीं मिलेगा। वैदिक मार्ग की कमी किसने पूरी की? वैष्णव मार्ग ने कोशिश की। हम और वैष्णव मार्ग की कमी पूरी करने के लिए कौन सा आया? सौर सिद्धांत जिसमें सूर्य ही प्रबल शक्ति है। केंद्र है सूर्य शक्ति का। उसमें भी कुछ कमी थी। तो गणपत्य आया। उसके बाद में शैव मार्ग आया। फिर उसके मार्ग में शाक्त मार्ग आया। शाक्त मार्ग में जो वामाचार का थोड़ा सा ज्यादा प्रचलन होने लगा। तो उसकी कमियां दूरी करने के
(57:24) लिए अवधूत आए। कपाली आए। अवधूत अवधूतों ने कहा जी शरीर को इतना तपा दो गला दो इसको और सबसे पहले नाथ पंथ ने बताया कि ये शरीर ही मंदिर है। तुम इसको गलाओ जलाओ मत हम इसको संवारो कैसे उन्होंने कई अलग-अलग रसायनों का प्रयोग करके इसको बलिष्ठ बनाया। हालांकि वह रसायन अभी उसको मतलब बाहर देना ठीक नहीं है क्योंकि उनमें कल को उनका प्रयोग से कोई पोइजन बन जाए कुछ बन जाए उनको तो नाप अनुपात समानुपात पता था जैसे पारा लेते थे वो तो कितने उसके अनुपात में किसके साथ स्वर्ण भस्म लेते थे और अगर यही स्वर्ण भस्म आप अगर अनजाना ले लेगा तो फफोले पड़ जाएंगे
(58:06) शरीर में हम मवाद बनके अरिस जाएगा तो उन्होंने कहा कि ये शरीर ही मंदिर है इसको गलाओ मत इसको उसको बलिष्ठ रखो और उन्होंने एक मार्ग दिया षट मार्ग हम हठ योग में शरीर की सबसे पहले मेहता है कि तुम इस शरीर का शुद्धिकरण करो तो शुद्धिकरण कैसे करें कैसे हम तो खूब खाते हैं सो जाते हैं हम तो उन्होंने कहा कि इसका शुद्धिकरण करो षट क्रियाओं से तो हठ योग में वो षट क्रियाएं बहुत प्रसिद्ध है वो किसी गुरु के आचरण में करनी चाहिए जिनका नाम है धोती वस्ती नेती नोली त्राटक कपालभाति
(58:52) इन छह क्रियाओं से व्यक्ति अपने शरीर का शोधन करता है नाड़ियों का शोधन करता है और [नाक से की जाने वाली आवाज़] जैसे ही शरीर शुद्ध हो जाता है तो उन्होंने कहा ये शरीर ही मंदिर है जो कुछ है इसके रहते ही है हम हमने देखा हमने कितनी बार हम कहते हैं कि देवता भी तरसते हैं इस मनुष्य शरीर के लिए क्यों क्यों क्योंकि इस मनुष्य शरीर से आप परम पद प्राप्त कर सकते हो। भाई आज ये मेरे पास शरीर ही नहीं रहेगा तो मैं क्या साधना कर लूंगी? क्या तपस्या कर लूंगी? क्या परम पद प्राप्त कर लूंगी? अगर इसमें भिन्न-भिन्न बीमारियां आ जाए, रोग लग जाए तो ये तो
(59:28) पॉसिबल नहीं है ना। तो किसी ने कहा कि संथारा ले लो, किसी ने कहा खाना छोड़ दो। किसी ने कहा शरीर को तपा लो। पर नाथ पंथ ने कहा कि नहीं इस शरीर की कीमत जानो। तो ये शरीर ही मंदिर है। हम इस शरीर को तुम बलिष्ठ करके इसका तुम शोधन करके फिर तुम योग मार्ग में प्रविष्ट हो जाओगे। तो ये जो छह क्रियाएं हैं ये शरीर के शुद्धिकरण की क्रियाएं हैं। हम जब हम इसका पतंजलि योग से डिफरशिएट करेंगे हठ योग का तो मैं आपको थोड़ा सा इसका विवरण वहां दूंगी। मैम जब भी नाथ योगी की बात आती है तो हमें एक शब्द सुनने को मिलता है अलख निरंजन और आदेश
