Sunday, July 19, 2026

Yogi with Powers Beyond Human Limits! | Ganapati Muni | Hyper Quest Podcast Ft. Sampadananda Mishra

Yogi with Powers Beyond Human Limits! | Ganapati Muni | Hyper Quest Podcast Ft. Sampadananda Mishra

Author Name:Hyper Quest

Youtube Channel Url:https://www.youtube.com/@HyperQuest

Youtube Video URL:https://www.youtube.com/watch?v=T3Wz2x5nLis



Transcript:
(00:00) युधिष्ठिर है, दुर्योधन है, द्रोपदी है, गांधारी है, कुंती है, धृतराष्ट्र हैं, अर्जुन है, भीम है, कृष्ण है। ये सब ऋग्वेद में है। ऋग्वेद के 200 मंत्रों को गणपति मुनि लेते हैं। इन 200 मंत्रों को यह एक अलग प्रकार से व्याख्यान करते हैं। यह दिखाने के लिए कि महाभारत की पूरी की पूरी कथा जो है यह ऋग्वेद में है। गणपति मुनि जी भगवान रमण महर्षि के प्रथम और प्रमुख शिष्य थे। उनको गणपति का अवतार माना जाता है। भगवान रमण महर्षि को स्कंद अवतार माना जाता है। कार्तिकेय माना जाता है। गणपति मुनि बहुत रिग्रेस छिन्न मस्ता की उपासना करते थे। कुंडलिनी जागरण होता
(00:40) है और इतनी तेजी से यह जागरण होता है कि उनके जो स्कल है जो कपाल है उसमें एक छेद बन जाता है। उस वो छेद से अग्नि उत्पन्न होती है। धुआ निकलने लगती है। तो वो कपाल भेद होने के बाद रमण महर्षि ने निर्देश दिया था कोई उनको स्पर्श नहीं करेगा क्योंकि उनको कोई स्पर्श करे तो जैसे इलेक्ट्रिक शॉक लगता है ना ऐसे एक झटका लगेगा। मद्रास में अवधान करते वक्त उनको एक चैलेंज दिया गया था। घंटा शतकम 1 घंटे में आपको 100 श्लोक बनाना है। उन्होंने इतनी स्पीड से श्लोक बनाया 6 मिनट में 25 श्लोक बनाए। इतनी तेजी से बनाए जो अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने बोला कि
(01:19) भाई आप रुक जाइए। महेंद्रगिरी है जिसको परशुराम का क्षेत्र माना जाता है। गणपति मुनि वहां पर तपस्या करते थे। उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति बहुत तेजी से उनके पास आ रहा है। एक परसु लेकर और सफेद कपड़ा पहना हुआ है और वह उनके पास आकर और उनके साथ एकाग्र हो गए। एक शिष्य था देवरात। देवरात मुनि उनके साथ तपस्या करते थे और इतने वो ट्रांस में चले गए तो अचानक गणपति मुनि ने देखा कि यह जब ट्रांस में चले जाते थे कुछ बड़बड़ाता रहते हैं तो गणपति मुनि उसको लिखते जाते थे और अंत में बोले कि यह ऋग्वेद के नए मंत्र उनके माध्यम से अभिव्यक्त हो रहा है।
(02:14) आचार्य जी प्रणाम। आपका फिर से हमारे कार्यक्रम में स्वागत है। जितनी भी बार आप आते हैं हमारी चर्चाएं होती है, इतने गहरे गहरे विषय पर चर्चा होती है और हर पॉडकास्ट के अंत में आप एक विषय छोड़कर चले जाते हैं। फिर उस पर मंथन करता हूं, देखता हूं, सोचता हूं और बस यही मन करता है कि कितनी जल्दी इस पर बात हो जाए और कितनी जल्दी हमारे दर्शक इस विषय के बारे में जान जाए। संस्कृत पर जब हम बात कर रहे थे तो आपने अवधान के विषय में बताया था। इतनी अद्भुत एक शक्ति हमारे पास है जिसको हमें रिवाइव करना है। फिर हमने अवधान के विषय में बात की तो हमें गणपति मुनि जी के
(02:48) बारे में पता चला। उनके विषय में जब आपने बताया और और शोध किया आपके मैंने आर्टिकल्स पढ़े तो आज के समय में अगर देखा जाए तो जैसे महर्षि वाल्मीकि जी और वेदव्यास जी थे तो आज के समय में उस स्तर का अगर कोई कवि फिलॉसफर दार्शनिक हुआ तो गणपति मुनि जी हुए और अवधानी भी हैं। एक प्रकार से जैसे वो कहा जाता है ना कि जो आध्यात्म में जाता है तो तो ऐसे ही लोग होते हैं। उनको कुछ आता नहीं है। वो तो सब छोड़ चुके होते हैं। आध्यात्म में जाना मतलब ऐसा देखा जाता है कि कुछ ना करना हो जीवन से आप बेकार हो चुके हैं तो आध्यात्म रास्ता है। बहुत से
(03:27) लोगों क्योंकि मैंने एक लोगों के साथ किया था तो उन्होंने यही बताया कि अभी आध्यात्म में वही लोग उनके आश्रम में आते हैं जो जीवन से हार चुके हैं। डिप्रेस्ड है। लेकिन गणपति मुनि जी एक ऐसा व्यक्तित्व है जहां पर दिखता है कि आध्यात्म में कितनी शक्ति है। वो अवधानी भी हैं। वो कवि भी हैं। वो रचनाकार हैं। मंत्रों की रचना उन्होंने की, श्लोकों की रचना की। तो उनका विषय जो है वह मुझे लेना है और जिस प्रकार से आपने उनके विषय में हमें बताया है तो मैं चाहता हूं कि दर्शक भी जाने। तो पहले हम यहीं से प्रारंभ करेंगे कि गणपति मुनि जी कौन हैं? बहुत
(04:02) अच्छी बात है और हमारे देश में हमारे ऋषि परंपरा में ऐसे ऐसे ऋषि लोगों का जन्म हुआ है और होता रहता है। होता रहेगा भी। जिनके बिना भारत ही नहीं है। भारत की सभ्यता का जो आधार है मूल है यह यही ऋषि परंपरा और इन ऋषियों का ही जो दान है जो देन है तो इसी ने ही हमारे सभ्यता का संस्कृति का आधार अध्यात्म का आधार बनाया है। मेरा परिचय गणपति मुनि जी से होता है
(04:54) 1999 को जब मैंने एक अवधान कार्यक्रम का आयोजन कर रहा था और अवधान के विषय पर थोड़ा बहुत उसी समय भी मेरा परिचय हुआ था क्योंकि मैं श्री अरविंद आश्रम में रहता था तो वहां पे एक नाम बहुत प्रसिद्ध था कपाली शास्त्री कपाली शास्त्री शास्त्री कपाली शास्त्री बहुत बड़े वेद विद्वान थे। श्री अरविंद के शिष्य थे। श्री अरविंद आश्रम में रहा करते थे। उनको मैं पढ़ता था क्योंकि वो वेद के बड़े विद्वान थे। और श्री अरविंद
(05:41) के दृष्टि से वेद का व्याख्यान करते थे। उनके सिद्धांजना भाष्य जो है ऋग्वेद के ऊपर यह अपूर्ण है। फिर भी जितना उन्होंने लिखा है वो बहुत ही गंभीर विषय है और व्याख्यान बहुत अलग प्रकार का है। तो वो मैं पढ़ता था कपाली शास्त्री जी के अनेक जो लेख होता था वेद के ऊपर उपनिषदों को ले गीता के रहस्य के बारे में काव्य के बारे में उनको पढ़ते पढ़ते पढ़ते पढ़ते उनका संस्कृत में एक लेख मैंने पढ़ा वाशिष्ठ वैभवम
(06:26) तो मैंने सोचा कि यह शायद वशिष्ठ ऋषि के बारे में लिखा होगा क्योंकि पढ़ा नहीं था मैंने केवल नाम पढ़ा फिर वाशिष्ठ वैभवम को पढ़ा तो मुझे गणपति मुनि के बारे में पता चला क्योंकि वाशिष्ठ वैभवम संस्कृत में लिखा लिखा हुआ गणपति मुनि के बायोग्राफी है, जीवन है उससे मुझे परिचय मिला। तो कपाली शास्त्र के माध्यम से लेख के माध्यम से मुझे गणपति मुनि के बारे में पता चला। उसको मैं पढ़ा पूरा संस्कृत में और बहुत ही सिंपल संस्कृत में ही लिखा हुआ है। बहुत सरल है और अद्भुत अद्भुत चीजें इनके व्यक्तित्व के बारे में पता चला
(07:13) और तो उसी समय मैं अवधान का कार्यक्रम भी आयोजन कर रहा था और उनके अवधानी एक थे। बहुत बड़े अवधानी थे गणपति मुनि यह मुझे उनके पुस्तक से पता चला कि किस प्रकार के अवधान करते थे। कैसे करते थे फिर उनके जीवनी के बारे में मैंने पढ़ना शुरू किया और मुझे बहुत ज्यादा पता नहीं था उनके बारे में। वशिष्ठ वैभवम को पढ़ने के बाद फिर मैंने अ उनका और एक पुस्तक मेरे हाथ में आया जो शंकर नारायणन के द्वारा लिखा हुआ है जो रमण महर्षि जी और गणपति मुनि दोनों के बारे में है वह