(1:00:13) तो गुरु आदेश अलख निरंजन ये आपस में कैसे कनेक्ट है और इनका क्या मतलब है अर्थ क्या है ये बहुत सुंदर प्रश्न है और मुझे लगता है इस पूरे पडकास्ट की ये जान रहेगा आप देखिएगा जो अलख निरंजन शब्द है वो आम मनुष्य के लिए नहीं है जो नाथ पंथ के योगी हैं जो गुरु स्वरूप है उनका यह शब्द है। जब भी उनका शिष्य आता है तो वह बोलते हैं अलख निरंजन या वो किसी के मुखातिब होते हैं तो बोलते हैं अलख निरंजन और शिष्य बोलता है आदेश आदेश। तो जहां अलख अलख का अर्थ है अलक्ष हम अलक्ष जो आंखों से दिखाई ना दे हम
(1:00:58) जो निर्विकार है जो निर्गुण है जो निराकार है वो अलक्ष है वो दिखाई नहीं देगा इन आंखों से तुम्हारे वो विवेक आंखों से अंतर्दृष्टि से दिखाई देगा और निरंजन निरंजन साक्षात परमात्मा भगवान शिव निर्गुण है निराकारी है अनादि है अनंत है वो निरंजन स्वरूप रूप है। जहां आत्मा परमात्मा जो हम परमात्मा के लिए क्या कहते हैं कि परमात्मा शुद्ध चैतन्य स्वरूप है। आनंद स्वरूप है। उसमें कोई विकार नहीं है। तो जब वह गुरु साक्षात शिव तुल्य हो गया तो वह इस पद का प्रयोग करता है। अलख निरंजन हम और
(1:01:42) इस शब्द में पूरी नाथ परंपरा की जान है। तो अलख निरंजन वह कब उत्पत्ति होगी उसकी जब हमारा ध्यान अंतर्मुखी हो जाएगा और जिसका ध्यान अंतर्मुखी हो गया उसको अलख ज्योति जगेगी हृदय में और जिसको अलख ज्योति जग गई वो तो साक्षात शिव तुल्य हो गया इसलिए वो नाथ गुरु ही उसका प्रयोग करते हैं। शिष्य केवल संबोधन के रूप में उनसे आदेश आदेश करते हैं। पूजा जी आपसे एक सवाल यह भी है जहां तक मैंने सुना है कि गोरखनाथ जी ने राजा भरतरी का मोह भी भंग किया था। उनको सत्य का ज्ञान दिया था। हां बहुत सत्य है ये। देखिएगा राजा भरतरी थे उज्जैन के शासक।
(1:02:24) हम और उनकी अति सुंदर पत्नी थी रानी पिंगला। हम और राजा भरतरी देखिए उस समय के जो राजा होते थे वो बड़े-बड़े काव्यकार होते थे। बड़े-बड़े उन्होंने ग्रंथ लिखे कवि होते थे। तो उन्होंने अपनी पत्नी की सुंदरता पे लिखा श्रृंगार शतक। वो बहुत फेमस है। फेमस साहित्य है श्रृंगार शतक राजा भरतरी का। तो पिंगला इतनी सुंदर थी कि राजा उसके मोह में इतना रच बस गया कि उन्होंने श्रृंगार शतक लिख दिया उसमें पूरा। हम तो इसके लिए एक कथा प्रचलित है। वो मैं व्यूवर्स को सुनाती हूं। बड़ी रोचक है। जी। तो ऐसा कहते हैं कि राजा भरतरी के यहां एक संत आए। हम
(1:03:07) और उन्होंने राजा से प्रसन्न होकर जो भी वो वृतांत है एक फल दिया हम बोले राजा आप के लिए मैं यह फल देता हूं और यह अमृत्व का फल है जो इसको खाएगा वो अजर अमर हो जाएगा वो कभी वृद्ध नहीं होगा हम है ना वृद्धा उससे वृद्धावस्था जजर अवस्था उससे हमेशा दूर रहेगी हम तो राजा ने वह फल लिया अब राजा का प्रेम किससे था पिंगला से पिंगला के अलावा कुछ दिखती नहीं थी तो राजा ने सोचा मैं खा के क्या करूंगा? मैं पिंगला को देता हूं। तो उसका यौवन ऐसे ही बरकरार रहेगा। तो राजा ने अपनी पत्नी को दिया। बोले पिंगला ये तुम खाओ। तुम तुम्हारा यौवन स्वष्ठाव ऐसे ही बना रहेगा।
(1:03:48) हम पिंगला ने पिंगला प्रेम करती थी सेनापति से। हम हम अब पिंगला ने सोचा कि मेरा मन तो उसमें है। क्यों ना मैं मेरे प्रेमी को दे दूं। तो प्रेमवश उसने अपने प्रेमी को दिया। बोले ये फल तू खा। हम क्योंकि वो पिंगला को संतुष्ट करता था। बलिष्ठ था बड़ा। तो पिंगला ने सोचा यार इसका वो रहना चाहिए। इसका बल रहना चाहिए। अब सेनापति किससे प्रेम करता था? वैश्या से। हम तो सेनापति ने सोचा मैं क्या करूंगा? क्यों ना मैं उस वैश्या को दूं। वो मुझे तृप्त करती है। इतना उसका यौवन है। तो वो हमेशा अमर रहेगी। उसका प्रेम उससे था। उसने जाके वैश्या को दे दिया। तुम खाओ। हम
(1:04:34) वैश्या ने सोचा बेचारी ने अरे अरे ऐसे नरक में पड़ी हूं हमेशा पड़ा रहने पड़ेगा यह फल मेरे लिए नहीं है क्यों ना ये फल दे दूं राजा को हम इस फल के योग्य तो हमारा राजा है हम राजा हमारा रहे ताकि जनता सुखी रहे वैश्या चली गई वापस फल किसके पास आ गया राजा राजा भरतरी के पास अब फल तो दिव्य फल था ना कोई आम फल तो था नहीं जैसे ही राजा भरतरी ने फल फल हाथ में लिया और उनके पांव से पृथ्वी सरक गई। एक क्षण में सारी कहानी समझ में आ गई कि ये फल वापस मेरे तक कैसे आया? मैंने तो किसको दिया था? वाइफ को दिया था। रानी को
(1:05:17) और राजा का जो मोह भंग हुआ मेरे साथ धोखा। जिसके प्रेम में मैं पागल हुआ पड़ा। उसी ने मुझे धोखा दिया। तो राजा ने उसी पिंगला के मोह भंग के बाद में लिखा वैराग्य शतक। और वह भी इतिहास में एक बहुत प्रचलित प्रसिद्ध अनुकृति है राजा भरतरी की। तो जब भी मौका मिले श्रृंगार शतक और वैरागी शतक दोनों पढ़िएगा। नहीं अभी मेरे हिसाब से कलयुग में यही चल रहा है। हां यही चल रहा है। यही साइकिल है ना? यही एग्जैक्टली आपने सही पकड़ा। यही साइकिल चल रहा है। तो गुरु गोरक्षनाथ जी का बाद में उनसे भेंट हुई। हम और उन्होंने राजा को सत्य ज्ञान दिया। उन्होंने राजा को विवेक ज्ञान दिया और
(1:06:04) सत्य असत्य का ज्ञान कराया और उनका जो विलाप था वह खत्म हुआ राजा का और वो एक दिव्य मार्ग पर चल पड़े हम तो ये कथा है जब गुरु गोरक्षनाथ जी से उनकी भेंट हुई और यहां मैं दो लाइनें जोड़ना चाहूंगी कि हम केवल बातें नहीं कर रहे हैं महेंद्र जी अगर कोई महसूस कर सकता है कोई भी तो गुरु गोरखनाथ जी से हम बढ़कर कोई नाथ नहीं हम अगर आपको और ऐसा नहीं है हम कि अब वो पृथ्वी से खत्म हो चुके हैं वो सूक्ष्म शरीर में है और जब तक यह युग रहेगा जब तक जब जब पृथ्वी का लय