(08:00) पुस्तक लघु पुस्तक है उससे मुझे फिर उनके जीवनी के बारे में उनके जीवन के बारे में दर्शन के बारे में काम के बारे में थोड़ा बहुत पता चला उसी से मेरी यात्रा शुरू हुई गणपति मुनि के बारे में और खोज करने का। सबसे बड़ा आनंद मुझे आया जब मैंने उनके जीवनी पढ़ रहा था। उसमें एक चीज आया कि उनका जन्म 1878 को 17 नवंबर को है और उससे मुझे लगा कि मेरा भी उनके साथ कुछ संपर्क रहा होगा क्योंकि मेरा भी जन्मदिन 17 नवंबर को ही
(08:46) है तो थोड़ा लिंक मुझे लगा कि शायद होगा कुछ संयोग इस बात पे नहीं तो मैं इनके काम में इनके जीवन के बारे में दर्शन के बारे में साहित्य के बारे में इतनी प्रबल आकांक्षा अभिप्साह मेरे अंदर क्यों जाग रहे हैं तो यह मैं पढ़ता था तरह-तरह की पुस्तकें और उनका अवधान कला के बारे में मैं ज्यादा थोड़ा सा रिसर्च करने लगा। फिर एक अद्भुत बात हुई। 2002 की बात है। तमिलनाडु में एक सरकारी ऑफिसर थे जिनका
(09:33) नाम था के नोटेशन। वो रिटायर्ड हो चुके थे। और रमणाश्रम में रहते थे। वह गणपति मुनि जी के शिष्य थे। और उनको गणपति मुनि जी ने यह बताया था जब उन्होंने पूछा कि मेरा क्या काम है? क्या साधना है? गणपति मुनि जी बोले कि देखो जितना भी मेरा संस्कृत का लेख है तो उसको तुम पढ़ो और लिखते रहो। तो उन्होंने गणपति मुनि जी के जितना लेख था उसको संग्रह किया और उसी को एक अपने नोटबुक में वह लिखते रहते थे। लिखते रहते थे और उनका एक
(10:22) संकल्प यह था। यह तो मैं लिखता आ रहा हूं। पर उसको कभी ना कभी पुस्तक के रूप में यह सब प्रकाशित होना चाहिए। आप मानिए 2002 तक गणपति मुनि जी के जितने संस्कृत में लेख है वह सब प्रकाशित नहीं हुआ था। कुछ काम प्रकाशित हुए थे। सब नहीं कुछ प्रसिद्ध काम उनके जैसे उमा सहश्रम है वह प्रकाशित हुए थे रमण चत्वार यह प्रकाशित हुए थे लेकिन उसके अलावा भी बहुत सारे काम थे जो नटिशन जी ने उनको संजो के रखा था नटिशन जी के जो दामाद हैं डॉक्टर सुबोधा प्रसाद पानी
(11:12) हमारा परिचय था उनसे से एक पारिवारिक परिचय आप मान लो। उन्होंने मेरे पास नटेशन जी को ले आए 2002 को और फिर वो लोग अपने हिसाब से ये गणपति मुनि जी के काम को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने का कुछ थोड़ा बहुत काम शुरू किया था। फिर बोले कि नहीं हम इनके पास जाते हैं। यह हमारा सहयोग कर सकते हैं। तो हमारे पास आए और बोले कि यह सारा काम मैंने संजो के रखा है और हमारा प्रयास है कि कम से कम उन्होंने यह बोला था कि मैं चाहूंगा कि मैं गुजर जाने से पहले कम से कम मेरे गुरु
(11:58) जी का एक पुस्तक एक वॉल्यूम देखना चाहता हूं प्रकाशित रूप में। मैंने बोला कि आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं? क्योंकि वह जब आए थे ऑलमोस्ट लेट 80ज में थे। ठीक है नटेशन जी नटेशन जी लेट 80 में थे तो वो आए मैंने बोला कि नहीं आप पूरा का पूरा काम देखोगे आप क्यों सोच रहे हो ऐसे हम मिलकर काम करेंगे और मेरे लिए मैंने देखा कि यह तो एक दैवी संयोग है क्योंकि जो मैं चाह रहा था गणपति मुनि जी के बारे में जानने की इतनी प्रबल आकांक्षा थी वो खुद ही आ गए मेरे पास मेरे घर आ गए हैं और सारे मनुस्क्रिप्ट्स इसको एडिट करके इनके काम करने का मतलब है इनके काम के माध्यम से
(12:44) उनकी चेतना से मैं जुड़ जाऊंगा। तो यह काम हम शुरू किए मेरी पत्नी ने और मैंने हम दोनों ने मिलके तो मेरी पत्नी को कंप्यूटर का ज्ञान है। तो वो हैंड रिटन मैनुस्क्रिप्ट से कंप्यूटर में सारे जो लेख है उसको वो टाइपिंग करती थी। उसका रोमन वर्शन भी बनाती थी और देवनागरी वर्शन भी बनाते थे। पहले टेक्नोलॉजी इतना नहीं था उस समय कन्वर्ट करने का और हर चीज को दोबारा टाइप करना पड़ता था। दोबारा प्रूफ रीडिंग करना पड़ता था और यही सब हम करते थे और हम निस्वार्थ भाव से सेवा के रूप में इस काम को हमने अपने ऊपर लिया था हम दोनों ने तो यह काम 2002 से शुरू होकर 2009 तक और 2009
(13:35) को 11वां वाला वॉल्यूम जो है मैंने नटेशन जी के हाथ में पकड़वाया और वो फिर एक बार बोले कि अब और कितना काम बाकी है? मैंने बोला कि जितना काम आप दिए थे वो तो सब हो चुका है और अब कुछ नहीं है। 12वां वाला जो वॉल्यूम है वो इंडेक्स वॉल्यूम है। उसमें मैं देख लूंगा उसको क्योंकि वो उसमें गणपति मुनि जी का लेख जितना आप दिए थे वो सब कंप्लीट हो चुका है। बड़े खुश हुए। फिर बोले कि अब तो मेरा काम हो गया। फिर मेरा अब आगे को रहने का फिर क्या अर्थ है? तो फरवरी के महीने में पुस्तक हम पकड़ाए थे। अब मानो मार्च, एंड और अप्रैल
(14:23) तक फिर वो शरीर छोड़ छोड़ दिए। तो मुझे यह भाव आया जब मुझे खबर आया कि वो शरीर छोड़ दिए हैं। मेरा तो मतलब चेतना ग्रेटट्यूड से भर गया भगवान के प्रति कि देखो एक व्यक्ति का एक संकल्प था कि अपने गुरु का संपूर्ण काम को वो देख सके और उस काम में मैं माध्यम बना और मुझे ही माध्यम बना के एक पूर्ण जीवन वह जिए। एक पूर्णता उनके मन में यह आई जाने से पहले कि नहीं यह काम पूर्ण हुआ। उनके भीतर कितना ग्रेटट्यूड होगा। कितने अपने गुरु की कृपा रही होगी और वो गुरु कृपा का मैं भी एक भागी हूं जो कि मेरे माध्यम से यह हो पाया। तो यह बात
(15:11) को सोच के जब भी सोचता हूं हृदय मन प्राण चेतना कृतज्ञता से भर उठता है कि चलो हम एक दैवी काम में योगदान दिए और उसका माध्यम बने तो इसी प्रकार मेरे गणपति मुनि जी के काम में उनके साथ उनके जीवन उनके दर्शन उनके काम को बार-बार पढ़ना पड़ता था प्रूफ रीडिंग करना पड़ता था यह सब करते करते उनके संपूर्ण चेतना संपूर्ण संपूर्ण दर्शन के साथ जैसा मेरा एक बहुत अच्छा सा संबंध बन गया। तो इसी प्रकार यह संबंध बना गणपति मुनि जी के साथ। अब प्रश्न उठता है कि गणपति मुनि जी थे कौन? वो आंध्र प्रदेश में उनका जन्म हुआ है।
(15:58) 1878 को 17 नवंबर एक कलवर विलेज है। जहां पे उनका जन्म हुआ। उनके जन्म की भी जो कहानी है अद्भुत है। उनके पिताजी और माताजी एस्पायर करते थे कि एक बच्चा हमारा होए और जब वह कंसीव हुए उस समय एक वो मंदिर में गए थे उनके माताजी वो जो उनके पिताजी गए थे मंदिर में और यहां पे उनके घर में उनके माताजी नरसिम्हांबा उनके पिताजी थे नरसिम्हा शास्त्री तो यह एक सपने में देखते हैं कि वह किसी एक सूर्य मंदिर में उपस्थित है और वहां पर
(16:47) एक देवी एक ज्योति लेके उनके पास आ रहे हैं और सीधा-सीधा यह ज्योति जो है यह इनके गर्भ में प्रवेश कर जाता है। फिर उसके बाद वह कंसीव होते हैं और उनके पिताजी को यह लगता है। उनको भी एक सिमिलर अनुभव होता है काशी में। उस समय वह काशी में थे। तो उनको यह लगता है कि स्वयं गणपति मुनि स्वयं अग्नि गणपति के रूप में हमारे घर में आ रहे हैं। इसीलिए उन्होंने उसी समय ही तय कर लिया था कि उनका नाम गणपति रह रखा जाएगा और उनके जन्म से ही यह लगता था कि यह बड़े तेज है और बड़े विद्वान बनेंगे और उसी प्रकार उनकी शिक्षा दीक्षा घर में
(17:35) ही शिक्षा दीक्षा हुई। उनके पिताजी, उनके दादाजी, प्रकाश शास्त्री और नरसिम्हा शास्त्री यह उनको पढ़ाते थे। संस्कृत के व्याकरण, साहित्य, वेद, वेदांग ये सब बचपन से वो पढ़ते थे और इसी प्रकार उनकी शिक्षा आगे बढ़ती रही। फिर आगे चलकर वो कैसे इतने बड़े कवि बने, योगी बने, तपस्वी बने, एक ऋषि बने और उनका क्या योगदान था और यह सब के ऊपर हम आगे चलकर फिर बात करेंगे। पर उससे पहले मैं यह भी बताना चाहता हूं कि गणपति मुनि जी भगवान रमण महर्षि के
(18:26) प्रथम और प्रमुख शिष्य थे। भगवान रमण महर्षि का नाम बहुत लोगों ने सुना होगा पर गणपति मुनि के नाम कम लोग सुने होंगे। और यह जो भगवान रमण महर्षि यह जो नाम है यह उनका पहला नाम नहीं था। यह नाम गणपति मुनि ने ही रखा है। पहले उनको लोग ब्राह्मण स्वामी के नाम में जानते थे। और गणपति मुनि जी जब 25 साल के उम्र के थे उस समय उनको उस समय तक वो एक प्रतिष्ठित
(19:12) कवि के रूप में तब तक उनको काव्यक उपाधि भी मिल चुका था और वो बड़े कवि के रूप में विद्वान के रूप में उपासक के रूप में वो वो जाने जाते थे। फिर भी उनके मन में कुछ असंतुष्टि थी। मतलब खुद के तपस्या को लेके वो इतना संतुष्ट नहीं थे। तो वो जब ब्राह्मण स्वामी के पास पहुंचे और उन्होंने यह बोला कि सारे शास्त्र मैं पढ़ चुका हूं। जैसे जैसे तपस्या करने की जो हमारी परंपरा है, वह तपस्या भी मैं कर चुका हूं, कर रहा
(20:00) हूं। फिर भी मुझे नहीं लगता है कि तपस्या का क्या अर्थ है यह मैं जान गया हूं। मतलब उनके जैसे बड़े तपस्वी यह बोल रहे हैं। इतने तपस्या करने के बाद भी तपस्या का अर्थ ही नहीं मुझे पता है। मुझे नहीं लगता है कि तपस्या के अर्थ को सही तरीके से समझ के मैं तपस्या कर रहा हूं। तो आप मेरा मार्गदर्शन करिए। और मुझे बताइए कि मैं कैसे तपस्या करूं। क्यों यह असंतुष्टि मेरे भीतर है कि यह पूर्णता मुझे प्राप्त नहीं हुई है। यह पूर्णता की ओर मैं कैसे आगे बढूं? तो फिर
(20:46) गणपति मुनि उन्हें कहते हैं कि जो अहम है हम बोलते हैं अगर अहम ब्रह्मास्म यह अहम के मूल को ढूंढ निकालना यह तपस्या है। ब्राह्मण स्वामी कहते हैं ब्राह्मण स्वामी कहते हैं कि अपने भीतर अगर स्वयं ब्रह्म हो बोलते हैं कि अहम ब्रह्मास्म यह अहम तत्व को यह ब्रह्म तत्व को स्वयं में ढूंढ निकालना यह तपस्या है। किसी भी मंत्र का जब हम उच्चारण करते हैं इस मंत्र के साथ जब हमारा तादात्म बन जाता
(21:34) है जब हम एकात्म हो उठते हैं और उस स्पंदन में जो पवित्रता है उस स्पंदन में जो शक्ति है वो शक्ति जब हमारे चेतना में समाहित हो जाती है। तब मानो कि तपस्या हो रही है। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा नहीं कि पहली बार भगवान रमण महर्षि ने ही यह बात कही है। यह तो सनातन तत्व है। यही तत्व है। यही सत्य है। पर एक सद्गुरु जब इसी बात को दोहराता है। सद्गुरु का जैसे शक्ति है। जो शक्ति है, जो आध्यात्मिक शक्ति है, जो योग शक्ति है,
(22:21) जो तपशक्ति है, वो शिष्य के चेतना में अपने आप प्रवेश करती है। इन संदेश के माध्यम से। तो तब गणपति मुनि जी के भीतर एक अलग प्रकार का भाव उगता है। अलग प्रकार की ऊर्जा जैसे कि उनमें शक्तिपात हुआ है। गुरु की कृपा हुई है तो आगे चलकर वह तपस्या के मार्ग में और भी निमग्न हो जाते हैं और गंभीर रूप से अपने तपस्या के काम को वो आगे बढ़ाते हैं। फिर भगवान रमण महर्षि के मार्गदर्शन में वो अपने जीवन के तपोमय जीवन को वो आगे
(23:08) बढ़ाते रहते हैं। और इसमें और एक बात है भगवती की कृपा वह मानते हैं। दैवी कृपा मानते हैं कि यह दैवी कृपा के बल से मेरा भगवान रमण महर्षि से मिलन हुआ है। भगवती जगदंबा की कृपा से यह मिलन हुआ है। मेरे गुरु से वह मिलाए हैं। तो मैं कृतज्ञता कैसे ज्ञापन करूं? वह कृतज्ञता ज्ञापन करने के लिए उन्होंने यह संकल्प लिया कि भगवती के नाम में मैं एक काव्य रचना करूंगा और उसमें 1000 श्लोक होंगे। यह 1000 श्लोक को मैं भगवती उमा
(23:58) के नाम पर समर्पित करूंगा और यह मेरे गुरु के प्रति भगवती कृपा के प्रति मेरी कृतज्ञता होगी। तो जो उमा सहस्रम उनके जैसे बोलते हैं ना उनका सर्वश्रेष्ठ कृति वही है मैग्नम ऑफ जिसको कहते हैं वो उमा सहस्त्रम है। 1000 श्लोक हैं उसमें तो वो 1000 श्लोक वो भगवती उमा को समर्पित कर लिखते हैं। यह उमा सहस्त्रम जो है यह बहुत एक अध्यात्म परक काव्य है और उसमें काव्य भी है। अध्यात्म भी है और तंत्र शास्त्र का जो
(24:43) सार तत्व है वह भी है। अगर तंत्र को तंत्र विद्या को तंत्र शास्त्र को श्री विद्या की उपासना को कोई समझना चाहे वो उमा सहश्रम को पढ़कर भी समझ सकता है। ठीक है? तो जितने भी 10 महाविदएं हैं ये 10 महाविदओं को आप इसके भीतर भी आप पाएंगे उमासा आश्रम में और ये उनके जो गुरु के साथ जो मिलन हुआ उसके कृतज्ञता ज्ञापन करते हुए उन्होंने यह काव्य को लिखा था। अब थोड़ा उनकी रचनाओं के विषय में बताइए कि क्यों हम उनको महर्षि वाल्मीकि जी, वेदव्यास जी, कालिदास जी के समकक्ष रख रहे हैं। जब ये
(25:30) उम्र 10 साल के थे जी तब उनका पहला जो काव्य है छोटा सा काव्य है भृंग संदेश। भृंग संदेश 10 साल की उम्र में उन्होंने लिखा था और उनके अंदर यह कविता स्वयं ही उत्पन्न होती थी। काव्य करना जैसे उनके स्वभाव में है। उनके चेतना में है। जहां बैठते थे वो काव्य आ जाता था। उनके अपने में वो काव्य रचना कर लेते थे। और बड़ी रोचक कहानियां है उनके जीवन में। किस प्रकार के प्रतिभा
(26:15) संपन्न थे। और एक बात यह भी मैं बताना चाहता हूं कि गणपति मुनि जी कहीं एक जगह स्थिर होकर तपस्या नहीं करते थे। समग्र भारतवर्ष में, कभी कर्नाटक में, कभी कश्मीर में, कभी आंध्र प्रदेश में, कभी तमिलनाडु में, कभी ओसा में और मैं तो बड़ा भाग्यशाली मानता हूं। मेरा जो क्षेत्र है विरजा क्षेत्र जाजपुर वो विरजा क्षेत्र में भी जाकर गणपति मुनि ने तपस्या की है। विरजा मंदिर में भुवनेश्वर में रह के तपस्या की है। काशी में कांचीपुरम में
(27:01) कहां-कहां नहीं रहे हैं वह। और हर जगह वह जाते थे। पंडिचेरी भी आए थे। उसके बारे में भी मैं आगे थोड़ा बताऊंगा कि कैसे उनका संबंध हुआ। श्री अरविंद के साथ और जब वह पंडिचेरी आश्रम में आए उस समय क्या हुआ यह भी बड़ी रोचक कथा है उसके बारे में हम बात करेंगे तो ये जहांजहां जाते थे अपने कवित्व से अपने अवधान सामर्थ्य से सब कुछ चौका देते थे सब कुछ चौका देते थे तो काशी में पहुंचे बड़े-बड़े विद्वान लोग भी मतलब उनका सम्मान करते थे कि क्या काव्य वह करते थे। फिर वहां वह पढ़ते थे भी लोगों से क्योंकि उनको जानना भी था बहुत सारी