(1:06:50) होगा स्थिति रहेगी संहार होगा वो हमेशा सूक्ष्म शरीर में रहेंगे इसलिए मैं कहती हूं कि अगर किसी को अपने पूर्व जन्मों की प्राप्ति से नाथ पंत में दीक्षा मिलती है। ये खुशी के आंसू है या दुख के आंसू है? [हंसी] नहीं नहीं ये हमारे एक्चुअली हमें याद आ गई जी हम हमारे जो गुरु हैं हम उनको आप साक्षात गुरु गोरखनाथ ही समझिए। तो यह तो प्रसन्नता के ही है। गुरु के सम्मान में है। खैर हम हम यह कह रहे थे कि अगर इस जन्म में किसी
(1:07:37) बच्चे को, किसी स्त्री को, किसी बच्ची को दीक्षा मिलती है नाथ पंथ में तो समझिएगा कि उसके पुण्यों का उदय हुआ है। अभी जैसे बात कर रहे थे नाथू ने अपना हठ योग दिया और उससे पहले आपने बताया कि पतंजलि ने अपना खुद का योग दिया। बिल्कुल। तो इन दोनों योगों में आपस में क्या संबंध है और दोनों आपस में कैसे भिन्न है? बहुत अच्छा प्रश्न है और मुझे लगता है कि आपका यह प्रश्न युगों युगों तक चलेगा क्योंकि ऐसा प्रश्न पहली बार किसी ने पूछा है नहीं तो योग को सब योग ही जानते हैं। हां क्योंकि सबने अपने-अपने योग दिए हैं। तो अलग देने में क्या संबंध कैसे है?
(1:08:10) कनेक्शन क्या है? देखिएगा वैसे तो हमने शुरू में ही बताया कि जो योग है योग तो शुरू से ही रहा है। भारत में वेद परंपरा से रहा है। है ना? वैष्णव में रहा, वेदों में रहा। हम हमारे पुराण उठा लो, आरण्य ग्रंथ उठा लो, सब में योग है। उपनिषदों में भी योग है। लेकिन जो हमने अभी बात की कि जो नाथ पंथ का जो योग है उसमें सिद्ध सिद्धांत पद्धति में हठ योग है। हम जिसमें वह शरीर को मान्यता देते हैं। और उधर जो महर्षि पतंजलि हैं हम उन्होंने जो हम हमेशा याद रखो योग के साथ आएगा सांख्य योग दर्शन। हम तो सांख्य के जो सैद्धांतिक मार्ग है वो योग दर्शन में व्यवहारिक मार्ग है।
(1:08:46) व्यवहारिक पथ से उन्होंने समझाया कि तुम कैसे कुंडलिनी जागरण करके हम और यहां पहुंच जाओगे। तो उन्होंने कहा लेकिन जी यहां पे कंडीशन है। हम महर्षि पतंजलि ने कहा क्या? उन्होंने कहा कि जब तक योग मार्ग सिद्ध नहीं होगा जब तक कि चित्त शांत नहीं होगा। तो उन्होंने कहा कि सबसे पहला स्टेप है कि तुम तुम्हारे चित्त पे काम करो। चित्त क्या? मन या माइंड। हम अब हमारे यहां तो मन भी अलग है, माइंड भी अलग है। लेकिन वेस्टर्न कंट्री में मन और माइंड एक ही है। वो माइंड बोलते हैं उसको। हम जानते हैं मन अलग है। कहीं ना कहीं यहां बैठा है और माइंड यहां बैठा है। तो