(27:50) चीजें। तो वहां से एक परमिशन लेटर लेके उस समय जैसे सलाह का परीक्षा होती है। जगह-जगह शास्त्रार्थ होता था। शास्त्रार्थ में फिर प्रमाण पत्र दिया जाता था लोगों को। तो इस प्रकार की एक परीक्षा नवद्वीप में नदियां नवद्वीप में होता था। तो वहां पर गणपति मुनि जी को काशी में यह बोला गया कि आप वहां जाइए तो वहां से वह परमिशन ले वहां पहुंचे नवद्वीप में। फिर नवद्वीप परीक्षा में प्रवेश पाना भी बहुत कठिन बात है। संयोग बस जो भी हो वो वहां तक वो पहुंचे। एकदम
(28:40) दुबला पतला इतने कम उम्र के बच्चे हैं। तो वहां पहुंचने के बाद भारी सभा है तो वहां वो बैठ के जैसे मंच के ऊपर बैठे हुए हैं। बड़े-बड़े विद्वान लोग अंबिका दत्त वहां पे सबसे अध्यक्षता वो करते थे। वहां पे सबसे बड़े विद्वान हैं वो। तो गणपति मुनि ने जो उनके पास बैठे थे उनको ऐसे मतलब पूछा कि यह कौन है? उनको परिचय नहीं था। तो अंबिका दत्त ने देख लिया तो उन्होंने कविता में अपना परिचय देके उनको बताया कि सत्वर कविता सविता गडोहम कश्चित अंबिका
(29:32) दत्ता कि मतलब काव्य करने में सत्वर कविता सविता सविता का मतलब है सूर्य है जैसे सूर्य के सामने कोई टिक नहीं सकता कविता के क्षेत्र में मेरे सामने कोई टिक नहीं सकता। ऐसे ऐसे भाव आता है। इसको कई प्रकार से इंटरप्रेट किया जा सकता है। मतलब ये कवि सूर्य थे। कविता सविता सत कविता सविता गडो हम गदेश हूं और कश्चित अंबिका दत्ता मतलब अपना नाम भी बता दिया। अंबिका दत्ता तो फिर गणपति मुनि ने जिस छंद में उन्होंने बताया उसी छंद में अपना परिचय देते हुए बताया गणपति रीति कवि
(30:22) कुलपति अति दक्ष दक्षिणात बोले मैं दक्षिणात हूं दक्षिण से आया हूं अति दक्ष और कवि कुलपति कवियों के परंपरा में मैं पति हूं स्वामित्व काव्य करने में बता तो दिया सब चौंक गए कि कितने मतलब शुद्ध रूप में उन्होंने बताया और फिर आगे चलकर उन्होंने और भी थोड़ा बात किया क्योंकि उन्होंने अपना नाम बताया अंबिका दत्त और यह थे गणपति मुनि तो उन्होंने फिर आगे चलकर बताया उनको उनको भी चौंका दिया यह बता के भवान दत्त अहम तू औस
(31:12) आप तो दत्त हो अंबिका दत्त मतलब माता जी की कृपा अहम तू औरस मैं तो स्वयं गणपति हूं तो ऐसे करके यह सभा चली और उसमें जितने प्रश्न पूछे गए सारे प्रश्नों का उत्तर एक-एक करके इस प्रकार दिए कि संपूर्ण सभा चूक गई। स्वयं अंबिका दत्त खड़े हो गए। गले लगाए और उनको काव्य कंठ की उपाधि वहां पर प्रदान की गई कि आज से यह काव्य कंठ गणपति मुनि के रूप में जाना जाएंगे। वहां पर प्रमाण पत्र ले फिर वह आते हैं काव्य कंठ बनके। कविता करना उनके स्वभाव में ऐसा
(32:02) था। मद्रास में अवधान करते वक्त उनको एक चैलेंज दिया गया था घंटा शतकम मतलब एक घंटा समय दिया जाता है एक घंटे में आपको 100 श्लोक बनाना है और लोग बैठे हुए हैं आप जैसे-जैसे बोलते जाएंगे वो लिखते जाएंगे एक घंटे में 100 श्लोक बनाना है। उन्होंने इतने स्पीड से श्लोक बनाया। 6 मिनट में 25 श्लोक बनाए। इतनी तेजी से बनाए जो अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने बोला कि भाई आप रुक जाइए।
(32:48) इसी प्रकार अगर आप यही स्पीड से जाओगे कविता करोगे तो एक घंटे में 250 श्लोक बन जाएगा। तो आपके कवित्व की प्रतिभा तो इसी से ही प्रमाणित हो गया। तो इतने बड़े कवि थे और काव्य रचना के क्षेत्र में अगर हम संपूर्ण संस्कृत साहित्य में सारे काव्यों को ले लेते हैं। चाहे हम कालिदास को पढ़ें, भरहरी को पढ़ें, जितने भी बड़े-बड़े कवि हैं, माघ को पढ़े, भारवी को पढ़ें, जितने बड़े-बड़े कवि हैं उनको हम पढ़ें। तो हर कवि ने छंदों के माध्यम से अपना काव्य लिखा है और
(33:37) कितने छंदों का प्रयोग हुआ होगा। महाभारत में आप देखो कि 18 छंदों का प्रयोग है। रामायण में 13 छंदों का प्रयोग है। कालिदास में देखिए, भरतहरी में देखिए। मतलब आप यह मानिए कि अगर 30 35 छंदों के साथ हमारा संपर्क होता है हम समझ जाते हैं तो संपूर्ण लोक संस्कृत साहित्य को समझने में दिक्कत नहीं होगी क्योंकि 30 35 से ज्यादा छंदों का प्रयोग किसी कवि ने किया नहीं और आगे चलकर आप देखिए गणपति मुनि एक ऐसे कवि थे जिन्होंने अपने संपूर्ण साहित्य में 70 छंदों का प्रयोग किया है। 70 70 छंदों का प्रयोग केवल गणपति मुनि ने की
(34:27) है। और अपने उमा सहस्त्रम छंद जो काव्य है उमा सहस्त्रम में ही 29 छंदों का प्रयोग है। छंद के प्रयोग के बारे में अगर हम बात करना चाहे तो इतनी सरलता के साथ और इतनी दक्षता के साथ वो छंदों का प्रयोग करते थे और उनके तो काव्य में ऐसा है कि यह एक प्रार्थना है। प्रार्थना को इस प्रकार लिखते थे और जो अंतिम प्रार्थना होती थी अंतिम श्लोक जो होता था एक सेक्शन अगर वह लिख रहे हैं एक स्तबक 25 श्लोक में एक स्तबक बनता है तो एक स्तबक
(35:11) अगर लिख रहे हैं जैसे कि उन्होंने उमा सहस्त्रम लिखा ठीक है तो उसमें 100-100 श्लोक में बांटा जैसे शतक 10 शतक है तो हर शतक में चार तबक है तो 40 तबक है वहां पे। ठीक है? तो हर एक स्तक में 25 श्लोक रहते हैं और एक-एक स्तक एक-एक छंद में होता है। छंद का रिपीटीशन भी हुआ है इसलिए 40 अलग-अलग छंद ना होके 29 छंद है। तो अंतिम श्लोक एक-एक स्तक का जिस छंद में लिखा हुआ है उस छंद का नाम अंतिम श्लोक में भी डाला है। डाला जाता था। तो इस प्रकार वह लिखते थे वह भगवती की प्रार्थना
(35:58) जो करते हैं उसके अर्थ को भी दर्शाएं साथ ही साथ वो छंद का नाम भी उसमें स्पष्ट हो जाए और छोटे-छोटे अक्षर वाले छंदों का प्रयोग भी बड़ी कुशलता के साथ वो करते थे। चार अक्षर वाले छंद, छह अक्षर वाले छंद, पांच अक्षर वाले छंद, छह अक्षर वाले छंद। इनका प्रयोग भी बहुत ज्यादा उन्होंने किया है। 10 अक्षर वाले छंद, नौ अक्षर वाले छंद जिसका प्रयोग यूजली आप अनुष्टुप देखते हो तो सीधा उसके बाद त्रिष्टुप छंद देखते हो तो छोटे-छोटे अक्षर वाले छंद का प्रयोग कम होता था। तो और बड़ी सरलता के साथ उसको करते थे। जैसे तनु मध्या एक छंद है। छठे
(36:42) छह अक्षर वाले तो उसमें वो लिखते थे। कई प्रकार के श्लोक लिखते थे और उसको यह सारे जो छंद है वह गेय बन जाता है। इतना गेय है आप उसको बहुत सरलता के साथ सरसता के साथ मधुरता के साथ आप गा सकते हो इसको। तो इस प्रकार वो लिखते थे। तो काव्य रचना में बड़े अद्भुत अद्भुत काव्य रचना करते थे और भाव और भक्ति इसको भी इसकी भी गंभीर्य जो है आप देखो एक मैं उदाहरण देता हूं क्योंकि वो उनको गणपति का अवतार माना जाता है और भगवान रमण महर्षि को उन मतलब स्कंद अवतार माना जाता है। कार्तिकेय
(37:32) माना जाता है। प्राचीन में स्कंद जो है क्या बोलते हैं कि वो गणपति और स्कंद दोनों भाई होते हैं और यहां भी यह दोनों जैसे गुरु शिष्य बनकर आते हैं। तो गणपति गणपति का पूजन भी करते थे। गणपति की आराधना भी करते थे। इंद्र की आराधना भी करते थे। उनके कुछ कामों के बारे में भी हम बात करेंगे। अद्भुत प्रकार के काम उनका है। तो गणपति का पूजन करते हुए वह एक बार बोलते हैं। देखिए इसमें भक्ति भी है। किस प्रकार की भक्ति है और किस प्रकार के तादात्म किस प्रकार के भाव और किस प्रकार के संबंध वो अपने देवता
(38:19) के साथ वो बनाते थे। तो वो एक श्लोक में बोलते हैं गणपति को बोलते हैं घोरम करोमि न तपो यदि ते अपराधा हे गणपति मैं अगर घोर तपस्या करने में असमर्थ हूं तो यह अपराधा आपका है। किम प्रेरणम न कृतवानस रुद्रसन मैं आपका पूजा करता हूं और आप मुझे प्रेरित नहीं करते हो तपस्या करने के लिए अगर आप मुझे यह बोलोगे कि नहीं नहीं नहीं मैं तो प्रेरित करता रहता हूं तुम नहीं तपस्या कर रहे हो अगर बात यह है आप मुझे
(39:07) प्रेरित कर रहे हो और मैं तपस्या नहीं कर रहा हूं संप्रेरितस भवता यदि नाच रेयम और आपने संप्रेरितस भवता आपके द्वारा प्रेरित होकर भी मतलब आपने प्रेरणा दी और मैं नहीं कर रहा हूं यदि नाचरेम संप्रेरणस्य तवका गजवत्र शक्ति क्या आपके संप्रेरण की आपकी प्रेरणा की यही शक्ति है कि आप प्रेरणा दी और मैं नहीं कर पा रहा हूं मतलब इस प्रकार वह अपने भगवान के साथ बात करते थे कि क्यों नहीं प्रेरित करते हो। अगर प्रेरित करते हो तो क्या आपकी प्रेरणा की यही शक्ति है कि मैं नहीं करूंगा।
(39:54) तो जब वो सब अपनी तपस्या में असंतुष्ट हो जाते थे। इसी प्रकार अपने देवता के साथ बात करते थे। इसमें छंद भी देखिए, काव्य भी देखिए, अलंकार भी देखिए, सब दृष्टि से, काव्य की दृष्टि से, साहित्य की दृष्टि से, आध्यात्म की दृष्टि से एक इतने मतलब इतने रिचनेस है उसमें। ठीक है ना? मतलब काव्य रचना में चाहे गद्य काव्य हो या पद्य काव्य हो। शास्त्र निर्माण करने की काव्य निर्माण करने की हर विधाओं का प्रयोग उन्होंने अपने साहित्य में किया है। तो उनके भाष्य रचना भी है। उनके सूत्र ग्रंथावली भी है। उनके उपन्यास भी है। उपन्यास की शैली में
(40:43) उन्होंने उपन्यास भी लिखा है। उन्होंने आयुर्वेद पर भी लिखा है। उन्होंने तंत्र विद्या पर भी लिखा है। उन्होंने ज्योतिष शास्त्र पर भी लिखा है। साहित्य पर भी लिखा है। वेद भाष्य पे किया है उन्होंने। वेद के ऊपर भी लिखा है और इस प्रकार सूत्र शैली में भी लिखा है, भाष्य शैली में लिखा है, गद्य शैली में लिखा है, पद्य शैली में लिखा है। मतलब हर प्रकार के विधाओं का प्रयोग और इतने दक्षता के साथ यह इनके पूरे साहित्य में किसी को भी मिलेगा। साहित्य की दृष्टि से भी उनके साहित्य का उनके काव्य का उनके रचनाओं का एक समीक्षण भी कोई कर सकता है। पर अभी तक उनके
(41:32) साहित्य जो थे जो है मैंने जैसे अह प्रारंभ में बताया उनके संपूर्ण जो संस्कृत रचनाओं को हमने अह अलग-अलग विभाग में रखकर 11 वॉल्यूम में उसको प्रकाशित किया है। ऋग्वेद के 200 मंत्रों को गणपति मुनि लेते हैं। इन 200 मंत्रों को यह एक अलग प्रकार से व्याख्यान करते हैं। यह दिखाने के लिए कि महाभारत की पूरी की पूरी कथा जो है यह ऋग्वेद में है। और महाभारत के कुछ प्रसिद्ध चरित्र जो है
(42:21) युधिष्ठिर है, दुर्योधन है, द्रोपदी है, गांधारी है, कुंती है, धृतराष्ट्र है, अर्जुन है, भीम है, कृष्ण है। यह सब ऋग्वेद में है। तो ऋग्वेद के 200 और मंत्रों का व्याख्यान वो उसी प्रकार करते हैं, जिसमें महाभारत का स्टोरी लाइन दिखाते हैं। और महाभारत के चरित्रों का भी व्याख्यान वहां पे करते हैं। अद्भुत ग्रंथ है भारत चरित्र में मानसा और इसके ऊपर उन्होंने आंध्र विश्वविद्यालय में एक सीरीज ऑफ लेक्चर भी तेलुगु में दिया था इसी विषय पर वो भी रिकॉर्डेड है और संस्कृत में उनका जो ग्रंथ है भारत चरित्र
(43:06) में मानसा और यह भी माना जाता है कि जैसे आपने भी सुना होगा कि तंत्र जो है वो वेद से हटकर, वेदांत से हटकर यह एक अलग प्रकार का शास्त्र है। आगम आगम शास्त्र है। पर गणपति मुनि ने पहली बार वेद, वेदांत और तंत्र इनका समन्वय स्थापन किया। काली है तो काली की उपस्थिति वेद में और कौन से वेद मंत्र में हम काली महाविद्या की उपासना कर सकते हैं। जैसे तंत्र में महाविद्या है।
(43:53) इसी प्रकार उपनिषदों में विद्याओं का वर्णन है। ब्रह्मसूत्र में 32 प्रकार की विद्याओं का वर्णन है। और 32 से अधिक विद्याओं का वर्णन भी है। उपनिषदों में है। लेकिन एक व्यवस्थित रूप में अगर कहा जाए कि कहां एक जगह हमको सारी विद्याओं का वर्णन मिलेगा तो ब्रह्मसूत्र में है। तो उपनिषदों की जो विद्या है गणपति मुनि ने एक करेस्पोंडेंस एक जो लिंक है तंत्र के महाविद्या उपनिषदों की विद्या उनमें एक समन्वय स्थापन किया यह सब महाविद्या सूत्रों में
(44:41) मिलता है। तो यह महाविद्या सूत्र को पढ़ने के बाद यही भाव उत्पन्न होता है कि पहली बार किसी ने वेद वेदांत और तंत्र इनका एक समन्वय स्थापन किया। उदाहरण स्वरूप जैसे उपनिषदों की संवर्ग विद्या है। इस संवर्ग विद्या को वह काली महाविद्या के साथ जोड़ते हैं। काली तंत्र में जिस प्रकार वर्णन है काली महाविद का जो तत्व है वह तत्व संवर्ग विद्या में उपनिषदों की संवर्ग विद्या में है। वहां पर प्राण की महत्ता क्या है? यहां पर काली
(45:26) और काल काली जो है काल का स्त्रीलिंग है। तो वहां पर प्राण का महत्व क्या है? काल में संवर्ग विद्या में प्राण का महत्व क्या है? इस प्रकार बहुत ही सुंदर तरीके से उन्होंने वेद वेदांत और तंत्र का समन्वय स्थापन किया है। और एक बात है गणपति मुनि बहुत रिगरसली छिन्न मस्ता की उपासना करते थे। अरुणाचल अरुणाचल मतलब तिरुवनामलाई में जहां रमणाश्रम है तो वहां पे जो अह पहाड़ है तो उसका नाम है अरुणाचल। ठीक है? तो वो इसलिए उस जगह का नाम भी अरुणाचल है। तो वो अरुणाचल में रह
(46:13) के रमणाश्रम में रह के वो वहां पर तपस्या करते थे। उस समय की बात है। यह 1922 की बात है। वहां पे उनकी यह स्थिति होती है छिन्नस्ता की उपासना में कुंडलिनी जागरण होता है और इतनी तेजी से यह जागरण होता है कि उनके जो कल है जो कपाल है उसमें एक छेद बन जाता है। उस वो छेद से अग्नि उत्पन्न होती है। धुआं निकलने लगती है। फिर सब लोग जो उनके आसपास थे वह देखते थे और वह पूरा एकदम तेजियान बन गए हैं और फिर जाकर रमण महर्षि जी को बताए फिर रमण महर्षि दौड़ के आए और उनके सर पर हाथ रखे और कैस्टर ऑयल
(47:01) उनके सर पर डाले। इसको कपाल भेद कहा जाता है। यह कपाल भेद का जो अनुभूति है वह बहुत कम लोगों को होता है और जिनको होता है वह उसी समय शरीर छोड़ देते हैं क्योंकि वो उसी मार्ग में ही चले जाते हैं। पर यह कपाल भेद होने के बाद 14 साल और गणपति मुनि जिए क्योंकि गणपति मुनि का जो जो समाधिस्थ हुए वो 1936 को हुआ तो 1922 में उनका कपालभेद हुआ। तो वह कपालभेद होने के बाद उनके शरीर में ऊर्जा इतनी बढ़ गई कि रमण महर्षि ने उनको