(1:09:23) वो कहता है कि जो चित्त है मन या माइंड है उसको शांत कर लो। उसको स्थिर कर लो। तो उन्होंने कहा चित्तवत्त निरोधस्य योग यह फार्मूला दिया आपको जो चित्तवृत्तियों का निरोध कर लेगा वही योग मार्ग में प्रविष्ट होगा और उधर हठयोग ने क्या कहा आपको याद हो तो उन्होंने कहा कि सबसे पहले काम करो बॉडी पे हम शरीर पे और पतंजलि क्या कहते हैं कि काम करो पहले चित्त पे माइंड पे और वो क्या कहते हैं कि देखो ये चित्त भी तो इस शरीर में ही अवस्थित है कहीं ना कहीं है तो पहले इस पे तो वर्क करो तो उन्होंने तो दी षट क्रियाएं धोती वस्ती नेति नोली तटक कपालभाति और इन्होंने दिया
(1:10:05) अष्टांगिक योग महर्षि पतंजलि ने यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि ये सब हम बात पहले करके आ चुके हैं पहले पडकास्ट में इसलिए मैं इसको भी बहुत लंबा नहीं खींचूंगी हम अब यम क्या है हमने बात की थी अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य परिग्रह नियम क्या है शो संतोष तप प्राण ईश्वर प्राणिधान ये यम है नियम है तो उन्होंने कहा कि अब अब प्रश्न उठता है जो हमारे नए व्यूवर्स हैं जिनको नहीं पता वो कहेंगे ये चित्तवृत्तियां क्या होती है हम तो चित्तवृत्तियां होती है कि जैसे हमने कहा स्मृति हम तो वो भी एक चित्तवृत्ति है मेमोरी और एक
(1:10:42) हमने कहा कि जब आप सपना लेते हो नींद में स्वप्न लेते हो आप तो आपको लगता है ना कि ये रियल है हम ये रियल वर्ल्ड है तो इस तरह की ये क्या है ये चित्रवृत्तियां है पांचितवत्तियां बताई उन्होंने कौन-कौन सी बस चित्तवृत्तियां भी पांच है। प्रमाण, विपर्य, विकल्प, निद्रा, स्मृति, स्मृति, मेमोरी, निद्रा जब आप नींद अवस्था में होते हो। प्रमाण यानी कि सत्य ज्ञान को प्रकाशित करने वाले साधन। हम जैसे मैंने कहा जी तुम्हें कैसे पता चला? तो आपने कहा मैडम मैंने अनुमान लगाया है। हम ये कहेंगे जी मैं प्रत्यक्ष देख के आया हूं। वो कहेगा जी मैंने सुना है।
(1:11:17) हम तो ज्ञान को जानने के साधन। तो ये सब चित्त की वृत्तियां है। तो इस पर वर्क करना है। पतंजलि जी कहते हैं। फिर वो कहते हैं महर्षि पतंजलि कि इसके साथ-साथ में पंच कक्लेश भी काटने पड़ेंगे। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश ये पांच क्लेश है मन के। अविद्या कि मैंने अज्ञानवश इस शरीर को ही आत्मा जान लिया। कि शरीर ही मैं हूं। तो उन्होंने कहा कि आप शरीर नहीं है। आप बॉडी नहीं है। आई एम नॉट बॉडी। तो कहा जी मैं क्या हूं? तो मैं इंद्रियां हूं। तो कहा ना आप इंद्रियां भी नहीं है तो मैं क्या हूं बुद्धि हूं ना मैं बुद्धि भी
(1:11:54) नहीं हूं तो मैं मन हूं ना मैं मन भी नहीं हूं तो मैं अहंकार हूं अहंकार भी नहीं हूं तो मैं क्या हूं तो मैं शुद्ध चैतन्य आत्मा हूं ये महर्षि पतंजलि जी ने कहा तो उन्होंने कहा लेकिन ये अवस्था तभी आएगी जब आप चित्त पे काम करो जब चित्त का अंतकरण का शुद्धिकरण होगा तो आप योग मार्ग में जो मैंने अष्टांगिक योग दिया यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि आप उस पे चल जाओगे और उधर उन्होंने क्या कहा कि शरीर का जब शुद्धिकरण होगा तो ऑटोमेटिकली राजयोग की उत्पत्ति होगी। तो हठ योग की जो समाधि है उसको राजयोग कहते हैं। और पतंजलि दर्शन