(47:46) यह निर्देश दिया था कि वह कभी भूमि में नहीं चलेंगे। कठऊ पहन के चलेंगे और कोई उनको स्पर्श नहीं करेगा क्योंकि उनको कोई स्पर्श करे तो जैसे इलेक्ट्रिक शॉक लगता है ना ऐसे एक झटका लगेगा और उसी के साथ-साथ उनको स्वर्ण सिद्धि भी प्राप्त हुई थी। स्वर्ण सिद्धि का मतलब है कोई भी मेटल अगर उनके स्पर्श में आ जाता था तो वह गोल्डन बन जाता था। गोल्डन कलर बन जाता था। गोल्ड नहीं बनता था। गोल्डन कलर बन जाता था। तो इतना मतलब उनके शरीर में जैसे उपनिषदों में यह सब वर्णन है ना योगाग्निमयंम शरीरम उनका शरीर जैसे योगाग्निममय बन गया था वैद्युत शक्ति
(48:28) प्रवाहित होने लगते थे उनके शरीर के माध्यम से तो कभी-कभी लोग भी मतलब इसको टेस्ट करने के लिए कभी उनको वो बुलाते थे तो चटाई के अंदर पैसा या कुछ वो डाल देते थे पर वो गणपति मुनि जान लेते थे कि यहां पे कोई मेटल होगा क्योंकि उनको भी कुछ लगता था तो लोग अपने घर में भी मैंने ऐसे सुना है कोई-कोई लोग जो करते थे तो वह जो गोल्डन बन गया था उसको संजो के रखे हैं अपने पास ऐसी कहानी सुनी है कितनी सच्चाई है मुझे मालूम नहीं है पर हुआ होगा लोगों के अंदर वो क्यूरियसिटी रहा होगा पर इनको इस प्रकार की सिद्धि प्राप्त हुई थी और कपाल भेद के बाद उनकी जो रचना हम अगर
(49:12) देखेंगे तो उसमें में भी एक अलग अलग प्रकार का जो भाव है, अलग प्रकार का जो गंभीर्य है वो भी उनकी रचना में दिखाई पड़ता है। और आगे चलकर देखिए गणपति मुनि जी जो थे उनके जीवन का तीन धेय था। वैदिक सनातन धर्म का पुनर्जागरण यह उनका चरम लक्ष्य था। उसके साथ-साथ तपस्या के बल पर तपस्या के बल पर भारत माता को विदेशियों के जो हाथ से मुक्त करना।
(49:58) भारत माता के मुक्ति के लिए वो कठोर तपस्या करते थे। कितने पत्र लिखे हैं संस्कृत में। रमण महर्षि को अपने गुरु को कि भगवन जितनी कठोर तपस्या हो सकती है इतनी कठोर तपस्या मैं करता रहता हूं पर जो होना चाहिए वो क्यों नहीं हो रहा है और वो भारत की स्वतंत्रता के बारे में बात करते थे 1924 को जो तमिलनाडु में और बेलगांव में दक्षिण में कांग्रेस का जो अधिवेशन था। उसमें में भी वह भाग लिए थे और उसमें एक बात यह भी हुई थी वहां पे यह
(50:45) सब चर्चाएं होती थी कि हमारी भाषा क्या होगी? ऑफिशियल लैंग्वेज क्या होगी भारत की मुक्ति के बाद? तो उसमें एक मीटिंग में महात्मा गांधी ने स्पष्ट रूप में यह कह दिया था कि भारत स्वतंत्रता प्राप्त करने के उपरांत हिंदी हमारी भाषा होगी। तो वहां पे गणपति मुनि यह बोले थे कि जब तक संस्कृत भारत की भाषा नहीं रहेगी भारत की दशा सही नहीं होगी। संस्कृत भारत की भाषा है और भारत के भारत उसको अपना भाषा बना के रखे। भारत स्वतंत्र होने के उपरांत संस्कृत को ही उसकी भाषा बनाया जाए। उसको इतना प्रेम था संस्कृत
(51:32) में। संस्कृत के अलावा वह और कोई भाषा बोलते ही नहीं थे। तेलुगु में बोलते थे बहुत कम संस्कृत में बोलते थे सारी रचनाएं उनके संस्कृत में है तेलुगु में भी उनके रचनाएं हैं पर बहुत कम है संस्कृत की तुलना से तो यह उनके संस्कृत के प्रति प्रेम और भारत के प्रति प्रेम है तो इसी प्रकार बहुत सारे रोचक कहानियां है और जो महेंद्रगिरी है जिसको परशुराम का क्षेत्र माना जाता है पश्चिम ओसा में श्रीकाकुलम के पास महेंद्रगिरी है जिसको परशुराम का क्षेत्र माना जाता है। कहते हैं कि आज भी परशुराम के जो उपस्थिति है उसको वहां पर अनुभव किया जा सकता है। गणपति मुनि वहां पे
(52:17) तपस्या करते थे। 20 दिन तक बिना खाए बिना पिए वहीं पर वो मतलब उनको उठने का ही मन नहीं करता था। इतने डीप वह ट्रांस में चले गए थे उस जगह में स्वाभाविक रूप में उस जगह का यह महत्व यह बताते हैं कि यहां पे तो बैठते ही यह अपने आप कोई चला जाता है। फिर जो 20थ डे है उस दिन ऐसा उनको एक उपलब्धि हुई कि उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति बहुत तेजी से उनके पास आ रहा है। एक पराशु लेके और सफेद कपड़ा पहना हुआ है और वह उनके पास आकर उनको कुछ मतलब बोल रहे
(53:06) हैं और उनके साथ एकाकार हो गए हैं। फिर उन्होंने यह कहा अपने अपना एक शिष्य था दवरात उनका नाम है दवरात। वह उनके साथ जाते थे तपस्या के लिए। तो वहां पे उनको वह बताएं कि देवरात मुझे परशुराम सिद्धि प्राप्त हो गए। परशुराम का दर्शन साक्षात दर्शन हो गया और उनसे यह शक्ति भी प्राप्त हो गए। और परशुराम शक्ति का अर्थ यह है अद्भुत ऊर्जा शुद्ध ऊर्जा और जिसमें अन्याय, अधर्म यह सबको मिटा देने का जो सामर्थ्य है वह सामर्थ्य उनके भीतर आ गया। और इसी सामर्थ्य के बल
(53:53) पर जैसे मैंने बताया कि उनका एक लक्ष्य था कि वैदिक सनातन धर्म का पुनर्जागरण और ये भारत माता की मुक्ति एक और सामाजिक समस्या के साथ उस समय के वो लड़ते थे क्योंकि इस समस्या को यह ब्रिटिश लोग ले आए थे वहां पे अस्पृश्यता निवारण अनटचेबिलिटी वो इस पर शास्त्र भी लिख लिखे हैं। वह शास्त्र के आधार पर यह बताते हैं कि अस्पृश्य करके कुछ कोई है नहीं। शास्त्र के आधार पर वो लिखते हैं। यह अस्पृश्यता निवारण को लेकर उन्होंने बहुत मतलब एक एक्टिविस्ट के रूप में उस समय वो काम किए। इसलिए बहुत सारे जो उस समय का
(54:40) ऑर्थोडॉक्स लोग थे तो वो उनके अगेंस्ट थे। उनका विरोध करते थे और इस प्रकार उनका जीवन होता था और और एक रोचक बात यह है कि जो दवरात मुनि के बारे में मैंने बताया वह उनके शिष्य थे। देवरात मुनि एक बार उनके साथ तपस्या करते थे। और इतने वह ट्रांस में चले गए। उनको संस्कृत का इतना ज्ञान भी नहीं था। उनके साथ रहते थे। उनके सेवा करते थे और उनके साथ बैठकर मेडिटेशन करते थे। तो अचानक गणपति मुनि ने देखा कि यह जब ट्रांस
(55:26) में चले जाते थे कुछ बड़बड़ाता रहते हैं। तो उन्होंने पास जाकर सुना कि यह क्या बड़बड़ा रहे हैं। तो कुछ ध्वनि तो स्पष्ट थे। कुछ ध्वनि अस्पष्ट थे। अस्पष्ट ध्वनि को छोड़कर जो स्पष्ट ध्वनि था तो गणपति मुनि उसको लिखते जाते थे। मतलब एक शिष्य में कुछ हो रहा है। गुरु बैठकर उसको लिख रहे हैं। और अंत में जितना उनको स्पष्ट सुनाई दिया वह सबको लिखे। वह सबको ऑर्गेनाइज किए और बोले कि यह ऋग्वेद के नए मंत्र उनके माध्यम से अभिव्यक्त हो रहा है। इस प्रकार 400 मंत्र
(56:15) का उद्धार हुआ है और उस पर स्वयं गणपति मुनि उस पर एक भाष्य भी लिखे हैं। छंदो दर्शनम के नाम पर यह पुस्तक प्रकाशित हुआ है। भारतीय विद्या भवन से जिसमें इन मंत्रों को ऋषि छंद देवता के रूप में जैसे व्यास देव ने किया था ऋग्वेद का तो उसी प्रकार विभाजन करके उस पर भाष्य लिखे हैं गणपति मुनि यह एक अद्भुत गुरु शिष्य की कहानी है। शिष्य को मंत्र दर्शन हो रहा है। और गुरु उसको लिख रहे हैं। उस पर भाष्य लिख रहे
(57:01) हैं और शिष्य को एक मंत्र दृष्टा ऋषि के रूप में स्वयं सम्मानित करते हैं। तो इस प्रकार अनेक रोचक कहानियां उनके तपस्या को लेके उनके अवधान सामर्थ्य को लेके उनके अध्यात्म शक्ति को लेके उनके काव्य सामर्थ्य को लेके उनके सामाजिक समस्याओं का परिहार जो समाधान देने को लेके अनेक प्रकार के रोचक कहानियां उनके जीवन में है उपलब्ध है जो उनके बायोग्राफर्स लोगों ने लिखा है और विशेष करके के उनके शिष्य जो कपाली शास्त्री थे अपने वाशिष्ट वैभवम में अनेक प्रकार के जो कहानियां हैं उनको समावेश
(57:48) किए हैं उसमें और आचार्य जी जैसे आप बता रहे हैं कि भारत के प्रति जो उनके अंदर प्रेम था तो उनके विषय में पढ़ते हुए यह भी पता चला कि उन्होंने स्वयं से एक भारत का संविधान भी लिखा था कि अगर भारत मुक्त होता है तो भारत कैसा होना चाहिए। किस विधि विधान का पालन होना चाहिए? इसके विषय में भी बताइए। उनके मन में यह चिंता भी थी कि भारत स्वतंत्रता को प्राप्त तो करेगा ही पर भारत स्वतंत्र होने के बाद उसका संचालन कैसे होगा तो इस विषय पर भी वह बहुत चिंतित होते थे और 1934 को वो स्वयं अकेले बैठ के भारत का संविधान प्रणयन किया शास्त्रों के आधार पर
(58:42) और वहां पर संविधान सम्मिलित अनेक शब्दावली ऐसे हैं जिन शब्दावलियों को आप पढ़ो तो प्राचीन काल में इन शब्दावलियों के प्रयोग ज्यादातर जैसे राज्य के संचालन के लिए राज्य के कार्य के संपादन के लिए जिन शब्दावलियों का प्रयोग होता था वैदिक समय में तो उन शब्दावलियों का प्रयोग भी उन्होंने किया है। जैसे नरिष्ट मंडली इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया है। और 560 सूत्रों में उन्होंने जो संविधान बनाया है शास्त्र आधारित संविधान
(59:28) इसका नाम है साम्राज्य निबंधनम। और यह यही लिखते हैं कि भारताय इदम प्रक्रियते भारत के लिए ही यह बनाया गया है। भारत के स्वभाव, स्वधर्म और भारत की जो परंपरा है, भारत के जो धर्म शास्त्र की परंपरा है, स्मृति शास्त्र की परंपरा है, दर्शनशास्त्र की परंपरा है, समाजशास्त्र की जो परंपरा है, यह सबको समाहित करते हुए उन्होंने 560 सूत्रों में अलग-अलग विषयों को लेके भारत का संचालन हमारे शास्त्र आधारित कैसे हो सकता है? यह साम्राज्य निबंधनम शास्त्र को बनाया है। तो इसका भी मतलब
(1:00:16) अध्ययन हो के अह हो सकता है कि आज के जो संविधान है हमारे हो सकता है कि बहुत सारे तत्व उनमें से ऑलरेडी होगा या तो जैसे हमारे प्राचीन धर्म शास्त्र में स्मृति शास्त्र में जैसे रहता था तो इस प्रकार के एक शास्त्र है और उसमें से कुछ प्रेरणा ली जा सकती है पर इसका एक गहरा अध्ययन अध्ययन होना चाहिए जो अभी तक नहीं हुआ है। एक बात और भी मैं बताना चाहता हूं कि वह श्री अरविंद आश्रम आए उससे पहले उनके कुछ शिष्य जो ऑलरेडी आके श्री अरविंद आश्रम में रह चुके थे। और 1928 को
(1:01:05) 15th अगस्त उस समय वो आते हैं श्री अरविंदों का जन्मदिन होता है 15th अगस्त को तो उस समय वो 1928 को गणपति मुनि आते हैं श्री अरविंद आश्रम में और श्री अरविंद का दर्शन जब होता है तो उनको यह दिखता है श्री अरविंद ऐसे दिखते हैं कि जैसे कि 500 साल से कोई ऋषि यहां बैठा हुआ है और दिव्य पुरुषलु ऐसे तेलुगु भाषा में उन्होंने उनका मुंह से निकल पड़ा कि एक दिव्य पुरुष का दर्शन हुआ। हालांकि श्री अरविंद और गणपति मुनि उन दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई। वो दूर से उनको देखें क्योंकि
(1:01:49) श्री अरविंद बात नहीं करते थे किसी से। 1926 के बाद वो किसी से बात नहीं किए हैं। केवल जितना आवश्यक है माताजी उनसे बात करते थे। लेकिन अन्य किसी से वह बात नहीं करते थे। 1950 तक 24 साल वो अपने एक ही प्रकोष्ठ में अपनी तपस्या में मग्न थे। लेकिन माता जी के साथ श्री माता जो जो स्पिरिचुअल कोलबोरेटर थे श्री अरविंद के उनके साथ कुछ सेशंस गणपति मुनि के हुए हैं। उनके साथ बैठ के वो मेडिटेशन करते थे। और माता जी यह बताए हैं कि जितनी सहजता से यह मुनि चेतना के उच्च स्तर पर चले जाते
(1:02:37) हैं। जहांजहां मैं चले जाते हूं वो बहुत सहजता से वह चले जाते हैं। तो आज तक मैंने ऐसा कोई साधक नहीं देखा है जो उस चेतना तक इतनी सहज भाव से वह चले जाते हैं। पर कहने का मतलब यह है वह कहीं भी जाते थे। चाहे वह भुवनेश्वर में रहे, कर्नाटक में रहे, कांचीपुरम में रहे, काशी में रहे या कश्मीर में रहे, कहीं भी वह गए हैं तो वहां कुछ ना कुछ वो भगवती की कृपा से वो काम करते थे, काव्य रचना करते थे या शास्त्र लिख डालते थे। वो संस्कृत में कुछ ना कुछ वो लिखते रहते थे। तो इसी प्रकार उनके शिष्य लोग ने सारे काम को इकट्ठा करके संजू के रखे थे। तो जिसके कारण आज हम
(1:03:21) गणपति मुनि के सारे कामों के बारे में जो रचनाओं के बारे में हम जान पाते हैं। 1936 को वो बड़े थोड़ा सा अस्वस्थ रहे और वह अपने जगह रहना चाहते थे पर उनको खरकपुर में लिया गया है। खरकपुर में एक आश्रम बनाया जा रहा था जहां पर वह रह सके अपना कुटीर बना के आश्रम बना के तो उसी समय वो अपने शरीर छोड़ दिए कुछ अस्वस्थता के कारण फिर वही उनका 1936 को उनका देहांत होता है तो यह कहानी है गणपति मुनि के और ऐसे प्रचंड तपस्वी कवि दार्शनिक और एक समाज
(1:04:09) उद्धारक, समाज सेवक और एक बड़े शिष्य भी थे और एक बड़े गुरु भी थे और उन्होंने बहुत शिष्यों को भी बनाया है और ऐसा नहीं कि अपने शिष्यों को अपने ही पास बांध के रखा। जैसे मैं बोलता हूं उनके बहुत सारे शिष्य उनके पास से आके यहां पर श्री अरविंद आश्रम में श्री अरविंद और माता जी के शरण लिए उनके पास रह गए। यूजली क्या होता है? गुरु अपने शिष्यों को अपने पास बांट के रहता है। तो इस प्रकार के शिष्यों को पैदा किया है गणपति मुनि ने और उनके अंदर इस प्रकार के जो कंस्ट्रिक्टेड फीलिंग है मतलब एक भावना है कि नहीं यह हमारा
(1:04:55) संप्रदाय है। यह हमारे गुरु है। हम उनसे ही टिक के रहेंगे। हम अलग गुरुओं को क्यों अपनाएंगे? तो इस प्रकार का भाव उनके शिष्यों में कभी नहीं रहा। तो इस प्रकार के गुरु शिष्य परंपरा को भी आगे वो बढ़ाते रहे। तो इनमें उनकी महत्ता इनमें उनकी विशेषता है। आचार्य जी जैसे आपने बताया कि गणपति मुनि जी थे तो हम देख पा रहे हैं। साफ-साफ देख पा रहे हैं कि उन्होंने धर्म शास्त्र पर भी लिखा। काम शास्त्र पर भी लिखा है। संविधान पर बात की। तंत्र पर, दर्शन पर, वेद पर, आयुर्वेद पर, ज्योतिष पर। ज्योतिष पर। उसके बाद सामाजिक चेतना भी कैसे हम ऊपर कर सकते हैं? और ऐसा ही नहीं
(1:05:36) है। जैसे जब भी ऐसे विषय लेते हैं किसी महान व्यक्तित्व में और विशेषकर अगर वो भारतीय ज्ञान परंपरा से है तो पॉलीमैथ्स दिखते हैं हमें कि उनको मैथमेटिक्स भी आती है। विज्ञान भी आता है। दर्शन ज्योतिष अर्थशास्त्र पर भी बात कर रहे हैं। कला यहां पर क्या होता है आज के समय में कि किसी को विज्ञान आता है तो पहले ही बोल देता है मैं गणित का व्यक्ति हूं। मुझसे कला नहीं होगी। तो क्या भारतीय जो अभी वर्तमान हमारी शिक्षा प्रणाली है या जिस तरह की भारतीय बोले या उसे ग्लोबल बोले पॉलीमैथ्स को इतना सेलिब्रेट नहीं करती है। हम पिछले 2025 सालों में जैसे लेनाडो