(1:12:32) में जो समाधि है उसको संप्रज्ञात योग कहते हैं। और यह बात आपको ध्यान हो तो लास्ट पडकास्ट में मैंने कही थी कि राजयोग का अर्थ है जैसे कोई अप्सरा जैसे कोई स्वर्ग की देवी साक्षात जैसे रेड कारपेट होता है ना हम तो उस रेड कारपेट का नाम है राजयोग और उस पे कौन चलती है? भगवती कुल कुंडलिनी हम कब चलती है? इन षट क्रियाओं से हठ योग की और उधर अष्टांगी की ओर का पालन करके आप क्या करते हैं? अपने चक्र जागृत करते हैं और कुंडलिनी को सुष्मना मार्ग मिल जाता है। क्योंकि इड़ा और पिंगला आप बंद कर लेते हैं। हम बंद से योग से। अभी मैं थोड़ा और समझा
(1:13:12) दूंगी। तो कौन सा मार्ग ऑटोमेटिकली खुल जाता है? सुष्मना का। और सुष्मना का मार्ग राजपथ है। किसके लिए? कुंडलिनी के लिए। के लिए। तो यह राजयोग है वहां पे कठयोग का। ओके। तो मोटा-मोटा अंतर है। एक कहता है अपना बॉडी का शुद्धिकरण करो। दूसरा कहता है अपने मनित पे कंट्रोल करो। हां। पहले पहले वो कहता है चित्त पे। ये कहते हैं शरीर पे। लेकिन दोनों का माध्यम उनका दोनों का उद्देश्य तो सेम है। हम मोक्ष की प्राप्ति करना कुंडलिनी जागरण के माध्यम से। हम और आप देखिए जो सबसे बड़े योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण है उन्होंने भी योग की महत्ता बताते हुए भगवत गीता में कहा वो कहते हैं
(1:13:55) युक्तहार विहारस युक्त चेष्टस कर्मसु युक्त सपना बोधस योगो भवती दुखा तो वो भी वहां बताते हैं कि ये ये अपनाकर तुम योग को जगा लो जीवन में मेरे तक पहुंच जाओ और मेरे से भी एक आगे परम पद है जो भगवान देते हैं साक्षात हम मोक्ष मार्ग जिसमें व्यक्ति परमहंस बन जाता है। तो यह दोनों ही साधन है योग प्राप्ति के और आप देखिएगा कि इन्होंने जो पतंजलि दर्शन में जो समाधि है हम उसमें भी दो तरह की समाधि है। एक सवतर्क एक निर्वितक सवतर्क जिसमें संकल्प विद्यमान रहता है। जैसे मैंने आपको कहा कि
(1:14:40) आपने कहा जी मैडम मुझे थोड़ा मेडिटेशन कराओ सीखना है। तो मैंने कहा आप एक काम करो किसी मूर्ति पर अपना ध्यान केंद्रित करो और जरूरी नहीं है आप अपने आंख बंद करके भी अपने इष्ट देवता को यहां रख के उन पर ध्यान कर सकते हो खुली आंखों से जरूरत नहीं है लेकिन [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसमें अंत तक वो देवता बना रहेगा हम यानी वो विकल्प बना रहेगा इसको हम कहते हैं सविकल्प समाधि और जब ये विकल्प भी हटा दोगे तब उत्पत्ति होगी निर्विकल्प समाधि की यह निर्बीज समाधि है। जहां आप जिस लक्ष्य को लेकर चले थे, वह लक्ष्य भी आपने पार कर लिया। यह महर्षि पतंजलि का योग दर्शन है।