(1:06:10) दाविची थे अगर हम वेस्ट की भी बात करें तो पॉलीमैक्स एक सेलिब्रेटरी फिगर होती थी कि इनको इतनी चीजें आती हैं और आज भी मैं देखता हूं जो गुरुकुल के बच्चे हैं या जो जिनके घर में वैदिक परंपरा रही उनके बच्चे थोड़ा कुछ तो गा ही देंगे। हमारे यहां ऐसा होगा कि बच्चे गा भी नहीं पा रहे हैं। स्कूल में भी इधर हो रहा है। मैथमेटिक्स अगर हैं तो मैथमेटिक्स में ही अच्छे हैं तो और किसी विषय में इतने अच्छे नहीं हैं। तो ये जो हमारे ऋषि मुनियों में दिखता है कि विषय कोई भी हो उसमें वो पारंगत दिखते हैं। तो ये प्रणाली क्या हम पुनर्जीवित कर
(1:06:44) सकते हैं? क्या अभी हमारे शिक्षा प्रणाली में चेंजेस आपको लगता है करना चाहिए कि हम पॉलीमैथ्स भी पैदा कर पाएं। केवल एक विषय के ज्ञाता ही ना रह जाएं। यह अवश्य है। हमारे गुरुकुल की परंपरा ऐसी ही थी। हमारे अध्ययन अध्यापन की परंपरा केवल गुरुकुलों में नहीं परिवार में भी इसी प्रकार की व्यवस्था थी। जैसे गणपति मुनि अपने पिताजी से अपने दादाजी से अपने परिवार में भी ऐसेसे लोग होते थे जो प्रकांड विद्वान होते थे। वह अपने बच्चों को सिखाते थे। घर में से संस्कार मिलता था। फिर गुरुकुलों में से गुरुओं की कृपा से भी संस्कार मिलता था। तो एक गुरुकुल और परिवार उनके
(1:07:27) बीच भी एक संबंध होता था। एक कम्युनिटी एजुकेशन की हम बात करें तो आजकल क्या होता है कि स्कूली सिस्टम में जैसे स्कूल है और कम्युनिटी है। कम्युनिटी का स्कूल के साथ कोई संबंध नहीं रहता है। मां-बाप भी बोलते हैं कि भाई हमने तो स्कूल में दे दिया फीस दे दिया। स्कूल देखेगा वह एजुकेट कर देगा। पर घर में वो एजुकेशन नहीं दिया जाता है। उसमें एक तालमेल होना चाहिए। समन्वय एक होना चाहिए। यह केवल स्कूल का ही दायित्व नहीं है और केवल परिवार का भी दायित्व नहीं है। परिवार का भी जितना दायित्व है। स्कूल का भी उतना दायित्व है। स्कूल का भी
(1:08:05) जितना दायित्व है। परिवार का भी उतना दायित्व है। जैसे मैंने अवधान के पडकास्ट में भी यह समझाया था कि ग्रहण, धारण, स्मरण, सामर्थ्य जो है तो जब बच्चे बड़े होते हैं उनके जो आंतरिक सामर्थ्य है उनके आंतर विकास को हम गुरुकुल व्यवस्था में ज्यादा ध्यान दिया जाता था। आंतर विकास को उनके इनर ग्रोथ को उनके इनर फैकल्टीज जो होते हैं उसको कैसे हम बढ़ाएं समर्थ बनाएं। तो अंदर से अगर कोई समर्थ है जिनका आंतरिक विकास हुआ है जिनके
(1:08:53) इंद्रियों में संस्कार है मन शुद्धि है चित्त शुद्धि है बुद्धि शुद्धि है शरीर शुद्धि है बोलते हैं ना आधार शुद्धि है तो उसको आप किसी भी काम में लगाइए वो सुचारू रूप से उसको संपन्न कर सकता है वो एक साथ एक कवि भी बन सकता है एक मैथमेटिक भी बन सकता है एक एथलीट भी बन सकता है एक अच्छा संगीत तज्ञ भी बन सकता है। तो यह जो व्हाट इज द की? आगे जो हम बनना चाहते हैं, जीवन के चरम लक्ष्य को जो हम प्राप्त करना चाहते हैं, उसके लिए कुंजी क्या है? माध्यम क्या है? उसको अगर हम पकड़ के हमारी शिक्षा
(1:09:40) व्यवस्था का हिस्सा बनाएंगे तभी एक हम समर्थ देश, समर्थ परिवार, समर्थ समाज व्यवस्था हम बना सकते हैं। और इनमें ऋषि मुनियों का योगदान बड़ा है। चाहे आप भगवान रमण महर्षि की बात करें, गणपति मुनि की बात करें, श्री अरविंद की बात करें, रामकृष्ण परमहंस की बात करें, स्वामी विवेकानंद की बात करें। इस समय के मतलब आधुनिक समय में जितने भी बड़े-बड़े योगी मुनि ऋषि लोग थे समाज सुधारक थे ना क्रांतिकारी लोग थे हर क्षेत्र में वह क्रांति पैदा करते थे तो केवल शास्त्र के क्षेत्र में नहीं है आप श्री अरविंद को भी देख लीजिए अध्यात्म के क्षेत्र में जो क्रांति लाए राजनीति के
(1:10:27) क्षेत्र में भी वही क्रांति लाए जैसे जिस प्रकार उन्होंने वंदे मातरम पत्रिका में लिखते थे ब्रिटिश लोग हिल जाते थे। पूरे भारत इकट्ठा हो जाता था उनके लेख को पढ़कर। विज्ञान के क्षेत्र में भी, साहित्य के क्षेत्र में भी उनके सावित्री के काव्य जो है कितना बड़ा क्रांति वो लाए काव्य के क्षेत्र में, कविता के क्षेत्र में, राजनीति के क्षेत्र में। तो ऋषि लोगों के भीतर यही चेतना विकसित होता है। कि अ ये किसी भी क्षेत्र में अपना योगदान देना चाहते हैं चाहेंगे और योगदान देते हैं।
(1:11:14) उसमें वो उस स्तर तक पहुंच जाते हैं। एक क्रांति पैदा कर देते हैं। तो इसीलिए हमारी ऋषि मुनि परंपरा को सम्मान देना उसी के अनुगुण अपने जीवन को बनाना और हमारे समाज व्यवस्था हमारे देश की संचालन की व्यवस्था हमारे शिक्षा व्यवस्था अगर इसी के अनुगुण हो ऋषि मुनियों की जो परंपरा है हमारे जो सभ्यतागत मूल्य बोध है हमारे जो संस्कृति है तो उसी के अनुगुण अगर बने तो हम अवश्य अवश्य ही जैसे हमारा प्राचीन भारत था जिस प्रकार हम इस मानव जाति का मार्गदर्शक बनकर आगे बढ़ते थे फिर उसी
(1:12:01) प्रकार हम आगे बढ़ते रहेंगे और भारत का आगे बढ़ने का अर्थ यह है कि मानव जाति का आगे बढ़ना भारत अगर विकसित होता है विकास की ओर बढ़ता रहेगा तो मानव जाति भी विकास की ओर बढ़ता रहेगा क्योंकि यह अध्यात्म की भूमि है, पुण्य भूमि है, देवभूमि है, तपस्थली है, तपस्या की भूमि है। यहां पे जिस समस्या का समाधान होता है पूर्ण विश्व में वो समस्या का समाधान अपने आप हो जाएगा। आचार्य जी बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपके माध्यम से आज एक विशिष्ट वीर बहुत महान विभूति के विषय में पता चला और एक आशा जगी कि ऐसा ही नहीं है कि भारत में ऋषि
(1:12:48) मुनियों का जन्म होना बंद हो गया है। ऐसे ऋषि मुनि हमारे बीच में हैं। यह हमारा कार्य है कि हम उनसे प्रेरणा लें। उनके कार्य को आगे बढ़ाएं। जिस प्रकार से आपने गणपति मुनि जी के कार्य को आप लेकर आ रहे हैं उनको एक जगह लाना उनको पब्लिश करना और जिस प्रकार से उनके विषय में हमें पता चला है तो दर्शकों को भी प्रेरणा मिलेगी और मैं चाहूंगा कि हम कुछ अभी प्रोवाइड करें चाहे आर्टिकल्स या छोटी-मोटी चीजें जो हमारे पास अवेलेबल है जिससे दर्शक पढ़ पाएं कि उनके विषय में उनके विषय में और शोध कर पाए और जो चीज उन्होंने की है कि आज हम उनको को एक
(1:13:29) उस लेवल पर रख रहे हैं जहां पर हम महर्षि वाल्मीकि और वेदव्यास जी की बात करते हैं कि वो वेदों से भी बहुत और उन्होंने वेद मंत्र के दृष्टा ऋषि जैसे शिष्यों के साथ वो रहे तो इसके साथ इस पॉडकास्ट को मैं यहीं पर समाप्त करूंगा और दर्शकों को भी यही प्रेरणा मिले कि इस तरह की महान विभूतियों से वह सीखें और अपने बच्चों के जीवन में और अपने जीवन में इस संस्कार को धारण करें। धन्यवाद। आचार्य जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद जुड़ने के लिए। नमस्कार।

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