(1:15:22) और इसकी प्राप्ति अष्टांग योग से होती है जो हम बार-बार बता रहे हैं। है ना? और इसी में जब आप चित्त का शुद्धिकरण करते जाते हैं तो चित्त की पांच अवस्थाएं उन्होंने दी। कौन सी? क्षिप्त विक्षिप्त मूढ़ निरुद्ध निर्विकल्प तो क्षिप्त विक्षिप्त मूढ़ तो काम की नहीं है लेकिन जैसेजैसे चित्त एकाग्र और निरुद्ध होता जाता है तो अपने आप ऑटोमेटिकली समाधि उत्पन्न होने लगती है तो महर्षि पतंजलि का भी योग मार्ग का महत्व है और उधर हठ योग का भी बहुत महत्व है और देखिएगा एक और जो गुरु गोरक्षनाथ जी की देन है हठ योग में वो सबसे बड़ी देन है इस विश्व
(1:16:04) को तीन बंद कौन-कौन? इन तीन बंध का नाम है। पहला मूल बंध, दूसरा जालंधर बंध और तीसरा उड़ियान बंध। इन तीन बंधों का जो रहस्य सीख जाता है, जो इनका रोज प्रैक्टिस करता है, उसकी कुंडलिनी अपने आप सुष्मना में चढ़ने लगती है। भले उसको पता ही नहीं हो। हम तो ये तीन बंद कैसे होंगे? जब आप ध्यान में बैठे हैं। जब आप आसन वगैरह कर रहे हैं। जब आप इनमें मुद्रा विज्ञान भी है। एक पडकास्ट में ये सब बताना असंभव है। [हंसी] पस तीन बंद बता के आई थिंक हम इसको खत्म करते हैं। क्योंकि लास्ट जैसे आपने चक्रास किया था तो उसमें आपने मंत्र दिए थे। मंत्र के माध्यम से
(1:16:43) बीज मंत्र हां बीज मंत्र थे। तो अगर किसी को देखना है तो आई बटन पे जाके वो होकास्ट देख सकता है। तीन बंद का रोज अभ्यास कीजिए क्योंकि नॉर्मली भी तो लोग योगासन करते हैं ना। तो योगासन में मैंने नोटिस किया लोग बंद छोड़ देते हैं। तो बंद का प्रैक्टिस जो कर लेगा वो उसको पता भी नहीं हो चाहे उसको कोई नॉलेज भी नहीं हो बट उसकी कुंडलिनी जागरण होने लगेगी। वो तीन बंद क्या है कि सबसे पहला बंद है मूल बंद जो गुदा मार्ग है तो गुदा मार्ग के और योनि मार्ग के यानी लिंग और गुदा के मार्ग के बीच का जो भाग है उसको संकुचित करना होता है। संकुचित करो
(1:17:19) छोड़ दो। संकुचित करो छोड़ दो। तो इसको वज्रौली भी बोला है। लेकिन मूल बंद में आप गुदा मार्ग को बंद कर लो तो वहां से अपान वायु ऊपर की तरफ आएगी अपने आप ही। तो जैसे ही अपान वायु ऊपर चढ़ेगी जो नाभि के नीचे है। आपने मूल बंध को संकुचित करके मार्ग बंद कर दिया ना जी हम तो ऑटोमेटिकली वायु ऊपर चढ़ेगी अपान वायु। अपान वायु नाभि में अंदर अग्नि है। यहां सूर्य नाड़ी है पेट में। वो उससे संयुक्त होगी। अग्नि से संयुक्त होगी। जैसे ही वो अग्नि से संयुक्त होगी वायु तो और तेज धोकनी की तरह ऊपर उठेगी हम फुफकारती हुई तो वो और तेज ऊपर उठी इधर
(1:17:57) आपने फिर लगाना है जालंधर बंद जैसे ही आप ठोडी को हृदय से लगाओगे तो यहां का मार्ग अवरुद्ध हो गया हम दो बंद लगा दिए आपने और ऑटोमेटिकली आपकी वायु अभी यहां पे है हम फिर आप डायफ्राम को खींच कर यहां लगा देते हो उडियान बंद हम तीनों मार्ग बंद अब वो वायु यहां पर जो वायु स्थित है तो इन तीनों बंदों से आपकी इड़ा और पिंगला का मार्ग बंद हो गया हम और किसका मार्ग खुल गया? सुष्मना का। तो अब वो जो प्राण है जो वायु है वो कहां बहेगी? सुष्मना में ऑटोमेटिकली बहने लगेगी। तो जो लोग योग करते हैं, आसन करते हैं उनसे मेरा एक अनुरोध है कि आप बंद ना
(1:18:37) छोड़िए। आप बंद का नियमित अभ्यास कीजिए। रोज प्रैक्टिस कीजिए। तो देखिएगा अपने आप चमत्कार होने लगेंगे। हां और पता भी नहीं चलेगा आपकी कुंडलिनी कब जागृत होगी। ओके तो यह पडकास्ट आपको कैसा लगा आप कमेंट करके जरूर बताना। हमने काफी डिटेल में बात की आज योग के बारे में नवनाथ के बारे में नाथों के योगों के बारे में कैसे अपन इन पे विजय पा सकते हैं? तो मैम से कोई भी सवाल है नीचे कमेंट में पूछ सकते हैं और जब भी टाइम मिलेगा मैम उनका आंसर भी दे सकते हैं और आने वाले पॉडकास्ट में हम वो सवाल भी पिक कर सकते हैं। तो अपने सवाल कमेंट में और मैम से अगर आप कांटेक्ट करना
(1:19:16) चाहते हैं तो मैम की सभी सोशल मीडिया लिंक्स आपको नीचे डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगी। जहां से जाके इन्हें फॉलो कर सकते हैं। यह अपने सोशल मीडिया पे लेटेस्ट वीडियोस अपडेट देते रहते हैं। तो इनसे जुड़ने का मौका भी आपको मिल जाएगा। लास्ट मैसेज मैम ऑडियंस के लिए आपकी तरफ से कुछ मेरे लिए एक आज का सबसे पहले तो आपका बहुत धन्यवाद कि आपने इस समय मुझे आमंत्रित किया क्योंकि मेरे मन में एक थोड़ा सा विक्षोभ सा भी है और दुख भी है कि जो आम जनता में जो हमारा युवा जो समाज है उसमें गलत मैसेज प्रसारित हो रहा है। है ना? वो युवा शराब, नशा और स्त्री के मोह भंग इन सब में पड़
(1:19:56) के बच्चे तक खराब हो रहे हैं। तो मैं यही बताना चाह रही थी कि असल ज्ञान यह है। है ना बच्चों कुछ नहीं रखा है इन मिथ्या तत्वों में। थोड़ा सा आप समझो कि हमारे लिए क्या अच्छा है और क्या सही है और क्या नहीं है। इसी की तो सारी बात करी। यही तो विवेक ज्ञान है। सारी जद्दोजहद इसी की तो प्राप्त करने के लिए हो रही है कि मैं क्या छोडूं? क्या पाऊं? सुनो सब कुछ। सब कुछ सुन रहा है। कान में जा रहा है, आंखों में जा रहा है। लेकिन तुम्हें ग्रहण क्या करना है? वो आप पे डिपेंड करता है। तब तय होगा आप क्या बनने वाले हो। यही मेरा मैसेज है।
(1:20:32) हां। पानी की जगह पेट्रोल डालोगे तो क्या होगा आपको पता है। एक्सक्टली। तो आज का पडकास्ट यहीं एंड करते हैं। मिलते हैं किसी नए टॉपिक पे। अपन ने काफी पॉइंट छोड़े हैं ऑडियंस के लिए। बिल्कुल। तो ये पडकास्ट लाइव होने के बाद कुछ दिनों बाद में हम उन पे और डिटेल में आपके लिए पूरा पडकास्ट लेके आएंगे। मिलते हैं नेक्स्ट एपिसोड में। आज के लिए इतना ही। नमस्कार [संगीत]

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